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दशम स्कन्ध · अध्याय 69

नारद मुनि की द्वारका में कृष्ण के महलों की यात्रा

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

श्लोक 1 (bhagavata.10.69.1)

श्रीशुक उवाच नरकं निहतं श्रुत्वा तथोद्वाहं च योषिताम् । कृष्णेनैकेन बह्वीनां तद् दिदृक्षुः स्म नारदः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca narakaṁ nihataṁ śrutvā tathodvāhaṁ ca yoṣitām kṛṣṇenaikena bahvīnāṁ tad-didṛkṣuḥ sma nāradaḥ

श्री शुकदेव जी ने कहा — नरकासुर के वध का तथा कृष्ण द्वारा अकेले ही अनेक स्त्रियों से विवाह किए जाने का समाचार सुनकर, नारद मुनि उसे प्रत्यक्ष देखने के इच्छुक हुए।

श्लोक 2 (bhagavata.10.69.2)

चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत्पृथक् । गृहेषु द्वयष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत् ॥ २ ॥

citraṁ bataitad ekena vapuṣā yugapat pṛthak gṛheṣu dvy-aṣṭa-sāhasraṁ striya eka udāvahat

"यह कितना अद्भुत है कि एक ही व्यक्ति ने एक साथ, अलग-अलग गृहों में, सोलह हजार स्त्रियों से एक ही शरीर द्वारा विवाह किया" — ऐसा सोचकर।

श्लोक 3 (bhagavata.10.69.3)

इत्युत्सुको द्वारवतीं देवर्षिर्द्रष्टुमागमत् । पुष्पितोपवनारामद्विजालिकुलनादिताम् ॥ ३ ॥

ity utsuko dvāravatīṁ devarṣir draṣṭum āgamat puṣpitopavanārāma- dvijāli-kula-nāditām

इस प्रकार उत्सुक होकर देवर्षि नारद द्वारका को देखने आए, जो फूले हुए उपवनों और उद्यानों में पक्षियों तथा भ्रमरों के समूहों से गुंजायमान थी।

श्लोक 4 (bhagavata.10.69.4)

उत्फुल्लेन्दीवराम्भोजकह्लारकुमुदोत्पलैः । छुरितेषु सरः सूच्चैः कूजितां हंससारसैः ॥ ४ ॥

utphullendīvarāmbhoja- kahlāra-kumudotpalaiḥ churiteṣu saraḥsūccaiḥ kūjitāṁ haṁsa-sārasaiḥ

वहाँ के सरोवर खिले हुए नील-कमल, कमल, कह्लार, कुमुद तथा उत्पल पुष्पों से भरे हुए थे, तथा हंसों और सारसों की मधुर ध्वनियों से गूँज रहे थे।

श्लोक 5 (bhagavata.10.69.5)

प्रासादलक्षैर्नवभिर्जुष्टां स्फाटिकराजतैः । महामरकतप्रख्यैः स्वर्णरत्नपरिच्छदैः ॥ ५ ॥

prāsāda-lakṣair navabhir juṣṭāṁ sphāṭika-rājataiḥ mahā-marakata-prakhyaiḥ svarṇa-ratna-paricchadaiḥ

वह नगरी नौ लाख महलों से सुशोभित थी, जो स्फटिक, रजत तथा महामरकतमणि के समान चमकते हुए स्वर्ण और रत्नों से अलंकृत थे।

श्लोक 6 (bhagavata.10.69.6)

विभक्तरथ्यापथचत्वरापणैः शालासभाभी रुचिरां सुरालयैः । संसिक्तमार्गाङ्गनवीथिदेहलीं पतत्पताकध्वजवारितातपाम् ॥ ६ ॥

vibhakta-rathyā-patha-catvarāpaṇaiḥ śālā-sabhābhī rucirāṁ surālayaiḥ saṁsikta-mārgāṅgana-vīthi-dehalīṁ patat-patāka-dhvaja-vāritātapām

उसकी सड़कें, मार्ग, चौराहे और बाजार सुव्यवस्थित थे, वह सभा-भवनों तथा देवालयों से रमणीय थी, उसके मार्ग, आँगन और गलियाँ जल-सिंचित थीं, और लहराती हुई पताकाओं तथा ध्वजाओं ने धूप को रोक रखा था।

