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दशम स्कन्ध · अध्याय 72

दैत्य जरासन्ध का वध

अध्याय 71अध्याय-सूचीअध्याय 73

श्लोक 1 (bhagavata.10.72.1)

श्रीशुक उवाच एकदा तु सभामध्य आस्थितो मुनिभिर्वृतः । ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैर्भ्रातृभिश्च युधिष्ठिरः ॥ 72.1 ॥

śrī-śuka uvāca ekadā tu sabhā-madhya āsthito munibhir vṛtaḥ brāhmaṇaiḥ kṣatriyair vaiśyair bhrātṛbhiś ca yudhiṣṭhiraḥ

शुकदेव ने कहा — एक दिन सभा के मध्य में मुनियों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा अपने भाइयों से घिरे बैठे हुए युधिष्ठिर ने,

श्लोक 2 (bhagavata.10.72.2)

आचार्यैः कुलवृद्धैश्च ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः । शृण्वतामेव चैतेषामाभाष्येदमुवाच ह ॥ 72.2 ॥

ācāryaiḥ kula-vṛddhaiś ca jñāti-sambandhi-bāndhavaiḥ śṛṇvatām eva caiteṣām ābhāṣyedam uvāca ha

— आचार्यों, कुल के वृद्धजनों, ज्ञातिजनों, सम्बन्धियों और बान्धवों से घिरे हुए, उन सबके सुनते हुए ही, कृष्ण को सम्बोधित करते हुए यह कहा।

श्लोक 3 (bhagavata.10.72.3)

श्रीयुधिष्ठिर उवाच क्रतुराजेन गोविन्द राजसूयेन पावनीः । यक्ष्ये विभूतीर्भवतस्तत् सम्पादय नः प्रभो ॥ 72.3 ॥

śrī-yudhiṣṭhira uvāca kratu-rājena govinda rājasūyena pāvanīḥ yakṣye vibhūtīr bhavatas tat sampādaya naḥ prabho

श्री युधिष्ठिर ने कहा — हे गोविन्द! यज्ञों के राजा राजसूय यज्ञ द्वारा मैं आपकी पवित्र विभूतियों की पूजा करना चाहता हूँ। हे प्रभो! आप हमारे लिए इसे सम्पन्न कराइए।

श्लोक 4 (bhagavata.10.72.4)

त्वत्पादुके अविरतं परि ये चरन्ति ध्यायन्त्यभद्रनशने शुचयो गृणन्ति । विन्दन्ति ते कमलनाभ भवापवर्ग- माशासते यदि त आशिष ईश नान्ये ॥ 72.4 ॥

tvat-pāduke avirataṁ pari ye caranti dhyāyanty abhadra-naśane śucayo gṛṇanti vindanti te kamala-nābha bhavāpavargam āśāsate yadi ta āśiṣa īśa nānye

हे कमलनाभ! जो लोग निरंतर आपकी उन पादुकाओं की सेवा में रहते हैं, जो समस्त अशुभ का नाश करने वाली हैं, जो उनका ध्यान करते और शुद्ध हृदय से उनका कीर्तन करते हैं, वे संसार से मुक्ति पाते हैं; और यदि वे कुछ लौकिक वस्तु चाहें तो वह भी पाते हैं — हे ईश्वर! अन्य कोई नहीं पाता।

श्लोक 5 (bhagavata.10.72.5)

तद् देवदेव भवतश्चरणारविन्द- सेवानुभावमिह पश्यतु लोक एषः । ये त्वां भजन्ति न भजन्त्युत वोभयेषां निष्ठां प्रदर्शय विभो कुरुसृञ्जयानाम् ॥ 72.5 ॥

tad deva-deva bhavataś caraṇāravinda- sevānubhāvam iha paśyatu loka eṣaḥ ye tvāṁ bhajanti na bhajanty uta vobhayeṣāṁ niṣṭhāṁ pradarśaya vibho kuru-sṛñjayānām

अतः हे देवाधिदेव! आपके चरणकमलों की सेवा का प्रभाव इस लोक को यहीं देखने दीजिए। हे प्रभो! कुरु और सृंजय वंश में जो आपको भजते हैं और जो नहीं भजते, दोनों की स्थिति दिखा दीजिए।

