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दशम स्कन्ध · अध्याय 43

कृष्ण द्वारा कुवलयापीड हाथी का वध

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44

श्लोक 1 (bhagavata.10.43.1)

श्रीशुक उवाच अथ कृष्णश्च रामश्च कृतशौचौ परन्तप । मल्लदुन्दुभिनिर्घोषं श्रुत्वा द्रष्टुमुपेयतुः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca atha kṛṣṇaś ca rāmaś ca kṛta-śaucau parantapa malla-dundubhi-nirghoṣaṁ śrutvā draṣṭum upeyatuḥ

शुकदेव जी ने कहा — हे परन्तप! तत्पश्चात् स्नानादि नित्यकर्म पूर्ण करके कृष्ण और राम ने मल्ल-दुन्दुभि की गर्जना सुनी, और उसे देखने चल पड़े।

श्लोक 2 (bhagavata.10.43.2)

रङ्गद्वारं समासाद्य तस्मिन् नागमवस्थितम् । अपश्यत्कुवलयापीडं कृष्णोऽम्बष्ठप्रचोदितम् ॥ २ ॥

raṅga-dvāraṁ samāsādya tasmin nāgam avasthitam apaśyat kuvalayāpīḍaṁ kṛṣṇo ’mbaṣṭha-pracoditam

रंगभूमि के द्वार पर पहुँचकर कृष्ण ने महावत द्वारा उकसाए गए कुवलयापीड नामक हाथी को वहाँ खड़ा देखा।

श्लोक 3 (bhagavata.10.43.3)

बद्ध्वा परिकरं शौरिः समुह्य कुटिलालकान् । उवाच हस्तिपं वाचा मेघनादगभीरया ॥ ३ ॥

baddhvā parikaraṁ śauriḥ samuhya kuṭilālakān uvāca hastipaṁ vācā megha-nāda-gabhīrayā

अपना वस्त्र कसकर और अपनी घुंघराली लटों को समेटकर, शौरि ने महावत को मेघ-गर्जना के समान गम्भीर वाणी में सम्बोधित किया।

श्लोक 4 (bhagavata.10.43.4)

अम्बष्ठाम्बष्ठ मार्गं नौ देह्यपक्रम मा चिरम् । नो चेत् सकुञ्जरं त्वाद्य नयामि यमसादनम् ॥ ४ ॥

ambaṣṭhāmbaṣṭha mārgaṁ nau dehy apakrama mā ciram no cet sa-kuñjaraṁ tvādya nayāmi yama-sādanam

[कृष्ण ने कहा —] हे महावत, महावत! हमें मार्ग दो और शीघ्र हट जाओ — अन्यथा आज मैं तुम्हें हाथी सहित यमलोक भेज दूँगा!

श्लोक 5 (bhagavata.10.43.5)

एवं निर्भर्त्सितोऽम्बष्ठः कुपितः कोपितं गजम् । चोदयामास कृष्णाय कालान्तकयमोपमम् ॥ ५ ॥

evaṁ nirbhartsito ’mbaṣṭhaḥ kupitaḥ kopitaṁ gajam codayām āsa kṛṣṇāya kālāntaka-yamopamam

इस प्रकार डाँटे जाने पर महावत क्रोधित हो उठा, और अपने पहले से ही क्रुद्ध हाथी को, जो काल और मृत्यु-यम के समान था, कृष्ण पर उकसा दिया।

श्लोक 6 (bhagavata.10.43.6)

करीन्द्रस्तमभिद्रुत्य करेण तरसाग्रहीत् । कराद्विगलितः सोऽमुं निहत्याङ्घ्रिष्वलीयत ॥ ६ ॥

karīndras tam abhidrutya kareṇa tarasāgrahīt karād vigalitaḥ so ’muṁ nihatyāṅghriṣv alīyata

