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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31

जीवों की गति पर भगवान कपिल का उपदेश

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (bhagavata.3.31.1)

श्रीभगवानुवाच कर्मणा दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये । स्त्रियाः प्रविष्ट उदरं पुंसो रेतःकणाश्रयः ॥ 31.1 ॥

śrī-bhagavān uvāca karmaṇā daiva-netreṇa jantur dehopapattaye striyāḥ praviṣṭa udaraṁ puṁso retaḥ-kaṇāśrayaḥ

श्रीभगवान ने कहा — कर्म से, जो दैव की दृष्टि के अधीन है, जीव शरीर धारण करने के लिए पुरुष के वीर्यकण के आश्रय से स्त्री के गर्भ में प्रवेश करता है।

श्लोक 2 (bhagavata.3.31.2)

कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम् । दशाहेन तु कर्कन्धूः पेश्यण्डं वा ततः परम् ॥ 31.2 ॥

kalalaṁ tv eka-rātreṇa pañca-rātreṇa budbudam daśāhena tu karkandhūḥ peśy aṇḍaṁ vā tataḥ param

पहली रात्रि में वह कलल बनता है, पाँचवीं रात्रि में बुद्बुद बनता है, दस दिन में बेर के समान आकार लेता है, और फिर उसके बाद पेशी अथवा अण्डाकार रूप बनता है।

श्लोक 3 (bhagavata.3.31.3)

मासेन तु शिरो द्वाभ्यां बाह्वङ्घ्र्याद्यङ्गविग्रहः । नखलोमास्थिचर्माणि लिङ्गच्छिद्रोद्भवस्त्रिभिः ॥ 31.3 ॥

māsena tu śiro dvābhyāṁ bāhv-aṅghry-ādy-aṅga-vigrahaḥ nakha-lomāsthi-carmāṇi liṅga-cchidrodbhavas tribhiḥ

एक महीने में सिर बनता है, दो महीने में भुजा, पैर आदि अंगों का आकार बनता है, और तीन महीने में नाखून, रोम, हड्डी, त्वचा तथा जननेन्द्रिय और शरीर के छिद्र प्रकट होते हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.3.31.4)

चतुर्भिर्धातवः सप्त पञ्चभिः क्षुत्तृडुद्भवः । षड्भिर्जरायुणा वीतः कुक्षौ भ्राम्यति दक्षिणे ॥ 31.4 ॥

caturbhir dhātavaḥ sapta pañcabhiḥ kṣut-tṛḍ-udbhavaḥ ṣaḍbhir jarāyuṇā vītaḥ kukṣau bhrāmyati dakṣiṇe

चार महीने में शरीर के सात धातु बनते हैं, पाँच महीने में भूख-प्यास प्रकट होती है, और छह महीने में गर्भ जरायु से ढका हुआ उदर के दाहिने भाग में घूमने लगता है।

श्लोक 5 (bhagavata.3.31.5)

मातुर्जग्धान्नपानाद्यैरेधद्धातुरसम्मते । शेते विण्मूत्रयोर्गर्ते स जन्तुर्जन्तुसम्भवे ॥ 31.5 ॥

mātur jagdhānna-pānādyair edhad-dhātur asammate śete viṇ-mūtrayor garte sa jantur jantu-sambhave

माता के खाए हुए अन्न-पान से पुष्ट होता हुआ वह जीव, कीड़ों के प्रजनन-स्थान के समान उस घृणित मल-मूत्र के गड्ढे में पड़ा रहता है।

श्लोक 6 (bhagavata.3.31.6)

कृमिभिः क्षतसर्वाङ्गः सौकुमार्यात्प्रतिक्षणम् । मूर्च्छामाप्नोत्युरुक्लेशस्तत्रत्यैः क्षुधितैर्मुहुः ॥ 31.6 ॥

kṛmibhiḥ kṣata-sarvāṅgaḥ saukumāryāt pratikṣaṇam mūrcchām āpnoty uru-kleśas tatratyaiḥ kṣudhitair muhuḥ

