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दशम स्कन्ध · अध्याय 80

ब्राह्मण सुदामा की द्वारका में कृष्ण से भेंट

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

श्लोक 1 (bhagavata.10.80.1)

श्रीराजोवाच भगवन् यानि चान्यानि मुकुन्दस्य महात्मनः । वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य श्रोतुमिच्छामि हे प्रभो ॥ 80.1 ॥

śrī-rājovāca bhagavan yāni cānyāni mukundasya mahātmanaḥ vīryāṇy ananta-vīryasya śrotum icchāmi he prabho

राजा परीक्षित ने कहा — हे भगवन्! हे प्रभो! मैं अनन्त पराक्रमी महात्मा मुकुन्द के और भी शौर्य-चरित्र सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 2 (bhagavata.10.80.2)

को नु श्रुत्वासकृद् ब्रह्मन्नुत्तमःश्लोकसत्कथाः । विरमेत विशेषज्ञो विषण्णः काममार्गणैः ॥ 80.2 ॥

ko nu śrutvāsakṛd brahmann uttamaḥśloka-sat-kathāḥ virameta viśeṣa-jño viṣaṇṇaḥ kāma-mārgaṇaiḥ

हे ब्रह्मन्! उत्तमश्लोक भगवान की पुण्य-कथाओं को बार-बार सुनकर, विषय-वासनाओं की खोज से उकताया हुआ कौन-सा विवेकी पुरुष उन्हें सुनना छोड़ सकता है?

श्लोक 3 (bhagavata.10.80.3)

सा वाग् यया तस्य गुणान् गृणीते करौ च तत्कर्मकरौ मनश्च । स्मरेद् वसन्तं स्थिरजङ्गमेषु शृणोति तत्पुण्यकथाः स कर्णः ॥ 80.3 ॥

sā vāg yayā tasya guṇān gṛṇīte karau ca tat-karma-karau manaś ca smared vasantaṁ sthira-jaṅgameṣu śṛṇoti tat-puṇya-kathāḥ sa karṇaḥ

वही वाणी सच्ची वाणी है जो उनके गुणों का गान करती है, वे ही हाथ सच्चे हैं जो उनके कार्य में लगे हैं, वही मन सच्चा है जो चराचर सभी में निवास करने वाले उन्हें स्मरण करता है, और वे ही कान सच्चे हैं जो उनकी पुण्य-कथाओं को सुनते हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.10.80.4)

शिरस्तु तस्योभयलिङ्गमान- मेत्तदेव यत् पश्यति तद्धि चक्षुः । अङ्गानि विष्णोरथ तज्जनानां पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम् ॥ 80.4 ॥

śiras tu tasyobhaya-liṅgam ānamet tad eva yat paśyati tad dhi cakṣuḥ aṅgāni viṣṇor atha taj-janānāṁ pādodakaṁ yāni bhajanti nityam

वही सिर सच्चा है जो चराचर दोनों रूपों में विद्यमान उन्हें नमन करता है, वही नेत्र सच्चा है जो उन्हीं को देखता है, तथा वे ही अंग सच्चे हैं जो विष्णु और उनके भक्तों के चरणामृत का नित्य सेवन करते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.10.80.5)

सूत उवाच विष्णुरातेन सम्पृष्टो भगवान् बादरायणिः । वासुदेवे भगवति निमग्नहृदयोऽब्रवीत् ॥ 80.5 ॥

sūta uvāca viṣṇu-rātena sampṛṣṭo bhagavān bādarāyaṇiḥ vāsudeve bhagavati nimagna-hṛdayo ’bravīt

सूत जी ने कहा — विष्णुरात (परीक्षित) द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, भगवान वासुदेव में जिनका हृदय सदा निमग्न रहता है, वे भगवान बादरायणि (शुकदेव) बोले।

श्लोक 6 (bhagavata.10.80.6)

श्रीशुक उवाच कृष्णस्यासीत् सखा कश्चिद् ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः । विरक्त इन्द्रियार्थेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ॥ 80.6 ॥

śrī-śuka uvāca kṛṣṇasyāsīt sakhā kaścid brāhmaṇo brahma-vittamaḥ virakta indriyārtheṣu praśāntātmā jitendriyaḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — कृष्ण का एक ब्राह्मण मित्र था, जो ब्रह्म-ज्ञान में अत्यन्त निपुण, इन्द्रिय-विषयों से विरक्त, शान्त-चित्त तथा जितेन्द्रिय था।

