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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29

भगवान कपिल द्वारा भक्ति का वर्णन

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (bhagavata.3.29.1)

देवहूतिरुवाच लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च । स्वरूपं लक्ष्यतेऽमीषां येन तत्पारमार्थिकम् ॥ 29.1 ॥

devahūtir uvāca lakṣaṇaṁ mahad-ādīnāṁ prakṛteḥ puruṣasya ca svarūpaṁ lakṣyate ’mīṣāṁ yena tat-pāramārthikam

देवहूति ने कहा — महत्तत्त्व आदि तथा प्रकृति और पुरुष का जो लक्षण आपने बताया, उससे उनका पारमार्थिक स्वरूप पहचाना जाता है।

श्लोक 2 (bhagavata.3.29.2)

यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत्प्रचक्षते । भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो ॥ 29.2 ॥

yathā sāṅkhyeṣu kathitaṁ yan-mūlaṁ tat pracakṣate bhakti-yogasya me mārgaṁ brūhi vistaraśaḥ prabho

जिस प्रकार सांख्य में कहा गया है, उसका जो मूल कहा जाता है, हे प्रभो, उस भक्तियोग के मार्ग को अब आप मुझसे विस्तारपूर्वक कहिए।

श्लोक 3 (bhagavata.3.29.3)

विरागो येन पुरुषो भगवन्सर्वतो भवेत् । आचक्ष्व जीवलोकस्य विविधा मम संसृतीः ॥ 29.3 ॥

virāgo yena puruṣo bhagavan sarvato bhavet ācakṣva jīva-lokasya vividhā mama saṁsṛtīḥ

हे भगवन्, जिसके द्वारा पुरुष सर्वथा विरक्त हो सके, वह उपाय बताइए; तथा जीवलोक की विविध जन्म-मृत्युरूप गतियों का भी मुझे वर्णन कीजिए।

श्लोक 4 (bhagavata.3.29.4)

कालस्येश्वररूपस्य परेषां च परस्य ते । स्वरूपं बत कुर्वन्ति यद्धेतोः कुशलं जनाः ॥ 29.4 ॥

kālasyeśvara-rūpasya pareṣāṁ ca parasya te svarūpaṁ bata kurvanti yad-dhetoḥ kuśalaṁ janāḥ

आपका ही स्वरूप है वह काल, जो ईश्वर का प्रतिनिधि है और सबसे परे तथा सर्वश्रेष्ठ है — जिसके भय से लोग शुभ कर्म करते हैं, उसका स्वरूप भी कहिए।

श्लोक 5 (bhagavata.3.29.5)

लोकस्य मिथ्याभिमतेरचक्षुष- श्चिरं प्रसुप्तस्य तमस्यनाश्रये । श्रान्तस्य कर्मस्वनुविद्धया धिया त्वमाविरासीः किल योगभास्करः ॥ 29.5 ॥

lokasya mithyābhimater acakṣuṣaś ciraṁ prasuptasya tamasy anāśraye śrāntasya karmasv anuviddhayā dhiyā tvam āvirāsīḥ kila yoga-bhāskaraḥ

मिथ्या अभिमान से अन्धे बने, अनाश्रित अंधकार में चिरकाल से सोए और कर्मों से थके हुए इस जगत के लिए आप योग के सूर्य के समान प्रकट हुए हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.3.29.6)

मैत्रेय उवाच इति मातुर्वचः श्लक्ष्णं प्रतिनन्द्य महामुनिः । आबभाषे कुरुश्रेष्ठ प्रीतस्तां करुणार्दितः ॥ 29.6 ॥

maitreya uvāca iti mātur vacaḥ ślakṣṇaṁ pratinandya mahā-muniḥ ābabhāṣe kuru-śreṣṭha prītas tāṁ karuṇārditaḥ

मैत्रेय ने कहा — हे कुरुश्रेष्ठ, इस प्रकार अपनी माता के कोमल वचनों का स्वागत कर, करुणा से द्रवित तथा प्रसन्न हुए महामुनि कपिल ने इस प्रकार कहा।

