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दशम स्कन्ध · अध्याय 68

साम्ब का विवाह

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69

श्लोक 1 (bhagavata.10.68.1)

श्रीशुक उवाच दुर्योधनसुतां राजन् लक्ष्मणां समितिंजयः । स्वयंवरस्थामहरत् साम्बो जाम्बवतीसुतः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca duryodhana-sutāṁ rājan lakṣmaṇāṁ samitiṁ-jayaḥ svayaṁvara-sthām aharat sāmbo jāmbavatī-sutaḥ

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्, सदा युद्ध-विजयी साम्ब, जो जाम्बवती का पुत्र था, दुर्योधन की कन्या लक्ष्मणा को स्वयंवर से हर ले गया।

श्लोक 2 (bhagavata.10.68.2)

कौरवाः कुपिता ऊचुर्दुर्विनीतोऽयमर्भकः । कदर्थीकृत्य नः कन्यामकामामहरद् बलात् ॥ २ ॥

kauravāḥ kupitā ūcur durvinīto ’yam arbhakaḥ kadarthī-kṛtya naḥ kanyām akāmām aharad balāt

कौरव क्रुद्ध होकर बोले — "यह उद्दण्ड बालक हमारा अपमान करके हमारी अनिच्छुक कन्या को बलपूर्वक हर ले गया है।"

श्लोक 3 (bhagavata.10.68.3)

बध्नीतेमं दुर्विनीतं किं करिष्यन्ति वृष्णयः । येऽस्मत्प्रसादोपचितां दत्तां नो भुञ्जते महीम् ॥ ३ ॥

badhnītemaṁ durvinītaṁ kiṁ kariṣyanti vṛṣṇayaḥ ye ’smat-prasādopacitāṁ dattāṁ no bhuñjate mahīm

"इस उद्दण्ड को बाँध लो! वृष्णिवंशी क्या कर लेंगे? वे तो हमारी ही कृपा से बढ़े हुए, हमारे ही दिए हुए राज्य को भोग रहे हैं।"

श्लोक 4 (bhagavata.10.68.4)

निगृहीतं सुतं श्रुत्वा यद्येष्यन्तीह वृष्णयः । भग्नदर्पाः शमं यान्ति प्राणा इव सुसंयताः ॥ ४ ॥

nigṛhītaṁ sutaṁ śrutvā yady eṣyantīha vṛṣṇayaḥ bhagna-darpāḥ śamaṁ yānti prāṇā iva su-saṁyatāḥ

"यदि पुत्र के बन्दी होने का समाचार सुनकर वृष्णिगण यहाँ आ भी जाएँ, तो उनका गर्व चूर्ण होकर वे उसी प्रकार शान्त हो जाएँगे, जैसे संयमित प्राण-वायु शान्त हो जाती है।"

श्लोक 5 (bhagavata.10.68.5)

इति कर्णः शलो भूरिर्यज्ञकेतुः सुयोधनः । साम्बमारेभिरे योद्धुं कुरुवृद्धानुमोदिताः ॥ ५ ॥

iti karṇaḥ śalo bhūrir yajñaketuḥ suyodhanaḥ sāmbam ārebhire yoddhuṁ kuru-vṛddhānumoditāḥ

ऐसा कहकर, कुरुवंश के वृद्धजनों की सम्मति पाकर कर्ण, शल, भूरि, यज्ञकेतु तथा सुयोधन साम्ब से युद्ध करने चल पड़े।

श्लोक 6 (bhagavata.10.68.6)

दृष्ट्वानुधावतः साम्बो धार्तराष्ट्रान् महारथः । प्रगृह्य रुचिरं चापं तस्थौ सिंह इवैकलः ॥ ६ ॥

dṛṣṭvānudhāvataḥ sāmbo dhārtarāṣṭrān mahā-rathaḥ pragṛhya ruciraṁ cāpaṁ tasthau siṁha ivaikalaḥ

दुर्योधन-पक्ष के उन योद्धाओं को अपनी ओर दौड़ते देख महारथी साम्ब अपना सुन्दर धनुष उठाकर अकेले सिंह के समान खड़ा हो गया।

श्लोक 7 (bhagavata.10.68.7)

तं ते जिघृक्षवः क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति भाषिणः । आसाद्य धन्विनो बाणैः कर्णाग्रण्यः समाकिरन् ॥ ७ ॥

taṁ te jighṛkṣavaḥ kruddhās tiṣṭha tiṣṭheti bhāṣiṇaḥ āsādya dhanvino bāṇaiḥ karṇāgraṇyaḥ samākiran

