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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27

भौतिक प्रकृति को समझना

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (bhagavata.3.27.1)

श्रीभगवानुवाच प्रकृतिस्थोऽपि पुरुषो नाज्यते प्राकृतैर्गुणैः । अविकारादकर्तृत्वान्निर्गुणत्वाज्जलार्कवत् ॥ 27.1 ॥

śrī-bhagavān uvāca prakṛti-stho ’pi puruṣo nājyate prākṛtair guṇaiḥ avikārād akartṛtvān nirguṇatvāj jalārkavat

श्रीभगवान ने कहा — प्रकृति में स्थित होते हुए भी पुरुष प्राकृत गुणों से लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह अविकारी, अकर्ता और निर्गुण है — जैसे जल में प्रतिबिम्बित सूर्य वस्तुतः जल से अस्पृष्ट रहता है।

श्लोक 2 (bhagavata.3.27.2)

स एष यर्हि प्रकृतेर्गुणेष्वभिविषज्जते । अहंक्रियाविमूढात्मा कर्तास्मीत्यभिमन्यते ॥ 27.2 ॥

sa eṣa yarhi prakṛter guṇeṣv abhiviṣajjate ahaṅkriyā-vimūḍhātmā kartāsmīty abhimanyate

किन्तु जब वही पुरुष प्रकृति के गुणों में आसक्त हो जाता है, तब अहंकार से मोहित होकर वह यह मान बैठता है कि 'मैं ही कर्ता हूँ'।

श्लोक 3 (bhagavata.3.27.3)

तेन संसारपदवीमवशोऽभ्येत्यनिर्वृतः । प्रासङ्गिकैः कर्मदोषैः सदसन्मिश्रयोनिषु ॥ 27.3 ॥

tena saṁsāra-padavīm avaśo ’bhyety anirvṛtaḥ prāsaṅgikaiḥ karma-doṣaiḥ sad-asan-miśra-yoniṣu

इसी भाव के कारण वह असंतुष्ट रहते हुए विवश होकर संसार-चक्र में प्रवेश करता है और प्रासंगिक कर्मदोषों से शुभ-अशुभ-मिश्रित योनियों में भटकता है।

श्लोक 4 (bhagavata.3.27.4)

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ 27.4 ॥

arthe hy avidyamāne ’pi saṁsṛtir na nivartate dhyāyato viṣayān asya svapne ’narthāgamo yathā

यद्यपि उसका आधार वास्तव में असत्य है, फिर भी विषयों का चिन्तन करते रहने से यह संसार-भ्रम उसी प्रकार समाप्त नहीं होता, जैसे स्वप्न में अनर्थों का आगमन स्वप्नदृष्टा को सत्य प्रतीत होता है।

श्लोक 5 (bhagavata.3.27.5)

अत एव शनैश्चित्तं प्रसक्तमसतां पथि । भक्तियोगेन तीव्रेण विरक्त्या च नयेद्वशम् ॥ 27.5 ॥

ata eva śanaiś cittaṁ prasaktam asatāṁ pathi bhakti-yogena tīvreṇa viraktyā ca nayed vaśam

इसलिए मनुष्य को चाहिए कि असत् मार्ग में आसक्त अपने चित्त को तीव्र भक्तियोग और वैराग्य के द्वारा धीरे-धीरे अपने वश में लाए।

श्लोक 6 (bhagavata.3.27.6)

यमादिभिर्योगपथैरभ्यसन्श्रद्धयान्वितः । मयि भावेन सत्येन मत्कथाश्रवणेन च ॥ 27.6 ॥

yamādibhir yoga-pathair abhyasañ śraddhayānvitaḥ mayi bhāvena satyena mat-kathā-śravaṇena ca

यम आदि योगमार्गों का अभ्यास करते हुए, श्रद्धा से युक्त होकर, मुझमें सच्चे भाव के साथ तथा मेरी कथाओं के श्रवण द्वारा साधक को आगे बढ़ना चाहिए।