उस कोमल शरीर को कीड़े क्षण-क्षण में काटते रहते हैं, और भूखे कीड़ों की बार-बार की उस पीड़ा से वह अत्यन्त कष्ट में मूर्च्छित हो जाता है।

श्लोक 7 (bhagavata.3.31.7)

कटुतीक्ष्णोष्णलवणरूक्षाम्लादिभिरुल्बणैः । मातृभुक्तैरुपस्पृष्टः सर्वाङ्गोत्थितवेदनः ॥ 31.7 ॥

kaṭu-tīkṣṇoṣṇa-lavaṇa- rūkṣāmlādibhir ulbaṇaiḥ mātṛ-bhuktair upaspṛṣṭaḥ sarvāṅgotthita-vedanaḥ

माता के खाए हुए कटु, तीक्ष्ण, उष्ण, नमकीन, रूखे, खट्टे आदि तीव्र खाद्य पदार्थों से स्पर्शित होकर उसके सारे अंगों में पीड़ा उठती है।

श्लोक 8 (bhagavata.3.31.8)

उल्बेन संवृतस्तस्मिन्नन्त्रैश्च बहिरावृतः । आस्ते कृत्वा शिरः कुक्षौ भुग्नपृष्ठशिरोधरः ॥ 31.8 ॥

ulbena saṁvṛtas tasminn antraiś ca bahir āvṛtaḥ āste kṛtvā śiraḥ kukṣau bhugna-pṛṣṭha-śirodharaḥ

उल्ब झिल्ली से ढका और बाहर से आँतों से घिरा हुआ वह अपना सिर उदर की ओर किए, पीठ और गर्दन को धनुष के समान मोड़े हुए वहीं पड़ा रहता है।

श्लोक 9 (bhagavata.3.31.9)

अकल्पः स्वाङ्गचेष्टायां शकुन्त इव पञ्जरे । तत्र लब्धस्मृतिर्दैवात्कर्म जन्मशतोद्भवम् । स्मरन्दीर्घमनुच्छ्वासं शर्म किं नाम विन्दते ॥ 31.9 ॥

akalpaḥ svāṅga-ceṣṭāyāṁ śakunta iva pañjare tatra labdha-smṛtir daivāt karma janma-śatodbhavam smaran dīrgham anucchvāsaṁ śarma kiṁ nāma vindate

अपने ही अंगों को हिलाने में असमर्थ, पिंजरे में बंद पक्षी के समान, वहाँ यदि सौभाग्य से उसे पूर्व सैकड़ों जन्मों के कर्मों का स्मरण हो आए, तो दीर्घ साँस भरता हुआ वह किस प्रकार शान्ति पा सकता है?

श्लोक 10 (bhagavata.3.31.10)

आरभ्य सप्तमान्मासाल्लब्धबोधोऽपि वेपितः । नैकत्रास्ते सूतिवातैर्विष्ठाभूरिव सोदरः ॥ 31.10 ॥

ārabhya saptamān māsāl labdha-bodho ’pi vepitaḥ naikatrāste sūti-vātair viṣṭhā-bhūr iva sodaraḥ

सातवें महीने से चेतना प्राप्त हो जाने पर भी वह प्रसव के लिए चलने वाली वायु से हिलाया जाता हुआ किसी एक स्थान पर नहीं रह पाता, ठीक उसी उदर में जन्मे कीड़े की भाँति।

श्लोक 11 (bhagavata.3.31.11)

नाथमान ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः । स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः ॥ 31.11 ॥

nāthamāna ṛṣir bhītaḥ sapta-vadhriḥ kṛtāñjaliḥ stuvīta taṁ viklavayā vācā yenodare ’rpitaḥ

भयभीत होकर, सातों आवरणों से बँधा हुआ वह जीव हाथ जोड़कर, उन्हीं भगवान से जिन्होंने उसे उस उदर में रखा है, कातर वाणी में प्रार्थना करता है।

श्लोक 12 (bhagavata.3.31.12)

