विराट पर्व · अध्याय 75
अर्जुन और उत्तर द्वारा विराट को पाण्डवों का परिचय
विराट पूछते हैं कि उनकी सभा में अर्जुन, भीम, नकुल-सहदेव और द्रौपदी कौन हैं। अर्जुन भीम, नकुल, सहदेव और द्रौपदी का परिचय देते हैं, भीम अर्जुन के पराक्रमों का वर्णन करते हैं, और राजकुमार उत्तर एक-एक कर पिता को पाण्डवों को दिखाते हैं तथा बताते हैं कि कैसे अकेले अर्जुन ने कौरव-सेना को परास्त कर उनके प्राण बचाए। विराट भाइयों को गले लगाते हैं, युधिष्ठिर को प्रणाम करते हैं, वन से उनकी सकुशल वापसी पर हर्ष प्रकट करते हैं और अपना राज्य उन्हीं का बताते हैं।
विराट उवाच
श्लोक 1 (4.75.1)
यद्येष राजा कौरव्यः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । कतमोऽस्यार्जुनो भ्राता भीमश्च कतमो बली ॥
yadyeṣa rājā kauravyaḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | katamo'syārjuno bhrātā bhīmaśca katamo balī
यदि ये सचमुच कुरुवंशी राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर हैं, तो इनमें इनका भाई अर्जुन कौन है, और बलवान भीम कौन है?
श्लोक 2 (4.75.2)
नकुलः सहदेवो वा द्रौपदी वा यशस्विनी । यदा ह्यक्षैर्जिता ह्येते नान्तरा श्रूयते कथा ॥
nakulaḥ sahadevo vā draupadī vā yaśasvinī | yadā hyakṣairjitā hyete nāntarā śrūyate kathā
नकुल और सहदेव कौन हैं, और यशस्विनी द्रौपदी कौन है? जब से ये जुए में हारे, तब से बीच में इनकी कोई चर्चा सुनने में नहीं आई।
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (4.75.3)
य एष बललोऽभूत्ते सूपकारश्च ते नृप । एष भीमो महाभाग भीमवेगपराक्रमः ॥
ya eṣa balalo'bhūtte sūpakāraśca te nṛpa | eṣa bhīmo mahābhāga bhīmavegaparākramaḥ
हे राजन्, जो आपके यहाँ बलल नाम से रसोइया बनकर रहे, वे ही भयंकर वेग और पराक्रम वाले महाभाग भीम हैं।
श्लोक 4 (4.75.4)
एष क्रोधवशान्हत्वा पर्वते गन्धमादने । सौगन्धिकानि पुष्पाणि कृष्णार्थे समुपानयत् ॥
eṣa krodhavaśānhatvā parvate gandhamādane | saugandhikāni puṣpāṇi kṛṣṇārthe samupānayat
इन्होंने ही गन्धमादन पर्वत पर क्रोधवश राक्षसों का वध करके कृष्णा (द्रौपदी) के लिए सौगन्धिक पुष्प लाकर दिए थे।
श्लोक 5 (4.75.5)
गन्धर्व एष वै हन्ता कीचकानां दुरात्मनाम् । व्याघ्रानृक्षान्गजांश्चैव हतवांश्च पुरे तव ॥
gandharva eṣa vai hantā kīcakānāṃ durātmanām | vyāghrānṛkṣāngajāṃścaiva hatavāṃśca pure tava
वही वह 'गन्धर्व' हैं जिन्होंने दुष्ट कीचकों का वध किया, और इन्होंने ही आपके नगर में बाघों, भालुओं और हाथियों को मारा था।
श्लोक 6 (4.75.6)
हिडिम्बं च बकं चैव किर्मीरं च जटासुरम् । हत्वा निष्कण्टकं चक्रे अरण्यं सर्वतः शुभम् ॥
hiḍimbaṃ ca bakaṃ caiva kirmīraṃ ca jaṭāsuram | hatvā niṣkaṇṭakaṃ cakre araṇyaṃ sarvataḥ śubham
हिडिम्ब, बक, किर्मीर और जटासुर को मारकर इन्होंने वन को सब ओर से निष्कण्टक और मंगलमय बना दिया।
श्लोक 7 (4.75.7)
यश्चासीदश्वबन्धस्ते नकुलोऽयं परन्तप । गोसङ्ख्यः सहदेवश्च माद्रीपुत्रौ महाबलौ ॥
