तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26
भौतिक प्रकृति के मूल तत्त्व
श्लोक 1 (bhagavata.3.26.1)
श्रीभगवानुवाच अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि तत्त्वानां लक्षणं पृथक् । यद्विदित्वा विमुच्येत पुरुषः प्राकृतैर्गुणैः ॥ 26.1 ॥
śrī-bhagavān uvāca atha te sampravakṣyāmi tattvānāṁ lakṣaṇaṁ pṛthak yad viditvā vimucyeta puruṣaḥ prākṛtair guṇaiḥ
श्रीभगवान ने कहा — अब मैं तुम्हें तत्त्वों का लक्षण एक-एक करके बताऊँगा, जिसे जानकर पुरुष प्राकृत गुणों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (bhagavata.3.26.2)
ज्ञानं निःश्रेयसार्थाय पुरुषस्यात्मदर्शनम् । यदाहुर्वर्णये तत्ते हृदयग्रन्थिभेदनम् ॥ 26.2 ॥
jñānaṁ niḥśreyasārthāya puruṣasyātma-darśanam yad āhur varṇaye tat te hṛdaya-granthi-bhedanam
ज्ञान वही है जो पुरुष के परम कल्याण के लिए आत्मदर्शन कराता है। मैं तुम्हें वह ज्ञान बताता हूँ, जिसे हृदय की ग्रंथि को काटने वाला कहा गया है।
श्लोक 3 (bhagavata.3.26.3)
अनादिरात्मा पुरुषो निर्गुणः प्रकृतेः परः । प्रत्यग्धामा स्वयंज्योतिर्विश्वं येन समन्वितम् ॥ 26.3 ॥
anādir ātmā puruṣo nirguṇaḥ prakṛteḥ paraḥ pratyag-dhāmā svayaṁ-jyotir viśvaṁ yena samanvitam
आत्मा अर्थात् पुरुष अनादि है, गुणों से रहित है और प्रकृति से परे है। वह सर्वत्र व्याप्त, स्वयंप्रकाश है, और उसी के द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व अनुप्राणित है।
श्लोक 4 (bhagavata.3.26.4)
स एष प्रकृतिं सूक्ष्मां दैवीं गुणमयीं विभुः । यदृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया ॥ 26.4 ॥
sa eṣa prakṛtiṁ sūkṣmāṁ daivīṁ guṇa-mayīṁ vibhuḥ yadṛcchayaivopagatām abhyapadyata līlayā
वह सर्वशक्तिमान पुरुष अपनी लीला से, अपनी ही इच्छा से समीप आई हुई उस सूक्ष्म, दैवी और त्रिगुणमयी प्रकृति को स्वीकार करता है।
श्लोक 5 (bhagavata.3.26.5)
गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः । विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया ॥ 26.5 ॥
guṇair vicitrāḥ sṛjatīṁ sa-rūpāḥ prakṛtiṁ prajāḥ vilokya mumuhe sadyaḥ sa iha jñāna-gūhayā
गुणों के कारण विचित्र रूप धारण करने वाली प्रकृति जब प्रजा की सृष्टि करती हुई देखी जाती है, तब जीव उसे देखकर ज्ञान को ढकने वाली उस माया से तुरन्त मोहित हो जाता है।
श्लोक 6 (bhagavata.3.26.6)
एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान् । कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते ॥ 26.6 ॥
evaṁ parābhidhyānena kartṛtvaṁ prakṛteḥ pumān karmasu kriyamāṇeṣu guṇair ātmani manyate
इस प्रकार पर-वस्तु के साथ तादात्म्य कर लेने के कारण जीव, प्रकृति द्वारा किये जा रहे कर्मों के कर्तृत्व को गुणों के प्रभाव से अपने ऊपर आरोपित मान लेता है।
श्लोक 7 (bhagavata.3.26.7)
तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् । भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः ॥ 26.7 ॥
tad asya saṁsṛtir bandhaḥ pāra-tantryaṁ ca tat-kṛtam bhavaty akartur īśasya sākṣiṇo nirvṛtātmanaḥ
इसी भ्रम से उत्पन्न यह संसार-बन्धन और परतन्त्रता उस जीव को घेर लेती है, जो वास्तव में अकर्ता, ईश्वरस्वरूप, केवल साक्षी और स्वभाव से आनन्दमय है।
श्लोक 8 (bhagavata.3.26.8)
कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः । भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥ 26.8 ॥
kārya-kāraṇa-kartṛtve kāraṇaṁ prakṛtiṁ viduḥ bhoktṛtve sukha-duḥkhānāṁ puruṣaṁ prakṛteḥ param
विद्वान जानते हैं कि कार्य और करण अर्थात् शरीर और इन्द्रियों के कर्तृत्व का कारण प्रकृति है; परन्तु सुख-दुःख के भोक्तृत्व में प्रकृति से परे पुरुष ही कारण है।
श्लोक 9 (bhagavata.3.26.9)
देवहूतिरुवाच प्रकृतेः पुरुषस्यापि लक्षणं पुरुषोत्तम । ब्रूहि कारणयोरस्य सदसच्च यदात्मकम् ॥ 26.9 ॥
devahūtir uvāca prakṛteḥ puruṣasyāpi lakṣaṇaṁ puruṣottama brūhi kāraṇayor asya sad-asac ca yad-ātmakam
