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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28

भक्ति-योग के अभ्यास पर कपिल का उपदेश

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

श्लोक 1 (bhagavata.3.28.1)

श्रीभगवानुवाच योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे । मनो येनैव विधिना प्रसन्नं याति सत्पथम् ॥ 28.1 ॥

śrī-bhagavān uvāca yogasya lakṣaṇaṁ vakṣye sabījasya nṛpātmaje mano yenaiva vidhinā prasannaṁ yāti sat-patham

श्रीभगवान ने कहा — हे राजपुत्री, अब मैं तुम्हें साक्षात् साध्य सहित योग का लक्षण बताता हूँ, जिस विधि से मन प्रसन्न होकर सत्पथ की ओर बढ़ता है।

श्लोक 2 (bhagavata.3.28.2)

स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम् । दैवाल्लब्धेन सन्तोष आत्मविच्चरणार्चनम् ॥ 28.2 ॥

sva-dharmācaraṇaṁ śaktyā vidharmāc ca nivartanam daivāl labdhena santoṣa ātmavic-caraṇārcanam

अपनी शक्ति के अनुसार स्वधर्म का पालन करना और विधर्म से दूर रहना, दैव से जो कुछ मिले उसी में संतुष्ट रहना, तथा आत्मज्ञानी सत्पुरुष के चरणों की पूजा करना।

श्लोक 3 (bhagavata.3.28.3)

ग्राम्यधर्मनिवृत्तिश्च मोक्षधर्मरतिस्तथा । मितमेध्यादनं शश्वद्विविक्तक्षेमसेवनम् ॥ 28.3 ॥

grāmya-dharma-nivṛttiś ca mokṣa-dharma-ratis tathā mita-medhyādanaṁ śaśvad vivikta-kṣema-sevanam

सांसारिक भोगों की प्रवृत्तियों से निवृत्त होना और मोक्षधर्म में अनुराग रखना, सदा परिमित एवं शुद्ध भोजन करना, तथा सदा एकान्त और कल्याणकारी स्थान का सेवन करना।

श्लोक 4 (bhagavata.3.28.4)

अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रहः । ब्रह्मचर्यं तपः शौचं स्वाध्यायः पुरुषार्चनम् ॥ 28.4 ॥

ahiṁsā satyam asteyaṁ yāvad-artha-parigrahaḥ brahmacaryaṁ tapaḥ śaucaṁ svādhyāyaḥ puruṣārcanam

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, आवश्यकता भर वस्तुओं का ही संग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शौच, स्वाध्याय और परम पुरुष की पूजा।

श्लोक 5 (bhagavata.3.28.5)

मौनं सदासनजयः स्थैर्यं प्राणजयः शनैः । प्रत्याहारश्चेन्द्रियाणां विषयान्मनसा हृदि ॥ 28.5 ॥

maunaṁ sad-āsana-jayaḥ sthairyaṁ prāṇa-jayaḥ śanaiḥ pratyāhāraś cendriyāṇāṁ viṣayān manasā hṛdi

मौन धारण करना, उत्तम आसन में स्थिरता प्राप्त करना, धीरे-धीरे प्राण को वश में करना, और इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन के द्वारा हृदय में प्रत्याहार करना।

श्लोक 6 (bhagavata.3.28.6)

स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् । वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथात्मनः ॥ 28.6 ॥

sva-dhiṣṇyānām eka-deśe manasā prāṇa-dhāraṇam vaikuṇṭha-līlābhidhyānaṁ samādhānaṁ tathātmanaḥ

अपने ही शरीर के किसी एक स्थान पर मन से प्राण को धारण करना, तथा वैकुण्ठ की लीलाओं का ध्यान करना — यही चित्त की समाधि कहलाती है।

श्लोक 7 (bhagavata.3.28.7)

एतैरन्यैश्च पथिभिर्मनो दुष्टमसत्पथम् । बुद्ध्या युञ्जीत शनकैर्जितप्राणो ह्यतन्द्रितः ॥ 28.7 ॥

etair anyaiś ca pathibhir mano duṣṭam asat-patham buddhyā yuñjīta śanakair jita-prāṇo hy atandritaḥ

