दशम स्कन्ध · अध्याय 82
कृष्ण और बलराम का वृन्दावनवासियों से मिलन
श्लोक 1 (bhagavata.10.82.1)
श्रीशुक उवाच अथैकदा द्वारवत्यां वसतो रामकृष्णयोः । सूर्योपरागः सुमहानासीत् कल्पक्षये यथा ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca athaikadā dvāravatyāṁ vasato rāma-kṛṣṇayoḥ sūryoparāgaḥ su-mahān āsīt kalpa-kṣaye yathā
शुकदेव ने कहा — एक बार जब बलराम और कृष्ण द्वारका में निवास कर रहे थे, तब सूर्य का एक महान ग्रहण लगा, मानो कल्प के अंत का समय आ गया हो।
श्लोक 2 (bhagavata.10.82.2)
तं ज्ञात्वा मनुजा राजन् पुरस्तादेव सर्वतः । समन्तपञ्चकं क्षेत्रं ययुः श्रेयोविधित्सया ॥ २ ॥
taṁ jñātvā manujā rājan purastād eva sarvataḥ samanta-pañcakaṁ kṣetraṁ yayuḥ śreyo-vidhitsayā
हे राजन्! उस ग्रहण के विषय में पहले से जानकर लोग चारों ओर से पुण्य अर्जित करने की इच्छा से समन्तपञ्चक नामक पवित्र क्षेत्र की ओर गए।
श्लोक 3 (bhagavata.10.82.3)
निःक्षत्रियां महीं कुर्वन् रामः शस्त्रभृतां वरः । नृपाणां रुधिरौघेण यत्र चक्रे महाह्रदान् ॥ ३ ॥
niḥkṣatriyāṁ mahīṁ kurvan rāmaḥ śastra-bhṛtāṁ varaḥ nṛpāṇāṁ rudhiraugheṇa yatra cakre mahā-hradān
शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भगवान परशुराम ने वहीं पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करते हुए राजाओं के रक्त की धाराओं से विशाल सरोवर बना दिए थे।
श्लोक 4 (bhagavata.10.82.4)
ईजे च भगवान् रामो यत्रास्पृष्टोऽपि कर्मणा । लोकं सङ्ग्राहयन्नीशो यथान्योऽघापनुत्तये ॥ ४ ॥
īje ca bhagavān rāmo yatrāspṛṣṭo ’pi karmaṇā lokaṁ saṅgrāhayann īśo yathānyo ’ghāpanuttaye
भगवान परशुराम कर्मों के फल से सर्वथा अस्पृष्ट होते हुए भी, सामान्य लोगों को शिक्षा देने के लिए, मानो किसी साधारण पुरुष के समान पापों से मुक्त होने हेतु, उन्होंने वहीं यज्ञ किया।
श्लोक 5 (bhagavata.10.82.5)
महत्यां तीर्थयात्रायां तत्रागन् भारतीः प्रजाः । वृष्णयश्च तथाक्रूरवसुदेवाहुकादयः ॥ ५ ॥
mahatyāṁ tīrtha-yātrāyāṁ tatrāgan bhāratīḥ prajāḥ vṛṣṇayaś ca tathākrūra- vasudevāhukādayaḥ
उस महान तीर्थयात्रा में भारतवर्ष की समस्त प्रजा वहाँ पहुँची, और उनके साथ वृष्णिवंशी, अक्रूर, वसुदेव, आहुक आदि भी वहाँ आए।
श्लोक 6 (bhagavata.10.82.6)
ययुर्भारत तत् क्षेत्रं स्वमघं क्षपयिष्णवः । गदप्रद्युम्नसाम्बाद्याः सुचन्द्रशुकसारणैः । आस्तेऽनिरुद्धो रक्षायां कृतवर्मा च यूथपः ॥ ६ ॥
yayur bhārata tat kṣetraṁ svam aghaṁ kṣapayiṣṇavaḥ gada-pradyumna-sāmbādyāḥ sucandra-śuka-sāraṇaiḥ āste ’niruddho rakṣāyāṁ kṛtavarmā ca yūtha-paḥ
हे भरतवंशी! अपने पापों का क्षय करने की इच्छा से गद, प्रद्युम्न, साम्ब आदि भी उस क्षेत्र में गए। सुचन्द्र, शुक और सारण के साथ अनिरुद्ध तथा सेनापति कृतवर्मा द्वारका की रक्षा हेतु वहीं रह गए।
श्लोक 7 (bhagavata.10.82.7)
ते रथैर्देवधिष्ण्याभैर्हयैश्च तरलप्लवैः । गजैर्नदद्भिरभ्राभैर्नृभिर्विद्याधरद्युभिः ॥ ७ ॥
