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दशम स्कन्ध · अध्याय 46

उद्धव का वृन्दावन आगमन

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (bhagavata.10.46.1)

श्रीशुक उवाच वृष्णीनां प्रवरो मन्त्री कृष्णस्य दयितः सखा । शिष्यो बृहस्पतेः साक्षादुद्धवो बुद्धिसत्तमः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca vṛṣṇīnāṁ pravaro mantrī kṛṣṇasya dayitaḥ sakhā śiṣyo bṛhaspateḥ sākṣād uddhavo buddhi-sattamaḥ

श्रीशुकदेव ने कहा — उद्धव वृष्णिवंशियों में श्रेष्ठ मंत्री, कृष्ण के प्रिय सखा और साक्षात् बृहस्पति के शिष्य थे; वे सर्वाधिक बुद्धिमान थे।

श्लोक 2 (bhagavata.10.46.2)

तमाह भगवान्प्रेष्ठं भक्तमेकान्तिनं क्वचित् । गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रपन्नार्तिहरो हरिः ॥ २ ॥

tam āha bhagavān preṣṭhaṁ bhaktam ekāntinaṁ kvacit gṛhītvā pāṇinā pāṇiṁ prapannārti-haro hariḥ

एक बार भगवान हरि, जो शरणागतों के दुःख हरने वाले हैं, ने अपने अत्यंत प्रिय और अनन्य भक्त उद्धव का हाथ अपने हाथ में लेकर उनसे कहा।

श्लोक 3 (bhagavata.10.46.3)

गच्छोद्धव व्रजं सौम्य पित्रोर्नौ प्रीतिमावह । गोपीनां मद्वियोगाधिं मत्सन्देशैर्विमोचय ॥ ३ ॥

gacchoddhava vrajaṁ saumya pitror nau prītim āvaha gopīnāṁ mad-viyogādhiṁ mat-sandeśair vimocaya

हे सौम्य उद्धव! तुम व्रज जाओ और हमारे माता-पिता को संतोष पहुँचाओ। मेरे संदेश द्वारा गोपियों को मेरे वियोग की पीड़ा से मुक्त करो।

श्लोक 4 (bhagavata.10.46.4)

ता मन्मनस्का मत्प्राणा मतर्थे त्यक्तदैहिकाः । मामेव दयितं प्रेष्ठमात्मानं मनसा गताः । ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे तान्बिभर्म्यहम् ॥ ४ ॥

tā man-manaskā mat-prāṇā mat-arthe tyakta-daihikāḥ mām eva dayitaṁ preṣṭham ātmānaṁ manasā gatāḥ ye tyakta-loka-dharmāś ca mad-arthe tān bibharmy aham

उनके मन सदा मुझमें लगे रहते हैं, उनका प्राण भी मैं ही हूँ; मेरे लिए उन्होंने देह-संबंधी सभी सुखों का त्याग कर दिया है। वे मुझे ही अपना प्रिय, अपना प्रियतम और अपना आत्मा मानकर मन से मुझमें ही लीन रहती हैं। जिन्होंने मेरे लिए लोक-धर्म तक त्याग दिया, उनका भरण-पोषण मैं स्वयं करता हूँ।

श्लोक 5 (bhagavata.10.46.5)

मयि ताः प्रेयसां प्रेष्ठे दूरस्थे गोकुलस्त्रियः । स्मरन्त्योऽङ्ग विमुह्यन्ति विरहौत्कण्ठ्यविह्वलाः ॥ ५ ॥

mayi tāḥ preyasāṁ preṣṭhe dūra-sthe gokula-striyaḥ smarantyo ’ṅga vimuhyanti virahautkaṇṭhya-vihvalāḥ

हे उद्धव! मैं ही उन गोकुल की स्त्रियों के लिए सबसे प्रिय हूँ, फिर भी मैं दूर हूँ; मुझे स्मरण करते हुए वे वियोग की व्याकुलता से मूर्च्छित हो जाती हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.10.46.6)

धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कथञ्चन । प्रत्यागमनसन्देशैर्बल्लव्यो मे मदात्मिकाः ॥ ६ ॥

dhārayanty ati-kṛcchreṇa prāyaḥ prāṇān kathañcana pratyāgamana-sandeśair ballavyo me mad-ātmikāḥ