इन तथा अन्य विधियों से, जो मन असत् मार्ग की ओर दूषित हो गया है, उसे प्राण को वश में करके, सजग रहते हुए, बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे संयत करना चाहिए।

श्लोक 8 (bhagavata.3.28.8)

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य विजितासन आसनम् । तस्मिन्स्वस्ति समासीन ऋजुकायः समभ्यसेत् ॥ 28.8 ॥

śucau deśe pratiṣṭhāpya vijitāsana āsanam tasmin svasti samāsīna ṛju-kāyaḥ samabhyaset

किसी पवित्र स्थान में आसन स्थापित कर, आसन-सिद्धि प्राप्त कर, वहाँ सुखपूर्वक बैठकर, शरीर को सीधा रखते हुए अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 9 (bhagavata.3.28.9)

प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः । प्रतिकूलेन वा चित्तं यथा स्थिरमचञ्चलम् ॥ 28.9 ॥

prāṇasya śodhayen mārgaṁ pūra-kumbhaka-recakaiḥ pratikūlena vā cittaṁ yathā sthiram acañcalam

पूरक, कुम्भक और रेचक के द्वारा, अथवा इसके विपरीत क्रम से, प्राण के मार्ग को शुद्ध करना चाहिए, जिससे चित्त स्थिर और चंचलतारहित हो जाए।

श्लोक 10 (bhagavata.3.28.10)

मनोऽचिरात्स्याद्विरजं जितश्वासस्य योगिनः । वाय्वग्निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम् ॥ 28.10 ॥

mano ’cirāt syād virajaṁ jita-śvāsasya yoginaḥ vāyv-agnibhyāṁ yathā lohaṁ dhmātaṁ tyajati vai malam

जिस योगी ने अपने श्वास को इस प्रकार जीत लिया है, उसका मन शीघ्र ही निर्मल हो जाता है — जैसे वायु और अग्नि से तपाया गया सोना अपनी मलिनता त्याग देता है।

श्लोक 11 (bhagavata.3.28.11)

प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषान् । प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ 28.11 ॥

prāṇāyāmair dahed doṣān dhāraṇābhiś ca kilbiṣān pratyāhāreṇa saṁsargān dhyānenānīśvarān guṇān

प्राणायाम से दोषों को, धारणा से पापों को, प्रत्याहार से संसर्गजनित मलों को, और ध्यान से ईश्वर-रहित गुणों को जलाना चाहिए।

श्लोक 12 (bhagavata.3.28.12)

यदा मनः स्वं विरजं योगेन सुसमाहितम् । काष्ठां भगवतो ध्यायेत्स्वनासाग्रावलोकनः ॥ 28.12 ॥

yadā manaḥ svaṁ virajaṁ yogena susamāhitam kāṣṭhāṁ bhagavato dhyāyet sva-nāsāgrāvalokanaḥ

जब योग-अभ्यास से भलीभाँति समाहित और निर्मल हुए मन से, नासाग्र पर दृष्टि रखते हुए, भगवान के दिव्य अंगों पर ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 13 (bhagavata.3.28.13)

प्रसन्नवदनाम्भोजं पद्मगर्भारुणेक्षणम् । नीलोत्पलदलश्यामं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ 28.13 ॥

prasanna-vadanāmbhojaṁ padma-garbhāruṇekṣaṇam nīlotpala-dala-śyāmaṁ śaṅkha-cakra-gadā-dharam

उनका मुखकमल प्रसन्न है, नेत्र कमल-गर्भ के समान अरुण हैं, नील कमल-दल के समान श्याम वर्ण है, और वे शंख, चक्र तथा गदा धारण करते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.3.28.14)

लसत्पङ्कजकिञ्जल्कपीतकौशेयवाससम् । श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ॥ 28.14 ॥

lasat-paṅkaja-kiñjalka- pīta-kauśeya-vāsasam śrīvatsa-vakṣasaṁ bhrājat kaustubhāmukta-kandharam

