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दशम स्कन्ध · अध्याय 27

इन्द्र और सुरभि की स्तुति

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (bhagavata.10.27.1)

श्रीशुक उवाच गोवर्धने धृते शैले आसाराद् रक्षिते व्रजे । गोलोकादाव्रजत्कृष्णं सुरभिः शक्र एव च ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca govardhane dhṛte śaile āsārād rakṣite vraje go-lokād āvrajat kṛṣṇaṁ surabhiḥ śakra eva ca

शुकदेव जी ने कहा — जब गोवर्धन पर्वत धारण किया जा चुका था और व्रज को उस भीषण वर्षा से बचा लिया गया था, तब सुरभि गोलोक से कृष्ण के दर्शन हेतु आईं, और साथ ही इन्द्र भी आए।

श्लोक 2 (bhagavata.10.27.2)

विविक्त उपसङ्गम्य व्रीडीतः कृतहेलनः । पस्पर्श पादयोरेनं किरीटेनार्कवर्चसा ॥ २ ॥

vivikta upasaṅgamya vrīḍītaḥ kṛta-helanaḥ pasparśa pādayor enaṁ kirīṭenārka-varcasā

एकांत में उनके पास जाकर, अपने द्वारा किए गए अपराध से लज्जित इन्द्र ने सूर्य के समान तेजस्वी अपने मुकुट से उनके चरणों का स्पर्श किया।

श्लोक 3 (bhagavata.10.27.3)

दृष्टश्रुतानुभावोऽस्य कृष्णस्यामिततेजसः । नष्टत्रिलोकेशमद इदमाह कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥

dṛṣṭa-śrutānubhāvo ’sya kṛṣṇasyāmita-tejasaḥ naṣṭa-tri-lokeśa-mada idam āha kṛtāñjaliḥ

इस अपार तेजस्वी कृष्ण के प्रभाव को देखकर और सुनकर, त्रिलोकाधिपति होने का उनका अभिमान नष्ट हो गया, और उन्होंने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा।

श्लोक 4 (bhagavata.10.27.4)

इन्द्र उवाच विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तंतपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहोन विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥

indra uvāca viśuddha-sattvaṁ tava dhāma śāntaṁ tapo-mayaṁ dhvasta-rajas-tamaskam māyā-mayo ’yaṁ guṇa-sampravāho na vidyate te grahaṇānubandhaḥ

इन्द्र ने कहा — आपका धाम शुद्ध सत्त्व-स्वरूप है, शान्त है, तप-मय है, तथा रज और तम से रहित है। गुणों का यह प्रवाह माया-निर्मित है; आपमें इसकी पकड़ का कोई बन्धन नहीं है।

श्लोक 5 (bhagavata.10.27.5)

कुतो नु तद्धेतव ईश तत्कृतालोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः । तथापि दण्डं भगवान् बिभर्तिधर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥

kuto nu tad-dhetava īśa tat-kṛtā lobhādayo ye ’budha-linga-bhāvāḥ tathāpi daṇḍaṁ bhagavān bibharti dharmasya guptyai khala-nigrahāya

तो फिर, हे ईश, आपमें उन कारणों का — लोभ आदि, जो अज्ञानी के लक्षण हैं — होना कैसे सम्भव है? फिर भी भगवान धर्म की रक्षा तथा दुष्टों के दमन हेतु दण्ड धारण करते हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.10.27.6)

पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशोदुरत्ययः काल उपात्तदण्डः । हिताय चेच्छातनुभिः समीहसेमानं विधुन्वन् जगदीशमानिनाम् ॥ ६ ॥

pitā gurus tvaṁ jagatām adhīśo duratyayaḥ kāla upātta-daṇḍaḥ hitāya cecchā-tanubhiḥ samīhase mānaṁ vidhunvan jagad-īśa-māninām

