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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9

ब्रह्मा की सृजन-शक्ति हेतु स्तुति

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (bhagavata.3.9.1)

ब्रह्मोवाच ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम् । नान्यत्त्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासि ॥ १ ॥

brahmovāca jñāto ’si me ’dya sucirān nanu deha-bhājāṁ na jñāyate bhagavato gatir ity avadyam nānyat tvad asti bhagavann api tan na śuddhaṁ māyā-guṇa-vyatikarād yad urur vibhāsi

ब्रह्मा ने कहा — हे भगवन्! मैं दीर्घकाल के पश्चात् आज आपको जान पाया हूँ; यह कितने खेद की बात है कि देहधारी जीव आपकी गति को नहीं जान पाते। आपसे परे कुछ भी नहीं है, और जो कुछ आपसे परे प्रतीत होता भी है, वह शुद्ध परम सत्य नहीं है, क्योंकि माया के गुणों के मिश्रण से ही आप, यद्यपि अपार हैं, इस प्रकार प्रकट होते हैं।

श्लोक 2 (bhagavata.3.9.2)

रूपं यदेतदवबोधरसोदयेन शश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय । आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् ॥ २ ॥

rūpaṁ yad etad avabodha-rasodayena śaśvan-nivṛtta-tamasaḥ sad-anugrahāya ādau gṛhītam avatāra-śataika-bījaṁ yan-nābhi-padma-bhavanād aham āvirāsam

यह जो रूप है, जो आपकी बोध-रस-शक्ति के उदय से युक्त है, जो सदा अंधकार से मुक्त है और भक्तों पर कृपा हेतु है — यह आदिकाल से ही सैकड़ों अवतारों का मूल-बीज माना गया है; और आपके इसी नाभि-कमल के गृह से मैं स्वयं प्रकट हुआ हूँ।

श्लोक 3 (bhagavata.3.9.3)

नातः परं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः । पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ ३ ॥

nātaḥ paraṁ parama yad bhavataḥ svarūpam ānanda-mātram avikalpam aviddha-varcaḥ paśyāmi viśva-sṛjam ekam aviśvam ātman bhūtendriyātmaka-madas ta upāśrito ’smi

हे परम! आपके इस स्वरूप से परे कुछ भी नहीं, जो केवल आनन्दमात्र, निर्विकल्प और अक्षुण्ण तेजवाला ब्रह्म नहीं अपितु विश्व का एकमात्र स्रष्टा है, यद्यपि स्वयं वह विश्वरूप नहीं है। हे आत्मन्! देह और इंद्रियों में अपनापन माने बैठा मैं आपकी ही शरण में आया हूँ।

श्लोक 4 (bhagavata.3.9.4)

तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम् । तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभाग्भिरसत्प्रसङ्गैः ॥ ४ ॥

tad vā idaṁ bhuvana-maṅgala maṅgalāya dhyāne sma no darśitaṁ ta upāsakānām tasmai namo bhagavate ’nuvidhema tubhyaṁ yo ’nādṛto naraka-bhāgbhir asat-prasaṅgaiḥ

समस्त लोकों के लिए मंगलकारी आपका वही रूप हमारे कल्याण हेतु ध्यान में हम उपासकों को दिखाया गया है। उस भगवान को मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ, जिसकी उपेक्षा वे लोग करते हैं जो असत् विषयों में रत रहकर नरकगामी होते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.3.9.5)

ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं जिघ्रन्ति कर्णविवरैः श्रुतिवातनीतम् । भक्त्या गृहीतचरणः परया च तेषां नापैषि नाथ हृदयाम्बुरुहात्स्वपुंसाम् ॥ ५ ॥

ye tu tvadīya-caraṇāmbuja-kośa-gandhaṁ jighranti karṇa-vivaraiḥ śruti-vāta-nītam bhaktyā gṛhīta-caraṇaḥ parayā ca teṣāṁ nāpaiṣi nātha hṛdayāmburuhāt sva-puṁsām

जो लोग आपके चरण-कमल की सुगंध को, जो वेद-वाणी रूपी वायु द्वारा वहन होकर कानों के मार्ग से भीतर पहुँचती है, सूंघते हैं और परम भक्ति से आपके चरणों को ग्रहण करते हैं — हे नाथ! उनके हृदय-कमल से आप कभी दूर नहीं होते।

श्लोक 6 (bhagavata.3.9.6)