देवहूति ने कहा — हे पुरुषोत्तम, कृपया प्रकृति और पुरुष दोनों के लक्षण बताइए, क्योंकि यह सत् और असत् सृष्टि इन्हीं दोनों के कारण उत्पन्न होती है।
श्लोक 10 (bhagavata.3.26.10)
श्रीभगवानुवाच यत्तत्त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥ 26.10 ॥
śrī-bhagavān uvāca yat tat tri-guṇam avyaktaṁ nityaṁ sad-asad-ātmakam pradhānaṁ prakṛtiṁ prāhur aviśeṣaṁ viśeṣavat
श्रीभगवान ने कहा — जो त्रिगुणमय, अव्यक्त, नित्य तथा कार्य-कारण दोनों रूपों में विद्यमान है, उसे विशेषरहित होने पर भी विशेषयुक्त 'प्रधान' या 'प्रकृति' कहा गया है।
श्लोक 11 (bhagavata.3.26.11)
पञ्चभिः पञ्चभिर्ब्रह्म चतुर्भिर्दशभिस्तथा । एतच्चतुर्विंशतिकं गणं प्राधानिकं विदुः ॥ 26.11 ॥
pañcabhiḥ pañcabhir brahma caturbhir daśabhis tathā etac catur-viṁśatikaṁ gaṇaṁ prādhānikaṁ viduḥ
पाँच स्थूल भूत, पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ, चार अन्तःकरण और दस इन्द्रियाँ — इन चौबीस तत्त्वों के समूह को ही प्रधान से सम्बद्ध गण जाना जाता है।
श्लोक 12 (bhagavata.3.26.12)
महाभूतानि पञ्चैव भूरापोऽग्निर्मरुन्नभः । तन्मात्राणि च तावन्ति गन्धादीनि मतानि मे ॥ 26.12 ॥
mahā-bhūtāni pañcaiva bhūr āpo ’gnir marun nabhaḥ tan-mātrāṇi ca tāvanti gandhādīni matāni me
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — ये पाँच स्थूल भूत हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द — इतनी ही संख्या में मुझे तन्मात्राएँ अभीष्ट हैं।
श्लोक 13 (bhagavata.3.26.13)
इन्द्रियाणि दश श्रोत्रं त्वग्दृग्रसननासिकाः । वाक्करौ चरणौ मेढ्रं पायुर्दशम उच्यते ॥ 26.13 ॥
indriyāṇi daśa śrotraṁ tvag dṛg rasana-nāsikāḥ vāk karau caraṇau meḍhraṁ pāyur daśama ucyate
दस इन्द्रियाँ हैं — श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका (ज्ञानेन्द्रियाँ), तथा वाणी, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा (कर्मेन्द्रियाँ), जिसे दसवीं कहा जाता है।
श्लोक 14 (bhagavata.3.26.14)
मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मकम् । चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥ 26.14 ॥
mano buddhir ahaṅkāraś cittam ity antar-ātmakam caturdhā lakṣyate bhedo vṛttyā lakṣaṇa-rūpayā
मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त — इस प्रकार अन्तःकरण चार प्रकार का माना गया है। इनका भेद केवल उनके विशिष्ट कार्यों की दृष्टि से देखा जाता है।
श्लोक 15 (bhagavata.3.26.15)
एतावानेव सङ्ख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य ह । सन्निवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः ॥ 26.15 ॥
etāvān eva saṅkhyāto brahmaṇaḥ sa-guṇasya ha sanniveśo mayā prokto yaḥ kālaḥ pañca-viṁśakaḥ
इस प्रकार गुणयुक्त ब्रह्म की इतनी ही संख्या मैंने गिनाई है। और जो इन सबको मिलाने वाला काल है, वह पच्चीसवाँ तत्त्व कहा जाता है।
श्लोक 16 (bhagavata.3.26.16)
प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम् । अहङ्कारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः ॥ 26.16 ॥
prabhāvaṁ pauruṣaṁ prāhuḥ kālam eke yato bhayam ahaṅkāra-vimūḍhasya kartuḥ prakṛtim īyuṣaḥ
कुछ विद्वान इसी काल को भगवान के प्रभाव के रूप में कहते हैं, जिससे अहंकार में मोहित होकर प्रकृति को प्राप्त हुए कर्ता जीव को भय उत्पन्न होता है।
श्लोक 17 (bhagavata.3.26.17)
प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि । चेष्टा यतः स भगवान्काल इत्युपलक्षितः ॥ 26.17 ॥
prakṛter guṇa-sāmyasya nirviśeṣasya mānavi ceṣṭā yataḥ sa bhagavān kāla ity upalakṣitaḥ
हे मानवि, जिसकी प्रेरणा से गुणों की साम्यावस्था में स्थित, विशेषरहित प्रकृति में चेष्टा उत्पन्न होती है, वही भगवान 'काल' के नाम से जाने जाते हैं।
श्लोक 18 (bhagavata.3.26.18)
अन्तः पुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः । समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया ॥ 26.18 ॥