te rathair deva-dhiṣṇyābhair hayaiś ca tarala-plavaiḥ gajair nadadbhir abhrābhair nṛbhir vidyādhara-dyubhiḥ
वे यादव देवताओं के विमानों के समान चमकते रथों पर, वेगवान अश्वों पर, गरजते हुए बादलों के समान विशाल हाथियों पर तथा विद्याधरों के समान तेजस्वी पैदल सैनिकों के साथ चल रहे थे।
श्लोक 8 (bhagavata.10.82.8)
व्यरोचन्त महातेजाः पथि काञ्चनमालिनः । दिव्यस्रग्वस्त्रसन्नाहाः कलत्रैः खेचरा इव ॥ ८ ॥
vyarocanta mahā-tejāḥ pathi kāñcana-mālinaḥ divya-srag-vastra-sannāhāḥ kalatraiḥ khe-carā iva
स्वर्ण-हारों से सुसज्जित, अत्यंत तेजस्वी वे यादव दिव्य पुष्पमालाओं, वस्त्रों और कवचों से युक्त होकर अपनी पत्नियों के साथ मार्ग में ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो आकाशचारी देवता हों।
श्लोक 9 (bhagavata.10.82.9)
तत्र स्नात्वा महाभागा उपोष्य सुसमाहिताः । ब्राह्मणेभ्यो ददुर्धेनूर्वासःस्रग्रुक्ममालिनीः ॥ ९ ॥
tatra snātvā mahā-bhāgā upoṣya su-samāhitāḥ brāhmaṇebhyo dadur dhenūr vāsaḥ-srag-rukma-mālinīḥ
उस पवित्र स्थान पर स्नान और एकाग्रचित्त होकर उपवास करने के बाद उन परम भाग्यशाली यादवों ने ब्राह्मणों को वस्त्र, पुष्पमाला और स्वर्णहार से सुसज्जित गौएँ दान कीं।
श्लोक 10 (bhagavata.10.82.10)
रामह्रदेषु विधिवत् पुनराप्लुत्य वृष्णयः । ददुः स्वन्नं द्विजाग्र्येभ्यः कृष्णे नो भक्तिरस्त्विति ॥ १० ॥
rāma-hradeṣu vidhi-vat punar āplutya vṛṣṇayaḥ daduḥ sv-annaṁ dvijāgryebhyaḥ kṛṣṇe no bhaktir astv iti
वृष्णिवंशियों ने विधिपूर्वक परशुराम के उन सरोवरों में पुनः स्नान किया और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उत्तम भोजन कराया, यह प्रार्थना करते हुए — कृष्ण के प्रति हमारी भक्ति सदा बनी रहे।
श्लोक 11 (bhagavata.10.82.11)
स्वयं च तदनुज्ञाता वृष्णयः कृष्णदेवताः । भुक्त्वोपविविशुः कामं स्निग्धच्छायाङ्घ्रिपाङ्घ्रिषु ॥ ११ ॥
svayaṁ ca tad-anujñātā vṛṣṇayaḥ kṛṣṇa-devatāḥ bhuktvopaviviśuḥ kāmaṁ snigdha-cchāyāṅghripāṅghriṣu
तत्पश्चात् कृष्ण को ही अपना आराध्य मानने वाले वृष्णिवंशी उन्हीं की अनुमति से भोजन करके शीतल छाया देने वाले वृक्षों की जड़ों में सुखपूर्वक बैठ गए।
श्लोक 12 (bhagavata.10.82.12)
तत्रागतांस्ते ददृशुः सुहृत्सम्बन्धिनो नृपान् । मत्स्योशीनरकौशल्यविदर्भकुरुसृञ्जयान् । काम्बोजकैकयान् मद्रान् कुन्तीनानर्तकेरलान् ॥ १२ ॥
tatrāgatāṁs te dadṛśuḥ suhṛt-sambandhino nṛpān matsyośīnara-kauśalya- vidarbha-kuru-sṛñjayān kāmboja-kaikayān madrān kuntīn ānarta-keralān
वहाँ उन्होंने आए हुए अपने मित्र और सम्बन्धी राजाओं को देखा — मत्स्य, उशीनर, कौशल्य, विदर्भ, कुरु, सृञ्जय, काम्बोज, कैकय, मद्र, कुन्ती तथा आनर्त और केरल देश के राजाओं को।
श्लोक 13 (bhagavata.10.82.13)
अन्यांश्चैवात्मपक्षीयान् परांश्च शतशो नृप । नन्दादीन्सुहृदो गोपान्गोपीश्चोत्कण्ठिताश्चिरम् ॥ १३ ॥
