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दशम स्कन्ध · अध्याय 12

अघासुर-वध

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (bhagavata.10.12.1)

श्रीशुक उवाच क्वचिद् वनाशाय मनो दधद्व्रजात् प्रातः समुत्थाय वयस्यवत्सपान् । प्रबोधयञ्छृङ्गरवेण चारुणा विनिर्गतो वत्सपुरःसरो हरिः ॥ 12.1 ॥

śrī-śuka uvāca kvacid vanāśāya mano dadhad vrajāt prātaḥ samutthāya vayasya-vatsapān prabodhayañ chṛṅga-raveṇa cāruṇā vinirgato vatsa-puraḥsaro hariḥ

श्रीशुक ने कहा — एक दिन वन में जाने की इच्छा से हरि प्रातःकाल उठे, अपने साथी बछड़ों के रखवालों को मधुर सींग-ध्वनि से जगाते हुए, बछड़ों को आगे कर वे व्रज से बाहर निकले।

श्लोक 2 (bhagavata.10.12.2)

तेनैव साकं पृथुकाः सहस्रशः स्निग्धाः सुशिग्वेत्रविषाणवेणवः । स्वान् स्वान् सहस्रोपरिसङ्ख्ययान्वितान् वत्सान् पुरस्कृत्य विनिर्ययुर्मुदा ॥ 12.2 ॥

tenaiva sākaṁ pṛthukāḥ sahasraśaḥ snigdhāḥ suśig-vetra-viṣāṇa-veṇavaḥ svān svān sahasropari-saṅkhyayānvitān vatsān puraskṛtya viniryayur mudā

उन्हीं के साथ हज़ारों प्रेममय बालक, थैलियों, छड़ी, सींग और बाँसुरी से सुसज्जित होकर, अपने-अपने हज़ारों-हज़ारों बछड़ों को आगे करके हर्षपूर्वक निकल पड़े।

श्लोक 3 (bhagavata.10.12.3)

कृष्णवत्सैरसङ्ख्यातैर्यूथीकृत्य स्ववत्सकान् । चारयन्तोऽर्भलीलाभिर्विजह्रुस्तत्र तत्र ह ॥ 12.3 ॥

kṛṣṇa-vatsair asaṅkhyātair yūthī-kṛtya sva-vatsakān cārayanto ’rbha-līlābhir vijahrus tatra tatra ha

अनगिनत बछड़ों को कृष्ण के बछड़ों के साथ एक ही झुंड बनाकर, वे बालसुलभ क्रीड़ाओं में मग्न होकर उन्हें चराते हुए इधर-उधर विचरण करने लगे।

श्लोक 4 (bhagavata.10.12.4)

फलप्रबालस्तवकसुमनःपिच्छधातुभिः । काचगुञ्जामणिस्वर्णभूषिता अप्यभूषयन् ॥ 12.4 ॥

phala-prabāla-stavaka- sumanaḥ-piccha-dhātubhiḥ kāca-guñjā-maṇi-svarṇa- bhūṣitā apy abhūṣayan

काँच, गुंजा, मणि और स्वर्ण से पहले ही अलंकृत वे बालक फलों, कोंपलों, फूलों के गुच्छों, मोरपंखों और रंगीन मिट्टियों से भी स्वयं को और सजाने लगे।

श्लोक 5 (bhagavata.10.12.5)

मुष्णन्तोऽन्योन्यशिक्यादीन्ज्ञातानाराच्च चिक्षिपुः । तत्रत्याश्च पुनर्दूराद्धसन्तश्च पुनर्ददुः ॥ 12.5 ॥

muṣṇanto ’nyonya-śikyādīn jñātān ārāc ca cikṣipuḥ tatratyāś ca punar dūrād dhasantaś ca punar daduḥ

वे एक-दूसरे की थैलियाँ चुराकर उन्हें पहचाने जाने पर दूर फेंक देते, और दूसरे बालक उन्हें और भी दूर फेंकते हुए हँसते; फिर वापस भी कर देते।

श्लोक 6 (bhagavata.10.12.6)

यदि दूरं गतः कृष्णो वनशोभेक्षणाय तम् । अहं पूर्वमहं पूर्वमिति संस्पृश्य रेमिरे ॥ 12.6 ॥

yadi dūraṁ gataḥ kṛṣṇo vana-śobhekṣaṇāya tam ahaṁ pūrvam ahaṁ pūrvam iti saṁspṛśya remire