श्लोक 7 (bhagavata.10.69.7)

तस्यामन्तः पुरं श्रीमदर्चितं सर्वधिष्ण्यपैः । हरेः स्वकौशलं यत्र त्वष्ट्रा कार्त्स्न्येन दर्शितम् ॥ ७ ॥

tasyām antaḥ-puraṁ śrīmad arcitaṁ sarva-dhiṣṇya-paiḥ hareḥ sva-kauśalaṁ yatra tvaṣṭrā kārtsnyena darśitam

उस नगरी में हरि का सुन्दर अन्तःपुर था, जिसे सभी लोकपाल पूजते थे, और जहाँ त्वष्टा (विश्वकर्मा) ने अपना समस्त कौशल पूर्णतः प्रदर्शित किया था।

श्लोक 8 (bhagavata.10.69.8)

तत्र षोडशभिः सद्मसहस्रैः समलङ्कृतम् । विवेशैकतोमं शौरेः पत्नीनां भवनं महत् ॥ ८ ॥

tatra ṣoḍaśabhiḥ sadma- sahasraiḥ samalaṅkṛtam viveśaikatomaṁ śaureḥ patnīnāṁ bhavanaṁ mahat

वह सोलह सहस्र भवनों से सुसज्जित था। नारद उन शौरि की पत्नियों के उन विशाल भवनों में से एक में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 9 (bhagavata.10.69.9)

विष्टब्धं विद्रुमस्तम्भैर्वैदूर्यफलकोत्तमैः । इन्द्रनीलमयैः कुड्यैर्जगत्या चाहतत्विषा ॥ ९ ॥

viṣṭabdhaṁ vidruma-stambhair vaidūrya-phalakottamaiḥ indranīla-mayaiḥ kuḍyair jagatyā cāhata-tviṣā

वह भवन प्रवाल-स्तम्भों पर टिका था, जिनमें उत्तम वैदूर्यमणि की पट्टिकाएँ जड़ी थीं, उसकी दीवारें इन्द्रनीलमणि से बनी थीं, तथा उसका फर्श सदा उज्ज्वल कान्ति से युक्त था।

श्लोक 10 (bhagavata.10.69.10)

वितानैर्निर्मितैस्त्वष्ट्रा मुक्तादामविलम्बिभिः । दान्तैरासनपर्यङ्कैर्मण्युत्तमपरिष्कृतैः ॥ १० ॥

vitānair nirmitais tvaṣṭrā muktā-dāma-vilambibhiḥ dāntair āsana-paryaṅkair maṇy-uttama-pariṣkṛtaiḥ

उसमें त्वष्टा द्वारा निर्मित वितान (चँदोवे) थे, जिनसे मोतियों की झालरें लटक रही थीं, तथा हाथी-दाँत के बने आसन और पलंग उत्तम मणियों से सुसज्जित थे।

श्लोक 11 (bhagavata.10.69.11)

दासीभिर्निष्ककण्ठीभिः सुवासोभिरलङ्कृतम् । पुम्भिः सकञ्चुकोष्णीषसुवस्त्रमणिकुण्डलैः ॥ ११ ॥

dāsībhir niṣka-kaṇṭhībhiḥ su-vāsobhir alaṅkṛtam pumbhiḥ sa-kañcukoṣṇīṣa su-vastra-maṇi-kuṇḍalaiḥ

वह भवन गले में स्वर्णहार पहने सुवस्त्रा दासियों से, तथा कंचुक, पगड़ी, सुन्दर वस्त्र और मणिजड़ित कुण्डल धारण किए पुरुषों से सुशोभित था।

श्लोक 12 (bhagavata.10.69.12)

रत्नप्रदीपनिकरद्युतिभिर्निरस्त- ध्वान्तं विचित्रवलभीषु शिखण्डिनोऽङ्ग । नृत्यन्ति यत्र विहितागुरुधूपमक्षै- र्निर्यान्तमीक्ष्य घनबुद्धय उन्नदन्तः ॥ १२ ॥

ratna-pradīpa-nikara-dyutibhir nirasta- dhvāntaṁ vicitra-valabhīṣu śikhaṇḍino ’ṅga nṛtyanti yatra vihitāguru-dhūpam akṣair niryāntam īkṣya ghana-buddhaya unnadantaḥ