anyāṁś caivātma-pakṣīyān parāṁś ca śataśo nṛpa nandādīn suhṛdo gopān gopīś cotkaṇṭhitāś ciram
हे राजन्! उन्होंने अपने पक्ष के अन्य सैकड़ों राजाओं को तथा विरोधी पक्ष के राजाओं को भी देखा, और साथ ही अपने प्रिय मित्र नन्द आदि गोपों तथा चिरकाल से उत्कण्ठित गोपियों को भी देखा।
श्लोक 14 (bhagavata.10.82.14)
अन्योन्यसन्दर्शनहर्षरंहसा प्रोत्फुल्लहृद्वक्त्रसरोरुहश्रियः । आश्लिष्य गाढं नयनैः स्रवज्जला हृष्यत्त्वचो रुद्धगिरो ययुर्मुदम् ॥ १४ ॥
anyonya-sandarśana-harṣa-raṁhasā protphulla-hṛd-vaktra-saroruha-śriyaḥ āśliṣya gāḍhaṁ nayanaiḥ sravaj-jalā hṛṣyat-tvaco ruddha-giro yayur mudam
एक-दूसरे को देखने के हर्षावेग से उनके हृदय और मुखकमल खिल उठे। वे प्रगाढ़ आलिंगन में बंध गए, उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे, रोमांच हो आया और गला भर आने से वे कुछ कह न सके — इस प्रकार वे परम आनन्द को प्राप्त हुए।
श्लोक 15 (bhagavata.10.82.15)
स्त्रियश्च संवीक्ष्य मिथोऽतिसौहृद- स्मितामलापाङ्गदृशोऽभिरेभिरे । स्तनैः स्तनान् कुङ्कुमपङ्करूषितान् निहत्य दोर्भिः प्रणयाश्रुलोचनाः ॥ १५ ॥
striyaś ca saṁvīkṣya mitho ’ti-sauhṛda- smitāmalāpāṅga-dṛśo ’bhirebhire stanaiḥ stanān kuṅkuma-paṅka-rūṣitān nihatya dorbhiḥ praṇayāśru-locanāḥ
स्त्रियाँ भी एक-दूसरे को देखकर अत्यंत स्नेहपूर्ण, निर्मल मुस्कान भरी तिरछी दृष्टि से निहारने लगीं और परस्पर आलिंगन करने लगीं, कुंकुम-चर्चित अपने स्तनों को एक-दूसरे के स्तनों से स्पर्श कराती हुईं, अपनी भुजाओं से जकड़ती हुईं, और उनके नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर गए।
श्लोक 16 (bhagavata.10.82.16)
ततोऽभिवाद्य ते वृद्धान् यविष्ठैरभिवादिताः । स्वागतं कुशलं पृष्ट्वा चक्रुः कृष्णकथा मिथः ॥ १६ ॥
tato ’bhivādya te vṛddhān yaviṣṭhair abhivāditāḥ sv-āgataṁ kuśalaṁ pṛṣṭvā cakruḥ kṛṣṇa-kathā mithaḥ
तत्पश्चात् उन्होंने अपने वृद्धजनों को प्रणाम किया और युवाओं ने उन्हें प्रणाम किया। सबका स्वागत और कुशल-क्षेम पूछने के बाद वे परस्पर कृष्ण-कथा करने लगे।
श्लोक 17 (bhagavata.10.82.17)
पृथा भ्रातॄन् स्वसॄर्वीक्ष्य तत्पुत्रान् पितरावपि । भ्रातृपत्नीर्मुकुन्दं च जहौ सङ्कथया शुचः ॥ १७ ॥
pṛthā bhrātṝn svasṝr vīkṣya tat-putrān pitarāv api bhrātṛ-patnīr mukundaṁ ca jahau saṅkathayā śucaḥ
पृथा (कुन्ती) ने अपने भाइयों, बहनों, उनके पुत्रों, अपने माता-पिता, भाइयों की पत्नियों और भगवान मुकुन्द को देखा; उनसे बातें करते हुए उसने अपना समस्त शोक त्याग दिया।
श्लोक 18 (bhagavata.10.82.18)
कुन्त्युवाच आर्य भ्रातरहं मन्ये आत्मानमकृताशिषम् । यद् वा आपत्सु मद्वार्तां नानुस्मरथ सत्तमाः ॥ १८ ॥
kunty uvāca ārya bhrātar ahaṁ manye ātmānam akṛtāśiṣam yad vā āpatsu mad-vārtāṁ nānusmaratha sattamāḥ
कुन्ती ने कहा — हे आर्य भ्राता! मैं अपने आप को अभागिनी मानती हूँ, क्योंकि आप सब परम साधुजन होते हुए भी मेरी विपत्तियों के समय मेरा स्मरण नहीं करते थे।
