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दशम स्कन्ध · अध्याय 4

राजा कंस के अत्याचार

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (bhagavata.10.4.1)

श्रीशुक उवाच बहिरन्तःपुरद्वारः सर्वाः पूर्ववदावृताः । ततो बालध्वनिं श्रुत्वा गृहपालाः समुत्थिताः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca bahir-antaḥ-pura-dvāraḥ sarvāḥ pūrvavad āvṛtāḥ tato bāla-dhvaniṁ śrutvā gṛha-pālāḥ samutthitāḥ

श्रीशुकदेव ने कहा — भीतर और बाहर के अंतःपुर के सभी द्वार पहले की भाँति बंद हो गए। तत्पश्चात् शिशु का रुदन सुनकर द्वारपाल जाग उठे।

श्लोक 2 (bhagavata.10.4.2)

ते तु तूर्णमुपव्रज्य देवक्या गर्भजन्म तत् । आचख्युर्भोजराजाय यदुद्विग्नः प्रतीक्षते ॥ २ ॥

te tu tūrṇam upavrajya devakyā garbha-janma tat ācakhyur bhoja-rājāya yad udvignaḥ pratīkṣate

वे शीघ्रता से जाकर देवकी के गर्भ से हुए उस जन्म का समाचार भोजराज कंस को सुनाने लगे, जो व्याकुल होकर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

श्लोक 3 (bhagavata.10.4.3)

स तल्पात् तूर्णमुत्थाय कालोऽयमिति विह्वलः । सूतीगृहमगात् तूर्णं प्रस्खलन् मुक्तमूर्धजः ॥ ३ ॥

sa talpāt tūrṇam utthāya kālo ’yam iti vihvalaḥ sūtī-gṛham agāt tūrṇaṁ praskhalan mukta-mūrdhajaḥ

'यही वह काल है' — ऐसा सोचकर व्याकुल कंस शय्या से तुरन्त उठकर, बिखरे केशों के साथ लड़खड़ाता हुआ शीघ्रता से सूतिकागृह की ओर चल पड़ा।

श्लोक 4 (bhagavata.10.4.4)

तमाह भ्रातरं देवी कृपणा करुणं सती । स्नुषेयं तव कल्याण स्त्रियं मा हन्तुमर्हसि ॥ ४ ॥

tam āha bhrātaraṁ devī kṛpaṇā karuṇaṁ satī snuṣeyaṁ tava kalyāṇa striyaṁ mā hantum arhasi

पतिव्रता, दीन देवकी ने करुण स्वर में अपने भाई से कहा — हे कल्याण, यह तो तुम्हारी पुत्रवधू है, इस कन्या का वध करना तुम्हें शोभा नहीं देता।

श्लोक 5 (bhagavata.10.4.5)

बहवो हिंसिता भ्रातः शिशवः पावकोपमाः । त्वया दैवनिसृष्टेन पुत्रिकैका प्रदीयताम् ॥ ५ ॥

bahavo hiṁsitā bhrātaḥ śiśavaḥ pāvakopamāḥ tvayā daiva-nisṛṣṭena putrikaikā pradīyatām

हे भाई, दैव के विधान से तुमने अग्नि के समान तेजस्वी मेरे कितने ही शिशुओं का वध किया है। अब यह एक बालिका मुझे दान में दे दो।

श्लोक 6 (bhagavata.10.4.6)

नन्वहं ते ह्यवरजा दीना हतसुता प्रभो । दातुमर्हसि मन्दाया अङ्गेमां चरमां प्रजाम् ॥ ६ ॥

nanv ahaṁ te hy avarajā dīnā hata-sutā prabho dātum arhasi mandāyā aṅgemāṁ caramāṁ prajām

हे प्रभो, मैं तुम्हारी छोटी बहन, अपने पुत्रों को खोकर दीन हो चुकी हूँ। इस अभागिन की इस अंतिम संतान को देना ही तुम्हारे लिए उचित है।

श्लोक 7 (bhagavata.10.4.7)

श्रीशुक उवाच उपगुह्यात्मजामेवं रुदत्या दीनदीनवत् । याचितस्तां विनिर्भर्त्स्य हस्तादाचिच्छिदे खलः ॥ ७ ॥