तावद्भयं द्रविणदेहसुहृन्निमित्तं शोकः स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभः । तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः ॥ ६ ॥

tāvad bhayaṁ draviṇa-deha-suhṛn-nimittaṁ śokaḥ spṛhā paribhavo vipulaś ca lobhaḥ tāvan mamety asad-avagraha ārti-mūlaṁ yāvan na te ’ṅghrim abhayaṁ pravṛṇīta lokaḥ

जब तक मनुष्य आपके अभय चरणों की शरण नहीं लेता, तब तक धन, देह और स्वजनों के निमित्त भय बना रहता है — शोक, लालसा, अपमान और अपार लोभ; तब तक 'यह मेरा है' यह मिथ्या आग्रह ही समस्त पीड़ा का मूल बना रहता है।

श्लोक 7 (bhagavata.3.9.7)

दैवेन ते हतधियो भवतः प्रसङ्गा- त्सर्वाशुभोपशमनाद्विमुखेन्द्रिया ये । कुर्वन्ति कामसुखलेशलवाय दीना लोभाभिभूतमनसोऽकुशलानि शश्वत् ॥ ७ ॥

daivena te hata-dhiyo bhavataḥ prasaṅgāt sarvāśubhopaśamanād vimukhendriyā ye kurvanti kāma-sukha-leśa-lavāya dīnā lobhābhibhūta-manaso ’kuśalāni śaśvat

दुर्भाग्यवश जिनकी बुद्धि हर ली गई है और जो आपके प्रसंग से — जो समस्त अशुभ को शांत करने वाला है — अपनी इंद्रियों को विमुख कर लेते हैं, वे दीन जन इंद्रिय-सुख के एक क्षणिक अंश के लिए, लोभ से अभिभूत मन से, सदैव अकल्याणकारी कर्म करते रहते हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.3.9.8)

क्षुत्तृट्त्रिधातुभिरिमा मुहुरर्द्यमानाः शीतोष्णवातवरषैरितरेतराच्च । कामाग्निनाच्युत रुषा च सुदुर्भरेण सम्पश्यतो मन उरुक्रम सीदते मे ॥ ८ ॥

kṣut-tṛṭ-tridhātubhir imā muhur ardyamānāḥ śītoṣṇa-vāta-varaṣair itaretarāc ca kāmāgninācyuta-ruṣā ca sudurbhareṇa sampaśyato mana urukrama sīdate me

हे उरुक्रम! भूख, प्यास और त्रिधातुओं से, शीत-उष्ण-वायु-वर्षा से तथा परस्पर अन्य कष्टों से बारंबार पीड़ित, और काम की असह्य अग्नि तथा क्रोध से संतप्त इन जीवों को देखकर मेरा मन खिन्न हो उठता है।

श्लोक 9 (bhagavata.3.9.9)

यावत्पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थ- मायाबलं भगवतो जन ईश पश्येत् । तावन्न संसृतिरसौ प्रतिसंक्रमेत व्यर्थापि दुःखनिवहं वहती क्रियार्था ॥ ९ ॥

yāvat pṛthaktvam idam ātmana indriyārtha- māyā-balaṁ bhagavato jana īśa paśyet tāvan na saṁsṛtir asau pratisaṅkrameta vyarthāpi duḥkha-nivahaṁ vahatī kriyārthā

हे ईश! जब तक मनुष्य देह और इंद्रियों में इस पार्थक्य को — जो भगवान की माया-शक्ति ही है — देखता रहता है, तब तक यह संसार-चक्र, यद्यपि निरर्थक है, उससे नहीं मुड़ता और कर्मफल के निमित्त दुःखों का भार वहन कराता रहता है।

श्लोक 10 (bhagavata.3.9.10)

अह्न्यापृतार्तकरणा निशि निःशयाना । नानामनोरथधिया क्षणभग्ननिद्राः । दैवाहतार्थरचना ऋषयोऽपि देव युष्मत्प्रसङ्गविमुखा इह संसरन्ति ॥ १० ॥

ahny āpṛtārta-karaṇā niśi niḥśayānā nānā-manoratha-dhiyā kṣaṇa-bhagna-nidrāḥ daivāhatārtha-racanā ṛṣayo ’pi deva yuṣmat-prasaṅga-vimukhā iha saṁsaranti

दिन में जिनकी इंद्रियाँ कष्टकारी कर्मों में लगी रहती हैं, रात्रि में जो निद्राहीन पड़े रहते हैं, नाना मनोरथों से जिनकी नींद क्षण-क्षण टूटती रहती है — हे देव! बड़े-बड़े ऋषि भी, जिनकी योजनाएँ भाग्य द्वारा विफल कर दी जाती हैं, आपके प्रसंग से विमुख रहकर इस संसार में भटकते रहते हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.3.9.11)

