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दशम स्कन्ध · अध्याय 45

कृष्ण द्वारा गुरुपुत्र की वापसी

अध्याय 44अध्याय-सूचीअध्याय 46

श्लोक 1 (bhagavata.10.45.1)

श्रीशुक उवाच पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः । मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca pitarāv upalabdhārthau viditvā puruṣottamaḥ mā bhūd iti nijāṁ māyāṁ tatāna jana-mohinīm

शुकदेव जी ने कहा — यह जानकर कि माता-पिता को अब यथार्थ ज्ञान हो गया है, पुरुषोत्तम भगवान ने "ऐसा न हो" यह सोचकर अपनी ही जनमोहिनी माया का विस्तार कर दिया।

श्लोक 2 (bhagavata.10.45.2)

उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वतर्षभः । प्रश्रयावनतः प्रीणन्नम्ब तातेति सादरम् ॥ २ ॥

uvāca pitarāv etya sāgrajaḥ sātvatarṣabhaḥ praśrayāvanataḥ prīṇann amba tāteti sādaram

अपने माता-पिता के पास जाकर, अग्रज सहित सात्वतश्रेष्ठ ने विनम्रतापूर्वक झुककर, उन्हें प्रसन्न करते हुए आदरपूर्वक "माँ", "पिताजी" कहकर सम्बोधित किया।

श्लोक 3 (bhagavata.10.45.3)

नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि । बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामभवन्क्वचित् ॥ ३ ॥

nāsmatto yuvayos tāta nityotkaṇṭhitayor api bālya-paugaṇḍa-kaiśorāḥ putrābhyām abhavan kvacit

[कृष्ण ने कहा —] हे तात! हमारे कारण, सदा उत्कण्ठित रहते हुए भी, आप दोनों को अपने पुत्रों से बाल्य, पौगण्ड और कैशोर अवस्था का सुख कभी न मिला।

श्लोक 4 (bhagavata.10.45.4)

न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके । यां बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम् ॥ ४ ॥

na labdho daiva-hatayor vāso nau bhavad-antike yāṁ bālāḥ pitṛ-geha-sthā vindante lālitā mudam

दैव के आघात से हमें आपके निकट रहने का अवसर ही न मिला — वह सुख जो पिता के घर में पले-बढ़े बालक पाते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.10.45.5)

सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः । न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा ॥ ५ ॥

sarvārtha-sambhavo deho janitaḥ poṣito yataḥ na tayor yāti nirveśaṁ pitror martyaḥ śatāyuṣā

यह शरीर, जिससे मनुष्य के समस्त प्रयोजन सिद्ध होते हैं, उन्हीं के द्वारा उत्पन्न और पोषित होता है; सौ वर्ष जीकर भी मनुष्य माता-पिता के इस ऋण से उऋण नहीं हो पाता।

श्लोक 6 (bhagavata.10.45.6)

यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च । वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ॥ ६ ॥

yas tayor ātmajaḥ kalpa ātmanā ca dhanena ca vṛttiṁ na dadyāt taṁ pretya sva-māṁsaṁ khādayanti hi

जो समर्थ पुत्र अपने शरीर और धन से माता-पिता का भरण-पोषण नहीं करता, उसे मृत्यु के पश्चात् अपना ही मांस खाना पड़ता है।

श्लोक 7 (bhagavata.10.45.7)

मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम् । गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः ॥ ७ ॥

mātaraṁ pitaraṁ vṛddhaṁ bhāryāṁ sādhvīṁ sutam śiśum guruṁ vipraṁ prapannaṁ ca kalpo ’bibhrac chvasan-mṛtaḥ

जो अपनी वृद्ध माता, पिता, पतिव्रता पत्नी, शिशु सन्तान, गुरु, ब्राह्मण अथवा शरणागत का भरण-पोषण नहीं करता, वह श्वास लेते हुए भी मृतक के समान है।

श्लोक 8 (bhagavata.10.45.8)

तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः । मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः ॥ ८ ॥

tan nāv akalpayoḥ kaṁsān nityam udvigna-cetasoḥ mogham ete vyatikrāntā divasā vām anarcatoḥ