śrī-śuka uvāca upaguhyātmajām evaṁ rudatyā dīna-dīnavat yācitas tāṁ vinirbhartsya hastād ācicchide khalaḥ

श्रीशुकदेव ने कहा — दीन-हीन रोती हुई देवकी अपनी पुत्री को छाती से लगाए हुए इस प्रकार याचना करती रही, परन्तु उस दुष्ट ने उसे डाँटकर उसके हाथों से बलपूर्वक छीन लिया।

श्लोक 8 (bhagavata.10.4.8)

तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसुः सुताम् । अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृदः ॥ ८ ॥

tāṁ gṛhītvā caraṇayor jāta-mātrāṁ svasuḥ sutām apothayac chilā-pṛṣṭhe svārthonmūlita-sauhṛdaḥ

अपने ही स्वार्थ से समस्त सौहृद को उखाड़ फेंकने वाला वह उस अभी-अभी जन्मी बहन की पुत्री को पैरों से पकड़कर पत्थर की शिला पर पटकने लगा।

श्लोक 9 (bhagavata.10.4.9)

सा तद्धस्तात् समुत्पत्य सद्यो देव्यम्बरं गता । अदृश्यतानुजा विष्णोः सायुधाष्टमहाभुजा ॥ ९ ॥

sā tad-dhastāt samutpatya sadyo devy ambaraṁ gatā adṛśyatānujā viṣṇoḥ sāyudhāṣṭa-mahābhujā

वह बालिका कंस के हाथों से छूटकर तुरन्त आकाश में जा पहुँची — वह विष्णु की छोटी बहन थी, और अष्ट महाभुजाओं में आयुध धारण किए हुए देवी के रूप में दिखाई पड़ी।

श्लोक 10 (bhagavata.10.4.10)

दिव्यस्रगम्बरालेपरत्नाभरणभूषिता । धनुःशूलेषुचर्मासिशङ्खचक्रगदाधरा ॥ १० ॥

divya-srag-ambarālepa- ratnābharaṇa-bhūṣitā dhanuḥ-śūleṣu-carmāsi- śaṅkha-cakra-gadā-dharā

दिव्य माला, वस्त्र, चंदन-लेप और रत्नाभूषणों से सुशोभित, धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली,

श्लोक 11 (bhagavata.10.4.11)

सिद्धचारणगन्धर्वैरप्सरःकिन्नरोरगैः । उपाहृतोरुबलिभिः स्तूयमानेदमब्रवीत् ॥ ११ ॥

siddha-cāraṇa-gandharvair apsaraḥ-kinnaroragaiḥ upāhṛtoru-balibhiḥ stūyamānedam abravīt

सिद्ध, चारण, गंधर्व, अप्सरा, किन्नर और नागों द्वारा बड़ी-बड़ी भेंटें अर्पित कर स्तुति की जाती हुई उस देवी ने यह कहा।

श्लोक 12 (bhagavata.10.4.12)

किं मया हतया मन्द जातः खलु तवान्तकृत् । यत्र क्व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसीः कृपणान् वृथा ॥ १२ ॥

kiṁ mayā hatayā manda jātaḥ khalu tavānta-kṛt yatra kva vā pūrva-śatrur mā hiṁsīḥ kṛpaṇān vṛthā

हे मूर्ख, मुझे मारने से तुझे क्या लाभ होगा? तेरा वास्तविक अन्तक तो कहीं और पहले ही जन्म ले चुका है। इसलिए बेचारे शिशुओं को व्यर्थ ही मत मार।

श्लोक 13 (bhagavata.10.4.13)

इति प्रभाष्य तं देवी माया भगवती भुवि । बहुनामनिकेतेषु बहुनामा बभूव ह ॥ १३ ॥

iti prabhāṣya taṁ devī māyā bhagavatī bhuvi bahu-nāma-niketeṣu bahu-nāmā babhūva ha

यह कहकर वह भगवती माया देवी पृथ्वी पर अनेक निवास-स्थानों में अनेक नामों से प्रसिद्ध हो गई।

श्लोक 14 (bhagavata.10.4.14)

तयाभिहितमाकर्ण्य कंसः परमविस्मितः । देवकीं वसुदेवं च विमुच्य प्रश्रितोऽब्रवीत् ॥ १४ ॥

tayābhihitam ākarṇya kaṁsaḥ parama-vismitaḥ devakīṁ vasudevaṁ ca vimucya praśrito ’bravīt