श्लोक 7 (bhagavata.3.29.7)

श्रीभगवानुवाच भक्तियोगो बहुविधो मार्गैर्भामिनि भाव्यते । स्वभावगुणमार्गेण पुंसां भावो विभिद्यते ॥ 29.7 ॥

śrī-bhagavān uvāca bhakti-yogo bahu-vidho mārgair bhāmini bhāvyate svabhāva-guṇa-mārgeṇa puṁsāṁ bhāvo vibhidyate

श्रीभगवान ने कहा — हे भामिनि, भक्तियोग अनेक मार्गों से प्रकट होता है; क्योंकि साधकों के स्वभाव और गुणों के भेद के अनुसार उनका भाव भी भिन्न-भिन्न हो जाता है।

श्लोक 8 (bhagavata.3.29.8)

अभिसन्धाय यो हिंसां दम्भं मात्सर्यमेव वा । संरम्भी भिन्नदृग्भावं मयि कुर्यात्स तामसः ॥ 29.8 ॥

abhisandhāya yo hiṁsāṁ dambhaṁ mātsaryam eva vā saṁrambhī bhinna-dṛg bhāvaṁ mayi kuryāt sa tāmasaḥ

जो क्रोधी हिंसा, दम्भ अथवा ईर्ष्या का लक्ष्य रखकर मुझसे भिन्न दृष्टि से भक्ति-भाव करता है, वह तामसी भक्ति कहलाती है।

श्लोक 9 (bhagavata.3.29.9)

विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव वा । अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भावः स राजसः ॥ 29.9 ॥

viṣayān abhisandhāya yaśa aiśvaryam eva vā arcādāv arcayed yo māṁ pṛthag-bhāvaḥ sa rājasaḥ

जो भोग, यश अथवा ऐश्वर्य को लक्ष्य बनाकर अर्चा आदि रूपों में मेरी पूजा करता है, वह पृथक-भाव से युक्त राजसी भक्ति कहलाती है।

श्लोक 10 (bhagavata.3.29.10)

कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन्वा तदर्पणम् । यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः ॥ 29.10 ॥

karma-nirhāram uddiśya parasmin vā tad-arpaṇam yajed yaṣṭavyam iti vā pṛthag-bhāvaḥ sa sāttvikaḥ

जो अपने कर्मों को त्यागने के उद्देश्य से अथवा उन्हें परम पुरुष को अर्पित करते हुए, यह मानकर कि 'पूजा करनी ही चाहिए', मेरी पूजा करता है, वह भी पृथक-भाव से युक्त सात्त्विकी भक्ति है।

श्लोक 11 (bhagavata.3.29.11)

मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये । मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ 29.11 ॥

mad-guṇa-śruti-mātreṇa mayi sarva-guhāśaye mano-gatir avicchinnā yathā gaṅgāmbhaso ’mbudhau

किन्तु सबके हृदय में निवास करने वाले मुझमें, केवल मेरे गुणों को सुनने मात्र से ही जिसका मनोप्रवाह अविच्छिन्न रूप से बहने लगता है, जैसे गंगा का जल समुद्र की ओर बहता है —

श्लोक 12 (bhagavata.3.29.12)

लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम् । अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥ 29.12 ॥

lakṣaṇaṁ bhakti-yogasya nirguṇasya hy udāhṛtam ahaituky avyavahitā yā bhaktiḥ puruṣottame

— यही निर्गुण भक्तियोग का सच्चा लक्षण कहा गया है — वह भक्ति, जो पुरुषोत्तम के प्रति निष्कारण और अबाधित होती है।

श्लोक 13 (bhagavata.3.29.13)

सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥ 29.13 ॥

sālokya-sārṣṭi-sāmīpya- sārūpyaikatvam apy uta dīyamānaṁ na gṛhṇanti vinā mat-sevanaṁ janāḥ