गजराज ने दौड़कर उन्हें अपनी सूँड़ से वेगपूर्वक पकड़ लिया; परन्तु उस पकड़ से फिसलकर कृष्ण ने उसे एक प्रहार किया और उसके पैरों के बीच अदृश्य हो गए।

श्लोक 7 (bhagavata.10.43.7)

सङ्क्रुद्धस्तमचक्षाणो घ्राणदृष्टिः स केशवम् । परामृशत् पुष्करेण स प्रसह्य विनिर्गतः ॥ ७ ॥

saṅkruddhas tam acakṣāṇo ghrāṇa-dṛṣṭiḥ sa keśavam parāmṛśat puṣkareṇa sa prasahya vinirgataḥ

क्रुद्ध हुआ हाथी केशव को न देख पाने पर गन्ध से उन्हें खोजने लगा, और सूँड़ के अग्रभाग से उन्हें पुनः बलपूर्वक पकड़ लिया — किन्तु भगवान ने बलपूर्वक स्वयं को छुड़ा लिया।

श्लोक 8 (bhagavata.10.43.8)

पुच्छे प्रगृह्यातिबलं धनुषः पञ्चविंशतिम् । विचकर्ष यथा नागं सुपर्ण इव लीलया ॥ ८ ॥

pucche pragṛhyāti-balaṁ dhanuṣaḥ pañca-viṁśatim vicakarṣa yathā nāgaṁ suparṇa iva līlayā

अपार बलशाली कृष्ण ने हाथी को पूँछ से पकड़कर पच्चीस धनुष-मात्रा तक लीलापूर्वक घसीट लिया, जैसे गरुड़ किसी सर्प को लीलामात्र में घसीट ले।

श्लोक 9 (bhagavata.10.43.9)

स पर्यावर्तमानेन सव्यदक्षिणतोऽच्युतः । बभ्राम भ्राम्यमाणेन गोवत्सेनेव बालकः ॥ ९ ॥

sa paryāvartamānena savya-dakṣiṇato ’cyutaḥ babhrāma bhrāmyamāṇena go-vatseneva bālakaḥ

जैसे-जैसे हाथी बाईं और दाईं ओर मुड़ता रहा, उसे पकड़े हुए अच्युत भी उसके विपरीत दिशा में घूमते रहे — मानो कोई बालक पूँछ से पकड़े हुए बछड़े के साथ घूम रहा हो।

श्लोक 10 (bhagavata.10.43.10)

ततोऽभिमुखमभ्येत्य पाणिनाहत्य वारणम् । प्राद्रवन् पातयामास स्पृश्यमानः पदे पदे ॥ १० ॥

tato ’bhimakham abhyetya pāṇināhatya vāraṇam prādravan pātayām āsa spṛśyamānaḥ pade pade

तत्पश्चात् उसके सम्मुख आकर उन्होंने हाथी को अपने हाथ से एक प्रहार किया और दौड़ पड़े; कदम-कदम पर छुए जाते हुए भी वे उसे गिराने में सफल रहे।

श्लोक 11 (bhagavata.10.43.11)

स धावन् क्रीडया भूमौ पतित्वा सहसोत्थितः । तं मत्वा पतितं क्रुद्धो दन्ताभ्यां सोऽहनत्क्षितिम् ॥ ११ ॥

sa dhāvan kṛīdayā bhūmau patitvā sahasotthitaḥ tam matvā patitaṁ kruddho dantābhyāṁ so ’hanat kṣitim

दौड़ते-दौड़ते लीलापूर्वक भूमि पर गिरकर वे तुरन्त ही उठ खड़े हुए; उन्हें गिरा हुआ समझकर क्रुद्ध हाथी ने अपने दाँतों से पृथ्वी पर ही प्रहार कर दिया।

श्लोक 12 (bhagavata.10.43.12)

