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दशम स्कन्ध · अध्याय 83

द्रौपदी का कृष्ण की रानियों से मिलन

अध्याय 82अध्याय-सूचीअध्याय 84

श्लोक 1 (bhagavata.10.83.1)

श्रीशुक उवाच तथानुगृह्य भगवान् गोपीनां स गुरुर्गतिः । युधिष्ठिरमथापृच्छत् सर्वांश्च सुहृदोऽव्ययम् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca tathānugṛhya bhagavān gopīnāṁ sa gurur gatiḥ yudhiṣṭhiram athāpṛcchat sarvāṁś ca suhṛdo ’vyayam

शुकदेव ने कहा — गोपियों के गुरु और परम गति स्वयं भगवान ने इस प्रकार उन पर कृपा करने के बाद युधिष्ठिर तथा अपने अन्य सभी अविनाशी मित्रों-सम्बन्धियों से उनका कुशल-क्षेम पूछा।

श्लोक 2 (bhagavata.10.83.2)

त एवं लोकनाथेन परिपृष्टाः सुसत्कृताः । प्रत्यूचुर्हृष्टमनसस्तत्पादेक्षाहतांहसः ॥ २ ॥

ta evaṁ loka-nāthena paripṛṣṭāḥ su-sat-kṛtāḥ pratyūcur hṛṣṭa-manasas tat-pādekṣā-hatāṁhasaḥ

विश्वनाथ भगवान द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर तथा भलीभाँति सत्कारित होकर, उनके चरणों के दर्शनमात्र से समस्त पापों से मुक्त हुए वे सब प्रसन्नचित्त होकर उत्तर देने लगे।

श्लोक 3 (bhagavata.10.83.3)

कुतोऽशिवं त्वच्चरणाम्बुजासवं महन्मनस्तो मुखनिःसृतं क्वचित् । पिबन्ति ये कर्णपुटैरलं प्रभो देहंभृतां देहकृदस्मृतिच्छिदम् ॥ ३ ॥

kuto ’śivaṁ tvac-caraṇāmbujāsavaṁ mahan-manasto mukha-niḥsṛtaṁ kvacit pibanti ye karṇa-puṭair alaṁ prabho dehaṁ-bhṛtāṁ deha-kṛd-asmṛti-cchidam

वे बोले — हे प्रभो! जो लोग आपके चरणकमलों के उस मधु का, जो महापुरुषों के हृदय से निकलकर उनके मुख द्वारा बाहर आता है, अपने कर्णपुटों से भरपूर पान करते हैं — जो देहधारियों के अपने शरीर के स्रष्टा को भूल जाने के दोष को नष्ट कर देता है — उनके लिए भला अमंगल कैसे हो सकता है?

श्लोक 4 (bhagavata.10.83.4)

हि त्वात्मधामविधुतात्मकृतत्र्यवस्था- मानन्दसम्प्लवमखण्डमकुण्ठबोधम् । कालोपसृष्टनिगमावन आत्तयोग- मायाकृतिं परमहंसगतिं नताः स्म ॥ ४ ॥

hi tvātma dhāma-vidhutātma-kṛta-try-avasthām ānanda-samplavam akhaṇḍam akuṇṭha-bodham kālopasṛṣṭa-nigamāvana ātta-yoga- māyākṛtiṁ paramahaṁsa-gatiṁ natāḥ sma

आपके ही धाम के प्रकाश से जीव द्वारा स्वयं रचित तीनों अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) दूर हो जाती हैं, और आपकी कृपा से हम अखण्ड आनन्द तथा अकुण्ठ ज्ञान में निमग्न हो जाते हैं। हे काल द्वारा संकटग्रस्त वेदों के रक्षक! आपने योगमाया द्वारा यह मानव-रूप धारण किया है। हम परमहंसों की उस परम गति को नमस्कार करते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.10.83.5)

श्रीऋषिरुवाच इत्युत्तमःश्लोकशिखामणिं जने- ष्वभिष्टुवत्स्वन्धककौरवस्त्रियः । समेत्य गोविन्दकथा मिथोऽगृणं- स्त्रिलोकगीताः शृणु वर्णयामि ते ॥ ५ ॥

śrī-ṛṣir uvāca ity uttamaḥ-śloka-śikhā-maṇiṁ janeṣv abhiṣṭuvatsv andhaka-kaurava-striyaḥ sametya govinda-kathā mitho ’gṛṇaṁs tri-loka-gītāḥ śṛṇu varṇayāmi te