उसकी बात सुनकर अत्यंत विस्मित हुआ कंस देवकी और वसुदेव को बंधन से मुक्त करके विनम्रतापूर्वक बोला।

श्लोक 15 (bhagavata.10.4.15)

अहो भगिन्यहो भाम मया वां बत पाप्मना । पुरुषाद इवापत्यं बहवो हिंसिताः सुताः ॥ १५ ॥

aho bhaginy aho bhāma mayā vāṁ bata pāpmanā puruṣāda ivāpatyaṁ bahavo hiṁsitāḥ sutāḥ

हाय बहन! हाय बहनोई! मैंने पापबुद्धि से तुम दोनों के इतने पुत्रों को, मानो नरभक्षी राक्षस अपनी ही संतान को खा जाता है, मार डाला है।

श्लोक 16 (bhagavata.10.4.16)

स त्वहं त्यक्तकारुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहृत् खलः । कान्लोकान् वै गमिष्यामि ब्रह्महेव मृतः श्वसन् ॥ १६ ॥

sa tv ahaṁ tyakta-kāruṇyas tyakta-jñāti-suhṛt khalaḥ kān lokān vai gamiṣyāmi brahma-heva mṛtaḥ śvasan

करुणाहीन और ज्ञातियों तथा मित्रों का त्याग करने वाला मैं दुष्ट, ब्रह्महत्यारे के समान, जीते जी भी और मरकर भी किस लोक में जाऊँगा?

श्लोक 17 (bhagavata.10.4.17)

दैवमप्यनृतं वक्ति न मर्त्या एव केवलम् । यद्विश्रम्भादहं पापः स्वसुर्निहतवाञ्छिशून् ॥ १७ ॥

daivam apy anṛtaṁ vakti na martyā eva kevalam yad-viśrambhād ahaṁ pāpaḥ svasur nihatavāñ chiśūn

मनुष्य ही नहीं, विधाता भी कभी असत्य बोलता है — क्योंकि उसी की वाणी पर विश्वास करके मैं पापी बनकर अपनी बहन के शिशुओं का वध करता रहा।

श्लोक 18 (bhagavata.10.4.18)

मा शोचतं महाभागावात्मजान् स्वकृतंभुजः । जान्तवो न सदैकत्र दैवाधीनास्तदासते ॥ १८ ॥

mā śocataṁ mahā-bhāgāv ātmajān sva-kṛtaṁ bhujaḥ jāntavo na sadaikatra daivādhīnās tadāsate

हे महाभागों, अपने-अपने कर्म का फल भोगने वाले अपने पुत्रों के लिए शोक मत करो। सभी प्राणी दैव के अधीन हैं, इसलिए वे सदा साथ नहीं रह सकते।

श्लोक 19 (bhagavata.10.4.19)

भुवि भौमानि भूतानि यथा यान्त्यपयान्ति च । नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः ॥ १९ ॥

bhuvi bhaumāni bhūtāni yathā yānty apayānti ca nāyam ātmā tathaiteṣu viparyeti yathaiva bhūḥ

जैसे पृथ्वी के बने पदार्थ जन्म लेकर पुनः पृथ्वी में लीन हो जाते हैं, वैसे ही यह आत्मा उनके नष्ट होने पर उस प्रकार परिवर्तित नहीं होता, जैसे पृथ्वी स्वयं अपरिवर्तित रहती है।

श्लोक 20 (bhagavata.10.4.20)

यथानेवंविदो भेदो यत आत्मविपर्ययः । देहयोगवियोगौ च संसृतिर्न निवर्तते ॥ २० ॥

yathānevaṁ-vido bhedo yata ātma-viparyayaḥ deha-yoga-viyogau ca saṁsṛtir na nivartate

इस सत्य को न जानने से ही यह भेद और आत्म-विपर्यय उत्पन्न होता है, जिससे देह के संयोग और वियोग से संसार-चक्र कभी नहीं रुकता।

श्लोक 21 (bhagavata.10.4.21)

तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि । मानुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥ २१ ॥

tasmād bhadre sva-tanayān mayā vyāpāditān api mānuśoca yataḥ sarvaḥ sva-kṛtaṁ vindate ’vaśaḥ