yaścāsīdaśvabandhaste nakulo'yaṃ parantapa | gosaṅkhyaḥ sahadevaśca mādrīputrau mahābalau
हे परन्तप, जो आपके यहाँ अश्वपाल थे वे नकुल हैं, और जो गौओं की गिनती रखते थे वे सहदेव हैं। ये दोनों माद्री के महाबली पुत्र हैं।
श्लोक 8 (4.75.8)
शृङ्गारवेषाभरणौ रूपवन्तौ मनस्विनौ । नानारथसहस्राणां समर्थौ भरतर्षभौ ॥
śṛṅgāraveṣābharaṇau rūpavantau manasvinau | nānārathasahasrāṇāṃ samarthau bharatarṣabhau
सुन्दर वेश-भूषा और आभूषणों से सजे, रूपवान और मनस्वी ये दोनों भरतश्रेष्ठ हज़ारों रथियों का सामना करने में समर्थ हैं।
श्लोक 9 (4.75.9)
एषा पद्मपलाशाक्षी सुमध्या चारुहासिनी । सैरन्ध्री द्रौपदी राजन्यत्कृते कीचका हताः ॥
eṣā padmapalāśākṣī sumadhyā cāruhāsinī | sairandhrī draupadī rājanyatkṛte kīcakā hatāḥ
और ये कमलदल-सी आँखों वाली, सुन्दर कटि वाली, मधुर मुस्कान वाली सैरन्ध्री द्रौपदी हैं, हे राजन्, जिनके कारण कीचक मारे गए।
श्लोक 10 (4.75.10)
द्रुपदस्य प्रिया पुत्री धृष्टद्युम्नस्य चानुजा । अग्निकुण्डात्समुद्भूता द्रौपदी त्ववगम्यताम् ॥
drupadasya priyā putrī dhṛṣṭadyumnasya cānujā | agnikuṇḍātsamudbhūtā draupadī tvavagamyatām
ये द्रुपद की प्रिय पुत्री, धृष्टद्युम्न की छोटी बहन, यज्ञ-कुण्ड की अग्नि से प्रकट हुई द्रौपदी हैं, ऐसा जानिए।
भीम उवाच
श्लोक 11 (4.75.11)
अस्त्रज्ञो दुर्लभः कश्चित्केवलं पृथिवीमनु । धनुर्भृतामतिश्रेष्ठः कौन्तेयोऽयं धनंजयः ॥
astrajño durlabhaḥ kaścitkevalaṃ pṛthivīmanu | dhanurbhṛtāmatiśreṣṭhaḥ kaunteyo'yaṃ dhanaṃjayaḥ
सारी पृथ्वी पर ऐसा अस्त्रवेत्ता मिलना दुर्लभ है। ये कुन्तीपुत्र धनंजय धनुर्धारियों में सर्वश्रेष्ठ हैं।
श्लोक 12 (4.75.12)
एतेन खाण्डवं तस्य ह्यकामस्य शतक्रतोः । दग्धं नागवनं चैव सह नागैर्नराधिप ॥
etena khāṇḍavaṃ tasya hyakāmasya śatakratoḥ | dagdhaṃ nāgavanaṃ caiva saha nāgairnarādhipa
हे नरेश, इन्होंने ही शतक्रतु इन्द्र की इच्छा के विरुद्ध नागों सहित खाण्डव नामक नाग-वन को जला डाला था।
श्लोक 13 (4.75.13)
वर्षं च शरवर्षेण वारितं दुर्जयेन वै । करमाहारिताः सर्वे पार्थिवाः पृथिवीतले ॥
varṣaṃ ca śaravarṣeṇa vāritaṃ durjayena vai | karamāhāritāḥ sarve pārthivāḥ pṛthivītale
इसी अजेय वीर ने बाणों की वर्षा से (इन्द्र की) वर्षा को रोक दिया था, और पृथ्वी के सभी राजाओं से कर वसूल किया था।
श्लोक 14 (4.75.14)
स्त्रीवेषं कृतवानेष तव राजन्निवेशने । बृहन्नलेति यामाहुरर्जुनं जयतांवरम् ॥
strīveṣaṃ kṛtavāneṣa tava rājanniveśane | bṛhannaleti yāmāhurarjunaṃ jayatāṃvaram
हे राजन्, इन्होंने आपके महल में स्त्री का वेश धारण किया था। जिसे लोग बृहन्नला कहते थे, वह विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन ही है।
श्लोक 15 (4.75.15)
उषिताःस्म सुखं सर्वे तव राजन्निवेशने । अज्ञातवासे निभृता गर्भवास इव प्रजाः ॥
uṣitāḥsma sukhaṃ sarve tava rājanniveśane | ajñātavāse nibhṛtā garbhavāsa iva prajāḥ