श्लोक 7 (bhagavata.10.80.7)

यदृच्छयोपपन्नेन वर्तमानो गृहाश्रमी । तस्य भार्या कुचैलस्य क्षुत्क्षामा च तथाविधा ॥ 80.7 ॥

yadṛcchayopapannena vartamāno gṛhāśramī tasya bhāryā ku-cailasya kṣut-kṣāmā ca tathā-vidhā

वह गृहस्थ जो कुछ भी अनायास प्राप्त होता उसी से जीवन-निर्वाह करता था। उस दीन-वस्त्र वाले ब्राह्मण की पत्नी भी भूख से क्षीण होकर वैसी ही दशा में थी।

श्लोक 8 (bhagavata.10.80.8)

पतिव्रता पतिं प्राह म्लायता वदनेन सा । दरिद्रं सीदमाना वै वेपमानाभिगम्य च ॥ 80.8 ॥

pati-vratā patiṁ prāha mlāyatā vadanena sā daridraṁ sīdamānā vai vepamānābhigamya ca

वह पतिव्रता स्त्री म्लान मुख से, दुर्दशाग्रस्त होकर काँपती हुई अपने दरिद्र पति के पास आई और यह बोली।

श्लोक 9 (bhagavata.10.80.9)

ननु ब्रह्मन् भगवतः सखा साक्षाच्छ्रियः पतिः । ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च भगवान् सात्वतर्षभः ॥ 80.9 ॥

nanu brahman bhagavataḥ sakhā sākṣāc chriyaḥ patiḥ brahmaṇyaś ca śaraṇyaś ca bhagavān sātvatarṣabhaḥ

"हे ब्राह्मण! क्या आप स्वयं लक्ष्मीपति भगवान के मित्र नहीं हैं? वे सात्वतवंश-श्रेष्ठ भगवान ब्राह्मणों के हितैषी तथा शरण देने वाले हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.10.80.10)

तमुपैहि महाभाग साधूनां च परायणम् । दास्यति द्रविणं भूरि सीदते ते कुटुम्बिने ॥ 80.10 ॥

tam upaihi mahā-bhāga sādhūnāṁ ca parāyaṇam dāsyati draviṇaṁ bhūri sīdate te kuṭumbine

हे महाभाग! साधुजनों के परम आश्रय उन्हीं के पास जाइए। आप जैसे कष्टग्रस्त गृहस्थ को वे अवश्य ही प्रचुर धन देंगे।"

श्लोक 11 (bhagavata.10.80.11)

आस्तेऽधुना द्वारवत्यां भोजवृष्ण्यन्धकेश्वरः । स्मरतः पादकमलमात्मानमपि यच्छति । किं न्वर्थकामान् भजतो नात्यभीष्टान् जगद्गुरुः ॥ 80.11 ॥

āste ’dhunā dvāravatyāṁ bhoja-vṛṣṇy-andhakeśvaraḥ smarataḥ pāda-kamalam ātmānam api yacchati kiṁ nv artha-kāmān bhajato nāty-abhīṣṭān jagad-guruḥ

वे भोज, वृष्णि तथा अन्धक वंशों के स्वामी अभी द्वारका में निवास करते हैं। स्मरण करने वाले को वे अपना-आप ही दे देते हैं — फिर उन जगद्गुरु से धन और सुख जैसी तुच्छ वस्तुएँ, जो सच्चे भक्त को अभीष्ट भी नहीं होतीं, माँगने में क्या सन्देह!

श्लोक 12 (bhagavata.10.80.12)

स एवं भार्यया विप्रो बहुशः प्रार्थितो मुहुः । अयं हि परमो लाभ उत्तमःश्लोकदर्शनम् ॥ 80.12 ॥

sa evaṁ bhāryayā vipro bahuśaḥ prārthito muhuḥ ayaṁ hi paramo lābha uttamaḥśloka-darśanam

पत्नी के इस प्रकार बार-बार अनुरोध करने पर उस ब्राह्मण ने सोचा — "उत्तमश्लोक भगवान के दर्शन ही तो परम लाभ हैं।"

श्लोक 13 (bhagavata.10.80.13)