इसलिए हे कल्याणी, मेरे द्वारा मारे गए अपने पुत्रों के लिए शोक मत करो, क्योंकि हर प्राणी विवश होकर अपने ही किए कर्म का फल पाता है।

श्लोक 22 (bhagavata.10.4.22)

यावद्धतोऽस्मि हन्तास्मीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वदृक् । तावत्तदभिमान्यज्ञो बाध्यबाधकतामियात् ॥ २२ ॥

yāvad dhato ’smi hantāsmī- ty ātmānaṁ manyate ’sva-dṛk tāvat tad-abhimāny ajño bādhya-bādhakatām iyāt

जब तक आत्मदर्शन से रहित मनुष्य 'मैं मारा गया' या 'मैंने मार डाला' — ऐसा अपने बारे में मानता रहता है, तब तक वह अज्ञानी, अभिमानी बना रहकर बाध्य और बाधक दोनों की स्थिति में उलझा रहता है।

श्लोक 23 (bhagavata.10.4.23)

क्षमध्वं मम दौरात्म्यं साधवो दीनवत्सलाः । इत्युक्त्वाश्रुमुखः पादौ श्यालः स्वस्रोरथाग्रहीत् ॥ २३ ॥

kṣamadhvaṁ mama daurātmyaṁ sādhavo dīna-vatsalāḥ ity uktvāśru-mukhaḥ pādau śyālaḥ svasror athāgrahīt

हे साधुजनो, हे दीनवत्सलो, मेरी दुष्टता को क्षमा करो — यह कहकर आँसू भरे मुख वाला वह बहनोई देवकी और वसुदेव के चरणों में गिर पड़ा।

श्लोक 24 (bhagavata.10.4.24)

मोचयामास निगडाद् विश्रब्धः कन्यकागिरा । देवकीं वसुदेवं च दर्शयन्नात्मसौहृदम् ॥ २४ ॥

mocayām āsa nigaḍād viśrabdhaḥ kanyakā-girā devakīṁ vasudevaṁ ca darśayann ātma-sauhṛdam

कन्या (योगमाया देवी) की वाणी पर पूर्ण विश्वास करते हुए कंस ने आत्मीयता दिखाते हुए देवकी और वसुदेव को बेड़ियों से मुक्त कर दिया।

श्लोक 25 (bhagavata.10.4.25)

भ्रातुः समनुतप्तस्य क्षान्तरोषा च देवकी । व्यसृजद् वसुदेवश्च प्रहस्य तमुवाच ह ॥ २५ ॥

bhrātuḥ samanutaptasya kṣānta-roṣā ca devakī vyasṛjad vasudevaś ca prahasya tam uvāca ha

अपने पश्चातापी भाई को देखकर देवकी का क्रोध शांत हो गया, और वसुदेव ने भी उन्हें छोड़कर हँसते हुए यह कहा।

श्लोक 26 (bhagavata.10.4.26)

एवमेतन्महाभाग यथा वदसि देहिनाम् । अज्ञानप्रभवाहंधीः स्वपरेति भिदा यतः ॥ २६ ॥

evam etan mahā-bhāga yathā vadasi dehinām ajñāna-prabhavāhaṁ-dhīḥ sva-pareti bhidā yataḥ

हे महाभाग, तुमने देहधारियों के विषय में जो कहा, वह ठीक ही है — अज्ञान से उत्पन्न 'मैं' की बुद्धि से ही 'स्व' और 'पर' का यह भेद उत्पन्न होता है।

श्लोक 27 (bhagavata.10.4.27)

शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः । मिथो घ्नन्तं न पश्यन्ति भावैर्भावं पृथग्दृशः ॥ २७ ॥

śoka-harṣa-bhaya-dveṣa- lobha-moha-madānvitāḥ mitho ghnantaṁ na paśyanti bhāvair bhāvaṁ pṛthag-dṛśaḥ

शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह और मद से युक्त होकर, भेददृष्टि रखने वाले लोग परस्पर एक-दूसरे को मारते हुए भी अपने-अपने भावों में इस कर्तापन को नहीं देख पाते।

श्लोक 28 (bhagavata.10.4.28)