जब कृष्ण वन की शोभा देखने के लिए कुछ दूर चले जाते, तो सब बालक "मैं पहले, मैं पहले" कहते हुए दौड़कर उन्हें छूने का आनन्द लेते।

श्लोक 7 (bhagavata.10.12.7)

केचिद्वेणून्वादयन्तो ध्मान्तः शृङ्गाणि केचन । केचिद्भृङ्गैः प्रगायन्तः कूजन्तः कोकिलैः परे ॥ 12.7 ॥

kecid veṇūn vādayanto dhmāntaḥ śṛṅgāṇi kecana kecid bhṛṅgaiḥ pragāyantaḥ kūjantaḥ kokilaiḥ pare

कोई बाँसुरी बजाता, कोई सींग फूँकता, कोई भौंरों की गुनगुनाहट की नकल करते हुए गाता, तो कोई कोयल की कूक की नकल करता।

श्लोक 8 (bhagavata.10.12.8)

विच्छायाभिः प्रधावन्तो गच्छन्तः साधु हंसकैः । बकैरुपविशन्तश्च नृत्यन्तश्च कलापिभिः ॥ 12.8 ॥

vicchāyābhiḥ pradhāvanto gacchantaḥ sādhu-haṁsakaiḥ bakair upaviśantaś ca nṛtyantaś ca kalāpibhiḥ

कोई पक्षियों की परछाइयों के पीछे दौड़ता, कोई हंसों की भाँति सुन्दर चाल चलता, कोई बगुलों के संग चुपचाप बैठ जाता, तो कोई मोरों के संग नाचने लगता।

श्लोक 9 (bhagavata.10.12.9)

विकर्षन्तः कीशबालानारोहन्तश्च तैर्द्रुमान् । विकुर्वन्तश्च तैः साकं प्लवन्तश्च पलाशिषु ॥ 12.9 ॥

vikarṣantaḥ kīśa-bālān ārohantaś ca tair drumān vikurvantaś ca taiḥ sākaṁ plavantaś ca palāśiṣu

कोई बन्दर के बच्चों को खींचता, कोई उन्हीं के साथ वृक्षों पर चढ़ जाता, कोई उनके साथ मुँह बिगाड़कर बन्दर बन जाता, तो कोई पेड़ों की डालियों पर से कूदता-फाँदता।

श्लोक 10 (bhagavata.10.12.10)

साकं भेकैर्विलङ्घन्तः सरितः स्रवसम्प्लुताः । विहसन्तः प्रतिच्छायाः शपन्तश्च प्रतिस्वनान् ॥ 12.10 ॥

sākaṁ bhekair vilaṅghantaḥ saritaḥ srava-samplutāḥ vihasantaḥ praticchāyāḥ śapantaś ca pratisvanān

कोई मेंढकों के साथ मिलकर धाराओं को लाँघता, कोई जल में अपनी परछाई देखकर हँस पड़ता, तो कोई अपनी ही प्रतिध्वनि को डाँटता।

श्लोक 11 (bhagavata.10.12.11)

इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन । मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥ 12.11 ॥

itthaṁ satāṁ brahma-sukhānubhūtyā dāsyaṁ gatānāṁ para-daivatena māyāśritānāṁ nara-dārakeṇa sākaṁ vijahruḥ kṛta-puṇya-puñjāḥ

इस प्रकार, जो सन्त पुरुषों को ब्रह्म-सुख के अनुभव के रूप में प्राप्त होते हैं, जो दास्य-भाव को प्राप्त भक्तों के परम आराध्य हैं, और जो माया के वशीभूत जनों को एक साधारण मनुष्य-बालक जान पड़ते हैं — उन्हीं के साथ, अनेक जन्मों के संचित पुण्यों वाले वे बालक क्रीड़ा कर रहे थे।

श्लोक 12 (bhagavata.10.12.12)

यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छ्रतो धृतात्मभिर्योगिभिरप्यलभ्यः । स एव यद् दृग्विषयः स्वयं स्थितः किं वर्ण्यते दिष्टमतो व्रजौकसाम् ॥ 12.12 ॥

yat-pāda-pāṁsur bahu-janma-kṛcchrato dhṛtātmabhir yogibhir apy alabhyaḥ sa eva yad-dṛg-viṣayaḥ svayaṁ sthitaḥ kiṁ varṇyate diṣṭam ato vrajaukasām

जिनके चरणों की धूल भी बड़े-बड़े योगीजन अनेक जन्मों के कठोर साधन से भी, मन को वश में करके, प्राप्त नहीं कर पाते — वे ही स्वयं इन बालकों की आँखों के सम्मुख साक्षात् उपस्थित थे; तब व्रजवासियों के इस सौभाग्य का वर्णन ही क्या किया जाए?