इति सञ्चिन्त्य मनसा गमनाय मतिं दधे । अप्यस्त्युपायनं किञ्चिद् गृहे कल्याणि दीयताम् ॥ 80.13 ॥

iti sañcintya manasā gamanāya matiṁ dadhe apy asty upāyanaṁ kiñcid gṛhe kalyāṇi dīyatām

ऐसा मन में सोचकर उसने जाने का निश्चय किया, और कहा — "हे कल्याणि! घर में यदि कोई भेंट-योग्य वस्तु हो, तो वह मुझे दे दो।"

श्लोक 14 (bhagavata.10.80.14)

याचित्वा चतुरो मुष्टीन् विप्रान् पृथुकतण्डुलान् । चैलखण्डेन तान् बद्ध्वा भर्त्रे प्रादादुपायनम् ॥ 80.14 ॥

yācitvā caturo muṣṭīn viprān pṛthuka-taṇḍulān caila-khaṇḍena tān baddhvā bhartre prādād upāyanam

उसने पड़ोसी ब्राह्मणों से माँगकर चार मुट्ठी चिउड़ा प्राप्त किया, उसे एक फटे कपड़े के टुकड़े में बाँधकर अपने पति को भेंट-स्वरूप दे दिया।

श्लोक 15 (bhagavata.10.80.15)

स तानादाय विप्राग्र्यः प्रययौ द्वारकां किल । कृष्णसन्दर्शनं मह्यं कथं स्यादिति चिन्तयन् ॥ 80.15 ॥

sa tān ādāya viprāgryaḥ prayayau dvārakāṁ kila kṛṣṇa-sandarśanaṁ mahyaṁ kathaṁ syād iti cintayan

उसे लेकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वारका की ओर चल पड़ा, यह सोचता हुआ कि "मुझे कृष्ण के दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?"

श्लोक 16 (bhagavata.10.80.16)

त्रीणि गुल्मान्यतीयाय तिस्रः कक्षाश्च सद्विजः । विप्रोऽगम्यान्धकवृष्णीनां गृहेष्वच्युतधर्मिणाम् ॥ 80.16 ॥

trīṇi gulmāny atīyāya tisraḥ kakṣāś ca sa-dvijaḥ vipro ’gamyāndhaka-vṛṣṇīnāṁ gṛheṣv acyuta-dharmiṇām

वह उत्तम ब्राह्मण तीन पहरा-चौकियों तथा तीन प्रांगणों को पार करता हुआ, अच्युत के परम भक्त अन्धक-वृष्णिवंशियों के उन घरों में प्रविष्ट हुआ जहाँ साधारणतः किसी का जाना सम्भव नहीं था।

श्लोक 17 (bhagavata.10.80.17)

गृहं द्वयष्टसहस्राणां महिषीणां हरेर्द्विजः । विवेशैकतमं श्रीमद् ब्रह्मानन्दं गतो यथा ॥ 80.17 ॥

gṛhaṁ dvy-aṣṭa-sahasrāṇāṁ mahiṣīṇāṁ harer dvijaḥ viveśaikatamaṁ śrīmad brahmānandaṁ gato yathā

वह ब्राह्मण हरि की सोलह हजार रानियों में से एक के वैभवशाली भवन में प्रविष्ट हुआ, मानो वह ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो गया हो।

श्लोक 18 (bhagavata.10.80.18)

तं विलोक्याच्युतो दूरात् प्रियापर्यङ्कमास्थितः । सहसोत्थाय चाभ्येत्य दोर्भ्यां पर्यग्रहीन्मुदा ॥ 80.18 ॥

taṁ vilokyācyuto dūrāt priyā-paryaṅkam āsthitaḥ sahasotthāya cābhyetya dorbhyāṁ paryagrahīn mudā

अपनी प्रिया की शय्या पर बैठे हुए भगवान अच्युत ने दूर से ही उसे देखकर तुरन्त उठकर, निकट जाकर, प्रसन्नतापूर्वक दोनों भुजाओं से उसका आलिंगन किया।

श्लोक 19 (bhagavata.10.80.19)

सख्युः प्रियस्य विप्रर्षेरङ्गसङ्गातिनिर्वृतः । प्रीतो व्यमुञ्चदब्बिन्दून् नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः ॥ 80.19 ॥

sakhyuḥ priyasya viprarṣer aṅga-saṅgāti-nirvṛtaḥ prīto vyamuñcad ab-bindūn netrābhyāṁ puṣkarekṣaṇaḥ