उसे बन्दी बनाने की इच्छा से वे क्रुद्ध धनुर्धर "ठहरो, ठहरो" कहते हुए, कर्ण को आगे कर उसके निकट पहुँचकर उस पर बाणों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 8 (bhagavata.10.68.8)

सोऽपविद्धः कुरुश्रेष्ठ कुरुभिर्यदुनन्दनः । नामृष्यत्तदचिन्त्यार्भः सिंह क्षुद्रमृगैरिव ॥ ८ ॥

so ’paviddhaḥ kuru-śreṣṭha kurubhir yadu-nandanaḥ nāmṛṣyat tad acintyārbhaḥ siṁha kṣudra-mṛgair iva

हे कुरुश्रेष्ठ, कुरुओं द्वारा इस प्रकार आक्रान्त होकर भी वह अद्भुत बलशाली यदुवंशी बालक उसे उसी प्रकार सहन न कर सका, जैसे सिंह छोटे-मोटे पशुओं का आक्रमण सहन नहीं करता।

श्लोक 9 (bhagavata.10.68.9)

विस्फूर्ज्य रुचिरं चापं सर्वान् विव्याध सायकैः । कर्णादीन् षड्रथान् वीरस्तावद्भिर्युगपत् पृथक् ॥ ९ ॥

visphūrjya ruciraṁ cāpaṁ sarvān vivyādha sāyakaiḥ karṇādīn ṣaḍ rathān vīras tāvadbhir yugapat pṛthak

अपने सुन्दर धनुष की टंकार कर, उस वीर ने कर्ण आदि छहों रथियों को अपने बाणों से बींध डाला — एक साथ, अलग-अलग, उतने ही बाणों से।

श्लोक 10 (bhagavata.10.68.10)

चतुर्भिश्चतुरो वाहानेकैकेन च सारथीन् । रथिनश्च महेष्वासांस्तस्य तत्तेऽभ्यपूजयन् ॥ १० ॥

caturbhiś caturo vāhān ekaikena ca sārathīn rathinaś ca maheṣvāsāṁs tasya tat te ’bhyapūjayan

उसने चार-चार बाणों से उनके चार-चार घोड़ों को, एक-एक बाण से सारथियों को तथा उन महाधनुर्धर रथियों को भी बींधा; यह देखकर उन्होंने भी उसकी सराहना की।

श्लोक 11 (bhagavata.10.68.11)

तं तु ते विरथं चक्रुश्चत्वारश्चतुरो हयान् । एकस्तु सारथिं जघ्ने चिच्छेदान्यः शरासनम् ॥ ११ ॥

taṁ tu te virathaṁ cakruś catvāraś caturo hayān ekas tu sārathiṁ jaghne cicchedaṇyaḥ śarāsanam

फिर भी उन्होंने उसे रथहीन कर दिया — चार योद्धाओं ने उसके चार घोड़ों को मार डाला, एक ने उसके सारथी का वध किया, और दूसरे ने उसका धनुष तोड़ डाला।

श्लोक 12 (bhagavata.10.68.12)

तं बद्ध्वा विरथीकृत्य कृच्छ्रेण कुरवो युधि । कुमारं स्वस्य कन्यां च स्वपुरं जयिनोऽविशन् ॥ १२ ॥

taṁ baddhvā virathī-kṛtya kṛcchreṇa kuravo yudhi kumāraṁ svasya kanyāṁ ca sva-puraṁ jayino ’viśan

युद्ध में बड़ी कठिनाई से उसे रथहीन कर बाँधकर, विजयी कुरुगण उस बालक और अपनी कन्या को लेकर अपने नगर में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 13 (bhagavata.10.68.13)

तच्छ्रुत्वा नारदोक्तेन राजन् सञ्जातमन्यवः । कुरून् प्रत्युद्यमं चक्रुरुग्रसेनप्रचोदिताः ॥ १३ ॥

tac chrutvā nāradoktena rājan sañjāta-manyavaḥ kurūn praty udyamaṁ cakrur ugrasena-pracoditāḥ

हे राजन्, नारद जी के मुख से यह समाचार सुनकर यादवगण क्रुद्ध हो उठे, और उग्रसेन द्वारा प्रेरित होकर उन्होंने कुरुओं के विरुद्ध युद्ध की तैयारी की।

श्लोक 14 (bhagavata.10.68.14)

सान्त्वयित्वा तु तान् रामः सन्नद्धान् वृष्णिपुङ्गवान् । नैच्छत् कुरूणां वृष्णीनां कलिं कलिमलापहः ॥ १४ ॥

sāntvayitvā tu tān rāmaḥ sannaddhān vṛṣṇi-puṅgavān naicchat kurūṇāṁ vṛṣṇīnāṁ kaliṁ kali-malāpahaḥ