श्रीशुक उवाच कंस एवं प्रसन्नाभ्यां विशुद्धं प्रतिभाषितः । देवकीवसुदेवाभ्यामनुज्ञातोऽविशद् गृहम् ॥ २८ ॥

śrī-śuka uvāca kaṁsa evaṁ prasannābhyāṁ viśuddhaṁ pratibhāṣitaḥ devakī-vasudevābhyām anujñāto ’viśad gṛham

श्रीशुकदेव ने कहा — इस प्रकार प्रसन्न हुए देवकी और वसुदेव द्वारा शुद्ध भाव से उत्तर दिए जाने पर कंस उनकी अनुमति लेकर अपने घर में चला गया।

श्लोक 29 (bhagavata.10.4.29)

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां कंस आहूय मन्त्रिणः । तेभ्य आचष्ट तत् सर्वं यदुक्तं योगनिद्रया ॥ २९ ॥

tasyāṁ rātryāṁ vyatītāyāṁ kaṁsa āhūya mantriṇaḥ tebhya ācaṣṭa tat sarvaṁ yad uktaṁ yoga-nidrayā

उस रात्रि के बीत जाने पर कंस ने अपने मंत्रियों को बुलाकर योगनिद्रा द्वारा कहे गए उन सारे वचनों को उन्हें बता दिया।

श्लोक 30 (bhagavata.10.4.30)

आकर्ण्य भर्तुर्गदितं तमूचुर्देवशत्रवः । देवान् प्रति कृतामर्षा दैतेया नातिकोविदाः ॥ ३० ॥

ākarṇya bhartur gaditaṁ tam ūcur deva-śatravaḥ devān prati kṛtāmarṣā daiteyā nāti-kovidāḥ

अपने स्वामी की बात सुनकर देवताओं के शत्रु, देवताओं के प्रति क्रोध से भरे और बहुत बुद्धिमान न होने वाले दैत्यों ने उससे यह कहा।

श्लोक 31 (bhagavata.10.4.31)

एवं चेत्तर्हि भोजेन्द्र पुरग्रामव्रजादिषु । अनिर्दशान् निर्दशांश्च हनिष्यामोऽद्य वै शिशून् ॥ ३१ ॥

evaṁ cet tarhi bhojendra pura-grāma-vrajādiṣu anirdaśān nirdaśāṁś ca haniṣyāmo ’dya vai śiśūn

हे भोजराज, यदि ऐसा है, तो हम आज ही नगरों, गाँवों और गोशालाओं में जन्मे दस दिन के भीतर और दस दिन से अधिक के सभी शिशुओं का वध कर देंगे।

श्लोक 32 (bhagavata.10.4.32)

किमुद्यमैः करिष्यन्ति देवाः समरभीरवः । नित्यमुद्विग्नमनसो ज्याघोषैर्धनुषस्तव ॥ ३२ ॥

kim udyamaiḥ kariṣyanti devāḥ samara-bhīravaḥ nityam udvigna-manaso jyā-ghoṣair dhanuṣas tava

युद्ध से डरने वाले देवता अपने प्रयत्नों से क्या कर लेंगे, जो तुम्हारे धनुष की टंकार से ही सदा भयभीत मन के रहते हैं?

श्लोक 33 (bhagavata.10.4.33)

अस्यतस्ते शरव्रातैर्हन्यमानाः समन्ततः । जिजीविषव उत्सृज्य पलायनपरा ययुः ॥ ३३ ॥

asyatas te śara-vrātair hanyamānāḥ samantataḥ jijīviṣava utsṛjya palāyana-parā yayuḥ

तुम्हारे चारों ओर से छोड़े गए बाणसमूहों से घायल होकर, जीने की इच्छा से जो बचे रह गए, वे भी भागकर पलायन करते रहे।

श्लोक 34 (bhagavata.10.4.34)

केचित् प्राञ्जलयो दीना न्यस्तशस्त्रा दिवौकसः । मुक्तकच्छशिखाः केचिद् भीताः स्म इति वादिनः ॥ ३४ ॥

kecit prāñjalayo dīnā nyasta-śastrā divaukasaḥ mukta-kaccha-śikhāḥ kecid bhītāḥ sma iti vādinaḥ