हे राजन्, हम सब आपके महल में अज्ञातवास के समय छिपे रहकर वैसे ही सुख से रहे, जैसे गर्भ में शिशु रहता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (4.75.16)
यदाऽर्जुनेन ते वीराः कथिताः पञ्च पाण्डवाः । पुनरेव च तान्पार्थान्दर्शयामास चोत्तरः ॥
yadā'rjunena te vīrāḥ kathitāḥ pañca pāṇḍavāḥ | punareva ca tānpārthāndarśayāmāsa cottaraḥ
जब अर्जुन ने उन पाँचों वीर पाण्डवों का परिचय दे दिया, तब उत्तर ने फिर से उन पृथापुत्रों को (पिता को) दिखाया।
उत्तर उवाच
श्लोक 17 (4.75.17)
य एष जाम्बूनदशुद्धगौर- । तनुर्महान्सिंह इव प्रवृद्धः । प्रचण्डघोणः पृथुदीर्घनेत्र- । स्ताम्रायताक्षः कुरुराज एषः ॥
ya eṣa jāmbūnadaśuddhagaura- | tanurmahānsiṃha iva pravṛddhaḥ | pracaṇḍaghoṇaḥ pṛthudīrghanetra- | stāmrāyatākṣaḥ kururāja eṣaḥ
ये, जिनका विशाल शरीर शुद्ध सोने के समान गौर है, जो सिंह की भाँति ऊँचे और पुष्ट हैं, जिनकी नासिका उन्नत है और नेत्र बड़े, लम्बे और ताम्रवर्ण हैं, कुरुराज हैं।
श्लोक 18 (4.75.18)
अयं पुनर्मत्तगजेन्द्रगामी । प्रतप्तचामीकरशुद्धगौरः । पृथ्वायतांसो गुरुदीर्घबाहु- । र्वृकोदरः पश्यत पश्यतैनम् ॥
ayaṃ punarmattagajendragāmī | prataptacāmīkaraśuddhagauraḥ | pṛthvāyatāṃso gurudīrghabāhu- | rvṛkodaraḥ paśyata paśyatainam
और ये, जो मदमत्त गजराज की-सी चाल से चलते हैं, तपाए हुए सोने के समान गौर हैं, जिनके कंधे चौड़े और भुजाएँ लम्बी व भारी हैं, वृकोदर हैं। देखिए, इन्हें देखिए!
श्लोक 19 (4.75.19)
यस्त्वेव पार्श्वेऽस्य महाधनुष्मा- । ञ्श्यामो युवा वारणयूथपोपमः । सिंहोन्नतांसो गजराजगामी । पद्मायताक्षोऽर्जुन एष वीरः ॥
yastveva pārśve'sya mahādhanuṣmā- | ñśyāmo yuvā vāraṇayūthapopamaḥ | siṃhonnatāṃso gajarājagāmī | padmāyatākṣo'rjuna eṣa vīraḥ
और इनके पास जो महाधनुर्धर, श्यामवर्ण युवक हैं, जो हाथियों के झुंड के नायक के समान हैं, जिनके कंधे सिंह के समान ऊँचे हैं, जो गजराज की चाल चलते हैं और जिनकी आँखें कमल-सी लम्बी हैं, वे वीर अर्जुन हैं।
श्लोक 20 (4.75.20)
राज्ञः समीपे पुरुषोत्तमौ तु । यमाविमौ विष्णुमहेन्द्रकल्पौ । मनुष्यलोके सकले समोऽस्ति । ययोर्न रूपे न बले न शीले ॥
rājñaḥ samīpe puruṣottamau tu | yamāvimau viṣṇumahendrakalpau | manuṣyaloke sakale samo'sti | yayorna rūpe na bale na śīle
और राजा के समीप ये दोनों पुरुषश्रेष्ठ जुड़वाँ भाई हैं, जो विष्णु और इन्द्र के समान हैं। सारे मनुष्य-लोक में रूप, बल और शील में इनकी बराबरी करने वाला कोई नहीं है।
श्लोक 21 (4.75.21)
आभ्यां तु पार्श्वे कनकोत्तमाङ्गी । यैषा प्रभा मूर्तिमतीव गौरी । नीलोत्पलाभा सुरदेवतेव । कृष्णा स्थिता मूर्तिमतीव लक्ष्मीः ॥
ābhyāṃ tu pārśve kanakottamāṅgī | yaiṣā prabhā mūrtimatīva gaurī | nīlotpalābhā suradevateva | kṛṣṇā sthitā mūrtimatīva lakṣmīḥ
