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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10

सृष्टि के विभाग

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (bhagavata.3.10.1)

विदुर उवाच अन्तर्हिते भगवति ब्रह्मा लोकपितामहः । प्रजाः ससर्ज कतिधा दैहिकीर्मानसीर्विभुः ॥ १ ॥

vidura uvāca antarhite bhagavati brahmā loka-pitāmahaḥ prajāḥ sasarja katidhā daihikīr mānasīr vibhuḥ

विदुर ने कहा — भगवान के अन्तर्धान हो जाने पर, समस्त लोकों के पितामह, सर्वशक्तिमान ब्रह्मा ने कितने प्रकार की प्रजाओं की — शरीर से तथा मन से — सृष्टि की?

श्लोक 2 (bhagavata.3.10.2)

ये च मे भगवन् पृष्टास्त्वय्यर्था बहुवित्तम । तान् वदस्वानुपूर्व्येण छिन्धि नः सर्वसंशयान् ॥ २ ॥

ye ca me bhagavan pṛṣṭās tvayy arthā bahuvittama tān vadasvānupūrvyeṇa chindhi naḥ sarva-saṁśayān

हे भगवन्, हे महाज्ञानी! जो विषय मैंने आपसे उनके संबंध में पूछे हैं, उन्हें कृपया क्रमपूर्वक मुझे बताइए और मेरे समस्त संशयों का निवारण कीजिए।

श्लोक 3 (bhagavata.3.10.3)

सूत उवाच एवं सञ्चोदितस्तेन क्षत्त्रा कौषारविर्मुनिः । प्रीतः प्रत्याह तान् प्रश्नान् हृदिस्थानथ भार्गव ॥ ३ ॥

sūta uvāca evaṁ sañcoditas tena kṣattrā kauṣāravir muniḥ prītaḥ pratyāha tān praśnān hṛdi-sthān atha bhārgava

सूत ने कहा — हे भार्गव! इस प्रकार विदुर द्वारा प्रेरित होकर, कौषारवि मुनि मैत्रेय ने प्रसन्न होकर उन प्रश्नों का उत्तर दिया, जो उनके हृदय में पहले से ही विद्यमान थे।

श्लोक 4 (bhagavata.3.10.4)

मैत्रेय उवाच विरिञ्चोऽपि तथा चक्रे दिव्यं वर्षशतं तपः । आत्मन्यात्मानमावेश्य यथाह भगवानजः ॥ ४ ॥

maitreya uvāca viriñco ’pi tathā cakre divyaṁ varṣa-śataṁ tapaḥ ātmany ātmānam āveśya yathāha bhagavān ajaḥ

मैत्रेय ने कहा — विरिंचि (ब्रह्मा) ने भी उसी प्रकार अपनी आत्मा को परमात्मा में लगाकर सौ दिव्य वर्षों तक तप किया, जैसा कि अजन्मा भगवान ने कहा था।

श्लोक 5 (bhagavata.3.10.5)

तद्विलोक्याब्जसम्भूतो वायुना यदधिष्ठितः । पद्ममम्भश्च तत्कालकृतवीर्येण कम्पितम् ॥ ५ ॥

tad vilokyābja-sambhūto vāyunā yad-adhiṣṭhitaḥ padmam ambhaś ca tat-kāla- kṛta-vīryeṇa kampitam

उस पर दृष्टिपात करते हुए, कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने देखा कि जिस कमल पर वे विराजमान थे, वह कमल तथा जल, काल द्वारा उत्पन्न बल से कंपायमान हो रहे हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.3.10.6)

तपसा ह्येधमानेन विद्यया चात्मसंस्थया । विवृद्धविज्ञानबलो न्यपाद् वायुं सहाम्भसा ॥ ६ ॥

tapasā hy edhamānena vidyayā cātma-saṁsthayā vivṛddha-vijñāna-balo nyapād vāyuṁ sahāmbhasā

इस प्रकार बढ़ते हुए तप और आत्मस्थित दिव्य ज्ञान से उनकी व्यावहारिक शक्ति परिपक्व हुई, और उन्होंने जल सहित वायु का पान कर लिया।

