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दशम स्कन्ध · अध्याय 67

बलराम द्वारा द्विविद वानर का वध

अध्याय 66अध्याय-सूचीअध्याय 68

श्लोक 1 (bhagavata.10.67.1)

श्रीराजोवाच भुयोऽहं श्रोतुमिच्छामि रामस्याद्भुतकर्मणः । अनन्तस्याप्रमेयस्य यदन्यत् कृतवान् प्रभुः ॥ १ ॥

śrī-rājovāca bhuyo ’haṁ śrotum icchāmi rāmasyādbhuta-karmaṇaḥ anantasyāprameyasya yad anyat kṛtavān prabhuḥ

श्री राजा ने कहा — मैं पुनः यह सुनना चाहता हूँ कि अद्भुत कर्मों वाले, अनन्त तथा अप्रमेय प्रभु बलराम ने और क्या-क्या किया।

श्लोक 2 (bhagavata.10.67.2)

श्रीशुक उवाच नरकस्य सखा कश्चिद् द्विविदो नाम वानरः । सुग्रीवसचिवः सोऽथ भ्राता मैन्दस्य वीर्यवान् ॥ २ ॥

śrī-śuka uvāca narakasya sakhā kaścid dvivido nāma vānaraḥ sugrīva-sacivaḥ so ’tha bhrātā maindasya vīryavān

श्री शुकदेव जी ने कहा — नरकासुर का एक मित्र द्विविद नामक वानर था, जो सुग्रीव का मंत्री तथा शक्तिशाली मैन्द का भाई था।

श्लोक 3 (bhagavata.10.67.3)

सख्युः सोऽपचितिं कुर्वन् वानरो राष्ट्रविप्लवम् । पुरग्रामाकरान् घोषानदहद् वह्निमुत्सृजन् ॥ ३ ॥

sakhyuḥ so ’pacitiṁ kurvan vānaro rāṣṭra-viplavam pura-grāmākarān ghoṣān adahad vahnim utsṛjan

अपने मित्र की मृत्यु का प्रतिशोध लेते हुए, उस वानर ने राज्य में उत्पात मचाया, तथा नगर, ग्राम, खान और गोप-बस्तियों में आग लगाकर उन्हें जला डाला।

श्लोक 4 (bhagavata.10.67.4)

क्वचित्स शैलानुत्पाट्य तैर्देशान् समचूर्णयत् । आनर्तान् सुतरामेव यत्रास्ते मित्रहा हरिः ॥ ४ ॥

kvacit sa śailān utpāṭya tair deśān samacūrṇayat ānartān sutarām eva yatrāste mitra-hā hariḥ

कभी वह पर्वतों को उखाड़कर उन्हीं से देशों को चूर-चूर कर देता, विशेषतः आनर्त प्रदेश को, जहाँ उसके मित्र का हन्ता हरि निवास करता था।

श्लोक 5 (bhagavata.10.67.5)

क्वचित् समुद्रमध्यस्थो दोर्भ्यामुत्क्षिप्य तज्जलम् । देशान् नागायुतप्राणो वेलाकूले न्यमज्जयत् ॥ ५ ॥

kvacit samudra-madhya-stho dorbhyām utkṣipya taj-jalam deśān nāgāyuta-prāṇo velā-kūle nyamajjayat

कभी समुद्र के मध्य खड़ा होकर, दस सहस्र हाथियों के बल वाला वह अपनी दोनों भुजाओं से जल उछालकर तटवर्ती प्रदेशों को जलमग्न कर देता।

श्लोक 6 (bhagavata.10.67.6)

आश्रमानृषिमुख्यानां कृत्वा भग्नवनस्पतीन् । अदूषयच्छकृन्मूत्रैरग्नीन् वैतानिकान् खलः ॥ ६ ॥

āśramān ṛṣi-mukhyānāṁ kṛtvā bhagna-vanaspatīn adūṣayac chakṛn-mūtrair agnīn vaitānikān khalaḥ

उस दुष्ट ने महर्षियों के आश्रमों के वृक्षों को तोड़-मरोड़कर तथा उनकी वैदिक अग्नियों को अपने मल-मूत्र से दूषित कर दिया।

श्लोक 7 (bhagavata.10.67.7)

पुरुषान् योषितो दृप्तः क्ष्माभृद्द्रोणीगुहासु सः । निक्षिप्य चाप्यधाच्छैलैः पेशष्कारीव कीटकम् ॥ ७ ॥

puruṣān yoṣito dṛptaḥ kṣmābhṛd-dronī-guhāsu saḥ nikṣipya cāpyadhāc chailaiḥ peśaṣkārīva kīṭakam

