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दशम स्कन्ध · अध्याय 77

भगवान कृष्ण द्वारा शाल्व-वध

अध्याय 76अध्याय-सूचीअध्याय 78

श्लोक 1 (bhagavata.10.77.1)

श्रीशुक उवाच स उपस्पृश्य सलिलं दंशितो धृतकार्मुकः । नय मां द्युमतः पार्श्वं वीरस्येत्याह सारथिम् ॥ 77.1 ॥

śrī-śuka uvāca sa upaspṛśya salilaṁ daṁśito dhṛta-kārmukaḥ naya māṁ dyumataḥ pārśvaṁ vīrasyety āha sārathim

श्रीशुकदेव जी ने कहा — जल का आचमन करके, कवच धारण कर तथा धनुष हाथ में लेकर प्रद्युम्न ने सारथी से कहा, "मुझे उस वीर द्युमान् के निकट ले चलो।"

श्लोक 2 (bhagavata.10.77.2)

विधमन्तं स्वसैन्यानि द्युमन्तं रुक्मिणीसुतः । प्रतिहत्य प्रत्यविध्यान्नाराचैरष्टभिः स्मयन् ॥ 77.2 ॥

vidhamantaṁ sva-sainyāni dyumantaṁ rukmiṇī-sutaḥ pratihatya pratyavidhyān nārācair aṣṭabhiḥ smayan

द्युमान् उस समय प्रद्युम्न की सेना को तितर-बितर कर रहा था; रुक्मिणी-पुत्र ने उसका सामना करके मुस्कुराते हुए आठ नाराच बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 3 (bhagavata.10.77.3)

चतुर्भिश्चतुरो वाहान् सूतमेकेन चाहनत् । द्वाभ्यं धनुश्च केतुं च शरेणान्येन वै शिरः ॥ 77.3 ॥

caturbhiś caturo vāhān sūtam ekena cāhanat dvābhyaṁ dhanuś ca ketuṁ ca śareṇānyena vai śiraḥ

चार बाणों से उसके चार घोड़ों को, एक बाण से उसके सारथी को, दो बाणों से उसके धनुष और ध्वज को, तथा एक और बाण से उसके सिर को मार गिराया।

श्लोक 4 (bhagavata.10.77.4)

गदसात्यकिसाम्बाद्या जघ्नुः सौभपतेर्बलम् । पेतुः समुद्रे सौभेयाः सर्वे सञ्छिन्नकन्धराः ॥ 77.4 ॥

gada-sātyaki-sāmbādyā jaghnuḥ saubha-pater balam petuḥ samudre saubheyāḥ sarve sañchinna-kandharāḥ

गद, सात्यकि, साम्ब आदि ने सौभपति की सेना का संहार करना आरम्भ किया; सौभ-निवासी सभी सैनिक कटी हुई गर्दनों के साथ समुद्र में गिरने लगे।

श्लोक 5 (bhagavata.10.77.5)

एवं यदूनां शाल्वानां निघ्नतामितरेतरम् । युद्धं त्रिनवरात्रं तदभूत्तुमुलमुल्बणम् ॥ 77.5 ॥

evaṁ yadūnāṁ śālvānāṁ nighnatām itaretaram yuddhaṁ tri-nava-rātraṁ tad abhūt tumulam ulbaṇam

इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे को मारते हुए यादवों और शाल्व की सेना के बीच वह भीषण एवं घोर युद्ध सत्ताईस रात्रियों तक चलता रहा।

श्लोक 6 (bhagavata.10.77.6)

इन्द्रप्रस्थं गतः कृष्ण आहूतो धर्मसूनुना । राजसूयेऽथ निवृत्ते शिशुपाले च संस्थिते ॥ 77.6 ॥

indraprasthaṁ gataḥ kṛṣṇa āhūto dharma-sūnunā rājasūye ’tha nivṛtte śiśupāle ca saṁsthite

धर्मराज युधिष्ठिर के बुलाने पर कृष्ण इन्द्रप्रस्थ गये थे। राजसूय यज्ञ की समाप्ति और शिशुपाल के मारे जाने के पश्चात, अत्यन्त भयंकर अपशकुन देखकर उन्होंने द्वारका जाने का विचार किया।

श्लोक 7 (bhagavata.10.77.7)

कुरुवृद्धाननुज्ञाप्य मुनींश्च ससुतां पृथाम् । निमित्तान्यतिघोराणि पश्यन् द्वारवतीं ययौ ॥ 77.7 ॥

kuru-vṛddhān anujñāpya munīṁś ca sa-sutāṁ pṛthām nimittāny ati-ghorāṇi paśyan dvāravatīṁ yayau