उनका वस्त्र खिले हुए कमल के पराग के समान पीत रेशमी है, वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न है, और गले में देदीप्यमान कौस्तुभ मणि सुशोभित है।

श्लोक 15 (bhagavata.3.28.15)

मत्तद्विरेफकलया परीतं वनमालया । परार्ध्यहारवलयकिरीटाङ्गदनूपुरम् ॥ 28.15 ॥

matta-dvirepha-kalayā parītaṁ vana-mālayā parārdhya-hāra-valaya- kirīṭāṅgada-nūpuram

मतवाले भ्रमरों की गुंजार से युक्त वनमाला उन्हें घेरे हुए है, और वे बहुमूल्य हार, कंगन, मुकुट, बाजूबन्द तथा नूपुरों से अलंकृत हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.3.28.16)

काञ्चीगुणोल्लसच्छ्रोणिं हृदयाम्भोजविष्टरम् । दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम् ॥ 28.16 ॥

kāñcī-guṇollasac-chroṇiṁ hṛdayāmbhoja-viṣṭaram darśanīyatamaṁ śāntaṁ mano-nayana-vardhanam

मेखला की डोरी से उनकी कटि देदीप्यमान है, वे भक्त के हृदय-कमल पर आसीन हैं, अत्यन्त दर्शनीय, शान्त, और मन तथा नेत्रों को आनन्दित करने वाले हैं।

श्लोक 17 (bhagavata.3.28.17)

अपीच्यदर्शनं शश्वत्सर्वलोकनमस्कृतम् । सन्तं वयसि कैशोरे भृत्यानुग्रहकातरम् ॥ 28.17 ॥

apīcya-darśanaṁ śaśvat sarva-loka-namaskṛtam santaṁ vayasi kaiśore bhṛtyānugraha-kātaram

उनका दर्शन सदा ही अति सुन्दर है, समस्त लोकवासियों द्वारा वन्दनीय हैं, वे सदा किशोर अवस्था में स्थित हैं, और अपने भृत्यों पर अनुग्रह करने को सदा उत्सुक रहते हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.3.28.18)

कीर्तन्यतीर्थयशसं पुण्यश्लोकयशस्करम् । ध्यायेद्देवं समग्राङ्गं यावन्न च्यवते मनः ॥ 28.18 ॥

kīrtanya-tīrtha-yaśasaṁ puṇya-śloka-yaśaskaram dhyāyed devaṁ samagrāṅgaṁ yāvan na cyavate manaḥ

जब तक मन विचलित न हो, तब तक उन भगवान के सम्पूर्ण अंगों का ध्यान करना चाहिए — जिनकी कीर्ति सदा गाई जाने योग्य है और जो पुण्यश्लोक भक्तों की कीर्ति को भी बढ़ाती है।

श्लोक 19 (bhagavata.3.28.19)

स्थितं व्रजन्तमासीनं शयानं वा गुहाशयम् । प्रेक्षणीयेहितं ध्यायेच्छुद्धभावेन चेतसा ॥ 28.19 ॥

sthitaṁ vrajantam āsīnaṁ śayānaṁ vā guhāśayam prekṣaṇīyehitaṁ dhyāyec chuddha-bhāvena cetasā

खड़े हुए, चलते हुए, बैठे हुए अथवा लेटे हुए, हृदय में निवास करने वाले उन भगवान की दर्शनीय चेष्टाओं का शुद्ध भाव से युक्त चित्त द्वारा ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 20 (bhagavata.3.28.20)

तस्मिँल्लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् । विलक्ष्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ 28.20 ॥

tasmiḻ labdha-padaṁ cittaṁ sarvāvayava-saṁsthitam vilakṣyaikatra saṁyujyād aṅge bhagavato muniḥ

उस रूप में जब चित्त को स्थिरता प्राप्त हो जाए, तब मुनि को सम्पूर्ण अंगों पर एक साथ न ठहरकर, भगवान के प्रत्येक अंग को अलग-अलग पहचानकर एक-एक स्थान पर मन को संयुक्त करना चाहिए।