परन्तु कलियुग के पाप को हरने वाले बलराम ने कवच धारण किए हुए उन वृष्णिवीरों को शान्त किया, क्योंकि वे कुरुओं और वृष्णियों के बीच कलह नहीं चाहते थे।

श्लोक 15 (bhagavata.10.68.15)

जगाम हास्तिनपुरं रथेनादित्यवर्चसा । ब्राह्मणैः कुलवृद्धैश्च वृतश्चन्द्र इव ग्रहैः ॥ १५ ॥

jagāma hāstina-puraṁ rathenāditya-varcasā brāhmaṇaiḥ kula-vṛddhaiś ca vṛtaś candra iva grahaiḥ

वे सूर्य के समान तेजस्वी अपने रथ पर सवार होकर, ब्राह्मणों तथा कुल के वृद्धजनों से घिरे हुए हस्तिनापुर गए, ठीक वैसे ही जैसे ग्रहों से घिरा हुआ चन्द्रमा शोभित होता है।

श्लोक 16 (bhagavata.10.68.16)

गत्वा गजाह्वयं रामो बाह्योपवनमास्थितः । उद्धवं प्रेषयामास धृतराष्ट्रं बुभुत्सया ॥ १६ ॥

gatvā gajāhvayaṁ rāmo bāhyopavanam āsthitaḥ uddhavaṁ preṣayām āsa dhṛtarāṣṭraṁ bubhutsayā

हस्तिनापुर पहुँचकर बलराम नगर के बाहर एक उद्यान में ठहर गए, और धृतराष्ट्र का मन्तव्य जानने के लिए उद्धव को भेजा।

श्लोक 17 (bhagavata.10.68.17)

सोऽभिवन्द्याम्बिकापुत्रं भीष्मं द्रोणं च बाह्लिकम् । दुर्योधनं च विधिवद् राममागतमब्रवीत् ॥ १७ ॥

so ’bhivandyāmbikā-putraṁ bhīṣmaṁ droṇaṁ ca bāhlikam duryodhanaṁ ca vidhi-vad rāmam āgataṁ abravīt

अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण, बाह्लीक तथा दुर्योधन को विधिवत् प्रणाम कर उद्धव ने उन्हें बलराम के आगमन का समाचार सुनाया।

श्लोक 18 (bhagavata.10.68.18)

तेऽतिप्रीतास्तमाकर्ण्य प्राप्तं रामं सुहृत्तमम् । तमर्चयित्वाभिययुः सर्वे मङ्गलपाणयः ॥ १८ ॥

te ’ti-prītās tam ākarṇya prāptaṁ rāmaṁ suhṛt-tamam tam arcayitvābhiyayuḥ sarve maṅgala-pāṇayaḥ

अपने परम मित्र बलराम के आगमन का समाचार सुनकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए, और उद्धव का सत्कार कर सभी हाथों में मंगल-द्रव्य लिए उनसे मिलने चल पड़े।

श्लोक 19 (bhagavata.10.68.19)

तं सङ्गय यथान्यायं गामर्घ्यं च न्यवेदयन् । तेषां ये तत्प्रभावज्ञाः प्रणेमुः शिरसा बलम् ॥ १९ ॥

taṁ saṅgamya yathā-nyāyaṁ gām arghyaṁ ca nyavedayan teṣāṁ ye tat-prabhāva-jñāḥ praṇemuḥ śirasā balam

उनसे मिलकर उन्होंने विधिपूर्वक गौ और अर्घ्य भेंट किए। उनमें से जो बलराम के प्रभाव को जानते थे, उन्होंने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 20 (bhagavata.10.68.20)

बन्धून् कुशलिनः श्रुत्वा पृष्ट्वा शिवमनामयम् । परस्परमथो रामो बभाषेऽविक्लवं वचः ॥ २० ॥

bandhūn kuśalinaḥ śrutvā pṛṣṭvā śivam anāmayam parasparam atho rāmo babhāṣe ’viklavaṁ vacaḥ

दोनों ओर के सम्बन्धियों का कुशल-समाचार सुनने और परस्पर कुशल-प्रश्न पूछने के पश्चात्, बलराम ने निडर होकर यह वचन कहा।

श्लोक 21 (bhagavata.10.68.21)

उग्रसेनः क्षितेशेशो यद् व आज्ञापयत् प्रभुः । तदव्यग्रधियः श्रुत्वा कुरुध्वमविलम्बितम् ॥ २१ ॥

ugrasenaḥ kṣiteśeśo yad va ājñāpayat prabhuḥ tad avyagra-dhiyaḥ śrutvā kurudhvam avilambitam

