विराट पर्व · अध्याय 74
पाण्डवों का राजासनों पर बैठना; अर्जुन द्वारा युधिष्ठिर का गुणगान
अगले दिन पाँचों पाण्डव स्नान करके, श्वेत वस्त्र और आभूषण धारण कर, युधिष्ठिर को आगे करके विराट की सभा में आते हैं और राजाओं के आसनों पर बैठ जाते हैं। प्रातःकर्म पूरे करके आया विराट उन्हें देखकर चकित और खिन्न होता है और व्यंग्य से कङ्क से पूछता है कि दरबार का पासे खेलने वाला राजसिंहासन पर क्यों बैठा है। उत्तर में अर्जुन युधिष्ठिर का विस्तृत गुणगान करता है—वे देहधारी धर्म हैं, अस्त्रों के ज्ञाता हैं, हाथियों, रथों और घोड़ों की विशाल सेना के स्वामी हैं, सब राजाओं से कर लेते रहे हैं और असहायों के रक्षक हैं—और पूछता है कि ऐसा राजा राजसी आसन के योग्य कैसे नहीं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.74.1)
ततो द्वितीये दिवसे भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः । स्नाताः शुक्लाम्बरधराः सर्वे सुचरितव्रताः ॥
tato dvitīye divase bhrātaraḥ pañca pāṇḍavāḥ | snātāḥ śuklāmbaradharāḥ sarve sucaritavratāḥ
फिर दूसरे दिन पाँचों पाण्डव भाई, जिन्होंने अपना व्रत भली-भाँति निभाया था, स्नान करके और श्वेत वस्त्र धारण करके,
श्लोक 2 (4.74.2)
युधिष्ठिरं पुरस्कृत्य सर्वाभरणभूषिताः । अभिपन्ना महाभागा भ्राजमाना महारथाः ॥
yudhiṣṭhiraṃ puraskṛtya sarvābharaṇabhūṣitāḥ | abhipannā mahābhāgā bhrājamānā mahārathāḥ
सब आभूषणों से सजे, युधिष्ठिर को आगे करके चल पड़े; वे महाभाग महारथी तेज से दमक रहे थे।
श्लोक 3 (4.74.3)
विराटस्य सभां प्राप्य भूमिपालासनेषु ते । निषेदुः पावकप्रख्याः सत्रे धिष्ण्येष्विवाग्नयः ॥
virāṭasya sabhāṃ prāpya bhūmipālāsaneṣu te | niṣeduḥ pāvakaprakhyāḥ satre dhiṣṇyeṣvivāgnayaḥ
विराट की सभा में पहुँचकर वे अग्नि के समान तेजस्वी पाण्डव राजाओं के आसनों पर ऐसे बैठ गए जैसे यज्ञ में वेदियों पर अग्नियाँ प्रतिष्ठित हों।
श्लोक 4 (4.74.4)
तेषु तत्रोपविष्टेषु विराटः पृथिवीपतिः । तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां प्रातःकृत्यं समाप्य च ॥
teṣu tatropaviṣṭeṣu virāṭaḥ pṛthivīpatiḥ | tasyāṃ rātryāṃ vyatītāyāṃ prātaḥkṛtyaṃ samāpya ca
जब वे वहाँ बैठ गए, तब पृथ्वीपति विराट ने, वह रात बीत जाने पर, प्रातःकाल के नित्यकर्म पूरे किए,
श्लोक 5 (4.74.5)
गोसुवर्णादिकं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि । आजगाम सभां राजा उत्तरेण सह प्रभो ॥
gosuvarṇādikaṃ dattvā brāhmaṇebhyo yathāvidhi | ājagāma sabhāṃ rājā uttareṇa saha prabho
और ब्राह्मणों को विधिपूर्वक गौ, सुवर्ण आदि दान देकर, हे प्रभो, वह राजा उत्तर के साथ सभा में आया।
श्लोक 6 (4.74.6)
स तान्दृष्ट्वा महासत्वाञ्ज्वलतः पावकानिव । राजवेषानुपादाय पार्थिवो विस्मितोऽभवत् ॥
sa tāndṛṣṭvā mahāsatvāñjvalataḥ pāvakāniva | rājaveṣānupādāya pārthivo vismito'bhavat
राजवेश धारण किए, अग्नियों के समान जलते हुए उन महापराक्रमी पुरुषों को देखकर राजा विस्मित रह गया।
श्लोक 7 (4.74.7)
