दशम स्कन्ध · अध्याय 6
पूतना-वध
श्लोक 1 (bhagavata.10.6.1)
श्रीशुक उवाच नन्दः पथि वचः शौरेर्न मृषेति विचिन्तयन् । हरिं जगाम शरणमुत्पातागमशङ्कितः ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca nandaḥ pathi vacaḥ śaurer na mṛṣeti vicintayan hariṁ jagāma śaraṇam utpātāgama-śaṅkitaḥ
श्रीशुक ने कहा — मार्ग में नन्द यह सोचते हुए कि शौरि (वसुदेव) के वचन असत्य नहीं हो सकते, किसी अनिष्ट की आशंका से भयभीत होकर भगवान हरि की शरण में गए।
श्लोक 2 (bhagavata.10.6.2)
कंसेन प्रहिता घोरा पूतना बालघातिनी । शिशूंश्चचार निघ्नन्ती पुरग्रामव्रजादिषु ॥ २ ॥
kaṁsena prahitā ghorā pūtanā bāla-ghātinī śiśūṁś cacāra nighnantī pura-grāma-vrajādiṣu
कंस द्वारा भेजी गई भयंकर बालघातिनी पूतना नगरों, ग्रामों और व्रजों में शिशुओं का वध करती हुई विचरण कर रही थी।
श्लोक 3 (bhagavata.10.6.3)
न यत्र श्रवणादीनि रक्षोघ्नानि स्वकर्मसु । कुर्वन्ति सात्वतां भर्तुर्यातुधान्यश्च तत्र हि ॥ ३ ॥
na yatra śravaṇādīni rakṣo-ghnāni sva-karmasu kurvanti sātvatāṁ bhartur yātudhānyaś ca tatra hi
हे राजन्, जहाँ लोग सात्वतों के स्वामी भगवान के श्रवण-कीर्तनादि, जो राक्षसों का नाश करने वाले हैं, अपने नित्यकर्म के रूप में नहीं करते, वहीं ऐसी राक्षसियाँ भी प्रवेश पा जाती हैं।
श्लोक 4 (bhagavata.10.6.4)
सा खेचर्येकदोत्पत्य पूतना नन्दगोकुलम् । योषित्वा माययात्मानं प्राविशत् कामचारिणी ॥ ४ ॥
sā khe-cary ekadotpatya pūtanā nanda-gokulam yoṣitvā māyayātmānaṁ prāviśat kāma-cāriṇī
वह आकाशचारिणी पूतना अपनी इच्छा से कहीं भी विचरण करने में समर्थ थी। एक दिन उड़ते हुए वह नन्द के गोकुल में पहुँची और माया से अपने को एक सुन्दर स्त्री का रूप देकर वहाँ प्रविष्ट हुई।
श्लोक 5 (bhagavata.10.6.5)
तां केशबन्धव्यतिषक्तमल्लिकां बृहन्नितम्बस्तनकृच्छ्रमध्यमाम् । सुवाससं कल्पितकर्णभूषण- त्विषोल्लसत्कुन्तलमण्डिताननाम् ॥ ५ ॥
tāṁ keśa-bandha-vyatiṣakta-mallikāṁ bṛhan-nitamba-stana-kṛcchra-madhyamām suvāsasaṁ kalpita-karṇa-bhūṣaṇa- tviṣollasat-kuntala-maṇḍitānanām
उसके केशपाश में मल्लिका के फूल गुँथे हुए थे, उसके विशाल नितम्ब और स्तन उसकी क्षीण कटि पर मानो भार डाल रहे थे। वह सुन्दर वस्त्र पहने थी और उसके कर्णाभूषणों की कान्ति से चमकते हुए घुँघराले बाल उसके मुख को सुशोभित कर रहे थे।
श्लोक 6 (bhagavata.10.6.6)
वल्गुस्मितापाङ्गविसर्गवीक्षितै- र्मनो हरन्तीं वनितां व्रजौकसाम् । अमंसताम्भोजकरेण रूपिणीं गोप्यः श्रियं द्रष्टुमिवागतां पतिम् ॥ ६ ॥