श्लोक 13 (bhagavata.10.12.13)

अथाघनामाभ्यपतन्महासुर- स्तेषां सुखक्रीडनवीक्षणाक्षमः । नित्यं यदन्तर्निजजीवितेप्सुभिः पीतामृतैरप्यमरैः प्रतीक्ष्यते ॥ 12.13 ॥

athāgha-nāmābhyapatan mahāsuras teṣāṁ sukha-krīḍana-vīkṣaṇākṣamaḥ nityaṁ yad-antar nija-jīvitepsubhiḥ pītāmṛtair apy amaraiḥ pratīkṣyate

इसी समय अघ नामक एक महाबली असुर वहाँ आ पहुँचा, जो उन बालकों की सुखमय क्रीड़ा को देख न सका; अमृत पीने वाले देवता भी अपने प्राणों की चिन्ता से सदैव उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा करते थे।

श्लोक 14 (bhagavata.10.12.14)

दृष्ट्वार्भकान् कृष्णमुखानघासुरः कंसानुशिष्टः स बकीबकानुजः । अयं तु मे सोदरनाशकृत्तयो- र्द्वयोर्ममैनं सबलं हनिष्ये ॥ 12.14 ॥

dṛṣṭvārbhakān kṛṣṇa-mukhān aghāsuraḥ kaṁsānuśiṣṭaḥ sa bakī-bakānujaḥ ayaṁ tu me sodara-nāśa-kṛt tayor dvayor mamainaṁ sa-balaṁ haniṣye

कंस के भेजे हुए, बकी और बक के छोटे भाई अघासुर ने कृष्ण के नेतृत्व में उन बालकों को देखकर सोचा — इसी ने मेरे भाई-बहन का नाश किया है, अतः मैं इसे इसके साथियों सहित मार डालूँगा।

श्लोक 15 (bhagavata.10.12.15)

एते यदा मत्सुहृदोस्तिलापः कृतास्तदा नष्टसमा व्रजौकसः । प्राणे गते वर्ष्मसु का नु चिन्ता प्रजासवः प्राणभृतो हि ये ते ॥ 12.15 ॥

ete yadā mat-suhṛdos tilāpaḥ kṛtās tadā naṣṭa-samā vrajaukasaḥ prāṇe gate varṣmasu kā nu cintā prajāsavaḥ prāṇa-bhṛto hi ye te

उसने सोचा — जब ये मेरे स्वजनों के तर्पण का ग्रास बन जाएँगे, तब व्रजवासी भी मृतवत् हो जाएँगे, क्योंकि प्राण चले जाने पर शरीर की क्या चिन्ता — ये ही तो उनके प्राण-तुल्य पुत्र हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.10.12.16)

इति व्यवस्याजगरं बृहद् वपुः स योजनायाममहाद्रिपीवरम् । धृत्वाद्भुतं व्यात्तगुहाननं तदा पथि व्यशेत ग्रसनाशया खलः ॥ 12.16 ॥

iti vyavasyājagaraṁ bṛhad vapuḥ sa yojanāyāma-mahādri-pīvaram dhṛtvādbhutaṁ vyātta-guhānanaṁ tadā pathi vyaśeta grasanāśayā khalaḥ

यह निश्चय करके, वह दुष्ट असुर एक विशाल अजगर का रूप धरकर, जो एक योजन लम्बा और विशाल पर्वत के समान स्थूल था, अपना मुँह किसी गुफा की भाँति खोलकर, निगलने की इच्छा से मार्ग में लेट गया।

श्लोक 17 (bhagavata.10.12.17)

धराधरोष्ठो जलदोत्तरोष्ठो दर्याननान्तो गिरिशृङ्गदंष्ट्रः । ध्वान्तान्तरास्यो वितताध्वजिह्वः परुषानिलश्वासदवेक्षणोष्णः ॥ 12.17 ॥

dharādharoṣṭho jaladottaroṣṭho dary-ānanānto giri-śṛṅga-daṁṣṭraḥ dhvāntāntar-āsyo vitatādhva-jihvaḥ paruṣānila-śvāsa-davekṣaṇoṣṇaḥ