स्वविक्रमे प्रतिहते कुञ्जरेन्द्रोऽत्यमर्षितः । चोद्यमानो महामात्रैः कृष्णमभ्यद्रवद् रुषा ॥ १२ ॥

sva-vikrame pratihate kuñjarendro ’ty-amarṣitaḥ codyamāno mahāmātraiḥ kṛṣṇam abhyadravad ruṣā

इस प्रकार अपना पराक्रम विफल होते देख गजराज और भी अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा, और महावतों द्वारा और उकसाए जाने पर क्रोधपूर्वक पुनः कृष्ण पर टूट पड़ा।

श्लोक 13 (bhagavata.10.43.13)

तमापतन्तमासाद्य भगवान् मधुसूदनः । निगृह्य पाणिना हस्तं पातयामास भूतले ॥ १३ ॥

tam āpatantam āsādya bhagavān madhusūdanaḥ nigṛhya pāṇinā hastaṁ pātayām āsa bhū-tale

उस झपटते हुए हाथी को सामने पाकर भगवान मधुसूदन ने अपने हाथ से उसकी सूँड़ पकड़ ली और उसे भूमि पर पटक दिया।

श्लोक 14 (bhagavata.10.43.14)

पतितस्य पदाक्रम्य मृगेन्द्र इव लीलया । दन्तमुत्पाट्य तेनेभं हस्तिपांश्चाहनद्धरिः ॥ १४ ॥

patitasya padākramya mṛgendra iva līlayā dantam utpāṭya tenebhaṁ hastipāṁś cāhanad dhariḥ

गिरे हुए हाथी पर सिंह के समान लीलापूर्वक अपना पैर रखकर, हरि ने उसका एक दाँत उखाड़ लिया, और उसी से हाथी तथा उसके महावतों का भी वध कर दिया।

श्लोक 15 (bhagavata.10.43.15)

मृतकं द्विपमुत्सृज्य दन्तपाणिः समाविशत् । अंसन्यस्तविषाणोऽसृङ्मदबिन्दुभिरङ्कितः । विरूढस्वेदकणिकावदनाम्बुरुहो बभौ ॥ १५ ॥

mṛtakaṁ dvipam utsṛjya danta-pāṇiḥ samāviśat aṁsa-nyasta-viṣāṇo ’sṛṅ- mada-bindubhir aṅkitaḥ virūḍha-sveda-kaṇikā vadanāmburuho babhau

मृत हाथी को छोड़कर, हाथ में दाँत लिए हुए वे रंगभूमि में प्रविष्ट हुए — कंधे पर दाँत रखे हुए, रक्त और मद की बूँदों से अंकित, तथा पसीने की बूँदों से सुशोभित उनका कमल-मुख अत्यन्त शोभायमान हो रहा था।

श्लोक 16 (bhagavata.10.43.16)

वृतौ गोपैः कतिपयैर्बलदेवजनार्दनौ । रङ्गं विविशतू राजन् गजदन्तवरायुधौ ॥ १६ ॥

vṛtau gopaiḥ katipayair baladeva-janārdanau raṅgaṁ viviśatū rājan gaja-danta-varāyudhau

हे राजन्! कुछ गोपों से घिरे हुए बलदेव और जनार्दन, गजदन्त रूपी सर्वश्रेष्ठ शस्त्र लिए हुए, रंगभूमि में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 17 (bhagavata.10.43.17)

मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः । मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनांवृष्णीनां परदेवतेति विदितो रङ्गं गतः साग्रजः ॥ १७ ॥

mallānām aśanir nṛṇāṁ nara-varaḥ strīṇāṁ smaro mūrtimān gopānāṁ sva-jano ’satāṁ kṣiti-bhujāṁ śāstā sva-pitroḥ śiśuḥ mṛtyur bhoja-pater virāḍ aviduṣāṁ tattvaṁ paraṁ yogināṁ vṛṣṇīnāṁ para-devateti vidito raṅgaṁ gataḥ sāgrajaḥ

