विराट पर्व · अध्याय 73
भीम का विराट-वध का आग्रह; युधिष्ठिर द्वारा निवारण
जीते हुए वस्त्र बाँटकर अर्जुन युधिष्ठिर के पास आता है और भीम से पूछता है कि राजा मुँह ढककर क्यों बैठे हैं। युधिष्ठिर बताते हैं कि जब अर्जुन की प्रशंसा हो रही थी, तब विराट ने उन पर प्रहार किया; उन्होंने मुँह ढककर क्रोध रोके रखा, ताकि उनका रक्त भूमि पर न गिरे और अर्जुन का क्रोध उस राज्य का नाश न कर दे जिसने उन्हें आश्रय दिया था। भीम और फिर अर्जुन विराट को तुरन्त मार डालने की बात कहते हैं; युधिष्ठिर उन्हें रोकते हैं और कहते हैं कि अगले प्रातः सब भाई राजवेश में सिंहासनों पर बैठें, और यदि तब भी विराट उनका सम्मान न करे, तभी कुछ किया जाए। इसी निश्चय के साथ सब वह रात बिताते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.73.1)
प्रदाय वस्त्राणि किरीटमाली । विराटगेहे मुदितः सखीभ्यः । कृत्वा महत्कर्म तदाऽऽजिमध्ये । दिदृक्षया सोऽभिजगाम पार्थम् ॥
pradāya vastrāṇi kirīṭamālī | virāṭagehe muditaḥ sakhībhyaḥ | kṛtvā mahatkarma tadā''jimadhye | didṛkṣayā so'bhijagāma pārtham
विराट के महल में सखियों को वस्त्र देकर, युद्धभूमि में वह महान कर्म करने से प्रसन्न किरीटधारी अर्जुन युधिष्ठिर से मिलने की इच्छा से उनके पास गया।
श्लोक 2 (4.73.2)
तं प्रेक्षमाणस्त्वथ धर्मराजं । पप्रच्छ पार्थोऽथ स भीमसेनम् । किं धर्मराजो हि यथापुरं मां । मुखं प्रतिच्छाद्य न चाह किंचित् ॥
taṃ prekṣamāṇastvatha dharmarājaṃ | papraccha pārtho'tha sa bhīmasenam | kiṃ dharmarājo hi yathāpuraṃ māṃ | mukhaṃ praticchādya na cāha kiṃcit
धर्मराज की ओर देखते हुए पार्थ ने भीमसेन से पूछा—"धर्मराज पहले की तरह मुझसे क्यों नहीं बोलते? वे मुँह ढककर कुछ भी नहीं कहते।"
श्लोक 3 (4.73.3)
तमेवमुक्त्वा परिशङ्कमानं । दृष्ट्वाऽर्जुनं भीमसेनं च राजा । तदाऽब्रवीत्तावभिवीक्ष्य राज- । न्युधिष्ठिरस्तत्परिमृज्य रक्तम् ॥
tamevamuktvā pariśaṅkamānaṃ | dṛṣṭvā'rjunaṃ bhīmasenaṃ ca rājā | tadā'bravīttāvabhivīkṣya rāja- | nyudhiṣṭhirastatparimṛjya raktam
इस प्रकार शंका से भरे अर्जुन को और भीमसेन को देखकर, हे राजन्, राजा युधिष्ठिर ने उन दोनों की ओर निहारा और वह रक्त पोंछकर कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 4 (4.73.4)
दुरात्मना त्वय्यभिपूज्यमाने । विराटराज्ञाभिहतोऽस्मि पार्थ । तस्मात्प्रहाराद्रुधिरस्य बिन्दून् । पश्यन्न चेमे पृथिवीं स्पृशेयुः । इति प्रतिच्छाद्य मुखं ततोऽहं । मन्युं नियच्छन्नुपविष्ट आसम् ॥
durātmanā tvayyabhipūjyamāne | virāṭarājñābhihato'smi pārtha | tasmātprahārādrudhirasya bindūn | paśyanna ceme pṛthivīṃ spṛśeyuḥ | iti praticchādya mukhaṃ tato'haṃ | manyuṃ niyacchannupaviṣṭa āsam
"पार्थ, जब तुम्हारी प्रशंसा हो रही थी, तब उस दुष्ट राजा विराट ने मुझ पर प्रहार किया। उस प्रहार से टपकती रक्त की बूँदों पर दृष्टि रखते हुए, कि वे धरती को न छू लें, मैं मुँह ढककर अपने क्रोध को रोके बैठा रहा।
श्लोक 5 (4.73.5)
शुभार्ह राष्ट्रं न खिलीकृतं भवे- । द्वयं तु यस्मिन्सुखिनोऽभवाम । क्रुद्धे तु वीरे त्वयि चाप्रतीते । राजा विराटो न लभेत शर्म ॥