उसका नीचला ओठ धरती को छूता था और ऊपरी ओठ बादलों तक जाता था, गुफा जैसा मुखान्त पर्वत-शिखर जैसी दाढ़ों वाला था, भीतर घोर अन्धकार था, फैली हुई जीभ मार्ग-सी लम्बी थी, और साँसें तप्त वायु के समान चल रही थीं, आँखें दावाग्नि-सी दहक रही थीं।

श्लोक 18 (bhagavata.10.12.18)

दृष्ट्वा तं तादृशं सर्वे मत्वा वृन्दावनश्रियम् । व्यात्ताजगरतुण्डेन ह्युत्प्रेक्षन्ते स्म लीलया ॥ 12.18 ॥

dṛṣṭvā taṁ tādṛśaṁ sarve matvā vṛndāvana-śriyam vyāttājagara-tuṇḍena hy utprekṣante sma līlayā

उस विचित्र आकृति को देखकर सब बालकों ने उसे वृन्दावन की ही कोई शोभा मान लिया, और खेल-खेल में उसे अजगर के फैले हुए मुख जैसा समझने लगे।

श्लोक 19 (bhagavata.10.12.19)

अहो मित्राणि गदत सत्त्वकूटं पुरः स्थितम् । अस्मत्सङ्ग्रसनव्यात्तव्यालतुण्डायते न वा ॥ 12.19 ॥

aho mitrāṇi gadata sattva-kūṭaṁ puraḥ sthitam asmat-saṅgrasana-vyātta- vyāla-tuṇḍāyate na vā

वे बोले — अरे मित्रो, बताओ तो, यह जो हमारे सामने पड़ा हुआ प्राणी है, कहीं यह हमें निगलने के लिए मुँह फैलाए बैठा जीता-जागता सर्प तो नहीं?

श्लोक 20 (bhagavata.10.12.20)

सत्यमर्ककरारक्तमुत्तराहनुवद् धनम् । अधराहनुवद्रोधस्तत्प्रतिच्छाययारुणम् ॥ 12.20 ॥

satyam arka-karāraktam uttarā-hanuvad ghanam adharā-hanuvad rodhas tat-praticchāyayāruṇam

सचमुच, इसका ऊपरी ओठ सूर्य की किरणों से लाल हुए बादल जैसा घना है, और निचला ओठ उसी की परछाईं से लाल दिखने वाले किनारे जैसा है।

श्लोक 21 (bhagavata.10.12.21)

प्रतिस्पर्धेते सृक्कभ्यां सव्यासव्ये नगोदरे । तुङ्गशृङ्गालयोऽप्येतास्तद्दंष्ट्राभिश्च पश्यत ॥ 12.21 ॥

pratispardhete sṛkkabhyāṁ savyāsavye nagodare tuṅga-śṛṅgālayo ’py etās tad-daṁṣṭrābhiś ca paśyata

देखो तो, पहाड़ की गुफा जैसे इसके दोनों ओर के मुखकोण होड़ लगा रहे हैं, और उन ऊँचे पर्वत-शिखरों जैसे इसके दाँत भी देखो।

श्लोक 22 (bhagavata.10.12.22)

आस्तृतायाममार्गोऽयं रसनां प्रतिगर्जति । एषामन्तर्गतं ध्वान्तमेतदप्यन्तराननम् ॥ 12.22 ॥

āstṛtāyāma-mārgo ’yaṁ rasanāṁ pratigarjati eṣāṁ antar-gataṁ dhvāntam etad apy antar-ānanam

इसकी लम्बी-चौड़ी फैली हुई जीभ किसी विशाल मार्ग की तरह गरज रही है, और इसका भीतरी मुख घोर अन्धकार से भरा हुआ है।

श्लोक 23 (bhagavata.10.12.23)

दावोष्णखरवातोऽयं श्वासवद्भाति पश्यत । तद्दग्धसत्त्वदुर्गन्धोऽप्यन्तरामिषगन्धवत् ॥ 12.23 ॥

dāvoṣṇa-khara-vāto ’yaṁ śvāsavad bhāti paśyata tad-dagdha-sattva-durgandho ’py antar-āmiṣa-gandhavat

देखो, यह गर्म और तीखी हवा इसकी साँस जैसी लग रही है, और भीतर से आती दुर्गन्ध ऐसी है मानो जले हुए माँस की गन्ध हो।

श्लोक 24 (bhagavata.10.12.24)

अस्मान् किमत्र ग्रसिता निविष्टा- नयं तथा चेद् बकवद् विनङ्क्ष्यति । क्षणादनेनेति बकार्युशन्मुखं वीक्ष्योद्धसन्तः करताडनैर्ययुः ॥ 12.24 ॥

asmān kim atra grasitā niviṣṭān ayaṁ tathā ced bakavad vinaṅkṣyati kṣaṇād aneneti bakāry-uśan-mukhaṁ vīkṣyoddhasantaḥ kara-tāḍanair yayuḥ