जन्तुरुवाच तस्योपसन्नमवितुं जगदिच्छयात्त- नानातनोर्भुवि चलच्चरणारविन्दम् । सोऽहं व्रजामि शरणं ह्यकुतोभयं मे येनेदृशी गतिरदर्श्यसतोऽनुरूपा ॥ 31.12 ॥

jantur uvāca tasyopasannam avituṁ jagad icchayātta- nānā-tanor bhuvi calac-caraṇāravindam so ’haṁ vrajāmi śaraṇaṁ hy akuto-bhayaṁ me yenedṛśī gatir adarśy asato ’nurūpā

जीव ने कहा — जो अपनी इच्छा से इस जगत की रक्षा के लिए अनेक शरीर धारण करते हैं और पृथ्वी पर चलते हुए चरणकमल रखते हैं, उन्हीं की शरण में मैं जाता हूँ, जो सर्वथा निर्भय हैं; क्योंकि उन्हीं से मुझे मेरे असत् कर्मों के अनुरूप यह अवस्था दिखाई गई है।

श्लोक 13 (bhagavata.3.31.13)

यस्त्वत्र बद्ध इव कर्मभिरावृतात्मा भूतेन्द्रियाशयमयीमवलम्ब्य मायाम् । आस्ते विशुद्धमविकारमखण्डबोधम् आतप्यमानहृदयेऽवसितं नमामि ॥ 31.13 ॥

yas tv atra baddha iva karmabhir āvṛtātmā bhūtendriyāśayamayīm avalambya māyām āste viśuddham avikāram akhaṇḍa-bodham ātapyamāna-hṛdaye ’vasitaṁ namāmi

इस जगत में जो पुरुष कर्मों से मानो बंधा हुआ है, जिसकी आत्मा भूत, इन्द्रिय और मन से बनी माया के आश्रय से ढकी हुई है, फिर भी वही, जो शुद्ध, अविकारी और अखण्ड ज्ञानमय है, इस संतप्त हृदय में विराजमान है — उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 14 (bhagavata.3.31.14)

यः पञ्चभूतरचिते रहितः शरीरे च्छन्नोऽयथेन्द्रियगुणार्थचिदात्मकोऽहम् । तेनाविकुण्ठमहिमानमृषिं तमेनं वन्दे परं प्रकृतिपूरुषयोः पुमांसम् ॥ 31.14 ॥

yaḥ pañca-bhūta-racite rahitaḥ śarīre cchanno ’yathendriya-guṇārtha-cid-ātmako ’ham tenāvikuṇṭha-mahimānam ṛṣiṁ tam enaṁ vande paraṁ prakṛti-pūruṣayoḥ pumāṁsam

जो पाँच भूतों से बने इस शरीर से रहित हैं, जबकि मैं स्वयं इन्द्रिय, गुण और विषयों से बने अहंकार में असंगत रूप से ढका हुआ हूँ — उन ऋषि, प्रकृति और पुरुष दोनों से परे, अखण्ड महिमा वाले उन परम पुरुष की मैं वन्दना करता हूँ।

श्लोक 15 (bhagavata.3.31.15)

यन्माययोरुगुणकर्मनिबन्धनेऽस्मिन् सांसारिके पथि चरंस्तदभिश्रमेण । नष्टस्मृतिः पुनरयं प्रवृणीत लोकं युक्त्या कया महदनुग्रहमन्तरेण ॥ 31.15 ॥

yan-māyayoru-guṇa-karma-nibandhane ’smin sāṁsārike pathi caraṁs tad-abhiśrameṇa naṣṭa-smṛtiḥ punar ayaṁ pravṛṇīta lokaṁ yuktyā kayā mahad-anugraham antareṇa

जिनकी माया से उत्पन्न इस विशाल गुण-कर्मों से बंधे संसार-मार्ग पर विचरण करता हुआ यह जीव, उसी परिश्रम से अपनी स्मृति खो बैठता है — तो उनकी महान कृपा के बिना वह किस उपाय से पुनः अपने वास्तविक स्वरूप को चुन सके?

