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दशम स्कन्ध · अध्याय 81

सुदामा ब्राह्मण के प्रति भगवान की कृपा

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82

श्लोक 1 (bhagavata.10.81.1)

श्रीशुक उवाच स इत्थं द्विजमुख्येन सह सङ्कथयन् हरिः । सर्वभूतमनोऽभिज्ञः स्मयमान उवाच तम् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca sa itthaṁ dvija-mukhyena saha saṅkathayan hariḥ sarva-bhūta-mano-’bhijñaḥ smayamāna uvāca tam

शुकदेव ने कहा — इस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मण के साथ वार्तालाप करते हुए, समस्त प्राणियों के मन को जानने वाले भगवान हरि मुस्कुराते हुए उनसे बोले।

श्लोक 2 (bhagavata.10.81.2)

ब्रह्मण्यो ब्राह्मणं कृष्णो भगवान् प्रहसन् प्रियम् । प्रेम्णा निरीक्षणेनैव प्रेक्षन् खलु सतां गतिः ॥ २ ॥

brahmaṇyo brāhmaṇaṁ kṛṣṇo bhagavān prahasan priyam premṇā nirīkṣaṇenaiva prekṣan khalu satāṁ gatiḥ

ब्राह्मणों के हितैषी भगवान कृष्ण अपने प्रिय ब्राह्मण मित्र को देखकर हँस पड़े; सज्जनों की परम गति स्वयं भगवान उसे प्रेमपूर्ण दृष्टि से निहार रहे थे।

श्लोक 3 (bhagavata.10.81.3)

श्रीभगवानुवाच किमुपायनमानीतं ब्रह्मन् मे भवता गृहात् । अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत् । भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते ॥ ३ ॥

śrī-bhagavān uvāca kim upāyanam ānītaṁ brahman me bhavatā gṛhāt aṇv apy upāhṛtaṁ bhaktaiḥ premṇā bhūry eva me bhavet bhūry apy abhaktopahṛtaṁ na me toṣāya kalpate

भगवान ने कहा — हे ब्राह्मण! तुम अपने घर से मेरे लिए क्या भेंट लाए हो? मेरे भक्तों द्वारा प्रेमपूर्वक अर्पित की गई अत्यंत छोटी वस्तु भी मुझे बहुत बड़ी प्रतीत होती है, किंतु अभक्तों द्वारा दी गई बड़ी से बड़ी वस्तु भी मुझे संतुष्ट नहीं करती।

श्लोक 4 (bhagavata.10.81.4)

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ ४ ॥

patraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayacchati tad ahaṁ bhakty-upahṛtam aśnāmi prayatātmanaḥ

जो कोई शुद्ध हृदय से भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पित करता है, उसकी वह भक्तिपूर्ण भेंट मैं ग्रहण करता हूँ।

श्लोक 5 (bhagavata.10.81.5)

इत्युक्तोऽपि द्वियस्तस्मै व्रीडितः पतये श्रियः । पृथुकप्रसृतिं राजन् न प्रायच्छदवाङ्मुखः ॥ ५ ॥

ity ukto ’pi dviyas tasmai vrīḍitaḥ pataye śriyaḥ pṛthuka-prasṛtiṁ rājan na prāyacchad avāṅ-mukhaḥ

शुकदेव ने कहा — हे राजन्! इस प्रकार कहे जाने पर भी वह ब्राह्मण लक्ष्मीपति भगवान को अपनी मुट्ठी भर चिपटे चावल देने में संकोच करता रहा और सिर झुकाए हुए वह उन्हें अर्पित न कर सका।

श्लोक 6 (bhagavata.10.81.6)

सर्वभूतात्मदृक् साक्षात् तस्यागमनकारणम् । विज्ञायाचिन्तयन्नायं श्रीकामो माभजत्पुरा ॥ ६ ॥

sarva-bhūtātma-dṛk sākṣāt tasyāgamana-kāraṇam vijñāyācintayan nāyaṁ śrī-kāmo mābhajat purā

समस्त प्राणियों के अंतःकरण के साक्षात् द्रष्टा भगवान ने उसके आगमन का कारण जान लिया और सोचा — यह पहले कभी धन-संपत्ति की इच्छा से मेरी भक्ति नहीं करता था।