श्लोक 7 (bhagavata.3.10.7)

तद्विलोक्य वियद्व्यापि पुष्करं यदधिष्ठितम् । अनेन लोकान् प्राग्लीनान् कल्पितास्मीत्यचिन्तयत् ॥ ७ ॥

tad vilokya viyad-vyāpi puṣkaraṁ yad-adhiṣṭhitam anena lokān prāg-līnān kalpitāsmīty acintayat

आकाश में सर्वत्र फैले उस कमल को देखकर, जिस पर वे विराजमान थे, उन्होंने विचार किया — इसी के द्वारा मैं पूर्व में प्रलय में विलीन हुए लोकों की सृष्टि करूँगा।

श्लोक 8 (bhagavata.3.10.8)

पद्मकोशं तदाविश्य भगवत्कर्मचोदितः । एकं व्यभाङ्क्षीदुरुधा त्रिधा भाव्यं द्विसप्तधा ॥ ८ ॥

padma-kośaṁ tadāviśya bhagavat-karma-coditaḥ ekaṁ vyabhāṅkṣīd urudhā tridhā bhāvyaṁ dvi-saptadhā

तब भगवान के कर्म से प्रेरित होकर उस कमल-कोश में प्रवेश कर, उन्होंने उस एक कमल-कोश को तीन बड़े विभागों में विभक्त किया, जो आगे चौदह विभागों में विकसित होने में सक्षम थे।

श्लोक 9 (bhagavata.3.10.9)

एतावाञ्जीवलोकस्य संस्थाभेदः समाहृतः । धर्मस्य ह्यनिमित्तस्य विपाकः परमेष्ठ्यसौ ॥ ९ ॥

etāvāñ jīva-lokasya saṁsthā-bhedaḥ samāhṛtaḥ dharmasya hy animittasya vipākaḥ parameṣṭhy asau

इस प्रकार जीव-लोक के आवास-स्थलों का यह भेद संक्षेप में बता दिया गया — यह उस सर्वोच्च पुरुष (ब्रह्मा) के निष्काम धर्म का ही परिपक्व फल है।

श्लोक 10 (bhagavata.3.10.10)

विदुर उवाच यथात्थ बहुरूपस्य हरेरद्भुतकर्मणः । कालाख्यं लक्षणं ब्रह्मन् यथा वर्णय नः प्रभो ॥ १० ॥

vidura uvāca yathāttha bahu-rūpasya harer adbhuta-karmaṇaḥ kālākhyaṁ lakṣaṇaṁ brahman yathā varṇaya naḥ prabho

विदुर ने कहा — हे ब्राह्मण! जैसे आपने अनेक रूपों वाले, अद्भुत कर्मों वाले भगवान हरि का वर्णन किया, वैसे ही अब हे प्रभु, काल नामक लक्षण का यथावत् वर्णन कीजिए।

श्लोक 11 (bhagavata.3.10.11)

मैत्रेय उवाच गुणव्यतिकराकारो निर्विशेषोऽप्रतिष्ठितः । पुरुषस्तदुपादानमात्मानं लीलयासृजत् ॥ ११ ॥

maitreya uvāca guṇa-vyatikarākāro nirviśeṣo ’pratiṣṭhitaḥ puruṣas tad-upādānam ātmānaṁ līlayāsṛjat

मैत्रेय ने कहा — गुणों के परस्पर व्यतिकरण का स्रोत, निर्विशेष और असीम पुरुष ने अपनी लीला से, अपने ही को साधन बनाकर, इस भौतिक सृष्टि की रचना की।

श्लोक 12 (bhagavata.3.10.12)

विश्वं वै ब्रह्मतन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया । ईश्वरेण परिच्छिन्नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना ॥ १२ ॥

viśvaṁ vai brahma-tan-mātraṁ saṁsthitaṁ viṣṇu-māyayā īśvareṇa paricchinnaṁ kālenāvyakta-mūrtinā