श्लोक 21 (bhagavata.3.28.21)

सञ्चिन्तयेद्भगवतश्चरणारविन्दं वज्राङ्कुशध्वजसरोरुहलाञ्छनाढ्यम् । उत्तुङ्गरक्तविलसन्नखचक्रवाल- ज्योत्स्नाभिराहतमहद्धृदयान्धकारम् ॥ 28.21 ॥

sañcintayed bhagavataś caraṇāravindaṁ vajrāṅkuśa-dhvaja-saroruha-lāñchanāḍhyam uttuṅga-rakta-vilasan-nakha-cakravāla- jyotsnābhir āhata-mahad-dhṛdayāndhakāram

भगवान के चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए, जो वज्र, अंकुश, ध्वज और कमल के चिह्नों से सुशोभित हैं, और जिनके ऊँचे, लाल, चमकते नखों की चन्द्रमा-सी ज्योत्स्ना महापुरुषों के हृदय के अंधकार को भी दूर कर देती है।

श्लोक 22 (bhagavata.3.28.22)

यच्छौचनिःसृतसरित्प्रवरोदकेन तीर्थेन मूर्ध्न्यधिकृतेन शिवः शिवोऽभूत् । ध्यातुर्मनःशमलशैलनिसृष्टवज्रं ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविन्दम् ॥ 28.22 ॥

yac-chauca-niḥsṛta-sarit-pravarodakena tīrthena mūrdhny adhikṛtena śivaḥ śivo ’bhūt dhyātur manaḥ-śamala-śaila-nisṛṣṭa-vajraṁ dhyāyec ciraṁ bhagavataś caraṇāravindam

जिनके चरण धोने से निकली गंगा के जल को अपने मस्तक पर धारण कर स्वयं शिव भी शिवतर हो जाते हैं, वही भगवान का चरणकमल ध्याता के मन में संचित पाप-पर्वत को चूर करने वाला वज्र है — इसी का दीर्घकाल ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 23 (bhagavata.3.28.23)

जानुद्वयं जलजलोचनया जनन्या लक्ष्म्याखिलस्य सुरवन्दितया विधातुः । ऊर्वोर्निधाय करपल्लवरोचिषा यत् संलालितं हृदि विभोरभवस्य कुर्यात् ॥ 28.23 ॥

jānu-dvayaṁ jalaja-locanayā jananyā lakṣmyākhilasya sura-vanditayā vidhātuḥ ūrvor nidhāya kara-pallava-rociṣā yat saṁlālitaṁ hṛdi vibhor abhavasya kuryāt

कमल-नेत्री जननी लक्ष्मी, जो सम्पूर्ण जगत की जननी हैं और स्वयं देवताओं द्वारा वन्दित हैं, अपनी कोमल अँगुलियों की कान्ति से जिन्हें उनके दोनों घुटनों और जंघाओं पर विराजमान होकर सेवा करती हुई पाई जाती हैं — उन अजन्मा विभु के उन दोनों घुटनों का ध्यान हृदय में करना चाहिए।

श्लोक 24 (bhagavata.3.28.24)

ऊरू सुपर्णभुजयोरधिशोभमानाव्- ओजोनिधी अतसिकाकुसुमावभासौ । व्यालम्बिपीतवरवाससि वर्तमान काञ्चीकलापपरिरम्भि नितम्बबिम्बम् ॥ 28.24 ॥

ūrū suparṇa-bhujayor adhi śobhamānāv ojo-nidhī atasikā-kusumāvabhāsau vyālambi-pīta-vara-vāsasi vartamāna- kāñcī-kalāpa-parirambhi nitamba-bimbam

गरुड़ के कंधों पर शोभायमान, सारी शक्ति के आगार, अलसी के फूल की आभा वाले उनके दोनों जंघाओं का, तथा नीचे तक लटकते पीत वस्त्र पर मेखला से घिरे हुए उनके गोल नितम्बों का ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 25 (bhagavata.3.28.25)