बलराम ने कहा — "राजाओं के भी स्वामी उग्रसेन ने तुम्हें जो आज्ञा दी है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो, और तुरन्त उसका पालन करो।"

श्लोक 22 (bhagavata.10.68.22)

यद् यूयं बहवस्त्वेकं जित्वाधर्मेण धार्मिकम् । अबध्नीताथ तन्मृष्ये बन्धूनामैक्यकाम्यया ॥ २२ ॥

yad yūyaṁ bahavas tv ekaṁ jitvādharmeṇa dhārmikam abadhnītātha tan mṛṣye bandhūnām aikya-kāmyayā

"उग्रसेन कहते हैं — तुम अनेकों ने मिलकर धर्मपरायण एक ही व्यक्ति को अधर्मपूर्वक जीतकर बाँध लिया, फिर भी परिवार की एकता चाहते हुए मैं इसे सहन करता हूँ।"

श्लोक 23 (bhagavata.10.68.23)

वीर्यशौर्यबलोन्नद्धमात्मशक्तिसमं वचः । कुरवो बलदेवस्य निशम्योचुः प्रकोपिताः ॥ २३ ॥

vīrya-śaurya-balonnaddham ātma-śakti-samaṁ vacaḥ kuravo baladevasya niśamyocuḥ prakopitāḥ

बलराम के पराक्रम, शौर्य और बल से भरे, अपनी शक्ति के अनुरूप उस वचन को सुनकर कौरवगण अत्यन्त क्रुद्ध होकर बोले।

श्लोक 24 (bhagavata.10.68.24)

अहो महच्चित्रमिदं कालगत्या दुरत्यया । आरुरुक्षत्युपानद् वै शिरो मुकुटसेवितम् ॥ २४ ॥

aho mahac citram idaṁ kāla-gatyā duratyayā ārurukṣaty upānad vai śiro mukuṭa-sevitam

"कुरुओं ने कहा — अहो, यह कितना विचित्र है! काल की अनिवार्य गति देखो — अब जूता ही मुकुट-सुशोभित सिर पर चढ़ने की इच्छा रखता है!"

श्लोक 25 (bhagavata.10.68.25)

एते यौनेन सम्बद्धाः सहशय्यासनाशनाः । वृष्णयस्तुल्यतां नीता अस्मद्दत्तनृपासनाः ॥ २५ ॥

ete yaunena sambaddhāḥ saha-śayyāsanāśanāḥ vṛṣṇayas tulyatāṁ nītā asmad-datta-nṛpāsanāḥ

"विवाह-सम्बन्ध के कारण ही इन वृष्णियों को हमने अपने साथ शय्या, आसन और भोजन में समानता दी है — हमारे ही दिए हुए राज-सिंहासनों पर वे बैठे हैं।"

श्लोक 26 (bhagavata.10.68.26)

चामरव्यजने शङ्खमातपत्रं च पाण्डुरम् । किरीटमासनं शय्यां भुञ्जतेऽस्मदुपेक्षया ॥ २६ ॥

cāmara-vyajane śaṅkham ātapatraṁ ca pāṇḍuram kirīṭam āsanaṁ śayyāṁ bhuñjate ’smad-upekṣayā

"केवल हमारी उपेक्षा के कारण ही वे चँवर-पंखे, शंख, श्वेत छत्र, मुकुट, सिंहासन तथा शय्या का उपभोग कर पा रहे हैं।"

श्लोक 27 (bhagavata.10.68.27)

अलं यदूनां नरदेवलाञ्छनै- र्दातुः प्रतीपैः फणिनामिवामृतम् । येऽस्मत्प्रसादोपचिता हि यादवा आज्ञापयन्त्यद्य गतत्रपा बत ॥ २७ ॥

alaṁ yadūnāṁ naradeva-lāñchanair dātuḥ pratīpaiḥ phaṇinām ivāmṛtam ye ’smat-prasādopacitā hi yādavā ājñāpayanty adya gata-trapā bata

"यादवों को अब ये राज-चिह्न न दिए जाएँ, क्योंकि ये अब उन्हीं दाताओं के लिए संकट बन गए हैं — जैसे साँप को पिलाया गया दूध विष बन जाता है। हमारी ही कृपा से समृद्ध हुए ये यादव आज निर्लज्ज होकर हमें आदेश देने का साहस करते हैं!"