हे राजन्, वहाँ रत्नजड़ित दीपकों के समूह के प्रकाश से अन्धकार सर्वथा दूर हो चुका था, तथा विचित्र छतों पर मोर नाच रहे थे, क्योंकि झरोखों से निकलते अगुरु धूप को बादल समझकर वे ऊँचे स्वर में बोल उठते थे।

श्लोक 13 (bhagavata.10.69.13)

तस्मिन् समानगुणरूपवयः सुवेष- दासीसहस्रयुतयानुसवं गृहिण्या । विप्रो ददर्श चमरव्यजनेन रुक्म- दण्डेन सात्वतपतिं परिवीजयन्त्या ॥ १३ ॥

tasmin samāna-guṇa-rūpa-vayaḥ-su-veṣa- dāsī-sahasra-yutayānusavaṁ gṛhiṇyā vipro dadarśa cāmara-vyajanena rukma- daṇḍena sātvata-patiṁ parivījayantyā

उस भवन में उस ब्राह्मण ने सात्वतपति कृष्ण को देखा, जिनकी गृहिणी, समान गुण, रूप, आयु तथा सुन्दर वेष वाली एक सहस्र दासियों से घिरी हुई, स्वर्ण-दण्ड वाले चँवर से निरन्तर उनकी सेवा में उन्हें पंखा झल रही थी।

श्लोक 14 (bhagavata.10.69.14)

तं सन्निरीक्ष्य भगवान् सहसोत्थितश्री- पर्यङ्कतः सकलधर्मभृतां वरिष्ठः । आनम्य पादयुगलं शिरसा किरीट- जुष्टेन साञ्जलिरवीविशदासने स्वे ॥ १४ ॥

taṁ sannirīkṣya bhagavān sahasotthita-śrī- paryaṅkataḥ sakala-dharma-bhṛtāṁ variṣṭhaḥ ānamya pāda-yugalaṁ śirasā kirīṭa- juṣṭena sāñjalir avīviśad āsane sve

उन्हें देखते ही, धर्म पालन करने वालों में श्रेष्ठ भगवान अपनी लक्ष्मी-सज्जित शय्या से तुरन्त उठ खड़े हुए, अपने मुकुट-सुशोभित मस्तक से उनके दोनों चरणों में झुककर, हाथ जोड़कर उन्हें अपने ही आसन पर बिठाया।

श्लोक 15 (bhagavata.10.69.15)

तस्यावनिज्य चरणौ तदपः स्वमूर्ध्ना बिभ्रज्जगद्गुरुतमोऽपि सतां पतिर्हि । ब्रह्मण्यदेव इति यद्गुणनाम युक्तं तस्यैव यच्चरणशौचमशेषतीर्थम् ॥ १५ ॥

tasyāvanijya caraṇau tad-apaḥ sva-mūrdhnā bibhraj jagad-gurutamo ’pi satāṁ patir hi brahmaṇya-deva iti yad guṇa-nāma yuktaṁ tasyaiva yac-caraṇa-śaucam aśeṣa-tīrtham

सन्तों के स्वामी तथा जगत् के परम गुरु होते हुए भी उन्होंने नारद के चरण धोकर उस जल को अपने ही मस्तक पर धारण किया — यह उनके "ब्रह्मण्यदेव" नाम के गुण के ही अनुरूप था, यद्यपि उन्हीं के चरण-प्रक्षालन का जल समस्त तीर्थों का सार है।

श्लोक 16 (bhagavata.10.69.16)

सम्पूज्य देवऋषिवर्यमृषिः पुराणो नारायणो नरसखो विधिनोदितेन । वाण्याभिभाष्य मितयामृतमिष्टया तं प्राह प्रभो भगवते करवाम हे किम् ॥ १६ ॥

sampūjya deva-ṛṣi-varyam ṛṣiḥ purāṇo nārāyaṇo nara-sakho vidhinoditena vāṇyābhibhāṣya mitayāmṛta-miṣṭayā taṁ prāha prabho bhagavate karavāma he kim

नर के सखा, स्वयं पुराण ऋषि नारायण ने उन देवर्षिश्रेष्ठ का विधिपूर्वक पूजन किया, तथा मापी हुई किन्तु अमृत के समान मधुर वाणी में उनसे बातचीत करते हुए पूछा — "हे प्रभो, हम आपके लिए क्या करें?"

