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दशम स्कन्ध · अध्याय 44

कंस-वध

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

श्लोक 1 (bhagavata.10.44.1)

श्रीशुक उवाच एवं चर्चितसङ्कल्पो भगवान् मधुसूदनः । आससादाथ चाणूरं मुष्टिकं रोहिणीसुतः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ carcita-saṅkalpo bhagavān madhusūdanaḥ āsasādātha caṇūraṁ muṣṭtikaṁ rohiṇī-sutaḥ

शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार संकल्प करके भगवान मधुसूदन, रोहिणीनन्दन सहित, चाणूर और मुष्टिक के सम्मुख जा पहुँचे।

श्लोक 2 (bhagavata.10.44.2)

हस्ताभ्यां हस्तयोर्बद्ध्वा पद्भ्यामेव च पादयोः । विचकर्षतुरन्योन्यं प्रसह्य विजिगीषया ॥ २ ॥

hastābhyāṁ hastayor baddhvā padbhyām eva ca pādayoḥ vicakarṣatur anyonyaṁ prasahya vijigīṣayā

एक-दूसरे के हाथों को हाथों से और पैरों को पैरों से बाँधकर, वे परस्पर विजय की इच्छा से बलपूर्वक एक-दूसरे को खींचने लगे।

श्लोक 3 (bhagavata.10.44.3)

अरत्नी द्वे अरत्निभ्यां जानुभ्यां चैव जानुनी । शिरः शीर्ष्णोरसोरस्तावन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ ३ ॥

aratnī dve aratnibhyāṁ jānubhyāṁ caiva jānunī śiraḥ śīrṣṇorasoras tāv anyonyam abhijaghnatuḥ

वे परस्पर मुट्ठी से मुट्ठी, घुटने से घुटने, सिर से सिर और छाती से छाती से प्रहार करने लगे।

श्लोक 4 (bhagavata.10.44.4)

परिभ्रामणविक्षेपपरिरम्भावपातनैः । उत्सर्पणापसर्पणैश्चान्योन्यं प्रत्यरुन्धताम् ॥ ४ ॥

paribhrāmaṇa-vikṣepa- parirambhāvapātanaiḥ utsarpaṇāpasarpaṇaiś cānyonyaṁ pratyarundhatām

घुमाकर पटकने, झटका देने, आलिंगन में जकड़ने और गिराने से, तथा आगे बढ़ने और पीछे हटने से भी वे एक-दूसरे को रोकते रहे।

श्लोक 5 (bhagavata.10.44.5)

उत्थापनैरुन्नयनैश्चालनैः स्थापनैरपि । परस्परं जिगीषन्तावपचक्रतुरात्मनः ॥ ५ ॥

utthāpanair unnayanaiś cālanaiḥ sthāpanair api parasparaṁ jigīṣantāv apacakratur ātmanaḥ

उठाकर, ऊपर ले जाकर, हिलाकर तथा दबाकर भी, विजय की इच्छा से परस्पर लड़ते हुए वे अपने ही शरीर को भी क्षति पहुँचाते रहे।

श्लोक 6 (bhagavata.10.44.6)

तद् बलाबलवद्युद्धं समेताः सर्वयोषितः । ऊचुः परस्परं राजन् सानुकम्पा वरूथशः ॥ ६ ॥

tad balābalavad yuddhaṁ sametāḥ sarva-yoṣitaḥ ūcuḥ parasparaṁ rājan sānukampā varūthaśaḥ

हे राजन्! वहाँ एकत्र हुई सभी स्त्रियाँ उस बलवान और निर्बल के बीच के इस युद्ध को देखकर करुणावश समूहों में परस्पर यह कहने लगीं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.44.7)

महानयं बताधर्म एषां राजसभासदाम् । ये बलाबलवद्युद्धं राज्ञोऽन्विच्छन्ति पश्यतः ॥ ७ ॥

mahān ayaṁ batādharma eṣāṁ rāja-sabhā-sadām ye balābalavad yuddhaṁ rājño ’nvicchanti paśyataḥ

[स्त्रियों ने कहा —] हाय, इस राजसभा में बैठे इन लोगों का यह कितना बड़ा अधर्म है, जो राजा के देखते हुए इस बलवान-निर्बल के युद्ध को देखना चाहते हैं!