त्वं भक्तियोगपरिभावितहृत्सरोज आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम् । यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ ११ ॥

tvaṁ bhakti-yoga-paribhāvita-hṛt-saroja āsse śrutekṣita-patho nanu nātha puṁsām yad-yad-dhiyā ta urugāya vibhāvayanti tat-tad-vapuḥ praṇayase sad-anugrahāya

हे भक्तवत्सल! जिनका हृदय-कमल भक्तियोग से पूर्णतः भावित है, उनमें आप उस मार्ग पर विराजते हैं जो पहले श्रवण द्वारा देखा जाता है; हे बहुकीर्तिमान! वे जिस-जिस रूप का बुद्धि से चिंतन करते हैं, आप उसी-उसी रूप को अपनी अहैतुकी कृपा दिखाने हेतु प्रकट करते हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.3.9.12)

नातिप्रसीदति तथोपचितोपचारै- राराधितः सुरगणैर्हृदिबद्धकामैः । यत्सर्वभूतदययासदलभ्ययैको नानाजनेष्ववहितः सुहृदन्तरात्मा ॥ १२ ॥

nātiprasīdati tathopacitopacārair ārādhitaḥ sura-gaṇair hṛdi baddha-kāmaiḥ yat sarva-bhūta-dayayāsad-alabhyayaiko nānā-janeṣv avahitaḥ suhṛd antar-ātmā

जिनके हृदय सांसारिक कामनाओं से बंधे हैं, ऐसे देवगण भव्य उपचारों से भी उन्हें उतना संतुष्ट नहीं कर पाते, जितना वे उससे प्रसन्न होते हैं जो — समस्त प्राणियों पर करुणा करते हुए, असाधुओं के लिए अप्राप्य — एकमात्र सुहृद अंतरात्मा के रूप में नाना जीवों में अंतर्यामी बनकर विद्यमान हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.3.9.13)

पुंसामतो विविधकर्मभिरध्वराद्यै- र्दानेन चोग्रतपसा परिचर्यया च । आराधनं भगवतस्तव सत्क्रियार्थो धर्मोऽर्पितः कर्हिचिद्म्रियते न यत्र ॥ १३ ॥

puṁsām ato vividha-karmabhir adhvarādyair dānena cogra-tapasā paricaryayā ca ārādhanaṁ bhagavatas tava sat-kriyārtho dharmo ’rpitaḥ karhicid mriyate na yatra

अतः लोग नाना कर्मों, यज्ञों, दान, कठोर तप अथवा सेवा द्वारा जो भी धर्म केवल आपकी प्रसन्नता के निमित्त अर्पित करते हैं, हे भगवन्! वही धर्म कभी नष्ट नहीं होता।

श्लोक 14 (bhagavata.3.9.14)

शश्वत्स्वरूपमहसैव निपीतभेद- मोहाय बोधधिषणाय नमः परस्मै । विश्वोद्भवस्थितिलयेषु निमित्तलीला- रासाय ते नम इदं चकृमेश्वराय ॥ १४ ॥

śaśvat svarūpa-mahasaiva nipīta-bheda- mohāya bodha-dhiṣaṇāya namaḥ parasmai viśvodbhava-sthiti-layeṣu nimitta-līlā- rāsāya te nama idaṁ cakṛmeśvarāya

जिन्होंने अपने स्वरूप के तेज से ही भेद-भ्रम को सदा के लिए लील लिया है, जो शुद्ध बोध और बुद्धि से युक्त परब्रह्म हैं — उन्हें नमस्कार है; और हे ईश्वर! जिनकी लीला मात्र ही विश्व की सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कारण है, उन्हें मैं यह नमस्कार अर्पित करता हूँ।

श्लोक 15 (bhagavata.3.9.15)

यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति । तेऽनैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा संयान्त्यपावृतामृतं तमजं प्रपद्ये ॥ १५ ॥

yasyāvatāra-guṇa-karma-viḍambanāni nāmāni ye ’su-vigame vivaśā gṛṇanti te ’naika-janma-śamalaṁ sahasaiva hitvā saṁyānty apāvṛtāmṛtaṁ tam ajaṁ prapadye

जिनके अवतार, गुण, कर्म और नाम सब रहस्यमय लीलाएँ हैं, जिनका नाम प्राण त्यागते समय विवश होकर भी उच्चारण करने वाले तत्काल अनेक जन्मों के संचित पाप त्यागकर खुले हुए अमृत को प्राप्त करते हैं — उन अजन्मा प्रभु की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 16 (bhagavata.3.9.16)

यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं च स्थित्युद्भवप्रलयहेतव आत्ममूलम् । भित्त्वा त्रिपाद्ववृध एक उरुप्ररोह- स्तस्मै नमो भगवते भुवनद्रुमाय ॥ १६ ॥

yo vā ahaṁ ca giriśaś ca vibhuḥ svayaṁ ca sthity-udbhava-pralaya-hetava ātma-mūlam bhittvā tri-pād vavṛdha eka uru-prarohas tasmai namo bhagavate bhuvana-drumāya

जो स्वयं मैं, गिरीश (शिव) और स्वयं सर्वशक्तिमान (विष्णु) — स्थिति, सृष्टि और प्रलय के ये तीन कारण — स्वमूल से भेदकर एक ही वृक्ष के रूप में तीन तनों और अनेक विशाल शाखाओं में विकसित हुए, उस विश्व-वृक्ष भगवान को मेरा नमस्कार है।

श्लोक 17 (bhagavata.3.9.17)

लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे । यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशां सद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोऽस्तु तस्मै ॥ १७ ॥

loko vikarma-nirataḥ kuśale pramattaḥ karmaṇy ayaṁ tvad-udite bhavad-arcane sve yas tāvad asya balavān iha jīvitāśāṁ sadyaś chinatty animiṣāya namo ’stu tasmai

साधारण जन अनुचित कर्मों में लगे रहकर उस कल्याणकारी कर्म — आपकी उपासना, जिसका आपने स्वयं विधान किया है — के प्रति उदासीन बने रहते हैं; जो बलवान काल, बिना पलक झपकाए, ऐसे लोगों की जीवन-आशा को तुरंत काट देता है, उस अनिमिष प्रभु को मेरा नमस्कार है।

श्लोक 18 (bhagavata.3.9.18)

यस्माद्बिभेम्यहमपि द्विपरार्धधिष्ण्य- मध्यासितः सकललोकनमस्कृतं यत् । तेपे तपो बहुसवोऽवरुरुत्समान- स्तस्मै नमो भगवतेऽधिमखाय तुभ्यम् ॥ १८ ॥

yasmād bibhemy aham api dviparārdha-dhiṣṇyam adhyāsitaḥ sakala-loka-namaskṛtaṁ yat tepe tapo bahu-savo ’varurutsamānas tasmai namo bhagavate ’dhimakhāya tubhyam

जिनसे मैं स्वयं भय मानता हूँ, यद्यपि मैं द्विपरार्ध काल तक रहने वाले तथा समस्त लोकों द्वारा सम्मानित पद पर स्थित हूँ — जिन्हें पाने की इच्छा से अनेकों ने बहु वर्षों तक तप किया; उन समस्त यज्ञों के भोक्ता भगवान को, हे प्रभु, आपको मेरा नमस्कार है।

श्लोक 19 (bhagavata.3.9.19)

तिर्यङ्मनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि- ष्वात्मेच्छयात्मकृतसेतुपरीप्सया यः । रेमे निरस्तविषयोऽप्यवरुद्धदेह- स्तस्मै नमो भगवते पुरुषोत्तमाय ॥ १९ ॥

tiryaṅ-manuṣya-vibudhādiṣu jīva-yoniṣv ātmecchayātma-kṛta-setu-parīpsayā yaḥ reme nirasta-viṣayo ’py avaruddha-dehas tasmai namo bhagavate puruṣottamāya

जो स्वेच्छा से, अपने ही रचे नियमों की रक्षा की इच्छा से, पशु-पक्षी, मनुष्य और देवता आदि विविध योनियों में क्रीड़ा करते हैं, और देह धारण करते हुए भी विषयों से अस्पृष्ट तथा आसक्तिरहित बने रहते हैं — उन पुरुषोत्तम भगवान को मेरा नमस्कार है।

श्लोक 20 (bhagavata.3.9.20)

योऽविद्ययानुपहतोऽपि दशार्धवृत्त्या निद्रामुवाह जठरीकृतलोकयात्रः । अन्तर्जलेऽहिकशिपुस्पर्शानुकूलां भीमोर्मिमालिनि जनस्य सुखं विवृण्वन् ॥ २० ॥

yo ’vidyayānupahato ’pi daśārdha-vṛttyā nidrām uvāha jaṭharī-kṛta-loka-yātraḥ antar-jale ’hi-kaśipu-sparśānukūlāṁ bhīmormi-mālini janasya sukhaṁ vivṛṇvan