śubhārha rāṣṭraṃ na khilīkṛtaṃ bhave- | dvayaṃ tu yasminsukhino'bhavāma | kruddhe tu vīre tvayi cāpratīte | rājā virāṭo na labheta śarma
हे शुभ के योग्य अर्जुन, जिस राज्य में हम सुख से रहे, वह उजाड़ नहीं होना चाहिए। यदि तुम जैसे वीर क्रुद्ध और अप्रसन्न हो जाओ, तो राजा विराट को चैन नहीं मिलेगा।
श्लोक 6 (4.73.6)
अजानता तेन च शौर्यमाजौ । छन्नस्य सत्रेण बलं च पार्थ । इदं विराटेन मयि प्रयुक्तं । त्वां वीक्षमाणो न गतोऽस्मि हर्षम् ॥
ajānatā tena ca śauryamājau | channasya satreṇa balaṃ ca pārtha | idaṃ virāṭena mayi prayuktaṃ | tvāṃ vīkṣamāṇo na gato'smi harṣam
पार्थ, युद्ध में तुम्हारे शौर्य को और वेश बदलकर छिपे हुए तुम्हारे बल को न जानते हुए विराट ने मेरे साथ यह किया। तुम्हें देखकर भी मुझे हर्ष नहीं हुआ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (4.73.7)
तेनाप्रमेयेन महाबलेन । तस्मिंस्तथोक्ते शममास्थितेन । तं भीमसेनो बलवानमर्षी । धनंजयं क्रुद्धमुवाच वाक्यम् ॥
tenāprameyena mahābalena | tasmiṃstathokte śamamāsthitena | taṃ bhīmaseno balavānamarṣī | dhanaṃjayaṃ kruddhamuvāca vākyam
उस असीम बलशाली, शान्ति का आश्रय लिए युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर बलवान और असहिष्णु भीमसेन ने क्रोध में भरकर धनञ्जय से कहा—
भीमसेन उवाच
श्लोक 8 (4.73.8)
न पार्थ नित्यं क्षमकालमाह । बृहस्पतिर्ज्ञानवतां वरिष्ठः । क्षमीह सर्वैः परिभूयतेऽसौ । यथा भुजङ्गो विषवीर्यहीनः ॥
na pārtha nityaṃ kṣamakālamāha | bṛhaspatirjñānavatāṃ variṣṭhaḥ | kṣamīha sarvaiḥ paribhūyate'sau | yathā bhujaṅgo viṣavīryahīnaḥ
"पार्थ, ज्ञानियों में श्रेष्ठ बृहस्पति ने यह नहीं कहा कि सदा क्षमा का ही समय होता है। संसार में क्षमाशील का सब तिरस्कार करते हैं, जैसे विषहीन साँप का।
श्लोक 9 (4.73.9)
विराटमद्यैव निहत्य शीघ्रं । सपुत्रपौत्रं सकुलं ससैन्यम् । योक्ष्यामहे धर्मसुतं च राज्ये । अद्यैव शीघ्रं त्वरिरेष मात्स्यः ॥
virāṭamadyaiva nihatya śīghraṃ | saputrapautraṃ sakulaṃ sasainyam | yokṣyāmahe dharmasutaṃ ca rājye | adyaiva śīghraṃ tvarireṣa mātsyaḥ
आज ही शीघ्र विराट को उसके पुत्र-पौत्रों, कुल और सेना सहित मारकर हम धर्मपुत्र को राज्य पर बिठाएँगे। आज ही, शीघ्र—यह मत्स्यराज हमारा शत्रु है।
श्लोक 10 (4.73.10)
अनेन पाञ्चालसुताऽथ कृष्णा । उपेक्षिता कीचकेनाभियुक्ता । तस्मादयं नार्हति राजशब्दं । राजा भव त्वं नृप पार्थवीर्यात् ॥
anena pāñcālasutā'tha kṛṣṇā | upekṣitā kīcakenābhiyuktā | tasmādayaṃ nārhati rājaśabdaṃ | rājā bhava tvaṃ nṛpa pārthavīryāt
इसी ने कीचक के द्वारा सताई जाती पाञ्चालराजकुमारी कृष्णा की उपेक्षा की थी। इसलिए यह राजा कहलाने योग्य नहीं। हे नृप, आप पार्थ के पराक्रम से राजा बनिए।
श्लोक 11 (4.73.11)
राजा कुरूणां च युधिष्ठिरोऽयं । मात्स्येषु राजा भवतु प्रवीरः । तं मात्स्यदेहं शतधा भिनद्मि । पूर्णोदकं कुम्भमिवाश्मनीह ॥
rājā kurūṇāṃ ca yudhiṣṭhiro'yaṃ | mātsyeṣu rājā bhavatu pravīraḥ | taṃ mātsyadehaṃ śatadhā bhinadmi | pūrṇodakaṃ kumbhamivāśmanīha
ये युधिष्ठिर कौरवों के राजा हों और ये वीर ही मत्स्यों के भी राजा बनें। मैं उस मत्स्यराज के शरीर के सौ टुकड़े कर दूँगा, जैसे पानी से भरा घड़ा पत्थर पर पटककर फोड़ दिया जाए।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 12 (4.73.12)