श्लोक 7 (bhagavata.10.81.7)

पत्न्याः पतिव्रतायास्तु सखा प्रियचिकीर्षया । प्राप्तो मामस्य दास्यामि सम्पदोऽमर्त्यदुर्लभाः ॥ ७ ॥

patnyāḥ pati-vratāyās tu sakhā priya-cikīrṣayā prāpto mām asya dāsyāmi sampado ’martya-durlabhāḥ

किंतु अब वह अपनी पतिव्रता पत्नी को प्रसन्न करने की इच्छा से मेरे पास आया है। मैं उसे ऐसा ऐश्वर्य प्रदान करूँगा जो अमरों को भी दुर्लभ है।

श्लोक 8 (bhagavata.10.81.8)

इत्थं विचिन्त्य वसनाच्चीरबद्धान्द्विजन्मनः । स्वयं जहार किमिदमिति पृथुकतण्डुलान् ॥ ८ ॥

itthaṁ vicintya vasanāc cīra-baddhān dvi-janmanaḥ svayaṁ jahāra kim idam iti pṛthuka-taṇḍulān

ऐसा विचार कर भगवान ने स्वयं ही उस ब्राह्मण के वस्त्र में बंधे हुए चिपटे चावलों को छीन लिया और कहा — यह क्या है?

श्लोक 9 (bhagavata.10.81.9)

नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे । तर्पयन्त्यङ्ग मां विश्वमेते पृथुकतण्डुलाः ॥ ९ ॥

nanv etad upanītaṁ me parama-prīṇanaṁ sakhe tarpayanty aṅga māṁ viśvam ete pṛthuka-taṇḍulāḥ

हे मित्र! क्या तुम यह मेरे लिए लाए हो? यह तो मुझे अत्यंत प्रसन्न करने वाली वस्तु है। ये चिपटे चावल मुझे और इस समस्त विश्व को तृप्त करने वाले हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.10.81.10)

इति मुष्टिं सकृज्जग्ध्वा द्वितीयां जग्धुमाददे । तावच्छ्रीर्जगृहे हस्तं तत्परा परमेष्ठिनः ॥ १० ॥

iti muṣṭiṁ sakṛj jagdhvā dvitīyāṁ jagdhum ādade tāvac chrīr jagṛhe hastaṁ tat-parā parameṣṭhinaḥ

ऐसा कहकर भगवान ने एक मुट्ठी चावल खा लिए और दूसरी मुट्ठी खाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि सदैव उनके प्रति समर्पित देवी लक्ष्मी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

श्लोक 11 (bhagavata.10.81.11)

एतावतालं विश्वात्मन् सर्वसम्पत्समृद्धये । अस्मिन्लोकेऽथवामुष्मिन् पुंसस्त्वत्तोषकारणम् ॥ ११ ॥

etāvatālaṁ viśvātman sarva-sampat-samṛddhaye asmin loke ’tha vāmuṣmin puṁsas tvat-toṣa-kāraṇam

श्री रुक्मिणी ने कहा — हे विश्वात्मन्! इतना ही पर्याप्त है, इससे इस लोक और परलोक दोनों में इस ब्राह्मण की समस्त सम्पत्ति की समृद्धि हो जाएगी; क्योंकि मनुष्य की समृद्धि का मूल कारण तो केवल आपकी प्रसन्नता ही है।

श्लोक 12 (bhagavata.10.81.12)

ब्राह्मणस्तां तु रजनीमुषित्वाच्युतमन्दिरे । भुक्त्वा पीत्वा सुखं मेने आत्मानं स्वर्गतं यथा ॥ १२ ॥

brāhmaṇas tāṁ tu rajanīm uṣitvācyuta-mandire bhuktvā pītvā sukhaṁ mene ātmānaṁ svar-gataṁ yathā

शुकदेव ने आगे कहा — वह ब्राह्मण उस रात्रि को भगवान अच्युत के महल में रहा। भोजन और पान कर वह इतना सुखी हुआ मानो स्वयं स्वर्गलोक को प्राप्त कर लिया हो।

श्लोक 13 (bhagavata.10.81.13)