अहंकार से उन्मत्त वह पुरुषों और स्त्रियों को पर्वत की घाटियों की गुफाओं में डालकर उन्हें शिलाओं से इस प्रकार बन्द कर देता, जैसे भँवरी कीड़े को बन्द कर देती है।

श्लोक 8 (bhagavata.10.67.8)

एवं देशान् विप्रकुर्वन् दूषयंश्च कुलस्त्रियः । श्रुत्वा सुललितं गीतं गिरिं रैवतकं ययौ ॥ ८ ॥

evaṁ deśān viprakurvan dūṣayaṁś ca kula-striyaḥ śrutvā su-lalitaṁ gītaṁ giriṁ raivatakaṁ yayau

इस प्रकार देशों को उत्पीड़ित करते और कुलीन स्त्रियों को दूषित करते हुए, एक बार उसने अत्यन्त मधुर गीत सुना और रैवतक पर्वत की ओर चला गया।

श्लोक 9 (bhagavata.10.67.9)

तत्रापश्यद् यदुपतिं रामं पुष्करमालिनम् । सुदर्शनीयसर्वाङ्गं ललनायूथमध्यगम् ॥ ९ ॥

tatrāpaśyad yadu-patiṁ rāmaṁ puṣkara-mālinam sudarśanīya-sarvāṅgaṁ lalanā-yūtha-madhya-gam

वहाँ उसने यदुपति बलराम को देखा, जो कमल-माला धारण किए हुए, अपने समस्त अंगों से अत्यन्त सुन्दर तथा स्त्रियों के समूह के मध्य विराजमान थे।

श्लोक 10 (bhagavata.10.67.10)

गायन्तं वारुणीं पीत्वा मदविह्वललोचनम् । विभ्राजमानं वपुषा प्रभिन्नमिव वारणम् ॥ १० ॥

gāyantaṁ vāruṇīṁ pītvā mada-vihvala-locanam vibhrājamānaṁ vapuṣā prabhinnam iva vāraṇam

वे गा रहे थे, वारुणी-मदिरा का पान करने से उनके नेत्र मद से व्याकुल थे, और वे मस्त हाथी के समान अपने शरीर से देदीप्यमान हो रहे थे।

श्लोक 11 (bhagavata.10.67.11)

दुष्टः शाखामृगः शाखामारूढः कम्पयन् द्रुमान् । चक्रे किलकिलाशब्दमात्मानं सम्प्रदर्शयन् ॥ ११ ॥

duṣṭaḥ śākhā-mṛgaḥ śākhām ārūḍhaḥ kampayan drumān cakre kilakilā-śabdam ātmānaṁ sampradarśayan

उस दुष्ट वानर ने एक डाल पर चढ़कर वृक्षों को हिलाते हुए किल-किल शब्द किया और अपने को प्रकट किया।

श्लोक 12 (bhagavata.10.67.12)

तस्य धार्ष्ट्यं कपेर्वीक्ष्य तरुण्यो जातिचापलाः । हास्यप्रिया विजहसुर्बलदेवपरिग्रहाः ॥ १२ ॥

tasya dhārṣṭyaṁ kaper vīkṣya taruṇyo jāti-cāpalāḥ hāsya-priyā vijahasur baladeva-parigrahāḥ

बलदेव की उन पत्नियों ने, जो स्वभाव से ही चंचल तथा हास्यप्रिय युवतियाँ थीं, उस वानर की धृष्टता देखकर हँसना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 13 (bhagavata.10.67.13)

ता हेलयामास कपिर्भ्रूक्षेपैर्सम्मुखादिभिः । दर्शयन् स्वगुदं तासां रामस्य च निरीक्षितः ॥ १३ ॥

tā helayām āsa kapir bhrū-kṣepair sammukhādibhiḥ darśayan sva-gudaṁ tāsāṁ rāmasya ca nirīkṣitaḥ

बलराम के देखते-देखते ही वह वानर भौंहें नचाते हुए तथा उनके सामने आकर, उन्हें अपना गुदाभाग दिखाकर उनका उपहास करने लगा।

श्लोक 14 (bhagavata.10.67.14)

तं ग्राव्णा प्राहरत् क्रुद्धो बलः प्रहरतां वरः । स वञ्चयित्वा ग्रावाणं मदिराकलशं कपिः ॥ १४ ॥

taṁ grāvṇā prāharat kruddho balaḥ praharatāṁ varaḥ sa vañcayitvā grāvāṇaṁ madirā-kalaśaṁ kapiḥ

