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दशम स्कन्ध · अध्याय 7

तृणावर्त-वध

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (bhagavata.10.7.1)

श्रीराजोवाच येन येनावतारेण भगवान् हरिरीश्वरः । करोति कर्णरम्याणि मनोज्ञानि च नः प्रभो ॥ १ ॥

śrī-rājovāca yena yenāvatāreṇa bhagavān harir īśvaraḥ karoti karṇa-ramyāṇi mano-jñāni ca naḥ prabho

राजा ने कहा — हे प्रभो, भगवान हरि ईश्वर जिस-जिस अवतार में हमारे लिए कर्णप्रिय और मनोहर कर्म करते हैं —

श्लोक 2 (bhagavata.10.7.2)

यच्छृण्वतोऽपैत्यरतिर्वितृष्णा सत्त्वं च शुद्ध्यत्यचिरेण पुंसः । भक्तिर्हरौ तत्पुरुषे च सख्यं तदेव हारं वद मन्यसे चेत् ॥ २ ॥

yac-chṛṇvato ’paity aratir vitṛṣṇā sattvaṁ ca śuddhyaty acireṇa puṁsaḥ bhaktir harau tat-puruṣe ca sakhyaṁ tad eva hāraṁ vada manyase cet

— जिसे सुनकर मनुष्य की अरति और तृष्णा दूर हो जाती है, उसका अन्तःकरण शीघ्र शुद्ध हो जाता है, और हरि के प्रति भक्ति तथा उनके भक्तों के प्रति सख्यभाव जाग्रत होता है — यदि आप उचित समझें, तो वही कथा एक हार के समान मुझे सुनाइए।

श्लोक 3 (bhagavata.10.7.3)

अथान्यदपि कृष्णस्य तोकाचरितमद्भुतम् । मानुषं लोकमासाद्य तज्जातिमनुरुन्धतः ॥ ३ ॥

athānyad api kṛṣṇasya tokācaritam adbhutam mānuṣaṁ lokam āsādya taj-jātim anurundhataḥ

अब मुझे कृष्ण की अन्य अद्भुत बाल-लीलाएँ भी सुनाइए, जो उन्होंने मनुष्य-लोक में जन्म लेकर उस अवस्था के अनुरूप आचरण करते हुए कीं।

श्लोक 4 (bhagavata.10.7.4)

श्रीशुक उवाच कदाचिदौत्थानिककौतुकाप्लवे जन्मर्क्षयोगे समवेतयोषिताम् । वादित्रगीतद्विजमन्त्रवाचकै- श्चकार सूनोरभिषेचनं सती ॥ ४ ॥

śrī-śuka uvāca kadācid autthānika-kautukāplave janmarkṣa-yoge samaveta-yoṣitām vāditra-gīta-dvija-mantra-vācakaiś cakāra sūnor abhiṣecanaṁ satī

श्रीशुक ने कहा — एक बार, उत्थान-उत्सव के आनन्दमय अवसर पर, जब चन्द्रमा पुनः जन्म-नक्षत्र के योग में आया, तब सती यशोदा ने एकत्रित स्त्रियों तथा वाद्य, गीत और मन्त्रोच्चार करने वाले ब्राह्मणों के साथ अपने पुत्र का अभिषेक-संस्कार सम्पन्न किया।

श्लोक 5 (bhagavata.10.7.5)

नन्दस्य पत्नी कृतमज्जनादिकं विप्रैः कृतस्वस्त्ययनं सुपूजितैः । अन्नाद्यवासःस्रगभीष्टधेनुभिः सञ्जातनिद्राक्षमशीशयच्छनैः ॥ ५ ॥

nandasya patnī kṛta-majjanādikaṁ vipraiḥ kṛta-svastyayanaṁ supūjitaiḥ annādya-vāsaḥ-srag-abhīṣṭa-dhenubhiḥ sañjāta-nidrākṣam aśīśayac chanaiḥ