श्लोक 16 (bhagavata.3.31.16)

ज्ञानं यदेतददधात्कतमः स देवस् त्रैकालिकं स्थिरचरेष्वनुवर्तितांशः । तं जीवकर्मपदवीमनुवर्तमानास् तापत्रयोपशमनाय वयं भजेम ॥ 31.16 ॥

jñānaṁ yad etad adadhāt katamaḥ sa devas trai-kālikaṁ sthira-careṣv anuvartitāṁśaḥ taṁ jīva-karma-padavīm anuvartamānās tāpa-trayopaśamanāya vayaṁ bhajema

जिन्होंने यह ज्ञान प्रदान किया, वह भगवान के अतिरिक्त और कौन हो सकता है, जो त्रैकालिक होकर स्थावर-जंगम सबमें अपने अंश से अनुगत हैं? जीवों के इस कर्म-मार्ग का अनुसरण करने वाले हम, त्रिविध तापों की शान्ति के लिए, उन्हीं का भजन करें।

श्लोक 17 (bhagavata.3.31.17)

देह्यन्यदेहविवरे जठराग्निनासृग्- विण्मूत्रकूपपतितो भृशतप्तदेहः । इच्छन्नितो विवसितुं गणयन्स्वमासान् निर्वास्यते कृपणधीर्भगवन्कदा नु ॥ 31.17 ॥

dehy anya-deha-vivare jaṭharāgnināsṛg- viṇ-mūtra-kūpa-patito bhṛśa-tapta-dehaḥ icchann ito vivasituṁ gaṇayan sva-māsān nirvāsyate kṛpaṇa-dhīr bhagavan kadā nu

दूसरे के शरीर के भीतरी भाग में, जठराग्नि से जलता, रक्त-मल-मूत्र के कुँए में गिरा, अत्यन्त संतप्त शरीर वाला यह देही, हे भगवन्, यहाँ से निकलने की इच्छा से अपने महीने गिनता हुआ — यह दीनबुद्धि कब मुक्त होगा?

श्लोक 18 (bhagavata.3.31.18)

येनेदृशीं गतिमसौ दशमास्य ईश संग्राहितः पुरुदयेन भवादृशेन । स्वेनैव तुष्यतु कृतेन स दीननाथः को नाम तत्प्रति विनाञ्जलिमस्य कुर्यात् ॥ 31.18 ॥

yenedṛśīṁ gatim asau daśa-māsya īśa saṅgrāhitaḥ puru-dayena bhavādṛśena svenaiva tuṣyatu kṛtena sa dīna-nāthaḥ ko nāma tat-prati vināñjalim asya kuryāt

हे ईश्वर, जिनकी अपार करुणा से मुझ जैसे को दस महीने की अवस्था में ही यह चेतना प्राप्त हुई है, वे अद्वितीय दीनबन्धु अपने ही इस कार्य से संतुष्ट हों; उनके प्रति हाथ जोड़ने के अतिरिक्त और कौन उसका प्रत्युपकार कर सकता है?

श्लोक 19 (bhagavata.3.31.19)

पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवध्रिः शारीरके दमशरीर्यपरः स्वदेहे । यत्सृष्टयासं तमहं पुरुषं पुराणं पश्ये बहिर्हृदि च चैत्यमिव प्रतीतम् ॥ 31.19 ॥

paśyaty ayaṁ dhiṣaṇayā nanu sapta-vadhriḥ śārīrake dama-śarīry aparaḥ sva-dehe yat-sṛṣṭayāsaṁ tam ahaṁ puruṣaṁ purāṇaṁ paśye bahir hṛdi ca caityam iva pratītam

सातों आवरणों से बंधा यह जीव अपने ही शरीर में बुद्धि के द्वारा केवल अनुकूल-प्रतिकूल संवेदनाओं को ही देख पाता है, इससे भिन्न कोई और; परन्तु जिनकी ही सृष्टि से मैं यह हुआ, उस पुरातन पुरुष को मैं बाहर और हृदय में उसी चैत्य-रूप में विद्यमान देखता हूँ।

श्लोक 20 (bhagavata.3.31.20)