अतः कुरु-वृद्धों, मुनियों तथा पुत्रों-सहित पृथा (कुन्ती) से विदा लेकर उन्होंने द्वारका की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 8 (bhagavata.10.77.8)

आह चाहमिहायात आर्यमिश्राभिसङ्गतः । राजन्याश्चैद्यपक्षीया नूनं हन्युः पुरीं मम ॥ 77.8 ॥

āha cāham ihāyāta ārya-miśrābhisaṅgataḥ rājanyāś caidya-pakṣīyā nūnaṁ hanyuḥ purīṁ mama

उन्होंने (मन में) कहा — "मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता (बलराम) के साथ यहाँ आया हूँ; निश्चय ही शिशुपाल-पक्षीय राजा लोग मेरी नगरी पर आक्रमण कर रहे होंगे।"

श्लोक 9 (bhagavata.10.77.9)

वीक्ष्य तत् कदनं स्वानां निरूप्य पुररक्षणम् । सौभं च शाल्वराजं च दारुकं प्राह केशवः ॥ 77.9 ॥

vīkṣya tat kadanaṁ svānāṁ nirūpya pura-rakṣaṇam saubhaṁ ca śālva-rājaṁ ca dārukaṁ prāha keśavaḥ

अपने लोगों के इस संहार को देखकर तथा नगर-रक्षा की व्यवस्था करके, सौभ और शाल्व राजा को देखकर भगवान केशव ने दारुक से कहा।

श्लोक 10 (bhagavata.10.77.10)

रथं प्रापय मे सूत शाल्वस्यान्तिकमाशु वै । सम्भ्रमस्ते न कर्तव्यो मायावी सौभराडयम् ॥ 77.10 ॥

rathaṁ prāpaya me sūta śālvasyāntikam āśu vai sambhramas te na kartavyo māyāvī saubha-rāḍ ayam

"हे सारथी, मेरे रथ को शीघ्र शाल्व के निकट ले चलो; यह सौभपति बड़ा मायावी है, इससे तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए।"

श्लोक 11 (bhagavata.10.77.11)

इत्युक्तश्चोदयामास रथमास्थाय दारुकः । विशन्तं ददृशुः सर्वे स्वे परे चारुणानुजम् ॥ 77.11 ॥

ity uktaś codayām āsa ratham āsthāya dārukaḥ viśantaṁ dadṛśuḥ sarve sve pare cāruṇānujam

ऐसा आदेश पाकर दारुक ने रथ पर चढ़कर उसे हाँका; रथ को युद्धभूमि में प्रवेश करते देखकर अपने-पराये सभी ने अरुण के अनुज (गरुड़-ध्वज) को पहचान लिया।

श्लोक 12 (bhagavata.10.77.12)

शाल्वश्च कृष्णमालोक्य हतप्रायबलेश्वरः । प्राहरत् कृष्णसूताय शक्तिं भीमरवां मृधे ॥ 77.12 ॥

śālvaś ca kṛṣṇam ālokya hata-prāya-baleśvaraḥ prāharat kṛṣṇa-sūtaya śaktiṁ bhīma-ravāṁ mṛdhe

अपनी लगभग नष्ट हो चुकी सेना के स्वामी शाल्व ने कृष्ण को आते देखकर युद्धभूमि में उनके सारथी पर भयंकर गर्जना करती हुई एक शक्ति (भाला) फेंकी।

श्लोक 13 (bhagavata.10.77.13)

तामापतन्तीं नभसि महोल्कामिव रंहसा । भासयन्तीं दिशः शौरिः सायकैः शतधाच्छिनत् ॥ 77.13 ॥

tām āpatantīṁ nabhasi maholkām iva raṁhasā bhāsayantīṁ diśaḥ śauriḥ sāyakaiḥ śatadhācchinat

आकाश में बड़ी उल्का के समान वेग से गिरती हुई, दिशाओं को प्रकाशित करती हुई उस शक्ति को शौरि ने अपने बाणों से सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 14 (bhagavata.10.77.14)

तं च षोडशभिर्विद्ध्वा बाणैः सौभं च खे भ्रमत् । अविध्यच्छरसन्दोहैः खं सूर्य इव रश्मिभिः ॥ 77.14 ॥

taṁ ca ṣoḍaśabhir viddhvā bānaiḥ saubhaṁ ca khe bhramat avidhyac chara-sandohaiḥ khaṁ sūrya iva raśmibhiḥ