भवतः क्षमया राजन्त्सर्वे दोषाश्च नोऽभवन् । तं मात्स्यं सबलं हत्वा सपुत्रज्ञातिबान्धवम् । पश्चाच्चैव कुरून्सर्वान्हनिष्यामि न संशयः ॥
bhavataḥ kṣamayā rājantsarve doṣāśca no'bhavan | taṃ mātsyaṃ sabalaṃ hatvā saputrajñātibāndhavam | paścāccaiva kurūnsarvānhaniṣyāmi na saṃśayaḥ
"राजन्, आपकी क्षमाशीलता के कारण ही ये सारे अनर्थ हम पर आए हैं। मैं उस मत्स्यराज को उसकी सेना, पुत्रों और जाति-बन्धुओं सहित मारूँगा और फिर निःसन्देह सब कौरवों को भी मार डालूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (4.73.13)
भीमसेनश्च ये चान्ये तथैवेति तमब्रुवन् ॥
bhīmasenaśca ye cānye tathaiveti tamabruvan
भीमसेन और अन्य भाइयों ने भी उनसे यही कहा—"ऐसा ही हो।"
श्लोक 14 (4.73.14)
तमब्रवीद्धर्मसुतो महात्मा । क्षमी वदान्यः कुपितं च भीमम् । न प्रत्युपस्थास्यति चेत्सदारः । प्रसादने सम्यगथास्तु वध्यः ॥
tamabravīddharmasuto mahātmā | kṣamī vadānyaḥ kupitaṃ ca bhīmam | na pratyupasthāsyati cetsadāraḥ | prasādane samyagathāstu vadhyaḥ
तब क्षमाशील और उदार महात्मा धर्मपुत्र ने क्रुद्ध भीम से कहा—"यदि वह अपनी पत्नी सहित मुझे भली-भाँति प्रसन्न करने न आए, तो उसका वध हो।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 15 (4.73.15)
न हन्तव्यो दुरात्माऽयं विराटश्चापि तेऽर्जुन ॥
na hantavyo durātmā'yaṃ virāṭaścāpi te'rjuna
अर्जुन, अभी तुम इस दुष्टबुद्धि विराट का वध मत करो।
श्लोक 16 (4.73.16)
श्वः प्रभाते प्रवेक्ष्यामः सभां सिंहासनेष्वपि । राजवेषेण संयुक्ताः स्थानमस्य स्वलंकृताः ॥
śvaḥ prabhāte pravekṣyāmaḥ sabhāṃ siṃhāsaneṣvapi | rājaveṣeṇa saṃyuktāḥ sthānamasya svalaṃkṛtāḥ
कल प्रातःकाल हम राजवेश धारण कर और भली-भाँति सज-धजकर सभा में प्रवेश करेंगे और उसके स्थान पर, सिंहासनों पर बैठेंगे।
श्लोक 17 (4.73.17)
विराटो यदि तत्रस्थान्राजालङ्कारशोभितान् । राजलक्षणसंपन्नान्यदि तत्र न मंस्यते । पश्चाद्धन्यामहे पार्थ विराटं सहबान्धवम् ॥
virāṭo yadi tatrasthānrājālaṅkāraśobhitān | rājalakṣaṇasaṃpannānyadi tatra na maṃsyate | paścāddhanyāmahe pārtha virāṭaṃ sahabāndhavam
पार्थ, यदि वहाँ राजसी अलंकारों से सुशोभित और राजलक्षणों से युक्त हमें देखकर भी विराट हमारा सम्मान न करे, तो बाद में हम उसे उसके बन्धु-बान्धवों सहित मार डालेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (4.73.18)
इतिकर्तव्यतां सर्वे मन्त्रयित्वा तु पाण्डवाः । न्यवसंश्चैव तां रात्रिं धर्मज्ञा धर्मवत्सलाः ॥
itikartavyatāṃ sarve mantrayitvā tu pāṇḍavāḥ | nyavasaṃścaiva tāṃ rātriṃ dharmajñā dharmavatsalāḥ
इस प्रकार सब कर्तव्य निश्चित करके धर्म के ज्ञाता और धर्मप्रेमी पाण्डवों ने वह रात वहीं बिताई।
श्लोक 19 (4.73.19)
सहपुत्रेण मात्स्यः स संप्रहृष्टो नराधिपः । तां रात्रिमवसत्प्रीतः संप्रहृष्टेन चेतसा ॥
sahaputreṇa mātsyaḥ sa saṃprahṛṣṭo narādhipaḥ | tāṃ rātrimavasatprītaḥ saṃprahṛṣṭena cetasā
और मत्स्यराज ने भी अत्यन्त हर्षित होकर, आनन्द से भरे मन से, अपने पुत्र के साथ वह रात सुखपूर्वक बिताई।