antaḥ puruṣa-rūpeṇa kāla-rūpeṇa yo bahiḥ samanvety eṣa sattvānāṁ bhagavān ātma-māyayā
वही भगवान अपनी माया से भीतर पुरुष अर्थात् अन्तर्यामी के रूप में तथा बाहर काल के रूप में सभी प्राणियों में व्याप्त रहते हैं।
श्लोक 19 (bhagavata.3.26.19)
दैवात्क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान् । आधत्त वीर्यं सासूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥ 26.19 ॥
daivāt kṣubhita-dharmiṇyāṁ svasyāṁ yonau paraḥ pumān ādhatta vīryaṁ sāsūta mahat-tattvaṁ hiraṇmayam
कर्मबद्ध जीवों के भाग्य से प्रकृति की साम्यावस्था क्षुब्ध होने पर, परम पुरुष अपनी ही योनिस्वरूपा प्रकृति में वीर्य स्थापित करते हैं, और वह महत्तत्त्व नामक हिरण्मय गर्भ को जन्म देती है।
श्लोक 20 (bhagavata.3.26.20)
विश्वमात्मगतं व्यञ्जन्कूटस्थो जगदङ्कुरः । स्वतेजसापिबत्तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः ॥ 26.20 ॥
viśvam ātma-gataṁ vyañjan kūṭa-stho jagad-aṅkuraḥ sva-tejasāpibat tīvram ātma-prasvāpanaṁ tamaḥ
अपने भीतर सारे विश्व को समेटे हुए, अविकारी और जगत का मूल अंकुर बना वह महत्तत्त्व अपने ही तेज से, आत्मा को सुला देने वाले सघन अन्धकार को पी जाता है।
श्लोक 21 (bhagavata.3.26.21)
यत्तत्सत्त्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम् । यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम् ॥ 26.21 ॥
yat tat sattva-guṇaṁ svacchaṁ śāntaṁ bhagavataḥ padam yad āhur vāsudevākhyaṁ cittaṁ tan mahad-ātmakam
यह जो निर्मल, शान्त सत्त्वगुण भगवान की स्थिति है, उसे ही 'वासुदेव' नामक चित्त कहा गया है, जो महत्तत्त्व में ही अन्तर्निहित है।
श्लोक 22 (bhagavata.3.26.22)
स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्वमिति चेतसः । वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तं यथापां प्रकृतिः परा ॥ 26.22 ॥
svacchatvam avikāritvaṁ śāntatvam iti cetasaḥ vṛttibhir lakṣaṇaṁ proktaṁ yathāpāṁ prakṛtiḥ parā
स्वच्छता, अविकारिता और शान्ति — ये चित्त के वृत्तिजनित लक्षण कहे गये हैं, जैसे जल का अपना स्वाभाविक शुद्ध रूप होता है।
श्लोक 23 (bhagavata.3.26.23)
महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यसम्भवात् । क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविधः समपद्यत ॥ 26.23 ॥
mahat-tattvād vikurvāṇād bhagavad-vīrya-sambhavāt kriyā-śaktir ahaṅkāras tri-vidhaḥ samapadyata
भगवान के ही वीर्य से उत्पन्न और विकार को प्राप्त होने वाले महत्तत्त्व से क्रियाशक्ति सम्पन्न त्रिविध अहंकार उत्पन्न हुआ।
श्लोक 24 (bhagavata.3.26.24)
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्च यतो भवः । मनसश्चेन्द्रियाणां च भूतानां महतामपि ॥ 26.24 ॥
vaikārikas taijasaś ca tāmasaś ca yato bhavaḥ manasaś cendriyāṇāṁ ca bhūtānāṁ mahatām api
वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और तामस — इन तीनों से ही मन, इन्द्रियाँ तथा स्थूल भूतों की उत्पत्ति होती है।
श्लोक 25 (bhagavata.3.26.25)
सहस्रशिरसं साक्षाद्यमनन्तं प्रचक्षते । सङ्कर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम् ॥ 26.25 ॥
sahasra-śirasaṁ sākṣād yam anantaṁ pracakṣate saṅkarṣaṇākhyaṁ puruṣaṁ bhūtendriya-manomayam
स्थूल भूत, इन्द्रिय और मन से युक्त इस त्रिविध अहंकार को साक्षात् सहस्रशीर्षा अनन्त, संकर्षण नाम से पुकारा जाता है।
श्लोक 26 (bhagavata.3.26.26)
कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् । शान्तघोरविमूढत्वमिति वा स्यादहङ्कृतेः ॥ 26.26 ॥
kartṛtvaṁ karaṇatvaṁ ca kāryatvaṁ ceti lakṣaṇam śānta-ghora-vimūḍhatvam iti vā syād ahaṅkṛteḥ
कर्तापन, करणपन और कार्यपन — यही अहंकार का लक्षण है; और वह गुणों के अनुसार शान्त, घोर अथवा मूढ़ भी कहा जा सकता है।
श्लोक 27 (bhagavata.3.26.27)
वैकारिकाद्विकुर्वाणान्मनस्तत्त्वमजायत । यत्सङ्कल्पविकल्पाभ्यां वर्तते कामसम्भवः ॥ 26.27 ॥
vaikārikād vikurvāṇān manas-tattvam ajāyata yat-saṅkalpa-vikalpābhyāṁ vartate kāma-sambhavaḥ