श्वोभूते विश्वभावेन स्वसुखेनाभिवन्दितः । जगाम स्वालयं तात पथ्यनुव्रज्य नन्दितः ॥ १३ ॥

śvo-bhūte viśva-bhāvena sva-sukhenābhivanditaḥ jagāma svālayaṁ tāta pathy anuvrajya nanditaḥ

हे राजन्! दूसरे दिन विश्व के पालनकर्ता भगवान द्वारा प्रसन्नतापूर्वक विदा किए जाने पर वह हर्षित होकर मार्ग में चलते हुए अपने घर की ओर गया।

श्लोक 14 (bhagavata.10.81.14)

स चालब्ध्वा धनं कृष्णान्न तु याचितवान्स्वयम् । स्वगृहान् व्रीडितोऽगच्छन्महद्दर्शननिर्वृतः ॥ १४ ॥

sa cālabdhvā dhanaṁ kṛṣṇān na tu yācitavān svayam sva-gṛhān vrīḍito ’gacchan mahad-darśana-nirvṛtaḥ

उसने भगवान कृष्ण से कोई धन प्राप्त नहीं किया, क्योंकि उसने स्वयं कभी कुछ माँगा ही नहीं। वह संकोचवश अपने घर की ओर चला, फिर भी उस महापुरुष के दर्शन से आनंदित था।

श्लोक 15 (bhagavata.10.81.15)

अहो ब्रह्मण्यदेवस्य दृष्टा ब्रह्मण्यता मया । यद् दरिद्रतमो लक्ष्मीमाश्लिष्टो बिभ्रतोरसि ॥ १५ ॥

aho brahmaṇya-devasya dṛṣṭā brahmaṇyatā mayā yad daridratamo lakṣmīm āśliṣṭo bibhratorasi

सुदामा ने सोचा — अहो! मैंने आज ब्राह्मणभक्त भगवान की ब्राह्मणों के प्रति भक्ति को साक्षात् देख लिया, कि जो अपने वक्षःस्थल पर लक्ष्मी को धारण करते हैं, उन्होंने मुझ परम दरिद्र को गले लगाया।

श्लोक 16 (bhagavata.10.81.16)

क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः । ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥ १६ ॥

kvāhaṁ daridraḥ pāpīyān kva kṛṣṇaḥ śrī-niketanaḥ brahma-bandhur iti smāhaṁ bāhubhyāṁ parirambhitaḥ

कहाँ तो मैं पापी और दरिद्र, और कहाँ लक्ष्मी के आश्रय भगवान कृष्ण! मुझ जैसे नाममात्र के ब्राह्मण को भी उन्होंने अपनी दोनों भुजाओं से आलिंगन किया।

श्लोक 17 (bhagavata.10.81.17)

निवासितः प्रियाजुष्टे पर्यङ्के भ्रातरो यथा । महिष्या वीजितः श्रान्तो बालव्यजनहस्तया ॥ १७ ॥

nivāsitaḥ priyā-juṣṭe paryaṅke bhrātaro yathā mahiṣyā vījitaḥ śrānto bāla-vyajana-hastayā

उन्होंने मुझे अपने भाई के समान अपनी प्रिय पत्नी की शय्या पर बैठाया, और जब मैं थका हुआ था तब स्वयं महारानी ने अपने हाथ में पंखा लेकर मुझ पर हवा की।

श्लोक 18 (bhagavata.10.81.18)

शुश्रूषया परमया पादसंवाहनादिभिः । पूजितो देवदेवेन विप्रदेवेन देववत् ॥ १८ ॥

śuśrūṣayā paramayā pāda-saṁvāhanādibhiḥ pūjito deva-devena vipra-devena deva-vat

देवताओं के भी देवता तथा ब्राह्मणों के आराध्य देव होते हुए भी उन्होंने परम सेवाभाव से मेरे चरण दबाकर तथा अन्य सेवाओं द्वारा मुझे ऐसे पूजा जैसे किसी देवता की पूजा की जाती है।

श्लोक 19 (bhagavata.10.81.19)

स्वर्गापवर्गयोः पुंसां रसायां भुवि सम्पदाम् । सर्वासामपि सिद्धीनां मूलं तच्चरणार्चनम् ॥ १९ ॥

svargāpavargayoḥ puṁsāṁ rasāyāṁ bhuvi sampadām sarvāsām api siddhīnāṁ mūlaṁ tac-caraṇārcanam