इस प्रकार आपकी सेवा न कर पाने के कारण, कंस के भय से सदा उद्विग्न-चित्त रहते हुए, आप दोनों का सम्मान किए बिना ही हमारे ये दिन व्यर्थ बीत गए।

श्लोक 9 (bhagavata.10.45.9)

तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः । अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदा भृशम् ॥ ९ ॥

tat kṣantum arhathas tāta mātar nau para-tantrayoḥ akurvator vāṁ śuśrūṣāṁ kliṣṭayor durhṛdā bhṛśam

अतः हे तात, हे माता! हमें क्षमा कीजिए, जो पराधीन रहे और उस दुष्ट-हृदय व्यक्ति द्वारा अत्यन्त सताए जाने के कारण आपकी सेवा न कर सके।

श्लोक 10 (bhagavata.10.45.10)

श्रीशुक उवाच इति मायामनुष्यस्य हरेर्विश्वात्मनो गिरा । मोहितावङ्कमारोप्य परिष्वज्यापतुर्मुदम् ॥ १० ॥

śrī-śuka uvāca iti māyā-manuṣyasya harer viśvātmano girā mohitāv aṅkam āropya pariṣvajyāpatur mudam

शुकदेव जी ने कहा — मायामय मनुष्य-रूप धारण किए हुए विश्वात्मा हरि के इन वचनों से इस प्रकार मोहित होकर, माता-पिता ने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें गोद में बिठाकर आलिंगन किया।

श्लोक 11 (bhagavata.10.45.11)

सिञ्चन्तावश्रुधाराभिः स्नेहपाशेन चावृतौ । न किञ्चिदूचतू राजन्बाष्पकण्ठौ विमोहितौ ॥ ११ ॥

siñcantāv aśru-dhārābhiḥ sneha-pāśena cāvṛtau na kiñcid ūcatū rājan bāṣpa-kaṇṭhau vimohitau

अश्रुधाराओं से उन्हें सिंचित करते हुए, स्नेह के पाश में बँधे हुए, हे राजन्! वे मोहित और गद्गद्कण्ठ होकर कुछ भी न कह सके।

श्लोक 12 (bhagavata.10.45.12)

एवमाश्वास्य पितरौ भगवान्देवकीसुतः । मातामहं तूग्रसेनं यदूनामकरोन्नृपम् ॥ १२ ॥

evam āśvāsya pitarau bhagavān devakī-sutaḥ mātāmahaṁ tūgrasenaṁ yadūnām akaron ṇṛpam

इस प्रकार माता-पिता को सान्त्वना देकर देवकीनन्दन भगवान ने अपने नाना उग्रसेन को यदुवंश का राजा बना दिया।

श्लोक 13 (bhagavata.10.45.13)

आह चास्मान् महाराज प्रजाश्चाज्ञप्तुमर्हसि । ययातिशापाद् यदुभिर्नासितव्यं नृपासने ॥ १३ ॥

āha cāsmān mahā-rāja prajāś cājñaptum arhasi yayāti-śāpād yadubhir nāsitavyaṁ nṛpāsane

और उन्होंने कहा — हे महाराज! आपको हम प्रजाजनों को आज्ञा देनी चाहिए; क्योंकि ययाति के शाप के कारण यदुवंशियों को राजसिंहासन पर बैठने का अधिकार नहीं है।

श्लोक 14 (bhagavata.10.45.14)

मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः । बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः ॥ १४ ॥

mayi bhṛtya upāsīne bhavato vibudhādayaḥ baliṁ haranty avanatāḥ kim utānye narādhipāḥ

जब मैं स्वयं ही आपके सेवक के रूप में यहाँ उपस्थित रहूँगा, तो देवता आदि भी झुककर आपको भेंट अर्पित करेंगे — फिर अन्य राजाओं की तो बात ही क्या!