महर्षि शुकदेव ने कहा — इस प्रकार जब लोग उन सर्वोत्तम कीर्तिमान भगवान की स्तुति कर रहे थे, तब अन्धक और कौरव कुल की स्त्रियाँ आपस में मिलकर गोविन्द की उन कथाओं का वर्णन करने लगीं जो तीनों लोकों में गाई जाती हैं। हे राजन्! सुनो, मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ।

श्लोक 6 (bhagavata.10.83.6)

श्रीद्रौपद्युवाच हे वैदर्भ्यच्युतो भद्रे हे जाम्बवति कौशले । हे सत्यभामे कालिन्दि शैब्ये रोहिणि लक्ष्मणे ॥ ६ ॥

śrī-draupady uvāca he vaidarbhy acyuto bhadre he jāmbavati kauśale he satyabhāme kālindi śaibye rohiṇi lakṣmaṇe

श्री द्रौपदी ने कहा — हे वैदर्भी (रुक्मिणी)! हे कल्याणी भद्रा! हे जाम्बवती! हे कौशल्या (नाग्नजिती)! हे सत्यभामा! हे कालिन्दी! हे शैब्या! हे रोहिणी! हे लक्ष्मणा!

श्लोक 7 (bhagavata.10.83.7)

हे कृष्णपत्न्य एतन्नो ब्रूते वो भगवान् स्वयम् । उपयेमे यथा लोकमनुकुर्वन् स्वमायया ॥ ७ ॥

he kṛṣṇa-patnya etan no brūte vo bhagavān svayam upayeme yathā lokam anukurvan sva-māyayā

हे कृष्ण की पत्नियो! हमें यह बताओ कि भगवान ने स्वयं अपनी माया से लौकिक जनों का अनुकरण करते हुए तुम सबसे किस प्रकार विवाह किया।

श्लोक 8 (bhagavata.10.83.8)

श्रीरुक्मिण्युवाच चैद्याय मार्पयितुमुद्यतकार्मुकेषु राजस्वजेयभटशेखरिताङ्घ्रिरेणुः । निन्ये मृगेन्द्र इव भागमजावियूथात् तच्छ्रीनिकेतचरणोऽस्तु ममार्चनाय ॥ ८ ॥

śrī-rukmiṇy uvāca caidyāya mārpayitum udyata-kārmukeṣu rājasv ajeya-bhaṭa-śekharitāṅghri-reṇuḥ ninye mṛgendra iva bhāgam ajāvi-yūthāt tac-chrī-niketa-caraṇo ’stu mamārcanāya

श्री रुक्मिणी ने कहा — जब मुझे शिशुपाल को सौंपने के लिए राजा लोग धनुष ताने खड़े थे, तब जिनके चरणों की रज को अजेय योद्धा भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं, उन्होंने सिंह के समान मुझे बकरियों और भेड़ों के झुण्ड में से अपना भाग उठा लिया। लक्ष्मी के उन्हीं आश्रयस्वरूप चरणों की पूजा मुझे सदा प्राप्त होती रहे।

श्लोक 9 (bhagavata.10.83.9)

श्रीसत्यभामोवाच यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन भीतः पितादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥

śrī-satyabhāmovāca yo me sanābhi-vadha-tapta-hṛdā tatena liptābhiśāpam apamārṣṭum upājahāra jitvarkṣa-rājam atha ratnam adāt sa tena bhītaḥ pitādiśata māṁ prabhave ’pi dattām

श्री सत्यभामा ने कहा — मेरे पिता का हृदय अपने भाई की मृत्यु से संतप्त होकर कृष्ण पर लगे आरोप से दुखी था। उस कलंक को मिटाने के लिए भगवान ने ऋक्षराज को पराजित कर वह स्यमन्तक मणि ले ली और मेरे पिता को लौटा दी। अपने अपराध से भयभीत होकर मेरे पिता ने मुझे भगवान को समर्पित कर दिया, यद्यपि मैं पहले ही अन्यत्र वचनबद्ध की जा चुकी थी।

श्लोक 10 (bhagavata.10.83.10)

श्रीजाम्बवत्युवाच प्राज्ञाय देहकृदमुं निजनाथदैवं सीतापतिं त्रिनवहान्यमुनाभ्ययुध्यत् । ज्ञात्वा परीक्षित उपाहरदर्हणं मां पादौ प्रगृह्य मणिनाहममुष्य दासी ॥ १० ॥