श्लोक 6 (bhagavata.10.72.6)

न ब्रह्मणः स्वपरभेदमतिस्तव स्यात् सर्वात्मनः समदृशः स्वसुखानुभूतेः । संसेवतां सुरतरोरिव ते प्रसादः सेवानुरूपमुदयो न विपर्ययोऽत्र ॥ 72.6 ॥

na brahmaṇaḥ sva-para-bheda-matis tava syāt sarvātmanaḥ sama-dṛśaḥ sva-sukhānubhūteḥ saṁsevatāṁ sura-taror iva te prasādaḥ sevānurūpam udayo na viparyayo ’tra

हे सर्वात्मन्! आप समदर्शी हैं, आत्मसुख का अनुभव करने वाले हैं — आपमें "यह मेरा है, यह पराया है" ऐसा भेदभाव नहीं हो सकता। कल्पवृक्ष के समान, आपकी सेवा करने वालों पर आपकी कृपा उनकी सेवा के अनुरूप ही प्रकट होती है, इसके विपरीत कभी नहीं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.72.7)

श्रीभगवानुवाच सम्यग् व्यवसितं राजन् भवता शत्रुकर्शन । कल्याणी येन ते कीर्तिर्लोकाननु भविष्यति ॥ 72.7 ॥

śrī-bhagavān uvāca samyag vyavasitaṁ rājan bhavatā śatru-karśana kalyāṇī yena te kīrtir lokān anubhaviṣyati

भगवान ने कहा — हे राजन्! हे शत्रुदमन! आपका यह निर्णय सर्वथा उचित है, जिससे आपकी कल्याणकारी कीर्ति सम्पूर्ण लोकों में फैलेगी।

श्लोक 8 (bhagavata.10.72.8)

ऋषीणां पितृदेवानां सुहृदामपि नः प्रभो । सर्वेषामपि भूतानामीप्सितः क्रतुराडयम् ॥ 72.8 ॥

ṛṣīṇāṁ pitṛ-devānāṁ suhṛdām api naḥ prabho sarveṣām api bhūtānām īpsitaḥ kratu-rāḍ ayam

ऋषियों, पितरों और देवताओं के लिए, तथा हमारे सुहृदों के लिए भी, और वस्तुतः समस्त प्राणियों के लिए, यह यज्ञराज अभीष्ट है।

श्लोक 9 (bhagavata.10.72.9)

विजित्य नृपतीन्सर्वान् कृत्वा च जगतीं वशे । सम्भृत्य सर्वसम्भारानाहरस्व महाक्रतुम् ॥ 72.9 ॥

vijitya nṛpatīn sarvān kṛtvā ca jagatīṁ vaśe sambhṛtya sarva-sambhārān āharasva mahā-kratum

समस्त राजाओं को जीतकर तथा पृथ्वी को अपने वश में करके, समस्त सामग्री एकत्र करके, आप इस महायज्ञ को सम्पन्न कीजिए।

श्लोक 10 (bhagavata.10.72.10)

एते ते भ्रातरो राजल्ँ लोकपालांशसम्भवाः । जितोऽस्म्यात्मवता तेऽहं दुर्जयो योऽकृतात्मभिः ॥ 72.10 ॥

ete te bhrātaro rājaḻ loka-pālāṁśa-sambhavāḥ jito ’smy ātmavatā te ’haṁ durjayo yo ’kṛtātmabhiḥ

हे राजन्! आपके ये भाई लोकपालों के अंश से उत्पन्न हुए हैं। आत्मसंयमी होने के कारण आपने मुझे भी जीत लिया है — मुझे, जो असंयमी पुरुषों के लिए दुर्जय हूँ।

श्लोक 11 (bhagavata.10.72.11)

न कश्चिन्मत्परं लोके तेजसा यशसा श्रिया । विभूतिभिर्वाभिभवेद् देवोऽपि किमु पार्थिवः ॥ 72.11 ॥

na kaścin mat-paraṁ loke tejasā yaśasā śriyā vibhūtibhir vābhibhaved devo ’pi kim u pārthivaḥ