श्लोक 19 (bhagavata.10.82.19)
सुहृदो ज्ञातयः पुत्रा भ्रातरः पितरावपि । नानुस्मरन्ति स्वजनं यस्य दैवमदक्षिणम् ॥ १९ ॥
suhṛdo jñātayaḥ putrā bhrātaraḥ pitarāv api nānusmaranti sva-janaṁ yasya daivam adakṣiṇam
जिस व्यक्ति पर विधाता प्रतिकूल हो जाता है, उसे मित्र, सम्बन्धी, पुत्र, भाई और यहाँ तक कि माता-पिता भी स्मरण नहीं करते।
श्लोक 20 (bhagavata.10.82.20)
श्रीवसुदेव उवाच अम्ब मास्मानसूयेथा दैवक्रीडनकान् नरान् । ईशस्य हि वशे लोकः कुरुते कार्यतेऽथ वा ॥ २० ॥
śrī-vasudeva uvāca amba māsmān asūyethā daiva-krīḍanakān narān īśasya hi vaśe lokaḥ kurute kāryate ’tha vā
श्री वसुदेव ने कहा — हे बहन! हम पर, जो कि दैव के हाथों की कठपुतली मात्र हैं, क्रोध मत करो। यह संसार तो ईश्वर के ही वश में है, चाहे वह स्वयं कुछ करे अथवा दूसरों से करवाए।
श्लोक 21 (bhagavata.10.82.21)
कंसप्रतापिताः सर्वे वयं याता दिशं दिशम् । एतर्ह्येव पुनः स्थानं दैवेनासादिताः स्वसः ॥ २१ ॥
kaṁsa-pratāpitāḥ sarve vayaṁ yātā diśaṁ diśam etarhy eva punaḥ sthānaṁ daivenāsāditāḥ svasaḥ
हे बहन! कंस द्वारा सताए जाने पर हम सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में भाग गए थे; अब दैव की कृपा से ही हमें फिर से अपने स्थान की प्राप्ति हुई है।
श्लोक 22 (bhagavata.10.82.22)
श्रीशुक उवाच वसुदेवोग्रसेनाद्यैर्यदुभिस्तेऽर्चिता नृपाः । आसन्नच्युतसन्दर्शपरमानन्दनिर्वृताः ॥ २२ ॥
śrī-śuka uvāca vasudevograsenādyair yadubhis te ’rcitā nṛpāḥ āsann acyuta-sandarśa- paramānanda-nirvṛtāḥ
शुकदेव ने कहा — वसुदेव, उग्रसेन आदि यादवों द्वारा सम्मानित होकर वे राजा भगवान अच्युत के दर्शन से परम आनन्द में मग्न हो गए।
श्लोक 23 (bhagavata.10.82.23)
भीष्मो द्रोणोऽम्बिकापुत्रो गान्धारी ससुता तथा । सदाराः पाण्डवाः कुन्ती सञ्जयो विदुरः कृपः ॥ २३ ॥
bhīṣmo droṇo ’mbikā-putro gāndhārī sa-sutā tathā sa-dārāḥ pāṇḍavāḥ kuntī sañjayo viduraḥ kṛpaḥ
भीष्म, द्रोण, अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र, अपने पुत्रों सहित गान्धारी, अपनी पत्नियों सहित पाण्डव, कुन्ती, संजय, विदुर और कृपाचार्य —
श्लोक 24 (bhagavata.10.82.24)
कुन्तीभोजो विराटश्च भीष्मको नग्नजिन्महान् । पुरुजिद्द्रुपदः शल्यो धृष्टकेतुः सकाशिराट् ॥ २४ ॥
kuntībhojo virāṭaś ca bhīṣmako nagnajin mahān purujid drupadaḥ śalyo dhṛṣṭaketuḥ sa kāśi-rāṭ
कुन्तीभोज, विराट, भीष्मक, महान नग्नजित, पुरुजित, द्रुपद, शल्य, धृष्टकेतु तथा काशिराज —
श्लोक 25 (bhagavata.10.82.25)
दमघोषो विशालाक्षो मैथिलो मद्रकेकयौ । युधामन्युः सुशर्मा च ससुता बाह्लिकादयः ॥ २५ ॥
damaghoṣo viśālākṣo maithilo madra-kekayau yudhāmanyuḥ suśarmā ca sa-sutā bāhlikādayaḥ
दमघोष, विशालाक्ष, मिथिलानरेश, मद्र और केकय देश के राजा, युधामन्यु, सुशर्मा तथा अपने पुत्रों सहित बाह्लीक आदि —