विकार को प्राप्त वैकारिक अहंकार से मन-तत्त्व उत्पन्न हुआ, जिसके संकल्प और विकल्प से इच्छा (काम) उत्पन्न होती है।
श्लोक 28 (bhagavata.3.26.28)
यद्विदुर्ह्यनिरुद्धाख्यं हृषीकाणामधीश्वरम् । शारदेन्दीवरश्यामं संराध्यं योगिभिः शनैः ॥ 26.28 ॥
yad vidur hy aniruddhākhyaṁ hṛṣīkāṇām adhīśvaram śāradendīvara-śyāmaṁ saṁrādhyaṁ yogibhiḥ śanaiḥ
इस मन को ही इन्द्रियों के अधीश्वर, अनिरुद्ध नाम से जाना जाता है, जो शरद ऋतु के नीलकमल के समान श्याम वर्ण है और योगीजन धीरे-धीरे उन्हें ही प्राप्त करते हैं।
श्लोक 29 (bhagavata.3.26.29)
तैजसात्तु विकुर्वाणाद् बुद्धितत्त्वमभूत्सति । द्रव्यस्फुरणविज्ञानमिन्द्रियाणामनुग्रहः ॥ 26.29 ॥
taijasāt tu vikurvāṇād buddhi-tattvam abhūt sati dravya-sphuraṇa-vijñānam indriyāṇām anugrahaḥ
हे साध्वी, विकार को प्राप्त तैजस अहंकार से बुद्धि-तत्त्व उत्पन्न हुआ, जिसका कार्य वस्तुओं के सामने आने पर उनका निश्चय करना और इन्द्रियों की सहायता करना है।
श्लोक 30 (bhagavata.3.26.30)
संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च । स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तितः पृथक् ॥ 26.30 ॥
saṁśayo ’tha viparyāso niścayaḥ smṛtir eva ca svāpa ity ucyate buddher lakṣaṇaṁ vṛttitaḥ pṛthak
संशय, विपर्यय, निश्चय, स्मृति और निद्रा — ये अपनी-अपनी वृत्तियों के अनुसार बुद्धि के पृथक-पृथक लक्षण कहे जाते हैं।
श्लोक 31 (bhagavata.3.26.31)
तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः । प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता ॥ 26.31 ॥
taijasānīndriyāṇy eva kriyā-jñāna-vibhāgaśaḥ prāṇasya hi kriyā-śaktir buddher vijñāna-śaktitā
तैजस अहंकार से ही इन्द्रियाँ क्रिया और ज्ञान के भेद से उत्पन्न होती हैं। क्रियाशक्ति प्राण पर आश्रित है और ज्ञानशक्ति बुद्धि पर।
श्लोक 32 (bhagavata.3.26.32)
तामसाच्च विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यचोदितात् । शब्दमात्रमभूत्तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम् ॥ 26.32 ॥
tāmasāc ca vikurvāṇād bhagavad-vīrya-coditāt śabda-mātram abhūt tasmān nabhaḥ śrotraṁ tu śabdagam
भगवान के वीर्य से प्रेरित होकर विकार को प्राप्त तामस अहंकार से शब्द-तन्मात्रा उत्पन्न हुई, और उससे आकाश तथा शब्दग्राही श्रोत्र इन्द्रिय उत्पन्न हुई।
श्लोक 33 (bhagavata.3.26.33)
अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च । तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः ॥ 26.33 ॥
arthāśrayatvaṁ śabdasya draṣṭur liṅgatvam eva ca tan-mātratvaṁ ca nabhaso lakṣaṇaṁ kavayo viduḥ
विद्वान जानते हैं कि शब्द अर्थ का आश्रय है, वक्ता के अस्तित्व का सूचक है, और वही आकाश की सूक्ष्म तन्मात्रा है — यही उसका लक्षण है।
श्लोक 34 (bhagavata.3.26.34)
भूतानां छिद्रदातृत्वं बहिरन्तरमेव च । प्राणेन्द्रियात्मधिष्ण्यत्वं नभसो वृत्तिलक्षणम् ॥ 26.34 ॥
bhūtānāṁ chidra-dātṛtvaṁ bahir antaram eva ca prāṇendriyātma-dhiṣṇyatvaṁ nabhaso vṛtti-lakṣaṇam
सब प्राणियों को बाहर और भीतर स्थान देना, तथा प्राण, इन्द्रिय और मन का आधार बनना — यही आकाश की वृत्तियों का लक्षण है।
श्लोक 35 (bhagavata.3.26.35)
नभसः शब्दतन्मात्रात्कालगत्या विकुर्वतः । स्पर्शोऽभवत्ततो वायुस्त्वक्स्पर्शस्य च संग्रहः ॥ 26.35 ॥
nabhasaḥ śabda-tanmātrāt kāla-gatyā vikurvataḥ sparśo ’bhavat tato vāyus tvak sparśasya ca saṅgrahaḥ
काल की गति से विकार को प्राप्त शब्द-तन्मात्रायुक्त आकाश से स्पर्श-तन्मात्रा उत्पन्न हुई, और उससे वायु तथा स्पर्शग्राही त्वचा इन्द्रिय उत्पन्न हुई।
श्लोक 36 (bhagavata.3.26.36)
मृदुत्वं कठिनत्वं च शैत्यमुष्णत्वमेव च । एतत्स्पर्शस्य स्पर्शत्वं तन्मात्रत्वं नभस्वतः ॥ 26.36 ॥
mṛdutvaṁ kaṭhinatvaṁ ca śaityam uṣṇatvam eva ca etat sparśasya sparśatvaṁ tan-mātratvaṁ nabhasvataḥ
कोमलता, कठोरता, शीतलता और उष्णता — यही स्पर्श के स्पर्शत्व का लक्षण है, जो वायु की ही सूक्ष्म तन्मात्रा है।
