विराट पर्व · अध्याय 76
विराट द्वारा युधिष्ठिर से क्षमा-याचना
राजकुमार उत्तर पिता से पाण्डवों को प्रसन्न करने का आग्रह करता है, उन्हें याद दिलाता है कि उन्होंने ही युद्ध में उन्हें छुड़ाया और गौएँ जीतीं, और प्रस्ताव करता है कि उसकी बहन उत्तरा अर्जुन को दी जाए। विराट मंत्रियों, पुत्र और बन्धु-बान्धवों सहित, उत्तरा को आगे करके, युधिष्ठिर के सामने भूमि पर गिर पड़ते हैं, अनजाने में हुए अपमान के लिए क्षमा माँगते हैं और अपना राज्य उन्हें अर्पित करते हैं। युधिष्ठिर उन्हें आश्वासन देते हैं कि उन्हें कोई भय नहीं और उनमें कोई दोष नहीं, और अत्यन्त प्रसन्न विराट उनसे संधि करके अपना राज्य उन्हें सौंप देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (4.76.1)
विराटस्य वचः श्रुत्वा पार्थिवस्य महात्मनः । उत्तरः प्रत्युवाचेदमभिपन्नो युधिष्ठिरे ॥
virāṭasya vacaḥ śrutvā pārthivasya mahātmanaḥ | uttaraḥ pratyuvācedamabhipanno yudhiṣṭhire
महात्मा राजा विराट की बात सुनकर, युधिष्ठिर के प्रति हुए अपराध को समझते हुए, उत्तर ने यह उत्तर दिया।
उत्तर उवाच
श्लोक 2 (4.76.2)
प्रसादनं प्राप्तकालं पाण्डवस्याभिरोचये । तेजस्वी बलवाञ्शूरो राजराजेश्वरः प्रभुः ॥
prasādanaṃ prāptakālaṃ pāṇḍavasyābhirocaye | tejasvī balavāñśūro rājarājeśvaraḥ prabhuḥ
मेरे विचार में अब पाण्डव को प्रसन्न करने का समय आ गया है। वे तेजस्वी, बलवान, शूरवीर, समर्थ और राजाओं के भी राजा हैं।
श्लोक 3 (4.76.3)
उत्तरां च स्वसारं मे पार्थस्यामित्रकर्शन । प्रणिपत्य प्रयच्छामस्ततः शिष्टा भवामहे ॥
uttarāṃ ca svasāraṃ me pārthasyāmitrakarśana | praṇipatya prayacchāmastataḥ śiṣṭā bhavāmahe
हे शत्रुनाशक, हम प्रणाम करके अपनी बहन उत्तरा पार्थ को सौंप दें; तब हम शिष्ट (कर्तव्य निभाने वाले) कहलाएँगे।
श्लोक 4 (4.76.4)
वयं च सर्वे सामात्याः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । प्रसाद्याभ्युपतिष्ठामो राजन्किं करवामहे ॥
vayaṃ ca sarve sāmātyāḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | prasādyābhyupatiṣṭhāmo rājankiṃ karavāmahe
और हम सब मंत्रियों सहित कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को प्रसन्न करके उनकी सेवा में उपस्थित हों और पूछें, "हे राजन्, हम आपकी क्या सेवा करें?"
श्लोक 5 (4.76.5)
राजंस्त्वमसि संग्रामे गृहीतस्तेन मोक्षितः । एतेषां बाहुवीर्येण गावश्च विजितास्त्वया ॥
rājaṃstvamasi saṃgrāme gṛhītastena mokṣitaḥ | eteṣāṃ bāhuvīryeṇa gāvaśca vijitāstvayā
हे राजन्, युद्ध में आप पकड़े गए थे और उन्होंने आपको छुड़ाया; और इन्हीं के बाहुबल से आपने गौएँ जीतीं।
श्लोक 6 (4.76.6)
कुरवो निर्जिता यस्मात्संग्रामेऽमिततेजसः । एष तत्सर्वमकरोत्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
kuravo nirjitā yasmātsaṃgrāme'mitatejasaḥ | eṣa tatsarvamakarotkuntīputro yudhiṣṭhiraḥ
अपार तेज वाले कौरव जो युद्ध में परास्त हुए, यह सब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर का ही किया हुआ है।
श्लोक 7 (4.76.7)
अर्च्याः पूज्याश्च मान्याश्च प्रत्युत्थेयाश्च पाण्डवाः । अर्घ्यार्हाश्चाभिवाद्याश्च प्राप्तकालं च मे मतम् ॥