स्वर्ग में, मोक्ष में, पाताल में तथा इस पृथ्वी पर मनुष्यों को प्राप्त होने वाली समस्त संपत्तियों और सभी सिद्धियों का मूल कारण उन्हीं भगवान के चरणों की आराधना है।

श्लोक 20 (bhagavata.10.81.20)

अधनोऽयं धनं प्राप्य माद्यन्नुच्चैर्न मां स्मरेत् । इति कारुणिको नूनं धनं मेऽभूरि नाददात् ॥ २० ॥

adhano ’yaṁ dhanaṁ prāpya mādyann uccair na māṁ smaret iti kāruṇiko nūnaṁ dhanaṁ me ’bhūri nādadāt

यह निर्धन व्यक्ति यदि धन पाकर उन्मत्त हो जाए तो मुझे भूल जाएगा — ऐसा सोचकर ही उन दयालु भगवान ने मुझे अधिक धन नहीं दिया, यह निश्चित है।

श्लोक 21 (bhagavata.10.81.21)

इति तच्चिन्तयन्नन्तः प्राप्तो निजगृहान्तिकम् । सूर्यानलेन्दुसङ्काशैर्विमानैः सर्वतो वृतम् ॥ २१ ॥

iti tac cintayann antaḥ prāpto nija-gṛhāntikam sūryānalendu-saṅkāśair vimānaiḥ sarvato vṛtam

ऐसा मन ही मन विचार करता हुआ वह अपने घर के निकट जा पहुँचा, जो सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा के समान तेजस्वी विमानों से चारों ओर से घिरा हुआ था।

श्लोक 22 (bhagavata.10.81.22)

विचित्रोपवनोद्यानैः कूजद्द्विजकुलाकुलैः । प्रोत्फुल्लकमुदाम्भोजकह्लारोत्पलवारिभिः ॥ २२ ॥

vicitropavanodyānaiḥ kūjad-dvija-kulākulaiḥ protphulla-kamudāmbhoja- kahlārotpala-vāribhiḥ

वहाँ विचित्र उपवनों और उद्यानों से सुशोभित तथा कूजते हुए पक्षियों के समूहों से भरे हुए सरोवर थे, जिनमें खिले हुए कुमुद, कमल, कह्लार और उत्पल पुष्प जल में लहरा रहे थे।

श्लोक 23 (bhagavata.10.81.23)

जुष्टं स्वलङ्कृतैः पुम्भिः स्त्रीभिश्च हरिणाक्षिभिः । किमिदं कस्य वा स्थानं कथं तदिदमित्यभूत् ॥ २३ ॥

juṣṭaṁ sv-alaṅkṛtaiḥ pumbhiḥ strībhiś ca hariṇākṣibhiḥ kim idaṁ kasya vā sthānaṁ kathaṁ tad idam ity abhūt

वह स्थान सुसज्जित पुरुषों तथा हरिणनयनी स्त्रियों से सेवित था। सुदामा सोचने लगा — यह क्या है? यह किसका स्थान है? और यह इस प्रकार कैसे हुआ?

श्लोक 24 (bhagavata.10.81.24)

एवं मीमांसमानं तं नरा नार्योऽमरप्रभाः । प्रत्यगृह्णन् महाभागं गीतवाद्येन भूयसा ॥ २४ ॥

evaṁ mīmāṁsamānaṁ taṁ narā nāryo ’mara-prabhāḥ pratyagṛhṇan mahā-bhāgaṁ gīta-vādyena bhūyasā

इस प्रकार सोच-विचार करते हुए उस परम भाग्यशाली सुदामा का, देवताओं के समान कान्तिमान पुरुषों और स्त्रियों ने अत्यधिक गीत-वाद्य के साथ स्वागत किया।

श्लोक 25 (bhagavata.10.81.25)

पतिमागतमाकर्ण्य पत्न्युद्धर्षातिसम्भ्रमा । निश्चक्राम गृहात्तूर्णं रूपिणी श्रीरिवालयात् ॥ २५ ॥

patim āgatam ākarṇya patny uddharṣāti-sambhramā niścakrāma gṛhāt tūrṇaṁ rūpiṇī śrīr ivālayāt