किमिदं को विधिस्त्वेष भयार्त इव पार्थिवः । पुरुषप्रवरान्दृष्ट्वा विषादमगमन्नृपः ॥
kimidaṃ ko vidhistveṣa bhayārta iva pārthivaḥ | puruṣapravarāndṛṣṭvā viṣādamagamannṛpaḥ
"यह क्या है? यह कैसी व्यवस्था है?"—उन श्रेष्ठ पुरुषों को देखकर राजा भयभीत-सा होकर उदास हो गया।
श्लोक 8 (4.74.8)
अथ मात्स्योऽब्रवीत्कङ्कं देवराजमिव स्थितम् । मरुद्गणैरुपासीनं त्रिदशानामिवेश्वरम् ॥
atha mātsyo'bravītkaṅkaṃ devarājamiva sthitam | marudgaṇairupāsīnaṃ tridaśānāmiveśvaram
तब मत्स्यराज ने कङ्क से कहा, जो वहाँ देवराज की भाँति विराजमान थे, मानो मरुद्गणों से सेवित देवताओं के स्वामी इन्द्र हों—
विराट उवाच
श्लोक 9 (4.74.9)
स किलाक्षनिवापस्त्वं सभास्तारो मया कृतः । अथ राजासने कस्मादुपविष्टोऽस्यलंकृतः ॥
sa kilākṣanivāpastvaṃ sabhāstāro mayā kṛtaḥ | atha rājāsane kasmādupaviṣṭo'syalaṃkṛtaḥ
"मैंने तो तुम्हें अपनी सभा में पासे फेंकने वाला सभासद बनाया था। फिर तुम सज-धजकर राजसिंहासन पर क्यों बैठे हो?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (4.74.10)
परिहासेच्छया राज्ञो विराटस्य निशम्य तत् । स्मयमानोऽब्रवीद्वाक्यमर्जुनः परवीरहा ॥
parihāsecchayā rājño virāṭasya niśamya tat | smayamāno'bravīdvākyamarjunaḥ paravīrahā
परिहास करने की इच्छा से कहे गए राजा विराट के ये वचन सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले अर्जुन ने मुसकराते हुए कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 11 (4.74.11)
इन्द्रस्यार्धासनं राजन्नयमारोढुमर्हति । ब्रह्मण्यः श्रुतवांस्त्यागी सर्वलोकाभिपूजितः ॥
indrasyārdhāsanaṃ rājannayamāroḍhumarhati | brahmaṇyaḥ śrutavāṃstyāgī sarvalokābhipūjitaḥ
"राजन्, ये तो इन्द्र के आधे आसन पर बैठने के भी योग्य हैं। ये ब्राह्मणों के हितैषी, शास्त्रज्ञ, त्यागी और सारे संसार में पूजित हैं।
श्लोक 12 (4.74.12)
एष विग्रहवान्धर्म एष वीर्यवतां वरः । एष बुद्ध्याधिको लोके तपसां च परायणम् ॥
eṣa vigrahavāndharma eṣa vīryavatāṃ varaḥ | eṣa buddhyādhiko loke tapasāṃ ca parāyaṇam
ये साक्षात् देहधारी धर्म हैं, पराक्रमियों में श्रेष्ठ हैं; संसार में बुद्धि में सबसे बढ़कर हैं और तपस्या के परम आश्रय हैं।
श्लोक 13 (4.74.13)
एषोऽस्त्रं विविधं वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे । न चैवान्यः पुमान्वेत्ति न वेत्स्यति कदाचन ॥
eṣo'straṃ vividhaṃ vetti trailokye sacarācare | na caivānyaḥ pumānvetti na vetsyati kadācana
चराचर सहित तीनों लोकों में ये अनेक प्रकार के अस्त्रों के ज्ञाता हैं; उन्हें न कोई दूसरा पुरुष जानता है, न कभी जानेगा—
श्लोक 14 (4.74.14)
न देवा नासुराः केचिन्न मनुष्या न राक्षसाः । गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥
na devā nāsurāḥ kecinna manuṣyā na rākṣasāḥ | gandharvayakṣapravarāḥ sakinnaramahoragāḥ
न देवता, न कोई असुर, न मनुष्य, न राक्षस, न श्रेष्ठ गन्धर्व और यक्ष, न किन्नर और महानाग।