मल्लों के लिए वज्र, पुरुषों के लिए नरश्रेष्ठ, स्त्रियों के लिए साक्षात् कामदेव, गोपों के लिए स्वजन, दुष्ट राजाओं के लिए शासक, अपने माता-पिता के लिए शिशु, भोजपति के लिए साक्षात् मृत्यु, अज्ञानियों के लिए विराट रूप, योगियों के लिए परम तत्त्व तथा वृष्णिवंशियों के लिए परम आराध्य देवता — इस प्रकार विभिन्न रूपों में जाने जाते हुए वे अग्रज सहित रंगभूमि में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 18 (bhagavata.10.43.18)

हतं कुवलयापीडं दृष्ट्वा तावपि दुर्जयौ । कंसो मनस्यपि तदा भृशमुद्विविजे नृप ॥ १८ ॥

hataṁ kuvalayāpīḍaṁ dṛṣṭvā tāv api durjayau kaṁso manasy api tadā bhṛśam udvivije nṛpa

कुवलयापीड को मारा गया तथा दोनों भाइयों को अजेय देखकर, हे राजन्! कंस का मन उसी क्षण अत्यन्त व्याकुल हो उठा।

श्लोक 19 (bhagavata.10.43.19)

तौ रेजतू रङ्गगतौ महाभुजौविचित्रवेषाभरणस्रगम्बरौ । यथा नटावुत्तमवेषधारिणौमनः क्षिपन्तौ प्रभया निरीक्षताम् ॥ १९ ॥

tau rejatū raṅga-gatau mahā-bhujau vicitra-veṣābharaṇa-srag-ambarau yathā naṭāv uttama-veṣa-dhāriṇau manaḥ kṣipantau prabhayā nirīkṣatām

वे दोनों महाबाहु विचित्र वेश, आभूषण, माला और वस्त्रों से सुशोभित होकर रंगभूमि में ऐसे शोभायमान हुए, मानो उत्तम वेष धारण किए हुए दो अभिनेता हों, और अपनी कान्ति से देखने वालों के मन को हर रहे थे।

श्लोक 20 (bhagavata.10.43.20)

निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषौ जनामञ्चस्थिता नागरराष्ट्रका नृप । प्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणाननाःपपुर्न तृप्ता नयनैस्तदाननम् ॥ २० ॥

nirīkṣya tāv uttama-pūruṣau janā mañca-sthitā nāgara-rāṣṭrakā nṛpa praharṣa-vegotkalitekṣaṇānanāḥ papur na tṛptā nayanais tad-ānanam

उन दोनों परम पुरुषों को देखकर, हे राजन्! मंचों पर बैठे नगरवासी और जनपदवासी, अपने हर्षातिरेक से खिले हुए नेत्रों और मुखों के साथ, नेत्रों से उस मुख का पान करते रहे और तृप्त न हुए।

श्लोक 21 (bhagavata.10.43.21)

पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया । जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्लिष्यन्त इव बाहुभिः ॥ २१ ॥

pibanta iva cakṣurbhyāṁ lihanta iva jihvayā jighranta iva nāsābhyāṁ śliṣyanta iva bāhubhiḥ

मानो नेत्रों से उन्हें पी रहे हों, मानो जिह्वा से चाट रहे हों, मानो नासिका से सूँघ रहे हों, मानो भुजाओं से आलिंगन कर रहे हों —

श्लोक 22 (bhagavata.10.43.22)

ऊचुः परस्परं ते वै यथादृष्टं यथाश्रुतम् । तद्रूपगुणमाधुर्यप्रागल्भ्यस्मारिता इव ॥ २२ ॥

ūcuḥ parasparaṁ te vai yathā-dṛṣṭaṁ yathā-śrutam tad-rūpa-guṇa-mādhurya- prāgalbhya-smāritā iva

— इस प्रकार मानो उनके रूप, गुण, माधुर्य और साहस का स्मरण होते ही, लोग परस्पर एक-दूसरे से जो कुछ देखा और सुना था, वही कहने लगे।