श्लोक 17 (bhagavata.10.69.17)

श्रीनारद उवाच नैवाद्भुतं त्वयि विभोऽखिललोकनाथे मैत्री जनेषु सकलेषु दमः खलानाम् । निः श्रेयसाय हि जगत्स्थितिरक्षणाभ्यां स्वैरावतार उरुगाय विदाम सुष्ठु ॥ १७ ॥

śrī-nārada uvāca naivādbhutaṁ tvayi vibho ’khila-loka-nāthe maitrī janeṣu sakaleṣu damaḥ khalānām niḥśreyasāya hi jagat-sthiti-rakṣaṇābhyāṁ svairāvatāra urugāya vidāma suṣṭhu

नारद ने कहा — हे विभो, हे सम्पूर्ण लोकों के स्वामी, आपका सभी प्राणियों के प्रति मैत्री-भाव तथा दुष्टों का दमन करना कोई आश्चर्य नहीं है। हम भली-भाँति जानते हैं कि विश्व की स्थिति और रक्षा द्वारा परम कल्याण के लिए ही आप अपनी इच्छा से अवतरित होते हैं, हे बहुशः स्तुत!

श्लोक 18 (bhagavata.10.69.18)

दृष्टं तवाङ्घ्रियुगलं जनतापवर्गं ब्रह्मादिभिर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः । संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं ध्यायंश्चराम्यनुगृहाण यथा स्मृतिः स्यात् ॥ १८ ॥

dṛṣṭaṁ tavāṅghri-yugalaṁ janatāpavargaṁ brahmādibhir hṛdi vicintyam agādha-bodhaiḥ saṁsāra-kūpa-patitottaraṇāvalambaṁ dhyāyaṁś carāmy anugṛhāṇa yathā smṛtiḥ syāt

आपके वे दोनों चरण अब मैंने देख लिए, जो लोगों को मुक्ति प्रदान करने वाले हैं, जिनका ब्रह्मा आदि अगाध-बुद्धि वाले भी केवल हृदय में ही ध्यान कर पाते हैं, तथा जो संसार-कूप में गिरे हुओं के उद्धार का एकमात्र सहारा हैं। कृपा कीजिए कि मैं उन्हीं का ध्यान करते हुए विचरण करूँ, जिससे मेरा स्मरण सदा बना रहे।

श्लोक 19 (bhagavata.10.69.19)

ततोऽन्यदाविशद् गेहं कृष्णपत्न्याः स नारदः । योगेश्वरेश्वरस्याङ्ग योगमायाविवित्सया ॥ १९ ॥

tato ’nyad āviśad gehaṁ kṛṣṇa-patnyāḥ sa nāradaḥ yogeśvareśvarasyāṅga yoga-māyā-vivitsayā

हे राजन्, इसके पश्चात् नारद ने योगेश्वरों के भी ईश्वर कृष्ण की योगमाया को जानने की इच्छा से कृष्ण की एक अन्य पत्नी के भवन में प्रवेश किया।

श्लोक 20 (bhagavata.10.69.20)

दीव्यन्तमक्षैस्तत्रापि प्रियया चोद्धवेन च । पूजितः परया भक्त्या प्रत्युत्थानासनादिभिः ॥ २० ॥

dīvyantam akṣais tatrāpi priyayā coddhavena ca pūjitaḥ parayā bhaktyā pratyutthānāsanādibhiḥ

वहाँ भी उन्होंने कृष्ण को अपनी प्रिया तथा उद्धव के साथ पासों से क्रीड़ा करते हुए देखा। कृष्ण ने उठकर, आसन देकर तथा अन्य विधियों से परम भक्तिपूर्वक उनका सत्कार किया।

श्लोक 21 (bhagavata.10.69.21)

पृष्टश्चाविदुषेवासौ कदायातो भवानिति । क्रियते किं नु पूर्णानामपूर्णैरस्मदादिभिः ॥ २१ ॥

pṛṣṭaś cāviduṣevāsau kadāyāto bhavān iti kriyate kiṁ nu pūrṇānām apūrṇair asmad-ādibhiḥ

और मानो कुछ न जानते हुए उन्होंने पूछा — "आप कब पधारे? हम जैसे अपूर्ण जन, आप जैसे पूर्णकाम व्यक्तियों के लिए भला क्या कर सकते हैं?"