सोऽहं वसन्नपि विभो बहुदुःखवासं गर्भान्न निर्जिगमिषे बहिरन्धकूपे । यत्रोपयातमुपसर्पति देवमाया मिथ्या मतिर्यदनु संसृतिचक्रमेतत् ॥ 31.20 ॥

so ’haṁ vasann api vibho bahu-duḥkha-vāsaṁ garbhān na nirjigamiṣe bahir andha-kūpe yatropayātam upasarpati deva-māyā mithyā matir yad-anu saṁsṛti-cakram etat

इसलिए, हे विभो, इतने दुःखों से भरे इस निवास में रहते हुए भी मैं गर्भ से बाहर उस अंधे कुएँ में जाने की इच्छा नहीं करता, जहाँ पहुँचते ही आपकी वह देवमाया मिथ्या अभिमान उत्पन्न कर देती है, जिसके पीछे यह संसार-चक्र चलता है।

श्लोक 21 (bhagavata.3.31.21)

तस्मादहं विगतविक्लव उद्धरिष्य आत्मानमाशु तमसः सुहृदात्मनैव । भूयो यथा व्यसनमेतदनेकरन्ध्रं मा मे भविष्यदुपसादितविष्णुपादः ॥ 31.21 ॥

tasmād ahaṁ vigata-viklava uddhariṣya ātmānam āśu tamasaḥ suhṛdātmanaiva bhūyo yathā vyasanam etad aneka-randhraṁ mā me bhaviṣyad upasādita-viṣṇu-pādaḥ

इसलिए मैं अब व्याकुलता त्यागकर, अपने ही सुहृद स्वरूप शुद्ध बुद्धि की सहायता से शीघ्र ही स्वयं को इस अंधकार से उबार लूँगा, ताकि अनेक गर्भों में प्रवेश करने का यह संकट मुझे पुनः न भोगना पड़े — यदि विष्णु के चरणों को मैंने अपने मन में सदा धारण किया।

श्लोक 22 (bhagavata.3.31.22)

कपिल उवाच एवं कृतमतिर्गर्भे दशमास्यः स्तुवन्नृषिः । सद्यः क्षिपत्यवाचीनं प्रसूत्यै सूतिमारुतः ॥ 31.22 ॥

kapila uvāca evaṁ kṛta-matir garbhe daśa-māsyaḥ stuvann ṛṣiḥ sadyaḥ kṣipaty avācīnaṁ prasūtyai sūti-mārutaḥ

कपिल ने कहा — इस प्रकार गर्भ में दस महीने का हो चुका वह जीव संकल्प लेकर स्तुति करता ही रहता है, तभी प्रसव की वायु उसे सहसा नीचे की ओर मुख किए हुए जन्म के लिए धकेल देती है।

श्लोक 23 (bhagavata.3.31.23)

तेनावसृष्टः सहसा कृत्वावाक्शिर आतुरः । विनिष्क्रामति कृच्छ्रेण निरुच्छ्वासो हतस्मृतिः ॥ 31.23 ॥

tenāvasṛṣṭaḥ sahasā kṛtvāvāk śira āturaḥ viniṣkrāmati kṛcchreṇa nirucchvāso hata-smṛtiḥ

उस वायु से बलपूर्वक धकेला गया, सिर नीचे किए हुए वह पीड़ित जीव अत्यन्त कठिनाई से, साँस रुकी हुई और स्मृति खोई हुई अवस्था में बाहर निकलता है।

श्लोक 24 (bhagavata.3.31.24)

पतितो भुव्यसृङ्मिश्रः विष्ठाभूरिव चेष्टते । रोरूयति गते ज्ञाने विपरीतां गतिं गतः ॥ 31.24 ॥

patito bhuvy asṛṅ-miśraḥ viṣṭhā-bhūr iva ceṣṭate rorūyati gate jñāne viparītāṁ gatiṁ gataḥ

रक्त से लथपथ पृथ्वी पर गिरकर वह मल में उत्पन्न कीड़े के समान हाथ-पैर हिलाता है; ज्ञान लुप्त हो जाने पर वह विपरीत गति को प्राप्त होकर जोर-जोर से रोता है।