arcyāḥ pūjyāśca mānyāśca pratyuttheyāśca pāṇḍavāḥ | arghyārhāścābhivādyāśca prāptakālaṃ ca me matam
पाण्डव पूजनीय, आदरणीय और माननीय हैं; उनके आने पर उठकर स्वागत करना, उन्हें अर्घ्य देना और प्रणाम करना चाहिए। मेरे मत में अब इसी का समय है।
श्लोक 8 (4.76.8)
पूज्यतां पूजनीयाश्च महाभागाश्च पाण्डवाः । न ह्येते कुपिताः शेषं कुर्युराशीविषोपमाः ॥
pūjyatāṃ pūjanīyāśca mahābhāgāśca pāṇḍavāḥ | na hyete kupitāḥ śeṣaṃ kuryurāśīviṣopamāḥ
पूजा के योग्य महाभाग पाण्डवों की पूजा की जाए; क्योंकि विषधर सर्पों के समान ये यदि कुपित हो गए तो कुछ भी शेष नहीं छोड़ेंगे।
श्लोक 9 (4.76.9)
तस्माच्छीघ्रं प्रपद्येम कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । प्रसादयाम्यहं तत्र सह पार्थैर्महात्मभिः ॥
tasmācchīghraṃ prapadyema kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | prasādayāmyahaṃ tatra saha pārthairmahātmabhiḥ
इसलिए हम शीघ्र कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर की शरण में चलें। मैं वहाँ महात्मा पृथापुत्रों के साथ उन्हें प्रसन्न करूँगा,
श्लोक 10 (4.76.10)
उत्तरामग्रतः कृत्वा शिरःस्नातां कृताञ्जलिः । जानाम्यहमिदं सर्वमेषां तु बलपौरुषम् । कुले च जन्म महति फल्गुनस्य च विक्रमम् ॥
uttarāmagrataḥ kṛtvā śiraḥsnātāṃ kṛtāñjaliḥ | jānāmyahamidaṃ sarvameṣāṃ tu balapauruṣam | kule ca janma mahati phalgunasya ca vikramam
सिर से स्नान की हुई उत्तरा को आगे करके, हाथ जोड़कर। मैं यह सब जानता हूँ: इनका बल और पौरुष, महान कुल में इनका जन्म, और फाल्गुन का पराक्रम।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (4.76.11)
उत्तरात्पाण्डवाञ्श्रुत्वा विराटो रिपुसूदनः । उत्तरं चापि संप्रेक्ष्य प्राप्तकालमचिन्तयत् ॥
uttarātpāṇḍavāñśrutvā virāṭo ripusūdanaḥ | uttaraṃ cāpi saṃprekṣya prāptakālamacintayat
उत्तर से पाण्डवों के विषय में सुनकर और उत्तर की ओर देखकर शत्रुनाशक विराट ने विचार किया कि इस समय क्या करना उचित है।
श्लोक 12 (4.76.12)
ततो विराटः सामात्यः सहपुत्रः सबान्धवः । उत्तरामग्रतः कृत्वा शिरःस्नातां कृताञ्जलिः । भूमौ निपतितस्तूर्णं पाण्डवस्य समीपतः ॥
tato virāṭaḥ sāmātyaḥ sahaputraḥ sabāndhavaḥ | uttarāmagrataḥ kṛtvā śiraḥsnātāṃ kṛtāñjaliḥ | bhūmau nipatitastūrṇaṃ pāṇḍavasya samīpataḥ
तब विराट अपने मंत्रियों, पुत्र और बन्धु-बान्धवों के साथ, सिर से नहाई हुई उत्तरा को आगे करके, हाथ जोड़े हुए तुरन्त पाण्डव (युधिष्ठिर) के समीप भूमि पर गिर पड़े।
विराट उवाच
श्लोक 13 (4.76.13)
प्रसीदतु महाराजो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । प्रच्छन्नरूपवेषत्वान्नाग्निर्दृष्टस्तृणैर्वृतः ॥
prasīdatu mahārājo dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | pracchannarūpaveṣatvānnāgnirdṛṣṭastṛṇairvṛtaḥ
महाराज धर्मपुत्र युधिष्ठिर प्रसन्न हों। आपका रूप और वेश छिपा होने के कारण मैं तिनकों से ढकी अग्नि को पहचान न सका।
श्लोक 14 (4.76.14)
शिरसाऽभिप्रपन्नोऽस्मि सपुत्रपरिचारकः ॥
śirasā'bhiprapanno'smi saputraparicārakaḥ
मैं अपने पुत्र और सेवकों सहित सिर झुकाकर आपकी शरण में आया हूँ।
श्लोक 15 (4.76.15)