फिर उन्होंने सोलह बाणों से शाल्व को बींधा और आकाश में विचरण करते सौभ को बाणों की झड़ी से इस प्रकार भर दिया जैसे सूर्य अपनी किरणों से आकाश को भर देता है।

श्लोक 15 (bhagavata.10.77.15)

शाल्वः शौरेस्तु दोः सव्यं सशार्ङ्गं शार्ङ्गधन्वनः । बिभेद न्यपतद्धस्ताच्छार्ङ्गमासीत्तदद्भुतम् ॥ 77.15 ॥

śālvaḥ śaures tu doḥ savyaṁ sa-śārṅgaṁ śārṅga-dhanvanaḥ bibheda nyapatad dhastāc chārṅgam āsīt tad adbhutam

शाल्व ने शार्ङ्गधारी शौरि की सशार्ङ्ग बाईं भुजा को भेद दिया, और आश्चर्य की बात है कि उनके हाथ से शार्ङ्ग धनुष गिर पड़ा।

श्लोक 16 (bhagavata.10.77.16)

हाहाकारो महानासीद् भूतानां तत्र पश्यताम् । निनद्य सौभराडुच्चैरिदमाह जनार्दनम् ॥ 77.16 ॥

hāhā-kāro mahān āsīd bhūtānāṁ tatra paśyatām ninadya saubha-rāḍ uccair idam āha janārdanam

यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी प्राणियों में हाहाकार मच गया। तब सौभपति ने ऊँचे स्वर में गरजते हुए भगवान जनार्दन से यह कहा।

श्लोक 17 (bhagavata.10.77.17)

यत्त्वया मूढ नः सख्युर्भ्रातुर्भार्या हृतेक्षताम् । प्रमत्तः स सभामध्ये त्वया व्यापादितः सखा ॥ 77.17 ॥

yat tvayā mūḍha naḥ sakhyur bhrātur bhāryā hṛtekṣatām pramattaḥ sa sabhā-madhye tvayā vyāpāditaḥ sakhā

"हे मूढ! हमारे मित्र और भाई-तुल्य शिशुपाल की पत्नी को तूने हमारे देखते-देखते हर लिया, और असावधान उस मित्र को तूने सभा के मध्य ही मार डाला।

श्लोक 18 (bhagavata.10.77.18)

तं त्वाद्य निशितैर्बाणैरपराजितमानिनम् । नयाम्यपुनरावृत्तिं यदि तिष्ठेर्ममाग्रतः ॥ 77.18 ॥

taṁ tvādya niśitair bāṇair aparājita-māninam nayāmy apunar-āvṛttiṁ yadi tiṣṭher mamāgrataḥ

अपने-आप को अजेय माननेवाले तुझे आज मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से उस लोक में भेज दूँगा, यदि तू मेरे सामने टिक सके!"

श्लोक 19 (bhagavata.10.77.19)

श्रीभगवानुवाच वृथा त्वं कत्थसे मन्द न पश्यस्यन्तिकेऽन्तकम् । पौरुषं दर्शयन्ति स्म शूरा न बहुभाषिणः ॥ 77.19 ॥

śrī-bhagavān uvāca vṛthā tvaṁ katthase manda na paśyasy antike ’ntakam paurusaṁ darśayanti sma śūrā na bahu-bhāṣiṇaḥ

भगवान ने कहा — हे मूर्ख! तू व्यर्थ ही डींग हाँक रहा है, तुझे यह भी नहीं दिखता कि मृत्यु तेरे निकट खड़ी है। शूरवीर पुरुष अपना पराक्रम दिखाते हैं, बहुत बोलते नहीं।

श्लोक 20 (bhagavata.10.77.20)

इत्युक्त्वा भगवाञ्छाल्वं गदया भीमवेगया । तताड जत्रौ संरब्धः स चकम्पे वमन्नसृक् ॥ 77.20 ॥

ity uktvā bhagavāñ chālvaṁ gadayā bhīma-vegayā tatāḍa jatrau saṁrabdhaḥ sa cakampe vamann asṛk

ऐसा कहकर भगवान ने अत्यन्त क्रोधित होकर भयंकर वेग वाली गदा से शाल्व की हँसली पर प्रहार किया, जिससे वह काँपने लगा और रक्त वमन करने लगा।

श्लोक 21 (bhagavata.10.77.21)

