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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13

भगवान वराह का अवतरण

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (bhagavata.3.13.1)

श्रीशुक उवाच निशम्य वाचं वदतो मुनेः पुण्यतमां नृप । भूयः पप्रच्छ कौरव्यो वासुदेवकथादृतः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca niśamya vācaṁ vadato muneḥ puṇyatamāṁ nṛpa bhūyaḥ papraccha kauravyo vāsudeva-kathādṛtaḥ

श्री शुकदेव ने कहा — हे राजन्! मैत्रेय मुनि की यह परम पुण्य वाणी सुनकर, वासुदेव-कथा के आदर करने वाले कुरुश्रेष्ठ विदुर ने पुनः प्रश्न किया।

श्लोक 2 (bhagavata.3.13.2)

विदुर उवाच स वै स्वायम्भुवः सम्राट् प्रियः पुत्रः स्वयम्भुवः । प्रतिलभ्य प्रियां पत्नीं किं चकार ततो मुने ॥ २ ॥

vidura uvāca sa vai svāyambhuvaḥ samrāṭ priyaḥ putraḥ svayambhuvaḥ pratilabhya priyāṁ patnīṁ kiṁ cakāra tato mune

विदुर ने कहा — हे मुने! अपनी प्रिय पत्नी को प्राप्त कर, ब्रह्मा के प्रिय पुत्र, सम्राट स्वायंभुव मनु ने तत्पश्चात् क्या किया?

श्लोक 3 (bhagavata.3.13.3)

चरितं तस्य राजर्षेरादिराजस्य सत्तम । ब्रूहि मे श्रद्दधानाय विष्वक्सेनाश्रयो ह्यसौ ॥ ३ ॥

caritaṁ tasya rājarṣer ādi-rājasya sattama brūhi me śraddadhānāya viṣvaksenāśrayo hy asau

हे सत्तम! उस राजर्षि, आदि राजा के चरित्र का वर्णन मुझ श्रद्धावान को कीजिए, क्योंकि वे भगवान विष्वक्सेन की शरण में थे।

श्लोक 4 (bhagavata.3.13.4)

श्रुतस्य पुंसां सुचिरश्रमस्य नन्वञ्जसा सूरिभिरीडितोऽर्थः । तत्तद्गुणानुश्रवणं मुकुन्द- पादारविन्द हृदयेषु येषाम् ॥ ४ ॥

śrutasya puṁsāṁ sucira-śramasya nanv añjasā sūribhir īḍito ’rthaḥ tat-tad-guṇānuśravaṇaṁ mukunda- pādāravindaṁ hṛdayeṣu yeṣām

निश्चय ही वह विषय, जिसे शुद्ध भक्तों ने विस्तार से समझाया है, उन श्रोताओं के दीर्घ परिश्रम के योग्य है, जिनके हृदय में मुकुंद के चरण-कमल निवास करते हैं और जो उनके गुणों का बारंबार श्रवण करते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.3.13.5)

श्रीशुक उवाच इति ब्रुवाणं विदुरं विनीतं सहस्रशीर्ष्णश्चरणोपधानम् । प्रहृष्टरोमा भगवत्कथायां प्रणीयमानो मुनिरभ्यचष्ट ॥ ५ ॥

śrī-śuka uvāca iti bruvāṇaṁ viduraṁ vinītaṁ sahasra-śīrṣṇaś caraṇopadhānam prahṛṣṭa-romā bhagavat-kathāyāṁ praṇīyamāno munir abhyacaṣṭa

श्री शुकदेव ने कहा — इस प्रकार विनम्र विदुर द्वारा संबोधित होकर, सहस्रशीर्ष भगवान की, जिनके चरण उनका आश्रय हैं, कथा में तल्लीन, रोमांचित मुनि मैत्रेय कहने लगे।

श्लोक 6 (bhagavata.3.13.6)

मैत्रेय उवाच यदा स्वभार्यया सार्धं जातः स्वायम्भुवो मनुः । प्राञ्जलिः प्रणतश्चेदं वेदगर्भमभाषत ॥ ६ ॥

maitreya uvāca yadā sva-bhāryayā sārdhaṁ jātaḥ svāyambhuvo manuḥ prāñjaliḥ praṇataś cedaṁ veda-garbham abhāṣata

मैत्रेय ने कहा — जब मानव-जाति के पिता स्वायंभुव मनु अपनी पत्नी सहित प्रकट हुए, तब उन्होंने हाथ जोड़कर, नमस्कार करते हुए वेदगर्भ ब्रह्मा से इस प्रकार कहा।

श्लोक 7 (bhagavata.3.13.7)

त्वमेकः सर्वभूतानां जन्मकृद् वृत्तिदः पिता । तथापि नः प्रजानां ते शुश्रूषा केन वा भवेत् ॥ ७ ॥

tvam ekaḥ sarva-bhūtānāṁ janma-kṛd vṛttidaḥ pitā tathāpi naḥ prajānāṁ te śuśrūṣā kena vā bhavet

आप ही समस्त प्राणियों के जन्मदाता और जीविका देने वाले पिता हैं; तथापि आपसे उत्पन्न हम प्रजाजन किस प्रकार आपकी सेवा कर सकते हैं?