श्लोक 26 (bhagavata.10.82.26)
राजानो ये च राजेन्द्र युधिष्ठिरमनुव्रताः । श्रीनिकेतं वपुः शौरेः सस्त्रीकं वीक्ष्य विस्मिताः ॥ २६ ॥
rājāno ye ca rājendra yudhiṣṭhiram anuvratāḥ śrī-niketaṁ vapuḥ śaureḥ sa-strīkaṁ vīkṣya vismitāḥ
हे राजेन्द्र! और भी जो राजा युधिष्ठिर के अनुयायी थे — वे सभी अपनी पत्नियों सहित भगवान कृष्ण के, समस्त शोभा के आगार, दिव्य स्वरूप को देखकर चकित रह गए।
श्लोक 27 (bhagavata.10.82.27)
अथ ते रामकृष्णाभ्यां सम्यक् प्राप्तसमर्हणाः । प्रशशंसुर्मुदा युक्ता वृष्णीन् कृष्णपरिग्रहान् ॥ २७ ॥
atha te rāma-kṛṣṇābhyāṁ samyak prāpta-samarhaṇāḥ praśaśaṁsur mudā yuktā vṛṣṇīn kṛṣṇa-parigrahān
तत्पश्चात् बलराम और कृष्ण द्वारा भलीभाँति सत्कारित होकर वे राजा प्रसन्नतापूर्वक कृष्ण के आत्मीयजन वृष्णिवंशियों की प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 28 (bhagavata.10.82.28)
अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह । यत् पश्यथासकृत् कृष्णं दुर्दर्शमपि योगिनाम् ॥ २८ ॥
aho bhoja-pate yūyaṁ janma-bhājo nṛṇām iha yat paśyathāsakṛt kṛṣṇaṁ durdarśam api yoginām
राजाओं ने कहा — हे भोजराज! मनुष्यों में केवल आप ही लोगों का जन्म सार्थक है, क्योंकि आप निरंतर उन कृष्ण का दर्शन करते हैं जो योगियों के लिए भी दुर्लभ हैं।
श्लोक 29 (bhagavata.10.82.29)
यद्विश्रुतिः श्रुतिनुतेदमलं पुनाति पादावनेजनपयश्च वचश्च शास्त्रम् । भूः कालभर्जितभगापि यदङ्घ्रिपद्म- स्पर्शोत्थशक्तिरभिवर्षति नोऽखिलार्थान् ॥ २९ ॥
yad-viśrutiḥ śruti-nutedam alaṁ punāti pādāvanejana-payaś ca vacaś ca śāstram bhūḥ kāla-bharjita-bhagāpi yad-aṅghri-padma- sparśottha-śaktir abhivarṣati no ’khilārthān
वेदों द्वारा स्तुत उनकी कीर्ति, उनके चरण धोए हुए जल तथा शास्त्ररूप में प्रकट उनकी वाणी — ये तीनों ही इस सम्पूर्ण विश्व को शुद्ध करने में समर्थ हैं। यद्यपि काल ने पृथ्वी के सौभाग्य को नष्ट कर दिया था, तथापि उनके चरणकमलों के स्पर्श से उत्पन्न शक्ति के प्रभाव से वही पृथ्वी अब हम पर समस्त इच्छित वस्तुओं की वर्षा कर रही है।
श्लोक 30 (bhagavata.10.82.30)
तद्दर्शनस्पर्शनानुपथप्रजल्प- शय्यासनाशनसयौनसपिण्डबन्धः । येषां गृहे निरयवर्त्मनि वर्ततां वः स्वर्गापवर्गविरमः स्वयमास विष्णुः ॥ ३० ॥
tad-darśana-sparśanānupatha-prajalpa- śayyāsanāśana-sayauna-sapiṇḍa-bandhaḥ yeṣāṁ gṛhe niraya-vartmani vartatāṁ vaḥ svargāpavarga-viramaḥ svayam āsa viṣṇuḥ
स्वर्ग और मोक्ष दोनों से भी विरत करने वाले वही भगवान विष्णु स्वयं आपके घरों में — जो अन्यथा नरकगामी मार्ग होते हैं — आपके दर्शन, स्पर्श, साथ चलने, वार्तालाप, शयन, आसन, भोजन, वैवाहिक सम्बन्ध और रक्त-सम्बन्ध के बन्धन में आ गए हैं।
श्लोक 31 (bhagavata.10.82.31)
श्रीशुक उवाच नन्दस्तत्र यदून् प्राप्तान् ज्ञात्वा कृष्णपुरोगमान् । तत्रागमद् वृतो गोपैरनःस्थार्थैर्दिदृक्षया ॥ ३१ ॥