श्लोक 28 (bhagavata.10.68.28)

कथमिन्द्रोऽपि कुरुभिर्भीष्मद्रोणार्जुनादिभिः । अदत्तमवरुन्धीत सिंहग्रस्तमिवोरणः ॥ २८ ॥

katham indro ’pi kurubhir bhīṣma-droṇārjunādibhiḥ adattam avarundhīta siṁha-grastam ivoraṇaḥ

"भला इन्द्र भी भीष्म, द्रोण, अर्जुन आदि कुरुओं द्वारा न दी गई वस्तु को कैसे ग्रहण कर सकता है — जैसे सिंह के ग्रास को कोई मेमना नहीं छीन सकता?"

श्लोक 29 (bhagavata.10.68.29)

श्रीबादरायणिरुवाच जन्मबन्धुश्रियोन्नद्धमदास्ते भरतर्षभ । आश्राव्य रामं दुर्वाच्यमसभ्याः पुरमाविशन् ॥ २९ ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca janma-bandhu-śrīyonnaddha- madās te bharatarṣabha āśrāvya rāmaṁ durvācyam asabhyāḥ puram āviśan

श्री बादरायणि ने कहा — हे भरतश्रेष्ठ, अपने उच्च कुल, बन्धुजन तथा ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त वे कुरुगण बलराम को इस प्रकार अपशब्द सुनाकर अपने नगर में लौट गए।

श्लोक 30 (bhagavata.10.68.30)

दृष्ट्वा कुरूणां दौः शील्यं श्रुत्वावाच्यानि चाच्युतः । अवोचत् कोपसंरब्धो दुष्प्रेक्ष्यः प्रहसन् मुहुः ॥ ३० ॥

dṛṣṭvā kurūnāṁ dauḥśīlyaṁ śrutvāvācyāni cācyutaḥ avocat kopa-saṁrabdho duṣprekṣyaḥ prahasan muhuḥ

कुरुओं की इस दुष्टता को देख और उनके अपशब्दों को सुनकर, अच्युत बलराम क्रोध से भर उठे; भयंकर दिखते हुए वे बार-बार हँसते हुए यह बोले।

श्लोक 31 (bhagavata.10.68.31)

नूनं नानामदोन्नद्धाः शान्तिं नेच्छन्त्यसाधवः । तेषां हि प्रशमो दण्डः पशूनां लगुडो यथा ॥ ३१ ॥

nūnaṁ nānā-madonnaddhāḥ śāntiṁ necchanty asādhavaḥ teṣāṁ hi praśamo daṇḍaḥ paśūnāṁ laguḍo yathā

बलराम ने कहा — "निश्चय ही नाना प्रकार के मद से उन्मत्त ये दुष्टजन शान्ति नहीं चाहते। ऐसों को दण्ड से ही वश में किया जाता है, जैसे पशुओं को लाठी से वश में किया जाता है।"

श्लोक 32 (bhagavata.10.68.32)

अहो यदून् सुसंरब्धान् कृष्णं च कुपितं शनैः । सान्त्वयित्वाहमेतेषां शममिच्छन्निहागतः ॥ ३२ ॥

aho yadūn su-saṁrabdhān kṛṣṇaṁ ca kupitaṁ śanaiḥ sāntvayitvāham eteṣāṁ śamam icchann ihāgataḥ

"अहा, अत्यन्त क्रुद्ध यादवों को तथा रुष्ट कृष्ण को भी मैंने धीरे-धीरे शान्त किया, और इनके साथ शान्ति की इच्छा से मैं यहाँ आया।"

श्लोक 33 (bhagavata.10.68.33)

त इमे मन्दमतयः कलहाभिरताः खलाः । तं मामवज्ञाय मुहुर्दुर्भाषान् मानिनोऽब्रुवन् ॥ ३३ ॥

ta ime manda-matayaḥ kalahābhiratāḥ khalāḥ taṁ mām avajñāya muhur durbhāṣān mānino ’bruvan

"परन्तु ये मन्दबुद्धि, कलहप्रिय तथा दुष्ट लोग मेरा तिरस्कार करते हुए, अभिमानवश बार-बार अपशब्द बोलते रहे।"

श्लोक 34 (bhagavata.10.68.34)

नोग्रसेनः किल विभुर्भोजवृष्ण्यन्धकेश्वरः । शक्रादयो लोकपाला यस्यादेशानुवर्तिनः ॥ ३४ ॥

nograsenaḥ kila vibhur bhoja-vṛṣṇy-andhakeśvaraḥ śakrādayo loka-pālā yasyādeśānuvartinaḥ

"क्या भोज, वृष्णि और अन्धक वंशों के स्वामी, सर्वशक्तिमान उग्रसेन शासन के अयोग्य हैं — जिनकी आज्ञा का पालन इन्द्र आदि लोकपाल भी करते हैं?"