श्लोक 15 (bhagavata.10.45.15)

सर्वान्स्वान्ज्ञतिसम्बन्धान्दिग्भ्यः कंसभयाकुलान् । यदुवृष्ण्यन्धकमधुदाशार्हकुकुरादिकान् ॥ १५ ॥

sarvān svān jñati-sambandhān digbhyaḥ kaṁsa-bhayākulān yadu-vṛṣṇy-andhaka-madhu dāśārha-kukurādikān

कंस के भय से व्याकुल होकर दिशा-दिशा में बिखरे हुए अपने समस्त ज्ञातिजनों और सम्बन्धियों को — यदु, वृष्णि, अन्धक, मधु, दाशार्ह, कुकुर आदि सभी को —

श्लोक 16 (bhagavata.10.45.16)

सभाजितान् समाश्वास्य विदेशावासकर्शितान् । न्यवासयत् स्वगेहेषु वित्तैः सन्तर्प्य विश्वकृत् ॥ १६ ॥

sabhājitān samāśvāsya videśāvāsa-karśitān nyavāsayat sva-geheṣu vittaiḥ santarpya viśva-kṛt

— इन सबका सम्मान और सान्त्वना करके, विदेश-निवास से क्लान्त हुए उन सबको, विश्वकर्ता भगवान ने धन से संतुष्ट करते हुए पुनः उनके अपने-अपने घरों में बसाया।

श्लोक 17 (bhagavata.10.45.17)

कृष्णसङ्कर्षणभुजैर्गुप्ता लब्धमनोरथाः । गृहेषु रेमिरे सिद्धाः कृष्णरामगतज्वराः ॥ १७ ॥

kṛṣṇa-saṅkarṣaṇa-bhujair guptā labdha-manorathāḥ gṛheṣu remire siddhāḥ kṛṣṇa-rāma-gata-jvarāḥ

कृष्ण और संकर्षण की भुजाओं से रक्षित, अपने मनोरथों को प्राप्त करके, वे सिद्ध होकर अपने घरों में सुखपूर्वक रहने लगे, कृष्ण और राम के प्रताप से उनका सन्ताप सदा के लिए मिट गया।

श्लोक 18 (bhagavata.10.45.18)

वीक्षन्तोऽहरहः प्रीता मुकुन्दवदनाम्बुजम् । नित्यं प्रमुदितं श्रीमत्सदयस्मितवीक्षणम् ॥ १८ ॥

vīkṣanto ’har ahaḥ prītā mukunda-vadanāmbujam nityaṁ pramuditaṁ śrīmat sa-daya-smita-vīkṣaṇam

— प्रतिदिन प्रेमपूर्वक मुकुन्द के उस सदा प्रफुल्लित, कान्तिमय, करुणा और मृदु मुस्कान से युक्त चितवन वाले कमल-मुख को निहारते हुए।

श्लोक 19 (bhagavata.10.45.19)

तत्र प्रवयसोऽप्यासन् युवानोऽतिबलौजसः । पिबन्तोऽक्षैर्मुकुन्दस्य मुखाम्बुजसुधां मुहुः ॥ १९ ॥

tatra pravayaso ’py āsan yuvāno ’ti-balaujasaḥ pibanto ’kṣair mukundasya mukhāmbuja-sudhāṁ muhuḥ

वहाँ वृद्धजन भी युवा-से प्रतीत होते थे, अत्यन्त बल और ओज से युक्त, क्योंकि वे अपने नेत्रों से मुकुन्द के मुख-कमल के अमृत का बारम्बार पान करते थे।

श्लोक 20 (bhagavata.10.45.20)

अथ नन्दं समसाद्य भगवान् देवकीसुतः । सङ्कर्षणश्च राजेन्द्र परिष्वज्येदमूचतुः ॥ २० ॥

atha nandaṁ samasādya bhagavān devakī-sutaḥ saṅkarṣaṇaś ca rājendra pariṣvajyedam ūcatuḥ

तत्पश्चात्, हे राजेन्द्र! देवकीनन्दन भगवान ने संकर्षण सहित नन्द के पास जाकर उनका आलिंगन किया और यह कहा।

श्लोक 21 (bhagavata.10.45.21)