आप ही जगत् के पिता, गुरु और अधीश्वर हैं, तथा दण्ड लिए हुए अपराजेय काल भी आप ही हैं; और अपनी इच्छा से स्वेच्छापूर्ण रूप धारण कर, आप जगत् के हित हेतु कार्य करते हैं, तथा जो स्वयं को जगत् का स्वामी मानते हैं, उनके अभिमान को चूर करते हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.27.7)

ये मद्विधाज्ञा जगदीशमानिन-स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तन्मदम् । हित्वार्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मयाईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥

ye mad-vidhājñā jagad-īśa-māninas tvāṁ vīkṣya kāle ’bhayam āśu tan-madam hitvārya-mārgaṁ prabhajanty apasmayā īhā khalānām api te ’nuśāsanam

मेरे जैसे अज्ञानी, जो स्वयं को जगत् का स्वामी मानते हैं, समय के समक्ष भी आपको निर्भय देखकर, तत्काल ही उस अभिमान को त्याग देते हैं और निरभिमान होकर आर्य-मार्ग का अवलम्बन कर लेते हैं — इस प्रकार दुष्टों की चेष्टा भी वस्तुतः आपका ही अनुशासन है।

श्लोक 8 (bhagavata.10.27.8)

स त्वं ममैश्वर्यमदप्लुतस्यकृतागसस्तेऽविदुषः प्रभावम् । क्षन्तुं प्रभोऽथार्हसि मूढचेतसोमैवं पुनर्भून्मतिरीश मेऽसती ॥ ८ ॥

sa tvaṁ mamaiśvarya-mada-plutasya kṛtāgasas te ’viduṣaḥ prabhāvam kṣantuṁ prabho ’thārhasi mūḍha-cetaso maivaṁ punar bhūn matir īśa me ’satī

हे प्रभो, आप ही मुझे क्षमा करने योग्य हैं — मैं जो अपनी शक्ति के मद में डूबा हुआ था, आपके प्रभाव को न जानते हुए जिसने अपराध किया, जिसका चित्त मोहित था। हे ईश, मेरी बुद्धि पुनः कभी ऐसी असती न हो।

श्लोक 9 (bhagavata.10.27.9)

तवावतारोऽयमधोक्षजेहभुवो भराणामुरुभारजन्मनाम् । चमूपतीनामभवाय देवभवाय युष्मच्चरणानुवर्तिनाम् ॥ ९ ॥

tavāvatāro ’yam adhokṣajeha bhuvo bharāṇām uru-bhāra-janmanām camū-patīnām abhavāya deva bhavāya yuṣmac-caraṇānuvartinām

हे अधोक्षज, आपका यह अवतार यहाँ पृथ्वी पर भारी बोझ बनी हुई सेनाओं के स्वामियों के विनाश हेतु है, और हे देव, आपके चरणों का अनुसरण करने वालों के कल्याण हेतु है।

श्लोक 10 (bhagavata.10.27.10)

नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने । वासुदेवाय कृष्णाय सात्वतां पतये नमः ॥ १० ॥

namas tubhyaṁ bhagavate puruṣāya mahātmane vāsudevāya kṛṣṇāya sātvatāṁ pataye namaḥ

आपको नमस्कार, हे भगवन्, हे परम पुरुष, हे महात्मन्; वासुदेव-नन्दन कृष्ण को, सात्वतों के स्वामी को, नमस्कार है।

श्लोक 11 (bhagavata.10.27.11)

स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये । सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥

svacchandopātta-dehāya viśuddha-jñāna-mūrtaye sarvasmai sarva-bījāya sarva-bhūtātmane namaḥ

जो अपनी स्वतन्त्र इच्छा से देह धारण करते हैं, जिनका स्वरूप शुद्ध ज्ञान है; उन सर्वस्वरूप, सबके बीज, समस्त प्राणियों की आत्मा को नमस्कार है।

श्लोक 12 (bhagavata.10.27.12)

