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दशम स्कन्ध · अध्याय 79

बलराम जी की तीर्थयात्रा

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80

श्लोक 1 (bhagavata.10.79.1)

श्रीशुक उवाच ततः पर्वण्युपावृत्ते प्रचण्डः पांशुवर्षणः । भीमो वायुरभूद् राजन्पूयगन्धस्तु सर्वशः ॥ 79.1 ॥

śrī-śuka uvāca tataḥ parvaṇy upāvṛtte pracaṇḍaḥ pāṁśu-varṣaṇaḥ bhīmo vāyur abhūd rājan pūya-gandhas tu sarvaśaḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! तत्पश्चात पर्व (अमावस्या) के आ जाने पर धूल की वर्षा करने वाली एक प्रचण्ड, भयंकर आँधी चली, और चारों ओर मवाद की दुर्गन्ध फैल गई।

श्लोक 2 (bhagavata.10.79.2)

ततोऽमेध्यमयं वर्षं बल्वलेन विनिर्मितम् । अभवद् यज्ञशालायां सोऽन्वदृश्यत शूलधृक् ॥ 79.2 ॥

tato ’medhya-mayaṁ varṣaṁ balvalena vinirmitam abhavad yajña-śālāyāṁ so ’nvadṛśyata śūla-dhṛk

फिर बल्वल द्वारा रची गई अपवित्र वस्तुओं की वर्षा यज्ञशाला में होने लगी, और वह त्रिशूलधारी दानव भी वहाँ दिखाई पड़ा।

श्लोक 3 (bhagavata.10.79.3)

तं विलोक्य बृहत्कायं भिन्नाञ्जनचयोपमम् । तप्तताम्रशिखाश्मश्रुं दंष्ट्रोग्रभ्रुकुटीमुखम् ॥ 79.3 ॥

taṁ vilokya bṛhat-kāyaṁ bhinnāñjana-cayopamam tapta-tāmra-śikhā-śmaśruṁ daṁṣṭrogra-bhru-kuṭī-mukham

विशाल शरीर वाले, टूटे हुए काजल के ढेर के समान श्यामवर्ण, तपे हुए ताम्र के समान जटा और दाढ़ी वाले, भयंकर दाढ़ों तथा टेढ़ी भौंहों वाले मुखवाले उस दानव को देखकर —

श्लोक 4 (bhagavata.10.79.4)

सस्मार मूषलं रामः परसैन्यविदारणम् । हलं च दैत्यदमनं ते तूर्णमुपतस्थतुः ॥ 79.4 ॥

sasmāra mūṣalaṁ rāmaḥ para-sainya-vidāraṇam halaṁ ca daitya-damanaṁ te tūrṇam upatasthatuḥ

बलराम ने शत्रु-सेना को विदीर्ण करने वाली अपनी मूषल (गदा) का और दैत्यों का दमन करने वाले अपने हल का स्मरण किया; और वे दोनों अस्त्र तुरन्त उनके समक्ष उपस्थित हो गये।

श्लोक 5 (bhagavata.10.79.5)

तमाकृष्य हलाग्रेण बल्वलं गगनेचरम् । मूषलेनाहनत्क्रुद्धो मूर्ध्नि ब्रह्मद्रुहं बलः ॥ 79.5 ॥

tam ākṛṣya halāgreṇa balvalaṁ gagane-caram mūṣalenāhanat kruddho mūrdhni brahma-druhaṁ balaḥ

आकाश में उड़ते हुए, ब्राह्मणों के शत्रु उस बल्वल को हल की नोक से खींचकर बलराम ने क्रोधित होकर उसके सिर पर मूषल से प्रहार किया।

श्लोक 6 (bhagavata.10.79.6)

सोऽपतद्भुवि निर्भिन्नललाटोऽसृक् समुत्सृजन् । मुञ्चन्नार्तस्वरं शैलो यथा वज्रहतोऽरुणः ॥ 79.6 ॥

so ’patad bhuvi nirbhinna- lalāṭo ’sṛk samutsṛjan muñcann ārta-svaraṁ śailo yathā vajra-hato ’ruṇaḥ