गदायां सन्निवृत्तायां शाल्वस्त्वन्तरधीयत । ततो मुहूर्त आगत्य पुरुषः शिरसाच्युतम् । देवक्या प्रहितोऽस्मीति नत्वा प्राह वचो रुदन् ॥ 77.21 ॥

gadāyāṁ sannivṛttāyāṁ śālvas tv antaradhīyata tato muhūrta āgatya puruṣaḥ śirasācyutam devakyā prahito ’smīti natvā prāha vaco rudan

गदा के लौटते ही शाल्व अन्तर्धान हो गया। तब कुछ ही क्षणों में एक पुरुष आकर, भगवान अच्युत को सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए तथा रोते हुए बोला — "मुझे देवकी ने भेजा है।"

श्लोक 22 (bhagavata.10.77.22)

कृष्ण कृष्ण महाबाहो पिता ते पितृवत्सल । बद्ध्वापनीतः शाल्वेन सौनिकेन यथा पशुः ॥ 77.22 ॥

kṛṣṇa kṛṣṇa mahā-bāho pitā te pitṛ-vatsala baddhvāpanītaḥ śālvena saunikena yathā paśuḥ

"हे कृष्ण, कृष्ण, हे महाबाहु, हे पितृभक्त! आपके पिता को शाल्व बाँधकर उस प्रकार ले गया है जैसे कसाई पशु को ले जाता है।"

श्लोक 23 (bhagavata.10.77.23)

निशम्य विप्रियं कृष्णो मानुषीं प्रकृतिं गतः । विमनस्को घृणी स्नेहाद् बभाषे प्राकृतो यथा ॥ 77.23 ॥

niśamya vipriyaṁ kṛṣṇo mānusīṁ prakṛtiṁ gataḥ vimanasko ghṛṇī snehād babhāṣe prākṛto yathā

यह अप्रिय समाचार सुनकर कृष्ण, मानव-स्वभाव धारण किये हुए, उदास और करुणा से भरकर, स्नेहवश एक साधारण मनुष्य के समान बोले।

श्लोक 24 (bhagavata.10.77.24)

कथं राममसम्भ्रान्तं जित्वाजेयं सुरासुरैः । शाल्वेनाल्पीयसा नीतः पिता मे बलवान् विधिः ॥ 77.24 ॥

kathaṁ rāmam asambhrāntaṁ jitvājeyaṁ surāsuraiḥ śālvenālpīyasā nītaḥ pitā me balavān vidhiḥ

"देवताओं और असुरों द्वारा भी अजेय, कभी विचलित न होने वाले बलराम को जीतकर इस तुच्छ शाल्व ने मेरे पिता को कैसे बाँध लिया! सचमुच विधि बड़ा बलवान है।"

श्लोक 25 (bhagavata.10.77.25)

इति ब्रुवाणे गोविन्दे सौभराट् प्रत्युपस्थितः । वसुदेवमिवानीय कृष्णं चेदमुवाच सः ॥ 77.25 ॥

iti bruvāṇe govinde saubha-rāṭ pratyupasthitaḥ vasudevam ivānīya kṛṣṇaṁ cedam uvāca saḥ

गोविन्द के ऐसा कहते-कहते ही सौभपति फिर वहाँ प्रकट हुआ, और वसुदेव को साथ लिए हुए-सा दिखाकर उसने कृष्ण से यह कहा।

श्लोक 26 (bhagavata.10.77.26)

एष ते जनिता तातो यदर्थमिह जीवसि । वधिष्ये वीक्षतस्तेऽमुमीशश्चेत् पाहि बालिश ॥ 77.26 ॥

eṣa te janitā tāto yad-artham iha jīvasi vadhiṣye vīkṣatas te ’mum īśaś cet pāhi bāliśa

"यह रहा तेरा वह पिता, जिसके लिए तू इस संसार में जी रहा है। तेरे देखते-देखते ही मैं इसे मार डालूँगा — यदि तू समर्थ है तो बचा ले, हे मूर्ख!"