श्लोक 15 (4.74.15)
दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः । पाण्डवानामतिरथो यज्ञधर्मपरो वशी ॥
dīrghadarśī mahātejāḥ paurajānapadapriyaḥ | pāṇḍavānāmatiratho yajñadharmaparo vaśī
ये दूरदर्शी, महातेजस्वी और नगर तथा जनपद के लोगों के प्रिय हैं; पाण्डवों में अतिरथी हैं, यज्ञ और धर्म में तत्पर और संयमी हैं।
श्लोक 16 (4.74.16)
महर्षिकल्पो राजर्षिः सर्वलोकेषु विश्रुतः । बलवान्धृतिमान्दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥
maharṣikalpo rājarṣiḥ sarvalokeṣu viśrutaḥ | balavāndhṛtimāndakṣaḥ satyavādī jitendriyaḥ
ये महर्षि के समान राजर्षि हैं, सब लोकों में विख्यात हैं; बलवान, धैर्यवान, कुशल, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं।
श्लोक 17 (4.74.17)
धनैश्च संचयैश्चैव शक्रवैश्रवणोपमः । यथा मनुर्महातेजा लोकानां परिरक्षिता । एवमेव महातेजाः प्रजानुग्रहकारकः ॥
dhanaiśca saṃcayaiścaiva śakravaiśravaṇopamaḥ | yathā manurmahātejā lokānāṃ parirakṣitā | evameva mahātejāḥ prajānugrahakārakaḥ
धन और संचय में ये इन्द्र और कुबेर के समान हैं। जैसे महातेजस्वी मनु लोकों के रक्षक थे, वैसे ही ये महातेजस्वी प्रजा पर अनुग्रह करने वाले हैं।
श्लोक 18 (4.74.18)
अयं कुरूणामृषभः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । यस्य कीर्तिः स्थिता लोके सूर्यस्येवोद्यतः प्रभा ॥
ayaṃ kurūṇāmṛṣabhaḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | yasya kīrtiḥ sthitā loke sūryasyevodyataḥ prabhā
ये कुरुश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर हैं, जिनकी कीर्ति संसार में उगते सूर्य की प्रभा की तरह स्थित है।
श्लोक 19 (4.74.19)
संसरन्ति दिशः सर्वा यशसोस्य गभस्तयः । उदितस्येव सूर्यस्य तेजसोऽनुगभस्तयः ॥
saṃsaranti diśaḥ sarvā yaśasosya gabhastayaḥ | uditasyeva sūryasya tejaso'nugabhastayaḥ
इनके यश की किरणें सब दिशाओं में फैलती हैं, जैसे उदित सूर्य के तेज की किरणें।
श्लोक 20 (4.74.20)
एनं त्रिंशत्सहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् । अन्वयुः पृष्ठतो राजन्यावदध्यावसत्कुरून् ॥
enaṃ triṃśatsahasrāṇi kuñjarāṇāṃ tarasvinām | anvayuḥ pṛṣṭhato rājanyāvadadhyāvasatkurūn
राजन्, जब ये कौरवों के बीच रहते थे, तब तीस हज़ार वेगवान हाथी इनके पीछे-पीछे चलते थे।
श्लोक 21 (4.74.21)
त्रिंशच्चैव सहस्राणि रथानां रथिनां वरम् । सदश्वैरुपसंपन्नाः पृष्ठतोऽनुययुस्तदा ॥
triṃśaccaiva sahasrāṇi rathānāṃ rathināṃ varam | sadaśvairupasaṃpannāḥ pṛṣṭhato'nuyayustadā
और उत्तम घोड़ों से जुते तीस हज़ार रथ तब रथियों में श्रेष्ठ इन युधिष्ठिर के पीछे चलते थे।
श्लोक 22 (4.74.22)
वाजिनां च शतं राजन्त्सहस्राण्ययुतानि च । इममष्टशतं सूताः सुमृष्टमणिकुण्डलाः । तुष्टुवुर्मागधैः सार्धं पुरा शक्रमिवर्षयः ॥
vājināṃ ca śataṃ rājantsahasrāṇyayutāni ca | imamaṣṭaśataṃ sūtāḥ sumṛṣṭamaṇikuṇḍalāḥ | tuṣṭuvurmāgadhaiḥ sārdhaṃ purā śakramivarṣayaḥ