तेज, यश, श्री अथवा ऐश्वर्य में इस लोक में मेरे भक्त से बढ़कर कोई नहीं है — देवता भी नहीं, फिर पार्थिव राजा की तो बात ही क्या।

श्लोक 12 (bhagavata.10.72.12)

श्रीशुक उवाच निशम्य भगवद्गीतं प्रीतः फुल्लमुखाम्बुजः । भ्रातृन् दिग्विजयेऽयुङ्क्त विष्णुतेजोपबृंहितान् ॥ 72.12 ॥

śrī-śuka uvāca niśamya bhagavad-gītaṁ prītaḥ phulla-mukhāmbujaḥ bhrātṝn dig-vijaye ’yuṅkta viṣṇu-tejopabṛṁhitān

शुकदेव ने कहा — भगवान के इस वचन को सुनकर प्रसन्न हुए, कमल के समान खिले हुए मुख वाले युधिष्ठिर ने विष्णु के तेज से समन्वित अपने भाइयों को दिग्विजय में नियुक्त किया।

श्लोक 13 (bhagavata.10.72.13)

सहदेवं दक्षिणस्यामादिशत् सह सृञ्जयैः । दिशि प्रतीच्यां नकुलमुदीच्यां सव्यसाचिनम् । प्राच्यां वृकोदरं मत्स्यैः केकयैः सह मद्रकैः ॥ 72.13 ॥

sahadevaṁ dakṣiṇasyām ādiśat saha sṛñjayaiḥ diśi pratīcyāṁ nakulam udīcyāṁ savyasācinam prācyāṁ vṛkodaraṁ matsyaiḥ kekayaiḥ saha madrakaiḥ

उन्होंने सहदेव को सृंजयों के साथ दक्षिण दिशा में, नकुल को पश्चिम दिशा में, सव्यसाची (अर्जुन) को उत्तर दिशा में, तथा वृकोदर (भीम) को मत्स्य, केकय और मद्रकों के साथ पूर्व दिशा में भेजा।

श्लोक 14 (bhagavata.10.72.14)

ते विजित्य नृपान्वीरा आजह्रुर्दिग्भ्य ओजसा । अजातशत्रवे भूरि द्रविणं नृप यक्ष्यते ॥ 72.14 ॥

te vijitya nṛpān vīrā ājahrur digbhya ojasā ajāta-śatrave bhūri draviṇaṁ nṛpa yakṣyate

उन वीरों ने राजाओं को जीतकर अपने पराक्रम से सभी दिशाओं से प्रचुर धन एकत्र कर लाया, हे राजन्! यज्ञ करने वाले अजातशत्रु (युधिष्ठिर) के लिए।

श्लोक 15 (bhagavata.10.72.15)

श्रुत्वाजितं जरासन्धं नृपतेर्ध्यायतो हरिः । आहोपायं तमेवाद्य उद्धवो यमुवाच ह ॥ 72.15 ॥

śrutvājitaṁ jarāsandhaṁ nṛpater dhyāyato hariḥ āhopāyaṁ tam evādya uddhavo yam uvāca ha

जरासन्ध को अब भी अजित सुनकर तथा राजा को चिंतामग्न देखकर, हरि ने उसी उपाय को बताया, जिसे उद्धव ने पहले कहा था।

श्लोक 16 (bhagavata.10.72.16)

भीमसेनोऽर्जुनः कृष्णो ब्रह्मलिङ्गधरास्त्रयः । जग्मुर्गिरिव्रजं तात बृहद्रथसुतो यतः ॥ 72.16 ॥

bhīmaseno ’rjunaḥ kṛṣṇo brahma-linga-dharās trayaḥ jagmur girivrajaṁ tāta bṛhadratha-suto yataḥ

भीमसेन, अर्जुन और कृष्ण — तीनों ब्राह्मण-वेष धारण कर, हे तात! उस गिरिव्रज नगर गए, जहाँ के राजा बृहद्रथ-पुत्र (जरासन्ध) थे।

श्लोक 17 (bhagavata.10.72.17)