श्लोक 8 (bhagavata.3.13.8)

तद्विधेहि नमस्तुभ्यं कर्मस्वीड्यात्मशक्तिषु । यत्कृत्वेह यशो विष्वगमुत्र च भवेद्गतिः ॥ ८ ॥

tad vidhehi namas tubhyaṁ karmasv īḍyātma-śaktiṣu yat kṛtveha yaśo viṣvag amutra ca bhaved gatiḥ

हे पूज्य! हमें उन कर्मों में निर्देशित कीजिए, जो हमारी सामर्थ्य के अंतर्गत हों, जिनके करने से इस लोक में कीर्ति और परलोक में सद्गति प्राप्त हो।

श्लोक 9 (bhagavata.3.13.9)

ब्रह्मोवाच प्रीतस्तुभ्यमहं तात स्वस्ति स्ताद्वां क्षितीश्वर । यन्निर्व्यलीकेन हृदा शाधि मेत्यात्मनार्पितम् ॥ ९ ॥

brahmovāca prītas tubhyam ahaṁ tāta svasti stād vāṁ kṣitīśvara yan nirvyalīkena hṛdā śādhi mety ātmanārpitam

ब्रह्मा ने कहा — हे प्रिय पुत्र! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; हे भूपति! तुम दोनों का कल्याण हो, क्योंकि तुमने निष्कपट हृदय से 'मुझे आदेश दीजिए' कहकर स्वयं को समर्पित किया है।

श्लोक 10 (bhagavata.3.13.10)

एतावत्यात्मजैर्वीर कार्या ह्यपचितिर्गुरौ । शक्त्याप्रमत्तैर्गृह्येत सादरं गतमत्सरैः ॥ १० ॥

etāvaty ātmajair vīra kāryā hy apacitir gurau śaktyāpramattair gṛhyeta sādaraṁ gata-matsaraiḥ

हे वीर! संतानों को अपने गुरुजन की ऐसी ही सेवा करनी चाहिए — सामर्थ्य भर, सावधानी और उल्लासपूर्वक, ईर्ष्यारहित होकर स्वीकार की गई।

श्लोक 11 (bhagavata.3.13.11)

स त्वमस्यामपत्यानि सदृशान्यात्मनो गुणैः । उत्पाद्य शास धर्मेण गां यज्ञैः पुरुषं यज ॥ ११ ॥

sa tvam asyām apatyāni sadṛśāny ātmano guṇaiḥ utpādya śāsa dharmeṇa gāṁ yajñaiḥ puruṣaṁ yaja

अतः तुम अपने ही गुणों से युक्त संतानों को इस स्त्री में उत्पन्न कर, धर्मानुसार पृथ्वी का शासन करो, और यज्ञों द्वारा परम पुरुष भगवान की उपासना करो।

श्लोक 12 (bhagavata.3.13.12)

स त्वमस्यामपत्यानि सदृशान्यात्मनो गुणैः । उत्पाद्य शास धर्मेण गां यज्ञैः पुरुषं यज ॥ ११ ॥

paraṁ śuśrūṣaṇaṁ mahyaṁ syāt prajā-rakṣayā nṛpa bhagavāṁs te prajā-bhartur hṛṣīkeśo ’nutuṣyati

हे राजन्! मेरी सर्वोच्च सेवा यही होगी कि तुम इस संसार में उत्पन्न प्रजाजनों की रक्षा करो; प्रजा के रक्षक तुमसे भगवान हृषीकेश स्वयं संतुष्ट होते हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.3.13.13)

येषां न तुष्टो भगवान् यज्ञलिङ्गो जनार्दनः । तेषां श्रमो ह्यपार्थाय यदात्मा नादृतः स्वयम् ॥ १३ ॥

yeṣāṁ na tuṣṭo bhagavān yajña-liṅgo janārdanaḥ teṣāṁ śramo hy apārthāya yad ātmā nādṛtaḥ svayam

जिनसे यज्ञ-स्वरूप भगवान जनार्दन संतुष्ट नहीं होते, उनका सारा परिश्रम निरर्थक ही है, क्योंकि उन्होंने अपने ही परमात्मा का आदर नहीं किया।

श्लोक 14 (bhagavata.3.13.14)

मनुरुवाच आदेशेऽहं भगवतो वर्तेयामीवसूदन । स्थानं त्विहानुजानीहि प्रजानां मम च प्रभो ॥ १४ ॥

manur uvāca ādeśe ’haṁ bhagavato varteyāmīva-sūdana sthānaṁ tv ihānujānīhi prajānāṁ mama ca prabho

मनु ने कहा — हे अमीव-सूदन! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा; परंतु हे प्रभु! कृपया मुझे बताइए कि इस संसार में मैं तथा मेरी प्रजा कहाँ निवास करें।

श्लोक 15 (bhagavata.3.13.15)