पति के आगमन का समाचार सुनकर उसकी पत्नी अत्यंत हर्ष और उत्सुकता से भरकर घर से शीघ्र बाहर निकली, मानो साक्षात् लक्ष्मी अपने निवास से बाहर आ रही हों।

श्लोक 26 (bhagavata.10.81.26)

पतिव्रता पतिं दृष्ट्वा प्रेमोत्कण्ठाश्रुलोचना । मीलिताक्ष्यनमद्बुद्ध्या मनसा परिषस्वजे ॥ २६ ॥

pati-vratā patiṁ dṛṣṭvā premotkaṇṭhāśru-locanā mīlitākṣy anamad buddhyā manasā pariṣasvaje

अपने पति को देखते ही उस पतिव्रता स्त्री के नेत्र प्रेम और उत्कण्ठा के आँसुओं से भर गए। आँखें मूँदकर वह विनम्रतापूर्वक झुकी और मन ही मन उसने पति का आलिंगन किया।

श्लोक 27 (bhagavata.10.81.27)

पत्नीं वीक्ष्य विस्फुरन्तीं देवीं वैमानिकीमिव । दासीनां निष्ककण्ठीनां मध्ये भान्तीं स विस्मितः ॥ २७ ॥

patnīṁ vīkṣya visphurantīṁ devīṁ vaimānikīm iva dāsīnāṁ niṣka-kaṇṭhīnāṁ madhye bhāntīṁ sa vismitaḥ

अपनी पत्नी को स्वर्ण-हारों से सुसज्जित दासियों के मध्य किसी विमान पर विराजमान देवी के समान देदीप्यमान देखकर सुदामा चकित रह गया।

श्लोक 28 (bhagavata.10.81.28)

प्रीतः स्वयं तया युक्तः प्रविष्टो निजमन्दिरम् । मणिस्तम्भशतोपेतं महेन्द्रभवनं यथा ॥ २८ ॥

prītaḥ svayaṁ tayā yuktaḥ praviṣṭo nija-mandiram maṇi-stambha-śatopetaṁ mahendra-bhavanaṁ yathā

वह प्रसन्नतापूर्वक अपनी पत्नी के साथ अपने ही महल में प्रविष्ट हुआ, जो सैकड़ों मणिजड़ित स्तम्भों से सुशोभित होकर देवराज इन्द्र के भवन के समान प्रतीत हो रहा था।

श्लोक 29 (bhagavata.10.81.29)

पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः । पर्यङ्का हेमदण्डानि चामरव्यजनानि च ॥ २९ ॥

payaḥ-phena-nibhāḥ śayyā dāntā rukma-paricchadāḥ paryaṅkā hema-daṇḍāni cāmara-vyajanāni ca

वहाँ दूध के झाग के समान श्वेत शय्याएँ थीं, जो हाथीदाँत से बनी और सोने से सज्जित थीं; स्वर्णदण्डयुक्त पलंग और चँवर के पंखे भी वहाँ रखे थे।

श्लोक 30 (bhagavata.10.81.30)

आसनानि च हैमानि मृदूपस्तरणानि च । मुक्तादामविलम्बीनि वितानानि द्युमन्ति च ॥ ३० ॥

āsanāni ca haimāni mṛdūpastaraṇāni ca muktādāma-vilambīni vitānāni dyumanti ca

वहाँ सोने के आसन थे, जिन पर मुलायम गद्दे बिछे थे, तथा मोतियों की लड़ियों से लटकते हुए तेजोमय वितान (चँदोवे) भी लगे थे।

श्लोक 31 (bhagavata.10.81.31)

स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च । रत्नदीपान् भ्राजमानान् ललनारत्नसंयुताः ॥ ३१ ॥

svaccha-sphaṭika-kuḍyeṣu mahā-mārakateṣu ca ratna-dīpān bhrājamānān lalanā ratna-saṁyutāḥ

स्वच्छ स्फटिक तथा विशाल मरकत मणियों से जड़ी दीवारों पर देदीप्यमान रत्नदीप जल रहे थे, और मणि-आभूषणों से अलंकृत सुन्दरियाँ वहाँ उपस्थित थीं।

श्लोक 32 (bhagavata.10.81.32)