श्लोक 22 (bhagavata.10.69.22)

अथापि ब्रूहि नो ब्रह्मन् जन्मैतच्छोभनं कुरु । स तु विस्मित उत्थाय तूष्णीमन्यदगाद् गृहम् ॥ २२ ॥

athāpi brūhi no brahman janmaitac chobhanaṁ kuru sa tu vismita utthāya tūṣṇīm anyad agād gṛham

"फिर भी, हे ब्रह्मन्, हमें आज्ञा दीजिए, हमारे इस जन्म को शुभ बना दीजिए।" यह सुनकर नारद विस्मित होकर चुपचाप उठे और दूसरे भवन की ओर चले गए।

श्लोक 23 (bhagavata.10.69.23)

तत्राप्यचष्ट गोविन्दं लालयन्तं सुतान् शिशून् । ततोऽन्यस्मिन् गृहेऽपश्यन्मज्जनाय कृतोद्यमम् ॥ २३ ॥

tatrāpy acaṣṭa govindaṁ lālayantaṁ sutān śiśūn tato ’nyasmin gṛhe ’paśyan majjanāya kṛtodyamam

वहाँ भी उन्होंने गोविन्द को अपने छोटे-छोटे पुत्रों को दुलारते हुए देखा। फिर एक अन्य भवन में उन्होंने देखा कि वे स्नान की तैयारी कर रहे हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.10.69.24)

जुह्वन्तं च वितानाग्नीन् यजन्तं पञ्चभिर्मखैः । भोजयन्तं द्विजान् क्वापि भुञ्जानमवशेषितम् ॥ २४ ॥

juhvantaṁ ca vitānāgnīn yajantaṁ pañcabhir makhaiḥ bhojayantaṁ dvijān kvāpi bhuñjānam avaśeṣitam

कहीं वे विस्तृत यज्ञ-अग्नियों में आहुति दे रहे थे, कहीं पंच महायज्ञों द्वारा यजन कर रहे थे, कहीं ब्राह्मणों को भोजन करा रहे थे, तो कहीं उन्हीं का शेष अन्न स्वयं ग्रहण कर रहे थे।

श्लोक 25 (bhagavata.10.69.25)

क्वापि सन्ध्यामुपासीनं जपन्तं ब्रह्म वाग्यतम् । एकत्र चासिचर्माभ्यां चरन्तमसिवर्त्मसु ॥ २५ ॥

kvāpi sandhyām upāsīnaṁ japantaṁ brahma vāg-yatam ekatra cāsi-carmābhyāṁ carantam asi-vartmasu

कहीं वे मौन रहकर संध्योपासना करते हुए गायत्री-मन्त्र का जप कर रहे थे, तो कहीं तलवार और ढाल लेकर शस्त्र-अभ्यास के मैदान में विचरण कर रहे थे।

श्लोक 26 (bhagavata.10.69.26)

अश्वैर्गजै रथैः क्वापि विचरन्तं गदाग्रजम् । क्वचिच्छयानं पर्यङ्के स्तूयमानं च वन्दिभिः ॥ २६ ॥

aśvair gajai rathaiḥ kvāpi vicarantaṁ gadāgrajam kvacic chayānaṁ paryaṅke stūyamānaṁ ca vandibhiḥ

कहीं गदाग्रज (कृष्ण) घोड़ों, हाथियों और रथों पर सवार होकर विचरण कर रहे थे, तो कहीं शय्या पर लेटे हुए भाटों द्वारा अपनी स्तुति सुन रहे थे।

श्लोक 27 (bhagavata.10.69.27)

मन्त्रयन्तं च कस्मिंश्चिन्मन्त्रिभिश्चोद्धवादिभिः । जलक्रीडारतं क्वापि वारमुख्याबलावृतम् ॥ २७ ॥

mantrayantaṁ ca kasmiṁścin mantribhiś coddhavādibhiḥ jala-krīḍā-rataṁ kvāpi vāramukhyābalāvṛtam

कहीं वे उद्धव आदि मंत्रियों के साथ राजकीय मंत्रणा कर रहे थे, तो कहीं श्रेष्ठ वारांगनाओं और युवतियों से घिरे हुए जल-क्रीड़ा में रत थे।

श्लोक 28 (bhagavata.10.69.28)