valgu-smitāpāṅga-visarga-vīkṣitair mano harantīṁ vanitāṁ vrajaukasām amaṁsatāmbhoja-kareṇa rūpiṇīṁ gopyaḥ śriyaṁ draṣṭum ivāgatāṁ patim
अपनी मधुर मुसकान और चितवन के सहज संकेतों से वह व्रजवासियों के मन को हर लेती थी। गोपियों ने सोचा कि हाथ में कमल लिए यह अनुपम सुन्दरी साक्षात् लक्ष्मी है, जो अपने पति के दर्शन हेतु आई है।
श्लोक 7 (bhagavata.10.6.7)
बालग्रहस्तत्र विचिन्वती शिशून् यदृच्छया नन्दगृहेऽसदन्तकम् । बालं प्रतिच्छन्ननिजोरुतेजसं ददर्श तल्पेऽग्निमिवाहितं भसि ॥ ७ ॥
bāla-grahas tatra vicinvatī śiśūn yadṛcchayā nanda-gṛhe ’sad-antakam bālaṁ praticchanna-nijoru-tejasaṁ dadarśa talpe ’gnim ivāhitaṁ bhasi
वह बालग्रह-राक्षसी शिशुओं को ढूँढ़ती हुई संयोगवश नन्द के घर आ पहुँची, जहाँ दुष्टों के अन्तक स्वयं शिशु-रूप में शय्या पर लेटे थे। उनका अपार तेज छिपा हुआ था, मानो राख से ढकी हुई अग्नि हो।
श्लोक 8 (bhagavata.10.6.8)
विबुध्य तां बालकमारिकाग्रहं चराचरात्मा स निमीलितेक्षणः । अनन्तमारोपयदङ्कमन्तकं यथोरगं सुप्तमबुद्धिरज्जुधीः ॥ ८ ॥
vibudhya tāṁ bālaka-mārikā-grahaṁ carācarātmā sa nimīlitekṣaṇaḥ anantam āropayad aṅkam antakaṁ yathoragaṁ suptam abuddhi-rajju-dhīḥ
चराचर के आत्मा भगवान ने उस बालघातिनी राक्षसी को पहचानकर अपनी आँखें मूँद लीं। और वह, जो स्वयं अपनी ही मृत्यु को गोद में उठा रही थी, उस अनन्त बालक को इस प्रकार गोद में ले बैठी, जैसे कोई मूर्ख सोए हुए सर्प को रस्सी समझ कर उठा ले।
श्लोक 9 (bhagavata.10.6.9)
तां तीक्ष्णचित्तामतिवामचेष्टितां वीक्ष्यान्तरा कोषपरिच्छदासिवत् । वरस्त्रियं तत्प्रभया च धर्षिते निरीक्ष्यमाणे जननी ह्यतिष्ठताम् ॥ ९ ॥
tāṁ tīkṣṇa-cittām ativāma-ceṣṭitāṁ vīkṣyāntarā koṣa-paricchadāsivat vara-striyaṁ tat-prabhayā ca dharṣite nirīkṣyamāṇe jananī hy atiṣṭhatām
वह भीतर से क्रूर हृदय की थी, पर उसकी चेष्टाएँ अत्यन्त मृदु प्रतीत होती थीं — मानो म्यान में छिपी तलवार हो। यशोदा और रोहिणी उस सुन्दरी के तेज से चकित होकर उसे देखती तो रहीं, किन्तु माता समझकर उसे रोक न सकीं।
श्लोक 10 (bhagavata.10.6.10)
तस्मिन् स्तनं दुर्जरवीर्यमुल्बणं घोराङ्कमादाय शिशोर्ददावथ । गाढं कराभ्यां भगवान् प्रपीड्य तत्- प्राणैः समं रोषसमन्वितोऽपिबत् ॥ १० ॥
tasmin stanaṁ durjara-vīryam ulbaṇaṁ ghorāṅkam ādāya śiśor dadāv atha gāḍhaṁ karābhyāṁ bhagavān prapīḍya tat- prāṇaiḥ samaṁ roṣa-samanvito ’pibat
अपनी भयानक गोद में शिशु को लेकर उसने उसे अपना स्तन पिलाना आरम्भ किया, जिस पर दुःसह विष लगा हुआ था। किन्तु भगवान ने दोनों हाथों से उसे कसकर पकड़ लिया और क्रोधपूर्वक उसका विष उसके प्राणों सहित पी लिया।