यदोकः सर्वभूतानां मही मग्ना महाम्भसि । अस्या उद्धरणे यत्नो देव देव्या विधीयताम् ॥ १५ ॥

yad okaḥ sarva-bhūtānāṁ mahī magnā mahāmbhasi asyā uddharaṇe yatno deva devyā vidhīyatām

हे देवेश! समस्त प्राणियों का निवास-स्थान यह पृथ्वी विशाल जल में डूब गई है; इस पृथ्वी-देवी को ऊपर उठाने का प्रयास कीजिए।

श्लोक 16 (bhagavata.3.13.16)

मैत्रेय उवाच परमेष्ठी त्वपां मध्ये तथा सन्नामवेक्ष्य गाम् । कथमेनां समुन्नेष्य इति दध्यौ धिया चिरम् ॥ १६ ॥

maitreya uvāca parameṣṭhī tv apāṁ madhye tathā sannām avekṣya gām katham enāṁ samunneṣya iti dadhyau dhiyā ciram

मैत्रेय ने कहा — जल के मध्य इस प्रकार डूबी हुई पृथ्वी को देखकर, परमेष्ठी ब्रह्मा ने बहुत समय तक अपनी बुद्धि से यह विचार किया — मैं इसे कैसे उठाऊँ?

श्लोक 17 (bhagavata.3.13.17)

सृजतो मे क्षितिर्वार्भिःप्लाव्यमाना रसां गता । अथात्र किमनुष्ठेयमस्माभिः सर्गयोजितैः । यस्याहं हृदयादासं स ईशो विदधातु मे ॥ १७ ॥

sṛjato me kṣitir vārbhiḥ plāvyamānā rasāṁ gatā athātra kim anuṣṭheyam asmābhiḥ sarga-yojitaiḥ yasyāhaṁ hṛdayād āsaṁ sa īśo vidadhātu me

सृष्टि में लगे हुए मुझसे यह पृथ्वी जल से आप्लावित होकर गहराई में चली गई; अतः सृष्टि-कार्य में नियुक्त हम क्या करें? जिनके हृदय से मैं उत्पन्न हुआ, वे प्रभु ही मुझे मार्ग दिखाएँ।

श्लोक 18 (bhagavata.3.13.18)

इत्यभिध्यायतो नासाविवरात्सहसानघ । वराहतोको निरगादङ्गुष्ठपरिमाणकः ॥ १८ ॥

ity abhidhyāyato nāsā- vivarāt sahasānagha varāha-toko niragād aṅguṣṭha-parimāṇakaḥ

हे निष्पाप! इस प्रकार चिंतन करते हुए, सहसा उनकी नासिका से अंगुष्ठ-मात्र आकार का एक लघु वराह-रूप निकल पड़ा।

श्लोक 19 (bhagavata.3.13.19)

तस्याभिपश्यतः खस्थः क्षणेन किल भारत । गजमात्रः प्रववृधे तदद्भुतमभून्महत् ॥ १९ ॥

tasyābhipaśyataḥ kha-sthaḥ kṣaṇena kila bhārata gaja-mātraḥ pravavṛdhe tad adbhutam abhūn mahat

हे भारत! उसे देखते-देखते ही, आकाश में स्थित वह रूप क्षण भर में हाथी के आकार तक बढ़ गया — यह एक महान अद्भुत परिवर्तन था।

श्लोक 20 (bhagavata.3.13.20)

मरीचिप्रमुखैर्विप्रैः कुमारैर्मनुना सह । हृष्ट्वा तत्सौकरं रूपं तर्कयामास चित्रधा ॥ २० ॥

marīci-pramukhair vipraiḥ kumārair manunā saha dṛṣṭvā tat saukaraṁ rūpaṁ tarkayām āsa citradhā

उस शूकर-रूप को देखकर मरीचि आदि ब्राह्मणों ने, कुमारों तथा मनु के साथ, नाना प्रकार से आपस में विचार-विमर्श करना आरंभ किया।

श्लोक 21 (bhagavata.3.13.21)

किमेतत्सूकरव्याजं सत्त्वं दिव्यमवस्थितम् । अहो बताश्चर्यमिदं नासाया मे विनिःसृतम् ॥ २१ ॥

kim etat sūkara-vyājaṁ sattvaṁ divyam avasthitam aho batāścaryam idaṁ nāsāyā me viniḥsṛtam

यह क्या है — शूकर के छद्म रूप में स्थित यह दिव्य सत्ता? अहो, यह कितना अद्भुत है कि यह मेरी ही नासिका से निकला है!

श्लोक 22 (bhagavata.3.13.22)

दृष्टोऽङ्गुष्ठशिरोमात्रः क्षणाद्गण्डशिलासमः । अपि स्विद्भगवानेष यज्ञो मे खेदयन्मनः ॥ २२ ॥

dṛṣṭo ’ṅguṣṭha-śiro-mātraḥ kṣaṇād gaṇḍa-śilā-samaḥ api svid bhagavān eṣa yajño me khedayan manaḥ

क्षण भर पहले जो अंगुष्ठ के अग्रभाग जितना दिखा था, वही अब पल भर में विशाल शिला के समान हो गया है; क्या यह स्वयं यज्ञ-स्वरूप भगवान हैं, जिनकी उपस्थिति मेरे मन को व्याकुल कर रही है?