ते गत्वातिथ्यवेलायां गृहेषु गृहमेधिनम् । ब्रह्मण्यं समयाचेरन् राजन्या ब्रह्मलिङ्गिनः ॥ 72.17 ॥

te gatvātithya-velāyāṁ gṛheṣu gṛha-medhinam brahmaṇyaṁ samayāceran rājanyā brahma-liṅginaḥ

अतिथि-सत्कार के समय वहाँ पहुँचकर, ब्राह्मण-वेषधारी उन क्षत्रिय वीरों ने ब्राह्मणभक्त गृहस्थ जरासन्ध से याचना की।

श्लोक 18 (bhagavata.10.72.18)

राजन् विद्ध्यतिथीन् प्राप्तानर्थिनो दूरमागतान् । तन्नः प्रयच्छ भद्रं ते यद्वयं कामयामहे ॥ 72.18 ॥

rājan viddhy atithīn prāptān arthino dūram āgatān tan naḥ prayaccha bhadraṁ te yad vayaṁ kāmayāmahe

[उन्होंने कहा:] हे राजन्! हमें दूर से आए हुए, याचक अतिथि जानिए। हम जो चाहते हैं, वह हमें दीजिए, आपका कल्याण हो।

श्लोक 19 (bhagavata.10.72.19)

किं दुर्मर्षं तितिक्षूणां किमकार्यमसाधुभिः । किं न देयं वदान्यानां कः परः समदर्शिनाम् ॥ 72.19 ॥

kiṁ durmarṣaṁ titikṣūṇāṁ kim akāryam asādhubhiḥ kiṁ na deyaṁ vadānyānāṁ kaḥ paraḥ sama-darśinām

सहनशील पुरुषों के लिए क्या असह्य है? दुष्टों के लिए क्या अकरणीय है? उदार पुरुषों के लिए क्या अदेय है? और समदर्शियों के लिए कौन पराया है?

श्लोक 20 (bhagavata.10.72.20)

योऽनित्येन शरीरेण सतां गेयं यशो ध्रुवम् । नाचिनोति स्वयं कल्पः स वाच्यः शोच्य एव सः ॥ 72.20 ॥

yo ’nityena śarīreṇa satāṁ geyaṁ yaśo dhruvam nācinoti svayaṁ kalpaḥ sa vācyaḥ śocya eva saḥ

जो व्यक्ति समर्थ होते हुए भी अपने नश्वर शरीर से सज्जनों द्वारा गाई जाने वाली उस अविनाशी कीर्ति को अर्जित नहीं करता, वह निंदा के योग्य है, वस्तुतः वह शोचनीय है।

श्लोक 21 (bhagavata.10.72.21)

हरिश्चन्द्रो रन्तिदेव उञ्छवृत्तिः शिबिर्बलिः । व्याधः कपोतो बहवो ह्यध्रुवेण ध्रुवं गताः ॥ 72.21 ॥

hariścandro rantideva uñchavṛttiḥ śibir baliḥ vyādhaḥ kapoto bahavo hy adhruveṇa dhruvaṁ gatāḥ

हरिश्चंद्र, रन्तिदेव, बिना मांगे अन्न-कण बीनकर जीवन-यापन करने वाले मुद्गल, शिबि, बलि, तथा वह व्याध और कबूतर — बहुतों ने नश्वर के द्वारा शाश्वत को प्राप्त किया है।

श्लोक 22 (bhagavata.10.72.22)

श्रीशुक उवाच स्वरैराकृतिभिस्तांस्तु प्रकोष्ठैर्ज्याहतैरपि । राजन्यबन्धून् विज्ञाय दृष्टपूर्वानचिन्तयत् ॥ 72.22 ॥

śrī-śuka uvāca svarair ākṛtibhis tāṁs tu prakoṣṭhair jyā-hatair api rājanya-bandhūn vijñāya dṛṣṭa-pūrvān acintayat

शुकदेव ने कहा — उनकी वाणी, आकृति तथा भुजाओं पर प्रत्यंचा के चिह्नों से जरासन्ध ने उन्हें राजवंशी पहचान लिया और सोचने लगा कि उसने इन्हें पहले कहीं देखा है।

श्लोक 23 (bhagavata.10.72.23)