विलोक्य ब्राह्मणस्तत्र समृद्धीः सर्वसम्पदाम् । तर्कयामास निर्व्यग्रः स्वसमृद्धिमहैतुकीम् ॥ ३२ ॥

vilokya brāhmaṇas tatra samṛddhīḥ sarva-sampadām tarkayām āsa nirvyagraḥ sva-samṛddhim ahaitukīm

वहाँ की समस्त सम्पदाओं की समृद्धि देखकर वह ब्राह्मण अविचलित रहा और अपनी इस अकारण समृद्धि के विषय में चिंतन करने लगा।

श्लोक 33 (bhagavata.10.81.33)

नूनं बतैतन्मम दुर्भगस्य शश्वद्दरिद्रस्य समृद्धिहेतुः । महाविभूतेरवलोकतोऽन्यो नैवोपपद्येत यदूत्तमस्य ॥ ३३ ॥

nūnaṁ bataitan mama durbhagasya śaśvad daridrasya samṛddhi-hetuḥ mahā-vibhūter avalokato ’nyo naivopapadyeta yadūttamasya

सुदामा ने सोचा — निश्चय ही मुझ अभागे और सदा दरिद्र रहने वाले की इस समृद्धि का कोई अन्य कारण नहीं हो सकता, सिवाय इसके कि यदुवंश-श्रेष्ठ उन महाविभूतिशाली भगवान की कृपादृष्टि मुझ पर पड़ी हो।

श्लोक 34 (bhagavata.10.81.34)

नन्वब्रुवाणो दिशते समक्षं याचिष्णवे भूर्यपि भूरिभोजः । पर्जन्यवत्तत् स्वयमीक्षमाणो दाशार्हकाणामृषभः सखा मे ॥ ३४ ॥

nanv abruvāṇo diśate samakṣaṁ yāciṣṇave bhūry api bhūri-bhojaḥ parjanya-vat tat svayam īkṣamāṇo dāśārhakāṇām ṛṣabhaḥ sakhā me

मेरे मित्र, दाशार्हकुल के श्रेष्ठ, समस्त ऐश्वर्य के भोक्ता भगवान, स्वयं ही यह देखते हुए कि मैं याचना करने का इच्छुक हूँ, बिना कुछ कहे ही मुझे प्रत्यक्ष में बहुत कुछ प्रदान कर देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे मेघ स्वयं वर्षा करता है।

श्लोक 35 (bhagavata.10.81.35)

किञ्चित्करोत्युर्वपि यत् स्वदत्तं सुहृत्कृतं फल्ग्वपि भूरिकारी । मयोपनीतं पृथुकैकमुष्टिं प्रत्यग्रहीत् प्रीतियुतो महात्मा ॥ ३५ ॥

kiñcit karoty urv api yat sva-dattaṁ suhṛt-kṛtaṁ phalgv api bhūri-kārī mayopaṇītaṁ pṛthukaika-muṣṭiṁ pratyagrahīt prīti-yuto mahātmā

वे महात्मा भगवान अपने द्वारा दी गई बड़ी से बड़ी वस्तु को भी थोड़ा मानते हैं, किंतु अपने मित्र द्वारा की गई एक छोटी सी सेवा को भी बहुत बड़ा मान लेते हैं। इसीलिए उन्होंने मेरे द्वारा लाई गई चिपटे चावल की एक मुट्ठी को भी प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया।

श्लोक 36 (bhagavata.10.81.36)

तस्यैव मे सौहृदसख्यमैत्री दास्यं पुनर्जन्मनि जन्मनि स्यात् । महानुभावेन गुणालयेन विषज्जतस्तत्पुरुषप्रसङ्गः ॥ ३६ ॥

tasyaiva me sauhṛda-sakhya-maitrī- dāsyaṁ punar janmani janmani syāt mahānubhāvena guṇālayena viṣajjatas tat-puruṣa-prasaṅgaḥ

उन्हीं महानुभाव, समस्त गुणों के आगार भगवान के प्रति मेरा स्नेह, सख्य, मैत्री और सेवाभाव जन्म-जन्मान्तर तक बना रहे, और उनके भक्तों की संगति में आसक्ति सदा बनी रहे।