कुत्रचिद्द्विजमुख्येभ्यो ददतं गाः स्वलङ्कृताः । इतिहासपुराणानि शृण्वन्तं मङ्गलानि च ॥ २८ ॥

kutracid dvija-mukhyebhyo dadataṁ gāḥ sv-alaṅkṛtāḥ itihāsa-purāṇāni śṛṇvantaṁ maṅgalāni ca

कहीं वे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सुसज्जित गौएँ दान कर रहे थे, तो कहीं इतिहासों और पुराणों की मंगलमय कथाएँ श्रवण कर रहे थे।

श्लोक 29 (bhagavata.10.69.29)

हसन्तं हासकथया कदाचित् प्रियया गृहे । क्वापि धर्मं सेवमानमर्थकामौ च कुत्रचित् ॥ २९ ॥

hasantaṁ hāsa-kathayā kadācit priyayā gṛhe kvāpi dharmaṁ sevamānam artha-kāmau ca kutracit

कहीं वे घर में अपनी प्रिया के साथ हास्य-वार्ता करते हुए हँस रहे थे, तो कहीं धर्म का पालन कर रहे थे, और कहीं अर्थ तथा काम में संलग्न थे।

श्लोक 30 (bhagavata.10.69.30)

ध्यायन्तमेकमासीनं पुरुषं प्रकृतेः परम् । शुश्रूषन्तं गुरून् क्वापि कामैर्भोगैः सपर्यया ॥ ३० ॥

dhyāyantam ekam āsīnaṁ puruṣaṁ prakṛteḥ param śuśrūṣantaṁ gurūn kvāpi kāmair bhogaiḥ saparyayā

कहीं वे एकाकी बैठकर प्रकृति से परे पुरुष का ध्यान कर रहे थे, तो कहीं वांछित वस्तुओं, भोगों तथा सेवा द्वारा गुरुजनों की परिचर्या कर रहे थे।

श्लोक 31 (bhagavata.10.69.31)

कुर्वन्तं विग्रहं कैश्चित् सन्धिं चान्यत्र केशवम् । कुत्रापि सह रामेण चिन्तयन्तं सतां शिवम् ॥ ३१ ॥

kurvantaṁ vigrahaṁ kaiścit sandhiṁ cānyatra keśavam kutrāpi saha rāmeṇa cintayantaṁ satāṁ śivam

कहीं केशव किन्हीं के साथ युद्ध की योजना बना रहे थे, तो कहीं किसी अन्य के साथ सन्धि कर रहे थे, और कहीं बलराम के साथ मिलकर साधुजनों के कल्याण का विचार कर रहे थे।

श्लोक 32 (bhagavata.10.69.32)

पुत्राणां दुहितृणां च काले विध्युपयापनम् । दारैर्वरैस्तत्सदृशैः कल्पयन्तं विभूतिभिः ॥ ३२ ॥

putrāṇāṁ duhitṝṇāṁ ca kāle vidhy-upayāpanam dārair varais tat-sadṛśaiḥ kalpayantaṁ vibhūtibhiḥ

नारद ने देखा कि वे अपने पुत्रों और पुत्रियों का विधिवत् विवाह उचित समय पर, उन्हीं के योग्य वर-वधुओं के साथ, बड़े वैभव से सम्पन्न करा रहे थे।

श्लोक 33 (bhagavata.10.69.33)

प्रस्थापनोपनयनैरपत्यानां महोत्सवान् । वीक्ष्य योगेश्वरेशस्य येषां लोका विसिस्मिरे ॥ ३३ ॥

prasthāpanopanayanair apatyānāṁ mahotsavān vīkṣya yogeśvareśasya yeṣāṁ lokā visismire

योगेश्वरों के भी ईश्वर कृष्ण द्वारा अपनी सन्तानों की विदाई और उपनयन आदि के महोत्सवों को उन्होंने देखा, जिन्हें देखकर सम्पूर्ण जन विस्मित हो उठे थे।

श्लोक 34 (bhagavata.10.69.34)

यजन्तं सकलान् देवान् क्वापि क्रतुभिरूर्जितैः । पूर्तयन्तं क्वचिद् धर्मं कूर्पाराममठादिभिः ॥ ३४ ॥

yajantaṁ sakalān devān kvāpi kratubhir ūrjitaiḥ pūrtayantaṁ kvacid dharmaṁ kūrpārāma-maṭhādibhiḥ