श्लोक 8 (bhagavata.10.44.8)

क्व वज्रसारसर्वाङ्गौ मल्लौ शैलेन्द्रसन्निभौ । क्व चातिसुकुमाराङ्गौ किशोरौ नाप्तयौवनौ ॥ ८ ॥

kva vajra-sāra-sarvāṅgau mallau śailendra-sannibhau kva cāti-sukumārāṅgau kiśorau nāpta-yauvanau

कहाँ वज्र के समान दृढ़ अंगों वाले, पर्वतश्रेष्ठ के समान ये मल्ल, और कहाँ अत्यन्त कोमल अंगों वाले, यौवन को भी न पहुँचे ये दोनों किशोर!

श्लोक 9 (bhagavata.10.44.9)

धर्मव्यतिक्रमो ह्यस्य समाजस्य ध्रुवं भवेत् । यत्राधर्मः समुत्तिष्ठेन्न स्थेयं तत्र कर्हिचित् ॥ ९ ॥

dharma-vyatikramo hy asya samājasya dhruvaṁ bhavet yatrādharmaḥ samuttiṣṭhen na stheyaṁ tatra karhicit

इस सभा में निश्चय ही धर्म का उल्लंघन हो रहा है; जहाँ अधर्म प्रकट हो, वहाँ एक क्षण भी नहीं रुकना चाहिए।

श्लोक 10 (bhagavata.10.44.10)

न सभां प्रविशेत् प्राज्ञः सभ्यदोषाननुस्मरन् । अब्रुवन् विब्रुवन्नज्ञो नरः किल्बिषमश्नुते ॥ १० ॥

na sabhāṁ praviśet prājñaḥ sabhya-doṣān anusmaran abruvan vibruvann ajño naraḥ kilbiṣam aśnute

बुद्धिमान पुरुष को सभा के दोषों का स्मरण रखते हुए सभा में प्रवेश ही नहीं करना चाहिए; और यदि करे भी, तो न बोलने वाला, गलत बोलने वाला अथवा अनजान बना रहने वाला मनुष्य पाप का भागी बनता है।

श्लोक 11 (bhagavata.10.44.11)

वल्गतः शत्रुमभितः कृष्णस्य वदनाम्बुजम् । वीक्ष्यतां श्रमवार्युप्तं पद्मकोशमिवाम्बुभिः ॥ ११ ॥

valgataḥ śatrum abhitaḥ kṛṣṇasya vadanāmbujam vīkṣyatāṁ śrama-vāry-uptaṁ padma-kośam ivāmbubhiḥ

देखो तो, शत्रु के चारों ओर उछलते हुए कृष्ण के उस कमल-मुख को, जो परिश्रम के पसीने से भीगा हुआ है, मानो जल की बूँदों से ढका कमल-कोश हो!

श्लोक 12 (bhagavata.10.44.12)

किं न पश्यत रामस्य मुखमाताम्रलोचनम् । मुष्टिकं प्रति सामर्षं हाससंरम्भशोभितम् ॥ १२ ॥

kiṁ na paśyata rāmasya mukham ātāmra-locanam muṣṭikaṁ prati sāmarṣaṁ hāsa-saṁrambha-śobhitam

क्या तुम राम का वह मुख नहीं देख रहे, जिसकी आँखें मुष्टिक पर क्रोध से ताम्रवर्ण हो उठी हैं, और जो हास्य तथा उत्साह से और भी शोभायमान हो रहा है?

श्लोक 13 (bhagavata.10.44.13)

पुण्या बत व्रजभुवो यदयं नृलिङ्ग-गूढः पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्यः । गाः पालयन् सहबलः क्वणयंश्च वेणुंविक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्घ्रिः ॥ १३ ॥

puṇyā bata vraja-bhuvo yad ayaṁ nṛ-liṅga gūḍhaḥ purāṇa-puruṣo vana-citra-mālyaḥ gāḥ pālayan saha-balaḥ kvaṇayaṁś ca veṇuṁ vikrīdayāñcati giritra-ramārcitāṅghriḥ

धन्य हैं व्रज की वे भूमियाँ, जहाँ यह पुराणपुरुष मनुष्य-वेष में छिपकर, वन के विचित्र फूलों की माला पहने, बलराम सहित गायों को चराता हुआ बाँसुरी बजाता विचरण करता है — जिसके चरणों की पूजा साक्षात् शिव और लक्ष्मी भी करते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.10.44.14)

गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपंलावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम् । दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप-मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य ॥ १४ ॥

gopyas tapaḥ kim acaran yad amuṣya rūpaṁ lāvaṇya-sāram asamordhvam ananya-siddham dṛgbhiḥ pibanty anusavābhinavaṁ durāpam ekānta-dhāma yaśasaḥ śriya aiśvarasya

गोपियों ने न जाने कैसी तपस्या की होगी, कि जिनकी आँखें निरन्तर इस रूप का पान करती हैं — जो सौन्दर्य का सार है, अतुलनीय है, स्वयंसिद्ध है, सदा नवीन है, दुर्लभ है, तथा यश और ऐश्वर्य का एकमात्र निवास है।

श्लोक 15 (bhagavata.10.44.15)

या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ । गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्योधन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥ १५ ॥

yā dohane ’vahanane mathanopalepa preṅkheṅkhanārbha-ruditokṣaṇa-mārjanādau gāyanti cainam anurakta-dhiyo ’śru-kaṇṭhyo dhanyā vraja-striya urukrama-citta-yānāḥ

जो व्रज की स्त्रियाँ दूध दुहते, दही मथते, उबटन लगाते, झूला झुलाते, रोते हुए शिशु को सम्भालते, आँगन सींचते और घर बुहारते हुए भी अनुरक्त हृदय और अश्रुपूरित कंठ से इनका ही गान करती हैं, और जिनका मन सदा उरुक्रम की ओर ही खिंचा रहता है, वे व्रजनारियाँ धन्य हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.10.44.16)

प्रातर्व्रजाद् व्रजत आविशतश्च सायंगोभिः समं क्वणयतोऽस्य निशम्य वेणुम् । निर्गम्य तूर्णमबलाः पथि भूरिपुण्याःपश्यन्ति सस्मितमुखं सदयावलोकम् ॥ १६ ॥

prātar vrajād vrajata āviśataś ca sāyaṁ gobhiḥ samaṁ kvaṇayato ’sya niśamya veṇum nirgamya tūrṇam abalāḥ pathi bhūri-puṇyāḥ paśyanti sa-smita-mukhaṁ sa-dayāvalokam

प्रातःकाल व्रज से जाते और सन्ध्या को गायों सहित लौटते हुए इनकी बाँसुरी की ध्वनि सुनकर, अनेक पुण्यों की स्वामिनी वे स्त्रियाँ शीघ्र बाहर निकलकर, इनके मुस्कराते हुए, करुणा से भरी चितवन वाले मुख को देखती हैं।

श्लोक 17 (bhagavata.10.44.17)

एवं प्रभाषमाणासु स्त्रीषु योगेश्वरो हरिः । शत्रुं हन्तुं मनश्चक्रे भगवान् भरतर्षभ ॥ १७ ॥

evaṁ prabhāṣamāṇāsu strīṣu yogeśvaro hariḥ śatruṁ hantuṁ manaś cakre bhagavān bharatarṣabha

शुकदेव जी ने आगे कहा — हे भरतश्रेष्ठ! स्त्रियों के इस प्रकार बोलते रहने पर, योगेश्वर भगवान हरि ने अपने शत्रु को मार डालने का निश्चय कर लिया।

श्लोक 18 (bhagavata.10.44.18)

सभयाः स्त्रीगिरः श्रुत्वा पुत्रस्नेहशुचातुरौ । पितरावन्वतप्येतां पुत्रयोरबुधौ बलम् ॥ १८ ॥

sa-bhayāḥ strī-giraḥ śrutvā putra-sneha-śucāturau pitarāv anvatapyetāṁ putrayor abudhau balam

भयभीत स्त्रियों की उन बातों को सुनकर, पुत्र-स्नेह से व्याकुल माता-पिता शोकाकुल हो उठे, क्योंकि वे अपने दोनों पुत्रों के बल को नहीं जानते थे।

श्लोक 19 (bhagavata.10.44.19)

तैस्तैर्नियुद्धविधिभिर्विविधैरच्युतेतरौ । युयुधाते यथान्योन्यं तथैव बलमुष्टिकौ ॥ १९ ॥

tais tair niyuddha-vidhibhir vividhair acyutetarau yuyudhāte yathānyonyaṁ tathaiva bala-muṣṭikau