नन्द-पत्नी ने स्नान-आदि संस्कार पूर्ण करके, मंगल-कृत्य सम्पन्न करने वाले ब्राह्मणों का अन्न, वस्त्र, माला और उत्तम गौओं से समुचित सम्मान किया। तत्पश्चात् बालक को निद्रा से आतुर देखकर उन्होंने उसे धीरे से सुला दिया।

श्लोक 6 (bhagavata.10.7.6)

औत्थानिकौत्सुक्यमना मनस्विनी समागतान् पूजयती व्रजौकसः । नैवाशृणोद् वै रुदितं सुतस्य सा रुदन् स्तनार्थी चरणावुदक्षिपत् ॥ ६ ॥

autthānikautsukya-manā manasvinī samāgatān pūjayatī vrajaukasaḥ naivāśṛṇod vai ruditaṁ sutasya sā rudan stanārthī caraṇāv udakṣipat

उत्सव की व्यस्तता में मग्न, उदारहृदया यशोदा व्रज के एकत्रित लोगों के सत्कार में लगी थीं, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र का रुदन नहीं सुना; और वह बालक स्तनपान के लिए रोता हुआ अपने पैर ऊपर उछालने लगा।

श्लोक 7 (bhagavata.10.7.7)

अधःशयानस्य शिशोरनोऽल्पक- प्रवालमृद्वङ्घ्रिहतं व्यवर्तत । विध्वस्तनानारसकुप्यभाजनं व्यत्यस्तचक्राक्षविभिन्नकूबरम् ॥ ७ ॥

adhaḥ-śayānasya śiśor ano ’lpaka- pravāla-mṛdv-aṅghri-hataṁ vyavartata vidhvasta-nānā-rasa-kupya-bhājanaṁ vyatyasta-cakrākṣa-vibhinna-kūbaram

गाड़ी के नीचे लेटे हुए उस शिशु ने अपने कोमल, नवपल्लव-से मृदु पैरों से उसे ठोकर मारी, और गाड़ी उलट कर बिखर गई — उस पर रखे विविध धातुओं के बर्तन इधर-उधर टूट-फूट गए, पहिए और धुरी अलग हो गए, और जुआ टूट गया।

श्लोक 8 (bhagavata.10.7.8)

दृष्ट्वा यशोदाप्रमुखा व्रजस्त्रिय औत्थानिके कर्मणि याः समागताः । नन्दादयश्चाद्भुतदर्शनाकुलाः कथं स्वयं वै शकटं विपर्यगात् ॥ ८ ॥

dṛṣṭvā yaśodā-pramukhā vraja-striya autthānike karmaṇi yāḥ samāgatāḥ nandādayaś cādbhuta-darśanākulāḥ kathaṁ svayaṁ vai śakaṭaṁ viparyagāt

यह देखकर उत्थान-संस्कार हेतु एकत्रित यशोदा-प्रमुख व्रज-स्त्रियाँ तथा नन्द आदि सब लोग उस अद्भुत दृश्य को देखकर विस्मित हो गए, और सोचने लगे कि गाड़ी अपने आप कैसे उलट गई।

श्लोक 9 (bhagavata.10.7.9)

ऊचुरव्यवसितमतीन् गोपान्गोपीश्च बालकाः । रुदतानेन पादेन क्षिप्तमेतन्न संशयः ॥ ९ ॥

ūcur avyavasita-matīn gopān gopīś ca bālakāḥ rudatānena pādena kṣiptam etan na saṁśayaḥ

उन असमंजस में पड़े गोप-गोपियों से बालकों ने कहा — "इसे तो इस रोते हुए शिशु के पैर ने ही उलटा है, इसमें कोई सन्देह नहीं।"

श्लोक 10 (bhagavata.10.7.10)

न ते श्रद्दधिरे गोपा बालभाषितमित्युत । अप्रमेयं बलं तस्य बालकस्य न ते विदुः ॥ १० ॥

na te śraddadhire gopā bāla-bhāṣitam ity uta aprameyaṁ balaṁ tasya bālakasya na te viduḥ