पितर्युवाभ्यां स्निग्धाभ्यां पोषितौ लालितौ भृशम् । पित्रोरभ्यधिका प्रीतिरात्मजेष्वात्मनोऽपि हि ॥ २१ ॥

pitar yuvābhyāṁ snigdhābhyāṁ poṣitau lālitau bhṛśam pitror abhyadhikā prītir ātmajeṣv ātmano ’pi hi

[उन्होंने कहा —] हे तात! आप दोनों ने स्नेहवश हमारा इतना कोमल पालन-पोषण किया! वस्तुतः माता-पिता का अपनी सन्तान के प्रति प्रेम उनके अपने प्रति प्रेम से भी बढ़कर होता है।

श्लोक 22 (bhagavata.10.45.22)

स पिता सा च जननी यौ पुष्णीतां स्वपुत्रवत् । शिशून् बन्धुभिरुत्सृष्टानकल्पैः पोषरक्षणे ॥ २२ ॥

sa pitā sā ca jananī yau puṣṇītāṁ sva-putra-vat śiśūn bandhubhir utsṛṣṭān akalpaiḥ poṣa-rakṣaṇe

वही सच्चा पिता है और वही सच्ची माता, जो उन शिशुओं को, जिन्हें उनके सम्बन्धी पालन-रक्षण में असमर्थ होकर त्याग देते हैं, अपने ही पुत्रों के समान पालते हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.10.45.23)

यात यूयं व्रजं तात वयं च स्नेहदुःखितान् । ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम् ॥ २३ ॥

yāta yūyaṁ vrajaṁn tāta vayaṁ ca sneha-duḥkhitān jñātīn vo draṣṭum eṣyāmo vidhāya suhṛdāṁ sukham

हे तात! अब आप व्रज को लौट जाइए; और हम अपने सुहृदों को सुख प्रदान करने के पश्चात्, स्नेहवश दुःखी अपने सभी बन्धुजनों को देखने आएँगे।

श्लोक 24 (bhagavata.10.45.24)

एवं सान्त्वय्य भगवान् नन्दं सव्रजमच्युतः । वासोऽलङ्कारकुप्याद्यैरर्हयामास सादरम् ॥ २४ ॥

evaṁ sāntvayya bhagavān nandaṁ sa-vrajam acyutaḥ vāso-’laṅkāra-kupyādyair arhayām āsa sādaram

इस प्रकार नन्द और सम्पूर्ण व्रजवासियों को सान्त्वना देकर, अच्युत भगवान ने वस्त्र, आभूषण, गृहोपकरण आदि से आदरपूर्वक उनका सत्कार किया।

श्लोक 25 (bhagavata.10.45.25)

इत्युक्तस्तौ परिष्वज्य नन्दः प्रणयविह्वलः । पूरयन्नश्रुभिर्नेत्रे सह गोपैर्व्रजं ययौ ॥ २५ ॥

ity uktas tau pariṣvajya nandaḥ praṇaya-vihvalaḥ pūrayann aśrubhir netre saha gopair vrajaṁ yayau

इस प्रकार सम्बोधित होकर नन्द, स्नेह से विह्वल हो उठे, और अश्रुपूर्ण नेत्रों से उन दोनों का आलिंगन करके गोपों सहित व्रज को चले गए।

श्लोक 26 (bhagavata.10.45.26)

अथ शूरसुतो राजन् पुत्रयोः समकारयत् । पुरोधसा ब्राह्मणैश्च यथावद् द्विजसंस्कृतिम् ॥ २६ ॥

atha śūra-suto rājan putrayoḥ samakārayat purodhasā brāhmaṇaiś ca yathāvad dvija-saṁskṛtim

तत्पश्चात्, हे राजन्! शूरसेन के पुत्र वसुदेव ने पुरोहित तथा अन्य ब्राह्मणों द्वारा अपने दोनों पुत्रों का विधिवत् द्विज-संस्कार करवाया।

श्लोक 27 (bhagavata.10.45.27)