जिस प्रकार अच्युत और उनका शत्रु उन-उन विभिन्न कुश्ती-दाँवों से परस्पर जूझ रहे थे, उसी प्रकार बल और मुष्टिक भी परस्पर जूझ रहे थे।

श्लोक 20 (bhagavata.10.44.20)

भगवद्गात्रनिष्पातैर्वज्रनीष्पेषनिष्ठुरैः । चाणूरो भज्यमानाङ्गो मुहुर्ग्लानिमवाप ह ॥ २० ॥

bhagavad-gātra-niṣpātair vajra-nīṣpeṣa-niṣṭhuraiḥ cāṇūro bhajyamānāṅgo muhur glānim avāpa ha

भगवान के अंगों के वज्र-सम कठोर प्रहारों से चाणूर के अंग टूटने लगे, और वह बार-बार क्लान्त होने लगा।

श्लोक 21 (bhagavata.10.44.21)

स श्येनवेग उत्पत्य मुष्टीकृत्य करावुभौ । भगवन्तं वासुदेवं क्रुद्धो वक्षस्यबाधत ॥ २१ ॥

sa śyena-vega utpatya muṣṭī-kṛtya karāv ubhau bhagavantaṁ vāsudevaṁ kruddho vakṣasy abādhata

बाज़ के समान वेग से उछलकर, अपने दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बाँधकर, क्रुद्ध हुए उसने भगवान वासुदेव की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 22 (bhagavata.10.44.22)

नाचलत्तत्प्रहारेण मालाहत इव द्विपः । बाह्वोर्निगृह्य चाणूरं बहुशो भ्रामयन् हरिः ॥ २२ ॥

nācalat tat-prahāreṇa mālāhata iva dvipaḥ bāhvor nigṛhya cāṇūraṁ bahuśo bhrāmayan hariḥ

उस प्रहार से वे उतना भी न हिले, जितना माला की चोट से कोई हाथी हिलता है; तब हरि ने चाणूर की दोनों भुजाओं को पकड़कर उसे बार-बार घुमाया।

श्लोक 23 (bhagavata.10.44.23)

भूपृष्ठे पोथयामास तरसा क्षीणजीवितम् । विस्रस्ताकल्पकेशस्रगिन्द्रध्वज इवापतत् ॥ २३ ॥

bhū-pṛṣṭhe pothayām āsa tarasā kṣīṇa jīvitam visrastākalpa-keśa-srag indra-dhvaja ivāpatat

उसके प्राण क्षीण होते देख, उन्होंने उसे वेगपूर्वक भूमि पर पटक दिया; वस्त्र, केश और माला बिखरे हुए वह ऐसे गिरा जैसे इन्द्रध्वज गिर पड़ा हो।

श्लोक 24 (bhagavata.10.44.24)

तथैव मुष्टिकः पूर्वं स्वमुष्ट्याभिहतेन वै । बलभद्रेण बलिना तलेनाभिहतो भृशम् ॥ २४ ॥

tathaiva muṣṭikaḥ pūrvaṁ sva-muṣṭyābhihatena vai balabhadreṇa balinā talenābhihato bhṛśam

उसी प्रकार मुष्टिक भी, जिसने पहले अपनी मुट्ठी से बलभद्र पर प्रहार किया था, बलवान बलभद्र की एक ही चपत से भीषण रूप से आहत हो गया।

श्लोक 25 (bhagavata.10.44.25)

प्रवेपितः स रुधिरमुद्वमन् मुखतोऽर्दितः । व्यसुः पपातोर्व्युपस्थे वाताहत इवाङ्घ्रिपः ॥ २५ ॥

pravepitaḥ sa rudhiram udvaman mukhato ’rditaḥ vyasuḥ papātorvy-upasthe vātāhata ivāṅghripaḥ

काँपता हुआ, मुख से रक्त उगलता हुआ, पीड़ा से पीड़ित वह प्राणहीन होकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़ा, जैसे आँधी से टूटा हुआ कोई वृक्ष गिरता है।

श्लोक 26 (bhagavata.10.44.26)

ततः कूटमनुप्राप्तं रामः प्रहरतां वरः । अवधील्लीलया राजन्सावज्ञं वाममुष्टिना ॥ २६ ॥

tataḥ kūṭam anuprāptaṁ rāmaḥ praharatāṁ varaḥ avadhīl līlayā rājan sāvajñaṁ vāma-muṣṭinā