मेरी वे सर्वात्मना समर्पित गोपियाँ केवल मेरे लौट आने के आश्वासन के सहारे बड़ी कठिनाई से किसी प्रकार अपने प्राण धारण किए हुए हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.46.7)

श्रीशुक उवाच इत्युक्त उद्धवो राजन्सन्देशं भर्तुरादृतः । आदाय रथमारुह्य प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥ ७ ॥

śrī-śuka uvāca ity ukta uddhavo rājan sandeśaṁ bhartur ādṛtaḥ ādāya ratham āruhya prayayau nanda-gokulam

श्रीशुकदेव ने कहा — हे राजन्! इस प्रकार आज्ञा पाकर उद्धव ने अपने स्वामी के संदेश को आदरपूर्वक ग्रहण किया और रथ पर सवार होकर नन्द के गोकुल की ओर चल पड़े।

श्लोक 8 (bhagavata.10.46.8)

प्राप्तो नन्दव्रजं श्रीमान् निम्लोचति विभावसौ । छन्नयानः प्रविशतां पशूनां खुररेणुभिः ॥ ८ ॥

prāpto nanda-vrajaṁ śrīmān nimlocati vibhāvasau channa-yānaḥ praviśatāṁ paśūnāṁ khura-reṇubhiḥ

सूर्यास्त के समय भाग्यशाली उद्धव नन्द के व्रज में पहुँचे; उस समय गोकुल में लौटते हुए पशुओं के खुरों से उड़ती धूल में उनका रथ छिप गया।

श्लोक 9 (bhagavata.10.46.9)

वासितार्थेऽभियुध्यद्भिर्नादितं शुश्मिभिर्वृषैः । धावन्तीभिश्च वास्राभिरुधोभारैः स्ववत्सकान् ॥ ९ ॥

vāsitārthe ’bhiyudhyadbhir nāditaṁ śuśmibhir vṛṣaiḥ dhāvantībhiś ca vāsrābhir udho-bhāraiḥ sva-vatsakān

वहाँ मदमत्त साँड़ गाय के लिए आपस में लड़ते हुए गरज रहे थे, और थन के भार से लदी गौएँ अपने बछड़ों की ओर दौड़ी जा रही थीं।

श्लोक 10 (bhagavata.10.46.10)

इतस्ततो विलङ्घद्भिर्गोवत्सैर्मण्डितं सितैः । गोदोहशब्दाभिरवं वेणूनां निःस्वनेन च ॥ १० ॥

itas tato vilaṅghadbhir go-vatsair maṇḍitaṁ sitaiḥ go-doha-śabdābhiravaṁ veṇūnāṁ niḥsvanena ca

सफेद बछड़े इधर-उधर कुलाँचे भर रहे थे, जिनसे वह स्थान और सुशोभित हो रहा था; वहाँ गौएँ दुहने का शब्द तथा बाँसुरी की ध्वनि गूँज रही थी।

श्लोक 11 (bhagavata.10.46.11)

गायन्तीभिश्च कर्माणि शुभानि बलकृष्णयोः । स्वलङ्कृताभिर्गोपीभिर्गोपैश्च सुविराजितम् ॥ ११ ॥

gāyantībhiś ca karmāṇi śubhāni bala-kṛṣṇayoḥ sv-alaṅkṛtābhir gopībhir gopaiś ca su-virājitam

सुंदर आभूषणों से सजी गोपियाँ और गोपगण बलराम-कृष्ण के मंगलमय चरित्रों का गान करते हुए उस स्थान की शोभा बढ़ा रहे थे।

श्लोक 12 (bhagavata.10.46.12)

अग्न्यर्कातिथिगोविप्रपितृदेवार्चनान्वितैः । धूपदीपैश्च माल्यैश्च गोपावासैर्मनोरमम् ॥ १२ ॥

agny-arkātithi-go-vipra- pitṛ-devārcanānvitaiḥ dhūpa-dīpaiś ca mālyaiś ca gopāvāsair mano-ramam

गोपों के घर अग्नि, सूर्य, अतिथि, गौ, ब्राह्मण, पितर और देवताओं के पूजन से युक्त थे तथा धूप, दीप और मालाओं से सुसज्जित होकर अत्यंत मनोहर लग रहे थे।

श्लोक 13 (bhagavata.10.46.13)