जो अविद्या से अस्पृष्ट होते हुए भी अपनी पंचविध वृत्ति के द्वारा निद्रा को स्वीकार करते हैं, समस्त लोकों की व्यवस्था अपने उदर में समाहित किए हुए, प्रलय-जल के भीतर भयंकर तरंगों की माला के मध्य शेष-शय्या के सुखद स्पर्श को प्रकट करते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.3.9.21)

यन्नाभिपद्मभवनादहमासमीड्य लोकत्रयोपकरणो यदनुग्रहेण । तस्मै नमस्त उदरस्थभवाय योग- निद्रावसानविकसन्नलिनेक्षणाय ॥ २१ ॥

yan-nābhi-padma-bhavanād aham āsam īḍya loka-trayopakaraṇo yad-anugraheṇa tasmai namas ta udara-stha-bhavāya yoga- nidrāvasāna-vikasan-nalinekṣaṇāya

हे पूज्य! जिनके नाभि-कमल गृह से मैं उत्पन्न हुआ, जिनकी कृपा से मुझे त्रिलोक-सृष्टि का साधन बनाया गया — उन्हें मेरा नमस्कार है, जो उदर में स्थित हैं, जिनके योगनिद्रा की समाप्ति पर कमल जैसे नेत्र खिल उठे।

श्लोक 22 (bhagavata.3.9.22)

सोऽयं समस्तजगतां सुहृदेक आत्मा सत्त्वेन यन्मृडयते भगवान् भगेन । तेनैव मे दृशमनुस्पृशताद्यथाहं स्रक्ष्यामि पूर्ववदिदं प्रणतप्रियोऽसौ ॥ २२ ॥

so ’yaṁ samasta-jagatāṁ suhṛd eka ātmā sattvena yan mṛḍayate bhagavān bhagena tenaiva me dṛśam anuspṛśatād yathāhaṁ srakṣyāmi pūrvavad idaṁ praṇata-priyo ’sau

वे भगवान, समस्त लोकों के एकमात्र सुहृद आत्मा, जो सत्त्वगुण और अपने षड् ऐश्वर्यों से सुख प्रदान करते हैं — वे शरणागतों के प्रिय प्रभु मेरी दृष्टि का स्पर्श करें, जिससे मैं पूर्व की भांति पुनः इस विश्व की रचना कर सकूँ।

श्लोक 23 (bhagavata.3.9.23)

एष प्रपन्नवरदो रमयात्मशक्त्या यद्यत्करिष्यति गृहीतगुणावतारः । तस्मिन् स्वविक्रममिदं सृजतोऽपि चेतो युञ्जीत कर्मशमलं च यथा विजह्याम् ॥ २३ ॥

eṣa prapanna-varado ramayātma-śaktyā yad yat kariṣyati gṛhīta-guṇāvatāraḥ tasmin sva-vikramam idaṁ sṛjato ’pi ceto yuñjīta karma-śamalaṁ ca yathā vijahyām

जो शरणागतों को वर देने वाले हैं, जो अपनी अंतरंगा शक्ति (लक्ष्मी) के साथ सदा रमण करते हैं, जो-जो कुछ करना चाहते हैं उसके लिए सत्त्वगुण-अवतार ग्रहण करते हैं — मेरा चित्त उन्हीं में लगा रहे, जिससे अपने ही सामर्थ्य से इस सृष्टि की रचना करते हुए भी मैं कर्म के मैल को त्याग सकूँ।

श्लोक 24 (bhagavata.3.9.24)

नाभिहृदादिह सतोऽम्भसि यस्य पुंसो विज्ञानशक्तिरहमासमनन्तशक्तेः । रूपं विचित्रमिदमस्य विवृण्वतो मे मा रीरिषीष्ट निगमस्य गिरां विसर्गः ॥ २४ ॥

nābhi-hradād iha sato ’mbhasi yasya puṁso vijñāna-śaktir aham āsam ananta-śakteḥ rūpaṁ vicitram idam asya vivṛṇvato me mā rīriṣīṣṭa nigamasya girāṁ visargaḥ

इस कल्प में जो जल में शयन करने वाले अनंत-शक्ति भगवान के नाभि-सरोवर से मैं, समस्त विश्व-विज्ञान की शक्ति, उत्पन्न हुआ — उनके इस विचित्र रूप का वर्णन करते हुए मुझ पर वेद-वाणी का यह प्रवाह क्षीण न हो।

श्लोक 25 (bhagavata.3.9.25)