राजन्यबन्धवो ह्येते ब्रह्मलिङ्गानि बिभ्रति । ददानि भिक्षितं तेभ्य आत्मानमपि दुस्त्यजम् ॥ 72.23 ॥

rājanya-bandhavo hy ete brahma-liṅgāni bibhrati dadāni bhikṣitaṁ tebhya ātmānam api dustyajam

[उसने सोचा:] ये निश्चय ही राजवंशी हैं जो ब्राह्मण का वेश धारण किए हुए हैं; फिर भी मैं इन्हें वह दूँगा जो वे माँगेंगे, चाहे वह मेरा अपना दुस्त्यज शरीर ही क्यों न हो।

श्लोक 24 (bhagavata.10.72.24)

बलेर्नु श्रूयते कीर्तिर्वितता दिक्ष्वकल्मषा । ऐश्वर्याद् भ्रंशितस्यापि विप्रव्याजेन विष्णुना ॥ 72.24 ॥

baler nu śrūyate kīrtir vitatā dikṣv akalmaṣā aiśvaryād bhraṁśitasyāpi vipra-vyājena viṣṇunā

बलि की कीर्ति सम्पूर्ण दिशाओं में निर्मल फैली हुई सुनी जाती है, यद्यपि विष्णु ने ब्राह्मण के छद्मवेष में उसे उसके ऐश्वर्य से च्युत कर दिया था।

श्लोक 25 (bhagavata.10.72.25)

श्रियं जिहीर्षतेन्द्रस्य विष्णवे द्विजरूपिणे । जानन्नपि महीं प्रादाद् वार्यमाणोऽपि दैत्यराट् ॥ 72.25 ॥

śriyaṁ jihīrṣatendrasya viṣṇave dvija-rūpiṇe jānann api mahīm prādād vāryamāṇo ’pi daitya-rāṭ

इन्द्र के लिए बलि की सम्पत्ति हरण करने की इच्छा से द्विजरूपधारी विष्णु आए; जानते हुए भी और अपने गुरु द्वारा रोके जाने पर भी, उस दैत्यराज ने पृथ्वी का दान कर दिया।

श्लोक 26 (bhagavata.10.72.26)

जीवता ब्राह्मणार्थाय को न्वर्थः क्षत्रबन्धुना । देहेन पतमानेन नेहता विपुलं यशः ॥ 72.26 ॥

jīvatā brāhmaṇārthāya ko nv arthaḥ kṣatra-bandhunā dehena patamānena nehatā vipulaṁ yaśaḥ

ब्राह्मणों के हित के लिए न जीने वाले क्षत्रिय के जीवित रहने से क्या लाभ, जिसका शरीर तो नष्ट होने वाला ही है, और जो विपुल यश के लिए प्रयत्न भी नहीं करता?

श्लोक 27 (bhagavata.10.72.27)

इत्युदारमतिः प्राह कृष्णार्जुनवृकोदरान् । हे विप्रा व्रियतां कामो ददाम्यात्मशिरोऽपि वः ॥ 72.27 ॥

ity udāra-matiḥ prāha kṛṣṇārjuna-vṛkodarān he viprā vriyatāṁ kāmo dadāmy ātma-śiro ’pi vaḥ

इस प्रकार उदार बुद्धि वाले जरासन्ध ने कृष्ण, अर्जुन और वृकोदर से कहा — "हे विप्रो! जो चाहो, माँग लो; मैं अपना सिर भी दे दूँगा।"

श्लोक 28 (bhagavata.10.72.28)

श्रीभगवानुवाच युद्धं नो देहि राजेन्द्र द्वन्द्वशो यदि मन्यसे । युद्धार्थिनो वयं प्राप्ता राजन्या नान्यकाङ्क्षिणः ॥ 72.28 ॥

śrī-bhagavān uvāca yuddhaṁ no dehi rājendra dvandvaśo yadi manyase yuddhārthino vayaṁ prāptā rājanyā nānya-kāṅkṣiṇaḥ

भगवान ने कहा — हे राजेन्द्र! यदि आप उचित समझें तो हमें द्वंद्वयुद्ध दीजिए। हम राजपुत्र युद्ध की इच्छा से आए हैं, अन्य किसी वस्तु की कामना नहीं है।