सर्वतः पुष्पितवनं द्विजालिकुलनादितम् । हंसकारण्डवाकीर्णैः पद्मषण्डैश्च मण्डितम् ॥ १३ ॥

sarvataḥ puṣpita-vanaṁ dvijāli-kula-nāditam haṁsa-kāraṇḍavākīrṇaiḥ padma-ṣaṇḍaiś ca maṇḍitam

चारों ओर पुष्पित वन पक्षियों और भ्रमरों के समूहों से गुंजायमान था, तथा हंसों और कारण्डव पक्षियों से भरे कमल-समूहों से सुशोभित था।

श्लोक 14 (bhagavata.10.46.14)

तमागतं समागम्य कृष्णस्यानुचरं प्रियम् । नन्दः प्रीतः परिष्वज्य वासुदेवधियार्चयत् ॥ १४ ॥

tam āgataṁ samāgamya kṛṣṇasyānucaraṁ priyam nandaḥ prītaḥ pariṣvajya vāsudeva-dhiyārcayat

कृष्ण के प्रिय अनुचर उद्धव के आगमन पर नन्द प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े, उन्हें गले लगाया और वासुदेव के ही स्वरूप मानकर उनका पूजन किया।

श्लोक 15 (bhagavata.10.46.15)

भोजितं परमान्नेन संविष्टं कशिपौ सुखम् । गतश्रमं पर्यपृच्छत् पादसंवाहनादिभिः ॥ १५ ॥

bhojitaṁ paramānnena saṁviṣṭaṁ kaśipau sukham gata-śramaṁ paryapṛcchat pāda-saṁvāhanādibhiḥ

उन्होंने उद्धव को उत्तम भोजन कराया, सुखपूर्वक शय्या पर बिठाया और पैर दबाने आदि सेवाओं से उनकी थकान दूर करके फिर उनसे प्रश्न किया।

श्लोक 16 (bhagavata.10.46.16)

कच्चिदङ्ग महाभाग सखा नः शूरनन्दनः । आस्ते कुशल्यपत्याद्यैर्युक्तो मुक्तः सुहृद्व्रतः ॥ १६ ॥

kaccid aṅga mahā-bhāga sakhā naḥ śūra-nandanaḥ āste kuśaly apatyādyair yukto muktaḥ suhṛd-vrataḥ

हे परम भाग्यशाली! क्या हमारे मित्र शूरपुत्र (वसुदेव) कुशलपूर्वक हैं? क्या वे अब बंधन से मुक्त होकर अपनी संतान और स्वजनों के साथ हैं तथा अपने मित्रों के प्रति अपने व्रत में स्थिर हैं?

श्लोक 17 (bhagavata.10.46.17)

दिष्ट्या कंसो हतः पापः सानुगः स्वेन पाप्मना । साधूनां धर्मशीलानां यदूनां द्वेष्टि यः सदा ॥ १७ ॥

diṣṭyā kaṁso hataḥ pāpaḥ sānugaḥ svena pāpmanā sādhūnāṁ dharma-śīlānāṁ yadūnāṁ dveṣṭi yaḥ sadā

यह सौभाग्य की बात है कि पापी कंस अपने ही पापों के कारण अपने अनुयायियों सहित मारा गया, जो सदा साधु-स्वभाव वाले धर्मपरायण यादवों से द्वेष रखता था।

श्लोक 18 (bhagavata.10.46.18)

अपि स्मरति नः कृष्णो मातरं सुहृदः सखीन् । गोपान् व्रजं चात्मनाथं गावो वृन्दावनं गिरिम् ॥ १८ ॥

api smarati naḥ kṛṣṇo mātaraṁ suhṛdaḥ sakhīn gopān vrajaṁ cātma-nāthaṁ gāvo vṛndāvanaṁ girim

क्या कृष्ण हमें स्मरण करते हैं? क्या वे अपनी माता, अपने सुहृदों और सखाओं को याद करते हैं? क्या वे गोपों को, अपने स्वामी-रूप व्रज को, गौओं को, वृन्दावन को और गोवर्धन पर्वत को याद करते हैं?