श्लोक 23 (bhagavata.3.13.23)

इति मीमांसतस्तस्य ब्रह्मणः सह सूनुभिः । भगवान् यज्ञपुरुषो जगर्जागेन्द्रसन्निभः ॥ २३ ॥

iti mīmāṁsatas tasya brahmaṇaḥ saha sūnubhiḥ bhagavān yajña-puruṣo jagarjāgendra-sannibhaḥ

इस प्रकार ब्रह्मा जब अपने पुत्रों सहित विचार-विमर्श कर रहे थे, तभी यज्ञ-स्वरूप भगवान एक विशाल पर्वत के समान गर्जना करने लगे।

श्लोक 24 (bhagavata.3.13.24)

ब्रह्माणं हर्षयामास हरिस्तांश्च द्विजोत्तमान् । स्वगर्जितेन ककुभः प्रतिस्वनयता विभुः ॥ २४ ॥

brahmāṇaṁ harṣayām āsa haris tāṁś ca dvijottamān sva-garjitena kakubhaḥ pratisvanayatā vibhuḥ

सर्वशक्तिमान भगवान हरि ने अपनी गर्जना से, जो समस्त दिशाओं में गूँज उठी, ब्रह्मा तथा उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों के हृदय को हर्षित कर दिया।

श्लोक 25 (bhagavata.3.13.25)

निशम्य ते घर्घरितं स्वखेद- क्षयिष्णु मायामयसूकरस्य । जनस्तपःसत्यनिवासिनस्ते त्रिभिः पवित्रैर्मुनयोऽगृणन् स्म ॥ २५ ॥

niśamya te ghargharitaṁ sva-kheda- kṣayiṣṇu māyāmaya-sūkarasya janas-tapaḥ-satya-nivāsinas te tribhiḥ pavitrair munayo ’gṛṇan sma

उस मायामय वराह-रूप भगवान की उस गंभीर गर्जना को — जो सुनने वालों के शोक का नाश करती है — सुनकर, जन, तप तथा सत्यलोक के निवासी मुनियों ने तीनों वेदों के पवित्र मंत्रों का उच्चारण किया।

श्लोक 26 (bhagavata.3.13.26)

तेषां सतां वेदवितानमूर्ति- र्ब्रह्मावधार्यात्मगुणानुवादम् । विनद्य भूयो विबुधोदयाय गजेन्द्रलीलो जलमाविवेश ॥ २६ ॥

teṣāṁ satāṁ veda-vitāna-mūrtir brahmāvadhāryātma-guṇānuvādam vinadya bhūyo vibudhodayāya gajendra-līlo jalam āviveśa

यह जानकर कि यह वेदों के विस्तार का ही रूप है, ब्रह्मा ने उन सज्जनों की भलाई हेतु अपनी उस दिव्य महिमा को पुनः गुंजायमान किया, और तत्पश्चात्, गजराज की भाँति क्रीड़ा करते हुए, वे जल में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 27 (bhagavata.3.13.27)

उत्क्षिप्तवालः खचरः कठोरः सटा विधुन्वन् खररोमशत्वक् । खुराहताभ्रः सितदंष्ट्र ईक्षा- ज्योतिर्बभासे भगवान्महीध्रः ॥ २७ ॥

utkṣipta-vālaḥ kha-caraḥ kaṭhoraḥ saṭā vidhunvan khara-romaśa-tvak khurāhatābhraḥ sita-daṁṣṭra īkṣā- jyotir babhāse bhagavān mahīdhraḥ

आकाश में पूँछ फटकारते हुए, कठोर एवं रोमिल अयाल को हिलाते हुए, खुरों से बादलों को आघात पहुँचाते हुए, श्वेत दाढ़ों सहित — पृथ्वी को धारण करने वाले भगवान अपनी तेजस्वी दृष्टि से प्रकाशमान हो उठे।

श्लोक 28 (bhagavata.3.13.28)

घ्राणेन पृथ्व्याः पदवीं विजिघ्रन् क्रोडापदेशः स्वयमध्वराङ्गः । करालदंष्ट्रोऽप्यकरालदृग्भ्या- मुद्वीक्ष्य विप्रान् गृणतोऽविशत्कम् ॥ २८ ॥

ghrāṇena pṛthvyāḥ padavīṁ vijighran kroḍāpadeśaḥ svayam adhvarāṅgaḥ karāla-daṁṣṭro ’py akarāla-dṛgbhyām udvīkṣya viprān gṛṇato ’viśat kam

अपनी घ्राण-शक्ति से पृथ्वी का पता ढूँढ़ते हुए, शूकर के छद्म रूप में भी दिव्य देहधारी, भयंकर दाढ़ों वाले किंतु सौम्य दृष्टि से युक्त, वे प्रार्थना करते ब्राह्मणों की ओर देखकर जल में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 29 (bhagavata.3.13.29)