श्लोक 37 (bhagavata.10.81.37)

भक्ताय चित्रा भगवान् हि सम्पदो राज्यं विभूतीर्न समर्थयत्यजः । अदीर्घबोधाय विचक्षणः स्वयं पश्यन् निपातं धनिनां मदोद्भवम् ॥ ३७ ॥

bhaktāya citrā bhagavān hi sampado rājyaṁ vibhūtīr na samarthayaty ajaḥ adīrgha-bodhāya vicakṣaṇaḥ svayaṁ paśyan nipātaṁ dhanināṁ madodbhavam

अजन्मा भगवान अपने उस भक्त को, जिसकी बुद्धि अभी परिपक्व नहीं हुई, विविध प्रकार की सम्पदाएँ, राज्य और ऐश्वर्य प्रदान नहीं करते, क्योंकि वे सर्वज्ञ स्वयं यह भली-भाँति देखते हैं कि धनवानों का पतन प्रायः उनके अहंकार के मद से ही होता है।

श्लोक 38 (bhagavata.10.81.38)

इत्थं व्यवसितो बुद्ध्या भक्तोऽतीव जनार्दने । विषयान् जायया त्यक्ष्यन्बुभुजे नातिलम्पटः ॥ ३८ ॥

itthaṁ vyavasito buddhyā bhakto ’tīva janārdane viṣayān jāyayā tyakṣyan bubhuje nāti-lampaṭaḥ

शुकदेव ने आगे कहा — इस प्रकार अपनी बुद्धि से यह निश्चय करके वह ब्राह्मण भगवान जनार्दन के प्रति अत्यंत भक्तिभाव रखने वाला बना रहा। वह लोभरहित होकर अपनी पत्नी के साथ प्राप्त भोगों का उपभोग तो करता रहा, किंतु सदैव उन्हें त्याग देने की भावना रखता था।

श्लोक 39 (bhagavata.10.81.39)

तस्य वै देवदेवस्य हरेर्यज्ञपतेः प्रभोः । ब्राह्मणाः प्रभवो दैवं न तेभ्यो विद्यते परम् ॥ ३९ ॥

tasya vai deva-devasya harer yajña-pateḥ prabhoḥ brāhmaṇāḥ prabhavo daivaṁ na tebhyo vidyate param

वे भगवान हरि देवताओं के भी देवता, समस्त यज्ञों के स्वामी और सर्वशक्तिमान प्रभु हैं, फिर भी वे ब्राह्मणों को अपना स्वामी मानते हैं; अतः ब्राह्मणों से बढ़कर कोई देवता नहीं है।

श्लोक 40 (bhagavata.10.81.40)

एवं स विप्रो भगवत्सुहृत्तदा दृष्ट्वा स्वभृत्यैरजितं पराजितम् । तद्ध्यानवेगोद्ग्रथितात्मबन्धन- स्तद्धाम लेभेऽचिरतः सतां गतिम् ॥ ४० ॥

evaṁ sa vipro bhagavat-suhṛt tadā dṛṣṭvā sva-bhṛtyair ajitaṁ parājitam tad-dhyāna-vegodgrathitātma-bandhanas tad-dhāma lebhe ’cirataḥ satāṁ gatim

इस प्रकार भगवान के उस ब्राह्मण मित्र सुदामा ने यह देखकर कि अजेय भगवान भी अपने भक्तों द्वारा पराजित हो जाते हैं, उनके निरंतर ध्यान के वेग से अपने हृदय के समस्त बंधनों को कट जाने का अनुभव किया, और शीघ्र ही उन्होंने भगवान के उस परम धाम को प्राप्त कर लिया, जो सज्जनों की परम गति है।

श्लोक 41 (bhagavata.10.81.41)

एतद् ब्रह्मण्यदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मण्यतां नरः । लब्धभावो भगवति कर्मबन्धाद् विमुच्यते ॥ ४१ ॥

etad brahmaṇya-devasya śrutvā brahmaṇyatāṁ naraḥ labdha-bhāvo bhagavati karma-bandhād vimucyate

ब्राह्मणों के हितैषी भगवान की यह ब्राह्मण-भक्ति की कथा सुनकर जो मनुष्य भगवान के प्रति भाव प्राप्त कर लेता है, वह कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82