यह विश्व वस्तुतः उसी ब्रह्म का स्वरूप है, जो विष्णु की माया-शक्ति द्वारा स्थित है और भगवान द्वारा अव्यक्त-स्वरूप काल के माध्यम से सीमांकित किया गया है।

श्लोक 13 (bhagavata.3.10.13)

यथेदानीं तथाग्रे च पश्चादप्येतदीदृशम् ॥ १३ ॥

yathedānīṁ tathāgre ca paścād apy etad īdṛśam

जैसा यह अभी है, वैसा ही यह आरंभ में था, और वैसा ही अंत में भी रहेगा।

श्लोक 14 (bhagavata.3.10.14)

सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतस्तु यः । कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविधः प्रतिसंक्रमः ॥ १४ ॥

sargo nava-vidhas tasya prākṛto vaikṛtas tu yaḥ kāla-dravya-guṇair asya tri-vidhaḥ pratisaṅkramaḥ

इसकी सृष्टि नौ प्रकार की है — जो भौतिक (प्राकृत) है और जो गुणों द्वारा उत्पन्न (वैकृत) है; और काल, द्रव्य तथा गुणों द्वारा इसका प्रलय त्रिविध है।

श्लोक 15 (bhagavata.3.10.15)

आद्यस्तु महतः सर्गो गुणवैषम्यमात्मनः । द्वितीयस्त्वहमो यत्र द्रव्यज्ञानक्रियोदयः ॥ १५ ॥

ādyas tu mahataḥ sargo guṇa-vaiṣamyam ātmanaḥ dvitīyas tv ahamo yatra dravya-jñāna-kriyodayaḥ

प्रथम सृष्टि महत्तत्व की है, जो परमात्मा के स्वभाव में गुणों की विषमता है; द्वितीय अहंकार की सृष्टि है, जिसमें द्रव्य, ज्ञान तथा क्रिया का उदय होता है।

श्लोक 16 (bhagavata.3.10.16)

भूतसर्गस्तृतीयस्तु तन्मात्रो द्रव्यशक्तिमान् । चतुर्थ ऐन्द्रियः सर्गो यस्तु ज्ञानक्रियात्मकः ॥ १६ ॥

bhūta-sargas tṛtīyas tu tan-mātro dravya-śaktimān caturtha aindriyaḥ sargo yas tu jñāna-kriyātmakaḥ

तृतीय सृष्टि भूतों की है, जो तन्मात्राएँ द्रव्य की शक्ति प्रदान करने वाली हैं; चतुर्थ सृष्टि इंद्रियों की है, जो ज्ञान और क्रिया रूप है।

श्लोक 17 (bhagavata.3.10.17)

वैकारिको देवसर्गः पञ्चमो यन्मयं मनः । पष्ठस्तु तमसः सर्गो यस्त्वबुद्धिकृतः प्रभोः ॥ १७ ॥

vaikāriko deva-sargaḥ pañcamo yan-mayaṁ manaḥ ṣaṣṭhas tu tamasaḥ sargo yas tv abuddhi-kṛtaḥ prabhoḥ

वैकारिक देव-सृष्टि पंचम है, जिसमें उसी तत्व से युक्त मन उत्पन्न होता है; षष्ठ सृष्टि तमस की है, जो प्रभु (ब्रह्मा) की अबुद्धि से रचित है।

श्लोक 18 (bhagavata.3.10.18)

षडिमे प्राकृताः सर्गा वैकृतानपि मे शृणु । रजोभाजो भगवतो लीलेयं हरिमेधसः ॥ १८ ॥

ṣaḍ ime prākṛtāḥ sargā vaikṛtān api me śṛṇu rajo-bhājo bhagavato līleyaṁ hari-medhasaḥ

ये छह प्राकृत सृष्टियाँ हैं; अब मुझसे वैकृत सृष्टियों को भी सुनो — यह उन रजोगुण-युक्त, हरि-बुद्धि से संपन्न महाशक्तिशाली भगवान (ब्रह्मा) की लीला है।

श्लोक 19 (bhagavata.3.10.19)