स वज्रकूटाङ्गनिपातवेग- विशीर्णकुक्षिः स्तनयन्नुदन्वान् । उत्सृष्टदीर्घोर्मिभुजैरिवार्त- श्चुक्रोश यज्ञेश्वर पाहि मेति ॥ २९ ॥

sa vajra-kūṭāṅga-nipāta-vega- viśīrṇa-kukṣiḥ stanayann udanvān utsṛṣṭa-dīrghormi-bhujair ivārtaś cukrośa yajñeśvara pāhi meti

उनके प्रचंड वेग से गोता लगाने पर वज्र-सम काय से विदीर्ण होकर वह समुद्र मानो व्यथित हो उठा, अपनी ऊँची तरंगों को भुजाओं की भाँति उठाकर पुकार उठा — हे यज्ञेश्वर! मेरी रक्षा कीजिए!

श्लोक 30 (bhagavata.3.13.30)

खुरैः क्षुरप्रैर्दरयंस्तदाप उत्पारपारं त्रिपरू रसायाम् । ददर्श गां तत्र सुषुप्सुरग्रे यां जीवधानीं स्वयमभ्यधत्त ॥ ३० ॥

khuraiḥ kṣuraprair darayaṁs tad āpa utpāra-pāraṁ tri-parū rasāyām dadarśa gāṁ tatra suṣupsur agre yāṁ jīva-dhānīṁ svayam abhyadhatta

अपने क्षुर के समान तीक्ष्ण खुरों से उस जल को विदीर्ण करते हुए, यज्ञ-स्वामी उस असीम जल की सीमा तक पहुँचे, और वहाँ, आदिकाल में पड़ी हुई पृथ्वी को — जो स्वयं समस्त जीवों का आश्रय है — पाकर स्वयं ही ऊपर उठा लिया।

श्लोक 31 (bhagavata.3.13.31)

स्वदंष्ट्रयोद्धृत्य महीं निमग्नां स उत्थितः संरुरुचे रसायाः । तत्रापि दैत्यं गदयापतन्तं सुनाभसन्दीपिततीव्रमन्युः ॥ ३१ ॥

sva-daṁṣṭrayoddhṛtya mahīṁ nimagnāṁ sa utthitaḥ saṁruruce rasāyāḥ tatrāpi daityaṁ gadayāpatantaṁ sunābha-sandīpita-tīvra-manyuḥ

अपनी ही दाढ़ों पर डूबी हुई पृथ्वी को उठाकर, वे जल से अत्यंत तेजस्वी होकर उठे; और वहीं, अपने चक्र के समान प्रज्वलित उग्र क्रोध सहित, गदा लिए दौड़ते हुए एक दैत्य का सामना किया।

श्लोक 32 (bhagavata.3.13.32)

जघान रुन्धानमसह्यविक्रमं स लीलयेभं मृगराडिवाम्भसि । तद्रक्तपङ्काङ्कितगण्डतुण्डो यथा गजेन्द्रो जगतीं विभिन्दन् ॥ ३२ ॥

jaghāna rundhānam asahya-vikramaṁ sa līlayebhaṁ mṛgarāḍ ivāmbhasi tad-rakta-paṅkāṅkita-gaṇḍa-tuṇḍo yathā gajendro jagatīṁ vibhindan

उस असह्य पराक्रमी बाधक शत्रु को उन्होंने सहज ही मार गिराया, जैसे सिंह जल में हाथी को मार डालता है; उस दैत्य के रक्त से सने हुए कपोल और दाढ़ों सहित, वे गजराज की भाँति पृथ्वी को खोदते रहे।

श्लोक 33 (bhagavata.3.13.33)

तमालनीलं सितदन्तकोट्या क्ष्मामुत्क्षिपन्तं गजलीलयाङ्ग । प्रज्ञाय बद्धाञ्जलयोऽनुवाकै- र्विरिञ्चिमुख्या उपतस्थुरीशम् ॥ ३३ ॥

tamāla-nīlaṁ sita-danta-koṭyā kṣmām utkṣipantaṁ gaja-līlayāṅga prajñāya baddhāñjalayo ’nuvākair viriñci-mukhyā upatasthur īśam

हे वत्स! तमाल वृक्ष के समान श्याम, अपनी श्वेत दाढ़ों की वक्र धार पर पृथ्वी को उठाए हुए, गजराज की भाँति क्रीड़ा करते हुए उन्हें देखकर, ब्रह्मा आदि ऋषिगण हाथ जोड़कर वैदिक मंत्रों से भगवान की स्तुति करने लगे।

श्लोक 34 (bhagavata.3.13.34)

ऋषय ऊचुः जितं जितं तेऽजित यज्ञभावन त्रयीं तनुं स्वां परिधुन्वते नमः । यद्रोमगर्ेषु निलिल्युरद्धय- स्तस्मै नमः कारणसूकराय ते ॥ ३४ ॥