श्लोक 35 (bhagavata.10.68.35)

सुधर्माक्रम्यते येन पारिजातोऽमराङ्घ्रिपः । आनीय भुज्यते सोऽसौ न किलाध्यासनार्हणः ॥ ३५ ॥

sudharmākramyate yena pārijāto ’marāṅghripaḥ ānīya bhujyate so ’sau na kilādhyāsanārhaṇaḥ

"जिस कृष्ण ने सुधर्मा-सभा को अपने अधिकार में कर लिया, तथा देवताओं के पारिजात वृक्ष को लाकर उसका भोग किया — क्या वही कृष्ण सिंहासन पर बैठने योग्य नहीं है?"

श्लोक 36 (bhagavata.10.68.36)

यस्य पादयुगं साक्षाच्छ्रीरुपास्तेऽखिलेश्वरी । स नार्हति किल श्रीशो नरदेवपरिच्छदान् ॥ ३६ ॥

yasya pāda-yugaṁ sākṣāc chrīr upāste ’khileśvarī sa nārhati kila śrīśo naradeva-paricchadān

"जिनके दोनों चरणों की सेवा साक्षात् सर्वेश्वरी लक्ष्मी करती हैं — क्या वे श्रीपति राजाओं के राजचिह्नों के योग्य नहीं हैं?"

श्लोक 37 (bhagavata.10.68.37)

यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजोऽखिललोकपालै- र्मौल्युत्तमैर्धृतमुपासिततीर्थतीर्थम् । ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य कलाः कलायाः श्रीश्चोद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व ॥ ३७ ॥

yasyāṅghri-paṅkaja-rajo ’khila-loka-pālair mauly-uttamair dhṛtam upāsita-tīrtha-tīrtham brahmā bhavo ’ham api yasya kalāḥ kalāyāḥ śrīś codvahema ciram asya nṛpāsanaṁ kva

"जिनके चरण-कमलों की रज को समस्त लोकपाल अपने उत्तम मुकुटों पर धारण करते हैं, तथा जो स्वयं समस्त तीर्थों के लिए भी परम तीर्थ है — ब्रह्मा, शिव, मैं स्वयं तथा लक्ष्मी भी जिनकी ही कलाओं की कला मात्र हैं, और जिस रज को हम भी दीर्घकाल से अपने सिर पर धारण करते आए हैं — उनके लिए राजसिंहासन की तो बात ही क्या?"

श्लोक 38 (bhagavata.10.68.38)

भुञ्जते कुरुभिर्दत्तं भूखण्डं वृष्णयः किल । उपानहः किल वयं स्वयं तु कुरवः शिरः ॥ ३८ ॥

bhuñjate kurubhir dattaṁ bhū-khaṇḍaṁ vṛṣṇayaḥ kila upānahaḥ kila vayaṁ svayaṁ tu kuravaḥ śiraḥ

"क्या हम वृष्णिजन केवल कुरुओं के दिए हुए भूखण्ड को ही भोगते हैं? क्या हम तो जूता मात्र हैं, और कुरु स्वयं सिर हैं?"

श्लोक 39 (bhagavata.10.68.39)

अहो ऐश्वर्यमत्तानां मत्तानामिव मानिनाम् । असम्बद्धा गिरो रुक्षाः कः सहेतानुशासिता ॥ ३९ ॥

aho aiśvarya-mattānāṁ mattānām iva māninām asambaddhā giṛo rukṣāḥ kaḥ sahetānuśāsītā

"अहा, ऐश्वर्य के मद से मतवाले, नशे में चूर अभिमानियों के समान इन असम्बद्ध और कठोर वचनों को कौन शासक सहन कर सकता है?"

श्लोक 40 (bhagavata.10.68.40)

अद्य निष्कौरवं पृथ्वीं करिष्यामीत्यमर्षितः । गृहीत्वा हलमुत्तस्थौ दहन्निव जगत्त्रयम् ॥ ४० ॥

adya niṣkauravāṁ pṛthvīṁ kariṣyāmīty amarṣitaḥ gṛhītvā halam uttasthau dahann iva jagat-trayam

"आज मैं पृथ्वी को कौरवों से रहित कर दूँगा!" — यह कहकर क्रुद्ध बलराम अपना हल उठाकर उठ खड़े हुए, मानो त्रिलोक को ही भस्म कर देंगे।

श्लोक 41 (bhagavata.10.68.41)

लाङ्गलाग्रेण नगरमुद्विदार्य गजाह्वयम् । विचकर्ष स गङ्गायां प्रहरिष्यन्नमर्षितः ॥ ४१ ॥

lāṅgalāgreṇa nagaram udvidārya gajāhvayam vicakarṣa sa gaṅgāyāṁ prahariṣyann amarṣitaḥ