किन्तु गोपों ने इसे मात्र बालकों की बात समझकर विश्वास नहीं किया; उन्हें उस शिशु के अप्रमेय बल का ज्ञान ही नहीं था।

श्लोक 11 (bhagavata.10.7.11)

रुदन्तं सुतमादाय यशोदा ग्रहशङ्किता । कृतस्वस्त्ययनं विप्रैः सूक्तैः स्तनमपाययत् ॥ ११ ॥

rudantaṁ sutam ādāya yaśodā graha-śaṅkitā kṛta-svastyayanaṁ vipraiḥ sūktaiḥ stanam apāyayat

किसी अशुभ ग्रह की आशंका से यशोदा ने रोते हुए पुत्र को गोद में उठा लिया, और ब्राह्मणों द्वारा वैदिक सूक्तों से स्वस्तिवाचन कराने के बाद उसे स्तनपान कराया।

श्लोक 12 (bhagavata.10.7.12)

पूर्ववत् स्थापितं गोपैर्बलिभिः सपरिच्छदम् । विप्रा हुत्वार्चयांचक्रुर्दध्यक्षतकुशाम्बुभिः ॥ १२ ॥

pūrvavat sthāpitaṁ gopair balibhiḥ sa-paricchadam viprā hutvārcayāṁ cakrur dadhy-akṣata-kuśāmbubhiḥ

बलवान गोपों ने गाड़ी को उसके सामान सहित पुनः पहले की तरह खड़ा कर दिया, और ब्राह्मणों ने हवन करके दही, अक्षत, कुश और जल से पूजा सम्पन्न की।

श्लोक 13 (bhagavata.10.7.13)

येऽसूयानृतदम्भेर्षाहिंसामानविवर्जिताः । न तेषां सत्यशीलानामाशिषो विफलाः कृताः ॥ १३ ॥

ye ’sūyānṛta-dambherṣā- hiṁsā-māna-vivarjitāḥ na teṣāṁ satya-śīlānām āśiṣo viphalāḥ kṛtāḥ

जो ईर्ष्या, असत्य, दम्भ, द्वेष और हिंसा से रहित हैं तथा सत्यनिष्ठ हैं, उन ब्राह्मणों का आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं होता।

श्लोक 14 (bhagavata.10.7.14)

इति बालकमादाय सामर्ग्यजुरुपाकृतैः । जलैः पवित्रौषधिभिरभिषिच्य द्विजोत्तमैः ॥ १४ ॥

iti bālakam ādāya sāmarg-yajur-upākṛtaiḥ jalaiḥ pavitrauṣadhibhir abhiṣicya dvijottamaiḥ

यह सोचकर नन्द ने बालक को गोद में लिया, और श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने सामवेद, ऋग्वेद तथा यजुर्वेद के मन्त्रों का उच्चारण करते हुए पवित्र औषधियों से युक्त जल द्वारा उसका अभिषेक किया।

श्लोक 15 (bhagavata.10.7.15)

वाचयित्वा स्वस्त्ययनं नन्दगोपः समाहितः । हुत्वा चाग्निं द्विजातिभ्यः प्रादादन्नं महागुणम् ॥ १५ ॥

vācayitvā svastyayanaṁ nanda-gopaḥ samāhitaḥ hutvā cāgniṁ dvijātibhyaḥ prādād annaṁ mahā-guṇam

नन्द ने पूर्ण एकाग्रता के साथ स्वस्तिवाचन कराया, अग्नि में हवन किया, और तत्पश्चात् ब्राह्मणों को उत्तम गुणों से युक्त भोजन प्रदान किया।

श्लोक 16 (bhagavata.10.7.16)

गावः सर्वगुणोपेता वासःस्रग्रुक्ममालिनीः । आत्मजाभ्युदयार्थाय प्रादात्ते चान्वयुञ्जत ॥ १६ ॥

gāvaḥ sarva-guṇopetā vāsaḥ-srag-rukma-mālinīḥ ātmajābhyudayārthāya prādāt te cānvayuñjata