ṛṣaya ūcuḥ jitaṁ jitaṁ te ’jita yajña-bhāvana trayīṁ tanuṁ svāṁ paridhunvate namaḥ yad-roma-garteṣu nililyur addhayas tasmai namaḥ kāraṇa-sūkarāya te

ऋषियों ने कहा — हे अजित! हे यज्ञभावन! आपकी जय हो, जय हो! अपने ही उस देह को, जो साक्षात् वेदत्रयी है, कंपाते हुए आपको नमस्कार है, जिनके रोमकूपों में समुद्र समा जाते हैं — हे सकारण शूकर-रूप! आपको नमस्कार है।

श्लोक 35 (bhagavata.3.13.35)

रूपं तवैतन्ननु दुष्कृतात्मनां दुर्दर्शनं देव यदध्वरात्मकम् । छन्दांसि यस्य त्वचि बर्हिरोम- स्वाज्यं दृशि त्वङ्घ्रि षु चातुर्होत्रम् ॥ ३५ ॥

rūpaṁ tavaitan nanu duṣkṛtātmanāṁ durdarśanaṁ deva yad adhvarātmakam chandāṁsi yasya tvaci barhi-romasv ājyaṁ dṛśi tv aṅghriṣu cātur-hotram

हे देव! आपका यह रूप, जो स्वयं यज्ञ-स्वरूप है, पापी आत्माओं के लिए दुर्लभ है — छंद आपकी त्वचा में, कुशा आपके रोमों में, घृत आपके नेत्रों में, तथा चातुर्होत्र आपके चरणों में निवास करते हैं।

श्लोक 36 (bhagavata.3.13.36)

स्रक्तुण्ड आसीत्स्रुव ईश नासयो- रिडोदरे चमसाः कर्णरन्ध्रे । प्राशित्रमास्ये ग्रसने ग्रहास्तु ते यच्चर्वणं ते भगवन्नग्निहोत्रम् ॥ ३६ ॥

srak tuṇḍa āsīt sruva īśa nāsayor iḍodare camasāḥ karṇa-randhre prāśitram āsye grasane grahās tu te yac carvaṇaṁ te bhagavann agni-hotram

हे ईश! सृक् पात्र आपकी जिह्वा पर है, स्रुव आपकी नासिका में, इडा आपके उदर में, चमस आपके कर्ण-छिद्रों में, प्राशित्र आपके मुख में, तथा सोम-पात्र आपके कंठ में स्थित हैं — हे भगवन्! आपका चर्वण ही आपका अग्निहोत्र है।

श्लोक 37 (bhagavata.3.13.37)

दीक्षानुजन्मोपसदः शिरोधरं त्वं प्रायणीयोदयनीयदंष्ट्रः । जिह्वा प्रवर्ग्यस्तव शीर्षकं क्रतोः सत्यावसथ्यं चितयोऽसवो हि ते ॥ ३७ ॥

dīkṣānujanmopasadaḥ śirodharaṁ tvaṁ prāyaṇīyodayanīya-daṁṣṭraḥ jihvā pravargyas tava śīrṣakaṁ kratoḥ satyāvasathyaṁ citayo ’savo hi te

दीक्षा और उसके फलस्वरूप पुनर्जन्म आपके उपसद हैं, और आपकी ग्रीवा है; प्रायणीय तथा उदयनीय आहुतियाँ आपकी दाढ़ें हैं; प्रवर्ग्य कर्म आपकी जिह्वा है; यज्ञ का शीर्ष आपका स्वयं का शीर्ष है; सत्य तथा आवसथ्य अग्नियाँ, तथा समस्त वांछित फलों का समुच्चय ही आपके प्राण हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.3.13.38)

सोमस्तु रेतः सवनान्यवस्थितिः संस्थाविभेदास्तव देव धातवः । सत्राणि सर्वाणि शरीरसन्धि- स्त्वं सर्वयज्ञक्रतुरिष्टिबन्धनः ॥ ३८ ॥

somas tu retaḥ savanāny avasthitiḥ saṁsthā-vibhedās tava deva dhātavaḥ satrāṇi sarvāṇi śarīra-sandhis tvaṁ sarva-yajña-kratur iṣṭi-bandhanaḥ

हे देव! सोम-यज्ञ आपका वीर्य है; प्रातःकालीन सवन आपकी देह-स्थिति है; सात प्रकार की संस्थाएँ आपके शरीर के धातु हैं; द्वादश-दिवसीय सत्र यज्ञ आपके शरीर की संधियाँ हैं; आप ही समस्त यज्ञों के समुच्चय, समस्त इष्टियों के बंधन-स्वरूप हैं।

श्लोक 39 (bhagavata.3.13.39)

नमो नमस्तेऽखिलमन्त्रदेवता- द्रव्याय सर्वक्रतवे क्रियात्मने । वैराग्यभक्त्यात्मजयानुभावित- ज्ञानाय विद्यागुरवे नमो नमः ॥ ३९ ॥

namo namas te ’khila-mantra-devatā- dravyāya sarva-kratave kriyātmane vairāgya-bhaktyātmajayānubhāvita- jñānāya vidyā-gurave namo namaḥ