श्लोक 7 (bhagavata.3.27.7)

सर्वभूतसमत्वेन निर्वैरेणाप्रसङ्गतः । ब्रह्मचर्येण मौनेन स्वधर्मेण बलीयसा ॥ 27.7 ॥

sarva-bhūta-samatvena nirvaireṇāprasaṅgataḥ brahmacaryeṇa maunena sva-dharmeṇa balīyasā

समस्त प्राणियों को समभाव से देखना, किसी से वैर न रखना, अनावश्यक संग से बचना, ब्रह्मचर्य, मौन तथा अपने धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करते हुए।

श्लोक 8 (bhagavata.3.27.8)

यदृच्छयोपलब्धेन सन्तुष्टो मितभुङ्मुनिः । विविक्तशरणः शान्तो मैत्रः करुण आत्मवान् ॥ 27.8 ॥

yadṛcchayopalabdhena santuṣṭo mita-bhuṅ muniḥ vivikta-śaraṇaḥ śānto maitraḥ karuṇa ātmavān

जो कुछ सहज ही प्राप्त हो उसी में सन्तुष्ट, अल्पाहारी, चिन्तनशील, एकान्तवासी, शान्त, सबका मित्र, करुणामय और आत्मस्थ रहना चाहिए।

श्लोक 9 (bhagavata.3.27.9)

सानुबन्धे च देहेऽस्मिन्नकुर्वन्नसदाग्रहम् । ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥ 27.9 ॥

sānubandhe ca dehe ’sminn akurvann asad-āgraham jñānena dṛṣṭa-tattvena prakṛteḥ puruṣasya ca

इस शरीर और उसके सम्बन्धों में मिथ्या आग्रह न करते हुए, प्रकृति और पुरुष दोनों के तत्त्व को देख चुके ज्ञान के द्वारा।

श्लोक 10 (bhagavata.3.27.10)

निवृत्तबुद्ध्यवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शनः । उपलभ्यात्मनात्मानं चक्षुषेवार्कमात्मदृक् ॥ 27.10 ॥

nivṛtta-buddhy-avasthāno dūrī-bhūtānya-darśanaḥ upalabhyātmanātmānaṁ cakṣuṣevārkam ātma-dṛk

बुद्धि की भौतिक अवस्थाओं से ऊपर उठकर, अन्य सभी दृष्टिकोणों को दूर करके, आत्मदर्शी पुरुष अपने शुद्ध अन्तःकरण से अपने आत्मा को उसी प्रकार अनुभव करता है, जैसे नेत्र से सूर्य को देखा जाता है।

श्लोक 11 (bhagavata.3.27.11)

मुक्तलिङ्गं सदाभासमसति प्रतिपद्यते । सतो बन्धुमसच्चक्षुः सर्वानुस्यूतमद्वयम् ॥ 27.11 ॥

mukta-liṅgaṁ sad-ābhāsam asati pratipadyate sato bandhum asac-cakṣuḥ sarvānusyūtam advayam

मुक्त पुरुष उस सत्य को प्राप्त करता है जो अहंकार में भी सत् के आभास रूप में प्रतिबिम्बित होता है — जो सत् का आश्रय है, असत् का प्रकाशक है, सर्वव्यापी और अद्वितीय है।

श्लोक 12 (bhagavata.3.27.12)

यथा जलस्थ आभासः स्थलस्थेनावदृश्यते । स्वाभासेन तथा सूर्यो जलस्थेन दिवि स्थितः ॥ 27.12 ॥

yathā jala-stha ābhāsaḥ sthala-sthenāvadṛśyate svābhāsena tathā sūryo jala-sthena divi sthitaḥ

जैसे जल में पड़ा प्रतिबिम्ब भूमि पर स्थित प्रतिबिम्ब से देखा जाता है, वैसे ही आकाश में स्थित सूर्य अपने ही जल-प्रतिबिम्ब से पहचाना जाता है।

श्लोक 13 (bhagavata.3.27.13)