तेभ्योऽदाद्दक्षिणा गावो रुक्ममालाः स्वलङ्कृताः । स्वलङ्कृतेभ्यः सम्पूज्य सवत्साः क्षौममालिनीः ॥ २७ ॥

tebhyo ’dād dakṣiṇā gāvo rukma-mālāḥ sv-alaṅkṛtāḥ sv-alaṅkṛtebhyaḥ sampūjya sa-vatsāḥ kṣauma-mālinīḥ

उन्हें दक्षिणा में स्वर्ण-मालाओं से सुसज्जित गौएँ दीं; तथा सुसज्जित ब्राह्मणों का पूजन करके, बछड़ों सहित तथा वस्त्र-मालाओं से युक्त गौएँ भी अर्पित कीं।

श्लोक 28 (bhagavata.10.45.28)

याः कृष्णरामजन्मर्क्षे मनोदत्ता महामतिः । ताश्चाददादनुस्मृत्य कंसेनाधर्मतो हृताः ॥ २८ ॥

yāḥ kṛṣṇa-rāma-janmarkṣe mano-dattā mahā-matiḥ tāś cādadād anusmṛtya kaṁsenādharmato hṛtāḥ

तथा महामति वसुदेव ने कृष्ण और राम के जन्म-नक्षत्र के समय मन ही मन संकल्पित की गई उन गौओं का, जिन्हें कंस ने अधर्मपूर्वक हर लिया था, स्मरण करके, उन्हें भी पुनः प्राप्त कर दान में दे दिया।

श्लोक 29 (bhagavata.10.45.29)

ततश्च लब्धसंस्कारौ द्विजत्वं प्राप्य सुव्रतौ । गर्गाद् यदुकुलाचार्याद्गायत्रं व्रतमास्थितौ ॥ २९ ॥

tataś ca labdha-saṁskārau dvijatvaṁ prāpya su-vratau gargād yadu-kulācāryād gāyatraṁ vratam āsthitau

तत्पश्चात् इन संस्कारों को प्राप्त कर द्विजत्व को प्राप्त, सुव्रत उन दोनों ने यदुवंश के आचार्य गर्ग मुनि से गायत्री-व्रत ग्रहण किया।

श्लोक 30 (bhagavata.10.45.30)

प्रभवौ सर्वविद्यानां सर्वज्ञौ जगदीश्वरौ । नान्यसिद्धामलं ज्ञानं गूहमानौ नरेहितैः ॥ ३० ॥

prabhavau sarva-vidyānāṁ sarva-jñau jagad-īśvarau nānya-siddhāmalaṁ jñānaṁ gūhamānau narehitaiḥ

विश्व के दोनों ईश्वर, समस्त विद्याओं के उद्गम, सर्वज्ञ होते हुए भी, मनुष्यों जैसे आचरण से अपने अनन्य-सिद्ध, निर्मल ज्ञान को छिपाए रखते थे।

श्लोक 31 (bhagavata.10.45.31)

अथो गुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतुः । काश्यं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तिपुरवासिनम् ॥ ३१ ॥

atho gurukule vāsam icchantāv upajagmatuḥ kāśyaṁ sāndīpaniṁ nāma hy avanti-pura-vāsinam

तत्पश्चात् गुरुकुल में निवास की इच्छा से वे दोनों काशीवासी सान्दीपनि नामक मुनि के पास गए, जो अवन्तिपुरी में निवास करते थे।

श्लोक 32 (bhagavata.10.45.32)

यथोपसाद्य तौ दान्तौ गुरौ वृत्तिमनिन्दिताम् । ग्राहयन्तावुपेतौ स्म भक्त्या देवमिवादृतौ ॥ ३२ ॥

yathopasādya tau dāntau gurau vṛttim aninditām grāhayantāv upetau sma bhaktyā devam ivādṛtau

इस प्रकार उनके पास पहुँचकर, संयमी उन दोनों ने गुरु की निर्दोष सेवा को स्वीकार किया, तथा भक्तिपूर्वक उनका पूजन ऐसे किया मानो वे साक्षात् देवता ही हों।

श्लोक 33 (bhagavata.10.45.33)