आपको बार-बार नमस्कार है, जो समस्त मंत्रों और देवताओं के द्रव्य-स्वरूप हैं, समस्त यज्ञों के योग्य, स्वयं क्रिया के स्वरूप हैं; वैराग्य, भक्ति तथा आत्म-विजय से अनुभूत होने वाले, विद्या के परम गुरु, आपको बारंबार नमस्कार है।

श्लोक 40 (bhagavata.3.13.40)

दंष्ट्राग्रकोट्या भगवंस्त्वया धृता विराजते भूधर भूः सभूधरा । यथा वनान्निःसरतो दता धृता मतङ्गजेन्द्रस्य सपत्रपद्मिनी ॥ ४० ॥

daṁṣṭrāgra-koṭyā bhagavaṁs tvayā dhṛtā virājate bhūdhara bhūḥ sa-bhūdharā yathā vanān niḥsarato datā dhṛtā mataṅ-gajendrasya sa-patra-padminī

हे भगवन्, हे भूधर! आपकी दाढ़ों के अग्रभाग पर धारण की गई पर्वतों सहित यह पृथ्वी उसी प्रकार सुशोभित हो रही है, जैसे वन-सरोवर से निकलते मत्त गजेंद्र की दाढ़ पर, पत्तों सहित धारण किया गया कमल सुशोभित होता है।

श्लोक 41 (bhagavata.3.13.41)

त्रयीमयं रूपमिदं च सौकरं भूमण्डलेनाथ दता धृतेन ते । चकास्ति शृङ्गोढघनेन भूयसा कुलाचलेन्द्रस्य यथैव विभ्रमः ॥ ४१ ॥

trayīmayaṁ rūpam idaṁ ca saukaraṁ bhū-maṇḍalenātha datā dhṛtena te cakāsti śṛṅgoḍha-ghanena bhūyasā kulācalendrasya yathaiva vibhramaḥ

आपका यह त्रयीमय शूकर-रूप, दाढ़ पर धारित पृथ्वी-मंडल सहित, और भी अधिक प्रकाशमान हो रहा है — जैसे बादलों को धारण किए हुए विशाल पर्वतराज का शिखर अपनी शोभा से चमकता है।

श्लोक 42 (bhagavata.3.13.42)

संस्थापयैनां जगतां सतस्थुषां लोकाय पत्नीमसि मातरं पिता । विधेम चास्यै नमसा सह त्वया यस्यां स्वतेजोऽग्निमिवारणावधाः ॥ ४२ ॥

saṁsthāpayaināṁ jagatāṁ sa-tasthuṣāṁ lokāya patnīm asi mātaraṁ pitā vidhema cāsyai namasā saha tvayā yasyāṁ sva-tejo ’gnim ivāraṇāv adhāḥ

इस पृथ्वी को चराचर जगत के निवास हेतु उसके स्थान पर पुनः स्थापित कीजिए; आप ही इसके पिता हैं, और आप ही माता भी; आपके साथ हम इसे भी नमस्कार अर्पित करते हैं, जिसमें आपने अरणि की काष्ठ में अग्नि के समान अपना ही तेज स्थापित किया है।

श्लोक 43 (bhagavata.3.13.43)

कः श्रद्दधीतान्यतमस्तव प्रभो रसां गताया भुव उद्विबर्हणम् । न विस्मयोऽसौ त्वयि विश्वविस्मये यो माययेदं ससृजेऽतिविस्मयम् ॥ ४३ ॥

kaḥ śraddadhītānyatamas tava prabho rasāṁ gatāyā bhuva udvibarhaṇam na vismayo ’sau tvayi viśva-vismaye yo māyayedaṁ sasṛje ’tivismayam

हे प्रभु! जल में डूबी हुई पृथ्वी के उद्धार का प्रयत्न आपके अतिरिक्त और कौन कर सकता है? किंतु यह आपके लिए कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि आप स्वयं ही विश्व के आश्चर्य हैं, जिन्होंने अपनी ही माया से इस अति-अद्भुत सृष्टि की रचना की।

श्लोक 44 (bhagavata.3.13.44)

विधुन्वता वेदमयं निजं वपु- र्जनस्तपःसत्यनिवासिनो वयम् । सटाशिखोद्धूतशिवाम्बुबिन्दुभि- र्विमृज्यमाना भृशमीश पाविताः ॥ ४४ ॥

vidhunvatā vedamayaṁ nijaṁ vapur janas-tapaḥ-satya-nivāsino vayam saṭā-śikhoddhūta-śivāmbu-bindubhir vimṛjyamānā bhṛśam īśa pāvitāḥ

हे ईश! जन, तप तथा सत्यलोक के निवासी हम, आपके इस वेदस्वरूप शरीर को हिलाने से, आपकी अयाल के अग्रभाग से बिखरी हुई मंगलमय जल की बूंदों से सिंचित होकर अत्यंत पवित्र हो रहे हैं।

श्लोक 45 (bhagavata.3.13.45)