मेरी सेवा के अतिरिक्त कोई भी मुक्ति — सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य अथवा एकत्व — यदि दी भी जाए, तो शुद्ध भक्त उसे स्वीकार नहीं करते।

श्लोक 14 (bhagavata.3.29.14)

स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः । येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते ॥ 29.14 ॥

sa eva bhakti-yogākhya ātyantika udāhṛtaḥ yenātivrajya tri-guṇaṁ mad-bhāvāyopapadyate

यही भक्तियोग नामक साधना अन्तिम कही गई है, जिसके द्वारा त्रिगुणों को लांघकर पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 15 (bhagavata.3.29.15)

निषेवितेनानिमित्तेन स्वधर्मेण महीयसा । क्रियायोगेन शस्तेन नातिहिंस्रेण नित्यशः ॥ 29.15 ॥

niṣevitenānimittena sva-dharmeṇa mahīyasā kriyā-yogena śastena nātihiṁsreṇa nityaśaḥ

फल की इच्छा से रहित होकर, अत्यन्त हिंसारहित, अपने महान स्वधर्म तथा शुभ क्रियायोग का नित्य नियमपूर्वक अभ्यास करते हुए।

श्लोक 16 (bhagavata.3.29.16)

मद्धिष्ण्यदर्शनस्पर्शपूजास्तुत्यभिवन्दनैः । भूतेषु मद्भावनया सत्त्वेनासङ्गमेन च ॥ 29.16 ॥

mad-dhiṣṇya-darśana-sparśa- pūjā-stuty-abhivandanaiḥ bhūteṣu mad-bhāvanayā sattvenāsaṅgamena ca

मेरी मूर्ति के दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दन के द्वारा; समस्त प्राणियों में मेरी उपस्थिति की भावना रखते हुए, सत्त्वगुण और अनासक्ति के द्वारा।

श्लोक 17 (bhagavata.3.29.17)

महतां बहुमानेन दीनानामनुकम्पया । मैत्र्या चैवात्मतुल्येषु यमेन नियमेन च ॥ 29.17 ॥

mahatāṁ bahu-mānena dīnānām anukampayā maitryā caivātma-tulyeṣu yamena niyamena ca

महापुरुषों का सम्मान करते हुए, दीनों पर करुणा दिखाते हुए, अपने समान लोगों से मैत्री रखते हुए, तथा यम और नियम का पालन करते हुए।

श्लोक 18 (bhagavata.3.29.18)

आध्यात्मिकानुश्रवणान्नामसङ्कीर्तनाच्च मे । आर्जवेनार्यसङ्गेन निरहङ्क्रियया तथा ॥ 29.18 ॥

ādhyātmikānuśravaṇān nāma-saṅkīrtanāc ca me ārjavenārya-saṅgena nirahaṅkriyayā tathā

आध्यात्मिक विषयों के निरन्तर श्रवण से और मेरे नाम-संकीर्तन से, सरलता से, सज्जनों की संगति से तथा अहंकाररहित होकर।

श्लोक 19 (bhagavata.3.29.19)

मद्धर्मणो गुणैरेतैः परिसंशुद्ध आशयः । पुरुषस्याञ्जसाभ्येति श्रुतमात्रगुणं हि माम् ॥ 29.19 ॥

mad-dharmaṇo guṇair etaiḥ parisaṁśuddha āśayaḥ puruṣasyāñjasābhyeti śruta-mātra-guṇaṁ hi mām

मेरे प्रति निष्ठा के इन गुणों से पूर्णतः शुद्ध हुआ अन्तःकरण उस पुरुष का सहज ही मुझ तक पहुँच जाता है, जिसके गुणों को उसने केवल सुना ही है।

श्लोक 20 (bhagavata.3.29.20)

यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात् । एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत् ॥ 29.20 ॥

yathā vāta-ratho ghrāṇam āvṛṅkte gandha āśayāt evaṁ yoga-rataṁ ceta ātmānam avikāri yat