एवं त्रिवृदहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोमयैः । स्वाभासैर्लक्षितोऽनेन सदाभासेन सत्यदृक् ॥ 27.13 ॥

evaṁ trivṛd-ahaṅkāro bhūtendriya-manomayaiḥ svābhāsair lakṣito ’nena sad-ābhāsena satya-dṛk

इसी प्रकार भूत, इन्द्रिय और मनरूपी अपने प्रतिबिम्बों के द्वारा त्रिविध अहंकार प्रकट होता है, और उसी सत् के प्रतिबिम्ब के माध्यम से सत्यद्रष्टा पुरुष पहचाना जाता है।

श्लोक 14 (bhagavata.3.27.14)

भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिष्विह निद्रया । लीनेष्वसति यस्तत्र विनिद्रो निरहंक्रियः ॥ 27.14 ॥

bhūta-sūkṣmendriya-mano- buddhy-ādiṣv iha nidrayā līneṣv asati yas tatra vinidro nirahaṅkriyaḥ

जब स्थूल भूत, सूक्ष्म तन्मात्रा, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि निद्रा में लीन हो जाते हैं, तब भी जो उन असत् वस्तुओं में लीन न होकर जाग्रत और अहंकाररहित रहता है — वही सच्चा द्रष्टा है।

श्लोक 15 (bhagavata.3.27.15)

मन्यमानस्तदात्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा । नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुरः ॥ 27.15 ॥

manyamānas tadātmānam anaṣṭo naṣṭavan mṛṣā naṣṭe ’haṅkaraṇe draṣṭā naṣṭa-vitta ivāturaḥ

इसी अहंकार के लुप्त हो जाने पर, यद्यपि द्रष्टा वास्तव में लुप्त नहीं होता, फिर भी वह मिथ्या ही स्वयं को लुप्त मान लेता है — जैसे धन खो देने वाला मनुष्य व्यर्थ ही स्वयं को दुःखी और लुप्त मान बैठता है।

श्लोक 16 (bhagavata.3.27.16)

एवं प्रत्यवमृश्यासावात्मानं प्रतिपद्यते । साहङ्कारस्य द्रव्यस्य योऽवस्थानमनुग्रहः ॥ 27.16 ॥

evaṁ pratyavamṛśyāsāv ātmānaṁ pratipadyate sāhaṅkārasya dravyasya yo ’vasthānam anugrahaḥ

इस प्रकार गहराई से विचार करने पर वह पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, और तब अहंकार से युक्त वस्तुओं की जो भी स्थिति है, वह उसके सामने स्पष्ट प्रकट हो जाती है।

श्लोक 17 (bhagavata.3.27.17)

देवहूतिरुवाच पुरुषं प्रकृतिर्ब्रह्मन्न विमुञ्चति कर्हिचित् । अन्योन्यापाश्रयत्वाच्च नित्यत्वादनयोः प्रभो ॥ 27.17 ॥

devahūtir uvāca puruṣaṁ prakṛtir brahman na vimuñcati karhicit anyonyāpāśrayatvāc ca nityatvād anayoḥ prabho

देवहूति ने कहा — हे ब्रह्मन्, हे प्रभो, प्रकृति पुरुष को कभी नहीं छोड़ती, क्योंकि ये दोनों परस्पर आश्रित और नित्य हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.3.27.18)

यथा गन्धस्य भूमेश्च न भावो व्यतिरेकतः । अपां रसस्य च यथा तथा बुद्धेः परस्य च ॥ 27.18 ॥

yathā gandhasya bhūmeś ca na bhāvo vyatirekataḥ apāṁ rasasya ca yathā tathā buddheḥ parasya ca

जैसे पृथ्वी और उसकी गन्ध का, अथवा जल और उसके रस का पृथक अस्तित्व नहीं है, वैसे ही बुद्धि और परम पुरुष का पृथक अस्तित्व कैसे हो सकता है?