मयेदं भगवन् गोष्ठनाशायासारवायुभिः । चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना ॥ १२ ॥

mayedaṁ bhagavan goṣṭha- nāśāyāsāra-vāyubhiḥ ceṣṭitaṁ vihate yajñe māninā tīvra-manyunā

हे भगवन्, यह मेरे द्वारा ही किया गया — अपने यज्ञ के भंग होने पर अभिमानवश तीव्र क्रोध से भरकर, मैंने भारी वर्षा और आँधी से आपके गोष्ठ को नष्ट करने का प्रयत्न किया।

श्लोक 13 (bhagavata.10.27.13)

त्वयेशानुगृहीतोऽस्मि ध्वस्तस्तम्भो वृथोद्यमः । ईश्वरं गुरुमात्मानं त्वामहं शरणं गतः ॥ १३ ॥

tvayeśānugṛhīto ’smi dhvasta-stambho vṛthodyamaḥ īśvaraṁ gurum ātmānaṁ tvām ahaṁ śaraṇaṁ gataḥ

हे ईश, आपके द्वारा ही मुझ पर अनुग्रह किया गया, मेरा अभिमान चूर हुआ और मेरा प्रयत्न व्यर्थ सिद्ध हुआ। आप ही ईश्वर, गुरु और आत्मस्वरूप हैं — मैं आपकी शरण में आया हूँ।

श्लोक 14 (bhagavata.10.27.14)

श्रीशुक उवाच एवं सङ्कीर्तितः कृष्णो मघोना भगवानमुम् । मेघगम्भीरया वाचा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥ १४ ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ saṅkīrtitaḥ kṛṣṇo maghonā bhagavān amum megha-gambhīrayā vācā prahasann idam abravīt

शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार इन्द्र द्वारा स्तुति किए जाने पर, भगवान कृष्ण मुस्कराते हुए मेघ के समान गम्भीर वाणी में उनसे इस प्रकार बोले।

श्लोक 15 (bhagavata.10.27.15)

श्रीभगवानुवाच मया तेऽकारि मघवन् मखभङ्गोऽनुगृह्णता । मदनुस्मृतये नित्यं मत्तस्येन्द्र श्रिया भृशम् ॥ १५ ॥

śrī-bhagavān uvāca mayā te ’kāri maghavan makha-bhaṅgo ’nugṛhṇatā mad-anusmṛtaye nityaṁ mattasyendra-śriyā bhṛśam

भगवान ने कहा — हे मघवन्, मैंने ही तुम पर अनुग्रह करते हुए तुम्हारे यज्ञ को भंग किया — इसलिए कि तुम, जो इन्द्र की समृद्धि से अत्यंत उन्मत्त हो गए थे, सदा मेरा स्मरण करते रहो।

श्लोक 16 (bhagavata.10.27.16)

मामैश्वर्यश्रीमदान्धो दण्डपाणिं न पश्यति । तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम् ॥ १६ ॥

mām aiśvarya-śrī-madāndho daṇḍa pāṇiṁ na paśyati taṁ bhraṁśayāmi sampadbhyo yasya cecchāmy anugraham

ऐश्वर्य और श्री के मद से अंधा हुआ पुरुष हाथ में दण्ड लिए मुझे नहीं देखता; जिसका मैं वास्तव में कल्याण चाहता हूँ, उसे मैं उसकी सम्पत्ति से नीचे गिरा देता हूँ।

श्लोक 17 (bhagavata.10.27.17)

गम्यतां शक्र भद्रं वः क्रियतां मेऽनुशासनम् । स्थीयतां स्वाधिकारेषु युक्तैर्वः स्तम्भवर्जितैः ॥ १७ ॥

gamyatāṁ śakra bhadraṁ vaḥ kriyatāṁ me ’nuśāsanam sthīyatāṁ svādhikāreṣu yuktair vaḥ stambha-varjitaiḥ