śrī-śuka uvāca nandas tatra yadūn prāptān jñātvā kṛṣṇa-purogamān tatrāgamad vṛto gopair anaḥ-sthārthair didṛkṣayā
शुकदेव ने कहा — जब नन्द को यह ज्ञात हुआ कि कृष्ण के नेतृत्व में यादव वहाँ पहुँचे हैं, तो वे उन्हें देखने की इच्छा से गोपों के साथ, अपना सामान बैलगाड़ियों में लादकर, वहाँ गए।
श्लोक 32 (bhagavata.10.82.32)
तं दृष्ट्वा वृष्णयो हृष्टास्तन्वः प्राणमिवोत्थिताः । परिषस्वजिरे गाढं चिरदर्शनकातराः ॥ ३२ ॥
taṁ dṛṣṭvā vṛṣṇayo hṛṣṭās tanvaḥ prāṇam ivotthitāḥ pariṣasvajire gāḍhaṁ cira-darśana-kātarāḥ
नन्द को देखकर वृष्णिवंशी अत्यंत हर्षित हुए, मानो प्राणहीन शरीर में पुनः प्राण आ गए हों। चिरकाल से दर्शन न होने के कारण व्याकुल वे उनसे दृढ़तापूर्वक लिपट गए।
श्लोक 33 (bhagavata.10.82.33)
वसुदेवः परिष्वज्य सम्प्रीतः प्रेमविह्वलः । स्मरन् कंसकृतान् क्लेशान् पुत्रन्यासं च गोकुले ॥ ३३ ॥
vasudevaḥ pariṣvajya samprītaḥ prema-vihvalaḥ smaran kaṁsa-kṛtān kleśān putra-nyāsaṁ ca gokule
वसुदेव ने अत्यंत प्रेमविह्वल होकर नन्द का आलिंगन किया, और उन्हें कंस द्वारा दिए गए कष्टों तथा अपने पुत्रों को गोकुल में सौंपने की उस घटना का स्मरण हो आया।
श्लोक 34 (bhagavata.10.82.34)
कृष्णरामौ परिष्वज्य पितरावभिवाद्य च । न किञ्चनोचतुः प्रेम्णा साश्रुकण्ठौ कुरूद्वह ॥ ३४ ॥
kṛṣṇa-rāmau pariṣvajya pitarāv abhivādya ca na kiñcanocatuḥ premṇā sāśru-kaṇṭhau kurūdvaha
हे कुरुश्रेष्ठ! कृष्ण और बलराम ने अपने पालक माता-पिता का आलिंगन किया और उन्हें प्रणाम किया, किंतु प्रेम के कारण उनके कण्ठ आँसुओं से अवरुद्ध हो गए और वे कुछ भी न कह सके।
श्लोक 35 (bhagavata.10.82.35)
तावात्मासनमारोप्य बाहुभ्यां परिरभ्य च । यशोदा च महाभागा सुतौ विजहतुः शुचः ॥ ३५ ॥
tāv ātmāsanam āropya bāhubhyāṁ parirabhya ca yaśodā ca mahā-bhāgā sutau vijahatuḥ śucaḥ
उन दोनों को अपनी गोद में बिठाकर और अपनी भुजाओं से आलिंगन करके, नन्द और परम भाग्यशाली यशोदा ने अपने इन दोनों पुत्रों को पाकर अपना समस्त शोक त्याग दिया।
श्लोक 36 (bhagavata.10.82.36)
रोहिणी देवकी चाथ परिष्वज्य व्रजेश्वरीम् । स्मरन्त्यौ तत्कृतां मैत्रीं बाष्पकण्ठ्यौ समूचतुः ॥ ३६ ॥
rohiṇī devakī cātha pariṣvajya vrajeśvarīm smarantyau tat-kṛtāṁ maitrīṁ bāṣpa-kaṇṭhyau samūcatuḥ
तत्पश्चात् रोहिणी और देवकी ने व्रज की रानी यशोदा का आलिंगन किया, और उनके द्वारा की गई मित्रता का स्मरण करते हुए, अश्रुपूरित कण्ठ से उनसे यह कहा।
श्लोक 37 (bhagavata.10.82.37)
का विस्मरेत वां मैत्रीमनिवृत्तां व्रजेश्वरि । अवाप्याप्यैन्द्रमैश्वर्यं यस्या नेह प्रतिक्रिया ॥ ३७ ॥
kā vismareta vāṁ maitrīm anivṛttāṁ vrajeśvari avāpyāpy aindram aiśvaryaṁ yasyā neha pratikriyā
उन्होंने कहा — हे व्रजेश्वरी! तुम्हारी और नन्द जी की वह अटूट मित्रता कौन भूल सकता है, जिसका ऋण इन्द्र का ऐश्वर्य पाकर भी इस लोक में चुकाया नहीं जा सकता?