श्लोक 19 (bhagavata.10.46.19)

अप्यायास्यति गोविन्दः स्वजनान्सकृदीक्षितुम् । तर्हि द्रक्ष्याम तद्वक्त्रं सुनसं सुस्मितेक्षणम् ॥ १९ ॥

apy āyāsyati govindaḥ sva-janān sakṛd īkṣitum tarhi drakṣyāma tad-vaktraṁ su-nasaṁ su-smitekṣaṇam

क्या गोविन्द अपने स्वजनों को एक बार देखने के लिए भी आएँगे? यदि आएँ, तो हम उनका वह मुखमंडल देख पाएँगे, जिसमें सुंदर नासिका और मुस्कुराते नेत्र सुशोभित हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.10.46.20)

दावाग्नेर्वातवर्षाच्च वृषसर्पाच्च रक्षिताः । दुरत्ययेभ्यो मृत्युभ्यः कृष्णेन सुमहात्मना ॥ २० ॥

dāvāgner vāta-varṣāc ca vṛṣa-sarpāc ca rakṣitāḥ duratyayebhyo mṛtyubhyaḥ kṛṣṇena su-mahātmanā

उस महात्मा कृष्ण ने ही हमें दावाग्नि, आँधी-वर्षा, तथा वृषासुर और सर्प जैसे दुर्जेय मृत्युओं से बचाया था।

श्लोक 21 (bhagavata.10.46.21)

स्मरतां कृष्णवीर्याणि लीलापाङ्गनिरीक्षितम् । हसितं भाषितं चाङ्ग सर्वा नः शिथिलाः क्रियाः ॥ २१ ॥

smaratāṁ kṛṣṇa-vīryāṇi līlāpāṅga-nirīkṣitam hasitaṁ bhāṣitaṁ cāṅga sarvā naḥ śithilāḥ kriyāḥ

हे उद्धव! कृष्ण के पराक्रम, उनकी लीलामय तिरछी चितवन, उनकी मुस्कान और उनके वचनों को स्मरण करते हुए हमारे सारे कार्य शिथिल पड़ जाते हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.10.46.22)

सरिच्छैलवनोद्देशान् मुकुन्दपदभूषितान् । आक्रीडानीक्ष्यमाणानां मनो याति तदात्मताम् ॥ २२ ॥

saric-chaila-vanoddeśān mukunda-pada-bhūṣitān ākrīḍān īkṣyamāṇānāṁ mano yāti tad-ātmatām

नदियों, पर्वतों और वनों के जिन स्थानों को मुकुन्द के चरण-चिह्नों ने सुशोभित किया, उन क्रीड़ा-स्थलों को देखते ही हमारा मन उन्हीं में तन्मय हो जाता है।

श्लोक 23 (bhagavata.10.46.23)

मन्ये कृष्णं च रामं च प्राप्ताविह सुरोत्तमौ । सुराणां महदर्थाय गर्गस्य वचनं यथा ॥ २३ ॥

manye kṛṣṇaṁ ca rāmaṁ ca prāptāv iha surottamau surāṇāṁ mahad-arthāya gargasya vacanaṁ yathā

मेरी समझ में कृष्ण और बलराम दोनों देवताओं में श्रेष्ठ हैं, जो देवताओं के किसी महान प्रयोजन हेतु यहाँ अवतरित हुए हैं — जैसा गर्गाचार्य ने पहले ही कह दिया था।

श्लोक 24 (bhagavata.10.46.24)

कंसं नागायुतप्राणं मल्लौ गजपतिं यथा । अवधिष्टां लीलयैव पशूनिव मृगाधिपः ॥ २४ ॥

kaṁsaṁ nāgāyuta-prāṇaṁ mallau gaja-patiṁ yathā avadhiṣṭāṁ līlayaiva paśūn iva mṛgādhipaḥ

जैसे सिंह पशुओं का वध कर देता है, वैसे ही उन दोनों ने खेल-खेल में ही दस हजार हाथियों के बराबर बलशाली कंस, मल्लों और गजराज कुवलयापीड़ का वध कर डाला।

श्लोक 25 (bhagavata.10.46.25)

तालत्रयं महासारं धनुर्यष्टिमिवेभराट् । बभञ्जैकेन हस्तेन सप्ताहमदधाद् गिरिम् ॥ २५ ॥

tāla-trayaṁ mahā-sāraṁ dhanur yaṣṭim ivebha-rāṭ babhañjaikena hastena saptāham adadhād girim

जैसे कोई श्रेष्ठ हाथी किसी छड़ी को तोड़ दे, वैसे ही कृष्ण ने तीन ताड़ के बराबर विशाल एवं सुदृढ़ धनुष को एक हाथ से तोड़ डाला, और सात दिनों तक एक ही हाथ से पर्वत को धारण किए रखा।