हे शक्र, अब जाओ, तुम्हारा कल्याण हो; मेरी आज्ञा का पालन करो। अपने अधिकार में स्थित रहो, अपने साथियों सहित, किन्तु अभिमान से रहित होकर।

श्लोक 18 (bhagavata.10.27.18)

अथाह सुरभिः कृष्णमभिवन्द्यमनस्विनी । स्वसन्तानैरुपामन्त्र्य गोपरूपिणमीश्वरम् ॥ १८ ॥

athāha surabhiḥ kṛṣṇam abhivandya manasvinī sva-santānair upāmantrya gopa-rūpiṇam īśvaram

तब उदार-हृदया सुरभि ने कृष्ण को प्रणाम कर, अपनी सन्तानों — गौओं — सहित, गोप के रूप में खड़े उन ईश्वर को सम्बोधित किया।

श्लोक 19 (bhagavata.10.27.19)

सुरभिरुवाच कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्वात्मन् विश्वसम्भव । भवता लोकनाथेन सनाथा वयमच्युत ॥ १९ ॥

surabhir uvāca kṛṣṇa kṛṣṇa mahā-yogin viśvātman viśva-sambhava bhavatā loka-nāthena sa-nāthā vayam acyuta

सुरभि ने कहा — हे कृष्ण, कृष्ण, हे महायोगिन्, हे विश्वात्मन्, हे विश्व के उद्गम! हे अच्युत, लोकों के स्वामी आपके द्वारा ही हम सनाथ हुए हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.10.27.20)

त्वं नः परमकं दैवं त्वं न इन्द्रो जगत्पते । भवाय भव गोविप्रदेवानां ये च साधवः ॥ २० ॥

tvaṁ naḥ paramakaṁ daivaṁ tvaṁ na indro jagat-pate bhavāya bhava go-vipra devānāṁ ye ca sādhavaḥ

आप ही हमारे परम देवता हैं; हे जगत्पते, आप ही हमारे इन्द्र भी बनें, गौओं, ब्राह्मणों, देवताओं तथा जो भी साधुजन हैं, उन सबके कल्याण हेतु।

श्लोक 21 (bhagavata.10.27.21)

इन्द्रं नस्त्वाभिषेक्ष्यामो ब्रह्मणा चोदिता वयम् । अवतीर्णोऽसि विश्वात्मन् भूमेर्भारापनुत्तये ॥ २१ ॥

indraṁ nas tvābhiṣekṣyāmo brahmaṇā coditā vayam avatīrṇo ’si viśvātman bhūmer bhārāpanuttaye

ब्रह्मा जी की प्रेरणा से हम आपको अपना इन्द्र बनाने हेतु अभिषेक करेंगे; क्योंकि हे विश्वात्मन्, आप पृथ्वी का भार हरने के लिए ही अवतरित हुए हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.10.27.22)

श्रीशुक उवाच एवं कृष्णमुपामन्त्र्य सुरभिः पयसात्मनः । जलैराकाशगङ्गाया ऐरावतकरोद्धृतैः ॥ २२ ॥

śṛī-śuka uvāca evaṁ kṛṣṇam upāmantrya surabhiḥ payasātmanaḥ jalair ākāśa-gaṅgāyā airāvata-karoddhṛtaiḥ

शुकदेव जी ने कहा — कृष्ण को इस प्रकार सम्बोधित कर, सुरभि ने अपने ही दूध से उनका अभिषेक किया,

श्लोक 23 (bhagavata.10.27.23)

इन्द्रः सुरर्षिभिः साकं चोदितो देवमातृभिः । अभ्यसिञ्चत दाशार्हं गोविन्द इति चाभ्यधात् ॥ २३ ॥

indraḥ surarṣibhiḥ sākaṁ codito deva-mātṛbhiḥ abhyasiñcata dāśārhaṁ govinda iti cābhyadhāt