श्लोक 11 (bhagavata.10.6.11)
सा मुञ्च मुञ्चालमिति प्रभाषिणी निष्पीड्यमानाखिलजीवमर्मणि । विवृत्य नेत्रे चरणौ भुजौ मुहुः प्रस्विन्नगात्रा क्षिपती रुरोद ह ॥ ११ ॥
sā muñca muñcālam iti prabhāṣiṇī niṣpīḍyamānākhila-jīva-marmaṇi vivṛtya netre caraṇau bhujau muhuḥ prasvinna-gātrā kṣipatī ruroda ha
वह चीख उठी — "छोड़ो, छोड़ो, बस करो!" उसके सारे मर्मस्थान पीड़ित हो रहे थे। आँखें फाड़े, बार-बार हाथ-पैर पटकते हुए, पसीने से तर-बतर शरीर लिए वह दहाड़ मार-मार कर रोने लगी।
श्लोक 12 (bhagavata.10.6.12)
तस्याः स्वनेनातिगभीररंहसा साद्रिर्मही द्यौश्च चचाल सग्रहा । रसा दिशश्च प्रतिनेदिरे जनाः पेतुः क्षितौ वज्रनिपातशङ्कया ॥ १२ ॥
tasyāḥ svanenātigabhīra-raṁhasā sādrir mahī dyauś ca cacāla sa-grahā rasā diśaś ca pratinedire janāḥ petuḥ kṣitau vajra-nipāta-śaṅkayā
उसकी गम्भीर और भयंकर वेगवाली चीत्कार से पर्वतों सहित पृथ्वी और ग्रहों सहित आकाश काँप उठे। पाताल और सभी दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं, और लोग यह समझकर कि वज्र गिर रहा है, भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 13 (bhagavata.10.6.13)
निशाचरीत्थं व्यथितस्तना व्यसु- र्व्यादाय केशांश्चरणौ भुजावपि । प्रसार्य गोष्ठे निजरूपमास्थिता वज्राहतो वृत्र इवापतन्नृप ॥ १३ ॥
niśā-carītthaṁ vyathita-stanā vyasur vyādāya keśāṁś caraṇau bhujāv api prasārya goṣṭhe nija-rūpam āsthitā vajrāhato vṛtra ivāpatan nṛpa
इस प्रकार वह निशाचरी, अपने स्तन की व्यथा से व्याकुल होकर प्राणहीन हो गई। हे राजन्, वह मुँह फाड़े, बाल, हाथ-पैर फैलाए, अपने वास्तविक राक्षसी रूप में गोशाला में इस प्रकार गिर पड़ी, जैसे इन्द्र के वज्र से आहत वृत्रासुर गिरा था।
श्लोक 14 (bhagavata.10.6.14)
पतमानोऽपि तद्देहस्त्रिगव्यूत्यन्तरद्रुमान् । चूर्णयामास राजेन्द्र महदासीत्तदद्भुतम् ॥ १४ ॥
patamāno ’pi tad-dehas tri-gavyūty-antara-drumān cūrṇayām āsa rājendra mahad āsīt tad adbhutam
गिरते हुए भी उसका वह शरीर तीन गव्यूति (लगभग बारह मील) के भीतर के सारे वृक्षों को चूर-चूर कर गया। हे राजेन्द्र, वह विशालकाय रूप सचमुच एक अद्भुत आश्चर्य था।
श्लोक 15 (bhagavata.10.6.15)
ईषामात्रोग्रदंष्ट्रास्यं गिरिकन्दरनासिकम् । गण्डशैलस्तनं रौद्रं प्रकीर्णारुणमूर्धजम् ॥ १५ ॥
īṣā-mātrogra-daṁṣṭrāsyaṁ giri-kandara-nāsikam gaṇḍa-śaila-stanaṁ raudraṁ prakīrṇāruṇa-mūrdhajam