जैसे वायु-रूपी रथ किसी स्रोत से सुगन्ध को उठाकर घ्राण इन्द्रिय तक ले आता है, वैसे ही योग में रत, अविकारी चित्त उस परमात्मा को पकड़ लेता है।

श्लोक 21 (bhagavata.3.29.21)

अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा । तमवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम् ॥ 29.21 ॥

ahaṁ sarveṣu bhūteṣu bhūtātmāvasthitaḥ sadā tam avajñāya māṁ martyaḥ kurute ’rcā-viḍambanam

मैं सदा ही समस्त प्राणियों में उनके आत्मा के रूप में स्थित रहता हूँ। जो उस आत्मा की उपेक्षा कर केवल अर्चा-पूजा करता है, वह मरणशील मनुष्य वस्तुतः एक स्वांग ही रचता है।

श्लोक 22 (bhagavata.3.29.22)

यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् । हित्वार्चां भजते मौढ्याद्भस्मन्येव जुहोति सः ॥ 29.22 ॥

yo māṁ sarveṣu bhūteṣu santam ātmānam īśvaram hitvārcāṁ bhajate mauḍhyād bhasmany eva juhoti saḥ

जो सब प्राणियों में विद्यमान मुझ आत्मा और ईश्वर की उपेक्षा कर मोहवश केवल अर्चा की पूजा करता है, वह मानो राख में ही आहुति डाल रहा है।

श्लोक 23 (bhagavata.3.29.23)

द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्नदर्शिनः । भूतेषु बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति ॥ 29.23 ॥

dviṣataḥ para-kāye māṁ mānino bhinna-darśinaḥ bhūteṣu baddha-vairasya na manaḥ śāntim ṛcchati

जो द्वेषवश दूसरों के शरीर से घृणा करता है, अपने को श्रेष्ठ मानता है, भिन्न दृष्टि रखता है और प्राणियों के प्रति वैर बाँधे रहता है — मुझमें आदर रखते हुए भी उसके मन को शान्ति नहीं मिलती।

श्लोक 24 (bhagavata.3.29.24)

अहमुच्चावचैर्द्रव्यैः क्रिययोत्पन्नयानघे । नैव तुष्येऽर्चितोऽर्चायां भूतग्रामावमानिनः ॥ 29.24 ॥

aham uccāvacair dravyaiḥ kriyayotpannayānaghe naiva tuṣye ’rcito ’rcāyāṁ bhūta-grāmāvamāninaḥ

हे निष्पाप माता, विविध उत्तम-अधम द्रव्यों से और विधिपूर्वक क्रिया से की गई पूजा से भी मैं उस पुरुष की अर्चा से संतुष्ट नहीं होता, जो अन्य प्राणियों का अनादर करता है।

श्लोक 25 (bhagavata.3.29.25)

अर्चादावर्चयेत्तावदीश्वरं मां स्वकर्मकृत् । यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ 29.25 ॥

arcādāv arcayet tāvad īśvaraṁ māṁ sva-karma-kṛt yāvan na veda sva-hṛdi sarva-bhūteṣv avasthitam

अपने-अपने कर्म का पालन करने वाला व्यक्ति तब तक अर्चा आदि रूपों में मुझ ईश्वर की पूजा करता रहे, जब तक वह यह न जान ले कि मैं अपने ही हृदय में और समस्त प्राणियों में स्थित हूँ।

श्लोक 26 (bhagavata.3.29.26)

आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् । तस्य भिन्नदृशो मृत्युर्विदधे भयमुल्बणम् ॥ 29.26 ॥

ātmanaś ca parasyāpi yaḥ karoty antarodaram tasya bhinna-dṛśo mṛtyur vidadhe bhayam ulbaṇam

जो अपने और दूसरे के बीच भेद-भाव करता है, ऐसे भिन्न-दृष्टि वाले पुरुष को मृत्यु के रूप में मैं ही घोर भय प्रदान करता हूँ।