श्लोक 37 (bhagavata.3.26.37)
चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः । सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायोः कर्माभिलक्षणम् ॥ 26.37 ॥
cālanaṁ vyūhanaṁ prāptir netṛtvaṁ dravya-śabdayoḥ sarvendriyāṇām ātmatvaṁ vāyoḥ karmābhilakṣaṇam
हिलाना, मिश्रण करना, वस्तुओं और शब्द तक पहुँचाना, तथा समस्त इन्द्रियों को अपनी शक्ति प्रदान करना — यही वायु के कर्मों के लक्षण हैं।
श्लोक 38 (bhagavata.3.26.38)
वायोश्च स्पर्शतन्मात्राद्रूपं दैवेरितादभूत् । समुत्थितं ततस्तेजश्चक्षू रूपोपलम्भनम् ॥ 26.38 ॥
vāyoś ca sparśa-tanmātrād rūpaṁ daiveritād abhūt samutthitaṁ tatas tejaś cakṣū rūpopalambhanam
दैव की प्रेरणा से विकार को प्राप्त स्पर्श-तन्मात्रायुक्त वायु से रूप उत्पन्न हुआ, और उससे तेज तथा रूप-ग्राही चक्षु इन्द्रिय उत्पन्न हुई।
श्लोक 39 (bhagavata.3.26.39)
द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च । तेजस्त्वं तेजसः साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तयः ॥ 26.39 ॥
dravyākṛtitvaṁ guṇatā vyakti-saṁsthātvam eva ca tejastvaṁ tejasaḥ sādhvi rūpa-mātrasya vṛttayaḥ
हे साध्वी, किसी वस्तु का आकार, गुण और पृथक अस्तित्व — यही रूप-तन्मात्रा की वृत्तियाँ हैं, और तेज का लक्षण उसकी प्रकाशमानता है।
श्लोक 40 (bhagavata.3.26.40)
द्योतनं पचनं पानमदनं हिममर्दनम् । तेजसो वृत्तयस्त्वेताः शोषणं क्षुत्तृडेव च ॥ 26.40 ॥
dyotanaṁ pacanaṁ pānam adanaṁ hima-mardanam tejaso vṛttayas tv etāḥ śoṣaṇaṁ kṣut tṛḍ eva ca
प्रकाश देना, पकाना, पचाना, शीत को दूर करना, सुखाना, तथा भूख-प्यास उत्पन्न करना — ये सब तेज की ही वृत्तियाँ हैं।
श्लोक 41 (bhagavata.3.26.41)
रूपमात्राद्विकुर्वाणात्तेजसो दैवचोदितात् । रसमात्रमभूत्तस्मादम्भो जिह्वा रसग्रहः ॥ 26.41 ॥
rūpa-mātrād vikurvāṇāt tejaso daiva-coditāt rasa-mātram abhūt tasmād ambho jihvā rasa-grahaḥ
दैव की प्रेरणा से विकार को प्राप्त रूप-तन्मात्रायुक्त तेज से रस-तन्मात्रा उत्पन्न हुई, और उससे जल तथा रसग्राही जिह्वा इन्द्रिय उत्पन्न हुई।
श्लोक 42 (bhagavata.3.26.42)
कषायो मधुरस्तिक्तः कट्वम्ल इति नैकधा । भौतिकानां विकारेण रस एको विभिद्यते ॥ 26.42 ॥
kaṣāyo madhuras tiktaḥ kaṭv amla iti naikadhā bhautikānāṁ vikāreṇa rasa eko vibhidyate
मूल रूप से एक होते हुए भी रस अन्य द्रव्यों के मिश्रण से कषाय, मधुर, तिक्त, कटु, अम्ल आदि अनेक भेदों में विभक्त हो जाता है।
श्लोक 43 (bhagavata.3.26.43)
क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्यायनोन्दनम् । तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः ॥ 26.43 ॥
kledanaṁ piṇḍanaṁ tṛptiḥ prāṇanāpyāyanondanam tāpāpanodo bhūyastvam ambhaso vṛttayas tv imāḥ
गीला करना, जमाना, तृप्त करना, प्राण धारण कराना, सींचना, कोमल बनाना, ताप को दूर करना और प्रचुरता — ये जल की वृत्तियाँ हैं।
श्लोक 44 (bhagavata.3.26.44)
रसमात्राद्विकुर्वाणादम्भसो दैवचोदितात् । गन्धमात्रमभूत्तस्मात्पृथ्वी घ्राणस्तु गन्धगः ॥ 26.44 ॥
rasa-mātrād vikurvāṇād ambhaso daiva-coditāt gandha-mātram abhūt tasmāt pṛthvī ghrāṇas tu gandhagaḥ
दैव की प्रेरणा से विकार को प्राप्त रस-तन्मात्रायुक्त जल से गन्ध-तन्मात्रा उत्पन्न हुई, और उससे पृथ्वी तथा गन्धग्राही घ्राण इन्द्रिय उत्पन्न हुई।
श्लोक 45 (bhagavata.3.26.45)
करम्भपूतिसौरभ्यशान्तोग्राम्लादिभिः पृथक् । द्रव्यावयववैषम्याद्गन्ध एको विभिद्यते ॥ 26.45 ॥
karambha-pūti-saurabhya- śāntogrāmlādibhiḥ pṛthak dravyāvayava-vaiṣamyād gandha eko vibhidyate
मिश्रित, दुर्गन्धित, सुगन्धित, मन्द, तीव्र, अम्ल आदि रूप में द्रव्यों के अंशों की विविधता के कारण गन्ध, यद्यपि मूल रूप से एक है, अनेक रूपों में विभक्त हो जाती है।
श्लोक 46 (bhagavata.3.26.46)
भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम् । सर्वसत्त्वगुणोद्भेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम् ॥ 26.46 ॥