तयोर्द्विजवरस्तुष्टः शुद्धभावानुवृत्तिभिः । प्रोवाच वेदानखिलान्सङ्गोपनिषदो गुरुः ॥ ३३ ॥

tayor dvija-varas tuṣṭaḥ śuddha-bhāvānuvṛttibhiḥ provāca vedān akhilān sāṅgopaniṣado guruḥ

उनके शुद्ध और अनुगत आचरण से प्रसन्न होकर, उन दोनों के द्विजश्रेष्ठ गुरु ने उन्हें अंगों और उपनिषदों सहित समस्त वेदों का उपदेश दिया।

श्लोक 34 (bhagavata.10.45.34)

सरहस्यं धनुर्वेदं धर्मान् न्यायपथांस्तथा । तथा चान्वीक्षिकीं विद्यां राजनीतिं च षड्विधाम् ॥ ३४ ॥

sa-rahasyaṁ dhanur-vedaṁ dharmān nyāya-pathāṁs tathā tathā cānvīkṣikīṁ vidyāṁ rāja-nītiṁ ca ṣaḍ-vidhām

तथा रहस्य सहित धनुर्वेद, धर्मशास्त्र और न्याय के मार्ग, आन्वीक्षिकी विद्या, तथा षड्विध राजनीति का भी उपदेश दिया।

श्लोक 35 (bhagavata.10.45.35)

सर्वं नरवरश्रेष्ठौ सर्वविद्याप्रवर्तकौ । सकृन्निगदमात्रेण तौ सञ्जगृहतुर्नृप ॥ ३५ ॥

sarvaṁ nara-vara-śreṣṭhau sarva-vidyā-pravartakau sakṛn nigada-mātreṇa tau sañjagṛhatur nṛpa

हे राजन्! समस्त विद्याओं के प्रवर्तक वे दोनों नरश्रेष्ठ, केवल एक ही बार कहे जाने मात्र से सब कुछ पूर्णतः ग्रहण कर लेते थे।

श्लोक 36 (bhagavata.10.45.36)

अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या संयत्तौ तावतीः कलाः । गुरुदक्षिणयाचार्यं छन्दयामासतुर्नृप ॥ ३६ ॥

aho-rātraiś catuḥ-ṣaṣṭyā saṁyattau tāvatīḥ kalāḥ guru-dakṣiṇayācāryaṁ chandayām āsatur nṛpa

चौंसठ दिन-रात्रियों में उन्होंने उतनी ही कलाओं को सिद्ध कर लिया, और हे राजन्! तत्पश्चात् गुरु-दक्षिणा देने हेतु आचार्य से अपनी इच्छा बताने का अनुरोध किया।

श्लोक 37 (bhagavata.10.45.37)

द्विजस्तयोस्तं महिमानमद्भुतं संलक्ष्य राजन्नतिमानुषीं मतिम् । सम्मन्त्र्य पत्न्या स महार्णवे मृतं बालं प्रभासे वरयां बभूव ह ॥ ३७ ॥

dvijas tayos taṁ mahimānam adbhutaṁ saṁlokṣya rājann ati-mānusīṁ matim sammantrya patnyā sa mahārṇave mṛtaṁ bālaṁ prabhāse varayāṁ babhūva ha

हे राजन्! उन दोनों की उस अद्भुत महिमा और अलौकिक बुद्धि को देखकर, उस ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से परामर्श करके, प्रभास के महासागर में मृत अपने बालक-पुत्र को ही वर के रूप में माँगा।

श्लोक 38 (bhagavata.10.45.38)

तथेत्यथारुह्य महारथौ रथं प्रभासमासाद्य दुरन्तविक्रमौ । वेलामुपव्रज्य निषीदतुः क्षणं सिन्धुर्विदित्वार्हणमाहरत्तयोः ॥ ३८ ॥

tethety athāruhya mahā-rathau rathaṁ prabhāsam āsādya duranta-vikramau velām upavrajya niṣīdatuḥ kṣanaṁ sindhur viditvārhanam āharat tayoḥ

"ऐसा ही हो" कहकर, अपार पराक्रमी वे दोनों महारथी रथ पर सवार होकर प्रभास पहुँचे, तट के निकट जाकर क्षणभर बैठे, तभी समुद्र ने उन्हें पहचानकर उनके लिए अर्घ्य-सामग्री उपस्थित की।