क्रुद्ध होकर योद्धाओं में श्रेष्ठ बलराम ने उस पर एक पत्थर फेंका, परन्तु वह चतुर वानर उस पत्थर से बचकर मदिरा के कलश को छीन ले गया।

श्लोक 15 (bhagavata.10.67.15)

गृहीत्वा हेलयामास धूर्तस्तं कोपयन् हसन् । निर्भिद्य कलशं दुष्टो वासांस्यास्फालयद् बलम् । कदर्थीकृत्य बलवान् विप्रचक्रे मदोद्धतः ॥ १५ ॥

gṛhītvā helayām āsa dhūrtas taṁ kopayan hasan nirbhidya kalaśaṁ duṣṭo vāsāṁsy āsphālayad balam kadarthī-kṛtya balavān vipracakre madoddhataḥ

उसे पकड़कर उस धूर्त ने हँसते-हँसते बलराम को क्रुद्ध किया; उस दुष्ट ने कलश तोड़ डाला और स्त्रियों के वस्त्र खींचकर बलराम को अपमानित किया; मद से उन्मत्त उस बलशाली वानर ने इस प्रकार उनका तिरस्कार किया।

श्लोक 16 (bhagavata.10.67.16)

तं तस्याविनयं दृष्ट्वा देशांश्च तदुपद्रुतान् । क्रुद्धो मुषलमादत्त हलं चारिजिघांसया ॥ १६ ॥

taṁ tasyāvinayaṁ dṛṣṭvā deśāṁś ca tad-upadrutān kruddho muṣalam ādatta halaṁ cāri-jighāṁsayā

उसकी इस उद्दण्डता को तथा उसके द्वारा उत्पीड़ित देशों को स्मरण कर, क्रुद्ध होकर बलराम ने अपने शत्रु का वध करने की इच्छा से मूसल और हल दोनों को उठा लिया।

श्लोक 17 (bhagavata.10.67.17)

द्विविदोऽपि महावीर्यः शालमुद्यम्य पाणिना । अभ्येत्य तरसा तेन बलं मूर्धन्यताडयत् ॥ १७ ॥

dvivido ’pi mahā-vīryaḥ śālam udyamya pāṇinā abhyetya tarasā tena balaṁ mūrdhany atāḍayat

महाबली द्विविद ने भी अपने हाथ से एक साल वृक्ष उखाड़कर तथा वेगपूर्वक आगे बढ़कर उसी से बलराम के सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 18 (bhagavata.10.67.18)

तं तु सङ्कर्षणो मूर्ध्नि पतन्तमचलो यथा । प्रतिजग्राह बलवान् सुनन्देनाहनच्च तम् ॥ १८ ॥

taṁ tu saṅkarṣaṇo mūrdhni patantam acalo yathā pratijagrāha balavān sunandenāhanac ca tam

परन्तु पर्वत के समान अचल संकर्षण ने अपने सिर पर गिरते हुए उस वृक्ष को थाम लिया और फिर अपनी सुनन्द नामक गदा से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 19 (bhagavata.10.67.19)

मूषलाहतमस्तिष्को विरेजे रक्तधारया । गिरिर्यथा गैरिकया प्रहारं नानुचिन्तयन् ॥ १९ ॥

mūṣalāhata-mastiṣko vireje rakta-dhārayā girir yathā gairikayā prahāraṁ nānucintayan

गदा से मस्तक पर आघात लगने से बहते हुए रक्त-प्रवाह से वह उसी प्रकार सुशोभित हो उठा, जैसे गैरिक मिट्टी से कोई पर्वत। परन्तु उस प्रहार की परवाह न करते हुए, द्विविद ने दूसरा वृक्ष उखाड़कर, बलपूर्वक उसके पत्ते तोड़कर, बलराम पर पुनः प्रहार किया।

श्लोक 20 (bhagavata.10.67.20)

पुनरन्यं समुत्क्षिप्य कृत्वा निष्पत्रमोजसा । तेनाहनत् सुसङ्क्रुद्धस्तं बलः शतधाच्छिनत् ॥ २० ॥

punar anyaṁ samutkṣipya kṛtvā niṣpatram ojasā tenāhanat su-saṅkruddhas taṁ balaḥ śatadhācchinat

फिर उसने एक और वृक्ष उखाड़कर, बलपूर्वक उसे पत्तों-रहित कर, उससे प्रहार किया; अत्यन्त क्रुद्ध बलराम ने उसे भी सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 21 (bhagavata.10.67.21)

ततोऽन्येन रुषा जघ्ने तं चापि शतधाच्छिनत् ॥ २१ ॥

tato ’nyena ruṣā jaghne taṁ cāpi śatadhācchinat

तब उसने क्रोधवश एक और वृक्ष से प्रहार किया, और बलराम ने उसे भी सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 22 (bhagavata.10.67.22)