वह पीड़ा से चिल्लाता हुआ, माथा फटा हुआ रक्त बहाता हुआ, उसी प्रकार पृथ्वी पर गिर पड़ा जैसे वज्र से आहत कोई लाल पर्वत गिरता है।

श्लोक 7 (bhagavata.10.79.7)

संस्तुत्य मुनयो रामं प्रयुज्यावितथाशिषः । अभ्यषिञ्चन् महाभागा वृत्रघ्नं विबुधा यथा ॥ 79.7 ॥

saṁstutya munayo rāmaṁ prayujyāvitathāśiṣaḥ abhyaṣiñcan mahā-bhāgā vṛtra-ghnaṁ vibudhā yathā

महाभाग ऋषियों ने बलराम की स्तुति करके, उन्हें अमोघ आशीर्वाद देकर, उसी प्रकार उनका अभिषेक किया जिस प्रकार देवताओं ने वृत्रासुर के वध के पश्चात इन्द्र का अभिषेक किया था।

श्लोक 8 (bhagavata.10.79.8)

वैजयन्तीं ददुर्मालां श्रीधामाम्लानपङ्कजाम् । रामाय वाससी दिव्ये दिव्यान्याभरणानि च ॥ 79.8 ॥

vaijayantīṁ dadur mālāṁ śrī-dhāmāmlāna-paṅkajāṁ rāmāya vāsasī divye divyāny ābharaṇāni ca

उन्होंने बलराम को अम्लान कमलों से बनी, लक्ष्मी के निवास-स्वरूप वैजयन्ती माला भेंट की, तथा दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषण भी अर्पित किए।

श्लोक 9 (bhagavata.10.79.9)

अथ तैरभ्यनुज्ञातः कौशिकीमेत्य ब्राह्मणैः । स्नात्वा सरोवरमगाद् यतः सरयूरास्रवत् ॥ 79.9 ॥

atha tair abhyanujñātaḥ kauśikīm etya brāhmaṇaiḥ snātvā sarovaram agād yataḥ sarayūr āsravat

तब उनकी अनुमति पाकर बलराम ब्राह्मणों के साथ कौशिकी नदी पर पहुँचे, स्नान करके फिर उस सरोवर की ओर गये जहाँ से सरयू नदी निकलती है।

श्लोक 10 (bhagavata.10.79.10)

अनुस्रोतेन सरयूं प्रयागमुपगम्य सः । स्नात्वा सन्तर्प्य देवादीन्जगाम पुलहाश्रमम् ॥ 79.10 ॥

anu-srotena sarayūṁ prayāgam upagamya saḥ snātvā santarpya devādīn jagāma pulahāśramam

फिर सरयू की धारा के अनुसार चलते हुए वे प्रयाग पहुँचे, वहाँ स्नान करके देवताओं आदि को तर्पण देकर पुलह ऋषि के आश्रम गये।

श्लोक 11 (bhagavata.10.79.11)

गोमतीं गण्डकीं स्नात्वा विपाशां शोण आप्लुतः । गयां गत्वा पितॄनिष्ट्वा गङ्गासागरसङ्गमे ॥ 79.11 ॥

gomatīṁ gaṇḍakīṁ snātvā vipāśāṁ śoṇa āplutaḥ gayāṁ gatvā pitṝn iṣṭvā gaṅgā-sāgara-saṅgame

गोमती, गण्डकी तथा विपाशा नदियों में स्नान करके, शोण नदी में डुबकी लगाकर, गया जाकर पितरों का श्राद्ध करके, फिर गंगा-सागर संगम पर —

श्लोक 12 (bhagavata.10.79.12)