क्या यह हमें, जो इसके भीतर प्रवेश कर जाएँ, निगल जाएगा? यदि ऐसा है तो यह भी बक की भाँति क्षण भर में नष्ट हो जाएगा — यह कहकर, बकासुर के शत्रु के मुख की ओर देखकर, वे ज़ोर से हँसते और ताली बजाते हुए भीतर चले गए।

श्लोक 25 (bhagavata.10.12.25)

इत्थं मिथोऽतथ्यमतज्ज्ञभाषितं श्रुत्वा विचिन्त्येत्यमृषा मृषायते । रक्षो विदित्वाखिलभूतहृत्स्थितः स्वानां निरोद्धुं भगवान् मनो दधे ॥ 12.25 ॥

itthaṁ mitho ’tathyam ataj-jña-bhāṣitaṁ śrutvā vicintyety amṛṣā mṛṣāyate rakṣo viditvākhila-bhūta-hṛt-sthitaḥ svānāṁ niroddhuṁ bhagavān mano dadhe

इस प्रकार बालकों की अज्ञानवश आपस में कही गई निरर्थक बातें सुनकर, तथा उस मिथ्या रूप को असत्य जानकर, समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित भगवान ने उसे राक्षस पहचान लिया और अपने साथियों को रोकने का विचार किया।

श्लोक 26 (bhagavata.10.12.26)

तावत् प्रविष्टास्त्वसुरोदरान्तरं परं न गीर्णाः शिशवः सवत्साः । प्रतीक्षमाणेन बकारिवेशनं हतस्वकान्तस्मरणेन रक्षसा ॥ 12.26 ॥

tāvat praviṣṭās tv asurodarāntaraṁ paraṁ na gīrṇāḥ śiśavaḥ sa-vatsāḥ pratīkṣamāṇena bakāri-veśanaṁ hata-sva-kānta-smaraṇena rakṣasā

किन्तु तब तक बछड़ों सहित सब बालक उस असुर के उदर में प्रवेश कर चुके थे, फिर भी वह उन्हें निगल नहीं पाया, क्योंकि वह असुर तो अपने मारे गए स्वजनों के लिए बकासुर-शत्रु के प्रवेश की ही प्रतीक्षा कर रहा था।

श्लोक 27 (bhagavata.10.12.27)

तान् वीक्ष्य कृष्णः सकलाभयप्रदो ह्यनन्यनाथान् स्वकरादवच्युतान् । दीनांश्च मृत्योर्जठराग्निघासान् घृणार्दितो दिष्टकृतेन विस्मितः ॥ 12.27 ॥

tān vīkṣya kṛṣṇaḥ sakalābhaya-prado hy ananya-nāthān sva-karād avacyutān dīnāṁś ca mṛtyor jaṭharāgni-ghāsān ghṛṇārdito diṣṭa-kṛtena vismitaḥ

अनन्य शरण, स्वयं अपने ही हाथ से चूक गए, मृत्यु की जठराग्नि के ग्रास बने उन दीन बालकों को देखकर, समस्त प्राणियों को अभय देने वाले कृष्ण करुणा से पीड़ित हो उठे और इस विधिवत घटना पर विस्मित रह गए।

श्लोक 28 (bhagavata.10.12.28)

कृत्यं किमत्रास्य खलस्य जीवनं न वा अमीषां च सतां विहिंसनम् । द्वयं कथं स्यादिति संविचिन्त्य ज्ञात्वाविशत्तुण्डमशेषदृग्घरिः ॥ 12.28 ॥

kṛtyaṁ kim atrāsya khalasya jīvanaṁ na vā amīṣāṁ ca satāṁ vihiṁsanam dvayaṁ kathaṁ syād iti saṁvicintya jñātvāviśat tuṇḍam aśeṣa-dṛg ghariḥ

इस दुष्ट का जीवन बना रहे या इन सज्जनों की हिंसा न हो — दोनों बातें एक साथ कैसे सम्भव हों, यह सोचकर, सर्वदर्शी हरि यह समाधान जान लेकर उस मुख में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 29 (bhagavata.10.12.29)