श्लोक 29 (bhagavata.10.72.29)

असौ वृकोदरः पार्थस्तस्य भ्रातार्जुनो ह्ययम् । अनयोर्मातुलेयं मां कृष्णं जानीहि ते रिपुम् ॥ 72.29 ॥

asau vṛkodaraḥ pārthas tasya bhrātārjuno hy ayam anayor mātuleyaṁ māṁ kṛṣṇaṁ jānīhi te ripum

यह पृथापुत्र वृकोदर है, यह उसका भाई अर्जुन है; और मुझे, इन दोनों के मामा-पुत्र, अपने शत्रु कृष्ण के रूप में जानिए।

श्लोक 30 (bhagavata.10.72.30)

एवमावेदितो राजा जहासोच्चैः स्म मागधः । आह चामर्षितो मन्दा युद्धं तर्हि ददामि वः ॥ 72.30 ॥

evam āvedito rājā jahāsoccaiḥ sma māgadhaḥ āha cāmarṣito mandā yuddhaṁ tarhi dadāmi vaḥ

इस प्रकार बताए जाने पर मागधराज उच्च स्वर से हँस पड़ा और क्रुद्ध होकर बोला — "अरे मूर्खो! तब तो मैं तुम्हें युद्ध देता हूँ!

श्लोक 31 (bhagavata.10.72.31)

न त्वया भीरुणा योत्स्ये युधि विक्लवतेजसा । मथुरां स्वपुरीं त्यक्त्वा समुद्रं शरणं गतः ॥ 72.31 ॥

na tvayā bhīruṇā yotsye yudhi viklava-tejasā mathurāṁ sva-purīṁ tyaktvā samudraṁ śaraṇaṁ gataḥ

"मैं तुझसे नहीं लड़ूँगा, हे भीरु! युद्ध में तेरा तेज विचलित हो जाता है; तूने अपनी नगरी मथुरा त्यागकर समुद्र की शरण ली थी।

श्लोक 32 (bhagavata.10.72.32)

अयं तु वयसातुल्यो नातिसत्त्वो न मे समः । अर्जुनो न भवेद् योद्धा भीमस्तुल्यबलो मम ॥ 72.32 ॥

ayaṁ tu vayasātulyo nāti-sattvo na me samaḥ arjuno na bhaved yoddhā bhīmas tulya-balo mama

"और यह [अर्जुन], न तो आयु में मेरे समान है, न विशेष बलशाली है, न मेरे तुल्य है; अर्जुन मेरा प्रतिद्वंद्वी होने योग्य नहीं। भीम ही मेरे समान बलवान है।"

श्लोक 33 (bhagavata.10.72.33)

इत्युक्त्वा भीमसेनाय प्रादाय महतीं गदाम् । द्वितीयां स्वयमादाय निर्जगाम पुराद् बहिः ॥ 72.33 ॥

ity uktvā bhīmasenāya prādāya mahatīṁ gadām dvitīyāṁ svayam ādāya nirjagāma purād bahiḥ

यह कहकर उसने भीमसेन को एक विशाल गदा दी, स्वयं दूसरी गदा उठाई, और नगर से बाहर निकल गया।

श्लोक 34 (bhagavata.10.72.34)

ततः समेखले वीरौ संयुक्तावितरेतरम् । जघ्नतुर्वज्रकल्पाभ्यां गदाभ्यां रणदुर्मदौ ॥ 72.34 ॥

tataḥ samekhale vīrau saṁyuktāv itaretaram jaghnatur vajra-kalpābhyāṁ gadābhyāṁ raṇa-durmadau

तब वे दोनों वीर, समतल भूमि पर आमने-सामने आकर, युद्ध के उन्माद में मत्त होकर, वज्र के समान अपनी गदाओं से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 35 (bhagavata.10.72.35)

मण्डलानि विचित्राणि सव्यं दक्षिणमेव च । चरतोः शुशुभे युद्धं नटयोरिव रङ्गिणोः ॥ 72.35 ॥

maṇḍalāni vicitrāṇi savyaṁ dakṣiṇam eva ca caratoḥ śuśubhe yuddhaṁ naṭayor iva raṅgiṇoḥ