bhāvanaṁ brahmaṇaḥ sthānaṁ dhāraṇaṁ sad-viśeṣaṇam sarva-sattva-guṇodbhedaḥ pṛthivī-vṛtti-lakṣaṇam
ब्रह्म के विविध रूपों की रचना, निवास-स्थान बनाना, पदार्थों को धारण करना, तथा सभी गुणों के प्राकट्य का आधार होना — यही पृथ्वी की वृत्तियों का लक्षण है।
श्लोक 47 (bhagavata.3.26.47)
नभोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तच्छ्रोत्रमुच्यते । वायोर्गुणविशेषोऽर्थो यस्य तत्स्पर्शनं विदुः ॥ 26.47 ॥
nabho-guṇa-viśeṣo ’rtho yasya tac chrotram ucyate vāyor guṇa-viśeṣo ’rtho yasya tat sparśanaṁ viduḥ
जिसका विषय आकाश का विशेष गुण (शब्द) है, वह श्रोत्र कहलाता है; और जिसका विषय वायु का विशेष गुण (स्पर्श) है, उसे त्वक-इन्द्रिय कहा जाता है।
श्लोक 48 (bhagavata.3.26.48)
तेजोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तच्चक्षुरुच्यते । अम्भोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तद्रसनं विदुः । भूमेर्गुणविशेषोऽर्थो यस्य स घ्राण उच्यते ॥ 26.48 ॥
tejo-guṇa-viśeṣo ’rtho yasya tac cakṣur ucyate ambho-guṇa-viśeṣo ’rtho yasya tad rasanaṁ viduḥ bhūmer guṇa-viśeṣo ’rtho yasya sa ghrāṇa ucyate
जिसका विषय तेज का विशेष गुण (रूप) है, वह चक्षु कहलाता है; जिसका विषय जल का विशेष गुण (रस) है, वह रसना कहलाती है; और जिसका विषय पृथ्वी का विशेष गुण (गन्ध) है, वह घ्राण कहलाता है।
श्लोक 49 (bhagavata.3.26.49)
परस्य दृश्यते धर्मो ह्यपरस्मिन्समन्वयात् । अतो विशेषो भावानां भूमावेवोपलक्ष्यते ॥ 26.49 ॥
parasya dṛśyate dharmo hy aparasmin samanvayāt ato viśeṣo bhāvānāṁ bhūmāv evopalakṣyate
कारण का स्वभाव उसके कार्य में क्रमशः देखा जाता है; इसलिए सभी भूतों की विशेषताएँ केवल पृथ्वी में ही एक साथ देखी जाती हैं।
श्लोक 50 (bhagavata.3.26.50)
एतान्यसंहत्य यदा महदादीनि सप्त वै । कालकर्मगुणोपेतो जगदादिरुपाविशत् ॥ 26.50 ॥
etāny asaṁhatya yadā mahad-ādīni sapta vai kāla-karma-guṇopeto jagad-ādir upāviśat
जब महत्तत्त्व आदि ये सातों तत्त्व असंयुक्त अवस्था में थे, तब काल, कर्म और गुणों से युक्त वह जगत का आदिकारण उनमें प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 51 (bhagavata.3.26.51)
ततस्तेनानुविद्धेभ्यो युक्तेभ्योऽण्डमचेतनम् । उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट् ॥ 26.51 ॥
tatas tenānuviddhebhyo yuktebhyo ’ṇḍam acetanam utthitaṁ puruṣo yasmād udatiṣṭhad asau virāṭ
तब उस भगवान से प्रेरित और परस्पर संयुक्त हुए इन तत्त्वों से एक अचेतन अण्ड उत्पन्न हुआ, जिससे वह प्रसिद्ध पुरुष विराट उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 52 (bhagavata.3.26.52)
एतदण्डं विशेषाख्यं क्रमवृद्धैर्दशोत्तरैः । तोयादिभिः परिवृतं प्रधानेनावृतैर्बहिः । यत्र लोकवितानोऽयं रूपं भगवतो हरेः ॥ 26.52 ॥
etad aṇḍaṁ viśeṣākhyaṁ krama-vṛddhair daśottaraiḥ toyādibhiḥ parivṛtaṁ pradhānenāvṛtair bahiḥ yatra loka-vitāno ’yaṁ rūpaṁ bhagavato hareḥ
यह अण्ड, जिसे विशेष कहा गया है, क्रमशः दस-दस गुना बढ़ते हुए जल आदि आवरणों से घिरा है और बाहर से प्रधान द्वारा आवृत है; इसी में भगवान हरि का यह लोक-विस्तार रूप स्थित है।
श्लोक 53 (bhagavata.3.26.53)
हिरण्मयादण्डकोशादुत्थाय सलिलेशयात् । तमाविश्य महादेवो बहुधा निर्बिभेद खम् ॥ 26.53 ॥
hiraṇmayād aṇḍa-kośād utthāya salile śayāt tam āviśya mahā-devo bahudhā nirbibheda kham
जल पर पड़े हुए उस स्वर्णिम अण्डकोश से उठकर महादेव उसमें प्रविष्ट हुए और उसे अनेक प्रकार से भेदकर छिद्र बना दिए।
श्लोक 54 (bhagavata.3.26.54)
निरभिद्यतास्य प्रथमं मुखं वाणी ततोऽभवत् । वाण्या वह्निरथो नासे प्राणोतो घ्राण एतयोः ॥ 26.54 ॥
nirabhidyatāsya prathamaṁ mukhaṁ vāṇī tato ’bhavat vāṇyā vahnir atho nāse prāṇoto ghrāṇa etayoḥ
सबसे पहले उनका मुख प्रकट हुआ, फिर उससे वाणी उत्पन्न हुई; वाणी के साथ अग्निदेव प्रकट हुए। फिर नासिका-द्वय, और उनमें प्राण तथा घ्राण इन्द्रिय उत्पन्न हुई।
श्लोक 55 (bhagavata.3.26.55)