śrī-jāmbavaty uvāca prājñāya deha-kṛd amuṁ nija-nātha-daivaṁ sītā-patiṁ tri-navahāny amunābhyayudhyat jñātvā parīkṣita upāharad arhaṇaṁ māṁ pādau pragṛhya maṇināham amuṣya dāsī

श्री जाम्बवती ने कहा — मेरे पिता यह न जानते हुए कि यही उनके स्वामी और आराध्य देव, सीतापति भगवान हैं, उनसे सत्ताईस दिनों तक युद्ध करते रहे। जब उन्हें इनकी पहचान का ज्ञान हुआ, तब उन्होंने इनके चरण पकड़कर मुझे तथा वह मणि इन्हें भेंट कर दी। मैं तो इनकी मात्र दासी हूँ।

श्लोक 11 (bhagavata.10.83.11)

श्रीकालिन्द्युवाच तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपादस्पर्शनाशया । सख्योपेत्याग्रहीत् पाणिं योऽहं तद्गृहमार्जनी ॥ ११ ॥

śrī-kālindy uvāca tapaś carantīm ājñāya sva-pāda-sparśanāśayā sakhyopetyāgrahīt pāṇiṁ yo ’haṁ tad-gṛha-mārjanī

श्री कालिन्दी ने कहा — मैं उनके चरणों के स्पर्श की आशा से तपस्या कर रही थी। यह जानकर वे अपने सखा के साथ मेरे पास आए और मेरा पाणिग्रहण किया। अब मैं उन्हीं के घर की झाड़ू लगाने वाली दासी हूँ।

श्लोक 12 (bhagavata.10.83.12)

श्रीमित्रविन्दोवाच यो मां स्वयंवर उपेत्य विजित्य भूपान् निन्ये श्वयूथगमिवात्मबलिं द्विपारिः । भ्रातॄंश्च मेऽपकुरुतः स्वपुरं श्रियौक- स्तस्यास्तु मेऽनुभवमङ्घ्र्यवनेजनत्वम् ॥ १२ ॥

śrī-mitravindovāca yo māṁ svayaṁvara upetya vijitya bhū-pān ninye śva-yūtha-gaṁ ivātma-baliṁ dvipāriḥ bhrātṝṁś ca me ’pakurutaḥ sva-puraṁ śriyaukas tasyāstu me ’nu-bhavam aṅghry-avanejanatvam

श्री मित्रविन्दा ने कहा — मेरे स्वयंवर में आकर, हाथियों के शत्रु सिंह के समान, समस्त राजाओं को — जिनमें मेरे अपमानकारी भाई भी सम्मिलित थे — पराजित कर, वे मुझे अपना भाग समझकर अपनी नगरी ले गए। लक्ष्मी के आश्रय उन्हीं के चरण धोने का सौभाग्य मुझे जन्म-जन्मान्तर प्राप्त होता रहे।

श्लोक 13 (bhagavata.10.83.13)

श्रीसत्योवाच सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्यसुतीक्ष्णशृङ्गान् पित्रा कृतान् क्षितिपवीर्यपरीक्षणाय । तान् वीरदुर्मदहनस्तरसा निगृह्य क्रीडन् बबन्ध ह यथा शिशवोऽजतोकान् ॥ १३ ॥

śrī-satyovāca saptokṣaṇo ’ti-bala-vīrya-su-tīkṣṇa-śṛṅgān pitrā kṛtān kṣitipa-vīrya-parīkṣaṇāya tān vīra-durmada-hanas tarasā nigṛhya krīḍan babandha ha yathā śiśavo ’ja-tokān

श्री सत्या ने कहा — मेरे पिता ने राजाओं का बल परखने के लिए अत्यंत बलवान, तीक्ष्ण सींगों वाले सात बैल तैयार करवाए थे, जिन्होंने अनेक वीरों का अभिमान चूर-चूर कर दिया था। किंतु वीरों के मद को नष्ट करने वाले भगवान ने उन्हें सहज ही वश में कर लिया और खेल-खेल में इस प्रकार बाँध दिया जैसे बालक बकरी के बच्चों को बाँध देते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.10.83.14)

य इत्थं वीर्यशुल्कां मां दासीभिश्चतुरङ्गिणीम् । पथि निर्जित्य राजन्यान् निन्ये तद्दास्यमस्तु मे ॥ १४ ॥

ya itthaṁ vīrya-śulkāṁ māṁ dāsībhiś catur-aṅgiṇīm pathi nirjitya rājanyān ninye tad-dāsyam astu me