नाभिह्रदं भुवनकोशगुहोदरस्थं यत्रात्मयोनिधिषणाखिललोकपद्मम् । व्यूढं हरिन्मणिवृषस्तनयोरमुष्य ध्यायेद्द्वयं विशदहारमयूखगौरम् ॥ 28.25 ॥

nābhi-hradaṁ bhuvana-kośa-guhodara-sthaṁ yatrātma-yoni-dhiṣaṇākhila-loka-padmam vyūḍhaṁ harin-maṇi-vṛṣa-stanayor amuṣya dhyāyed dvayaṁ viśada-hāra-mayūkha-gauram

उनके उदर के मध्य नाभि-सरोवर का ध्यान करना चाहिए, जो सब लोकों के आगार का उद्गम है और जिससे ब्रह्मा के निवासस्थान, सम्पूर्ण लोकों को धारण करने वाला कमल प्रकट हुआ है; तथा हरितमणि के समान उनके दोनों उत्तम स्तनों का, जो श्वेत हार की किरणों से गौरवर्ण दीखते हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.3.28.26)

वक्षोऽधिवासमृषभस्य महाविभूतेः पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम् । कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थं कुर्यान्मनस्यखिललोकनमस्कृतस्य ॥ 28.26 ॥

vakṣo ’dhivāsam ṛṣabhasya mahā-vibhūteḥ puṁsāṁ mano-nayana-nirvṛtim ādadhānam kaṇṭhaṁ ca kaustubha-maṇer adhibhūṣaṇārthaṁ kuryān manasy akhila-loka-namaskṛtasya

महाविभूति महालक्ष्मी के निवासस्थान, मनुष्यों के मन और नेत्रों को परम आनन्द देने वाले उनके वक्षस्थल का ध्यान करना चाहिए; तथा समस्त लोकों द्वारा वन्दित उन भगवान के कण्ठ का, जो कौस्तुभ मणि की शोभा को और बढ़ाता है।

श्लोक 27 (bhagavata.3.28.27)

बाहूंश्च मन्दरगिरेः परिवर्तनेन निर्णिक्तबाहुवलयानधिलोकपालान् । सञ्चिन्तयेद्दशशतारमसह्यतेजः शङ्खं च तत्करसरोरुहराजहंसम् ॥ 28.27 ॥

bāhūṁś ca mandara-gireḥ parivartanena nirṇikta-bāhu-valayān adhiloka-pālān sañcintayed daśa-śatāram asahya-tejaḥ śaṅkhaṁ ca tat-kara-saroruha-rāja-haṁsam

मन्दराचल के घूमने से घिस-घिसकर चमकीले हुए बाजूबन्दों वाली, सम्पूर्ण लोकपालों के अधिष्ठान रूप उनकी भुजाओं का ध्यान करना चाहिए; तथा हजार तीलियों वाले असह्य तेजयुक्त सुदर्शन चक्र का, और हाथ में कमल पर बैठे राजहंस के समान सुशोभित शंख का।

श्लोक 28 (bhagavata.3.28.28)

कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन । मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां चैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥ 28.28 ॥

kaumodakīṁ bhagavato dayitāṁ smareta digdhām arāti-bhaṭa-śoṇita-kardamena mālāṁ madhuvrata-varūtha-giropaghuṣṭāṁ caityasya tattvam amalaṁ maṇim asya kaṇṭhe

भगवान की प्रिय गदा कौमोदकी का स्मरण करना चाहिए, जो शत्रु-सैनिकों के रक्त-कीचड़ से सनी रहती है; तथा भ्रमरों की गुंजार से मुखरित माला का, और गले में धारण की गई उस निर्मल मणिहार का, जो चैत्य जीव के शुद्ध तत्त्व की प्रतीक है।

श्लोक 29 (bhagavata.3.28.29)

भृत्यानुकम्पितधियेह गृहीतमूर्तेः सञ्चिन्तयेद्भगवतो वदनारविन्दम् । यद्विस्फुरन्मकरकुण्डलवल्गितेन विद्योतितामलकपोलमुदारनासम् ॥ 28.29 ॥

bhṛtyānukampita-dhiyeha gṛhīta-mūrteḥ sañcintayed bhagavato vadanāravindam yad visphuran-makara-kuṇḍala-valgitena vidyotitāmala-kapolam udāra-nāsam