श्लोक 38 (bhagavata.10.82.38)
एतावदृष्टपितरौ युवयोः स्म पित्रोः सम्प्रीणनाभ्युदयपोषणपालनानि । प्राप्योषतुर्भवति पक्ष्म ह यद्वदक्ष्णो- र्न्यस्तावकुत्रचभयौ न सतां परः स्वः ॥ ३८ ॥
etāv adṛṣṭa-pitarau yuvayoḥ sma pitroḥ samprīṇanābhyudaya-poṣaṇa-pālanāni prāpyoṣatur bhavati pakṣma ha yadvad akṣṇor nyastāv akutra ca bhayau na satāṁ paraḥ svaḥ
इन दोनों बालकों ने अपने वास्तविक माता-पिता को देखने से पूर्व ही तुम दोनों से वह समस्त स्नेह, पालन-पोषण और रक्षा प्राप्त की, जो सच्चे माता-पिता देते हैं। जिस प्रकार पलकें नेत्रों की रक्षा करती हैं, उसी प्रकार तुमने इन्हें सुरक्षित रखा, और ये कभी भयभीत नहीं हुए। वास्तव में सज्जनों के लिए न कोई पराया होता है, न कोई अपना।
श्लोक 39 (bhagavata.10.82.39)
श्रीशुक उवाच गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टं यत्प्रेक्षणे दृशिषु पक्ष्मकृतं शपन्ति । दृग्भिर्हृदीकृतमलं परिरभ्य सर्वा- स्तद्भावमापुरपि नित्ययुजां दुरापम् ॥ ३९ ॥
śrī-śuka uvāca gopyaś ca kṛṣṇam upalabhya cirād abhīṣṭaṁ yat-prekṣaṇe dṛśiṣu pakṣma-kṛtaṁ śapanti dṛgbhir hṛdī-kṛtam alaṁ parirabhya sarvās tad-bhāvam āpur api nitya-yujāṁ durāpam
शुकदेव ने कहा — जिन प्रिय कृष्ण को देखते समय गोपियाँ अपनी पलकों की रचना करने वाले को भी कोसती थीं, उन्हीं कृष्ण को चिरकाल के पश्चात् पुनः पाकर उन सभी ने अपने नेत्रों से उन्हें हृदय में बसा लिया, मानो उनका आलिंगन कर लिया हो। इस प्रकार वे उस भावसमाधि को प्राप्त हुईं, जो नित्य योगाभ्यास करने वालों के लिए भी दुर्लभ है।
श्लोक 40 (bhagavata.10.82.40)
भगवांस्तास्तथाभूता विविक्त उपसङ्गतः । आश्लिष्यानामयं पृष्ट्वा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥ ४० ॥
bhagavāṁs tās tathā-bhūtā vivikta upasaṅgataḥ āśliṣyānāmayaṁ pṛṣṭvā prahasann idam abravīt
भगवान ने उन गोपियों को उस अवस्था में देखकर एकांत में उनके पास जाकर उनका आलिंगन किया, उनकी कुशलता पूछी और हँसते हुए यह कहा।
श्लोक 41 (bhagavata.10.82.41)
अपि स्मरथ नः सख्यः स्वानामर्थचिकीर्षया । गतांश्चिरायिताञ्छत्रुपक्षक्षपणचेतसः ॥ ४१ ॥
api smaratha naḥ sakhyaḥ svānām artha-cikīrṣayā gatāṁś cirāyitāñ chatru- pakṣa-kṣapaṇa-cetasaḥ
भगवान ने कहा — हे सखियो! क्या तुम्हें मेरा स्मरण है? मैं अपने स्वजनों के हित के लिए तथा शत्रुपक्ष का विनाश करने के विचार से बहुत काल तक दूर चला गया था।
श्लोक 42 (bhagavata.10.82.42)
अप्यवध्यायथास्मान् स्विदकृतज्ञाविशङ्कया । नूनं भूतानि भगवान् युनक्ति वियुनक्ति च ॥ ४२ ॥
apy avadhyāyathāsmān svid akṛta-jñāviśaṅkayā nūnaṁ bhūtāni bhagavān yunakti viyunakti ca
क्या तुम मुझे कृतघ्न समझकर मेरा तिरस्कार कर रही हो? निश्चय ही भगवान ही समस्त प्राणियों को परस्पर मिलाते और पृथक करते हैं।
श्लोक 43 (bhagavata.10.82.43)
वायुर्यथा घनानीकं तृणं तूलं रजांसि च । संयोज्याक्षिपते भूयस्तथा भूतानि भूतकृत् ॥ ४३ ॥