इस प्रकार अपने पराक्रम से मुझे प्राप्त कर तथा दासियों और चतुरंगिणी सेना सहित मुझे ले जाते समय मार्ग में विरोध करने वाले राजाओं को पराजित कर वे मुझे अपने नगर ले गए। मुझे उन्हीं की सेवा सदा प्राप्त होती रहे।

श्लोक 15 (bhagavata.10.83.15)

श्रीभद्रोवाच पिता मे मातुलेयाय स्वयमाहूय दत्तवान् । कृष्णे कृष्णाय तच्चित्तामक्षौहिण्या सखीजनैः ॥ १५ ॥

śrī-bhadrovāca pitā me mātuleyāya svayam āhūya dattavān kṛṣṇe kṛṣṇāya tac-cittām akṣauhiṇyā sakhī-janaiḥ

श्री भद्रा ने कहा — मेरे पिता ने स्वयं ही अपने भानजे कृष्ण को आमंत्रित कर, जिनमें मेरा मन पहले से ही रम चुका था, मुझे एक अक्षौहिणी सेना और सखियों सहित उन्हें अर्पित कर दिया।

श्लोक 16 (bhagavata.10.83.16)

अस्य मे पादसंस्पर्शो भवेज्जन्मनि जन्मनि । कर्मभिर्भ्राम्यमाणाया येन तच्छ्रेय आत्मनः ॥ १६ ॥

asya me pāda-saṁsparśo bhavej janmani janmani karmabhir bhrāmyamāṇāyā yena tac chreya ātmanaḥ

मेरे कर्मों के कारण संसार में भटकते हुए मुझे जन्म-जन्मान्तर उन्हीं के चरणों का स्पर्श प्राप्त होता रहे, क्योंकि उसी में मेरी आत्मा का परम कल्याण है।

श्लोक 17 (bhagavata.10.83.17)

श्रीलक्ष्मणोवाच ममापि राज्ञ्यच्युतजन्मकर्म श्रुत्वा मुहुर्नारदगीतमास ह । चित्तं मुकुन्दे किल पद्महस्तया वृतः सुसम्मृश्य विहाय लोकपान् ॥ १७ ॥

śrī-lakṣmaṇovāca mamāpi rājñy acyuta-janma-karma śrutvā muhur nārada-gītam āsa ha cittaṁ mukunde kila padma-hastayā vṛtaḥ su-sammṛśya vihāya loka-pān

श्री लक्ष्मणा ने कहा — हे रानी! नारद मुनि द्वारा बार-बार गाए गए भगवान अच्युत के जन्म और कर्मों को सुनकर मेरा मन भी मुकुन्द में आसक्त हो गया। सुना है कि पद्महस्ता लक्ष्मी ने भी भलीभाँति विचार करके, बड़े-बड़े लोकपालों को त्यागकर, इन्हीं को अपना पति चुना था।

श्लोक 18 (bhagavata.10.83.18)

ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवत्सलः । बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायमचीकरत् ॥ १८ ॥

jñātvā mama mataṁ sādhvi pitā duhitṛ-vatsalaḥ bṛhatsena iti khyātas tatropāyam acīkarat

हे साध्वी! मेरा यह मनोभाव जानकर पुत्री-वत्सल मेरे पिता, जो बृहत्सेन नाम से विख्यात थे, उन्होंने इसे पूर्ण करने का उपाय किया।

श्लोक 19 (bhagavata.10.83.19)

यथा स्वयंवरे राज्ञि मत्स्यः पार्थेप्सया कृतः । अयं तु बहिराच्छन्नो दृश्यते स जले परम् ॥ १९ ॥

yathā svayaṁ-vare rājñi matsyaḥ pārthepsayā kṛtaḥ ayaṁ tu bahir ācchanno dṛśyate sa jale param

हे रानी! जिस प्रकार तुम्हारे स्वयंवर में अर्जुन की प्राप्ति के लिए मत्स्य-लक्ष्य रखा गया था, उसी प्रकार मेरे स्वयंवर में भी मत्स्य-लक्ष्य रखा गया था, किंतु वह चारों ओर से ढका हुआ था और केवल जल में उसका प्रतिबिम्ब ही दिखाई देता था।

श्लोक 20 (bhagavata.10.83.20)

श्रुत्वैतत् सर्वतो भूपा आययुर्मत्पितुः पुरम् । सर्वास्त्रशस्त्रतत्त्वज्ञाः सोपाध्यायाः सहस्रशः ॥ २० ॥