श्लोक 23 (bhagavata.10.43.23)

एतौ भगवतः साक्षाद्धरेर्नारायणस्य हि । अवतीर्णाविहांशेन वसुदेवस्य वेश्मनि ॥ २३ ॥

etau bhagavataḥ sākṣād dharer nārāyaṇasya hi avatīrṇāv ihāṁśena vasudevasya veśmani

[लोगों ने कहा —] ये दोनों निश्चय ही साक्षात् भगवान हरि नारायण के ही अंश हैं, जो वसुदेव के घर में अवतीर्ण हुए हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.10.43.24)

एष वै किल देवक्यां जातो नीतश्च गोकुलम् । कालमेतं वसन् गूढो ववृधे नन्दवेश्मनि ॥ २४ ॥

eṣa vai kila devakyāṁ jāto nītaś ca gokulam kālam etaṁ vasan gūḍho vavṛdhe nanda-veśmani

यह वही है जो देवकी से उत्पन्न हुआ और गोकुल ले जाया गया; इतने समय तक वहाँ छिपकर रहते हुए यह नन्द के घर में बड़ा हुआ।

श्लोक 25 (bhagavata.10.43.25)

पूतनानेन नीतान्तं चक्रवातश्च दानवः । अर्जुनौ गुह्यकः केशी धेनुकोऽन्ये च तद्विधाः ॥ २५ ॥

pūtanānena nītāntaṁ cakravātaś ca dānavaḥ arjunau guhyakaḥ keśī dhenuko ’nye ca tad-vidhāḥ

इसी ने पूतना का अन्त किया, तथा चक्रवात दानव का भी; इसी ने अर्जुन-युगल वृक्षों को उखाड़ा, और केशी, धेनुक तथा उन्हीं जैसे अन्य असुरों का वध किया।

श्लोक 26 (bhagavata.10.43.26)

गावः सपाला एतेन दावाग्नेः परिमोचिताः । कालियो दमितः सर्प इन्द्रश्च विमदः कृतः ॥ २६ ॥

gāvaḥ sa-pālā etena dāvāgneḥ parimocitāḥ kāliyo damitaḥ sarpa indraś ca vimadaḥ kṛtaḥ

इसी ने गोपालकों सहित गायों को दावाग्नि से मुक्त कराया; सर्प कालिय को वश में किया, तथा इन्द्र का मद भी दूर किया।

श्लोक 27 (bhagavata.10.43.27)

सप्ताहमेकहस्तेन धृतोऽद्रिप्रवरोऽमुना । वर्षवाताशनिभ्यश्च परित्रातं च गोकुलम् ॥ २७ ॥

saptāham eka-hastena dhṛto ’dri-pravaro ’munā varṣa-vātāśanibhyaś ca paritrātaṁ ca gokulam

सात दिनों तक इसने एक ही हाथ से पर्वतश्रेष्ठ को उठाए रखा, और इस प्रकार गोकुल की वर्षा, आँधी और वज्रपात से रक्षा की।

श्लोक 28 (bhagavata.10.43.28)

गोप्योऽस्य नित्यमुदितहसितप्रेक्षणं मुखम् । पश्यन्त्यो विविधांस्तापांस्तरन्ति स्माश्रमं मुदा ॥ २८ ॥

gopyo ’sya nitya-mudita- hasita-prekṣaṇaṁ mukham paśyantyo vividhāṁs tāpāṁs taranti smāśramaṁ mudā

गोपियाँ इसके सदा प्रफुल्लित, हास्ययुक्त चितवन वाले मुख को देखकर ही समस्त प्रकार के संतापों को पार कर जाती हैं, और आनन्दपूर्वक रहती हैं।

श्लोक 29 (bhagavata.10.43.29)