क्रोधावेश में उन्होंने अपने हल की नोक से हस्तिनापुर नगर को उखाड़कर, उसे गंगा में फेंकने के लिए घसीटना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 42 (bhagavata.10.68.42)

जलयानमिवाघूर्णं गङ्गायां नगरं पतत् । आकृष्यमाणमालोक्य कौरवाः जातसम्भ्रमाः ॥ ४२ ॥

jala-yānam ivāghūrṇaṁ gaṅgāyāṁ nagaraṁ patat ākṛṣyamāṇam ālokya kauravāḥ jāta-sambhramāḥ

गंगा की ओर घसीटे जाते हुए उस नगर को जलयान के समान डगमगाते और गिरते हुए देखकर कौरवगण अत्यन्त भयभीत हो उठे।

श्लोक 43 (bhagavata.10.68.43)

तमेव शरणं जग्मुः सकुटुम्बा जिजीविषवः । सलक्ष्मणं पुरस्कृत्य साम्बं प्राञ्जलयः प्रभुम् ॥ ४३ ॥

tam eva śaraṇaṁ jagmuḥ sa-kuṭumbā jijīviṣavaḥ sa-lakṣmaṇaṁ puras-kṛtya sāmbaṁ prāñjalayaḥ prabhum

प्राणों की रक्षा चाहते हुए वे अपने परिवारों सहित उन्हीं की शरण में गए, और साम्ब को लक्ष्मणा सहित आगे कर, हाथ जोड़कर प्रभु के समक्ष खड़े हो गए।

श्लोक 44 (bhagavata.10.68.44)

राम रामाखिलाधार प्रभावं न विदाम ते । मूढानां नः कुबुद्धीनां क्षन्तुमर्हस्यतिक्रमम् ॥ ४४ ॥

rāma rāmākhilādhāra prabhāvaṁ na vidāma te mūḍhānāṁ naḥ ku-buddhīnāṁ kṣantum arhasy atikramam

"हे राम, हे राम, हे सर्वाधार! हम आपकी शक्ति को नहीं जानते। हम मूढ़ तथा कुबुद्धि लोगों के इस अपराध को क्षमा करने योग्य हैं आप।"

श्लोक 45 (bhagavata.10.68.45)

स्थित्युत्पत्त्यप्ययानां त्वमेको हेतुर्निराश्रयः । लोकान् क्रीडनकानीश क्रीडतस्ते वदन्ति हि ॥ ४५ ॥

sthity-utpatty-apyayānāṁ tvam eko hetur nirāśrayaḥ lokān krīḍanakān īśa krīḍatas te vadanti hi

"आप ही अकेले स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय के, स्वयं निराश्रित, कारण हैं। हे ईश्वर, कहते हैं कि लीला करते हुए आपके लिए ये समस्त लोक क्रीड़ा-वस्तु मात्र हैं।"

श्लोक 46 (bhagavata.10.68.46)

त्वमेव मूर्ध्नीदमनन्त लीलया भूमण्डलं बिभर्षि सहस्रमूर्धन् । अन्ते च यः स्वात्मनिरुद्धविश्वः शेषेऽद्वितीयः परिशिष्यमाणः ॥ ४६ ॥

tvam eva mūrdhnīdam ananta līlayā bhū-maṇḍalaṁ bibharṣi sahasra-mūrdhan ante ca yaḥ svātma-niruddha-viśvaḥ śeṣe ’dvitīyaḥ pariśiṣyamāṇaḥ

"हे अनन्त, हे सहस्रमस्तक! आप ही लीला करते हुए इस पृथ्वी-मण्डल को अपने एक मस्तक पर धारण करते हैं। तथा प्रलय के समय समस्त विश्व को अपने ही स्वरूप में समेटकर, अद्वितीय होकर अकेले शेष रह जाते हैं।"

श्लोक 47 (bhagavata.10.68.47)

कोपस्तेऽखिलशिक्षार्थं न द्वेषान्न च मत्सरात् । बिभ्रतो भगवन् सत्त्वं स्थितिपालनतत्परः ॥ ४७ ॥

kopas te ’khila-śikṣārthaṁ na dveṣān na ca matsarāt bibhrato bhagavan sattvaṁ sthiti-pālana-tatparaḥ

"हे भगवन्, आपका यह क्रोध सभी को शिक्षा देने के लिए है, न कि द्वेष या ईर्ष्या से; सत्त्वगुण को धारण करने वाले आप तो जगत् की स्थिति और रक्षा में ही तत्पर रहते हैं।"

श्लोक 48 (bhagavata.10.68.48)