śrutvaitat sarvato bhū-pā āyayur mat-pituḥ puram sarvāstra-śastra-tattva-jñāḥ sopādhyāyāḥ sahasraśaḥ

यह सुनकर सभी दिशाओं से शस्त्रास्त्र-विद्या में निपुण सहस्रों राजा अपने-अपने गुरुओं सहित मेरे पिता की नगरी में आए।

श्लोक 21 (bhagavata.10.83.21)

पित्रा सम्पूजिताः सर्वे यथावीर्यं यथावयः । आददुः सशरं चापं वेद्धुं पर्षदि मद्धियः ॥ २१ ॥

pitrā sampūjitāḥ sarve yathā-vīryaṁ yathā-vayaḥ ādaduḥ sa-śaraṁ cāpaṁ veddhuṁ parṣadi mad-dhiyaḥ

मेरे पिता ने उन सबका उनके बल और आयु के अनुसार सम्मान किया। तत्पश्चात् जिनका मन मुझे पाने में लगा था, वे सभा में लक्ष्यभेदन के लिए बाण सहित धनुष उठाने लगे।

श्लोक 22 (bhagavata.10.83.22)

आदाय व्यसृजन् केचित् सज्यं कर्तुमनीश्वराः । आकोष्ठं ज्यां समुत्कृष्य पेतुरेकेऽमुना हताः ॥ २२ ॥

ādāya vyasṛjan kecit sajyaṁ kartum anīśvarāḥ ā-koṣṭhaṁ jyāṁ samutkṛṣya petur eke ’munāhatāḥ

कुछ राजा धनुष उठाकर भी उस पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सके और उसे छोड़ दिया। कुछ ने प्रत्यंचा को धनुष की नोक तक खींचा, किंतु धनुष के वेग से उछलकर वे भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 23 (bhagavata.10.83.23)

सज्यं कृत्वापरे वीरा मागधाम्बष्ठचेदिपाः । भीमो दुर्योधनः कर्णो नाविदंस्तदवस्थितिम् ॥ २३ ॥

sajyaṁ kṛtvāpare vīrā māgadhāmbaṣṭha-cedipāḥ bhīmo duryodhanaḥ karṇo nāvidaṁs tad-avasthitim

मगधराज जरासंध, अम्बष्ठराज, चेदिराज शिशुपाल, भीम, दुर्योधन और कर्ण जैसे कुछ वीरों ने धनुष पर प्रत्यंचा तो चढ़ा ली, किंतु वे लक्ष्य की स्थिति को पहचान न सके।

श्लोक 24 (bhagavata.10.83.24)

मत्स्याभासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा च तदवस्थितिम् । पार्थो यत्तोऽसृजद् बाणं नाच्छिनत् पस्पृशे परम् ॥ २४ ॥

matsyābhāsaṁ jale vīkṣya jñātvā ca tad-avasthitim pārtho yatto ’sṛjad bāṇaṁ nācchinat paspṛśe param

अर्जुन ने जल में मत्स्य के प्रतिबिम्ब को देखकर उसकी स्थिति पहचान ली और सावधानीपूर्वक बाण छोड़ा, किंतु वह लक्ष्य को भेद न सका, केवल उसे स्पर्श मात्र कर सका।

श्लोक 25 (bhagavata.10.83.25)

राजन्येषु निवृत्तेषु भग्नमानेषु मानिषु । भगवान् धनुरादाय सज्यं कृत्वाथ लीलया ॥ २५ ॥

rājanyeṣu nivṛtteṣu bhagna-māneṣu māniṣu bhagavān dhanur ādāya sajyaṁ kṛtvātha līlayā

जब सभी अभिमानी राजाओं का मान भंग होकर वे लक्ष्यभेद से विरत हो गए, तब भगवान ने लीलापूर्वक धनुष उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और बाण संधान किया।

श्लोक 26 (bhagavata.10.83.26)

तस्मिन् सन्धाय विशिखं मत्स्यं वीक्ष्य सकृज्जले । छित्त्वेषुणापातयत्तं सूर्ये चाभिजिति स्थिते ॥ २६ ॥

tasmin sandhāya viśikhaṁ matsyaṁ vīkṣya sakṛj jale chittveṣuṇāpātayat taṁ sūrye cābhijiti sthite