तदा घनच्छदा देवा भयाद्धाहेति चुक्रुशुः । जहृषुर्ये च कंसाद्याः कौणपास्त्वघबान्धवाः ॥ 12.29 ॥

tadā ghana-cchadā devā bhayād dhā-heti cukruśuḥ jahṛṣur ye ca kaṁsādyāḥ kauṇapās tv agha-bāndhavāḥ

उस समय बादलों में छिपे देवगण भय से "हा, हा" चिल्ला उठे, जबकि कंस आदि तथा अघ के स्वजन राक्षसगण हर्षित हो उठे।

श्लोक 30 (bhagavata.10.12.30)

तच्छ्रुत्वा भगवान्कृष्णस्त्वव्ययः सार्भवत्सकम् । चूर्णीचिकीर्षोरात्मानं तरसा ववृधे गले ॥ 12.30 ॥

tac chrutvā bhagavān kṛṣṇas tv avyayaḥ sārbha-vatsakam cūrṇī-cikīrṣor ātmānaṁ tarasā vavṛdhe gale

यह सुनकर अविनाशी भगवान कृष्ण ने बछड़ों और बालकों सहित अपने आपको चूर करने की उस असुर की इच्छा को विफल करने के लिए, वेगपूर्वक उसके गले में अपना शरीर बड़ा कर लिया।

श्लोक 31 (bhagavata.10.12.31)

ततोऽतिकायस्य निरुद्धमार्गिणो ह्युद्गीर्णदृष्टेर्भ्रमतस्त्वितस्ततः । पूर्णोऽन्तरङ्गे पवनो निरुद्धो मूर्धन् विनिर्भिद्य विनिर्गतो बहिः ॥ 12.31 ॥

tato ’tikāyasya niruddha-mārgiṇo hy udgīrṇa-dṛṣṭer bhramatas tv itas tataḥ pūrṇo ’ntar-aṅge pavano niruddho mūrdhan vinirbhidya vinirgato bahiḥ

तब उस विशालकाय असुर का मार्ग अवरुद्ध हो गया, उसकी आँखें बाहर निकल आईं, वह इधर-उधर भटकने लगा; उसके भीतर पूर्ण रूप से रुका हुआ प्राणवायु अन्ततः उसके मस्तक को फोड़कर बाहर निकल गया।

श्लोक 32 (bhagavata.10.12.32)

तेनैव सर्वेषु बहिर्गतेषु प्राणेषु वत्सान् सुहृदः परेतान् । दृष्टया स्वयोत्थाप्य तदन्वितः पुन- र्वक्त्रान्मुकुन्दो भगवान् विनिर्ययौ ॥ 12.32 ॥

tenaiva sarveṣu bahir gateṣu prāṇeṣu vatsān suhṛdaḥ paretān dṛṣṭyā svayotthāpya tad-anvitaḥ punar vaktrān mukundo bhagavān viniryayau

उसका सारा प्राणवायु बाहर निकल जाने पर, मुकुन्द भगवान ने मृत बछड़ों और अपने साथियों को अपनी दृष्टि मात्र से पुनर्जीवित कर, उन्हें साथ लेकर उस मुख से बाहर निकल आए।

श्लोक 33 (bhagavata.10.12.33)

पीनाहिभोगोत्थितमद्भुतं मह- ज्ज्योतिः स्वधाम्ना ज्वलयद् दिशो दश । प्रतीक्ष्य खेऽवस्थितमीशनिर्गमं विवेश तस्मिन् मिषतां दिवौकसाम् ॥ 12.33 ॥

pīnāhi-bhogotthitam adbhutaṁ mahaj jyotiḥ sva-dhāmnā jvalayad diśo daśa pratīkṣya khe ’vasthitam īśa-nirgamaṁ viveśa tasmin miṣatāṁ divaukasām

उस स्थूल सर्प-शरीर से एक अद्भुत महातेज निकला, जो अपने ही प्रकाश से दसों दिशाओं को दीप्त कर रहा था; वह आकाश में तब तक ठहरा रहा जब तक ईश्वर बाहर न आए, और फिर स्वर्गवासियों के देखते-देखते उसी में समा गया।

श्लोक 34 (bhagavata.10.12.34)

ततोऽतिहृष्टाः स्वकृतोऽकृतार्हणं पुष्पैः सुगा अप्सरसश्च नर्तनैः । गीतैः सुरा वाद्यधराश्च वाद्यकैः स्तवैश्च विप्रा जयनिःस्वनैर्गणाः ॥ 12.34 ॥

tato ’tihṛṣṭāḥ sva-kṛto ’kṛtārhaṇaṁ puṣpaiḥ sugā apsarasaś ca nartanaiḥ gītaiḥ surā vādya-dharāś ca vādyakaiḥ stavaiś ca viprā jaya-niḥsvanair gaṇāḥ