और घोड़े—सैकड़ों, हज़ारों और दसियों हज़ार। चमकते मणिकुण्डल पहने एक सौ आठ सूत मागधों के साथ इनकी स्तुति करते थे, जैसे प्राचीन काल में ऋषि इन्द्र की स्तुति करते थे।
श्लोक 23 (4.74.23)
इमं नित्यमुपातिष्ठन्कुरवः किंकरास्तदा । सर्वे च नृप राजानं धनेश्वरमिवामराः ॥
imaṃ nityamupātiṣṭhankuravaḥ kiṃkarāstadā | sarve ca nṛpa rājānaṃ dhaneśvaramivāmarāḥ
कौरव तब सेवकों की तरह सदा इनकी सेवा में उपस्थित रहते थे, और हे नृप, सब राजा भी, जैसे देवता धनेश्वर कुबेर की सेवा करते हैं।
श्लोक 24 (4.74.24)
एष सर्वान्महीपालान्करमाहारयत्तदा । वैश्यानिव महाराज विवशान्स्ववशानपि ॥
eṣa sarvānmahīpālānkaramāhārayattadā | vaiśyāniva mahārāja vivaśānsvavaśānapi
महाराज, इन्होंने तब पृथ्वी के सब राजाओं से—चाहे वे अधीन हों या स्वतन्त्र—वैश्यों की तरह कर वसूल किया।
श्लोक 25 (4.74.25)
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् । उपजीवन्ति राजानमेनं सुचरितव्रताः ॥
aṣṭāśītisahasrāṇi snātakānāṃ mahātmanām | upajīvanti rājānamenaṃ sucaritavratāḥ
अठासी हज़ार उत्तम व्रत वाले महात्मा स्नातक इस राजा के आश्रय से जीविका पाते थे।
श्लोक 26 (4.74.26)
एष वृद्धाननाथांश्च व्यङ्गान्पङ्गूंश्च वामनान् । पुत्रवत्पालयामास प्रजाधर्मेण चाभिभूः ॥
eṣa vṛddhānanāthāṃśca vyaṅgānpaṅgūṃśca vāmanān | putravatpālayāmāsa prajādharmeṇa cābhibhūḥ
ये वृद्धों, अनाथों, विकलांगों, लँगड़ों और बौनों का पुत्र की तरह पालन करते थे; ये प्रभु राजधर्म के अनुसार प्रजा की रक्षा करते थे।
श्लोक 27 (4.74.27)
एष धर्मे दमे चैव दाने सत्ये रतः सदा । महाप्रसादो ब्रह्मण्यः सत्यवादी च पार्थिवः ॥
eṣa dharme dame caiva dāne satye rataḥ sadā | mahāprasādo brahmaṇyaḥ satyavādī ca pārthivaḥ
ये सदा धर्म, संयम, दान और सत्य में लगे रहते हैं; ये अत्यन्त कृपालु, ब्राह्मणों के हितैषी और सत्यवादी राजा हैं।
श्लोक 28 (4.74.28)
श्रीमत्संपत्प्रभावेन तप्यते यस्य कौरवः । सगणः सह कर्णेन सौबलेन च वीर्यवान् ॥
śrīmatsaṃpatprabhāvena tapyate yasya kauravaḥ | sagaṇaḥ saha karṇena saubalena ca vīryavān
इनकी शोभा और समृद्धि का प्रभाव पराक्रमी कौरव दुर्योधन को उसके साथियों, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि सहित सन्तप्त करता है।
श्लोक 29 (4.74.29)
गुणा न शक्याः संख्यातुमेतस्यैव नरेश्वर । एष धर्मपरो नित्यमनृशंसः सुशीलवान् ॥
guṇā na śakyāḥ saṃkhyātumetasyaiva nareśvara | eṣa dharmaparo nityamanṛśaṃsaḥ suśīlavān
हे नरेश्वर, इनके गुण गिने नहीं जा सकते। ये सदा धर्मपरायण, क्रूरता से रहित और सुशील हैं।
श्लोक 30 (4.74.30)
एवं युक्तो महाराजः पाण्डवः पुरुषर्षभः । कथं नार्हति राजार्हमासनं पृथिवीपतिः ॥
evaṃ yukto mahārājaḥ pāṇḍavaḥ puruṣarṣabhaḥ | kathaṃ nārhati rājārhamāsanaṃ pṛthivīpatiḥ
ऐसे गुणों से युक्त ये पाण्डुपुत्र महाराज, पुरुषश्रेष्ठ और पृथ्वीपति राजा के योग्य आसन के अधिकारी कैसे नहीं हैं?"