अभिजित नक्षत्र में सूर्य के स्थित रहते हुए, जल में मत्स्य को एक बार देखकर ही उन्होंने बाण से उसे काटकर नीचे गिरा दिया।

श्लोक 27 (bhagavata.10.83.27)

दिवि दुन्दुभयो नेदुर्जयशब्दयुता भुवि । देवाश्च कुसुमासारान् मुमुचुर्हर्षविह्वलाः ॥ २७ ॥

divi dundubhayo nedur jaya-śabda-yutā bhuvi devāś ca kusumāsārān mumucur harṣa-vihvalāḥ

आकाश में नगाड़े बज उठे और पृथ्वी पर जय-जय की ध्वनि गूँज उठी। हर्ष से विह्वल होकर देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की।

श्लोक 28 (bhagavata.10.83.28)

तद् रङ्गमाविशमहं कलनूपुराभ्यां पद्भ्यां प्रगृह्य कनकोज्ज्वलरत्नमालाम् । नूत्ने निवीय परिधाय च कौशिकाग्र्ये सव्रीडहासवदना कवरीधृतस्रक् ॥ २८ ॥

tad raṅgam āviśam ahaṁ kala-nūpurābhyāṁ padbhyāṁ pragṛhya kanakojjvala-ratna-mālām nūtne nivīya paridhāya ca kauśikāgrye sa-vrīḍa-hāsa-vadanā kavarī-dhṛta-srak

उसी क्षण मैं अपने पैरों में मधुर बजते नूपुर पहने, हाथ में स्वर्ण और रत्नों से देदीप्यमान माला लिए, नवीन उत्तम रेशमी वस्त्र धारण किए, लज्जायुक्त मुस्कान लिए तथा केशों में पुष्पमाला संजोए उस रंगभूमि में प्रवेश किया।

श्लोक 29 (bhagavata.10.83.29)

उन्नीय वक्त्रमुरुकुन्तलकुण्डलत्विड् गण्डस्थलं शिशिरहासकटाक्षमोक्षैः । राज्ञो निरीक्ष्य परितः शनकैर्मुरारे- रंसेऽनुरक्तहृदया निदधे स्वमालाम् ॥ २९ ॥

unnīya vaktram uru-kuntala-kuṇḍala-tviḍ- gaṇḍa-sthalaṁ śiśira-hāsa-kaṭākṣa-mokṣaiḥ rājño nirīkṣya paritaḥ śanakair murārer aṁse ’nurakta-hṛdayā nidadhe sva-mālām

अपने घुँघराले केशों और कुण्डलों की चमक से दीप्त गालों वाला अपना मुख ऊपर उठाकर, शीतल मुस्कान भरी तिरछी दृष्टि से मैंने चारों ओर उपस्थित राजाओं को देखा, और फिर हृदय से अनुरक्त होकर धीरे-धीरे अपनी माला मुरारि के कंधे पर डाल दी।

श्लोक 30 (bhagavata.10.83.30)

तावन्मृदङ्गपटहाः शङ्खभेर्यानकादयः । निनेदुर्नटनर्तक्यो ननृतुर्गायका जगुः ॥ ३० ॥

tāvan mṛdaṅga-paṭahāḥ śaṅkha-bhery-ānakādayaḥ ninedur naṭa-nartakyo nanṛtur gāyakā jaguḥ

उसी क्षण मृदंग, पटह, शंख, भेरी, आनक आदि वाद्य बज उठे। नट-नर्तकियाँ नाचने लगीं और गायक गाने लगे।

श्लोक 31 (bhagavata.10.83.31)

एवं वृते भगवति मयेशे नृपयूथपाः । न सेहिरे याज्ञसेनि स्पर्धन्तो हृच्छयातुराः ॥ ३१ ॥

evaṁ vṛte bhagavati mayeśe nṛpa-yūthapāḥ na sehire yājñaseni spardhanto hṛc-chayāturāḥ

हे याज्ञसेनी! इस प्रकार मेरे द्वारा भगवान को अपना पति चुन लिए जाने पर वहाँ उपस्थित प्रमुख राजा इसे सहन न कर सके और काम-पीड़ित होकर परस्पर स्पर्धा करने लगे।

श्लोक 32 (bhagavata.10.83.32)

मां तावद् रथमारोप्य हयरत्नचतुष्टयम् । शार्ङ्गमुद्यम्य सन्नद्धस्तस्थावाजौ चतुर्भुजः ॥ ३२ ॥

māṁ tāvad ratham āropya haya-ratna-catuṣṭayam śārṅgam udyamya sannaddhas tasthāv ājau catur-bhujaḥ