उसका मुख भयंकर दाढ़ों वाला था, मानो हल की ईषा हों; उसके नथुने पर्वत की गुफाओं-से गहरे थे; उसके स्तन पर्वत से गिरी शिलाओं-से भयावह थे, और उसके बिखरे हुए केश ताँबे के रंग के थे।
श्लोक 16 (bhagavata.10.6.16)
अन्धकूपगभीराक्षं पुलिनारोहभीषणम् । बद्धसेतुभुजोर्वङ्घ्रि शून्यतोयह्रदोदरम् ॥ १६ ॥
andha-kūpa-gabhīrākṣaṁ pulināroha-bhīṣaṇam baddha-setu-bhujorv-aṅghri śūnya-toya-hradodaram
उसकी आँखों के गड्ढे अंधे कुओं-से गहरे थे, उसकी जाँघें नदी के तटों-सी भयावह थीं, उसके भुजा, ऊरु और पैर विशाल पुलों-से प्रतीत होते थे, और उसका उदर सूखे हुए सरोवर की भाँति खोखला था।
श्लोक 17 (bhagavata.10.6.17)
सन्तत्रसुः स्म तद्वीक्ष्य गोपा गोप्यः कलेवरम् । पूर्वं तु तन्निःस्वनितभिन्नहृत्कर्णमस्तकाः ॥ १७ ॥
santatrasuḥ sma tad vīkṣya gopā gopyaḥ kalevaram pūrvaṁ tu tan-niḥsvanita- bhinna-hṛt-karṇa-mastakāḥ
उस विकराल शव को देखकर गोप-गोपियाँ भय से काँप उठे — उनके हृदय, कान और सिर तो पहले ही उसकी चीत्कार की ध्वनि से विदीर्ण हो चुके थे।
श्लोक 18 (bhagavata.10.6.18)
बालं च तस्या उरसि क्रीडन्तमकुतोभयम् । गोप्यस्तूर्णं समभ्येत्य जगृहुर्जातसम्भ्रमाः ॥ १८ ॥
bālaṁ ca tasyā urasi krīḍantam akutobhayam gopyas tūrṇaṁ samabhyetya jagṛhur jāta-sambhramāḥ
और उसकी छाती पर निर्भय होकर खेलते हुए उस बालक को देखकर गोपियाँ चकित होकर तुरन्त दौड़ पड़ीं और उसे उठा लिया।
श्लोक 19 (bhagavata.10.6.19)
यशोदारोहिणीभ्यां ताः समं बालस्य सर्वतः । रक्षां विदधिरे सम्यग्गोपुच्छभ्रमणादिभिः ॥ १९ ॥
yaśodā-rohiṇībhyāṁ tāḥ samaṁ bālasya sarvataḥ rakṣāṁ vidadhire samyag go-puccha-bhramaṇādibhiḥ
यशोदा और रोहिणी के साथ मिलकर उन्होंने गोपुच्छ घुमाने आदि विधियों से बालक की चारों ओर से भलीभाँति रक्षा की।
श्लोक 20 (bhagavata.10.6.20)
गोमूत्रेण स्नापयित्वा पुनर्गोरजसार्भकम् । रक्षां चक्रुश्च शकृता द्वादशाङ्गेषु नामभिः ॥ २० ॥
go-mūtreṇa snāpayitvā punar go-rajasārbhakam rakṣāṁ cakruś ca śakṛtā dvādaśāṅgeṣu nāmabhiḥ
शिशु को पहले गोमूत्र से स्नान कराया, फिर गोरज से; तत्पश्चात् गोबर से बारह अंगों पर भगवान के नामों का अंकन करके उसकी रक्षा की।
श्लोक 21 (bhagavata.10.6.21)
गोप्यः संस्पृष्टसलिला अङ्गेषु करयोः पृथक् । न्यस्यात्मन्यथ बालस्य बीजन्यासमकुर्वत ॥ २१ ॥
gopyaḥ saṁspṛṣṭa-salilā aṅgeṣu karayoḥ pṛthak nyasyātmany atha bālasya bīja-nyāsam akurvata
गोपियों ने जल का स्पर्श करके पहले अपने अंगों और हाथों पर अलग-अलग न्यास किया, फिर बालक के शरीर पर भी वही बीज-न्यास सम्पन्न किया।