तत्पश्चात् हे राजन्! सामने आए कूट को, प्रहारकर्ताओं में श्रेष्ठ राम ने लीलापूर्वक और तिरस्कारपूर्वक अपनी बाईं मुट्ठी से ही मार डाला।

श्लोक 27 (bhagavata.10.44.27)

तर्ह्येव हि शलः कृष्णप्रपदाहतशीर्षकः । द्विधा विदीर्णस्तोशलक उभावपि निपेततुः ॥ २७ ॥

tarhy eva hi śalaḥ kṛṣṇa- prapadāhata-śīrṣakaḥ dvidhā vidīrṇas tośalaka ubhāv api nipetatuḥ

उसी क्षण कृष्ण के पैर के अग्रभाग की चोट से शल का सिर टूट गया, और तोशल दो टुकड़ों में विदीर्ण हो गया — दोनों ही वहीं गिर पड़े।

श्लोक 28 (bhagavata.10.44.28)

चाणूरे मुष्टिके कूटे शले तोशलके हते । शेषाः प्रदुद्रुवुर्मल्लाः सर्वे प्राणपरीप्सवः ॥ २८ ॥

cāṇūre muṣṭike kūṭe śale tośalake hate śeṣāḥ pradudruvur mallāḥ sarve prāṇa-parīpsavaḥ

चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल के मारे जाने पर, शेष सभी मल्ल अपने प्राण बचाने की इच्छा से भाग खड़े हुए।

श्लोक 29 (bhagavata.10.44.29)

गोपान्वयस्यानाकृष्य तैः संसृज्य विजह्रतुः । वाद्यमानेषु तूर्येषु वल्गन्तौ रुतनूपुरौ ॥ २९ ॥

gopān vayasyān ākṛṣya taiḥ saṁsṛjya vijahratuḥ vādyamāneṣu tūryeṣu valgantau ruta-nūpurau

तत्पश्चात् अपने वयस्य गोपों को बुलाकर, उनके साथ मिलकर, वाद्य बजते रहने के बीच, नूपुरों को झंकृत करते हुए वे नाचते हुए क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 30 (bhagavata.10.44.30)

जनाः प्रजहृषुः सर्वे कर्मणा रामकृष्णयोः । ऋते कंसं विप्रमुख्याः साधवः साधु साध्विति ॥ ३० ॥

janāḥ prajahṛṣuḥ sarve karmaṇā rāma-kṛṣṇayoḥ ṛte kaṁsaṁ vipra-mukhyāḥ sādhavaḥ sādhu sādhv iti

कंस को छोड़कर वहाँ उपस्थित सभी लोग राम-कृष्ण के इस कार्य से हर्षित हो उठे; श्रेष्ठ ब्राह्मण और सन्तजन 'साधु, साधु' कहकर सराहना करने लगे।

श्लोक 31 (bhagavata.10.44.31)

हतेषु मल्लवर्येषु विद्रुतेषु च भोजराट् । न्यवारयत् स्वतूर्याणि वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ३१ ॥

hateṣu malla-varyeṣu vidruteṣu ca bhoja-rāṭ nyavārayat sva-tūryāṇi vākyaṁ cedam uvāca ha

अपने श्रेष्ठ मल्लों के मारे जाने और भाग जाने पर, भोजराज ने अपने वाद्यों को रुकवाकर यह वचन कहा।

श्लोक 32 (bhagavata.10.44.32)

निःसारयत दुर्वृत्तौ वसुदेवात्मजौ पुरात् । धनं हरत गोपानां नन्दं बध्नीत दुर्मतिम् ॥ ३२ ॥

niḥsārayata durvṛttau vasudevātmajau purāt dhanaṁ harata gopānāṁ nandaṁ badhnīta durmatim

[कंस ने कहा —] इन दोनों दुष्ट वसुदेव-पुत्रों को नगर से बाहर निकाल दो! गोपों का धन छीन लो, और उस मूर्ख नन्द को बाँध लो!