उपस्पृश्य महेन्द्राद्रौ रामं दृष्ट्वाभिवाद्य च । सप्तगोदावरीं वेणां पम्पां भीमरथीं ततः ॥ 79.12 ॥

upaspṛśya mahendrādrau rāmaṁ dṛṣṭvābhivādya ca sapta-godāvarīṁ veṇāṁ pampāṁ bhīmarathīṁ tataḥ

स्नान करके, महेन्द्र पर्वत पर परशुराम के दर्शन और प्रणाम करके, फिर सप्तधारा गोदावरी, वेणा, पम्पा तथा भीमरथी नदियों में स्नान करके —

श्लोक 13 (bhagavata.10.79.13)

स्कन्दं दृष्ट्वा ययौ रामः श्रीशैलं गिरिशालयम् । द्रविडेषु महापुण्यं दृष्ट्वाद्रिं वेङ्कटं प्रभुः ॥ 79.13 ॥

skandaṁ dṛṣṭvā yayau rāmaḥ śrī-śailaṁ giriśālayam draviḍeṣu mahā-puṇyaṁ dṛṣṭvādriṁ veṅkaṭaṁ prabhuḥ

कार्तिकेय के दर्शन करके बलराम गिरीश (शिव) के निवास श्रीशैल गये, तथा द्रविड़ प्रदेश में अत्यन्त पुण्यमय वेंकट पर्वत के दर्शन करके —

श्लोक 14 (bhagavata.10.79.14)

कामकोष्णीं पुरीं काञ्चीं कावेरीं च सरिद्वराम् । श्रीरङ्गाख्यं महापुण्यं यत्र सन्निहितो हरिः ॥ 79.14 ॥

kāma-koṣṇīṁ purīṁ kāñcīṁ kāverīṁ ca sarid-varām śrī-rangākhyaṁ mahā-puṇyaṁ yatra sannihito hariḥ

फिर कामकोष्णी नगरी, काञ्ची, श्रेष्ठ नदी कावेरी, तथा उस अत्यन्त पवित्र श्रीरंग-धाम के दर्शन किये जहाँ भगवान हरि साक्षात् विराजमान हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.10.79.15)

ऋषभाद्रिं हरेः क्षेत्रं दक्षिणां मथुरां तथा । सामुद्रं सेतुमगमत्महापातकनाशनम् ॥ 79.15 ॥

ṛṣabhādriṁ hareḥ kṣetraṁ dakṣiṇāṁ mathurāṁ tathā sāmudraṁ setum agamat mahā-pātaka-nāśanam

भगवान हरि के क्षेत्र ऋषभाद्रि, तथा दक्षिण-मथुरा के दर्शन करके, फिर महापातकों का नाश करने वाले समुद्र-सेतु (रामेश्वरम्) गये।

श्लोक 16 (bhagavata.10.79.16)

तत्रायुतमदाद् धेनूर्ब्राह्मणेभ्यो हलायुधः । कृतमालां ताम्रपर्णीं मलयं च कुलाचलम् ॥ 79.16 ॥

tatrāyutam adād dhenūr brāhmaṇebhyo halāyudhaḥ kṛtamālāṁ tāmraparṇīṁ malayaṁ ca kulācalam

वहाँ हलायुध (बलराम) ने ब्राह्मणों को दस हजार गौएँ दान दीं, फिर कृतमाला, ताम्रपर्णी नदियों तथा कुलपर्वत मलय के दर्शन किये।

श्लोक 17 (bhagavata.10.79.17)

तत्रागस्त्यं समासीनं नमस्कृत्याभिवाद्य च । योजितस्तेन चाशीर्भिरनुज्ञातो गतोऽर्णवम् । दक्षिणं तत्र कन्याख्यां दुर्गां देवीं ददर्श सः ॥ 79.17 ॥

tatrāgastyaṁ samāsīnaṁ namaskṛtyābhivādya ca yojitas tena cāśīrbhir anujñāto gato ’rṇavam dakṣiṇaṁ tatra kanyākhyāṁ durgāṁ devīṁ dadarśa saḥ