श्लोक 22 (bhagavata.10.6.22)
अव्यादजोऽङ्घ्रि मणिमांस्तव जान्वथोरू यज्ञोऽच्युतः कटितटं जठरं हयास्यः । हृत्केशवस्त्वदुर ईश इनस्तु कण्ठं विष्णुर्भुजं मुखमुरुक्रम ईश्वरः कम् ॥ २२ ॥
avyād ajo ’ṅghri maṇimāṁs tava jānv athorū yajño ’cyutaḥ kaṭi-taṭaṁ jaṭharaṁ hayāsyaḥ hṛt keśavas tvad-ura īśa inas tu kaṇṭhaṁ viṣṇur bhujaṁ mukham urukrama īśvaraḥ kam
अज तुम्हारे चरणों की रक्षा करें, मणिमान तुम्हारे घुटनों की, यज्ञ तुम्हारी जंघाओं की, अच्युत तुम्हारी कटि की, और हयग्रीव तुम्हारे उदर की रक्षा करें। केशव तुम्हारे हृदय की, ईश तुम्हारे वक्षस्थल की, सूर्य तुम्हारे कण्ठ की, विष्णु तुम्हारी भुजाओं की, उरुक्रम तुम्हारे मुख की, और ईश्वर तुम्हारे मस्तक की रक्षा करें।
श्लोक 23 (bhagavata.10.6.23)
चक्रयग्रतः सहगदो हरिरस्तु पश्चात् त्वत्पार्श्वयोर्धनुरसी मधुहाजनश्च । कोणेषु शङ्ख उरुगाय उपर्युपेन्द्र- स्तार्क्ष्यः क्षितौ हलधरः पुरुषः समन्तात् ॥ २३ ॥
cakry agrataḥ saha-gado harir astu paścāt tvat-pārśvayor dhanur-asī madhu-hājanaś ca koṇeṣu śaṅkha urugāya upary upendras tārkṣyaḥ kṣitau haladharaḥ puruṣaḥ samantāt
चक्रधारी तुम्हारे आगे और गदाधारी हरि तुम्हारे पीछे रहें। धनुष और खड्ग धारण करने वाले मधुसूदन और अजन तुम्हारे दोनों ओर रहें। कोनों में शंखधारी उरुगाय, ऊपर उपेन्द्र, भूमि पर तार्क्ष्य (गरुड़), और सभी दिशाओं में हलधर पुरुष तुम्हारी रक्षा करें।
श्लोक 24 (bhagavata.10.6.24)
इन्द्रियाणि हृषीकेशः प्राणान् नारायणोऽवतु । श्वेतद्वीपपतिश्चित्तं मनो योगेश्वरोऽवतु ॥ २४ ॥
indriyāṇi hṛṣīkeśaḥ prāṇān nārāyaṇo ’vatu śvetadvīpa-patiś cittaṁ mano yogeśvaro ’vatu
हृषीकेश तुम्हारी इन्द्रियों की, नारायण तुम्हारे प्राणों की रक्षा करें; श्वेतद्वीपपति तुम्हारे चित्त की और योगेश्वर तुम्हारे मन की रक्षा करें।
श्लोक 25 (bhagavata.10.6.25)
पृश्निगर्भस्तु ते बुद्धिमात्मानं भगवान् परः । क्रीडन्तं पातु गोविन्दः शयानं पातु माधवः ॥ २५ ॥
pṛśnigarbhas tu te buddhim ātmānaṁ bhagavān paraḥ krīḍantaṁ pātu govindaḥ śayānaṁ pātu mādhavaḥ
पृश्निगर्भ तुम्हारी बुद्धि की और स्वयं परम भगवान तुम्हारी आत्मा की रक्षा करें; खेलते समय गोविन्द तुम्हारी और सोते समय माधव तुम्हारी रक्षा करें।
श्लोक 26 (bhagavata.10.6.26)
व्रजन्तमव्याद्वैकुण्ठ आसीनं त्वां श्रियः पतिः । भुञ्जानं यज्ञभुक् पातु सर्वग्रहभयङ्करः ॥ २६ ॥
vrajantam avyād vaikuṇṭha āsīnaṁ tvāṁ śriyaḥ patiḥ bhuñjānaṁ yajñabhuk pātu sarva-graha-bhayaṅkaraḥ