श्लोक 33 (bhagavata.10.44.33)

वसुदेवस्तु दुर्मेधा हन्यतामाश्वसत्तमः । उग्रसेनः पिता चापि सानुगः परपक्षगः ॥ ३३ ॥

vasudevas tu durmedhā hanyatām āśv asattamaḥ ugrasenaḥ pitā cāpi sānugaḥ para-pakṣa-gaḥ

उस दुर्बुद्धि वसुदेव को भी शीघ्र मार डाला जाए, जो अत्यन्त नीच है! और मेरे पिता उग्रसेन को भी, जो अपने अनुयायियों सहित शत्रु-पक्ष में जा मिले हैं, मार डालो!

श्लोक 34 (bhagavata.10.44.34)

एवं विकत्थमाने वै कंसे प्रकुपितोऽव्ययः । लघिम्नोत्पत्य तरसा मञ्चमुत्तुङ्गमारुहत् ॥ ३४ ॥

evaṁ vikatthamāne vai kaṁse prakupito ’vyayaḥ laghimnotpatya tarasā mañcam uttuṅgam āruhat

कंस के इस प्रकार डींग हाँकते रहने पर, अविनाशी कृष्ण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे, और लाघवपूर्वक तुरन्त उछलकर ऊँचे राजमंच पर चढ़ गए।

श्लोक 35 (bhagavata.10.44.35)

तमाविशन्तमालोक्य मृत्युमात्मन आसनात् । मनस्वी सहसोत्थाय जगृहे सोऽसिचर्मणी ॥ ३५ ॥

tam āviśantam ālokya mṛtyum ātmana āsanāt manasvī sahasotthāya jagṛhe so ’si-carmaṇī

अपने आसन की ओर मृत्यु को ही आते देखकर, बुद्धिमान कंस तुरन्त उठ खड़ा हुआ, और खड्ग तथा ढाल उठा ली।

श्लोक 36 (bhagavata.10.44.36)

तं खड्गपाणिं विचरन्तमाशुश्येनं यथा दक्षिणसव्यमम्बरे । समग्रहीद् दुर्विषहोग्रतेजायथोरगं तार्क्ष्यसुतः प्रसह्य ॥ ३६ ॥

taṁ khaḍga-pāṇiṁ vicarantam āśu śyenaṁ yathā dakṣiṇa-savyam ambare samagrahīd durviṣahogra-tejā yathoragaṁ tārkṣya-sutaḥ prasahya

आकाश में बाज़ के समान दाएँ-बाएँ तेजी से घूमते हुए, खड्गधारी उस कंस को, दुःसह और उग्र तेजस्वी कृष्ण ने ऐसे बलपूर्वक पकड़ लिया, जैसे गरुड़ किसी सर्प को पकड़ लेता है।

श्लोक 37 (bhagavata.10.44.37)

प्रगृह्य केशेषु चलत्किरीटंनिपात्य रङ्गोपरि तुङ्गमञ्चात् । तस्योपरिष्टात् स्वयमब्जनाभःपपात विश्वाश्रय आत्मतन्त्रः ॥ ३७ ॥

pragṛhya keśeṣu calat-kirītaṁ nipātya raṅgopari tuṅga-mañcāt tasyopariṣṭāt svayam abja-nābhaḥ papāta viśvāśraya ātma-tantraḥ

उसके बालों को पकड़कर, उसका हिलता हुआ मुकुट गिराते हुए, उन्होंने उसे ऊँचे मंच से रंगभूमि पर गिरा दिया; और स्वयं विश्व के आश्रय, स्वतंत्र, कमलनाभ भगवान उसके ऊपर आ गिरे।

श्लोक 38 (bhagavata.10.44.38)

तं सम्परेतं विचकर्ष भूमौहरिर्यथेभं जगतो विपश्यतः । हाहेति शब्दः सुमहांस्तदाभू-दुदीरितः सर्वजनैर्नरेन्द्र ॥ ३८ ॥

taṁ samparetaṁ vicakarṣa bhūmau harir yathebhaṁ jagato vipaśyataḥ hā heti śabdaḥ su-mahāṁs tadābhūd udīritaḥ sarva-janair narendra

हे नरेन्द्र! समस्त प्रजा के देखते-देखते, हरि ने उस मृत कंस को पृथ्वी पर वैसे ही घसीटा जैसे सिंह किसी मृत हाथी को घसीटता है; तब उपस्थित सभी लोगों में एक अत्यन्त महान हाहाकार गूँज उठा।

श्लोक 39 (bhagavata.10.44.39)