श्लोक 27 (bhagavata.10.77.27)

एवं निर्भर्त्स्य मायावी खड्गेनानकदुन्दुभेः । उत्कृत्य शिर आदाय खस्थं सौभं समाविशत् ॥ 77.27 ॥

evaṁ nirbhartsya māyāvī khaḍgenānakadundubheḥ utkṛtya śira ādāya kha-sthaṁ saubhaṁ samāviśat

इस प्रकार भर्त्सना करके उस मायावी ने अपनी तलवार से आनकदुन्दुभि (वसुदेव) का सिर काट लिया, और उसे लेकर आकाश में स्थित सौभ विमान में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 28 (bhagavata.10.77.28)

ततो मुहूर्तं प्रकृतावुपप्लुतः स्वबोध आस्ते स्वजनानुषङ्गतः । महानुभावस्तदबुध्यदासुरीं मायां स शाल्वप्रसृतां मयोदिताम् ॥ 77.28 ॥

tato muhūrtaṁ prakṛtāv upaplutaḥ sva-bodha āste sva-janānuṣaṅgataḥ mahānubhāvas tad abudhyad āsurīṁ māyāṁ sa śālva-prasṛtāṁ mayoditām

भगवान अपने स्वरूप में सदा स्थित, पूर्ण ज्ञानवान होते हुए भी अपने प्रियजनों के प्रति स्नेहवश एक क्षण के लिए मानव-भाव में डूब गये। किन्तु शीघ्र ही उस महाप्रभावशाली भगवान ने यह पहचान लिया कि यह मयदानव-निर्मित तथा शाल्व द्वारा प्रयुक्त आसुरी माया मात्र थी।

श्लोक 29 (bhagavata.10.77.29)

न तत्र दूतं न पितुः कलेवरं प्रबुद्ध आजौ समपश्यदच्युतः । स्वाप्नं यथा चाम्बरचारिणं रिपुं सौभस्थमालोक्य निहन्तुमुद्यतः ॥ 77.29 ॥

na tatra dūtaṁ na pituḥ kalevaraṁ prabuddha ājau samapaśyad acyutaḥ svāpnaṁ yathā cāmbara-cāriṇaṁ ripuṁ saubha-stham ālokya nihantum udyataḥ

सचेत होकर अच्युत ने युद्धभूमि में न तो कोई दूत देखा, न ही पिता का शरीर — मानो वह सब स्वप्न ही रहा हो। तब आकाश में विचरते सौभ पर स्थित अपने शत्रु को देखकर वे उसे मार डालने के लिए तत्पर हुए।

श्लोक 30 (bhagavata.10.77.30)

एवं वदन्ति राजर्षे ऋषयः के च नान्विताः । यत् स्ववाचो विरुध्येत नूनं ते न स्मरन्त्युत ॥ 77.30 ॥

evaṁ vadanti rājarṣe ṛṣayaḥ ke ca nānvitāḥ yat sva-vāco virudhyeta nūnaṁ te na smaranty uta

हे राजर्षि! कुछ ऋषि इस प्रकार वर्णन करते हैं, किन्तु जो कोई अपनी ही पूर्वोक्त बात का खण्डन कर बैठे, वह असंगत ही बोल रहा है — निश्चय ही वे अपने पूर्व कथन को स्मरण नहीं रखते।

श्लोक 31 (bhagavata.10.77.31)

क्व शोकमोहौ स्नेहो वा भयं वा येऽज्ञसम्भवाः । क्व चाखण्डितविज्ञानज्ञानैश्वर्यस्त्वखण्डितः ॥ 77.31 ॥

kva śoka-mohau sneho vā bhayaṁ vā ye ’jña-sambhavāḥ kva cākhaṇḍita-vijñāna- jñānaiśvaryas tv akhaṇḍitaḥ

कहाँ तो शोक, मोह, स्नेह अथवा भय, जो अज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं, और कहाँ वह अखण्ड — जिनका विज्ञान, ज्ञान और ऐश्वर्य कभी खण्डित नहीं होता!

श्लोक 32 (bhagavata.10.77.32)

यत्पादसेवोर्जितयात्मविद्यया हिन्वन्त्यनाद्यात्मविपर्ययग्रहम् । लभन्त आत्मीयमनन्तमैश्वरं कुतो नु मोहः परमस्य सद्गतेः ॥ 77.32 ॥

yat-pāda-sevorjitayātma-vidyayā hinvanty anādyātma-viparyaya-graham labhanta ātmīyam anantam aiśvaraṁ kuto nu mohaḥ paramasya sad-gateḥ

जिनके चरणों की सेवा से बलवती हुई आत्म-विद्या के द्वारा भक्तजन अनादि काल से चले आ रहे देहाभिमान के भ्रम को दूर कर देते हैं, और उन्हीं की अनन्त ऐश्वर्यमयी अपनी संगति को प्राप्त करते हैं — भला सन्तों के परम गन्तव्य उन परमेश्वर में मोह कैसे हो सकता है?