उन्होंने तुरंत मुझे चार उत्तम अश्वों से जुते हुए रथ पर बिठाया और कवच धारण कर, शार्ङ्ग धनुष उठाकर, वे युद्धभूमि में चतुर्भुज रूप में खड़े हो गए।

श्लोक 33 (bhagavata.10.83.33)

दारुकश्चोदयामास काञ्चनोपस्करं रथम् । मिषतां भूभुजां राज्ञि मृगाणां मृगराडिव ॥ ३३ ॥

dārukaś codayām āsa kāñcanopaskaraṁ ratham miṣatāṁ bhū-bhujāṁ rājñi mṛgāṇāṁ mṛga-rāḍ iva

हे रानी! दारुक ने उस स्वर्णजड़ित रथ को हाँका, और सभी राजा असहाय होकर ऐसे देखते रह गए जैसे मृग सिंह को देखते हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.10.83.34)

तेऽन्वसज्जन्त राजन्या निषेद्धुं पथि केचन । संयत्ता उद्धृतेष्वासा ग्रामसिंहा यथा हरिम् ॥ ३४ ॥

te ’nvasajjanta rājanyā niṣeddhuṁ pathi kecana saṁyattā uddhṛteṣv-āsā grāma-siṁhā yathā harim

उनमें से कुछ राजा मार्ग में धनुष उठाकर तैयार होकर उन्हें रोकने के लिए उनके पीछे लग गए, ठीक वैसे ही जैसे गाँव के कुत्ते सिंह के पीछे भौंकते हुए दौड़ते हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.10.83.35)

ते शार्ङ्गच्युतबाणौघैः कृत्तबाह्वङ्घ्रिकन्धराः । निपेतुः प्रधने केचिदेके सन्त्यज्य दुद्रुवुः ॥ ३५ ॥

te śārṅga-cyuta-bāṇaughaiḥ kṛtta-bāhv-aṅghri-kandharāḥ nipetuḥ pradhane kecid eke santyajya dudruvuḥ

भगवान के शार्ङ्ग धनुष से छूटे बाणों की झड़ी से उनकी भुजाएँ, पैर और गर्दनें कट गईं, और वे युद्धभूमि में गिर पड़े; शेष युद्ध छोड़कर भाग खड़े हुए।

श्लोक 36 (bhagavata.10.83.36)

ततः पुरीं यदुपतिरत्यलङ्कृतां रविच्छदध्वजपटचित्रतोरणाम् । कुशस्थलीं दिवि भुवि चाभिसंस्तुतां समाविशत्तरणिरिव स्वकेतनम् ॥ ३६ ॥

tataḥ purīṁ yadu-patir aty-alaṅkṛtāṁ ravi-cchada-dhvaja-paṭa-citra-toraṇām kuśasthalīṁ divi bhuvi cābhisaṁstutāṁ samāviśat taraṇir iva sva-ketanam

तत्पश्चात् यदुपति भगवान उस अत्यंत अलंकृत नगरी कुशस्थली में, जिसकी सूर्य को ढकने वाली पताकाओं और सुन्दर तोरणद्वारों से शोभा बढ़ी हुई थी, तथा जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में प्रशंसित थी, ऐसे प्रविष्ट हुए जैसे सूर्य अपने ही धाम में प्रवेश करता है।

श्लोक 37 (bhagavata.10.83.37)

पिता मे पूजयामास सुहृत्सम्बन्धिबान्धवान् । महार्हवासोऽलङ्कारैः शय्यासनपरिच्छदैः ॥ ३७ ॥

pitā me pūjayām āsa suhṛt-sambandhi-bāndhavān mahārha-vāso-’laṅkāraiḥ śayyāsana-paricchadaiḥ

मेरे पिता ने अपने मित्रों, सम्बन्धियों और बान्धवों को अत्यंत मूल्यवान वस्त्रों, आभूषणों तथा शय्या और आसन आदि की सामग्री से सम्मानित किया।

श्लोक 38 (bhagavata.10.83.38)

दासीभिः सर्वसम्पद्भिर्भटेभरथवाजिभिः । आयुधानि महार्हाणि ददौ पूर्णस्य भक्तितः ॥ ३८ ॥

dāsībhiḥ sarva-sampadbhir bhaṭebha-ratha-vājibhiḥ āyudhāni mahārhāṇi dadau pūrṇasya bhaktitaḥ