स नित्यदोद्विग्नधिया तमीश्वरंपिबन्नदन्वा विचरन् स्वपन् श्वसन् । ददर्श चक्रायुधमग्रतो यत-स्तदेव रूपं दुरवापमाप ॥ ३९ ॥

sa nityadodvigna-dhiyā tam īśvaraṁ pibann adan vā vicaran svapan śvasan dadarśa cakrāyudham agrato yatas tad eva rūpaṁ duravāpam āpa

पीते, खाते, विचरण करते, सोते और श्वास लेते हुए भी, सदा उद्विग्न चित्त से उस ईश्वर का ही चिन्तन करने वाला वह कंस, अपने सम्मुख सदा चक्रधारी उसी रूप को देखता रहता था — इसीलिए उसने वह दुर्लभ रूप-साम्य प्राप्त कर लिया।

श्लोक 40 (bhagavata.10.44.40)

तस्यानुजा भ्रातरोऽष्टौ कङ्कन्यग्रोधकादयः । अभ्यधावन्नतिक्रुद्धा भ्रातुर्निर्वेशकारिणः ॥ ४० ॥

tasyānujā bhrātaro ’ṣṭau kaṅka-nyagrodhakādayaḥ abhyadhāvann ati-kruddhā bhrātur nirveśa-kāriṇaḥ

उसके कंक, न्यग्रोधक आदि आठों छोटे भाई, अपने भाई का बदला लेने के लिए, अत्यन्त क्रोधित होकर दौड़ पड़े।

श्लोक 41 (bhagavata.10.44.41)

तथातिरभसांस्तांस्तु संयत्तान्रोहिणीसुतः । अहन् परिघमुद्यम्य पशूनिव मृगाधिपः ॥ ४१ ॥

tathāti-rabhasāṁs tāṁs tu saṁyattān rohiṇī-sutaḥ ahan parigham udyamya paśūn iva mṛgādhipaḥ

इस प्रकार अत्यन्त वेग से आते हुए और युद्ध के लिए तैयार उन सबको, रोहिणीनन्दन ने अपनी गदा उठाकर वैसे ही मार डाला जैसे सिंह पशुओं को मार डालता है।

श्लोक 42 (bhagavata.10.44.42)

नेदुर्दुन्दुभयो व्योम्नि ब्रह्मेशाद्या विभूतयः । पुष्पैः किरन्तस्तं प्रीताः शशंसुर्ननृतुः स्त्रियः ॥ ४२ ॥

nedur dundubhayo vyomni brahmeśādyā vibhūtayaḥ puṣpaiḥ kirantas taṁ prītāḥ śaśaṁsur nanṛtuḥ striyaḥ

आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं, ब्रह्मा-शिव आदि विभूतियाँ प्रसन्न होकर उन पर पुष्पों की वर्षा करने लगीं, स्तुति करने लगीं, और उनकी पत्नियाँ नाचने लगीं।

श्लोक 43 (bhagavata.10.44.43)

तेषां स्त्रियो महाराज सुहृन्मरणदुःखिताः । तत्राभीयुर्विनिघ्नन्त्यः शीर्षाण्यश्रुविलोचनाः ॥ ४३ ॥

teṣāṁ striyo mahā-rāja suhṛn-maraṇa-duḥkhitāḥ tatrābhīyur vinighnantyaḥ śīrṣāṇy aśru-vilocanāḥ

हे महाराज! उनकी पत्नियाँ अपने प्रिय पतियों की मृत्यु से दुःखी होकर, अश्रुपूरित नेत्रों से अपना सिर पीटती हुई वहाँ दौड़ी आईं।

श्लोक 44 (bhagavata.10.44.44)

शयानान्वीरशयायां पतीनालिङ्ग्य शोचतीः । विलेपुः सुस्वरं नार्यो विसृजन्त्यो मुहुः शुचः ॥ ४४ ॥

śayānān vīra-śayāyāṁ patīn āliṅgya śocatīḥ vilepuḥ su-svaraṁ nāryo visṛjantyo muhuḥ śucaḥ

वीरों की उस शय्या पर पड़े हुए अपने पतियों का आलिंगन करके शोक से भरी वे स्त्रियाँ, बारम्बार विलाप करते हुए ऊँचे स्वर में रोने लगीं।