चलते समय वैकुण्ठ तुम्हारी और बैठते समय लक्ष्मीपति तुम्हारी रक्षा करें; भोजन करते समय समस्त ग्रहों को भयभीत करने वाले यज्ञभुक तुम्हारी रक्षा करें।
श्लोक 27 (bhagavata.10.6.27)
डाकिन्यो यातुधान्यश्च कुष्माण्डा येऽर्भकग्रहाः । भूतप्रेतपिशाचाश्च यक्षरक्षोविनायकाः ॥ २७ ॥
ḍākinyo yātudhānyaś ca kuṣmāṇḍā ye ’rbhaka-grahāḥ bhūta-preta-piśācāś ca yakṣa-rakṣo-vināyakāḥ
डाकिनियाँ, यातुधानियाँ और कुष्माण्ड नामक बालग्रह; भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस और विनायक —
श्लोक 28 (bhagavata.10.6.28)
कोटरा रेवती ज्येष्ठा पूतना मातृकादयः । उन्मादा ये ह्यपस्मारा देहप्राणेन्द्रियद्रुहः ॥ २८ ॥
koṭarā revatī jyeṣṭhā pūtanā mātṛkādayaḥ unmādā ye hy apasmārā deha-prāṇendriya-druhaḥ
कोटरा, रेवती, ज्येष्ठा, पूतना और मातृकाएँ; तथा उन्माद और अपस्मार के वे ग्रह जो शरीर, प्राण और इन्द्रियों को पीड़ा देते हैं —
श्लोक 29 (bhagavata.10.6.29)
स्वप्नदृष्टा महोत्पाता वृद्धा बालग्रहाश्च ये । सर्वे नश्यन्तु ते विष्णोर्नामग्रहणभीरवः ॥ २९ ॥
svapna-dṛṣṭā mahotpātā vṛddhā bāla-grahāś ca ye sarve naśyantu te viṣṇor nāma-grahaṇa-bhīravaḥ
स्वप्नों में दिखने वाले महान अपशकुन, और वृद्धा बालग्रह — ये सभी विष्णु के नाम के उच्चारण से भयभीत होकर नष्ट हो जाएँ।
श्लोक 30 (bhagavata.10.6.30)
श्रीशुक उवाच इति प्रणयबद्धाभिर्गोपीभिः कृतरक्षणम् । पाययित्वा स्तनं माता सन्न्यवेशयदात्मजम् ॥ ३० ॥
śrī-śuka uvāca iti praṇaya-baddhābhir gopībhiḥ kṛta-rakṣaṇam pāyayitvā stanaṁ mātā sannyaveśayad ātmajam
श्रीशुक ने कहा — इस प्रकार स्नेह से बँधी गोपियों द्वारा जब बालक की रक्षा सम्पन्न हो गई, तब माता यशोदा ने उसे स्तनपान कराकर शय्या पर सुला दिया।
श्लोक 31 (bhagavata.10.6.31)
तावन्नन्दादयो गोपा मथुराया व्रजं गताः । विलोक्य पूतनादेहं बभूवुरतिविस्मिताः ॥ ३१ ॥
tāvan nandādayo gopā mathurāyā vrajaṁ gatāḥ vilokya pūtanā-dehaṁ babhūvur ativismitāḥ
इसी बीच नन्द आदि गोप मथुरा से व्रज लौट रहे थे। मार्ग में पूतना के शरीर को देखकर वे अत्यन्त विस्मित हो गए।
श्लोक 32 (bhagavata.10.6.32)
नूनं बतर्षिः सञ्जातो योगेशो वा समास सः । स एव दृष्टो ह्युत्पातो यदाहानकदुन्दुभिः ॥ ३२ ॥
nūnaṁ batarṣiḥ sañjāto yogeśo vā samāsa saḥ sa eva dṛṣṭo hy utpāto yad āhānakadundubhiḥ
उन्होंने कहा — "निश्चय ही आनकदुन्दुभि कोई महान् ऋषि या योगेश्वर बन गए हैं, क्योंकि उन्होंने ठीक इसी उत्पात को पहले ही देख लिया था।"
श्लोक 33 (bhagavata.10.6.33)