अपने प्रिय ब्राह्मण-सखा के शरीर के स्पर्श से अत्यन्त आनन्दित होकर कमल-नयन भगवान ने प्रेम-विह्वल होकर अपने दोनों नेत्रों से अश्रु-बिन्दु बहाए।

श्लोक 20 (bhagavata.10.80.20)

अथोपवेश्य पर्यङ्के स्वयं सख्युः समर्हणम् । उपहृत्यावनिज्यास्य पादौ पादावनेजनीः ॥ 80.20 ॥

athopaveśya paryaṅke svayam sakhyuḥ samarhaṇam upahṛtyāvanijyāsya pādau pādāvanejanīḥ

फिर उस मित्र को शय्या पर बिठाकर भगवान ने स्वयं पूजा-सामग्री लाकर उसके चरण धोए और उस चरणोदक को भी अपने ऊपर धारण किया।

श्लोक 21 (bhagavata.10.80.21)

अग्रहीच्छिरसा राजन् भगवाँल्लोकपावनः । व्यलिम्पद् दिव्यगन्धेन चन्दनागुरुकुङ्कुमैः ॥ 80.21 ॥

agrahīc chirasā rājan bhagavāḻ loka-pāvanaḥ vyalimpad divya-gandhena candanāguru-kuṅkumaiḥ

हे राजन्! समस्त लोकों को पवित्र करने वाले भगवान ने उस चरणोदक को अपने सिर पर धारण किया, और चन्दन, अगुरु तथा कुंकुम के दिव्य सुगन्धित लेप से उसे अनुलिप्त किया।

श्लोक 22 (bhagavata.10.80.22)

धूपैः सुरभिभिर्मित्रं प्रदीपावलिभिर्मुदा । अर्चित्वावेद्य ताम्बूलं गां च स्वागतमब्रवीत् ॥ 80.22 ॥

dhūpaiḥ surabhibhir mitraṁ pradīpāvalibhir mudā arcitvāvedya tāmbūlaṁ gāṁ ca svāgatam abravīt

सुगन्धित धूप तथा दीपमालाओं से आनन्दपूर्वक अपने मित्र की पूजा करके, ताम्बूल और गौ भेंट करके उन्होंने उसका स्वागत किया।

श्लोक 23 (bhagavata.10.80.23)

कुचैलं मलिनं क्षामं द्विजं धमनिसन्ततम् । देवी पर्यचरत् साक्षाच्चामरव्यजनेन वै ॥ 80.23 ॥

ku-cailaṁ malinaṁ kṣāmaṁ dvijaṁ dhamani-santatam devī paryacarat sākṣāc cāmara-vyajanena vai

फटे-मैले वस्त्र पहने, इतने दुबले कि नसें दिखाई पड़ती थीं, उस ब्राह्मण की सेवा साक्षात् लक्ष्मी देवी ने स्वयं चँवर डुलाकर की।

श्लोक 24 (bhagavata.10.80.24)

अन्तःपुरजनो दृष्ट्वा कृष्णेनामलकीर्तिना । विस्मितोऽभूदतिप्रीत्या अवधूतं सभाजितम् ॥ 80.24 ॥

antaḥ-pura-jano dṛṣṭvā kṛṣṇenāmala-kīrtinā vismito ’bhūd ati-prītyā avadhūtaṁ sabhājitam

निर्मल कीर्ति वाले कृष्ण द्वारा इस प्रकार अत्यन्त प्रेम से सम्मानित उस उपेक्षित-से ब्राह्मण को देखकर अन्तःपुर के सभी लोग चकित रह गए।

श्लोक 25 (bhagavata.10.80.25)

किमनेन कृतं पुण्यमवधूतेन भिक्षुणा । श्रिया हीनेन लोकेऽस्मिन् गर्हितेनाधमेन च ॥ 80.25 ॥

kim anena kṛtaṁ puṇyam avadhūtena bhikṣuṇā śriyā hīnena loke ’smin garhitenādhamena ca

"इस दरिद्र, तिरस्कृत तथा हीन भिखारी ब्राह्मण ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया होगा?