कहीं वे भव्य यज्ञों द्वारा समस्त देवताओं का यजन कर रहे थे, तो कहीं कुओं, उद्यानों और मठों आदि के निर्माण से धर्म का सम्पादन कर रहे थे।

श्लोक 35 (bhagavata.10.69.35)

चरन्तं मृगयां क्वापि हयमारुह्य सैन्धवम् । घ्नन्तं तत्र पशून् मेध्यान् परीतं यदुपुङ्गवैः ॥ ३५ ॥

carantaṁ mṛgayāṁ kvāpi hayam āruhya saindhavam ghnantaṁ tatra paśūn medhyān parītaṁ yadu-puṅgavaiḥ

कहीं वे सिन्धु देश के अश्व पर सवार होकर, यदुश्रेष्ठों से घिरे हुए, मृगया कर रहे थे, तथा यज्ञ-योग्य पशुओं का वध कर रहे थे।

श्लोक 36 (bhagavata.10.69.36)

अव्यक्तलिङ्गं प्रकृतिष्वन्तः पुरगृहादिषु । क्वचिच्चरन्तं योगेशं तत्तद्भावबुभुत्सया ॥ ३६ ॥

avyakta-lingaṁ prakṛtiṣv antaḥ-pura-gṛhādiṣu kvacic carantaṁ yogeśaṁ tat-tad-bhāva-bubhutsayā

कहीं वे योगेश्वर कृष्ण अपने मंत्रियों तथा अन्य नागरिकों के घरों और अन्तःपुरों में भेष बदलकर विचरण कर रहे थे, यह जानने की इच्छा से कि उनके मन में क्या-क्या भाव हैं।

श्लोक 37 (bhagavata.10.69.37)

अथोवाच हृषीकेशं नारदः प्रहसन्निव । योगमायोदयं वीक्ष्य मानुषीमीयुषो गतिम् ॥ ३७ ॥

athovāca hṛṣīkeśaṁ nāradaḥ prahasann iva yoga-māyodayaṁ vīkṣya mānuṣīm īyuṣo gatim

इस प्रकार मनुष्यों जैसा आचरण करने वाले हृषीकेश की योगमाया के इस प्रकटीकरण को देखकर नारद कुछ हँसते हुए उनसे बोले।

श्लोक 38 (bhagavata.10.69.38)

विदाम योगमायास्ते दुर्दर्शा अपि मायिनाम् । योगेश्वरात्मन् निर्भाता भवत्पादनिषेवया ॥ ३८ ॥

vidāma yoga-māyās te durdarśā api māyinām yogeśvarātman nirbhātā bhavat-pāda-niṣevayā

नारद ने कहा — हे योगेश्वरात्मन्, अब हम आपकी उस योगमाया को जान गए, जिसे बड़े-बड़े मायावी भी नहीं देख सकते; यह आपके चरणों की सेवा से ही मुझ पर प्रकट हुई है।

श्लोक 39 (bhagavata.10.69.39)

अनुजानीहि मां देव लोकांस्ते यशसाप्लुतान् । पर्यटामि तवोद्गायन् लीला भुवनपावनीः ॥ ३९ ॥

anujānīhi māṁ deva lokāṁs te yaśasāplutān paryaṭāmi tavodgāyan līlā bhuvana-pāvanīḥ

"हे देव, मुझे अनुमति दीजिए। आपकी कीर्ति से आप्लावित इन लोकों में मैं विचरण करूँगा, तथा आपकी उन लीलाओं का उच्च स्वर से गान करूँगा, जो सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करने वाली हैं।"

श्लोक 40 (bhagavata.10.69.40)

श्रीभगवानुवाच ब्रह्मन् धर्मस्य वक्ताहं कर्ता तदनुमोदिता । तच्छिक्षयन् लोकमिममास्थितः पुत्र मा खिदः ॥ ४० ॥

śrī-bhagavān uvāca brahman dhannasya vaktāhaṁ kartā tad-anumoditā tac chikṣayan lokam imam āsthitaḥ putra mā khidaḥ