और इन दोनों के पास जो स्वर्ण से भी उत्तम अंगों वाली, साक्षात् प्रभा-सी, गौरी-सी, नीलकमल की-सी आभा वाली, देवताओं की देवी-सी, मूर्तिमती लक्ष्मी-सी खड़ी हैं, वे कृष्णा (द्रौपदी) हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (4.75.22)
एवं निवेद्य तान्पार्थान्पाण्डवान्पञ्च भूपतेः । ततोऽर्जुनस्य वैराटिः कथयामास विक्रमम् ॥
evaṃ nivedya tānpārthānpāṇḍavānpañca bhūpateḥ | tato'rjunasya vairāṭiḥ kathayāmāsa vikramam
इस प्रकार राजा को पाँचों पृथापुत्र पाण्डवों का परिचय देकर विराटपुत्र ने फिर अर्जुन का पराक्रम बताया।
उत्तर उवाच
श्लोक 23 (4.75.23)
अयं स द्विषतां मध्ये मृगाणामिव केसरी । अचरद्रथबृन्देषु निघ्नंस्तेषां परावरान् ॥
ayaṃ sa dviṣatāṃ madhye mṛgāṇāmiva kesarī | acaradrathabṛndeṣu nighnaṃsteṣāṃ parāvarān
यही वे हैं जो शत्रुओं के बीच, हिरनों के बीच सिंह की भाँति, रथ-समूहों में विचरते रहे और उनके छोटे-बड़े सभी योद्धाओं को मारते रहे।
श्लोक 24 (4.75.24)
अनेन विद्धा मातङ्गा महामेघोपमास्तदा । हिरण्यकक्ष्याः संग्रामे दन्ताभ्यामगमन्महीम् ॥
anena viddhā mātaṅgā mahāmeghopamāstadā | hiraṇyakakṣyāḥ saṃgrāme dantābhyāmagamanmahīm
इनके बाणों से बिंधकर महामेघ जैसे विशाल, सुनहरी कक्ष्या वाले हाथी युद्ध में अपने दाँतों के बल धरती पर जा गिरे।
श्लोक 25 (4.75.25)
अनेन विजिता गावो निर्जिताः कुरवो युधि । अस्य शङ्खस्य शब्देन कर्णौ मे बधिरीकृतौ ॥
anena vijitā gāvo nirjitāḥ kuravo yudhi | asya śaṅkhasya śabdena karṇau me badhirīkṛtau
इन्होंने ही गौएँ जीत लीं और युद्ध में कौरवों को परास्त किया। इनके शंख की ध्वनि से मेरे कान बहरे हो गए।
श्लोक 26 (4.75.26)
जायते रोमहर्षो मे संस्मृत्यास्य धनुर्ध्वनिम् । ध्वजस्य वानरं भूतैराक्रोशन्तं सहानुगैः ॥
jāyate romaharṣo me saṃsmṛtyāsya dhanurdhvanim | dhvajasya vānaraṃ bhūtairākrośantaṃ sahānugaiḥ
इनके धनुष की टंकार और ध्वज पर बैठे उस वानर को, जो अपने अनुचर भूतों के साथ गर्जना कर रहा था, याद करके मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
श्लोक 27 (4.75.27)
नाददानं शरान्घोरान्न मुञ्चन्तं शरोत्करान् । न कार्मुकं विकर्षन्तमेनं पश्यामि संयुगे ॥
nādadānaṃ śarānghorānna muñcantaṃ śarotkarān | na kārmukaṃ vikarṣantamenaṃ paśyāmi saṃyuge
युद्ध में मैं इन्हें न तो भयंकर बाण उठाते देख पाता था, न बाणों की बौछार छोड़ते, न धनुष खींचते।
श्लोक 28 (4.75.28)
एतद्धनुःप्रमुक्ताश्च शराः पुङ्खानुपुङ्खिनः । नालक्ष्येषु रणे पेतुर्नाराचा रक्तभोजनाः ॥
etaddhanuḥpramuktāśca śarāḥ puṅkhānupuṅkhinaḥ | nālakṣyeṣu raṇe peturnārācā raktabhojanāḥ
इनके धनुष से छूटे, एक के पीछे एक लगातार चलने वाले, रक्त पीने वाले नाराच बाण युद्ध में कभी लक्ष्य से चूककर नहीं गिरे।
श्लोक 29 (4.75.29)
तीक्ष्णनाराचसंकृत्तशिरोबाहूरुवक्षसाम् । कलेबराणि दृश्यन्ते योधानां साश्वसादिनां ॥
tīkṣṇanārācasaṃkṛttaśirobāhūruvakṣasām | kalebarāṇi dṛśyante yodhānāṃ sāśvasādināṃ