श्लोक 26 (bhagavata.10.46.26)

प्रलम्बो धेनुकोऽरिष्टस्तृणावर्तो बकादयः । दैत्याः सुरासुरजितो हता येनेह लीलया ॥ २६ ॥

pralambo dhenuko ’riṣṭas tṛṇāvarto bakādayaḥ daityāḥ surāsura-jito hatā yeneha līlayā

प्रलम्ब, धेनुक, अरिष्ट, तृणावर्त और बक आदि दैत्य, जिन्होंने देवताओं और असुरों दोनों को जीत लिया था, वे भी उन्हीं के द्वारा यहाँ खेल-खेल में मार डाले गए।

श्लोक 27 (bhagavata.10.46.27)

श्रीशुक उवाच इति संस्मृत्य संस्मृत्य नन्दः कृष्णानुरक्तधीः । अत्युत्कण्ठोऽभवत्तूष्णीं प्रेमप्रसरविह्वलः ॥ २७ ॥

śrī-śuka uvāca iti saṁsmṛtya saṁsmṛtya nandaḥ kṛṣṇānurakta-dhīḥ aty-utkaṇṭho ’bhavat tūṣṇīṁ prema-prasara-vihvalaḥ

श्रीशुकदेव ने कहा — इस प्रकार बार-बार स्मरण करते हुए, कृष्ण में अनुरक्त मन वाले नन्द अत्यंत उत्कंठित हो गए और प्रेम के उमड़ने से विह्वल होकर मौन हो गए।

श्लोक 28 (bhagavata.10.46.28)

यशोदा वर्ण्यमानानि पुत्रस्य चरितानि च । शृण्वन्त्यश्रूण्यवास्राक्षीत् स्नेहस्नुतपयोधरा ॥ २८ ॥

yaśodā varṇyamānāni putrasya caritāni ca śṛṇvanty aśrūṇy avāsrākṣīt sneha-snuta-payodharā

पुत्र के वर्णन किए जाते हुए चरित्रों को सुनकर यशोदा की आँखों से आँसू बह चले, और स्नेहवश उनके स्तनों से दूध झरने लगा।

श्लोक 29 (bhagavata.10.46.29)

तयोरित्थं भगवति कृष्णे नन्दयशोदयोः । वीक्ष्यानुरागं परमं नन्दमाहोद्धवो मुदा ॥ २९ ॥

tayor itthaṁ bhagavati kṛṣṇe nanda-yaśodayoḥ vīkṣyānurāgaṁ paramaṁ nandam āhoddhavo mudā

भगवान कृष्ण के प्रति नन्द और यशोदा के इस प्रकार के परम अनुराग को देखकर उद्धव ने आनन्दित होकर नन्द से कहा।

श्लोक 30 (bhagavata.10.46.30)

श्रीउद्धव उवाच युवां श्लाघ्यतमौ नूनं देहिनामिह मानद । नारायणेऽखिलगुरौ यत्कृता मतिरीदृशी ॥ ३० ॥

śrī-uddhava uvāca yuvāṁ ślāghyatamau nūnaṁ dehinām iha māna-da nārāyaṇe ’khila-gurau yat kṛtā matir īdṛśī

श्री उद्धव ने कहा — हे मान देने वाले नन्द! निःसंदेह आप दोनों इस संसार के समस्त प्राणियों में सर्वाधिक श्लाघनीय हैं, क्योंकि आपने सबके गुरु नारायण के प्रति ऐसा अनुराग विकसित किया है।

श्लोक 31 (bhagavata.10.46.31)

एतौ हि विश्वस्य च बीजयोनी रामो मुकुन्दः पुरुषः प्रधानम् । अन्वीय भूतेषु विलक्षणस्य ज्ञानस्य चेशात इमौ पुराणौ ॥ ३१ ॥

etau hi viśvasya ca bīja-yonī rāmo mukundaḥ puruṣaḥ pradhānam anvīya bhūteṣu vilakṣaṇasya jñānasya ceśāta imau purāṇau

राम और मुकुन्द ही इस विश्व के बीज और योनि हैं — पुरुष और प्रकृति स्वयं। समस्त जीवों में प्रवेश कर वे उनकी विभिन्न चेतनाओं को नियंत्रित करते हैं; वे दोनों ही सनातन परमेश्वर हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.10.46.32)