सप्तमो मुख्यसर्गस्तु षङ्विधस्तस्थुषां च यः । वनस्पत्योषधिलतात्वक्सारा वीरुधो द्रुमाः ॥ १९ ॥

saptamo mukhya-sargas tu ṣaḍ-vidhas tasthuṣāṁ ca yaḥ vanaspaty-oṣadhi-latā- tvaksārā vīrudho drumāḥ

सप्तम सृष्टि मुख्य रूप से स्थावर प्राणियों की है, जो छह प्रकार की है — बिना फूल वाले फलदार वृक्ष, फल पकने तक रहने वाले पौधे, लताएँ, बेंत जैसे पौधे, बिना सहारे की लताएँ, तथा फूल-फल वाले वृक्ष।

श्लोक 20 (bhagavata.3.10.20)

उत्स्रोतसस्तमःप्राया अन्तःस्पर्शा विशेषिणः ॥ २० ॥

utsrotasas tamaḥ-prāyā antaḥ-sparśā viśeṣiṇaḥ

वे ऊपर की ओर से पोषण प्राप्त करते हैं, प्रायः चेतनाहीन होते हैं, केवल भीतर ही अनुभूति रखते हैं, तथा नाना प्रकार के होते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.3.10.21)

तिरश्चामष्टमः सर्गः सोऽष्टाविंशद्विधो मतः । अविदो भूरितमसो घ्राणज्ञा ह्यद्यवेदिनः ॥ २१ ॥

tiraścām aṣṭamaḥ sargaḥ so ’ṣṭāviṁśad-vidho mataḥ avido bhūri-tamaso ghrāṇa-jñā hṛdy avedinaḥ

अष्टम सृष्टि तिर्यक् (पशु-पक्षी) की है, जो अट्ठाईस प्रकार की मानी गई है; वे कल का ज्ञान नहीं रखते, गहन अज्ञान में डूबे रहते हैं, गंध से वांछित वस्तु पहचानते हैं और हृदय में लगभग कुछ भी स्मरण नहीं रखते।

श्लोक 22 (bhagavata.3.10.22)

गौरजो महिषः कृष्णः सूकरो गवयो रुरुः । द्विशफाः पशवश्चेमे अविरुष्ट्रश्च सत्तम ॥ २२ ॥

gaur ajo mahiṣaḥ kṛṣṇaḥ sūkaro gavayo ruruḥ dvi-śaphāḥ paśavaś ceme avir uṣṭraś ca sattama

गाय, बकरी, भैंस, कृष्णमृग, सूअर, गवय, रुरु मृग — हे परम पवित्र! ये तथा भेड़ और ऊँट सब दो-खुर वाले पशु हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.3.10.23)

खरोऽश्वोऽश्वतरो गौरः शरभश्चमरी तथा । एते चैकशफाः क्षत्तः शृणु पञ्चनखान् पशून् ॥ २३ ॥

kharo ’śvo ’śvataro gauraḥ śarabhaś camarī tathā ete caika-śaphāḥ kṣattaḥ śṛṇu pañca-nakhān paśūn

गधा, घोड़ा, खच्चर, गौर मृग, शरभ तथा चमरी — हे विदुर! ये सब एक-खुर वाले पशु हैं; अब पाँच नखों वाले पशुओं को सुनो।

श्लोक 24 (bhagavata.3.10.24)

श्वा सृगालो वृको व्याघ्रो मार्जारः शशशल्लकौ । सिंहः कपिर्गजः कूर्मो गोधा च मकरादयः ॥ २४ ॥

śvā sṛgālo vṛko vyāghro mārjāraḥ śaśa-śallakau siṁhaḥ kapir gajaḥ kūrmo godhā ca makarādayaḥ

कुत्ता, सियार, भेड़िया, बाघ, बिल्ली, खरगोश, साही, सिंह, वानर, हाथी, कछुआ, गोह तथा मगरमच्छ आदि।

श्लोक 25 (bhagavata.3.10.25)