उनमें से कुछ देवता दीन होकर हाथ जोड़े, शस्त्र त्यागकर खड़े रहे, और कुछ ने अपने वस्त्र और केश खोलकर कहा — हम भयभीत हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.10.4.35)

न त्वं विस्मृतशस्त्रास्त्रान् विरथान् भयसंवृतान् । हंस्यन्यासक्तविमुखान् भग्नचापानयुध्यतः ॥ ३५ ॥

na tvaṁ vismṛta-śastrāstrān virathān bhaya-saṁvṛtān haṁsy anyāsakta-vimukhān bhagna-cāpān ayudhyataḥ

तुम शस्त्र-अस्त्र भूल चुके, रथहीन, भय से आच्छन्न, अन्यत्र आसक्त होकर मुँह मोड़ चुके, धनुष टूट जाने पर लड़ना छोड़ चुके शत्रुओं को नहीं मारते।

श्लोक 36 (bhagavata.10.4.36)

किं क्षेमशूरैर्विबुधैरसंयुगविकत्थनैः । रहोजुषा किं हरिणा शम्भुना वा वनौकसा । किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण ब्रह्मणा वा तपस्यता ॥ ३६ ॥

kiṁ kṣema-śūrair vibudhair asaṁyuga-vikatthanaiḥ raho-juṣā kiṁ hariṇā śambhunā vā vanaukasā kim indreṇālpa-vīryeṇa brahmaṇā vā tapasyatā

उन बलहीन देवताओं से क्या भय, जो केवल युद्धभूमि से दूर रहकर ही डींग हाँकते हैं? एकांतवासी विष्णु से क्या, वनवासी शिव से क्या, अल्पपराक्रमी इन्द्र से क्या, अथवा तपस्यारत ब्रह्मा से भी क्या भय?

श्लोक 37 (bhagavata.10.4.37)

तथापि देवाः सापत्न्यान्नोपेक्ष्या इति मन्महे । ततस्तन्मूलखनने नियुङ्क्ष्वास्माननुव्रतान् ॥ ३७ ॥

tathāpi devāḥ sāpatnyān nopekṣyā iti manmahe tatas tan-mūla-khanane niyuṅkṣvāsmān anuvratān

फिर भी हमारा विचार है कि शत्रुतापूर्ण देवताओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। इसलिए उनकी जड़ खोदने के इस कार्य में अपने अनुयायी हम लोगों को नियुक्त कीजिए।

श्लोक 38 (bhagavata.10.4.38)

यथामयोऽङ्गे समुपेक्षितो नृभि- र्न शक्यते रूढपदश्चिकित्सितुम् । यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा रिपुर्महान् बद्धबलो न चाल्यते ॥ ३८ ॥

yathāmayo ’ṅge samupekṣito nṛbhir na śakyate rūḍha-padaś cikitsitum yathendriya-grāma upekṣitas tathā ripur mahān baddha-balo na cālyate

जैसे शरीर में उपेक्षित रोग गहरा जड़ जमाकर असाध्य हो जाता है, अथवा जैसे उपेक्षित इन्द्रियसमूह वश में नहीं रहता, वैसे ही उपेक्षित महाशत्रु बलवान होकर फिर हटाया नहीं जा सकता।

श्लोक 39 (bhagavata.10.4.39)

मूलं हि विष्णुर्देवानां यत्र धर्मः सनातनः । तस्य च ब्रह्म गोविप्रास्तपो यज्ञाः सदक्षिणाः ॥ ३९ ॥

mūlaṁ hi viṣṇur devānāṁ yatra dharmaḥ sanātanaḥ tasya ca brahma-go-viprās tapo yajñāḥ sa-dakṣiṇāḥ

देवताओं का मूल तो विष्णु ही हैं, और विष्णु वहीं रहते हैं जहाँ सनातन धर्म, वेद, गौएँ, ब्राह्मण, तप और दक्षिणा सहित यज्ञ होते हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.10.4.40)

तस्मात् सर्वात्मना राजन् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः । तपस्विनो यज्ञशीलान् गाश्च हन्मो हविर्दुघाः ॥ ४० ॥

tasmāt sarvātmanā rājan brāhmaṇān brahma-vādinaḥ tapasvino yajña-śīlān gāś ca hanmo havir-dughāḥ