भगवान ने कहा — हे ब्रह्मन्, मैं ही धर्म का उपदेशक, कर्ता तथा उसका अनुमोदन करने वाला हूँ। इस जगत् को शिक्षा देने के लिए ही मैं इस प्रकार धर्माचरण में स्थित हूँ; हे पुत्र, दुःखी मत हो।

श्लोक 41 (bhagavata.10.69.41)

श्रीशुक उवाच इत्याचरन्तं सद्धर्मान् पावनान् गृहमेधिनाम् । तमेव सर्वगेहेषु सन्तमेकं ददर्श ह ॥ ४१ ॥

śrī-śuka uvāca ity ācarantaṁ sad-dharmān pāvanān gṛha-medhinām tam eva sarva-geheṣu santam ekaṁ dadarśa ha

श्री शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार गृहस्थों के लिए पवित्रकारी सद्धर्मों का आचरण करते हुए, नारद ने प्रत्येक भवन में उन्हीं एक कृष्ण को साक्षात् उपस्थित पाया।

श्लोक 42 (bhagavata.10.69.42)

कृष्णस्यानन्तवीर्यस्य योगमायामहोदयम् । मुहुर्दृष्ट्वा ऋषिरभूद् विस्मितो जातकौतुकः ॥ ४२ ॥

kṛṣṇasyānanta-vīryasya yoga-māyā-mahodayam muhur dṛṣṭvā ṛṣir abhūd vismito jāta-kautukaḥ

अनन्त पराक्रम वाले कृष्ण की उस योगमाया के महान प्रकटीकरण को बार-बार देखकर वे मुनि विस्मित हो उठे तथा उनमें अत्यन्त कौतूहल उत्पन्न हुआ।

श्लोक 43 (bhagavata.10.69.43)

इत्यर्थकामधर्मेषु कृष्णेन श्रद्धितात्मना । सम्यक् सभाजितः प्रीतस्तमेवानुस्मरन् ययौ ॥ ४३ ॥

ity artha-kāma-dharmeṣu kṛṣṇena śraddhitātmanā samyak sabhājitaḥ prītas tam evānusmaran yayau

इस प्रकार श्रद्धालु कृष्ण द्वारा अर्थ, काम और धर्म से सम्बन्धित विषयों में भली-भाँति सम्मानित होकर, प्रसन्न नारद उन्हीं का सतत स्मरण करते हुए वहाँ से चले गए।

श्लोक 44 (bhagavata.10.69.44)

एवं मनुष्यपदवीमनुवर्तमानो नारायणोऽखिलभवाय गृहीतशक्तिः । रेमेऽङ्ग षोडशसहस्रवराङ्गनानां सव्रीडसौहृदनिरीक्षणहासजुष्टः ॥ ४४ ॥

evaṁ manuṣya-padavīm anuvartamāno nārāyaṇo ’khila-bhavāya gṛhīta-śaktiḥ reme ’ṇga ṣoḍaśa-sahasra-varāṅganānāṁ sa-vrīḍa-sauhṛda-nirīkṣaṇa-hāsa-juṣṭaḥ

हे राजन्, इस प्रकार मनुष्यों के मार्ग का अनुसरण करते हुए, सम्पूर्ण जीवों के कल्याण हेतु अपनी शक्तियों को धारण किए हुए भगवान नारायण अपनी सोलह सहस्र श्रेष्ठ पत्नियों की लज्जायुक्त, स्नेहभरी दृष्टि तथा हास्य से सेवित होते हुए विहार करते थे।

श्लोक 45 (bhagavata.10.69.45)

यानीह विश्वविलयोद्भववृत्तिहेतुः कर्माण्यनन्यविषयाणि हरिश्चकार । यस्त्वङ्ग गायति शृणोत्यनुमोदते वा भक्तिर्भवेद् भगवति ह्यपवर्गमार्गे ॥ ४५ ॥

yānīha viśva-vilayodbhava-vṛtti-hetuḥ karmāṇy ananya-viṣayāṇi harīś cakāra yas tv aṅga gāyati śṛṇoty anumodate vā bhaktir bhaved bhagavati hy apavarga-mārge

हे राजन्, विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के हेतुभूत भगवान हरि ने यहाँ जो अद्वितीय कर्म किए, उनका जो कोई गान करता है, श्रवण करता है, अथवा उनकी सराहना करता है, उसमें मुक्ति के मार्गस्वरूप भगवान के प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाती है।

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