विचित्र मंडलों में, बाईं और दाईं ओर घूमते हुए, उन दोनों का युद्ध रंगमंच पर नाचते हुए दो नटों के समान शोभित हो रहा था।

श्लोक 36 (bhagavata.10.72.36)

ततश्चटचटाशब्दो वज्रनिष्पेससन्निभः । गदयोः क्षिप्तयो राजन्दन्तयोरिव दन्तिनोः ॥ 72.36 ॥

tataś caṭa-caṭā-śabdo vajra-niṣpesa-sannibhaḥ gadayoḥ kṣiptayo rājan dantayor iva dantinoḥ

तब, हे राजन्! उनकी टकराती हुई गदाओं की चट-चट ध्वनि वज्रपात के समान थी, मानो दो हाथियों के दाँत आपस में टकरा रहे हों।

श्लोक 37 (bhagavata.10.72.37)

ते वै गदे भुजजवेन निपात्यमाने अन्योन्यतोंऽसकटिपादकरोरुजत्रुम् । चूर्णीबभूवतुरुपेत्य यथार्कशाखे संयुध्यतोर्द्विरदयोरिव दीप्तमन्व्योः ॥ 72.37 ॥

te vai gade bhuja-javena nipātyamāne anyonyato ’ṁsa-kaṭi-pāda-karoru-jatrum cūrṇī-babhūvatur upetya yathārka-śākhe saṁyudhyator dviradayor iva dīpta-manvyoḥ

भुजाओं के वेग से एक-दूसरे के कंधों, कमर, पैरों, हाथों, जांघों और हंसलियों पर गिरती हुई वे दोनों गदाएँ चूर-चूर हो गईं, मानो दो क्रुद्ध हाथी परस्पर युद्ध करते हुए अर्क वृक्ष की शाखाओं को तोड़ रहे हों।

श्लोक 38 (bhagavata.10.72.38)

इत्थं तयोः प्रहतयोर्गदयोर्नृवीरौ क्रुद्धौ स्वमुष्टिभिरयःस्परशैरपिष्टाम् । शब्दस्तयोः प्रहरतोरिभयोरिवासी- न्निर्घातवज्रपरुषस्तलताडनोत्थः ॥ 72.38 ॥

itthaṁ tayoḥ prahatayor gadayor nṛ-vīrau kruddhau sva-muṣṭibhir ayaḥ-sparaśair apiṣṭām śabdas tayoḥ praharator ibhayor ivāsīn nirghāta-vajra-paruṣas tala-tāḍanotthaḥ

इस प्रकार अपनी गदाएँ टूट जाने पर वे दोनों नरवीर क्रुद्ध होकर लोहे के समान कठोर मुक्कों से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे; उनके थप्पड़ों की ध्वनि वज्रपात के समान कर्कश थी, मानो दो हाथी परस्पर टकरा रहे हों।

श्लोक 39 (bhagavata.10.72.39)

तयोरेवं प्रहरतोः समशिक्षाबलौजसोः । निर्विशेषमभूद् युद्धमक्षीणजवयोर्नृप ॥ 72.39 ॥

tayor evaṁ praharatoḥ sama-śikṣā-balaujasoḥ nirviśeṣam abhūd yuddham akṣīṇa-javayor nṛpa

हे राजन्! समान शिक्षा, बल और तेज वाले वे दोनों इस प्रकार लड़ते रहे, किन्तु उनका वेग क्षीण न होने के कारण यह युद्ध अनिर्णीत ही बना रहा।

श्लोक 40 (bhagavata.10.72.40)

शत्रोर्जन्ममृती विद्वाञ्जीवितं च जराकृतम् । पार्थमाप्याययन् स्वेन तेजसाचिन्तयद्धरिः ॥ 72.40 ॥

śatror janma-mṛtī vidvāñ jīvitaṁ ca jarā-kṛtam pārtham āpyāyayan svena tejasācintayad dhariḥ

शत्रु के जन्म-मृत्यु के रहस्य को तथा उसका जीवन जरा राक्षसी द्वारा किस प्रकार जुड़ा था, यह जानने वाले हरि ने विचार करते हुए अपने तेज से पार्थ (भीम) को बल प्रदान किया।