श्लोक 19 (bhagavata.3.27.19)

अकर्तुः कर्मबन्धोऽयं पुरुषस्य यदाश्रयः । गुणेषु सत्सु प्रकृतेः कैवल्यं तेष्वतः कथम् ॥ 27.19 ॥

akartuḥ karma-bandho ’yaṁ puruṣasya yad-āśrayaḥ guṇeṣu satsu prakṛteḥ kaivalyaṁ teṣv ataḥ katham

यह कर्म-बन्धन उस पुरुष को घेरे रहता है जो वस्तुतः अकर्ता है, केवल इसलिए कि वह गुणों का आश्रय बना रहता है। जब तक प्रकृति के गुण विद्यमान हैं, तब तक उनसे पुरुष की एकान्त मुक्ति कैसे सम्भव है?

श्लोक 20 (bhagavata.3.27.20)

क्वचित्तत्त्वावमर्शेन निवृत्तं भयमुल्बणम् । अनिवृत्तनिमित्तत्वात्पुनः प्रत्यवतिष्ठते ॥ 27.20 ॥

kvacit tattvāvamarśena nivṛttaṁ bhayam ulbaṇam anivṛtta-nimittatvāt punaḥ pratyavatiṣṭhate

तत्त्वों पर विचार करने से कहीं-कहीं यह घोर भय दूर तो हो जाता है, किन्तु उसका कारण पूर्ण रूप से समाप्त न होने के कारण वह पुनः लौट आता है।

श्लोक 21 (bhagavata.3.27.21)

श्रीभगवानुवाच अनिमित्तनिमित्तेन स्वधर्मेणामलात्मना । तीव्रया मयि भक्त्या च श्रुतसम्भृतया चिरम् ॥ 27.21 ॥

śrī-bhagavān uvāca animitta-nimittena sva-dharmeṇāmalātmanā tīvrayā mayi bhaktyā ca śruta-sambhṛtayā ciram

श्रीभगवान ने कहा — निष्काम भाव से किए गए अपने स्वधर्म द्वारा, शुद्ध अन्तःकरण से, तथा दीर्घकाल तक श्रवण से पुष्ट हुई मेरी तीव्र भक्ति के द्वारा।

श्लोक 22 (bhagavata.3.27.22)

ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा । तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना ॥ 27.22 ॥

jñānena dṛṣṭa-tattvena vairāgyeṇa balīyasā tapo-yuktena yogena tīvreṇātma-samādhinā

तत्त्व-दर्शन से युक्त ज्ञान के द्वारा, प्रबल वैराग्य के द्वारा, तप से युक्त योग के द्वारा और आत्मा में स्थिर तीव्र समाधि के द्वारा।

श्लोक 23 (bhagavata.3.27.23)

प्रकृतिः पुरुषस्येह दह्यमाना त्वहर्निशम् । तिरोभवित्री शनकैरग्नेर्योनिरिवारणिः ॥ 27.23 ॥

prakṛtiḥ puruṣasyeha dahyamānā tv ahar-niśam tiro-bhavitrī śanakair agner yonir ivāraṇiḥ

इस लोक में पुरुष की प्रकृति दिन-रात जलती रहती है, और वह धीरे-धीरे उसी प्रकार लुप्त हो जाती है, जिस प्रकार अग्नि उत्पन्न करने वाली अरणी की लकड़ी अग्नि में ही भस्म हो जाती है।

श्लोक 24 (bhagavata.3.27.24)

भुक्तभोगा परित्यक्ता दृष्टदोषा च नित्यशः । नेश्वरस्याशुभं धत्ते स्वे महिम्नि स्थितस्य च ॥ 27.24 ॥

bhukta-bhogā parityaktā dṛṣṭa-doṣā ca nityaśaḥ neśvarasyāśubhaṁ dhatte sve mahimni sthitasya ca

जो भोग भोग लिया गया, त्याग दिया गया, और जिसका दोष सदा के लिए देख लिया गया — वह अब स्वतंत्र और अपनी ही महिमा में स्थित पुरुष का कोई अहित नहीं कर पाता।