श्लोक 26 (bhagavata.10.80.26)

योऽसौ त्रिलोकगुरुणा श्रीनिवासेन सम्भृतः । पर्यङ्कस्थां श्रियं हित्वा परिष्वक्तोऽग्रजो यथा ॥ 80.26 ॥

yo ’sau tri-loka-guruṇā śrī-nivāsena sambhṛtaḥ paryaṅka-sthāṁ śriyaṁ hitvā pariṣvakto ’gra-jo yathā

कि त्रिलोक-गुरु, लक्ष्मी के निवास-स्वरूप भगवान ने शय्या पर बैठी लक्ष्मी को भी छोड़कर उसे ऐसे गले लगाया मानो वह उनका बड़ा भाई हो!"

श्लोक 27 (bhagavata.10.80.27)

कथयां चक्रतुर्गाथाः पूर्वा गुरुकुले सतोः । आत्मनोर्ललिता राजन् करौ गृह्य परस्परम् ॥ 80.27 ॥

kathayāṁ cakratur gāthāḥ pūrvā gurukule satoḥ ātmanor lalitā rājan karau gṛhya parasparam

हे राजन्! एक-दूसरे का हाथ थामे हुए कृष्ण और सुदामा गुरुकुल में साथ बिताए हुए दिनों की मधुर स्मृतियाँ बताने लगे।

श्लोक 28 (bhagavata.10.80.28)

श्रीभगवानुवाच अपि ब्रह्मन् गुरुकुलाद् भवता लब्धदक्षिणात् । समावृत्तेन धर्मज्ञ भार्योढा सदृशी न वा ॥ 80.28 ॥

śrī-bhagavān uvāca api brahman gurukulād bhavatā labdha-dakṣiṇāt samāvṛttena dharma-jña bhāryoḍhā sadṛśī na vā

भगवान ने कहा — हे ब्राह्मण, हे धर्मज्ञ! गुरु को दक्षिणा देकर गुरुकुल से लौटने के बाद क्या आपने अपने योग्य पत्नी से विवाह किया या नहीं?

श्लोक 29 (bhagavata.10.80.29)

प्रायो गृहेषु ते चित्तमकामविहितं तथा । नैवातिप्रीयसे विद्वन् धनेषु विदितं हि मे ॥ 80.29 ॥

prāyo gṛheṣu te cittam akāma-vihitaṁ tathā naivāti-prīyase vidvan dhaneṣu viditaṁ hi me

यद्यपि आप प्रायः गृहस्थी में ही व्यस्त रहते हैं, तथापि आपका चित्त कामनाओं से रहित है। हे विद्वान्! मुझे भली-भाँति ज्ञात है कि धन में भी आपका विशेष अनुराग नहीं है।

श्लोक 30 (bhagavata.10.80.30)

केचित् कुर्वन्ति कर्माणि कामैरहतचेतसः । त्यजन्तः प्रकृतीर्दैवीर्यथाहं लोकसङ्ग्रहम् ॥ 80.30 ॥

kecit kurvanti karmāṇi kāmair ahata-cetasaḥ tyajantaḥ prakṛtīr daivīr yathāhaṁ loka-saṅgraham

कुछ लोग दैवी प्रकृतियों (माया) का त्याग करके, कामनाओं से अस्पृष्ट चित्त से कर्म करते हैं, जैसे मैं स्वयं लोक-संग्रह के लिए करता हूँ।

श्लोक 31 (bhagavata.10.80.31)

कच्चिद् गुरुकुले वासं ब्रह्मन् स्मरसि नौ यतः । द्विजो विज्ञाय विज्ञेयं तमसः पारमश्नुते ॥ 80.31 ॥

kaccid gurukule vāsaṁ brahman smarasi nau yataḥ dvijo vijñāya vijñeyaṁ tamasaḥ pāram aśnute

हे ब्राह्मण! क्या आपको हमारा गुरुकुल-वास स्मरण है, जहाँ से द्विज ज्ञातव्य वस्तु को जानकर अज्ञान-अन्धकार के पार पहुँच जाता है?