घ्राणाद्वायुरभिद्येतामक्षिणी चक्षुरेतयोः । तस्मात्सूर्यो न्यभिद्येतां कर्णौ श्रोत्रं ततो दिशः ॥ 26.55 ॥
ghrāṇād vāyur abhidyetām akṣiṇī cakṣur etayoḥ tasmāt sūryo nyabhidyetāṁ karṇau śrotraṁ tato diśaḥ
घ्राण के साथ वायुदेव प्रकट हुए। फिर नेत्र-द्वय और उनमें चक्षु इन्द्रिय; फिर उससे सूर्यदेव प्रकट हुए। फिर कर्ण-द्वय और उनमें श्रोत्र इन्द्रिय, और उसके साथ दिशाओं के देवता प्रकट हुए।
श्लोक 56 (bhagavata.3.26.56)
निर्बिभेद विराजस्त्वग्रोमश्मश्रवादयस्ततः । तत ओषधयश्चासन् शिश्नं निर्बिभिदे ततः ॥ 26.56 ॥
nirbibheda virājas tvag- roma-śmaśrv-ādayas tataḥ tata oṣadhayaś cāsan śiśnaṁ nirbibhide tataḥ
फिर विराट पुरुष की त्वचा प्रकट हुई, और उससे रोम, मूँछ-दाढ़ी आदि। फिर औषधियाँ प्रकट हुईं, और उसके बाद जननेन्द्रिय प्रकट हुई।
श्लोक 57 (bhagavata.3.26.57)
रेतस्तस्मादाप आसन्निरभिद्यत वै गुदम् । गुदादपानोऽपानाच्च मृत्युर्लोकभयङ्करः ॥ 26.57 ॥
retas tasmād āpa āsan nirabhidyata vai gudam gudād apāno ’pānāc ca mṛtyur loka-bhayaṅkaraḥ
उससे वीर्य और जल के देवता प्रकट हुए, फिर गुदा प्रकट हुई, और गुदा से अपान वायु तथा फिर संसार को भयभीत करने वाला मृत्युदेव प्रकट हुआ।
श्लोक 58 (bhagavata.3.26.58)
हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् । पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः ॥ 26.58 ॥
hastau ca nirabhidyetāṁ balaṁ tābhyāṁ tataḥ svarāṭ pādau ca nirabhidyetāṁ gatis tābhyāṁ tato hariḥ
फिर दोनों हाथ प्रकट हुए, और उनसे बल-शक्ति, और उसके बाद इन्द्र प्रकट हुए। फिर दोनों पैर प्रकट हुए, और उनसे गति-शक्ति, और उसके बाद विष्णु प्रकट हुए।
श्लोक 59 (bhagavata.3.26.59)
नाड्योऽस्य निरभिद्यन्त ताभ्यो लोहितमाभृतम् । नद्यस्ततः समभवन्नुदरं निरभिद्यत ॥ 26.59 ॥
nāḍyo ’sya nirabhidyanta tābhyo lohitam ābhṛtam nadyas tataḥ samabhavann udaraṁ nirabhidyata
फिर उनकी नाड़ियाँ प्रकट हुईं, और उनसे रक्त धारण किया गया; फिर उससे नदियाँ प्रकट हुईं, और तब उदर प्रकट हुआ।
श्लोक 60 (bhagavata.3.26.60)
क्षुत्पिपासे ततः स्यातां समुद्रस्त्वेतयोरभूत् । अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् ॥ 26.60 ॥
kṣut-pipāse tataḥ syātāṁ samudras tv etayor abhūt athāsya hṛdayaṁ bhinnaṁ hṛdayān mana utthitam
फिर भूख-प्यास उत्पन्न हुई, और उनसे समुद्र प्रकट हुआ। फिर उनका हृदय प्रकट हुआ, और हृदय से मन उत्पन्न हुआ।
श्लोक 61 (bhagavata.3.26.61)
मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरां पतिः । अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्यस्ततोऽभवत् ॥ 26.61 ॥
manasaś candramā jāto buddhir buddher girāṁ patiḥ ahaṅkāras tato rudraś cittaṁ caityas tato ’bhavat
मन से चन्द्रमा प्रकट हुए, फिर बुद्धि, और बुद्धि से वाणी के स्वामी ब्रह्मा प्रकट हुए। फिर अहंकार से रुद्र, और उसके बाद चित्त से चैत्य देवता प्रकट हुए।
श्लोक 62 (bhagavata.3.26.62)
एते ह्यभ्युत्थिता देवा नैवास्योत्थापनेऽशकन् । पुनराविविशुः खानि तमुत्थापयितुं क्रमात् ॥ 26.62 ॥
ete hy abhyutthitā devā naivāsyotthāpane ’śakan punar āviviśuḥ khāni tam utthāpayituṁ kramāt
जब इस प्रकार ये देवता प्रकट हो चुके, तब भी वे उस विराट पुरुष को जगा न सके। तब वे सब क्रमशः पुनः उनके छिद्रों में प्रविष्ट हुए, उन्हें जगाने के लिए।
श्लोक 63 (bhagavata.3.26.63)
वह्निर्वाचा मुखं भेजे नोदतिष्ठत्तदा विराट् । घ्राणेन नासिके वायुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ 26.63 ॥
vahnir vācā mukhaṁ bheje nodatiṣṭhat tadā virāṭ ghrāṇena nāsike vāyur nodatiṣṭhat tadā virāṭ
अग्निदेव वाणी सहित मुख में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं। वायुदेव घ्राण सहित नासिका में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं।
श्लोक 64 (bhagavata.3.26.64)
अक्षिणी चक्षुषादित्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट् । श्रोत्रेण कर्णौ च दिशो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ 26.64 ॥