तब अत्यन्त प्रसन्न होकर, अपने-अपने साधनों से उनकी अपूर्व अर्चना करते हुए, सुन्दर पुष्पों से देवता, नृत्य से अप्सराएँ, गीतों से गन्धर्व, वाद्ययन्त्रों से वादक, स्तुतियों से ब्राह्मणगण तथा जय-जयकार से गणदेव — सभी उमड़ पड़े।

श्लोक 35 (bhagavata.10.12.35)

तदद्भुतस्तोत्रसुवाद्यगीतिका- जयादिनैकोत्सवमङ्गलस्वनान् । श्रुत्वा स्वधाम्नोऽन्त्यज आगतोऽचिराद् दृष्ट्वा महीशस्य जगाम विस्मयम् ॥ 12.35 ॥

tad-adbhuta-stotra-suvādya-gītikā- jayādi-naikotsava-maṅgala-svanān śrutvā sva-dhāmno ’nty aja āgato ’cirād dṛṣṭvā mahīśasya jagāma vismayam

उस अद्भुत स्तुति, मधुर वाद्य, गीत और जय-जयकार से भरे मंगल-निनाद को सुनकर, अपने लोक से उतरकर वह अजन्मा (ब्रह्मा) शीघ्र वहाँ आए, और पृथ्वीपति के उस दृश्य को देखकर विस्मय में डूब गए।

श्लोक 36 (bhagavata.10.12.36)

राजन्नाजगरं चर्म शुष्कं वृन्दावनेऽद्भुतम् । व्रजौकसां बहुतिथं बभूवाक्रीडगह्वरम् ॥ 12.36 ॥

rājann ājagaraṁ carma śuṣkaṁ vṛndāvane ’dbhutam vrajaukasāṁ bahu-tithaṁ babhūvākrīḍa-gahvaram

हे राजन्, वृन्दावन में उस अजगर की सूखी हुई खाल दीर्घकाल तक व्रजवासियों के लिए एक अद्भुत क्रीड़ा-गुफा बनी रही।

श्लोक 37 (bhagavata.10.12.37)

एतत् कौमारजं कर्म हरेरात्माहिमोक्षणम् । मृत्योः पौगण्डके बाला दृष्ट्वोचुर्विस्मिता व्रजे ॥ 12.37 ॥

etat kaumārajaṁ karma harer ātmāhi-mokṣaṇam mṛtyoḥ paugaṇḍake bālā dṛṣṭvocur vismitā vraje

हरि के इस कौमार-अवस्था के कर्म को, जिसमें उन्होंने स्वयं को और साथियों को बचाया तथा उस सर्प को भी मृत्यु से मुक्ति दे दी, बालकों ने अपने पौगण्ड-काल में विस्मित होकर व्रज में वर्णन किया — मानो वह उसी क्षण घटा हो।

श्लोक 38 (bhagavata.10.12.38)

नैतद् विचित्रं मनुजार्भमायिनः परावराणां परमस्य वेधसः । अघोऽपि यत्स्पर्शनधौतपातकः प्रापात्मसाम्यं त्वसतां सुदुर्लभम् ॥ 12.38 ॥

naitad vicitraṁ manujārbha-māyinaḥ parāvarāṇāṁ paramasya vedhasaḥ agho ’pi yat-sparśana-dhauta-pātakaḥ prāpātma-sāmyaṁ tv asatāṁ sudurlabham

मनुष्य-बालक का रूप धरने वाले, कारणों और कार्यों के परम विधाता उस भगवान के लिए यह कुछ भी विचित्र नहीं है, कि जिस अघ का स्पर्श ही उसके पापों को धो देने वाला था, उसे भी असाधुओं के लिए दुर्लभ आत्म-सामीप्य प्राप्त हो गया।

श्लोक 39 (bhagavata.10.12.39)

सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम् । स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः ॥ 12.39 ॥

sakṛd yad-aṅga-pratimāntar-āhitā manomayī bhāgavatīṁ dadau gatim sa eva nityātma-sukhānubhūty-abhi- vyudasta-māyo ’ntar-gato hi kiṁ punaḥ

जब उनके अंग का ध्यान एक ही बार में, मन के भीतर धारण करने मात्र से, भागवत गति प्रदान कर देता है, तो जिनके हृदय में वे स्वयं नित्य आत्मानन्द के अनुभव के साथ, माया को दूर करके प्रविष्ट हो जाते हैं, उनकी तो बात ही क्या!