यस्मिन् जनः प्राणवियोगकाले क्षणं समावेश्य मनोऽविशुद्धम् । निर्हृत्य कर्माशयमाशु याति परां गतिं ब्रह्ममयोऽर्कवर्णः ॥ ३२ ॥

yasmin janaḥ prāṇa-viyoga-kāle kṣanaṁ samāveśya mano ’viśuddham nirhṛtya karmāśayam āśu yāti parāṁ gatiṁ brahma-mayo ’rka-varṇaḥ

जिसमें मन को मृत्युकाल में क्षणभर भी लगाकर, चाहे वह अशुद्ध ही क्यों न हो, मनुष्य कर्मों के समस्त संचित बीज को नष्ट कर तुरंत ही सूर्य के समान तेजस्वी, ब्रह्ममय परम गति को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 33 (bhagavata.10.46.33)

तस्मिन् भवन्तावखिलात्महेतौ नारायणे कारणमर्त्यमूर्तौ । भावं विधत्तां नितरां महात्मन् किं वावशिष्टं युवयोः सुकृत्यम् ॥ ३३ ॥

tasmin bhavantāv akhilātma-hetau nārāyaṇe kāraṇa-martya-mūrtau bhāvaṁ vidhattāṁ nitarāṁ mahātman kiṁ vāvaśiṣṭaṁ yuvayoḥ su-kṛtyam

हे महात्मन्! उन्हीं नारायण के प्रति, जो सबके आत्मा के कारण हैं और स्वेच्छा से मनुष्य-रूप धारण करने वाले हैं, आप दोनों का ऐसा गहन भाव है — फिर आप दोनों के लिए और कौन-सा पुण्य-कर्म शेष रह गया है?

श्लोक 34 (bhagavata.10.46.34)

आगमिष्यत्यदीर्घेण कालेन व्रजमच्युतः । प्रियं विधास्यते पित्रोर्भगवान् सात्वतां पतिः ॥ ३४ ॥

āgamiṣyaty adīrgheṇa kālena vrajam acyutaḥ priyaṁ vidhāsyate pitror bhagavān sātvatāṁ patiḥ

अच्युत भगवान, जो सात्वतों के स्वामी हैं, शीघ्र ही व्रज लौट आएँगे और अपने माता-पिता को प्रसन्न करेंगे।

श्लोक 35 (bhagavata.10.46.35)

हत्वा कंसं रङ्गमध्ये प्रतीपं सर्वसात्वताम् । यदाह वः समागत्य कृष्णः सत्यं करोति तत् ॥ ३५ ॥

hatvā kaṁsaṁ raṅga-madhye pratīpaṁ sarva-sātvatām yad āha vaḥ samāgatya kṛṣṇaḥ satyaṁ karoti tat

सभी सात्वतों के शत्रु कंस को रंगभूमि में मारकर, कृष्ण अब वापस आकर आपसे किए गए अपने वचन को अवश्य सत्य कर दिखाएँगे।

श्लोक 36 (bhagavata.10.46.36)

मा खिद्यतं महाभागौ द्रक्ष्यथः कृष्णमन्तिके । अन्तर्हृदि स भूतानामास्ते ज्योतिरिवैधसि ॥ ३६ ॥

mā khidyataṁ mahā-bhāgau drakṣyathaḥ kṛṣṇam antike antar hṛdi sa bhūtānām āste jyotir ivaidhasi

हे परम भाग्यशालियो! शोक न करें, आप शीघ्र ही कृष्ण को अपने निकट देखेंगे। वे तो सभी प्राणियों के हृदय में उसी प्रकार निवास करते हैं जैसे लकड़ी में अग्नि छिपी रहती है।

श्लोक 37 (bhagavata.10.46.37)

न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चिन्नाप्रियो वास्त्यमानिनः । नोत्तमो नाधमो वापि समानस्यासमोऽपि वा ॥ ३७ ॥

na hy asyāsti priyaḥ kaścin nāpriyo vāsty amāninaḥ nottamo nādhamo vāpi sa-mānasyāsamo ’pi vā

उन मानरहित भगवान के लिए न कोई प्रिय है, न कोई अप्रिय; न कोई उत्तम है, न अधम; और यद्यपि वे समभाव वाले हैं, तथापि वे किसी के तुल्य भी नहीं हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.10.46.38)