वहाँ आसीन अगस्त्य मुनि को नमस्कार और प्रणाम करके, उनसे आशीर्वाद पाकर तथा उनकी अनुमति लेकर बलराम दक्षिण समुद्र-तट गये, जहाँ उन्होंने कन्याकुमारी के रूप में विराजमान देवी दुर्गा के दर्शन किये।

श्लोक 18 (bhagavata.10.79.18)

ततः फाल्गुनमासाद्य पञ्चाप्सरसमुत्तमम् । विष्णुः सन्निहितो यत्र स्नात्वास्पर्शद् गवायुतम् ॥ 79.18 ॥

tataḥ phālgunam āsādya pañcāpsarasam uttamam viṣṇuḥ sannihito yatra snātvāsparśad gavāyutam

फिर फाल्गुन तीर्थ पहुँचकर, जहाँ भगवान विष्णु साक्षात् विराजमान हैं, उस उत्तम पंचाप्सरा सरोवर में स्नान करके उन्होंने दस हजार गौएँ दान कीं।

श्लोक 19 (bhagavata.10.79.19)

ततोऽभिव्रज्य भगवान् केरलांस्तु त्रिगर्तकान् । गोकर्णाख्यं शिवक्षेत्रं सान्निध्यं यत्र धूर्जटेः ॥ 79.19 ॥

tato ’bhivrajya bhagavān keralāṁs tu trigartakān gokarṇākhyaṁ śiva-kṣetraṁ sānnidhyaṁ yatra dhūrjaṭeḥ

फिर भगवान केरल और त्रिगर्त प्रदेशों से होकर गोकर्ण नामक शिवक्षेत्र गये, जहाँ धूर्जटि (शिव) साक्षात् विद्यमान हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.10.79.20)

आर्यां द्वैपायनीं दृष्ट्वा शूर्पारकमगाद् बलः । तापीं पयोष्णीं निर्विन्ध्यामुपस्पृश्याथ दण्डकम् ॥ 79.20 ॥

āryāṁ dvaipāyanīṁ dṛṣṭvā śūrpārakam agād balaḥ tāpīṁ payoṣṇīṁ nirvindhyām upaspṛśyātha daṇḍakam

द्वीपवासिनी देवी पार्वती के दर्शन करके बलराम शूर्पारक गये, फिर ताप्ती, पयोष्णी तथा निर्विन्ध्या नदियों में स्नान करके दण्डक वन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 21 (bhagavata.10.79.21)

प्रविश्य रेवामगमद् यत्र माहिष्मती पुरी । मनुतीर्थमुपस्पृश्य प्रभासं पुनरागमत् ॥ 79.21 ॥

praviśya revām agamad yatra māhiṣmatī purī manu-tīrtham upaspṛśya prabhāsaṁ punar āgamat

वहाँ से आगे बढ़कर वे रेवा नदी के तट पर पहुँचे, जहाँ माहिष्मती नगरी बसी है, फिर मनु-तीर्थ में स्नान करके पुनः प्रभास लौट आये।

श्लोक 22 (bhagavata.10.79.22)

श्रुत्वा द्विजैः कथ्यमानं कुरुपाण्डवसंयुगे । सर्वराजन्यनिधनं भारं मेने हृतं भुवः ॥ 79.22 ॥

śrutvā dvijaiḥ kathyamānaṁ kuru-pāṇḍava-saṁyuge sarva-rājanya-nidhanaṁ bhāraṁ mene hṛtaṁ bhuvaḥ

वहाँ ब्राह्मणों के मुख से कुरु-पाण्डव युद्ध में समस्त राजाओं के मारे जाने का समाचार सुनकर उन्होंने समझा कि पृथ्वी का भार अब उतर गया है।

श्लोक 23 (bhagavata.10.79.23)