श्लोक 40 (bhagavata.10.12.40)

श्रीसूत उवाच इत्थं द्विजा यादवदेवदत्तः श्रुत्वा स्वरातुश्चरितं विचित्रम् । पप्रच्छ भूयोऽपि तदेव पुण्यं वैयासकिं यन्निगृहीतचेताः ॥ 12.40 ॥

śrī-sūta uvāca itthaṁ dvijā yādavadeva-dattaḥ śrutvā sva-rātuś caritaṁ vicitram papraccha bhūyo ’pi tad eva puṇyaṁ vaiyāsakiṁ yan nigṛhīta-cetāḥ

श्रीसूत ने कहा — हे द्विजगण, इस प्रकार यादव-देव द्वारा दिए गए (परीक्षित) ने अपने रक्षक (कृष्ण) की यह विचित्र चरित्र-गाथा सुनकर, उसी पावन कथा को फिर से सुनने के लिए वेदव्यास-पुत्र (शुकदेव) से पुनः प्रश्न किया, इतने मुग्ध हो गए थे उनके मन।

श्लोक 41 (bhagavata.10.12.41)

श्रीराजोवाच ब्रह्मन्कालान्तरकृतं तत्कालीनं कथं भवेत् । यत् कौमारे हरिकृतं जगुः पौगण्डकेऽर्भकाः ॥ 12.41 ॥

śrī-rājovāca brahman kālāntara-kṛtaṁ tat-kālīnaṁ kathaṁ bhavet yat kaumāre hari-kṛtaṁ jaguḥ paugaṇḍake ’rbhakāḥ

श्रीराजा ने कहा — हे ब्रह्मन्, जो घटना कृष्ण ने बाल्यावस्था में की थी, उसे पौगण्ड-अवस्था के बालकों ने उस समय की घटना कहकर कैसे गाया? भूतकाल की बात उस समय की कैसे हो सकती है?

श्लोक 42 (bhagavata.10.12.42)

तद् ब्रूहि मे महायोगिन्परं कौतूहलं गुरो । नूनमेतद्धरेरेव माया भवति नान्यथा ॥ 12.42 ॥

tad brūhi me mahā-yogin paraṁ kautūhalaṁ guro nūnam etad dharer eva māyā bhavati nānyathā

हे महायोगिन्, हे गुरो, मुझे इसका रहस्य बताइए, मैं अत्यन्त कौतूहल से भरा हूँ। निश्चय ही यह हरि की माया का ही एक और चमत्कार है, इसके सिवा और कुछ नहीं हो सकता।

श्लोक 43 (bhagavata.10.12.43)

वयं धन्यतमा लोके गुरोऽपि क्षत्रबन्धवः । वयं पिबामो मुहुस्त्वत्तः पुण्यं कृष्णकथामृतम् ॥ 12.43 ॥

vayaṁ dhanyatamā loke guro ’pi kṣatra-bandhavaḥ vayaṁ pibāmo muhus tvattaḥ puṇyaṁ kṛṣṇa-kathāmṛtam

हे गुरो, हम क्षत्रिय होकर भी, इस लोक में सबसे अधिक धन्य हैं, क्योंकि हम आपके मुख से बार-बार कृष्ण-कथा का पावन अमृत पीते रहते हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.10.12.44)

श्रीसूत उवाच इत्थं स्म पृष्टः स तु बादरायणि- स्तत्स्मारितानन्तहृताखिलेन्द्रियः । कृच्छ्रात् पुनर्लब्धबहिर्दृशिः शनैः प्रत्याह तं भागवतोत्तमोत्तम ॥ 12.44 ॥

śrī-sūta uvāca itthaṁ sma pṛṣṭaḥ sa tu bādarāyaṇis tat-smāritānanta-hṛtākhilendriyaḥ kṛcchrāt punar labdha-bahir-dṛśiḥ śanaiḥ pratyāha taṁ bhāgavatottamottama

श्रीसूत ने कहा — हे भक्तोत्तमों में श्रेष्ठ, इस प्रकार पूछे जाने पर, उन कृष्ण-स्मरण से भीतर ही भीतर सारी इन्द्रियों को खो चुके व्यास-पुत्र शुकदेव ने, कठिनाई से धीरे-धीरे अपनी बाह्य चेतना पुनः प्राप्त कर, परीक्षित को उत्तर देना आरम्भ किया।

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