वदन्त्यनेन वंशोऽयं यदोः सुबहुविश्रुतः । श्रियं यशो महत्वं च लप्स्यते परिरक्षितः ॥ २९ ॥

vadanty anena vaṁśo ’yaṁ yadoḥ su-bahu-viśrutaḥ śriyaṁ yaśo mahatvaṁ ca lapsyate parirakṣitaḥ

कहते हैं कि पहले से ही अत्यन्त विख्यात यह यदुवंश, अब इसके संरक्षण में, श्री, यश और महत्ता को प्राप्त करेगा।

श्लोक 30 (bhagavata.10.43.30)

अयं चास्याग्रजः श्रीमान्रामः कमललोचनः । प्रलम्बो निहतो येन वत्सको ये बकादयः ॥ ३० ॥

ayaṁ cāsyāgrajaḥ śrīmān rāmaḥ kamala-locanaḥ pralambo nihato yena vatsako ye bakādayaḥ

और यह इसका अग्रज, कमलनयन श्रीमान् राम — इसी के द्वारा प्रलम्ब मारा गया, तथा वत्सक, बक और अन्य वैसे ही असुर भी।

श्लोक 31 (bhagavata.10.43.31)

जनेष्वेवं ब्रुवाणेषु तूर्येषु निनदत्सु च । कृष्णरामौ समाभाष्य चाणूरो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३१ ॥

janeṣv evaṁ bruvāṇeṣu tūryeṣu ninadatsu ca kṛṣṇa-rāmau samābhāṣya cāṇūro vākyam abravīt

लोगों के इस प्रकार बातें करते रहने और वाद्यों के बजते रहने के बीच, चाणूर ने कृष्ण और राम को संबोधित करते हुए यह वचन कहा।

श्लोक 32 (bhagavata.10.43.32)

हे नन्दसूनो हे राम भवन्तौ वीरसम्मतौ । नियुद्धकुशलौ श्रुत्वा राज्ञाहूतौ दिदृक्षुणा ॥ ३२ ॥

he nanda-sūno he rāma bhavantau vīra-sammatau niyuddha-kuśalau śrutvā rājñāhūtau didṛkṣuṇā

[चाणूर ने कहा —] हे नन्दपुत्र, हे राम! आप दोनों वीरों में सम्मानित और द्वन्द्वयुद्ध में कुशल हैं; यह सुनकर राजा ने स्वयं देखने की इच्छा से आप दोनों को यहाँ बुलाया है।

श्लोक 33 (bhagavata.10.43.33)

प्रियं राज्ञः प्रकुर्वत्यः श्रेयो विन्दन्ति वै प्रजाः । मनसा कर्मणा वाचा विपरीतमतोऽन्यथा ॥ ३३ ॥

priyaṁ rājñaḥ prakurvatyaḥ śreyo vindanti vai prajāḥ manasā karmaṇā vācā viparītam ato ’nyathā

जो प्रजा मन, कर्म और वचन से राजा को प्रसन्न करने का प्रयत्न करती है, वह कल्याण प्राप्त करती है; जो इसके विपरीत करती है, उसे विपरीत फल ही मिलता है।

श्लोक 34 (bhagavata.10.43.34)

नित्यं प्रमुदिता गोपा वत्सपाला यथास्फुटम् । वनेषु मल्लयुद्धेन क्रीडन्तश्चारयन्ति गाः ॥ ३४ ॥

nityaṁ pramuditā gopā vatsa-pālā yathā-sphuṭam vaneṣu malla-yuddhena krīḍantaś cārayanti gāḥ

यह प्रत्यक्ष ही है कि बछड़ों की रखवाली करने वाले गोप सदा प्रसन्न रहते हैं, तथा वनों में गायों को चराते हुए वे परस्पर मल्लयुद्ध की क्रीड़ा भी करते रहते हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.10.43.35)