स भीमदुर्योधनयोर्गदाभ्यां युध्यतोर्मृधे । वारयिष्यन् विनशनं जगाम यदुनन्दनः ॥ 79.23 ॥

sa bhīma-duryodhanayor gadābhyāṁ yudhyator mṛdhe vārayiṣyan vinaśanaṁ jagāma yadu-nandanaḥ

भीम और दुर्योधन को गदाओं से युद्धरत जानकर, उन्हें रोकने की इच्छा से यदुनन्दन बलराम विनशन (कुरुक्षेत्र) गये।

श्लोक 24 (bhagavata.10.79.24)

युधिष्ठिरस्तु तं दृष्ट्वा यमौ कृष्णार्जुनावपि । अभिवाद्याभवंस्तूष्णीं किं विवक्षुरिहागतः ॥ 79.24 ॥

yudhiṣṭhiras tu taṁ dṛṣṭvā yamau kṛṣṇārjunāv api abhivādyābhavaṁs tuṣṇīṁ kiṁ vivakṣur ihāgataḥ

युधिष्ठिर, नकुल-सहदेव, तथा कृष्ण और अर्जुन ने भी उन्हें देखकर प्रणाम किया, किन्तु सोचते हुए कि "यह क्या कहने आये हैं," वे चुप रहे।

श्लोक 25 (bhagavata.10.79.25)

गदापाणी उभौ दृष्ट्वा संरब्धौ विजयैषिणौ । मण्डलानि विचित्राणि चरन्ताविदमब्रवीत् ॥ 79.25 ॥

gadā-pāṇī ubhau dṛṣṭvā saṁrabdhau vijayaiṣiṇau maṇḍalāni vicitrāṇi carantāv idam abravīt

गदा हाथों में लिए, विजय की इच्छा से क्रुद्ध होकर विचित्र चालों से घूमते हुए उन दोनों को देखकर बलराम ने यह कहा।

श्लोक 26 (bhagavata.10.79.26)

युवां तुल्यबलौ वीरौ हे राजन् हे वृकोदर । एकं प्राणाधिकं मन्ये उतैकं शिक्षयाधिकम् ॥ 79.26 ॥

yuvāṁ tulya-balau vīrau he rājan he vṛkodara ekaṁ prāṇādhikaṁ manye utaikaṁ śikṣayādhikam

"हे राजन् (दुर्योधन)! हे वृकोदर (भीम)! तुम दोनों वीर बल में समान हो — मुझे लगता है, एक बल में बढ़कर है तो दूसरा शिक्षा (कौशल) में बढ़कर।

श्लोक 27 (bhagavata.10.79.27)

तस्मादेकतरस्येह युवयोः समवीर्ययोः । न लक्ष्यते जयोऽन्यो वा विरमत्वफलो रणः ॥ 79.27 ॥

tasmād ekatarasyeha yuvayoḥ sama-vīryayoḥ na lakṣyate jayo ’nyo vā viramatv aphalo raṇaḥ

इसलिए, समान बल वाले तुम दोनों में से किसी एक की विजय दिखाई नहीं देती — इस निष्फल युद्ध को यहीं रोक दो।"

श्लोक 28 (bhagavata.10.79.28)

न तद्वाक्यं जगृहतुर्बद्धवैरौ नृपार्थवत् । अनुस्मरन्तावन्योन्यं दुरुक्तं दुष्कृतानि च ॥ 79.28 ॥

na tad-vākyaṁ jagṛhatur baddha-vairau nṛpārthavat anusmarantāv anyonyaṁ duruktaṁ duṣkṛtāni ca

हे राजन्! अपने-अपने वैर में बँधे हुए, तथा एक-दूसरे के प्रति किए गए कटु वचनों और दुष्कर्मों को स्मरण करते हुए उन दोनों ने बलराम के इस युक्तिसंगत वचन को स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 29 (bhagavata.10.79.29)