श्लोक 25 (bhagavata.3.27.25)

यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत् । स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ 27.25 ॥

yathā hy apratibuddhasya prasvāpo bahv-anartha-bhṛt sa eva pratibuddhasya na vai mohāya kalpate

जैसे अजागृत मनुष्य के लिए स्वप्न अनेक अनर्थों को लाता है, किन्तु वही स्वप्न जाग चुके मनुष्य को कभी मोहित नहीं कर पाता।

श्लोक 26 (bhagavata.3.27.26)

एवं विदिततत्त्वस्य प्रकृतिर्मयि मानसम् । युञ्जतो नापकुरुत आत्मारामस्य कर्हिचित् ॥ 27.26 ॥

evaṁ vidita-tattvasya prakṛtir mayi mānasam yuñjato nāpakuruta ātmārāmasya karhicit

इसी प्रकार तत्त्व को जान चुके तथा अपने में ही रमण करने वाले पुरुष का, जिसका मन सदा मुझमें लगा रहता है, प्रकृति कभी कोई अहित नहीं कर पाती।

श्लोक 27 (bhagavata.3.27.27)

यदैवमध्यात्मरतः कालेन बहुजन्मना । सर्वत्र जातवैराग्य आब्रह्मभुवनान्मुनिः ॥ 27.27 ॥

yadaivam adhyātma-rataḥ kālena bahu-janmanā sarvatra jāta-vairāgya ābrahma-bhuvanān muniḥ

जब इस प्रकार अनेक जन्मों तक आत्म-चिन्तन में रत रहने वाले मुनि के मन में ब्रह्मलोक तक के सभी लोकों के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।

श्लोक 28 (bhagavata.3.27.28)

मद्भक्तः प्रतिबुद्धार्थो मत्प्रसादेन भूयसा । निःश्रेयसं स्वसंस्थानं कैवल्याख्यं मदाश्रयम् ॥ 27.28 ॥

mad-bhaktaḥ pratibuddhārtho mat-prasādena bhūyasā niḥśreyasaṁ sva-saṁsthānaṁ kaivalyākhyaṁ mad-āśrayam

तब मेरा भक्त, मेरी अपार कृपा से तत्त्व को भलीभाँति जान लेता है, और मेरे ही आश्रित, कैवल्य नामक अपने उस परम कल्याणकारी स्वरूप-धाम को —

श्लोक 29 (bhagavata.3.27.29)

प्राप्नोतीहाञ्जसा धीरः स्वदृशाच्छिन्नसंशयः । यद्गत्वा न निवर्तेत योगी लिङ्गाद्विनिर्गमे ॥ 27.29 ॥

prāpnotīhāñjasā dhīraḥ sva-dṛśā cchinna-saṁśayaḥ yad gatvā na nivarteta yogī liṅgād vinirgame

— वह धीर पुरुष अपनी ही आत्म-दृष्टि से समस्त संशयों को काटकर, इसी जीवन में सहज ही प्राप्त कर लेता है; और वहाँ पहुँचकर योगी अपने सूक्ष्म शरीर के त्याग के पश्चात् फिर कभी लौटकर नहीं आता।

श्लोक 30 (bhagavata.3.27.30)

यदा न योगोपचितासु चेतो मायासु सिद्धस्य विषज्जतेऽङ्ग । अनन्यहेतुष्वथ मे गतिः स्याद् आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहासः ॥ 27.30 ॥

yadā na yogopacitāsu ceto māyāsu siddhasya viṣajjate ’ṅga ananya-hetuṣv atha me gatiḥ syād ātyantikī yatra na mṛtyu-hāsaḥ

हे मेरी माता, जब सिद्ध योगी का चित्त योग से प्राप्त हुई मायिक सिद्धियों में भी आसक्त नहीं होता, तब उसकी मुझ तक की गति अनन्य और अन्तिम हो जाती है, जहाँ मृत्यु की हँसी भी उसे स्पर्श नहीं कर पाती।

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