स वै बत भ्रष्टमतिस्तवैषते यः कर्मणां पारमपारकर्मणः । यद्योगमायागुणयोगमोहितं विश्वं समस्तं भगवन् विधेहि शम् ॥ ४५ ॥

sa vai bata bhraṣṭa-matis tavaiṣate yaḥ karmaṇāṁ pāram apāra-karmaṇaḥ yad-yoga-māyā-guṇa-yoga-mohitaṁ viśvaṁ samastaṁ bhagavan vidhehi śam

अहो! जो आपसे आपके अतिरिक्त किसी और वस्तु की कामना करता है, वह वास्तव में भ्रष्टबुद्धि है — आपसे, जिनके कर्म असीम हैं और जिनकी अपनी कोई सीमा किसी कर्म से नहीं मापी जा सकती; जिनकी योगमाया के गुणों से यह समस्त विश्व मोहित है, हे भगवन्! कृपया इस पर कल्याण की वर्षा कीजिए।

श्लोक 46 (bhagavata.3.13.46)

मैत्रेय उवाच इत्युपस्थीयमानोऽसौ मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः । सलिले स्वखुराक्रान्त उपाधत्तावितावनिम् ॥ ४६ ॥

maitreya uvāca ity upasthīyamāno ’sau munibhir brahma-vādibhiḥ salile sva-khurākrānta upādhattāvitāvanim

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार ब्रह्मवादी मुनियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, उस भगवान वराह ने अपने खुर को जल पर टिकाए हुए, समस्त जगत के पालक ने, पृथ्वी को कोमलता से स्थापित कर दिया।

श्लोक 47 (bhagavata.3.13.47)

स इत्थं भगवानुर्वीं विष्वक्सेनः प्रजापतिः । रसाया लीलयोन्नीतामप्सु न्यस्य ययौ हरिः ॥ ४७ ॥

sa itthaṁ bhagavān urvīṁ viṣvaksenaḥ prajāpatiḥ rasāyā līlayonnītām apsu nyasya yayau hariḥ

इस प्रकार भगवान विष्वक्सेन, समस्त प्रजा के स्वामी, ने जल के भीतर से पृथ्वी को सहजता से उठाकर, उसे जल के ऊपर स्थापित किया, और स्वयं हरि अपने धाम को लौट गए।

श्लोक 48 (bhagavata.3.13.48)

य एवमेतां हरिमेधसो हरेः । कथां सुभद्रां कथनीयमायिनः । शृण्वीत भक्त्या श्रवयेत वोशतीं जनार्दनोऽस्याशु हृदि प्रसीदति ॥ ४८ ॥

ya evam etāṁ hari-medhaso hareḥ kathāṁ subhadrāṁ kathanīya-māyinaḥ śṛṇvīta bhaktyā śravayeta vośatīṁ janārdano ’syāśu hṛdi prasīdati

जो कोई भक्तिपूर्वक हरि की, जो अपनी शक्ति से अत्यंत करुणामय हैं तथा जो भक्तों के भवबंधन का नाश करते हैं, इस परम मंगलमय और सुखद कथा को सुनता है, अथवा दूसरों को सुनाता है — उसके हृदय में भगवान जनार्दन शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं।

श्लोक 49 (bhagavata.3.13.49)

तस्मिन् प्रसन्ने सकलाशिषां प्रभौ किं दुर्लभं ताभिरलं लवात्मभिः । अनन्यदृष्टया भजतां गुहाशयः स्वयं विधत्ते स्वगतिं परः पराम् ॥ ४९ ॥

tasmin prasanne sakalāśiṣāṁ prabhau kiṁ durlabhaṁ tābhir alaṁ lavātmabhiḥ ananya-dṛṣṭyā bhajatāṁ guhāśayaḥ svayaṁ vidhatte sva-gatiṁ paraḥ parām

जब वे समस्त वरदानों के स्वामी प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, तो फिर क्या दुर्लभ रह जाता है? उन तुच्छ, क्षणिक लाभों से क्या लेना-देना — क्योंकि हृदय में निवास करने वाले परमेश्वर स्वयं ही अनन्य दृष्टि से भजन करने वालों को अपना परम, दिव्य धाम प्रदान करते हैं।

श्लोक 50 (bhagavata.3.13.50)

को नाम लोके पुरुषार्थसारवित् पुराकथानां भगवत्कथासुधाम् । आपीय कर्णाञ्जलिभिर्भवापहा- महो विरज्येत विना नरेतरम् ॥ ५० ॥

ko nāma loke puruṣārtha-sāravit purā-kathānāṁ bhagavat-kathā-sudhām āpīya karṇāñjalibhir bhavāpahām aho virajyeta vinā naretaram

इस संसार में पुरुषार्थ के सार को जानने वाला ऐसा कौन है, जो अपने कर्ण-अंजलि से पुरातन कथाओं में सर्वश्रेष्ठ भगवत्कथा के उस अमृत का, जो भवबंधन का नाश करता है, पान करके भी उससे विरक्त रह सके — जब तक कि वह मनुष्येतर न हो?

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