श्लोक 27 (bhagavata.3.29.27)

अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम् । अर्हयेद्दानमानाभ्यां मैत्र्याभिन्नेन चक्षुषा ॥ 29.27 ॥

atha māṁ sarva-bhūteṣu bhūtātmānaṁ kṛtālayam arhayed dāna-mānābhyāṁ maitryābhinnena cakṣuṣā

इसलिए सब प्राणियों में निवास करने वाले मुझ आत्मा को दान और सम्मान के द्वारा, तथा मैत्री और अभेद दृष्टि से देखते हुए पूजना चाहिए।

श्लोक 28 (bhagavata.3.29.28)

जीवाः श्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे । तः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः ॥ 29.28 ॥

jīvāḥ śreṣṭhā hy ajīvānāṁ tataḥ prāṇa-bhṛtaḥ śubhe tataḥ sa-cittāḥ pravarās tataś cendriya-vṛttayaḥ

हे कल्याणी, जीव अजीवों से श्रेष्ठ हैं, उनसे भी श्रेष्ठ प्राणधारी हैं, उनसे भी चेतनायुक्त प्राणी श्रेष्ठ हैं, और उनसे भी इन्द्रिय-वृत्तियों से युक्त प्राणी श्रेष्ठ हैं।

श्लोक 29 (bhagavata.3.29.29)

तत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः । तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदो वराः ॥ 29.29 ॥

tatrāpi sparśa-vedibhyaḥ pravarā rasa-vedinaḥ tebhyo gandha-vidaḥ śreṣṭhās tataḥ śabda-vido varāḥ

उनमें भी स्पर्श जानने वालों से रस जानने वाले श्रेष्ठ हैं, उनसे गन्ध जानने वाले श्रेष्ठ हैं, और उनसे भी शब्द जानने वाले श्रेष्ठ हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.3.29.30)

रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः । तेषां बहुपदाः श्रेष्ठाश्चतुष्पादस्ततो द्विपात् ॥ 29.30 ॥

rūpa-bheda-vidas tatra tataś cobhayato-dataḥ teṣāṁ bahu-padāḥ śreṣṭhāś catuṣ-pādas tato dvi-pāt

उनसे भी रूप-भेद जानने वाले श्रेष्ठ हैं, और उनसे दोनों जबड़ों में दाँत रखने वाले; उनमें भी बहुपाद प्राणी श्रेष्ठ हैं, उनसे चतुष्पाद, और उनसे भी द्विपाद श्रेष्ठ हैं।

श्लोक 31 (bhagavata.3.29.31)

ततो वर्णाश्च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः । ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः ॥ 29.31 ॥

tato varṇāś ca catvāras teṣāṁ brāhmaṇa uttamaḥ brāhmaṇeṣv api veda-jño hy artha-jño ’bhyadhikas tataḥ

उनमें चार वर्ण हैं, जिनमें ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है; और ब्राह्मणों में भी वेदज्ञ, और वेदज्ञों में भी वेद के अर्थ को जानने वाला उनसे भी अधिक श्रेष्ठ है।

श्लोक 32 (bhagavata.3.29.32)

अर्थज्ञात्संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान्स्वकर्मकृत् । मुक्तसङ्गस्ततो भूयानदोग्धा धर्ममात्मनः ॥ 29.32 ॥

artha-jñāt saṁśaya-cchettā tataḥ śreyān sva-karma-kṛt mukta-saṅgas tato bhūyān adogdhā dharmam ātmanaḥ

अर्थज्ञ से भी श्रेष्ठ है संशय का छेदन करने वाला, उससे भी श्रेष्ठ अपने स्वधर्म का पालन करने वाला; उससे भी बढ़कर संगरहित पुरुष है, और उससे भी बढ़कर वह जो अपनी भक्ति का व्यापार नहीं करता।

श्लोक 33 (bhagavata.3.29.33)

तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मा निरन्तरः । मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि संन्यस्तकर्मणः । न पश्यामि परं भूतमकर्तुः समदर्शनात् ॥ 29.33 ॥

tasmān mayy arpitāśeṣa- kriyārthātmā nirantaraḥ mayy arpitātmanaḥ puṁso mayi sannyasta-karmaṇaḥ na paśyāmi paraṁ bhūtam akartuḥ sama-darśanāt

इसलिए जिस पुरुष ने अपने सारे कर्म, अर्थ और आत्मा को अविच्छिन्न रूप से मुझमें अर्पित कर दिया है, जिसका मन मुझमें ही समर्पित है और जिसने अपने सभी कर्म मुझे ही सौंप दिए हैं — ऐसे अकर्ता, समदर्शी पुरुष से बढ़कर मुझे कोई और प्राणी दिखाई नहीं देता।

श्लोक 34 (bhagavata.3.29.34)

मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहुमानयन् । ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥ 29.34 ॥

manasaitāni bhūtāni praṇamed bahu-mānayan īśvaro jīva-kalayā praviṣṭo bhagavān iti

ऐसा साधक मन से ही सब प्राणियों को यह मानते हुए प्रणाम करता है कि ईश्वर, भगवान, अपने अंश जीव के रूप में उनमें प्रविष्ट हुए हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.3.29.35)

भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः । ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत् ॥ 29.35 ॥

bhakti-yogaś ca yogaś ca mayā mānavy udīritaḥ yayor ekatareṇaiva puruṣaḥ puruṣaṁ vrajet

हे मानवि, भक्तियोग और योग — दोनों ही मैंने वर्णन किए हैं, और इन दोनों में से किसी एक के द्वारा भी पुरुष उस परम पुरुष को प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 36 (bhagavata.3.29.36)

एतद्भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः । परं प्रधानं पुरुषं दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥ 29.36 ॥

etad bhagavato rūpaṁ brahmaṇaḥ paramātmanaḥ paraṁ pradhānaṁ puruṣaṁ daivaṁ karma-viceṣṭitam

यह जिस भगवत्स्वरूप को प्राप्त करना है, वही ब्रह्म और परमात्मा है — परम, प्रधान से परे पुरुष, दिव्य और लीलामय कर्मों से युक्त।

श्लोक 37 (bhagavata.3.29.37)

रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते । भूतानां महदादीनां यतो भिन्नदृशां भयम् ॥ 29.37 ॥

rūpa-bhedāspadaṁ divyaṁ kāla ity abhidhīyate bhūtānāṁ mahad-ādīnāṁ yato bhinna-dṛśāṁ bhayam

जो दिव्य रूप-भेदों का आधार है, वह 'काल' कहलाता है — जिसके कारण महत्तत्त्व आदि से भेद-दृष्टि रखने वाले प्राणियों को भय उत्पन्न होता है।

श्लोक 38 (bhagavata.3.29.38)

योऽन्तः प्रविश्य भूतानि भूतैरत्त्यखिलाश्रयः । स विष्ण्वाख्योऽधियज्ञोऽसौ कालः कलयतां प्रभुः ॥ 29.38 ॥

yo ’ntaḥ praviśya bhūtāni bhūtair atty akhilāśrayaḥ sa viṣṇv-ākhyo ’dhiyajño ’sau kālaḥ kalayatāṁ prabhuḥ

जो सबका आश्रय होकर भीतर प्रवेश कर प्राणियों को प्राणियों के द्वारा ही ग्रस लेता है, वह विष्णु नाम से प्रसिद्ध, यज्ञों के भोक्ता, सब नियन्ताओं के भी नियन्ता, वही काल है।

श्लोक 39 (bhagavata.3.29.39)

न चास्य कश्चिद्दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः । आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ 29.39 ॥

na cāsya kaścid dayito na dveṣyo na ca bāndhavaḥ āviśaty apramatto ’sau pramattaṁ janam anta-kṛt