न माता न पिता तस्य न भार्या न सुतादयः । नात्मीयो न परश्चापि न देहो जन्म एव च ॥ ३८ ॥

na mātā na pitā tasya na bhāryā na sutādayaḥ nātmīyo na paraś cāpi na deho janma eva ca

उनकी न कोई माता है, न पिता, न पत्नी, न पुत्रादि; न कोई उनका अपना है, न कोई पराया; न उनका कोई भौतिक शरीर है, न जन्म।

श्लोक 39 (bhagavata.10.46.39)

न चास्य कर्म वा लोके सदसन्मिश्रयोनिषु । क्रीडार्थं सोऽपि साधूनां परित्राणाय कल्पते ॥ ३९ ॥

na cāsya karma vā loke sad-asan-miśra-yoniṣu krīḍārthaṁ so ’pi sādhūnāṁ paritrāṇāya kalpate

इस लोक में शुद्ध, अशुद्ध या मिश्र योनियों में जन्म लेने के लिए बाध्य करने वाला कोई कर्म भी उनका नहीं है; फिर भी वे लीला के लिए तथा साधुजनों के परित्राण के लिए अवतरित होते हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.10.46.40)

सत्त्वं रजस्तम इति भजते निर्गुणो गुणान् । क्रीडन्नतीतोऽपि गुणैः सृजत्यवति हन्त्यजः ॥ ४० ॥

sattvaṁ rajas tama iti bhajate nirguṇo guṇān krīḍann atīto ’pi guṇaiḥ sṛjaty avan hanty ajaḥ

वे गुणातीत होते हुए भी सत्त्व, रज और तम — इन तीनों गुणों का आश्रय लीलावश ग्रहण करते हैं; इस प्रकार गुणों से परे रहते हुए भी वे अजन्मा भगवान सृष्टि, पालन और संहार करते हैं।

श्लोक 41 (bhagavata.10.46.41)

यथा भ्रमरिकादृष्ट्या भ्राम्यतीव महीयते । चित्ते कर्तरि तत्रात्मा कर्तेवाहंधिया स्मृतः ॥ ४१ ॥

yathā bhramarikā-dṛṣṭyā bhrāmyatīva mahīyate citte kartari tatrātmā kartevāhaṁ-dhiyā smṛtaḥ

जैसे चक्कर काटता हुआ व्यक्ति भ्रमवश पृथ्वी को ही घूमती हुई देखता है, वैसे ही वास्तव में कर्ता तो मन होता है, परंतु अहंकार के कारण आत्मा को ही कर्ता मान लिया जाता है।

श्लोक 42 (bhagavata.10.46.42)

युवयोरेव नैवायमात्मजो भगवान् हरिः । सर्वेषामात्मजो ह्यात्मा पिता माता स ईश्वरः ॥ ४२ ॥

yuvayor eva naivāyam ātmajo bhagavān hariḥ sarveṣām ātmajo hy ātmā pitā mātā sa īśvaraḥ

भगवान हरि केवल आप दोनों के ही पुत्र नहीं हैं; वे तो सबके पुत्र, सबकी आत्मा, तथा सबके पिता और माता भी वही ईश्वर हैं।

श्लोक 43 (bhagavata.10.46.43)

दृष्टं श्रुतं भूतभवद् भविष्यत् स्थास्नुश्चरिष्णुर्महदल्पकं च । विनाच्युताद् वस्तु तरां न वाच्यं स एव सर्वं परमात्मभूतः ॥ ४३ ॥

dṛṣṭaṁ śrutaṁ bhūta-bhavad-bhaviṣyat sthāsnuś cariṣṇur mahad alpakaṁ ca vinācyutād vastu tarāṁ na vācyaṁ sa eva sarvaṁ paramātma-bhūtaḥ

जो कुछ देखा या सुना गया है, जो भूत, वर्तमान या भविष्य में है, जो स्थावर या चर है, जो बड़ा या छोटा है — अच्युत भगवान से पृथक् किसी भी वस्तु का वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि परमात्मा-स्वरूप वे ही सब कुछ हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.10.46.44)

एवं निशा सा ब्रुवतोर्व्यतीता नन्दस्य कृष्णानुचरस्य राजन् । गोप्यः समुत्थाय निरूप्य दीपान् वास्तून् समभ्यर्च्य दधीन्यमन्थन् ॥ ४४ ॥

evaṁ niśā sā bruvator vyatītā nandasya kṛṣṇānucarasya rājan gopyaḥ samutthāya nirūpya dīpān vāstūn samabhyarcya daudhīny amanthun