श्लोक 33 (bhagavata.10.77.33)

तं शस्त्रपूगैः प्रहरन्तमोजसा शाल्वं शरैः शौरिरमोघविक्रमः । विद्ध्वाच्छिनद् वर्म धनुः शिरोमणिं सौभं च शत्रोर्गदया रुरोज ह ॥ 77.33 ॥

taṁ śastra-pūgaiḥ praharantam ojasā śālvaṁ śaraiḥ śaurir amogha-vikramaḥ viddhvācchinad varma dhanuḥ śiro-maṇiṁ saubhaṁ ca śatror gadayā ruroja ha

शस्त्रों के समूहों से बलपूर्वक प्रहार करते हुए शाल्व पर अमोघ-पराक्रमी शौरि ने अपने बाणों की वर्षा की, उसे बींधकर उसका कवच, धनुष तथा मुकुट-मणि काट डाला, और अपनी गदा से शत्रु के सौभ विमान को चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 34 (bhagavata.10.77.34)

तत् कृष्णहस्तेरितया विचूर्णितं पपात तोये गदया सहस्रधा । विसृज्य तद् भूतलमास्थितो गदा- मुद्यम्य शाल्वोऽच्युतमभ्यगाद्द्रुतम् ॥ 77.34 ॥

tat kṛṣṇa-hasteritayā vicūrṇitaṁ papāta toye gadayā sahasradhā visṛjya tad bhū-talam āsthito gadām udyamya śālvo ’cyutam abhyagād drutam

कृष्ण के हाथ से चलाई गई गदा से हजारों टुकड़ों में चूर्ण होकर वह विमान जल में जा गिरा। उसे छोड़कर, भूतल पर खड़े होकर, गदा उठाकर शाल्व वेग से अच्युत की ओर दौड़ा।

श्लोक 35 (bhagavata.10.77.35)

आधावतः सगदं तस्य बाहुं भल्लेन छित्त्वाथ रथाङ्गमद्भुतम् । वधाय शाल्वस्य लयार्कसन्निभं बिभ्रद् बभौ सार्क इवोदयाचलः ॥ 77.35 ॥

ādhāvataḥ sa-gadaṁ tasya bāhuṁ bhallena chittvātha rathāṅgam adbhutam vadhāya śālvasya layārka-sannibhaṁ bibhrad babhau sārka ivodayācalaḥ

दौड़ते हुए शाल्व की गदा-सहित भुजा को भल्ल बाण से काटकर, प्रलयकाल के सूर्य के समान तेजस्वी अद्भुत सुदर्शन चक्र को शाल्व के वध हेतु धारण करते हुए भगवान सूर्य-सहित उदयाचल पर्वत के समान देदीप्यमान हो उठे।

श्लोक 36 (bhagavata.10.77.36)

जहार तेनैव शिरः सकुण्डलं किरीटयुक्तं पुरुमायिनो हरिः । वज्रेण वृत्रस्य यथा पुरन्दरो बभूव हाहेति वचस्तदा नृणाम् ॥ 77.36 ॥

jahāra tenaiva śiraḥ sa-kuṇḍalaṁ kirīṭa-yuktaṁ puru-māyino hariḥ vajreṇa vṛtrasya yathā purandaro babhūva hāheti vacas tadā nṛṇām

उसी चक्र से भगवान हरि ने उस महामायावी के कुण्डल तथा मुकुट-सहित सिर को उसी प्रकार काट डाला जिस प्रकार पुरन्दर (इन्द्र) ने अपने वज्र से वृत्रासुर का सिर काटा था। तब सब लोगों के मुख से "हाय, हाय!" की ध्वनि निकल पड़ी।

श्लोक 37 (bhagavata.10.77.37)

तस्मिन् निपतिते पापे सौभे च गदया हते । नेदुर्दुन्दुभयो राजन् दिवि देवगणेरिताः । सखीनामपचितिं कुर्वन्दन्तवक्रो रुषाभ्यगात् ॥ 77.37 ॥

tasmin nipatite pāpe saubhe ca gadayā hate nedur dundubhayo rājan divi deva-gaṇeritāḥ sakhīnām apacitiṁ kurvan dantavakro ruṣābhyagāt

उस पापी के गिर जाने और गदा से सौभ के विनष्ट होने पर, हे राजन्, आकाश में देवगणों द्वारा बजाए गए नगाड़े गूँज उठे। तब अपने मित्रों की मृत्यु का प्रतिशोध लेने की भावना से क्रोधित दन्तवक्र आगे बढ़ा।

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