उनका न कोई प्रिय है, न कोई द्वेष्य, न कोई बन्धु; वे सदा सतर्क रहकर, प्रमादी मनुष्य में ही अन्तकाल बनकर प्रवेश करते हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.3.29.40)

यद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति यद्भयात् । यद्भयाद्वर्षते देवो भगणो भाति यद्भयात् ॥ 29.40 ॥

yad-bhayād vāti vāto ’yaṁ sūryas tapati yad-bhayāt yad-bhayād varṣate devo bha-gaṇo bhāti yad-bhayāt

जिनके भय से यह वायु बहती है, जिनके भय से सूर्य तपता है, जिनके भय से वर्षा-देवता वर्षा करते हैं, और जिनके भय से नक्षत्र-समूह चमकते हैं।

श्लोक 41 (bhagavata.3.29.41)

यद्वनस्पतयो भीता लताश्चौषधिभिः सह । स्वे स्वे कालेऽभिगृह्णन्ति पुष्पाणि च फलानि च ॥ 29.41 ॥

yad vanaspatayo bhītā latāś cauṣadhibhiḥ saha sve sve kāle ’bhigṛhṇanti puṣpāṇi ca phalāni ca

जिनके भय से भयभीत वृक्ष, लताएँ और औषधियाँ अपने-अपने समय पर फूल और फल धारण करती हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.3.29.42)

स्रवन्ति सरितो भीता नोत्सर्पत्युदधिर्यतः । अग्निरिन्धे सगिरिभिर्भूर्न मज्जति यद्भयात् ॥ 29.42 ॥

sravanti sarito bhītā notsarpaty udadhir yataḥ agnir indhe sa-giribhir bhūr na majjati yad-bhayāt

जिनके भय से नदियाँ बहती हैं, समुद्र अपनी सीमा नहीं लांघता, अग्नि जलती है, और पर्वतों सहित पृथ्वी जल में नहीं डूबती।

श्लोक 43 (bhagavata.3.29.43)

नभो ददाति श्वसतां पदं यन्नियमाददः । लोकं स्वदेहं तनुते महान् सप्तभिरावृतम् ॥ 29.43 ॥

nabho dadāti śvasatāṁ padaṁ yan-niyamād adaḥ lokaṁ sva-dehaṁ tanute mahān saptabhir āvṛtam

जिनके नियम से आकाश श्वास लेने वाले प्राणियों को अवकाश देता है, और महत्तत्त्व सात आवरणों से घिरा हुआ यह ब्रह्माण्ड-रूपी अपना ही शरीर विस्तृत करता है।

श्लोक 44 (bhagavata.3.29.44)

गुणाभिमानिनो देवाः सर्गादिष्वस्य यद्भयात् । वर्तन्तेऽनुयुगं येषां वश एतच्चराचरम् ॥ 29.44 ॥

guṇābhimānino devāḥ sargādiṣv asya yad-bhayāt vartante ’nuyugaṁ yeṣāṁ vaśa etac carācaram

जिनके भय से गुणों के अधिष्ठाता देवता सृष्टि आदि के कार्यों में युग-युग तक प्रवृत्त रहते हैं, और जिनके वश में यह सम्पूर्ण चराचर जगत है।

श्लोक 45 (bhagavata.3.29.45)

सोऽनन्तोऽन्तकरः कालोऽनादिरादिकृदव्ययः । जनं जनेन जनयन्मारयन्मृत्युनान्तकम् ॥ 29.45 ॥

so ’nanto ’nta-karaḥ kālo ’nādir ādi-kṛd avyayaḥ janaṁ janena janayan mārayan mṛtyunāntakam

वह अनन्त, अन्तकारी काल न किसी से उत्पन्न हुआ है, न व्यय होता है, अपितु वही सृष्टि का आदिकर्ता है — जो एक जीव को दूसरे जीव के द्वारा जन्म देता है और मृत्यु के द्वारा स्वयं मृत्यु के स्वामी यमराज का भी अन्त कर देता है।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30