कङ्कगृधबकश्येनभासभल्लूकबर्हिणः । हंससारसचक्राह्वकाकोलूकादयः खगाः ॥ २५ ॥

kaṅka-gṛdhra-baka-śyena- bhāsa-bhallūka-barhiṇaḥ haṁsa-sārasa-cakrāhva- kākolūkādayaḥ khagāḥ

बगुला, गिद्ध, बगला, बाज, भास, भल्लूक, मोर, हंस, सारस, चक्रवाक, कौआ, उल्लू तथा अन्य — ये सब पक्षी हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.3.10.26)

अर्वाक्स्रोतस्तु नवमः क्षत्तरेकविधो नृणाम् । रजोऽधिकाः कर्मपरा दुःखे च सुखमानिनः ॥ २६ ॥

arvāk-srotas tu navamaḥ kṣattar eka-vidho nṛṇām rajo ’dhikāḥ karma-parā duḥkhe ca sukha-māninaḥ

हे विदुर! नवम सृष्टि, जिसमें भोजन का मार्ग नीचे की ओर होता है, एक ही प्रकार की है — मनुष्यों की, जिनमें रजोगुण की प्रधानता है, जो कर्म में रत रहते हैं और दुःख में भी अपने को सुखी मानते हैं।

श्लोक 27 (bhagavata.3.10.27)

वैकृतास्रय एवैते देवसर्गश्च सत्तम । वैकारिकस्तु यः प्रोक्तः कौमारस्तूभयात्मकः ॥ २७ ॥

vaikṛtās traya evaite deva-sargaś ca sattama vaikārikas tu yaḥ proktaḥ kaumāras tūbhayātmakaḥ

हे सत्तम! ये तीन, देव-सृष्टि सहित, वैकृत सृष्टियाँ हैं; जो पहले वैकारिक कहा गया, वह तथा चार कुमारों की सृष्टि — जो दोनों प्रकार की है — भी इसी में सम्मिलित है।

श्लोक 28 (bhagavata.3.10.28)

देवसर्गश्चाष्टविधो विबुधाः पितरोऽसुराः । गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा यक्षरक्षांसि चारणाः ॥ २८ ॥

deva-sargaś cāṣṭa-vidho vibudhāḥ pitaro ’surāḥ gandharvāpsarasaḥ siddhā yakṣa-rakṣāṁsi cāraṇāḥ

देवताओं की सृष्टि भी आठ प्रकार की है — स्वयं देवगण, पितर, असुर, गंधर्व-अप्सराएँ, सिद्ध, यक्ष-राक्षस तथा चारण —

श्लोक 29 (bhagavata.3.10.29)

भूतप्रेतपिशाचाश्च विद्याध्राः किन्नरादयः । दशैते विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्वसृक्कृताः ॥ २९ ॥

bhūta-preta-piśācāś ca vidyādhrāḥ kinnarādayaḥ daśaite vidurākhyātāḥ sargās te viśva-sṛk-kṛtāḥ

— भूत, प्रेत तथा पिशाच, तथा विद्याधर, किन्नर आदि। हे विदुर! ये दस सृष्टियाँ तुम्हें बता दी गईं, जो विश्व-स्रष्टा (ब्रह्मा) द्वारा रची गई हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.3.10.30)

अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशान्मन्वन्तराणि च । एवं रजःप्लुतः स्रष्टा कल्पादिष्वात्मभूर्हरिः । सृजत्यमोघसङ्कल्प आत्मैवात्मानमात्मना ॥ ३० ॥

ataḥ paraṁ pravakṣyāmi vaṁśān manvantarāṇi ca evaṁ rajaḥ-plutaḥ sraṣṭā kalpādiṣv ātmabhūr hariḥ sṛjaty amogha-saṅkalpa ātmaivātmānam ātmanā

इसके पश्चात् मैं वंशों तथा मन्वंतरों का वर्णन करूँगा; इस प्रकार रजोगुण से युक्त स्वयंभू सृष्टिकर्ता हरि, प्रत्येक कल्प में, अमोघ संकल्प वाले, स्वयं ही अपने द्वारा अपनी सृष्टि करते हैं।

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