श्लोक 32 (bhagavata.10.80.32)

स वै सत्कर्मणां साक्षाद् द्विजातेरिह सम्भवः । आद्योऽङ्ग यत्राश्रमिणां यथाहं ज्ञानदो गुरुः ॥ 80.32 ॥

sa vai sat-karmaṇāṁ sākṣād dvijāter iha sambhavaḥ ādyo ’ṅga yatrāśramiṇāṁ yathāhaṁ jñāna-do guruḥ

हे मित्र! जन्म देने वाला ही द्विज का प्रथम गुरु है, संस्कार और आश्रम-धर्म में स्थापित करने वाला उससे भी बढ़कर गुरु है, किन्तु जो ज्ञान प्रदान करता है वही सबसे बड़ा गुरु है — वह मेरे ही समान है।

श्लोक 33 (bhagavata.10.80.33)

नन्वर्थकोविदा ब्रह्मन् वर्णाश्रमवतामिह । ये मया गुरुणा वाचा तरन्त्यञ्जो भवार्णवम् ॥ 80.33 ॥

nanv artha-kovidā brahman varṇāśrama-vatām iha ye mayā guruṇā vācā taranty añjo bhavārṇavam

हे ब्राह्मण! वर्णाश्रम-धर्म का पालन करने वालों में सबसे अधिक अपने वास्तविक हित को जानने वाले वे ही हैं जो गुरु-रूप मेरी वाणी के सहारे संसार-सागर को सहज ही पार कर जाते हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.10.80.34)

नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा । तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा ॥ 80.34 ॥

nāham ijyā-prajātibhyāṁ tapasopaśamena vā tuṣyeyaṁ sarva-bhūtātmā guru-śuśrūṣayā yathā

मैं, जो समस्त प्राणियों की आत्मा हूँ, यज्ञ, ब्राह्मणत्व की प्राप्ति, तपस्या अथवा इन्द्रिय-संयम से उतना संतुष्ट नहीं होता, जितना गुरु की सेवा से होता हूँ।

श्लोक 35 (bhagavata.10.80.35)

अपि नः स्मर्यते ब्रह्मन् वृत्तं निवसतां गुरौ । गुरुदारैश्चोदितानामिन्धनानयने क्वचित् ॥ 80.35 ॥

api naḥ smaryate brahman vṛttaṁ nivasatāṁ gurau guru-dāraiś coditānām indhanānayane kvacit

हे ब्राह्मण! क्या आपको वह घटना स्मरण है जो गुरुकुल में हमारे साथ घटी थी — जब एक बार गुरु-पत्नी के कहने पर हम लकड़ी लाने गए थे?

श्लोक 36 (bhagavata.10.80.36)

प्रविष्टानां महारण्यमपर्तौ सुमहद् द्विज । वातवर्षमभूत्तीव्रं निष्ठुराः स्तनयित्नवः ॥ 80.36 ॥

praviṣṭānāṁ mahāraṇyam apartau su-mahad dvija vāta-varṣam abhūt tīvraṁ niṣṭhurāḥ stanayitnavaḥ

हे द्विज! विशाल वन में प्रवेश करते ही असमय में एक भीषण तूफान आ गया, तेज वर्षा होने लगी और भयंकर बादल गरजने लगे।

श्लोक 37 (bhagavata.10.80.37)

सूर्यश्चास्तं गतस्तावत् तमसा चावृता दिशः । निम्नं कूलं जलमयं न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ 80.37 ॥

sūryaś cāstaṁ gatas tāvat tamasā cāvṛtā diśaḥ nimnaṁ kūlaṁ jala-mayaṁ na prājñāyata kiñcana

तभी सूर्य भी अस्त हो गया, चारों दिशाएँ अन्धकार से घिर गईं, और जल से भरे उस स्थान में ऊँच-नीच कुछ भी पहचान में नहीं आ रहा था।

श्लोक 38 (bhagavata.10.80.38)

वयं भृशं तत्र महानिलाम्बुभि- र्निहन्यमाना महुरम्बुसम्प्लवे । दिशोऽविदन्तोऽथ परस्परं वने गृहीतहस्ताः परिबभ्रिमातुराः ॥ 80.38 ॥

vayaṁ bhṛśam tatra mahānilāmbubhir nihanyamānā mahur ambu-samplave diśo ’vidanto ’tha parasparaṁ vane gṛhīta-hastāḥ paribabhrimāturāḥ

उस बाढ़ में प्रचण्ड वायु और वर्षा से बुरी तरह पीड़ित, दिशाओं का ज्ञान खोकर, हम एक-दूसरे का हाथ थामे हुए व्याकुल होकर उस वन में इधर-उधर भटकते रहे।

श्लोक 39 (bhagavata.10.80.39)