श्लोक 39 (bhagavata.10.45.39)

तमाह भगवानाशु गुरुपुत्रः प्रदीयताम् । योऽसाविह त्वया ग्रस्तो बालको महतोर्मिणा ॥ ३९ ॥

tam āha bhagavān āśu guru-putraḥ pradīyatām yo ’sāv iha tvayā grasto bālako mahatormiṇā

भगवान ने उससे तुरन्त कहा — गुरुपुत्र को शीघ्र लौटा दो, जिसे आपने यहाँ अपनी विशाल लहरों में निगल लिया था।

श्लोक 40 (bhagavata.10.45.40)

श्रीसमुद्र उवाच न चाहार्षमहं देव दैत्यः पञ्चजनो महान् । अन्तर्जलचरः कृष्ण शङ्खरूपधरोऽसुरः ॥ ४० ॥

śrī-samudra uvāca na cāhārṣam ahaṁ deva daityaḥ pañcajano mahān antar-jala-caraḥ kṛṣṇa śaṅkha-rūpa-dharo ’suraḥ

श्री समुद्र ने कहा — हे देव! मैंने उसे नहीं लिया; हे कृष्ण! शंख का रूप धारण करने वाला पंचजन नामक एक महान दैत्य जल के भीतर निवास करता है, उसी ने उसे लिया है।

श्लोक 41 (bhagavata.10.45.41)

आस्ते तेनाहृतो नूनं तच्छ्रुत्वा सत्वरं प्रभुः । जलमाविश्य तं हत्वा नापश्यदुदरेऽर्भकम् ॥ ४१ ॥

āste tenāhṛto nūnaṁ tac chrutvā satvaraṁ prabhuḥ jalam āviśya taṁ hatvā nāpaśyad udare ’rbhakam

"निश्चय ही वह उसी के द्वारा हरा गया है" — यह सुनकर प्रभु ने तुरन्त जल में प्रवेश कर उसका वध कर दिया, परन्तु उसके उदर में उस बालक को न पाया।

श्लोक 42 (bhagavata.10.45.42)

तदङ्गप्रभवं शङ्खमादाय रथमागमत् । ततः संयमनीं नाम यमस्य दयितां पुरीम् ॥ ४२ ॥

tad-aṅga-prabhavaṁ śaṅkham ādāya ratham āgamat tataḥ saṁyamanīṁ nāma yamasya dayitāṁ purīm

उस असुर के शरीर से उत्पन्न शंख को लेकर वे रथ पर लौट आए; तत्पश्चात् वे संयमनी नामक यम की प्रिय नगरी को गए।

श्लोक 43 (bhagavata.10.45.43)

गत्वा जनार्दनः शङ्खं प्रदध्मौ सहलायुधः । शङ्खनिर्ह्रादमाकर्ण्य प्रजासंयमनो यमः ॥ ४३ ॥

gatvā janārdanaḥ śaṅkhaṁ pradadhmau sa-halāyudhaḥ śaṅkha-nirhrādam ākarṇya prajā-saṁyamano yamaḥ

वहाँ पहुँचकर हलायुध सहित जनार्दन ने उस शंख को फूँका; तब प्रजा के संयमनकर्ता यम ने उस शंख-ध्वनि को सुनकर —

श्लोक 44 (bhagavata.10.45.44)

तयोः सपर्यां महतीं चक्रे भक्त्युपबृंहिताम् । उवाचावनतः कृष्णं सर्वभूताशयालयम् । लीलामनुष्ययोर्विष्णो युवयोः करवाम किम् ॥ ४४ ॥

tayoḥ saparyāṁ mahatīṁ cakre bhakty-upabṛṁhitām uvācāvanataḥ kṛṣṇaṁ sarva-bhūtāśayālayam līlā-manuṣyayor viṣṇo yuvayoḥ karavāma kim

— उन दोनों की भक्तिपूर्ण महती पूजा की, और समस्त प्राणियों के हृदय के आश्रयस्वरूप कृष्ण के सम्मुख झुककर कहा — हे विष्णो! आप दोनों मनुष्य-लीला कर रहे हैं, मैं आपके लिए क्या करूँ?