भक्तों पर करुणा से द्रवित होकर विविध रूप धारण करने वाले भगवान के मुखकमल का ध्यान करना चाहिए, जिसका उदार नासिका और निर्मल गाल उनके चमकते मकराकार कुण्डलों की हलचल से आलोकित होते हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.3.28.30)

यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानं भूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् । मीनद्वयाश्रयमधिक्षिपदब्जनेत्रं ध्यायेन्मनोमयमतन्द्रित उल्लसद्भ्रु ॥ 28.30 ॥

yac chrī-niketam alibhiḥ parisevyamānaṁ bhūtyā svayā kuṭila-kuntala-vṛnda-juṣṭam mīna-dvayāśrayam adhikṣipad abja-netraṁ dhyāyen manomayam atandrita ullasad-bhru

भ्रमरों से सेवित उस लक्ष्मी-निकेतन मुख का, जो घुँघराले केशों के समूह से सुशोभित है और जिसकी कमल-सी आँखें दो मछलियों की शोभा को भी मात करती हैं, सजग रहते हुए उठती हुई भौंहों सहित मन में ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 31 (bhagavata.3.28.31)

तस्यावलोकमधिकं कृपयातिघोर- तापत्रयोपशमनाय निसृष्टमक्ष्णोः । स्निग्धस्मितानुगुणितं विपुलप्रसादं ध्यायेच्चिरं विपुलभावनया गुहायाम् ॥ 28.31 ॥

tasyāvalokam adhikaṁ kṛpayātighora- tāpa-trayopaśamanāya nisṛṣṭam akṣṇoḥ snigdha-smitānuguṇitaṁ vipula-prasādaṁ dhyāyec ciraṁ vipula-bhāvanayā guhāyām

करुणावश उनकी आँखों से बरसने वाली, भक्तों के भीषण त्रिविध ताप को शान्त करने वाली, स्नेहमय मुस्कान से युक्त उन अत्यन्त कृपापूर्ण दृष्टियों का हृदय में विशाल भाव से दीर्घकाल तक ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 32 (bhagavata.3.28.32)

हासं हरेरवनताखिललोकतीव्र- शोकाश्रुसागरविशोषणमत्युदारम् । सम्मोहनाय रचितं निजमाययास्य भ्रूमण्डलं मुनिकृते मकरध्वजस्य ॥ 28.32 ॥

hāsaṁ harer avanatākhila-loka-tīvra- śokāśru-sāgara-viśoṣaṇam atyudāram sammohanāya racitaṁ nija-māyayāsya bhrū-maṇḍalaṁ muni-kṛte makara-dhvajasya

हरि की उस हँसी का ध्यान करना चाहिए, जो नतमस्तक हुए समस्त लोगों के तीव्र शोक के अश्रु-सागर को सुखा देती है और अत्यन्त उदार है; तथा उनकी भ्रू-मण्डली का, जिसे उन्होंने ऋषियों के कल्याणार्थ काम को मोहित करने के लिए अपनी ही माया से रचा है।

श्लोक 33 (bhagavata.3.28.33)

ध्यानायनं प्रहसितं बहुलाधरोष्ठ- भासारुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति । ध्यायेत्स्वदेहकुहरेऽवसितस्य विष्णोर् भक्त्यार्द्रयार्पितमना न पृथग्दिदृक्षेत् ॥ 28.33 ॥

dhyānāyanaṁ prahasitaṁ bahulādharoṣṭha- bhāsāruṇāyita-tanu-dvija-kunda-paṅkti dhyāyet svadeha-kuhare ’vasitasya viṣṇor bhaktyārdrayārpita-manā na pṛthag didṛkṣet