vāyur yathā ghanānīkaṁ tṛṇaṁ tūlaṁ rajāṁsi ca saṁyojyākṣipate bhūyas tathā bhūtāni bhūta-kṛt
जिस प्रकार वायु बादलों के समूह, तिनकों, रुई और धूलिकणों को एक साथ लाकर फिर बिखेर देती है, उसी प्रकार सृष्टिकर्ता समस्त प्राणियों को परस्पर मिलाकर पुनः बिखेर देते हैं।
श्लोक 44 (bhagavata.10.82.44)
मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते । दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥ ४४ ॥
mayi bhaktir hi bhūtānām amṛtatvāya kalpate diṣṭyā yad āsīn mat-sneho bhavatīnāṁ mad-āpanaḥ
मेरे प्रति भक्ति ही समस्त प्राणियों को अमरत्व प्रदान करने में समर्थ है। सौभाग्य से तुम सबके हृदय में जो मेरे प्रति स्नेह उत्पन्न हुआ, वही तुम्हें मेरी प्राप्ति करा देने वाला है।
श्लोक 45 (bhagavata.10.82.45)
अहं हि सर्वभूतानामादिरन्तोऽन्तरं बहिः । भौतिकानां यथा खं वार्भूर्वायुर्ज्योतिरङ्गनाः ॥ ४५ ॥
ahaṁ hi sarva-bhūtānām ādir anto ’ntaraṁ bahiḥ bhautikānāṁ yathā khaṁ vār bhūr vāyur jyotir aṅganāḥ
हे सखियो! जिस प्रकार आकाश, जल, पृथ्वी, वायु और अग्नि समस्त भौतिक पदार्थों के आदि, अंत तथा भीतर-बाहर व्याप्त रहते हैं, उसी प्रकार मैं ही समस्त प्राणियों का आदि, अंत तथा उनके भीतर-बाहर व्याप्त हूँ।
श्लोक 46 (bhagavata.10.82.46)
एवं ह्येतानि भूतानि भूतेष्वात्मात्मना ततः । उभयं मय्यथ परे पश्यताभातमक्षरे ॥ ४६ ॥
evaṁ hy etāni bhūtāni bhūteṣv ātmātmanā tataḥ ubhayaṁ mayy atha pare paśyatābhātam akṣare
इस प्रकार ये समस्त सृष्ट पदार्थ पंचमहाभूतों में स्थित हैं, और आत्मा अपने ही स्वरूप से उन सबमें व्याप्त रहती है। तुम इन दोनों को — भौतिक सृष्टि और आत्मा को — मुझ अविनाशी परम तत्व में ही प्रकट हुआ देखो।
श्लोक 47 (bhagavata.10.82.47)
श्रीशुक उवाच अध्यात्मशिक्षया गोप्य एवं कृष्णेन शिक्षिताः । तदनुस्मरणध्वस्तजीवकोशास्तमध्यगन् ॥ ४७ ॥
śrī-śuka uvāca adhyātma-śikṣayā gopya evaṁ kṛṣṇena śikṣitāḥ tad-anusmaraṇa-dhvasta- jīva-kośās tam adhyagan
शुकदेव ने कहा — इस प्रकार कृष्ण द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा पाकर गोपियों का जीवभाव (देहाभिमान) उनके निरंतर स्मरण से नष्ट हो गया, और वे उन्हीं को यथार्थ रूप से प्राप्त हुईं।
श्लोक 48 (bhagavata.10.82.48)
आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः । संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥ ४८ ॥
āhuś ca te nalina-nābha padāravindaṁ yogeśvarair hṛdi vicintyam agādha-bodhaiḥ saṁsāra-kūpa-patitottaraṇāvalambaṁ gehaṁ juṣām api manasy udiyāt sadā naḥ
उन्होंने कहा — हे कमलनाभ! आपके वे चरणकमल, जिनका ध्यान गहन ज्ञान से युक्त बड़े-बड़े योगीश्वर भी अपने हृदय में करते हैं, तथा जो संसाररूपी कूप में गिरे हुए प्राणियों के उद्धार का एकमात्र आधार हैं — वे चरणकमल हम गृहस्थी में लगी हुई स्त्रियों के मन में भी सदैव उदित होते रहें।