सोऽसावदभ्रकरुणो भगवान् विवृद्ध- प्रेमस्मितेन नयनाम्बुरुहं विजृम्भन् । उत्थाय विश्वविजयाय च नो विषादं माध्व्या गिरापनयतात्पुरुषः पुराणः ॥ २५ ॥

so ’sāv adabhra-karuṇo bhagavān vivṛddha- prema-smitena nayanāmburuhaṁ vijṛmbhan utthāya viśva-vijayāya ca no viṣādaṁ mādhvyā girāpanayatāt puruṣaḥ purāṇaḥ

वे ही अपार करुणामय भगवान, समस्त पुरातन पुरुष, प्रगाढ़ प्रेम से युक्त मुस्कान के साथ अपने कमल-नेत्र खोलते हुए, विश्व के अभ्युदय हेतु उठकर, अपनी मधुर वाणी से हमारे विषाद को दूर करें।

श्लोक 26 (bhagavata.3.9.26)

मैत्रेय उवाच स्वसम्भवं निशाम्यैवं तपोविद्यासमाधिभिः । यावन्मनोवचः स्तुत्वा विरराम स खिन्नवत् ॥ २६ ॥

maitreya uvāca sva-sambhavaṁ niśāmyaivaṁ tapo-vidyā-samādhibhiḥ yāvan mano-vacaḥ stutvā virarāma sa khinnavat

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार अपने उद्गम-स्रोत को देखकर, तप, विद्या और समाधि द्वारा जहाँ तक मन और वाणी पहुँच सकी, स्तुति करने के पश्चात् ब्रह्मा मानो थककर मौन हो गए।

श्लोक 27 (bhagavata.3.9.27)

अथाभिप्रेतमन्वीक्ष्य ब्रह्मणो मधुसूदनः । विषण्णचेतसं तेन कल्पव्यतिकराम्भसा ॥ २७ ॥

athābhipretam anvīkṣya brahmaṇo madhusūdanaḥ viṣaṇṇa-cetasaṁ tena kalpa-vyatikarāmbhasā

तदनन्तर ब्रह्मा के अभिप्राय को देखकर मधुसूदन ने देखा कि कल्प-प्रलय के जल से उनका चित्त विषण्ण है और लोक-व्यवस्था के ज्ञान को लेकर वे अत्यंत खिन्न हैं;

श्लोक 28 (bhagavata.3.9.28)

लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः । तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव ॥ २८ ॥

loka-saṁsthāna-vijñāna ātmanaḥ parikhidyataḥ tam āhāgādhayā vācā kaśmalaṁ śamayann iva

तब उन्होंने गंभीर एवं अगाध वाणी से उससे कहा, मानो उनके मन के मालिन्य को शांत करते हुए।

श्लोक 29 (bhagavata.3.9.29)

श्रीभगवानुवाच मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह । तन्मयापादितं ह्यग्रे यन्मां प्रार्थयते भवान् ॥ २९ ॥

śrī-bhagavān uvāca mā veda-garbha gās tandrīṁ sarga udyamam āvaha tan mayāpāditaṁ hy agre yan māṁ prārthayate bhavān

भगवान ने कहा — हे वेदगर्भ! खिन्न मत होओ; सृष्टि के उद्यम को पुनः धारण करो, क्योंकि जो तुम मुझसे मांग रहे हो, वह मेरे द्वारा पहले ही तुम्हें प्रदान किया जा चुका है।

श्लोक 30 (bhagavata.3.9.30)

भूयस्त्वं तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् । ताभ्यामन्तर्हृदि ब्रह्मन् लोकान्द्रक्ष्यस्यपावृतान् ॥ ३० ॥

bhūyas tvaṁ tapa ātiṣṭha vidyāṁ caiva mad-āśrayām tābhyām antar-hṛdi brahman lokān drakṣyasy apāvṛtān

हे ब्राह्मण! पुनः तप में स्थित होओ, और साथ ही मुझ पर आश्रित विद्या में भी; इन दोनों के द्वारा तुम अपने हृदय के भीतर ही समस्त लोकों को उद्घाटित देखोगे।

श्लोक 31 (bhagavata.3.9.31)

तत आत्मनि लोके च भक्तियुक्तः समाहितः । द्रष्टासि मां ततं ब्रह्यन्मयि लोकांस्त्वमात्मनः ॥ ३१ ॥

tata ātmani loke ca bhakti-yuktaḥ samāhitaḥ draṣṭāsi māṁ tataṁ brahman mayi lokāṁs tvam ātmanaḥ