नमस्ते सर्वभूतात्मन् सर्वशक्तिधराव्यय । विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु त्वां वयं शरणं गताः ॥ ४८ ॥

namas te sarva-bhūtātman sarva-śakti-dharāvyaya viśva-karman namas te ’stu tvāṁ vayaṁ śaraṇaṁ gatāḥ

"हे सर्वभूतात्मा, हे अविनाशी सर्वशक्तिधर, हे विश्व-निर्माता, आपको नमस्कार हो! हम आपकी ही शरण में आए हैं।"

श्लोक 49 (bhagavata.10.68.49)

श्रीशुक उवाच एवं प्रपन्नैः संविग्नैर्वेपमानायनैर्बलः । प्रसादितः सुप्रसन्नो मा भैष्टेत्यभयं ददौ ॥ ४९ ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ prapannaiḥ saṁvignair vepamānāyanair balaḥ prasāditaḥ su-prasanno mā bhaiṣṭety abhayaṁ dadau

श्री शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार भयभीत तथा काँपते हुए शरणागत कुरुओं द्वारा प्रसन्न किए जाने पर बलराम अत्यन्त प्रसन्न हो गए, और "मत डरो" कहकर उन्हें अभय प्रदान किया।

श्लोक 50 (bhagavata.10.68.50)

दुर्योधनः पारिबर्हं कुञ्जरान् षष्टिहायनान् । ददौ च द्वादशशतान्ययुतानि तुरङ्गमान् ॥ ५० ॥

duryodhanaḥ pāribarhaṁ kuñjarān ṣaṣṭi-hāyanān dadau ca dvādaśa-śatāny ayutāni turaṅgamān

पुत्री के प्रति स्नेहवश दुर्योधन ने दहेज में साठ वर्ष की आयु के बारह सौ हाथी तथा एक लाख बीस हजार घोड़े दिए।

श्लोक 51 (bhagavata.10.68.51)

रथानां षट्सहस्राणि रौक्माणां सूर्यवर्चसाम् । दासीनां निष्ककण्ठीनां सहस्रं दुहितृवत्सलः ॥ ५१ ॥

rathānāṁ ṣaṭ-sahasrāṇi raukmāṇāṁ sūrya-varcasām dāsīnāṁ niṣka-kaṇṭhīnāṁ sahasraṁ duhitṛ-vatsalaḥ

पुत्री-वत्सल दुर्योधन ने सूर्य के समान चमकते स्वर्ण-जटित छह हजार रथ, तथा कण्ठ में स्वर्णहार पहने हुए एक हजार दासियाँ भी दीं।

श्लोक 52 (bhagavata.10.68.52)

प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं भगवान् सात्वतर्षभः । ससुतः सस्नुषः प्रायात् सुहृद्भिरभिनन्दितः ॥ ५२ ॥

pratigṛhya tu tat sarvaṁ bhagavān sātvatarṣabhaḥ sa-sutaḥ sa-snuṣaḥ prāyāt suhṛdbhir abhinanditaḥ

वृष्णिश्रेष्ठ भगवान बलराम उन सबको ग्रहण कर, अपने पुत्र और पुत्रवधू सहित, मित्रों द्वारा विदा किए जाते हुए वहाँ से चल पड़े।

श्लोक 53 (bhagavata.10.68.53)

ततः प्रविष्टः स्वपुरं हलायुधः समेत्य बन्धूननुरक्तचेतसः । शशंस सर्वं यदुपुङ्गवानां मध्ये सभायां कुरुषु स्वचेष्टितम् ॥ ५३ ॥

tataḥ praviṣṭaḥ sva-puraṁ halāyudhaḥ sametya bandhūn anurakta-cetasaḥ śaśaṁsa sarvaṁ yadu-puṅgavānāṁ madhye sabhāyāṁ kuruṣu sva-ceṣṭitam

तब हलधारी बलराम अपनी नगरी में प्रविष्ट होकर अपने स्नेहशील बन्धुजनों से मिले, और यदुश्रेष्ठों की सभा में कुरुओं के साथ अपने समस्त कार्यकलाप का वर्णन किया।

श्लोक 54 (bhagavata.10.68.54)

अद्यापि च पुरं ह्येतत् सूचयद् रामविक्रमम् । समुन्नतं दक्षिणतो गङ्गायामनुदृश्यते ॥ ५४ ॥

adyāpi ca puraṁ hy etat sūcayad rāma-vikramam samunnataṁ dakṣiṇato gaṅgāyām anudṛśyate

आज भी यह नगर गंगा के दक्षिण तट पर ऊँचा उठा हुआ दिखाई देता है, जो बलराम के उस पराक्रम का साक्षी है।

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