कलेवरं परशुभिश्छित्त्वा तत्ते व्रजौकसः । दूरे क्षिप्त्वावयवशो न्यदहन् काष्ठवेष्टितम् ॥ ३३ ॥
kalevaraṁ paraśubhiś chittvā tat te vrajaukasaḥ dūre kṣiptvāvayavaśo nyadahan kāṣṭha-veṣṭitam
व्रजवासियों ने उस विशाल शरीर को कुल्हाड़ियों से टुकड़े-टुकड़े काट डाला, टुकड़ों को दूर फेंककर काठ से ढककर जला दिया।
श्लोक 34 (bhagavata.10.6.34)
दह्यमानस्य देहस्य धूमश्चागुरुसौरभः । उत्थितः कृष्णनिर्भुक्तसपद्याहतपाप्मनः ॥ ३४ ॥
dahyamānasya dehasya dhūmaś cāguru-saurabhaḥ utthitaḥ kṛṣṇa-nirbhukta- sapady āhata-pāpmanaḥ
जलते हुए उस शरीर से अगुरु के समान सुगन्धित धुआँ उठने लगा, क्योंकि कृष्ण द्वारा स्तनपान किए जाने मात्र से उसके सारे पाप तत्क्षण नष्ट हो चुके थे।
श्लोक 35 (bhagavata.10.6.35)
पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना । जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाप सद्गतिम् ॥ ३५ ॥
pūtanā loka-bāla-ghnī rākṣasī rudhirāśanā jighāṁsayāpi haraye stanaṁ dattvāpa sad-gatim
पूतना, जो संसार के शिशुओं का वध करने वाली रक्तपायिनी राक्षसी थी, मारने की इच्छा से ही सही, हरि को स्तन देकर भी सद्गति को प्राप्त हो गई।
श्लोक 36 (bhagavata.10.6.36)
किं पुनः श्रद्धया भक्त्या कृष्णाय परमात्मने । यच्छन् प्रियतमं किं नु रक्तास्तन्मातरो यथा ॥ ३६ ॥
kiṁ punaḥ śraddhayā bhaktyā kṛṣṇāya paramātmane yacchan priyatamaṁ kiṁ nu raktās tan-mātaro yathā
फिर उनकी तो बात ही क्या, जो श्रद्धा और भक्ति से परमात्मा कृष्ण को अपनी अत्यन्त प्रिय वस्तु अर्पित करती हैं, ठीक वैसे ही जैसे वास्तविक स्नेहवती माताएँ करती हैं?
श्लोक 37 (bhagavata.10.6.37)
पद्भ्यां भक्तहृदिस्थाभ्यां वन्द्याभ्यां लोकवन्दितैः । अङ्गं यस्याः समाक्रम्य भगवानपितत् स्तनम् ॥ ३७ ॥
padbhyāṁ bhakta-hṛdi-sthābhyāṁ vandyābhyāṁ loka-vanditaiḥ aṅgaṁ yasyāḥ samākramya bhagavān api tat-stanam
जिन चरणों का निवास भक्तों के हृदय में है, और जिनकी वन्दना उन महापुरुषों द्वारा भी की जाती है जो स्वयं समस्त लोक द्वारा वन्दित हैं — उन्हीं चरणों से भगवान ने उसके शरीर पर चढ़कर उसका स्तन ग्रहण किया।
श्लोक 38 (bhagavata.10.6.38)
यातुधान्यपि सा स्वर्गमवाप जननीगतिम् । कृष्णभुक्तस्तनक्षीराः किमु गावोऽनुमातरः ॥ ३८ ॥
yātudhāny api sā svargam avāpa jananī-gatim kṛṣṇa-bhukta-stana-kṣīrāḥ kim u gāvo ’numātaraḥ
राक्षसी होते हुए भी उसने स्वर्ग और माता का पद प्राप्त कर लिया। फिर उन गौओं की तो बात ही क्या, जिनके स्तनों का दूध कृष्ण ने पिया और जो माताओं की भाँति उनके पीछे-पीछे चलती थीं?