उनके अधरों की आभा से अरुणित, कुन्द-पंक्ति के समान छोटे दाँतों से युक्त उस सहज ध्यान योग्य हँसी का ध्यान करना चाहिए। अपने ही हृदय-गुहा में स्थित उन विष्णु का प्रेम से आर्द्र भक्ति से मन को समर्पित कर, उसके अतिरिक्त और कुछ देखने की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 34 (bhagavata.3.28.34)

एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकः प्रमोदात् । औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानस् तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ॥ 28.34 ॥

evaṁ harau bhagavati pratilabdha-bhāvo bhaktyā dravad-dhṛdaya utpulakaḥ pramodāt autkaṇṭhya-bāṣpa-kalayā muhur ardyamānas tac cāpi citta-baḍiśaṁ śanakair viyuṅkte

इस प्रकार भगवान हरि के प्रति भक्ति उत्पन्न होने पर, आनन्द से हृदय द्रवित होकर, रोमांच से भर उठता है, तथा उत्कण्ठा के अश्रुओं से बार-बार आर्द्र होता हुआ साधक धीरे-धीरे अपने ही चित्त-रूपी बंसी को भी उस ध्यान से मुक्त कर देता है।

श्लोक 35 (bhagavata.3.28.35)

मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं विरक्तं निर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः । आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेकम् अन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाहः ॥ 28.35 ॥

muktāśrayaṁ yarhi nirviṣayaṁ viraktaṁ nirvāṇam ṛcchati manaḥ sahasā yathārciḥ ātmānam atra puruṣo ’vyavadhānam ekam anvīkṣate pratinivṛtta-guṇa-pravāhaḥ

जब मन मुक्ति में स्थित, विषयरहित और विरक्त हो जाता है, तब वह अग्निशिखा के समान सहसा निर्वाण को प्राप्त हो जाता है; तब पुरुष गुणों के प्रवाह से सर्वथा निवृत्त होकर आत्मा को अभेद रूप से एक अनुभव करता है।

श्लोक 36 (bhagavata.3.28.36)

सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या तस्मिन्महिम्न्यवसितः सुखदुःखबाह्ये । हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दुःखयोर्यत् स्वात्मन्विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ठः ॥ 28.36 ॥

so ’py etayā caramayā manaso nivṛttyā tasmin mahimny avasitaḥ sukha-duḥkha-bāhye hetutvam apy asati kartari duḥkhayor yat svātman vidhatta upalabdha-parātma-kāṣṭhaḥ

इस चरम मानसिक निवृत्ति से, सुख-दुःख से परे अपनी उस महिमा में स्थित हुआ वह पुरुष, परमात्मा की चरम सीमा को प्राप्त कर, यह जान लेता है कि सुख-दुःख का कारण असत् अहंकार ही है, न कि स्वयं आत्मा।

श्लोक 37 (bhagavata.3.28.37)

देहं च तं न चरमः स्थितमुत्थितं वा सिद्धो विपश्यति यतोऽध्यगमत्स्वरूपम् । दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥ 28.37 ॥

dehaṁ ca taṁ na caramaḥ sthitam utthitaṁ vā siddho vipaśyati yato ’dhyagamat svarūpam daivād upetam atha daiva-vaśād apetaṁ vāso yathā parikṛtaṁ madirā-madāndhaḥ

अपना वास्तविक स्वरूप पा चुका सिद्ध पुरुष अपने अन्तिम शरीर को बैठा या उठा हुआ भी नहीं देखता, ठीक वैसे ही जैसे मदिरा के नशे में अन्धा हुआ मनुष्य यह नहीं जान पाता कि उसने वस्त्र पहना है या नहीं।

श्लोक 38 (bhagavata.3.28.38)

देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥ 28.38 ॥

deho ’pi daiva-vaśagaḥ khalu karma yāvat svārambhakaṁ pratisamīkṣata eva sāsuḥ taṁ sa-prapañcam adhirūḍha-samādhi-yogaḥ svāpnaṁ punar na bhajate pratibuddha-vastuḥ

यह शरीर भी प्राणों सहित दैव के अधीन तब तक बना रहता है जब तक अपने ही प्रारम्भ किए गए कर्म को पूरा नहीं कर लेता; योग-समाधि में आरूढ़ और अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति जागृत वह पुरुष उस समस्त प्रपंच-युक्त शरीर को पुनः स्वप्न की भाँति नहीं अपनाता।