और इन्द्र ने, देवताओं की माताओं की प्रेरणा से, देवर्षियों के साथ, ऐरावत की सूँड़ में भरे आकाश-गंगा के जल से उनका अभिषेक किया, तथा उन्हें "गोविन्द" कहकर पुकारा।

श्लोक 24 (bhagavata.10.27.24)

तत्रागतास्तुम्बुरुनारदादयोगन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः । जगुर्यशो लोकमलापहं हरेः सुराङ्गनाः सन्ननृतुर्मुदान्विताः ॥ २४ ॥

tatrāgatās tumburu-nāradādayo gandharva-vidyādhara-siddha-cāraṇāḥ jagur yaśo loka-malāpahaṁ hareḥ surāṅganāḥ sannanṛtur mudānvitāḥ

वहाँ तुम्बुरु, नारद आदि — गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण — आए, और हरि की उस कीर्ति का गान करने लगे जो लोक के मल को हर लेती है, और देवांगनाएँ आनन्दित होकर एक साथ नृत्य करने लगीं।

श्लोक 25 (bhagavata.10.27.25)

तं तुष्टुवुर्देवनिकायकेतवोह्यवाकिरंश्चाद्भुतपुष्पवृष्टिभिः । लोकाः परां निर्वृतिमाप्नुवंस्त्रयोगावस्तदा गामनयन् पयोद्रुताम् ॥ २५ ॥

taṁ tuṣṭuvur deva-nikāya-ketavo hy avākiraṁś cādbhuta-puṣpa-vṛṣṭibhiḥ lokāḥ parāṁ nirvṛtim āpnuvaṁs trayo gāvas tadā gām anayan payo-drutām

देवगणों के प्रमुखों ने उनकी स्तुति की और अद्भुत पुष्पों की वर्षा से उन्हें ढक दिया; तीनों लोकों को परम आनन्द प्राप्त हुआ, और गौओं ने उस समय अपने दूध की धाराओं से पृथ्वी को आप्लावित कर दिया।

श्लोक 26 (bhagavata.10.27.26)

नानारसौघाः सरितो वृक्षा आसन् मधुस्रवाः । अकृष्टपच्यौषधयो गिरयोऽबिभ्रनुन्मणीन् ॥ २६ ॥

nānā-rasaughāḥ sarito vṛkṣā āsan madhu-sravāḥ akṛṣṭa-pacyauṣadhayo girayo ’bibhran un maṇīn

नदियाँ नाना रसों की धाराओं से बहने लगीं, वृक्षों से मधु झरने लगा, औषधियाँ बिना जोते ही पक गईं, और पर्वतों ने अपने भीतर के मणियों को प्रकट कर दिया।

श्लोक 27 (bhagavata.10.27.27)

कृष्णेऽभिषिक्त एतानि सर्वाणि कुरुनन्दन । निर्वैराण्यभवंस्तात क्रूराण्यपि निसर्गतः ॥ २७ ॥

kṛṣṇe ’bhiṣikta etāni sarvāṇi kuru-nandana nirvairāṇy abhavaṁs tāta krūrāṇy api nisargataḥ

हे कुरुनन्दन, जब कृष्ण का इस प्रकार अभिषेक हुआ, तब ये सभी प्राणी — स्वभाव से क्रूर प्राणी भी — वैर-रहित हो गए।

श्लोक 28 (bhagavata.10.27.28)

इति गोगोकुलपतिं गोविन्दमभिषिच्य सः । अनुज्ञातो ययौ शक्रो वृतो देवादिभिर्दिवम् ॥ २८ ॥

iti go-gokula-patiṁ govindam abhiṣicya saḥ anujñāto yayau śakro vṛto devādibhir divam

गौओं और गोकुल के स्वामी गोविन्द का इस प्रकार अभिषेक कर, इन्द्र, आज्ञा पाकर, देवताओं आदि से घिरे हुए स्वर्ग को चले गए।

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