श्लोक 39 (bhagavata.10.6.39)
पयांसि यासामपिबत् पुत्रस्नेहस्नुतान्यलम् । भगवान् देवकीपुत्रः कैवल्याद्यखिलप्रदः ॥ ३९ ॥
payāṁsi yāsām apibat putra-sneha-snutāny alam bhagavān devakī-putraḥ kaivalyādy-akhila-pradaḥ
देवकीनन्दन भगवान, जो कैवल्य आदि सभी वरदानों के दाता हैं, उन गोपियों के स्तनों से पुत्रस्नेहवश बहते हुए दूध को भरपूर पीते थे।
श्लोक 40 (bhagavata.10.6.40)
तासामविरतं कृष्णे कुर्वतीनां सुतेक्षणम् । न पुनः कल्पते राजन् संसारोऽज्ञानसम्भवः ॥ ४० ॥
tāsām avirataṁ kṛṣṇe kurvatīnāṁ sutekṣaṇam na punaḥ kalpate rājan saṁsāro ’jñāna-sambhavaḥ
हे राजन्, जो स्त्रियाँ निरन्तर कृष्ण को पुत्र-दृष्टि से देखती रहीं, उनके लिए अज्ञान से उत्पन्न यह संसार पुनः कभी सम्भव नहीं होता।
श्लोक 41 (bhagavata.10.6.41)
कटधूमस्य सौरभ्यमवघ्राय व्रजौकसः । किमिदं कुत एवेति वदन्तो व्रजमाययुः ॥ ४१ ॥
kaṭa-dhūmasya saurabhyam avaghrāya vrajaukasaḥ kim idaṁ kuta eveti vadanto vrajam āyayuḥ
उस चिता के धुएँ की सुगन्ध को सूँघकर दूर-दूर के व्रजवासी यह पूछते हुए कि "यह क्या है, और कहाँ से आ रहा है?", व्रज की ओर आ पहुँचे।
श्लोक 42 (bhagavata.10.6.42)
ते तत्र वर्णितं गोपैः पूतनागमनादिकम् । श्रुत्वा तन्निधनं स्वस्ति शिशोश्चासन् सुविस्मिताः ॥ ४२ ॥
te tatra varṇitaṁ gopaiḥ pūtanāgamanādikam śrutvā tan-nidhanaṁ svasti śiśoś cāsan suvismitāḥ
उन्होंने वहाँ गोपों से पूतना के आगमन और उसके वध का सारा वृत्तान्त तथा शिशु के कुशल-क्षेम का समाचार सुनकर अत्यन्त विस्मय व्यक्त किया।
श्लोक 43 (bhagavata.10.6.43)
नन्दः स्वपुत्रमादाय प्रेत्यागतमुदारधीः । मूर्ध्न्युपाघ्राय परमां मुदं लेभे कुरूद्वह ॥ ४३ ॥
nandaḥ sva-putram ādāya pretyāgatam udāra-dhīḥ mūrdhny upāghrāya paramāṁ mudaṁ lebhe kurūdvaha
हे कुरुश्रेष्ठ, उदारचित्त नन्द ने अपने पुत्र को इस प्रकार गोद में उठाया मानो वह मृत्यु के मुख से लौटकर आया हो, और उसका मस्तक सूँघकर परम आनन्द का अनुभव किया।
श्लोक 44 (bhagavata.10.6.44)
य एतत् पूतनामोक्षं कृष्णस्यार्भकमद्भुतम् । शृणुयाच्छ्रद्धया मर्त्यो गोविन्दे लभते रतिम् ॥ ४४ ॥
ya etat pūtanā-mokṣaṁ kṛṣṇasyārbhakam adbhutam śṛṇuyāc chraddhayā martyo govinde labhate ratim
जो मरणधर्मा मनुष्य कृष्ण की इस अद्भुत बाल-लीला — पूतना-मोक्ष — को श्रद्धापूर्वक सुनता है, वह गोविन्द में अनुराग को प्राप्त होता है।