इसलिए हे राजन्, हम पूर्ण रूप से तुम्हारे अनुयायी, वेदपाठी ब्राह्मणों, तपस्वियों, यज्ञशील पुरुषों और हवि देने वाली गौओं का वध करेंगे।

श्लोक 41 (bhagavata.10.4.41)

विप्रा गावश्च वेदाश्च तपः सत्यं दमः शमः । श्रद्धा दया तितिक्षा च क्रतवश्च हरेस्तनूः ॥ ४१ ॥

viprā gāvaś ca vedāś ca tapaḥ satyaṁ damaḥ śamaḥ śraddhā dayā titikṣā ca kratavaś ca hares tanūḥ

ब्राह्मण, गौएँ, वेद, तप, सत्य, दम, शम, श्रद्धा, दया, तितिक्षा और यज्ञ — ये सब हरि के ही शरीर हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.10.4.42)

स हि सर्वसुराध्यक्षो ह्यसुरद्विड् गुहाशयः । तन्मूला देवताः सर्वाः सेश्वराः सचतुर्मुखाः । अयं वै तद्वधोपायो यदृषीणां विहिंसनम् ॥ ४२ ॥

sa hi sarva-surādhyakṣo hy asura-dviḍ guhā-śayaḥ tan-mūlā devatāḥ sarvāḥ seśvarāḥ sa-catur-mukhāḥ ayaṁ vai tad-vadhopāyo yad ṛṣīṇāṁ vihiṁsanam

वे ही सब देवताओं के अधिष्ठाता, हृदय में छिपे रहने वाले असुरों के शत्रु हैं। ईश्वर सहित और चतुर्मुख ब्रह्मा सहित सभी देवता उन्हीं पर आधारित हैं। इसलिए ऋषियों की हिंसा ही उनके वध का एकमात्र उपाय है।

श्लोक 43 (bhagavata.10.4.43)

श्रीशुक उवाच एवं दुर्मन्त्रिभिः कंसः सह सम्मन्त्र्य दुर्मतिः । ब्रह्महिंसां हितं मेने कालपाशावृतोऽसुरः ॥ ४३ ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ durmantribhiḥ kaṁsaḥ saha sammantrya durmatiḥ brahma-hiṁsāṁ hitaṁ mene kāla-pāśāvṛto ’suraḥ

श्रीशुकदेव ने कहा — इस प्रकार उन दुष्ट मंत्रियों से सलाह लेकर कालपाश में बंधे दुर्बुद्धि असुर कंस ने ब्राह्मणों की हिंसा को ही अपने लिए हितकर मान लिया।

श्लोक 44 (bhagavata.10.4.44)

सन्दिश्य साधुलोकस्य कदने कदनप्रियान् । कामरूपधरान् दिक्षु दानवान् गृहमाविशत् ॥ ४४ ॥

sandiśya sādhu-lokasya kadane kadana-priyān kāma-rūpa-dharān dikṣu dānavān gṛham āviśat

साधु-जनों को पीड़ा पहुँचाने में प्रिय रहने वाले, इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ उन दानवों को दिशा-दिशा में भेजकर वह अपने महल में चला गया।

श्लोक 45 (bhagavata.10.4.45)

ते वै रजःप्रकृतयस्तमसा मूढचेतसः । सतां विद्वेषमाचेरुरारादागतमृत्यवः ॥ ४५ ॥

te vai rajaḥ-prakṛtayas tamasā mūḍha-cetasaḥ satāṁ vidveṣam ācerur ārād āgata-mṛtyavaḥ

रजोगुण-प्रकृति वाले, तमोगुण से मोहित बुद्धि वाले वे दानव, जिनकी मृत्यु पास ही आ चुकी थी, सज्जनों से द्वेष करने लगे।

श्लोक 46 (bhagavata.10.4.46)

आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च । हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः ॥ ४६ ॥

āyuḥ śriyaṁ yaśo dharmaṁ lokān āśiṣa eva ca hanti śreyāṁsi sarvāṇi puṁso mahad-atikramaḥ

हे राजन्, महान् पुरुषों का अपराध मनुष्य की आयु, श्री, यश, धर्म, लोक और आशीर्वाद — इन सारे कल्याणों को नष्ट कर देता है।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5