श्लोक 45 (bhagavata.10.44.45)

हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ करुणानाथवत्सल । त्वया हतेन निहता वयं ते सगृहप्रजाः ॥ ४५ ॥

hā nātha priya dharma-jña karuṇānātha-vatsala tvayā hatena nihatā vayaṁ te sa-gṛha-prajāḥ

[स्त्रियों ने विलाप करते हुए कहा —] हाय नाथ! हाय प्रियतम! हे धर्मज्ञ! हे करुणामय, अनाथों के वत्सल स्वामी! आपके मारे जाने से हम अपने घर और सन्तान सहित भी मानो मारी ही गई हैं।

श्लोक 46 (bhagavata.10.44.46)

त्वया विरहिता पत्या पुरीयं पुरुषर्षभ । न शोभते वयमिव निवृत्तोत्सवमङ्गला ॥ ४६ ॥

tvayā virahitā patyā purīyaṁ puruṣarṣabha na śobhate vayam iva nivṛttotsava-maṅgalā

हे पुरुषश्रेष्ठ! अपने स्वामी आपसे बिछड़कर यह नगरी भी हमारे ही समान शोभाहीन हो गई है, जिसमें अब न कोई उत्सव है, न कोई मंगल।

श्लोक 47 (bhagavata.10.44.47)

अनागसां त्वं भूतानां कृतवान्द्रोहमुल्बणम् । तेनेमां भो दशां नीतो भूतध्रुक्को लभेत शम् ॥ ४७ ॥

anāgasāṁ tvaṁ bhūtānāṁ kṛtavān droham ulbaṇam tenemāṁ bho daśāṁ nīto bhūta-dhruk ko labheta śam

आपने निर्दोष प्राणियों के प्रति भीषण द्रोह किया था, और उसी के कारण आप इस दशा को प्राप्त हुए हैं; जो प्राणियों का द्रोही होता है, उसे भला शान्ति कहाँ मिलती है?

श्लोक 48 (bhagavata.10.44.48)

सर्वेषामिह भूतानामेष हि प्रभवाप्ययः । गोप्ता च तदवध्यायी न क्वचित्सुखमेधते ॥ ४८ ॥

sarveṣām iha bhūtānām eṣa hi prabhavāpyayaḥ goptā ca tad-avadhyāyī na kvacit sukham edhate

इस संसार में समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और लय इन्हीं से होती है, और यही उनके पालक भी हैं; जो इनकी अवहेलना करता है, वह कहीं भी सुखपूर्वक फल-फूल नहीं सकता।

श्लोक 49 (bhagavata.10.44.49)

श्रीशुक उवाच राजयोषित आश्वास्य भगवाँल्लोकभावनः । यामाहुर्लौकिकीं संस्थां हतानां समकारयत् ॥ ४९ ॥

śrī-śuka uvāca rāja-yoṣita āśvāsya bhagavāḻ loka-bhāvanaḥ yām āhur laukikīṁ saṁsthāṁ hatānāṁ samakārayat

शुकदेव जी ने कहा — लोकों का पालन करने वाले भगवान ने राजपत्नियों को धैर्य बँधाकर, हतों का वह लौकिक अन्त्येष्टि-संस्कार करवाया जो शास्त्रोक्त था।

श्लोक 50 (bhagavata.10.44.50)

मातरं पितरं चैव मोचयित्वाथ बन्धनात् । कृष्णरामौ ववन्दाते शिरसा स्पृश्य पादयोः ॥ ५० ॥

mātaraṁ pitaraṁ caiva mocayitvātha bandhanāt kṛṣṇa-rāmau vavandāte śirasā spṛśya pādayoḥ

तत्पश्चात् अपनी माता और पिता को बन्धन से मुक्त कराकर, कृष्ण और राम ने उनके चरणों को सिर से स्पर्श करते हुए उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 51 (bhagavata.10.44.51)

देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय जगदीश्वरौ । कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शङ्कितौ ॥ ५१ ॥

devakī vasudevaś ca vijñāya jagad-īśvarau kṛta-saṁvandanau putrau sasvajāte na śaṅkitau

देवकी और वसुदेव, अपने दोनों पुत्रों को साक्षात् जगदीश्वर जानकर, प्रणाम स्वीकार करने पर भी, भय के कारण उन्हें आलिंगन में न ले सके।

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