अपने पुत्र के कल्याण के लिए उन्होंने सभी गुणों से सम्पन्न, वस्त्र, माला और स्वर्ण-हार से अलंकृत गौएँ ब्राह्मणों को दान कीं, और ब्राह्मणों ने उन्हें ग्रहण कर आशीर्वाद प्रदान किया।

श्लोक 17 (bhagavata.10.7.17)

विप्रा मन्त्रविदो युक्तास्तैर्याः प्रोक्तास्तथाशिषः । ता निष्फला भविष्यन्ति न कदाचिदपि स्फुटम् ॥ १७ ॥

viprā mantra-vido yuktās tair yāḥ proktās tathāśiṣaḥ tā niṣphalā bhaviṣyanti na kadācid api sphuṭam

मन्त्रों के ज्ञाता और योगयुक्त उन ब्राह्मणों द्वारा दिए गए आशीर्वाद निश्चय ही कभी निष्फल नहीं होते।

श्लोक 18 (bhagavata.10.7.18)

एकदारोहमारूढं लालयन्ती सुतं सती । गरिमाणं शिशोर्वोढुं न सेहे गिरिकूटवत् ॥ १८ ॥

ekadāroham ārūḍhaṁ lālayantī sutaṁ satī garimāṇaṁ śiśor voḍhuṁ na sehe giri-kūṭavat

एक दिन सती यशोदा अपनी गोद में चढ़े हुए पुत्र को दुलार रही थीं, तभी उन्हें लगा कि वह पर्वत-शिखर के समान भारी हो गया है और वे उसका भार सहन नहीं कर पा रही हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.10.7.19)

भूमौ निधाय तं गोपी विस्मिता भारपीडिता । महापुरुषमादध्यौ जगतामास कर्मसु ॥ १९ ॥

bhūmau nidhāya taṁ gopī vismitā bhāra-pīḍitā mahā-puruṣam ādadhyau jagatām āsa karmasu

उस भार से पीड़ित और विस्मित होकर गोपी ने उसे भूमि पर बिठा दिया और परम पुरुष का स्मरण करते हुए पुनः अपने गृहकार्यों में लग गईं।

श्लोक 20 (bhagavata.10.7.20)

दैत्यो नाम्ना तृणावर्तः कंसभृत्यः प्रणोदितः । चक्रवातस्वरूपेण जहारासीनमर्भकम् ॥ २० ॥

daityo nāmnā tṛṇāvartaḥ kaṁsa-bhṛtyaḥ praṇoditaḥ cakravāta-svarūpeṇa jahārāsīnam arbhakam

तभी कंस के भृत्य त्रिणावर्त नामक दैत्य ने, कंस द्वारा प्रेरित होकर, बवण्डर का रूप धारण किया और वहाँ बैठे हुए शिशु को उठा ले गया।

श्लोक 21 (bhagavata.10.7.21)

गोकुलं सर्वमावृण्वन् मुष्णंश्चक्षूंषि रेणुभिः । ईरयन् सुमहाघोरशब्देन प्रदिशो दिशः ॥ २१ ॥

gokulaṁ sarvam āvṛṇvan muṣṇaṁś cakṣūṁṣi reṇubhiḥ īrayan sumahā-ghora- śabdena pradiśo diśaḥ

सम्पूर्ण गोकुल को ढक कर, धूल से सबकी आँखों को अन्धा करते हुए, उसने अत्यन्त भयंकर शब्द से सभी दिशाओं को गुँजा दिया।

श्लोक 22 (bhagavata.10.7.22)

मुहूर्तमभवद् गोष्ठं रजसा तमसावृतम् । सुतं यशोदा नापश्यत्तस्मिन् न्यस्तवती यतः ॥ २२ ॥

muhūrtam abhavad goṣṭhaṁ rajasā tamasāvṛtam sutaṁ yaśodā nāpaśyat tasmin nyastavatī yataḥ