तस्माद् राज्ञः प्रियं यूयं वयं च करवाम हे । भूतानि नः प्रसीदन्ति सर्वभूतमयो नृपः ॥ ३५ ॥

tasmād rājñaḥ priyaṁ yūyaṁ vayaṁ ca karavāma he bhūtāni naḥ prasīdanti sarva-bhūta-mayo nṛpaḥ

अतः हे मित्रो, हम और आप दोनों ही राजा को प्रिय लगने वाला कार्य करें; जब सर्वभूतमय राजा प्रसन्न होता है, तो समस्त प्राणी हम पर प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 36 (bhagavata.10.43.36)

तन्निशम्याब्रवीत्कृष्णो देशकालोचितं वचः । नियुद्धमात्मनोऽभीष्टं मन्यमानोऽभिनन्द्य च ॥ ३६ ॥

tan niśamyābravīt kṛṣṇo deśa-kālocitaṁ vacaḥ niyuddham ātmano ’bhīṣṭaṁ manyamāno ’bhinandya ca

यह सुनकर, द्वन्द्वयुद्ध को स्वयं अपने लिए ही अभीष्ट मानते हुए कृष्ण ने देश-काल के अनुरूप वचन कहकर उसका अभिनन्दन किया।

श्लोक 37 (bhagavata.10.43.37)

प्रजा भोजपतेरस्य वयं चापि वनेचराः । करवाम प्रियं नित्यं तन्नः परमनुग्रहः ॥ ३७ ॥

prajā bhoja-pater asya vayaṁ cāpi vane-carāḥ karavāma priyaṁ nityaṁ tan naḥ param anugrahaḥ

[कृष्ण ने कहा —] हम भी, यद्यपि वनचर हैं, इस भोजपति की ही प्रजा हैं; हम सदा उसे प्रिय लगने वाला ही कार्य करें, यही हमारे लिए परम अनुग्रह होगा।

श्लोक 38 (bhagavata.10.43.38)

बाला वयं तुल्यबलैः क्रीडिष्यामो यथोचितम् । भवेन्नियुद्धं माधर्मः स्पृशेन्मल्ल सभासदः ॥ ३८ ॥

bālā vayaṁ tulya-balaiḥ krīḍiṣyāmo yathocitam bhaven niyuddhaṁ mādharmaḥ spṛśen malla-sabhā-sadaḥ

हम तो बालक हैं; अतः हम अपने समान बल वालों के साथ ही उचित रीति से क्रीड़ा करें — द्वन्द्वयुद्ध उचित रीति से हो, ऐसा न हो कि इस सभा के सम्मानित सदस्यों को अधर्म स्पर्श करे।

श्लोक 39 (bhagavata.10.43.39)

चाणूर उवाच न बालो न किशोरस्त्वं बलश्च बलिनां वरः । लीलयेभो हतो येन सहस्रद्विपसत्त्वभृत् ॥ ३९ ॥

cāṇūra uvāca na bālo na kiśoras tvaṁ balaś ca balināṁ varaḥ līlayebho hato yena sahasra-dvipa-sattva-bhṛt

चाणूर ने कहा — न तो आप बालक हैं, न किशोर — और न ही बलवानों में श्रेष्ठ बल ही; क्योंकि आपने तो लीलामात्र में सहस्र गजों के बल वाले हाथी का वध कर दिया।

श्लोक 40 (bhagavata.10.43.40)

तस्माद्भवद्भ्यां बलिभिर्योद्धव्यं नानयोऽत्र वै । मयि विक्रम वार्ष्णेय बलेन सह मुष्टिकः ॥ ४० ॥

tasmād bhavadbhyāṁ balibhir yoddhavyaṁ nānayo ’tra vai mayi vikrama vārṣṇeya balena saha muṣṭikaḥ

अतः आप दोनों को बलवान मल्लों से ही युद्ध करना चाहिए — इसमें कोई अन्याय नहीं है। हे वार्ष्णेय! आप मुझसे अपना पराक्रम दिखाइए, और बल मुष्टिक से लड़ें।

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