दिष्टं तदनुमन्वानो रामो द्वारवतीं ययौ । उग्रसेनादिभिः प्रीतैर्ज्ञातिभिः समुपागतः ॥ 79.29 ॥

diṣṭaṁ tad anumanvāno rāmo dvāravatīṁ yayau ugrasenādibhiḥ prītair jñātibhiḥ samupāgataḥ

उसे भाग्य की ही योजना मानकर बलराम द्वारका लौट गये, जहाँ उग्रसेन आदि प्रसन्नचित्त कुटुम्बीजनों ने उनका स्वागत किया।

श्लोक 30 (bhagavata.10.79.30)

तं पुनर्नैमिषं प्राप्तमृषयोऽयाजयन् मुदा । क्रत्वङ्गं क्रतुभिः सर्वैर्निवृत्ताखिलविग्रहम् ॥ 79.30 ॥

taṁ punar naimiṣaṁ prāptam ṛṣayo ’yājayan mudā kratv-aṅgaṁ kratubhiḥ sarvair nivṛttākhila-vigraham

अब समस्त युद्धों से निवृत्त होकर पुनः नैमिषारण्य पहुँचे बलराम को — जो स्वयं यज्ञ के अंगस्वरूप हैं — ऋषियों ने प्रसन्नतापूर्वक विविध यज्ञ सम्पन्न कराए।

श्लोक 31 (bhagavata.10.79.31)

तेभ्यो विशुद्धं विज्ञानं भगवान् व्यतरद् विभुः । येनैवात्मन्यदो विश्वमात्मानं विश्वगं विदुः ॥ 79.31 ॥

tebhyo viśuddhaṁ vijñānaṁ bhagavān vyatarad vibhuḥ yenaivātmany ado viśvam ātmānaṁ viśva-gaṁ viduḥ

सर्वशक्तिमान भगवान ने उन्हें वह विशुद्ध विज्ञान प्रदान किया जिसके द्वारा वे अपने भीतर ही सम्पूर्ण विश्व को, तथा स्वयं को सर्वव्यापी रूप में जान सके।

श्लोक 32 (bhagavata.10.79.32)

स्वपत्यावभृथस्नातो ज्ञातिबन्धुसुहृद् वृतः । रेजे स्वज्योत्स्नयेवेन्दुः सुवासाः सुष्ठ्वलङ्कृतः ॥ 79.32 ॥

sva-patyāvabhṛtha-snāto jñāti-bandhu-suhṛd-vṛtaḥ reje sva-jyotsnayevenduḥ su-vāsāḥ suṣṭhv alaṅkṛtaḥ

अपनी पत्नी के साथ अवभृथ-स्नान करके, कुटुम्बियों, बन्धुओं और मित्रों से घिरे हुए, सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित बलराम उसी प्रकार शोभायमान हुए जैसे चन्द्रमा अपनी ही चाँदनी से।

श्लोक 33 (bhagavata.10.79.33)

ईदृग्विधान्यसङ्ख्यानि बलस्य बलशालिनः । अनन्तस्याप्रमेयस्य मायामर्त्यस्य सन्ति हि ॥ 79.33 ॥

īdṛg-vidhāny asaṅkhyāni balasya bala-śālinaḥ anantasyāprameyasya māyā-martyasya santi hi

अनन्त, अप्रमेय, तथा अपनी माया से मनुष्य-सा प्रतीत होने वाले महाबली बलराम के ऐसे अगणित चरित्र हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.10.79.34)

योऽनुस्मरेत रामस्य कर्माण्यद्भुतकर्मणः । सायं प्रातरनन्तस्य विष्णोः स दयितो भवेत् ॥ 79.34 ॥

yo ’nusmareta rāmasya karmāṇy adbhuta-karmaṇaḥ sāyaṁ prātar anantasya viṣṇoḥ sa dayito bhavet

जो कोई भी अद्भुत कर्म करने वाले अनन्त बलराम के इन चरित्रों का प्रातः-सायं स्मरण करता है, वह भगवान विष्णु का अत्यन्त प्रिय बन जाता है।

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80