एक क्षण के लिए सारा गोशाला धूल से घिरकर अन्धकारमय हो गया, और जिस स्थान पर यशोदा ने अपने पुत्र को बिठाया था, वहाँ वे उसे देख न सकीं।

श्लोक 23 (bhagavata.10.7.23)

नापश्यत्कश्चनात्मानं परं चापि विमोहितः । तृणावर्तनिसृष्टाभिः शर्कराभिरुपद्रुतः ॥ २३ ॥

nāpaśyat kaścanātmānaṁ paraṁ cāpi vimohitaḥ tṛṇāvarta-nisṛṣṭābhiḥ śarkarābhir upadrutaḥ

त्रिणावर्त द्वारा फेंके गए कंकड़ों से त्रस्त होकर कोई भी न तो अपने आप को देख पा रहा था, न दूसरों को; सब कुछ मोहग्रस्त हो गया था।

श्लोक 24 (bhagavata.10.7.24)

इति खरपवनचक्रपांशुवर्षे सुतपदवीमबलाविलक्ष्य माता । अतिकरुणमनुस्मरन्त्यशोचद् भुवि पतिता मृतवत्सका यथा गौः ॥ २४ ॥

iti khara-pavana-cakra-pāṁśu-varṣe suta-padavīm abalāvilakṣya mātā atikaruṇam anusmaranty aśocad bhuvi patitā mṛta-vatsakā yathā gauḥ

इस प्रकार उस प्रचण्ड बवण्डर की धूल-वर्षा में असहाय माता अपने पुत्र का कोई निशान न पाकर, अत्यन्त करुण भाव से उसे स्मरण करती हुई भूमि पर गिर पड़ीं, ठीक वैसे ही जैसे बछड़ा खो चुकी गाय विलाप करती है।

श्लोक 25 (bhagavata.10.7.25)

रुदितमनुनिशम्य तत्र गोप्यो भृशमनुतप्तधियोऽश्रुपूर्णमुख्यः । रुरुदुरनुपलभ्य नन्दसूनुं पवन उपारतपांशुवर्षवेगे ॥ २५ ॥

ruditam anuniśamya tatra gopyo bhṛśam anutapta-dhiyo ’śru-pūrṇa-mukhyaḥ rurudur anupalabhya nanda-sūnuṁ pavana upārata-pāṁśu-varṣa-vege

उसका विलाप सुनकर अन्य गोपियों के हृदय भी गहरे शोक से भर उठे और उनके मुख आँसुओं से भीग गए; बवण्डर की प्रचण्डता शान्त होने पर भी नन्दसुत को न पाकर वे भी रो पड़ीं।

श्लोक 26 (bhagavata.10.7.26)

तृणावर्तः शान्तरयो वात्यारूपधरो हरन् । कृष्णं नभोगतो गन्तुं नाशक्नोद् भूरिभारभृत् ॥ २६ ॥

tṛṇāvartaḥ śānta-rayo vātyā-rūpa-dharo haran kṛṣṇaṁ nabho-gato gantuṁ nāśaknod bhūri-bhāra-bhṛt

बवण्डर का रूप धारण करके कृष्ण को आकाश में ले जाने वाला त्रिणावर्त अत्यधिक भार वहन करने के कारण अपने वेग को रोककर आगे न बढ़ सका।

श्लोक 27 (bhagavata.10.7.27)

तमश्मानं मन्यमान आत्मनो गुरुमत्तया । गले गृहीत उत्स्रष्टुं नाशक्नोदद्भुतार्भकम् ॥ २७ ॥

tam aśmānaṁ manyamāna ātmano guru-mattayā gale gṛhīta utsraṣṭuṁ nāśaknod adbhutārbhakam

उसके भारीपन के कारण उसे पत्थर समझकर, और अब स्वयं गले से पकड़े जाने पर, वह उस अद्भुत शिशु को छोड़ भी नहीं पा रहा था।