श्लोक 39 (bhagavata.3.28.39)

यथा पुत्राच्च वित्ताच्च पृथङ्मर्त्यः प्रतीयते । अप्यात्मत्वेनाभिमताद्देहादेः पुरुषस्तथा ॥ 28.39 ॥

yathā putrāc ca vittāc ca pṛthaṅ martyaḥ pratīyate apy ātmatvenābhimatād dehādeḥ puruṣas tathā

जैसे मरणशील मनुष्य को पुत्र और धन से पृथक समझा जाता है, यद्यपि वह इन्हें अपनापन मानकर उनसे स्नेह रखता है, वैसे ही पुरुष को शरीरादि से पृथक समझना चाहिए।

श्लोक 40 (bhagavata.3.28.40)

यथोल्मुकाद्विस्फुलिङ्गाद्धूमाद्वापि स्वसम्भवात् । अप्यात्मत्वेनाभिमताद्यथाग्निः पृथगुल्मुकात् ॥ 28.40 ॥

yatholmukād visphuliṅgād dhūmād vāpi sva-sambhavāt apy ātmatvenābhimatād yathāgniḥ pṛthag ulmukāt

जैसे जलती हुई लकड़ी से उत्पन्न होने वाले अंगारे, चिनगारी अथवा धुएँ से अग्नि पृथक है — यद्यपि वे उसी से उत्पन्न होने के कारण उससे जुड़े हुए प्रतीत होते हैं।

श्लोक 41 (bhagavata.3.28.41)

भूतेन्द्रियान्तःकरणात्प्रधानाज्जीवसंज्ञितात् । आत्मा तथा पृथग्द्रष्टा भगवान्ब्रह्मसंज्ञितः ॥ 28.41 ॥

bhūtendriyāntaḥ-karaṇāt pradhānāj jīva-saṁjñitāt ātmā tathā pṛthag draṣṭā bhagavān brahma-saṁjñitaḥ

इसी प्रकार भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरण से युक्त प्रधान से उत्पन्न, 'जीव' नाम से जाना जाने वाला पुरुष द्रष्टा से पृथक है; और वह द्रष्टा साक्षात् 'ब्रह्म' नाम से जाने जाने वाले भगवान हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.3.28.42)

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षेतानन्यभावेन भूतेष्विव तदात्मताम् ॥ 28.42 ॥

sarva-bhūteṣu cātmānaṁ sarva-bhūtāni cātmani īkṣetānanya-bhāvena bhūteṣv iva tad-ātmatām

समस्त प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में समस्त प्राणियों को देखना चाहिए, तथा सब भूतों में उसी एकत्व-भाव को अभेद दृष्टि से देखना चाहिए।

श्लोक 43 (bhagavata.3.28.43)

स्वयोनिषु यथा ज्योतिरेकं नाना प्रतीयते । योनीनां गुणवैषम्यात्तथात्मा प्रकृतौ स्थितः ॥ 28.43 ॥

sva-yoniṣu yathā jyotir ekaṁ nānā pratīyate yonīnāṁ guṇa-vaiṣamyāt tathātmā prakṛtau sthitaḥ

जैसे एक ही अग्नि विभिन्न लकड़ियों में अनेक रूपों में प्रकट होती दिखाई देती है, वैसे ही योनियों के गुणभेद के कारण एक ही आत्मा प्रकृति में स्थित होकर भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है।

श्लोक 44 (bhagavata.3.28.44)

तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं दैवीं सदसदात्मिकाम् । दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ 28.44 ॥

tasmād imāṁ svāṁ prakṛtiṁ daivīṁ sad-asad-ātmikām durvibhāvyāṁ parābhāvya svarūpeṇāvatiṣṭhate

इस प्रकार सत् और असत् दोनों रूपों से युक्त, दुर्बोध्य अपनी इस दैवी प्रकृति को जीतकर, वह अपने ही वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।

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