उन्होंने भक्तिपूर्वक उन परिपूर्ण भगवान को समस्त सम्पदाओं से युक्त दासियाँ, पैदल सैनिक, हाथी, रथ और अश्व, तथा अत्यंत मूल्यवान अस्त्र-शस्त्र भेंट किए।

श्लोक 39 (bhagavata.10.83.39)

आत्मारामस्य तस्येमा वयं वै गृहदासिकाः । सर्वसङ्गनिवृत्त्याद्धा तपसा च बभूविम ॥ ३९ ॥

ātmārāmasya tasyemā vayaṁ vai gṛha-dāsikāḥ sarva-saṅga-nivṛttyāddhā tapasā ca babhūvima

इस प्रकार समस्त सांसारिक संगति का त्याग करके तथा कठोर तप द्वारा हम सब उन आत्माराम भगवान की गृह-दासियाँ बन गईं।

श्लोक 40 (bhagavata.10.83.40)

महिष्य ऊचुः भौमं निहत्य सगणं युधि तेन रुद्धा ज्ञात्वाथ नः क्षितिजये जितराजकन्याः । निर्मुच्य संसृतिविमोक्षमनुस्मरन्तीः पादाम्बुजं परिणिनाय य आप्तकामः ॥ ४० ॥

mahiṣya ūcuḥ bhaumaṁ nihatya sa-gaṇaṁ yudhi tena ruddhā jñātvātha naḥ kṣiti-jaye jita-rāja-kanyāḥ nirmucya saṁsṛti-vimokṣam anusmarantīḥ pādāmbujaṁ pariṇināya ya āpta-kāmaḥ

रानियों ने कहा — युद्ध में भौमासुर और उसके साथियों का वध कर, हमें बन्दीगृह में पाकर, भगवान ने यह जान लिया कि हम उन राजाओं की कन्याएँ हैं जिन्हें भौम ने अपनी दिग्विजय में पराजित किया था। हमें बन्धनमुक्त कर, और यह देखकर कि हम निरन्तर संसार-बन्धन से मुक्ति देने वाले उन्हीं के चरणकमल का स्मरण कर रही थीं, उन आप्तकाम भगवान ने हम सबका पाणिग्रहण कर लिया।

श्लोक 41 (bhagavata.10.83.41)

न वयं साध्वि साम्राज्यं स्वाराज्यं भौज्यमप्युत । वैराज्यं पारमेष्ठ्यं च आनन्त्यं वा हरेः पदम् ॥ ४१ ॥

na vayaṁ sādhvi sāmrājyaṁ svārājyaṁ bhaujyam apy uta vairājyaṁ pārameṣṭhyaṁ ca ānantyaṁ vā hareḥ padam

हे साध्वी! हमें न तो सम्राट पद चाहिए, न स्वराज्य, न भोग-सामर्थ्य, न विराट पद, न ब्रह्मा का पद, न अमरत्व, और न ही भगवान विष्णु के परमपद की ही अभिलाषा है।

श्लोक 42 (bhagavata.10.83.42)

कामयामह एतस्य श्रीमत्पादरजः श्रियः । कुचकुङ्कुमगन्धाढ्यं मूर्ध्ना वोढुं गदाभृतः ॥ ४२ ॥

kāmayāmaha etasya śrīmat-pāda-rajaḥ śriyaḥ kuca-kuṅkuma-gandhāḍhyaṁ mūrdhnā voḍhuṁ gadā-bhṛtaḥ

हम तो केवल गदाधारी भगवान की उन लक्ष्मी-सेवित चरणरज को, जो उनकी प्रिया के कुचों के कुंकुम की सुगंध से सुवासित है, अपने मस्तक पर धारण करना चाहती हैं।

श्लोक 43 (bhagavata.10.83.43)

व्रजस्त्रियो यद् वाञ्छन्ति पुलिन्द्यस्तृणवीरुधः । गावश्चारयतो गोपाः पदस्पर्शं महात्मनः ॥ ४३ ॥

vraja-striyo yad vāñchanti pulindyas tṛṇa-vīrudhaḥ gāvaś cārayato gopāḥ pada-sparśaṁ mahātmanaḥ

जिस प्रकार व्रज की स्त्रियाँ, वन में रहने वाली पुलिन्द स्त्रियाँ, तथा गौओं को चराने वाले गोप — घास और लताओं तक — उस महात्मा के चरणस्पर्श की कामना करते हैं, वैसी ही कामना हम भी करती हैं।

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