यदस्माभिरजानद्भिरधिक्षिप्तो महीपतिः । अवमत्य कृतं सर्वमज्ञानात्प्राकृते यथा । क्षन्तुमर्हसि तत्सर्वं धर्मज्ञो धर्मवत्सल ॥
yadasmābhirajānadbhiradhikṣipto mahīpatiḥ | avamatya kṛtaṃ sarvamajñānātprākṛte yathā | kṣantumarhasi tatsarvaṃ dharmajño dharmavatsala
हमने अनजाने में राजा का जो अपमान किया, अज्ञानवश साधारण मनुष्य समझकर उपेक्षा से जो कुछ किया, हे धर्मज्ञ, धर्मप्रेमी, वह सब आप क्षमा करें।
श्लोक 16 (4.76.16)
यदिदं मामकं राष्ट्रं पुरं राज्यं च पार्थिव । सदण्डकोशं विसृजे तव वश्योऽस्मि पार्थिव । वयं च सर्वे सामात्या भवन्तं शरणं गताः ॥
yadidaṃ māmakaṃ rāṣṭraṃ puraṃ rājyaṃ ca pārthiva | sadaṇḍakośaṃ visṛje tava vaśyo'smi pārthiva | vayaṃ ca sarve sāmātyā bhavantaṃ śaraṇaṃ gatāḥ
हे राजन्, मेरा यह राष्ट्र, नगर और राज्य, सेना और कोष सहित, मैं आपको सौंपता हूँ; मैं आपके अधीन हूँ। हम सब मंत्रियों सहित आपकी शरण में आए हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (4.76.17)
तं धर्मराजः पतितं महीतले । सबन्धुवर्गं प्रसमीक्ष्य पार्थिवम् । उवाच वाक्यं परलोकदर्शनः । प्रनष्टमन्युर्गतशोकमत्सरः ॥
taṃ dharmarājaḥ patitaṃ mahītale | sabandhuvargaṃ prasamīkṣya pārthivam | uvāca vākyaṃ paralokadarśanaḥ | pranaṣṭamanyurgataśokamatsaraḥ
राजा विराट को बन्धु-बान्धवों सहित भूमि पर पड़ा देखकर, परलोक पर दृष्टि रखने वाले, क्रोध से मुक्त, शोक और ईर्ष्या से रहित धर्मराज ने ये वचन कहे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 18 (4.76.18)
न ते भयं पार्थिव विद्यते मयि । प्रतीतरूपोऽस्म्यनुचिन्त्य मानसम् । एतत्त्वया सम्यगिहोपपादितं । द्विजैरमात्यैः सदृशैश्च पण्डितैः । इमां च कन्यां समलंकृतां भृशं । समीक्ष्य तुष्टोऽस्मि नरेन्द्रसत्तम ॥
na te bhayaṃ pārthiva vidyate mayi | pratītarūpo'smyanucintya mānasam | etattvayā samyagihopapāditaṃ | dvijairamātyaiḥ sadṛśaiśca paṇḍitaiḥ | imāṃ ca kanyāṃ samalaṃkṛtāṃ bhṛśaṃ | samīkṣya tuṣṭo'smi narendrasattama
हे राजन्, आपको मुझसे कोई भय नहीं है। आपके मन की बात पर विचार करके मैं आश्वस्त हूँ। आपने ब्राह्मणों, मंत्रियों और योग्य विद्वानों के साथ यहाँ यह सब उचित ही किया है। और भली-भाँति सजी हुई इस कन्या को देखकर, हे नरेन्द्रश्रेष्ठ, मैं संतुष्ट हूँ।
श्लोक 19 (4.76.19)
क्षान्तमेतन्महाबाहो यन्मां वदसि पार्थिव । न चैव किंचित्पश्यामि विकृतं ते नराधिप ॥
kṣāntametanmahābāho yanmāṃ vadasi pārthiva | na caiva kiṃcitpaśyāmi vikṛtaṃ te narādhipa
हे महाबाहु राजन्, आप जो कुछ कह रहे हैं, वह क्षमा किया। हे नरेश, मुझे आपमें कोई भी दोष दिखाई नहीं देता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (4.76.20)
ततो विराटः परमामितुष्टः । समेत्य राज्ञा समयं चकार । राज्यं च सर्वं विससर्ज तस्मै । सदण्डकोशं सपुरं महात्मा ॥
tato virāṭaḥ paramāmituṣṭaḥ | sametya rājñā samayaṃ cakāra | rājyaṃ ca sarvaṃ visasarja tasmai | sadaṇḍakośaṃ sapuraṃ mahātmā
तब अत्यन्त प्रसन्न होकर महात्मा विराट ने राजा युधिष्ठिर से मिलकर उनसे संधि की और सेना, कोष और नगर सहित अपना सारा राज्य उन्हें सौंप दिया।