एतद् विदित्वा उदिते रवौ सान्दीपनिर्गुरुः । अन्वेषमाणो नः शिष्यानाचार्योऽपश्यदातुरान् ॥ 80.39 ॥

etad viditvā udite ravau sāndīpanir guruḥ anveṣamāṇo naḥ śiṣyān ācāryo ’paśyad āturān

यह जानकर, सूर्योदय होते ही हमारे गुरु सान्दीपनि हम शिष्यों को खोजते हुए निकले और हमें उस व्याकुल दशा में पाया।

श्लोक 40 (bhagavata.10.80.40)

अहो हे पुत्रका यूयमस्मदर्थेऽतिदुःखिताः । आत्मा वै प्राणिनां प्रेष्ठस्तमनादृत्य मत्पराः ॥ 80.40 ॥

aho he putrakā yūyam asmad-arthe ’ti-duḥkhitāḥ ātmā vai prāṇinām preṣṭhas tam anādṛtya mat-parāḥ

(गुरु ने कहा) "हाय, हे पुत्रो! तुम मेरे लिए इतने कष्ट में पड़ गए! सभी प्राणियों को अपना शरीर सबसे प्रिय होता है, फिर भी तुमने मेरे लिए उसकी भी परवाह नहीं की।

श्लोक 41 (bhagavata.10.80.41)

एतदेव हि सच्छिष्यैः कर्तव्यं गुरुनिष्कृतम् । यद् वै विशुद्धभावेन सर्वार्थात्मार्पणं गुरौ ॥ 80.41 ॥

etad eva hi sac-chiṣyaiḥ kartavyaṁ guru-niṣkṛtam yad vai viśuddha-bhāvena sarvārthātmārpaṇaṁ gurau

सच्चे शिष्यों का यही कर्तव्य है कि वे शुद्ध भाव से अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपनी आत्मा भी गुरु को अर्पित कर दें — यही गुरु-ऋण से मुक्ति है।"

श्लोक 42 (bhagavata.10.80.42)

तुष्टोऽहं भो द्विजश्रेष्ठाः सत्याः सन्तु मनोरथाः । छन्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च ॥ 80.42 ॥

tuṣṭo ’haṁ bho dvija-śreṣṭhāḥ satyāḥ santu manorathāḥ chandāṁsy ayāta-yāmāni bhavantv iha paratra ca

"हे श्रेष्ठ द्विजो! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारे सभी मनोरथ सफल हों, और तुम्हारे द्वारा अध्ययन किए वेद-मन्त्र इस लोक और परलोक दोनों में सदा अक्षुण्ण बने रहें।"

श्लोक 43 (bhagavata.10.80.43)

इत्थंविधान्यनेकानि वसतां गुरुवेश्मनि । गुरोरनुग्रहेणैव पुमान् पूर्णः प्रशान्तये ॥ 80.43 ॥

itthaṁ-vidhāny anekāni vasatāṁ guru-veśmani guror anugraheṇaiva pumān pūrṇaḥ praśāntaye

गुरु के घर में रहते हुए हमारे साथ ऐसी अनेक घटनाएँ घटीं। गुरु की कृपा से ही मनुष्य पूर्णता तथा परम शान्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 44 (bhagavata.10.80.44)

श्रीब्राह्मण उवाच किमस्माभिरनिर्वृत्तं देवदेव जगद्गुरो । भवता सत्यकामेन येषां वासो गुरोरभूत् ॥ 80.44 ॥

śrī-brāhmaṇa uvāca kim asmābhir anirvṛttaṁ deva-deva jagad-guro bhavatā satya-kāmena yeṣāṁ vāso guror abhūt

उस ब्राह्मण ने कहा — हे देवाधिदेव! हे जगद्गुरो! जिनका गुरु के घर में आपके साथ निवास हुआ, उनके लिए भला क्या शेष रह गया है, हे सत्यसंकल्प!

श्लोक 45 (bhagavata.10.80.45)

यस्यच्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो । श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोऽत्यन्तविडम्बनम् ॥ 80.45 ॥

yasya cchando-mayaṁ brahma deha āvapanaṁ vibho śreyasāṁ tasya guruṣu vāso ’tyanta-viḍambanam

हे प्रभो! जिनका शरीर स्वयं वेदमय ब्रह्म है, तथा जो समस्त कल्याणों का मूल स्रोत हैं — उन्हीं का गुरु के घर में निवास करना तो केवल एक लीला-मात्र है।

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