श्लोक 28 (bhagavata.10.7.28)

गलग्रहणनिश्चेष्टो दैत्यो निर्गतलोचनः । अव्यक्तरावो न्यपतत्सहबालो व्यसुर्व्रजे ॥ २८ ॥

gala-grahaṇa-niśceṣṭo daityo nirgata-locanaḥ avyakta-rāvo nyapatat saha-bālo vyasur vraje

गले की पकड़ से निश्चेष्ट, आँखें बाहर निकली हुई, और चीत्कार तक न कर सकने की स्थिति में, वह दैत्य बालक के साथ ही व्रज में प्राणहीन होकर गिर पड़ा।

श्लोक 29 (bhagavata.10.7.29)

तमन्तरिक्षात् पतितं शिलायां विशीर्णसर्वावयवं करालम् । पुरं यथा रुद्रशरेण विद्धं स्त्रियो रुदत्यो ददृशुः समेताः ॥ २९ ॥

tam antarikṣāt patitaṁ śilāyāṁ viśīrṇa-sarvāvayavaṁ karālam puraṁ yathā rudra-śareṇa viddhaṁ striyo rudatyo dadṛśuḥ sametāḥ

विलाप करती हुई एकत्रित स्त्रियों ने देखा कि वह भयंकर दैत्य आकाश से एक शिला पर गिरकर अंग-अंग टूट गया था — मानो रुद्र के बाण से बिंधा हुआ त्रिपुर हो।

श्लोक 30 (bhagavata.10.7.30)

प्रादाय मात्रे प्रतिहृत्य विस्मिताः कृष्णं च तस्योरसि लम्बमानम् । तं स्वस्तिमन्तं पुरुषादनीतं विहायसा मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् । गोप्यश्च गोपाः किल नन्दमुख्या लब्ध्वा पुनः प्रापुरतीव मोदम् ॥ ३० ॥

prādāya mātre pratihṛtya vismitāḥ kṛṣṇaṁ ca tasyorasi lambamānam taṁ svastimantaṁ puruṣāda-nītaṁ vihāyasā mṛtyu-mukhāt pramuktam gopyaś ca gopāḥ kila nanda-mukhyā labdhvā punaḥ prāpur atīva modam

विस्मित होकर उन्होंने राक्षस की छाती पर पड़े कृष्ण को उठाया और माता के पास ले गईं — वे पूर्णतः कुशल थे, यद्यपि उस नरभक्षी द्वारा आकाश-मार्ग से ले जाए गए थे, फिर भी मृत्यु के मुख से मुक्त होकर लौटे थे। नन्द-प्रमुख गोपी और गोप उन्हें पुनः पाकर अत्यधिक आनन्दित हो उठे।

श्लोक 31 (bhagavata.10.7.31)

अहो बतात्यद्भुतमेष रक्षसा बालो निवृत्तिं गमितोऽभ्यगात् पुनः । हिंस्रः स्वपापेन विहिंसितः खलः साधुः समत्वेन भयाद् विमुच्यते ॥ ३१ ॥

aho batāty-adbhutam eṣa rakṣasā bālo nivṛttiṁ gamito ’bhyagāt punaḥ hiṁsraḥ sva-pāpena vihiṁsitaḥ khalaḥ sādhuḥ samatvena bhayād vimucyate

"अहो, यह कितना अद्भुत है — यह बालक, जिसे राक्षस विनाश के लिए ले गया था, पुनः लौट आया है! क्रूर और दुष्ट अपने ही पाप से नष्ट हो गया, जबकि निर्दोष अपनी निर्दोषता के कारण ही भय से मुक्त हो जाता है।"

श्लोक 32 (bhagavata.10.7.32)