हे ब्रह्मन्! तदुपरांत भक्तियोग से युक्त और पूर्ण समाहित होकर तुम मुझे अपने में और समस्त लोक में व्याप्त देखोगे, और लोकों को अपने में उसी प्रकार देखोगे जैसे वे मुझमें स्थित हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.3.9.32)

यदा तु सर्वभूतेषु दारुष्वग्निमिव स्थितम् । प्रतिचक्षीत मां लोको जह्यात्तर्ह्येव कश्मलम् ॥ ३२ ॥

yadā tu sarva-bhūteṣu dāruṣv agnim iva sthitam praticakṣīta māṁ loko jahyāt tarhy eva kaśmalam

जब तुम मुझे समस्त प्राणियों में उसी प्रकार व्याप्त देखोगे जैसे अग्नि काष्ठ में छिपी रहती है, तब लोक भी मुझे इस प्रकार देखकर तत्क्षण भ्रम का त्याग कर देगा।

श्लोक 33 (bhagavata.3.9.33)

यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियगुणाशयैः । स्वरूपेण मयोपेतं पश्यन् स्वाराज्यमृच्छति ॥ ३३ ॥

yadā rahitam ātmānaṁ bhūtendriya-guṇāśayaiḥ svarūpeṇa mayopetaṁ paśyan svārājyam ṛcchati

जब कोई अपनी आत्मा को भौतिक तत्वों, इंद्रियों और गुणों के प्रभाव से मुक्त, अपने शुद्ध स्वरूप में, मुझसे युक्त देखता है, तब वह अपने स्वराज्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 34 (bhagavata.3.9.34)

नानाकर्मवितानेन प्रजा बह्वीः सिसृक्षतः । नात्मावसीदत्यस्मिंस्ते वर्षीयान्मदनुग्रहः ॥ ३४ ॥

nānā-karma-vitānena prajā bahvīḥ sisṛkṣataḥ nātmāvasīdaty asmiṁs te varṣīyān mad-anugrahaḥ

नाना कर्मों के विस्तार से बहुविध प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा रखते हुए भी तुम्हारा आत्मा इस कार्य में कभी खिन्न नहीं होगा; तुम पर मेरी कृपा सदा बढ़ती रहेगी।

श्लोक 35 (bhagavata.3.9.35)

ऋषिमाद्यं न बध्नाति पापीयांस्त्वां रजोगुणः । यन्मनो मयि निर्बद्धं प्रजाः संसृजतोऽपि ते ॥ ३५ ॥

ṛṣim ādyaṁ na badhnāti pāpīyāṁs tvāṁ rajo-guṇaḥ yan mano mayi nirbaddhaṁ prajāḥ saṁsṛjato ’pi te

हे आदि ऋषि! पापमय रजोगुण तुम्हें कभी नहीं बांधता, क्योंकि प्रजा की सृष्टि करते हुए भी तुम्हारा मन मुझमें ही दृढ़तापूर्वक बंधा रहता है।

श्लोक 36 (bhagavata.3.9.36)

ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम् । यन्मां त्वं मन्यसेऽयुक्तं भूतेन्द्रियगुणात्मभिः ॥ ३६ ॥

jñāto ’haṁ bhavatā tv adya durvijñeyo ’pi dehinām yan māṁ tvaṁ manyase ’yuktaṁ bhūtendriya-guṇātmabhiḥ

यद्यपि देहधारियों के लिए मुझे जानना अत्यंत कठिन है, तथापि आज तुमने मुझे जान लिया है, क्योंकि अब तुम मुझे बद्धजीव की भांति भौतिक तत्वों, इंद्रियों और गुणों से युक्त नहीं मानते।

श्लोक 37 (bhagavata.3.9.37)

तुभ्यं मद्विचिकित्सायामात्मा मे दर्शितोऽबहिः । नालेन सलिले मूलं पुष्करस्य विचिन्वतः ॥ ३७ ॥

tubhyaṁ mad-vicikitsāyām ātmā me darśito ’bahiḥ nālena salile mūlaṁ puṣkarasya vicinvataḥ

मुझे जानने के तुम्हारे इस प्रयास में मेरा स्वरूप तुम्हें भीतर से ही प्रकट हो गया है — जैसे कमल की जड़ को खोजने वाला जल में नाल के सहारे ही उसे बाहर गए बिना पा लेता है।

श्लोक 38 (bhagavata.3.9.38)

यच्चकर्थाङ्ग मतस्तोत्रं मत्कथाभ्युदयाङ्कितम् । यद्वा तपसि ते निष्ठा स एष मदनुग्रहः ॥ ३८ ॥

yac cakarthāṅga mat-stotraṁ mat-kathābhyudayāṅkitam yad vā tapasi te niṣṭhā sa eṣa mad-anugrahaḥ