हे राजन्! इस प्रकार नन्द और कृष्ण के अनुचर उद्धव की बातचीत में वह रात्रि बीत गई। गोपियाँ उठकर दीप जलाकर अपने-अपने घरों की पूजा कर दही मथने लगीं।

श्लोक 45 (bhagavata.10.46.45)

ता दीपदीप्तैर्मणिभिर्विरेजू रज्जूर्विकर्षद्भुजकङ्कणस्रजः । चलन्नितम्बस्तनहारकुण्डल- त्विषत्कपोलारुणकुङ्कुमाननाः ॥ ४५ ॥

tā dīpa-dīptair maṇibhir virejū rajjūr vikarṣad-bhuja-kaṅkaṇa-srajaḥ calan-nitamba-stana-hāra-kuṇḍala- tviṣat-kapolāruṇa-kuṅkumānanāḥ

मथानी की रस्सी खींचती हुई उन गोपियों की भुजाओं में पहने कंगन और मालाएँ शोभायमान हो रही थीं, उनके आभूषण दीपकों के प्रकाश में जगमगा रहे थे; उनके नितम्ब और स्तनों पर हार हिल रहे थे और कुण्डलों की आभा से उनके कुंकुम-रंजित कपोल दमक रहे थे।

श्लोक 46 (bhagavata.10.46.46)

उद्गायतीनामरविन्दलोचनं व्रजाङ्गनानां दिवमस्पृशद् ध्वनिः । दध्नश्च निर्मन्थनशब्दमिश्रितो निरस्यते येन दिशाममङ्गलम् ॥ ४६ ॥

udgāyatīnām aravinda-locanaṁ vrajāṅganānāṁ divam aspṛśad dhvaniḥ dadhnaś ca nirmanthana-śabda-miśrito nirasyate yena diśām amaṅgalam

कमलनयन कृष्ण का गुणगान करती हुई व्रज-वनिताओं की वह ध्वनि, दही मथने के शब्द से मिलकर आकाश को स्पर्श कर रही थी, जिससे दिशाओं का सारा अमंगल दूर हो जाता था।

श्लोक 47 (bhagavata.10.46.47)

भगवत्युदिते सूर्ये नन्दद्वारि व्रजौकसः । दृष्ट्वा रथं शातकौम्भं कस्यायमिति चाब्रुवन् ॥ ४७ ॥

bhagavaty udite sūrye nanda-dvāri vrajaukasaḥ dṛṣṭvā rathaṁ śātakaumbhaṁ kasyāyam iti cābruvan

सूर्यदेव के उदय होने पर व्रजवासियों ने नन्द के द्वार पर सुवर्णमय रथ देखा और पूछने लगे — यह किसका रथ है?

श्लोक 48 (bhagavata.10.46.48)

अक्रूर आगतः किं वा यः कंसस्यार्थसाधकः । येन नीतो मधुपुरीं कृष्णः कमललोचनः ॥ ४८ ॥

akrūra āgataḥ kiṁ vā yaḥ kaṁsasyārtha-sādhakaḥ yena nīto madhu-purīṁ kṛṣṇaḥ kamala-locanaḥ

"क्या अक्रूर आ गए हैं — वही जिन्होंने कंस का प्रयोजन सिद्ध करते हुए कमलनयन कृष्ण को मथुरा ले जाया था?

श्लोक 49 (bhagavata.10.46.49)

किं साधयिष्यत्यस्माभिर्भर्तुः प्रीतस्य निष्कृतिम् । ततः स्त्रीणां वदन्तीनामुद्धवोऽगात् कृताह्निकः ॥ ४९ ॥

kiṁ sādhayiṣyaty asmābhir bhartuḥ prītasya niṣkṛtim tataḥ strīṇāṁ vadantīnām uddhavo ’gāt kṛtāhnikaḥ

"क्या वे अब हमारे द्वारा अपने प्रसन्न स्वामी के तर्पण-कार्य को पूरा कराना चाहते हैं?" इस प्रकार स्त्रियाँ बातें कर ही रही थीं कि नित्यकर्म निपटाकर उद्धव वहाँ आ पहुँचे।

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