किं नस्तपश्चीर्णमधोक्षजार्चनं पूर्तेष्टदत्तमुत भूतसौहृदम् । यत्सम्परेतः पुनरेव बालको दिष्टया स्वबन्धून् प्रणयन्नुपस्थितः ॥ ३२ ॥

kiṁ nas tapaś cīrṇam adhokṣajārcanaṁ pūrteṣṭa-dattam uta bhūta-sauhṛdam yat samparetaḥ punar eva bālako diṣṭyā sva-bandhūn praṇayann upasthitaḥ

"हमने न जाने कैसी तपस्या की होगी, अधोक्षज की कैसी आराधना, पुण्य-कार्य और दान, तथा प्राणियों के प्रति कैसा सद्भाव रखा होगा — कि मृत्यु के मुख में जाकर भी यह बालक सौभाग्य से पुनः अपने बन्धुओं के हृदय में प्रेम भर देने लौट आया है!"

श्लोक 33 (bhagavata.10.7.33)

दृष्ट्वाद्भुतानि बहुशो नन्दगोपो बृहद्वने । वसुदेववचो भूयो मानयामास विस्मितः ॥ ३३ ॥

dṛṣṭvādbhutāni bahuśo nanda-gopo bṛhadvane vasudeva-vaco bhūyo mānayām āsa vismitaḥ

बृहद्वन में इतने सारे आश्चर्यजनक कार्य देखकर विस्मित नन्द ने वसुदेव के वचनों पर पुनः पूर्ण विश्वास किया।

श्लोक 34 (bhagavata.10.7.34)

एकदार्भकमादाय स्वाङ्कमारोप्य भामिनी । प्रस्नुतं पाययामास स्तनं स्नेहपरिप्लुता ॥ ३४ ॥

ekadārbhakam ādāya svāṅkam āropya bhāminī prasnutaṁ pāyayām āsa stanaṁ sneha-pariplutā

एक दिन उस स्नेहमयी माता ने बालक को गोद में उठाकर बिठाया और स्नेह से विह्वल होकर उसे अपने दूध से भरे स्तन का पान कराया।

श्लोक 35 (bhagavata.10.7.35)

पीतप्रायस्य जननी सुतस्य रुचिरस्मितम् । मुखं लालयती राजञ्जृम्भतो ददृशे इदम् ॥ ३५ ॥

pīta-prāyasya jananī sutasya rucira-smitam mukhaṁ lālayatī rājañ jṛmbhato dadṛśe idam

हे राजन्, जब पुत्र स्तनपान लगभग समाप्त कर चुका था और माता उसके मनोहर मुसकाते हुए मुख को दुलार रही थीं, तभी उसने जम्हाई ली — और तब उन्होंने यह देखा।

श्लोक 36 (bhagavata.10.7.36)

खं रोदसी ज्योतिरनीकमाशाः सूर्येन्दुवह्निश्वसनाम्बुधींश्च । द्वीपान् नगांस्तद्दुहितृर्वनानि भूतानि यानि स्थिरजङ्गमानि? ॥ ३६ ॥

khaṁ rodasī jyotir-anīkam āśāḥ sūryendu-vahni-śvasanāmbudhīṁś ca dvīpān nagāṁs tad-duhitṝr vanāni bhūtāni yāni sthira-jaṅgamāni

आकाश, स्वर्ग-पृथ्वी, नक्षत्रों के समूह, दिशाएँ, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु और समुद्र, द्वीप, पर्वत तथा उनकी पुत्री-सम नदियाँ, वन, और चर-अचर समस्त प्राणी —

श्लोक 37 (bhagavata.10.7.37)

सा वीक्ष्य विश्वं सहसा राजन् सञ्जातवेपथुः । सम्मील्य मृगशावाक्षी नेत्रे आसीत्सुविस्मिता ॥ ३७ ॥

sā vīkṣya viśvaṁ sahasā rājan sañjāta-vepathuḥ sammīlya mṛgaśāvākṣī netre āsīt suvismitā

— इस सम्पूर्ण विश्व को अचानक वहाँ देखकर, हे राजन्, वह मृगनयनी माता काँप उठीं और आँखें मूँदकर अत्यन्त विस्मित हो गईं।

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