हे अंग (ब्रह्मा)! जो स्तुति तुमने मेरे प्रति की, मेरी कथाओं और महिमा से युक्त, तथा तप में जो तुम्हारी निष्ठा है — यह सब मेरी ही अहैतुकी कृपा है।

श्लोक 39 (bhagavata.3.9.39)

प्रीतोऽहमस्तु भद्रं ते लोकानां विजयेच्छया । यदस्तौषीर्गुणमयं निर्गुणं मानुवर्णयन् ॥ ३९ ॥

prīto ’ham astu bhadraṁ te lokānāṁ vijayecchayā yad astauṣīr guṇamayaṁ nirguṇaṁ mānuvarṇayan

मैं प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो। लोकों के अभ्युदय की कामना से, गुणातीत होते हुए भी मुझे तुमने गुणों सहित वर्णित करते हुए स्तुति की है।

श्लोक 40 (bhagavata.3.9.40)

य एतेन पुमान्नित्यं स्तुत्वा स्तोत्रेण मां भजेत् । तस्याशु सम्प्रसीदेयं सर्वकामवरेश्वरः ॥ ४० ॥

ya etena pumān nityaṁ stutvā stotreṇa māṁ bhajet tasyāśu samprasīdeyaṁ sarva-kāma-vareśvaraḥ

जो कोई मनुष्य इस स्तोत्र द्वारा नित्य स्तुति करते हुए मेरा भजन करेगा, उस पर मैं, समस्त कामनाओं के वरदाता, शीघ्र ही प्रसन्न हो जाऊँगा।

श्लोक 41 (bhagavata.3.9.41)

पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगसमाधिना । राद्धं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम् ॥ ४१ ॥

pūrtena tapasā yajñair dānair yoga-samādhinā rāddhaṁ niḥśreyasaṁ puṁsāṁ mat-prītis tattvavin-matam

पुण्यकर्म, तप, यज्ञ, दान, योग तथा समाधि द्वारा मनुष्य जो भी परम कल्याण प्राप्त करता है — तत्त्ववेत्ताओं का मत है कि मेरी प्रसन्नता ही वह परम कल्याण है।

श्लोक 42 (bhagavata.3.9.42)

अहमात्मात्मनां धातः प्रेष्ठः सन् प्रेयसामपि । अतो मयि रतिं कुर्याद्देहादिर्यत्कृते प्रियः ॥ ४२ ॥

aham ātmātmanāṁ dhātaḥ preṣṭhaḥ san preyasām api ato mayi ratiṁ kuryād dehādir yat-kṛte priyaḥ

मैं ही समस्त आत्माओं का आत्मा और नियंता हूँ, और समस्त प्रिय वस्तुओं से भी अधिक प्रिय हूँ; अतः मनुष्य को मुझमें ही अनुराग करना चाहिए, क्योंकि जिसके निमित्त देह आदि प्रिय प्रतीत होते हैं, वह मैं ही हूँ।

श्लोक 43 (bhagavata.3.9.43)

सर्ववेदमयेनेदमात्मनात्मात्मयोनिना । प्रजाः सृज यथापूर्वं याश्च मय्यनुशेरते ॥ ४३ ॥

sarva-veda-mayenedam ātmanātmātma-yoninā prajāḥ sṛja yathā-pūrvaṁ yāś ca mayy anuśerate

अपनी उस देह के द्वारा, जो साक्षात् मुझसे उत्पन्न और सम्पूर्ण वेद-ज्ञान से युक्त है, पूर्व की भांति उन्हीं प्रजाओं की सृष्टि करो, जो अभी भी मुझमें ही शयन कर रही हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.3.9.44)

मैत्रेय उवाच तस्मा एवं जगत्स्रष्ट्रे प्रधानपुरुषेश्वरः । व्यज्येदं स्वेन रूपेण कञ्जनाभस्तिरोदधे ॥ ४४ ॥

maitreya uvāca tasmā evaṁ jagat-sraṣṭre pradhāna-puruṣeśvaraḥ vyajyedaṁ svena rūpeṇa kañja-nābhas tirodadhe

मैत्रेय ने कहा — विश्व के स्रष्टा ब्रह्मा को इस प्रकार उपदेश देकर, प्रकृति और पुरुष के स्वामी, कमलनाभ आदि-पुरुष भगवान अपने ही रूप में अंतर्धान हो गए।

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