वहाँ घोड़ों और घुड़सवारों सहित योद्धाओं के शरीर दिखाई देते हैं, जिनके सिर, भुजाएँ, जाँघें और छातियाँ इनके तीखे नाराचों से कट गई हैं।
श्लोक 30 (4.75.30)
अनेन तटिनी तत्र शोणिताम्बुप्रवाहिनी । प्रवर्तिता भीमरूपा यां स्मृत्वाऽद्यापि मे मनः । प्रकम्पते चण्डवायुकम्पिता कदली यथा ॥
anena taṭinī tatra śoṇitāmbupravāhinī | pravartitā bhīmarūpā yāṃ smṛtvā'dyāpi me manaḥ | prakampate caṇḍavāyukampitā kadalī yathā
इन्होंने वहाँ रक्त-जल से बहती एक भयंकर नदी बहा दी, जिसे याद करके आज भी मेरा मन प्रचण्ड वायु से काँपते केले के पेड़ की भाँति काँप उठता है।
श्लोक 31 (4.75.31)
अनेन राजन्वीरेण भीष्मद्रोणमुखा रथाः । दुर्योधनेन सहिता निर्जिता भीमकर्मणा ॥
anena rājanvīreṇa bhīṣmadroṇamukhā rathāḥ | duryodhanena sahitā nirjitā bhīmakarmaṇā
हे राजन्, भयंकर कर्म करने वाले इसी वीर ने दुर्योधन सहित भीष्म और द्रोण आदि रथियों को परास्त किया।
श्लोक 32 (4.75.32)
अयं भीतं द्रवन्तं मां देवपुत्रो न्यवारयत् । यस्य बाहुबलेनास्मि जीवन्प्रत्यागतः पुरम् ॥
ayaṃ bhītaṃ dravantaṃ māṃ devaputro nyavārayat | yasya bāhubalenāsmi jīvanpratyāgataḥ puram
जब मैं डरकर भाग रहा था, तब इसी देवपुत्र ने मुझे रोका। इन्हीं के बाहुबल से मैं जीवित नगर लौट पाया हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (4.75.33)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मात्स्यराजः प्रतापवान् । धनंजयं परिष्वज्य पाण्डवानथ सर्वशः ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā mātsyarājaḥ pratāpavān | dhanaṃjayaṃ pariṣvajya pāṇḍavānatha sarvaśaḥ
पुत्र की यह बात सुनकर प्रतापी मत्स्यराज ने धनंजय को और फिर सभी पाण्डवों को गले लगाया।
श्लोक 34 (4.75.34)
धर्मराजं नमस्कृत्य राजा राज्येऽभिषेचितम् । नातृप्यद्दर्शने तेषां विराटो वाहिनीपतिः ॥
dharmarājaṃ namaskṛtya rājā rājye'bhiṣecitam | nātṛpyaddarśane teṣāṃ virāṭo vāhinīpatiḥ
राजा ने राज्य पर अभिषिक्त धर्मराज को प्रणाम किया, और सेनापति विराट उन्हें देखते-देखते तृप्त नहीं होते थे।
श्लोक 35 (4.75.35)
संप्रीयमाणो राजानं युधिष्ठिरमथाब्रवीत् । दिष्ट्या भवन्तः संप्राप्ताः सर्वे कुशलिनो वनात् ॥
saṃprīyamāṇo rājānaṃ yudhiṣṭhiramathābravīt | diṣṭyā bhavantaḥ saṃprāptāḥ sarve kuśalino vanāt
प्रसन्न होकर उन्होंने राजा युधिष्ठिर से कहा, "सौभाग्य से आप सब वन से सकुशल लौट आए हैं।"
विराट उवाच
श्लोक 36 (4.75.36)
दिष्ट्या च चरितं कृच्छ्रमज्ञातं तैर्दुरात्मभिः । इदं राज्यं च वः सर्वं यच्चास्ति वसु किंचन । अविभक्तं भवद्भिर्मे न सन्देहो नराधिपाः ॥
diṣṭyā ca caritaṃ kṛcchramajñātaṃ tairdurātmabhiḥ | idaṃ rājyaṃ ca vaḥ sarvaṃ yaccāsti vasu kiṃcana | avibhaktaṃ bhavadbhirme na sandeho narādhipāḥ
और सौभाग्य से आपने उन दुष्टों से अज्ञात रहकर यह कठिन समय बिता लिया। यह सारा राज्य और जो कुछ भी धन है, सब आपका है; आपमें और मुझमें इसका कोई बँटवारा नहीं। हे नरेशो, इसमें संदेह मत कीजिए।