श्लोक 41 (bhagavata.10.72.41)

सञ्चिन्त्यारिवधोपायं भीमस्यामोघदर्शनः । दर्शयामास विटपं पाटयन्निव संज्ञया ॥ 72.41 ॥

sañcintyārī-vadhopāyaṁ bhīmasyāmogha-darśanaḥ darśayām āsa viṭapaṁ pāṭayann iva saṁjñayā

शत्रु-वध के उपाय पर विचार करते हुए अमोघदर्शी कृष्ण ने भीम को संकेत से दिखाया, मानो एक शाखा को फाड़ रहे हों।

श्लोक 42 (bhagavata.10.72.42)

तद् विज्ञाय महासत्त्वो भीमः प्रहरतां वरः । गृहीत्वा पादयोः शत्रुं पातयामास भूतले ॥ 72.42 ॥

tad vijñāya mahā-sattvo bhīmaḥ praharatāṁ varaḥ gṛhītvā pādayoḥ śatruṁ pātayām āsa bhū-tale

उस संकेत को समझकर महाबली भीम, जो योद्धाओं में श्रेष्ठ था, शत्रु को पैरों से पकड़कर भूमि पर पटक दिया।

श्लोक 43 (bhagavata.10.72.43)

एकं पादं पदाक्रम्य दोर्भ्यामन्यं प्रगृह्य सः । गुदतः पाटयामास शाखमिव महागजः ॥ 72.43 ॥

ekam pādaṁ padākramya dorbhyām anyaṁ pragṛhya saḥ gudataḥ pāṭayām āsa śākham iva mahā-gajaḥ

एक पैर को अपने पैर से दबाकर और दूसरे को दोनों हाथों से पकड़कर, उसने जरासन्ध को गुदा से ऊपर की ओर उसी प्रकार चीर डाला जैसे कोई विशाल हाथी किसी शाखा को चीर देता है।

श्लोक 44 (bhagavata.10.72.44)

एकपादोरुवृषणकटिपृष्ठस्तनांसके । एकबाह्वक्षिभ्रूकर्णे शकले ददृशुः प्रजाः ॥ 72.44 ॥

eka-pādoru-vṛṣaṇa- kaṭi-pṛṣṭha-stanāṁsake eka-bāhv-akṣi-bhrū-karṇe śakale dadṛśuḥ prajāḥ

प्रजाजनों ने उसके दोनों टुकड़ों को देखा — प्रत्येक में एक पैर, एक जांघ, एक अंडकोष, एक कमर, आधी पीठ, आधी छाती और एक कंधा, एक भुजा, एक नेत्र, एक भौंह और एक कान था।

श्लोक 45 (bhagavata.10.72.45)

हाहाकारो महानासीन्निहते मगधेश्वरे । पूजयामासतुर्भीमं परिरभ्य जयाच्युतौ ॥ 72.45 ॥

hāhā-kāro mahān āsīn nihate magadheśvare pūjayām āsatur bhīmaṁ parirabhya jayācyatau

मगधेश्वर के मारे जाने पर एक महान हाहाकार उठा; जय (अर्जुन) और अच्युत (कृष्ण) ने भीम का आलिंगन कर उसे सम्मानित किया।

श्लोक 46 (bhagavata.10.72.46)

सहदेवं तत्तनयं भगवान् भूतभावनः । अभ्यषिञ्चदमेयात्मा मगधानां पतिं प्रभुः । मोचयामास राजन्यान्संरुद्धा मागधेन ये ॥ 72.46 ॥

sahadevaṁ tat-tanayaṁ bhagavān bhūta-bhāvanaḥ abhyaṣiñcad ameyātmā magadhānāṁ patiṁ prabhuḥ mocayām āsa rājanyān saṁruddhā māgadhena ye

अपरिमेय आत्मा वाले, समस्त प्राणियों के पालक भगवान ने जरासन्ध के पुत्र सहदेव को मगध के राजा के पद पर अभिषिक्त किया, और मागधराज द्वारा बंदी बनाए गए समस्त राजाओं को मुक्त कराया।

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