एवं युध्यन् भगवता भग्ने भग्ने पुनः पुनः । आकृष्य सर्वतो वृक्षान् निर्वृक्षमकरोद् वनम् ॥ २२ ॥

evaṁ yudhyan bhagavatā bhagne bhagne punaḥ punaḥ ākṛṣya sarvato vṛkṣān nirvṛkṣam akarod vanam

इस प्रकार युद्ध करते हुए, भगवान द्वारा बार-बार वृक्षों के तोड़े जाने पर भी, वह चारों ओर से वृक्ष उखाड़ता रहा, यहाँ तक कि उसने सम्पूर्ण वन को ही वृक्षविहीन कर दिया।

श्लोक 23 (bhagavata.10.67.23)

ततोऽमुञ्चच्छिलावर्षं बलस्योपर्यमर्षितः । तत्सर्वं चूर्णयामास लीलया मुषलायुधः ॥ २३ ॥

tato ’muñcac chilā-varṣaṁ balasyopary amarṣitaḥ tat sarvaṁ cūrṇayāṁ āsa līlayā muṣalāyudhaḥ

तब क्रुद्ध होकर उसने बलराम पर पत्थरों की वर्षा कर दी, परन्तु मूसलधारी बलराम ने उन सबको सहज ही चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 24 (bhagavata.10.67.24)

स बाहू तालसङ्काशौ मुष्टीकृत्य कपीश्वरः । आसाद्य रोहिणीपुत्रं ताभ्यां वक्षस्यरूरुजत् ॥ २४ ॥

sa bāhū tāla-saṅkāśau muṣṭī-kṛtya kapīśvaraḥ āsādya rohiṇī-putraṁ tābhyāṁ vakṣasy arūrujat

तब वानरराज ने ताड़-वृक्ष के समान अपनी भुजाओं को मुट्ठी बनाकर, रोहिणी-पुत्र बलराम के निकट जाकर उन दोनों मुट्ठियों से उनकी छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 25 (bhagavata.10.67.25)

यादवेन्द्रोऽपि तं दोर्भ्यां त्यक्त्वा मुषललाङ्गले । जत्रावभ्यर्दयत्क्रुद्धः सोऽपतद् रुधिरं वमन् ॥ २५ ॥

yādavendro ’pi taṁ dorbhyāṁ tyaktvā muṣala-lāṅgale jatrāv abhyardayat kruddhaḥ so ’patad rudhiraṁ vaman

यादवेन्द्र बलराम ने भी अपना मूसल और हल त्यागकर, क्रोधपूर्वक अपने दोनों हाथों से उसकी कंठ-हड्डी पर प्रहार किया; उससे वह रक्त वमन करते हुए भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 26 (bhagavata.10.67.26)

चकम्पे तेन पतता सटङ्कः सवनस्पतिः । पर्वतः कुरुशार्दूल वायुना नौरिवाम्भसि ॥ २६ ॥

cakampe tena patatā sa-ṭaṅkaḥ sa-vanaspatiḥ parvataḥ kuru-śārdūla vāyunā naur ivāmbhasi

हे कुरुश्रेष्ठ, उसके गिरने से वहाँ का पर्वत अपनी चट्टानों और वृक्षों सहित उसी प्रकार काँप उठा, जैसे समुद्र में वायु से नौका काँपती है।

श्लोक 27 (bhagavata.10.67.27)

जयशब्दो नमः शब्दः साधु साध्विति चाम्बरे । सुरसिद्धमुनीन्द्राणामासीत् कुसुमवर्षिणाम् ॥ २७ ॥

jaya-śabdo namaḥ-śabdaḥ sādhu sādhv iti cāmbare sura-siddha-munīndrāṇām āsīt kusuma-varṣiṇām

आकाश में देवताओं, सिद्धों और महर्षियों के "जय हो, नमस्कार हो, साधु-साधु" की ध्वनियाँ गूँज उठीं, और वे पुष्पों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 28 (bhagavata.10.67.28)

एवं निहत्य द्विविदं जगद्व्यतिकरावहम् । संस्तूयमानो भगवान् जनैः स्वपुरमाविशत् ॥ २८ ॥

evaṁ nihatya dvividaṁ jagad-vyatikarāvaham saṁstūyamāno bhagavān janaiḥ sva-puram āviśat

इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् को उत्पीड़ित करने वाले द्विविद का वध कर, भगवान लोगों द्वारा स्तुति किए जाते हुए अपनी नगरी में प्रविष्ट हुए।

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