akṣiṇī cakṣuṣādityo nodatiṣṭhat tadā virāṭ śrotreṇa karṇau ca diśo nodatiṣṭhat tadā virāṭ
सूर्यदेव चक्षु सहित नेत्रों में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं। दिशाओं के देवता श्रोत्र सहित कानों में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं।
श्लोक 65 (bhagavata.3.26.65)
त्वचं रोमभिरोषध्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट् । रेतसा शिश्नमापस्तु नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ 26.65 ॥
tvacaṁ romabhir oṣadhyo nodatiṣṭhat tadā virāṭ retasā śiśnam āpas tu nodatiṣṭhat tadā virāṭ
औषधियाँ रोमों सहित त्वचा में प्रविष्ट हुईं, फिर भी विराट उठे नहीं। जलदेव वीर्य सहित जननेन्द्रिय में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं।
श्लोक 66 (bhagavata.3.26.66)
गुदं मृत्युरपानेन नोदतिष्ठत्तदा विराट् । हस्ताविन्द्रो बलेनैव नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ 26.66 ॥
gudaṁ mṛtyur apānena nodatiṣṭhat tadā virāṭ hastāv indro balenaiva nodatiṣṭhat tadā virāṭ
मृत्युदेव अपान सहित गुदा में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं। इन्द्र बल सहित हाथों में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं।
श्लोक 67 (bhagavata.3.26.67)
विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत्तदा विराट् । नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ 26.67 ॥
viṣṇur gatyaiva caraṇau nodatiṣṭhat tadā virāṭ nāḍīr nadyo lohitena nodatiṣṭhat tadā virāṭ
विष्णु गति सहित पैरों में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं। नदियाँ रक्त सहित नाड़ियों में प्रविष्ट हुईं, फिर भी विराट उठे नहीं।
श्लोक 68 (bhagavata.3.26.68)
क्षुत्तृड्भ्यामुदरं सिन्धुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट् । हृदयं मनसा चन्द्रो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ 26.68 ॥
kṣut-tṛḍbhyām udaraṁ sindhur nodatiṣṭhat tadā virāṭ hṛdayaṁ manasā candro nodatiṣṭhat tadā virāṭ
समुद्र भूख-प्यास सहित उदर में प्रविष्ट हुआ, फिर भी विराट उठे नहीं। चन्द्रमा मन सहित हृदय में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं।
श्लोक 69 (bhagavata.3.26.69)
बुद्ध्या ब्रह्मापि हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट् । रुद्रोऽभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ 26.69 ॥
buddhyā brahmāpi hṛdayaṁ nodatiṣṭhat tadā virāṭ rudro ’bhimatyā hṛdayaṁ nodatiṣṭhat tadā virāṭ
ब्रह्मा भी बुद्धि सहित हृदय में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं। रुद्र अहंकार सहित हृदय में प्रविष्ट हुए, फिर भी विराट उठे नहीं।
श्लोक 70 (bhagavata.3.26.70)
चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद्यदा । विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ 26.70 ॥
cittena hṛdayaṁ caityaḥ kṣetra-jñaḥ prāviśad yadā virāṭ tadaiva puruṣaḥ salilād udatiṣṭhata
किन्तु जब चैत्य देवता, क्षेत्रज्ञ, चित्त सहित हृदय में प्रविष्ट हुए, तभी वह विराट पुरुष जल से उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 71 (bhagavata.3.26.71)
यथा प्रसुप्तं पुरुषं प्राणेन्द्रियमनोधियः । प्रभवन्ति विना येन नोत्थापयितुमोजसा ॥ 26.71 ॥
yathā prasuptaṁ puruṣaṁ prāṇendriya-mano-dhiyaḥ prabhavanti vinā yena notthāpayitum ojasā
जैसे प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि — ये सब मिलकर भी, जिसके बिना सोए हुए पुरुष को अपने बल से नहीं जगा सकते।
श्लोक 72 (bhagavata.3.26.72)
तमस्मिन्प्रत्यगात्मानं धिया योगप्रवृत्तया । भक्त्या विरक्त्या ज्ञानेन विविच्यात्मनि चिन्तयेत् ॥ 26.72 ॥
tam asmin pratyag-ātmānaṁ dhiyā yoga-pravṛttayā bhaktyā viraktyā jñānena vivicyātmani cintayet
इसलिए योगयुक्त बुद्धि से, भक्ति, वैराग्य और ज्ञान के द्वारा विवेकपूर्वक इस शरीर में विराजमान उस प्रत्यगात्मा (परमात्मा) का ही ध्यान करना चाहिए।