श्लोक 45 (bhagavata.10.45.45)

श्रीभगवानुवाच गुरुपुत्रमिहानीतं निजकर्मनिबन्धनम् । आनयस्व महाराज मच्छासनपुरस्कृतः ॥ ४५ ॥

śrī-bhagavān uvāca guru-putram ihānītaṁ nija-karma-nibandhanam ānayasva mahā-rāja mac-chāsana-puraskṛtaḥ

श्री भगवान ने कहा — हे महाराज! मेरी आज्ञा को स्वीकार कर, अपने ही पूर्वकर्म के बन्धन से यहाँ लाए गए गुरुपुत्र को ले आइए।

श्लोक 46 (bhagavata.10.45.46)

तथेति तेनोपानीतं गुरुपुत्रं यदूत्तमौ । दत्त्वा स्वगुरवे भूयो वृणीष्वेति तमूचतुः ॥ ४६ ॥

tatheti tenopānītaṁ guru-putraṁ yadūttamau dattvā sva-gurave bhūyo vṛṇīṣveti tam ūcatuḥ

"ऐसा ही हो" कहकर यम ने गुरुपुत्र को ले आए; और दोनों यदुश्रेष्ठों ने उसे अपने गुरु को सौंपकर कहा — "अब पुनः वर माँगिए।"

श्लोक 47 (bhagavata.10.45.47)

श्रीगुरुरुवाच सम्यक् सम्पादितो वत्स भवद्भयां गुरुनिष्क्रयः । को नु युष्मद्विधगुरोः कामानामवशिष्यते ॥ ४७ ॥

śrī-gurur uvāca samyak sampādito vatsa bhavadbhyāṁ guru-niṣkrayaḥ ko nu yuṣmad-vidha-guroḥ kāmānām avaśiṣyate

श्री गुरु ने कहा — हे वत्सो! तुम दोनों ने गुरु-दक्षिणा भलीभाँति चुका दी है; तुम्हारे जैसे शिष्यों वाले गुरु के लिए भला कौन-सी इच्छा शेष रह जाती है?

श्लोक 48 (bhagavata.10.45.48)

गच्छतं स्वगृहं वीरौ कीर्तिर्वामस्तु पावनी । छन्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च ॥ ४८ ॥

gacchataṁ sva-gṛhaṁ vīrau kīrtir vām astu pāvanī chandāṁsy ayāta-yāmāni bhavantv iha paratra ca

हे वीरो! अब अपने घर जाओ; तुम्हारी कीर्ति पवित्र करने वाली हो, और वेद-मन्त्र इस लोक तथा परलोक में सदा ताज़े और अक्षुण्ण बने रहें।

श्लोक 49 (bhagavata.10.45.49)

गुरुणैवमनुज्ञातौ रथेनानिलरंहसा । आयातौ स्वपुरं तात पर्जन्यनिनदेन वै ॥ ४९ ॥

guruṇaivam anujñātau rathenānila-raṁhasā āyātau sva-puraṁ tāta parjanya-ninadena vai

हे तात! इस प्रकार गुरु से अनुमति पाकर, वे दोनों वायु के समान वेगवान तथा मेघ-गर्जना के समान ध्वनि करने वाले रथ पर सवार होकर अपने नगर लौट आए।

श्लोक 50 (bhagavata.10.45.50)

समनन्दन् प्रजाः सर्वा दृष्ट्वा रामजनार्दनौ । अपश्यन्त्यो बह्वहानि नष्टलब्धधना इव ॥ ५० ॥

samanandan prajāḥ sarvā dṛṣṭvā rāma-janārdanau apaśyantyo bahv ahāni naṣṭa-labdha-dhanā iva

बहुत दिनों तक न देख पाने के बाद राम और जनार्दन को देखकर समस्त प्रजा ऐसे आनन्दित हुई, मानो खोया हुआ धन पुनः प्राप्त कर लिया हो।

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