श्लोक 25 (bhagavata.3.31.25)

परच्छन्दं न विदुषा पुष्यमाणो जनेन सः । अनभिप्रेतमापन्नः प्रत्याख्यातुमनीश्वरः ॥ 31.25 ॥

para-cchandaṁ na viduṣā puṣyamāṇo janena saḥ anabhipretam āpannaḥ pratyākhyātum anīśvaraḥ

दूसरे की इच्छा को न समझने वाले, अज्ञानी लोगों द्वारा पाला जाता हुआ वह जीव, अनिष्ट परिस्थितियों में पड़कर भी उन्हें अस्वीकार करने में असमर्थ रहता है।

श्लोक 26 (bhagavata.3.31.26)

शायितोऽशुचिपर्यङ्के जन्तुः स्वेदज-दूषिते । नेशः कण्डूयनेऽङ्गानामासनोत्थानचेष्टने ॥ 31.26 ॥

śāyito ’śuci-paryaṅke jantuḥ svedaja-dūṣite neśaḥ kaṇḍūyane ’ṅgānām āsanotthāna-ceṣṭane

पसीने से उत्पन्न कीड़ों से दूषित अपवित्र बिछौने पर लिटाया गया वह शिशु न तो अपने अंगों को खुजा सकता है, न बैठ सकता है, न उठकर हिल-डुल सकता है।

श्लोक 27 (bhagavata.3.31.27)

तुदन्त्यामत्वचं दंशा मशका मत्कुणादयः । रुदन्तं विगतज्ञानं कृमयः कृमिकं यथा ॥ 31.27 ॥

tudanty āma-tvacaṁ daṁśā maśakā matkuṇādayaḥ rudantaṁ vigata-jñānaṁ kṛmayaḥ kṛmikaṁ yathā

जिसकी त्वचा अभी कच्ची है, ऐसे उस शिशु को डांस, मच्छर, खटमल आदि काटते रहते हैं, ठीक जैसे बड़े कीड़े को छोटे कीड़े काटते हैं; और वह ज्ञानरहित होकर रोता ही रहता है।

श्लोक 28 (bhagavata.3.31.28)

इत्येवं शैशवं भुक्त्वा दुःखं पौगण्डमेव च । अलब्धाभीप्सितोऽज्ञानादिद्धमन्युः शुचार्पितः ॥ 31.28 ॥

ity evaṁ śaiśavaṁ bhuktvā duḥkhaṁ paugaṇḍam eva ca alabdhābhīpsito ’jñānād iddha-manyuḥ śucārpitaḥ

इस प्रकार शैशव के इन दुःखों को भोगकर वह बाल्यावस्था को प्राप्त होता है, जहाँ भी वह अपनी इच्छित वस्तुओं को न पाकर, अज्ञानवश क्रोध और शोक से भर उठता है।

श्लोक 29 (bhagavata.3.31.29)

सह देहेन मानेन वर्धमानेन मन्युना । करोति विग्रहं कामी कामिष्वन्ताय चात्मनः ॥ 31.29 ॥

saha dehena mānena vardhamānena manyunā karoti vigrahaṁ kāmī kāmiṣv antāya cātmanaḥ

शरीर के साथ-साथ मान और क्रोध भी बढ़ते जाते हैं, और वह कामी पुरुष अपनी ही आत्मा के विनाश के लिए अन्य कामी लोगों के साथ शत्रुता मोल लेता है।

श्लोक 30 (bhagavata.3.31.30)

भूतैः पञ्चभिरारब्धे देहे देह्यबुधोऽसकृत् । अहंममेत्यसद्ग्राहः करोति कुमतिर्मतिम् ॥ 31.30 ॥

bhūtaiḥ pañcabhir ārabdhe dehe dehy abudho ’sakṛt ahaṁ mamety asad-grāhaḥ karoti kumatir matim

पाँच भूतों से बने इस शरीर में स्थित अज्ञानी जीव बार-बार 'मैं' और 'मेरा' कहकर असत् वस्तुओं को पकड़ता रहता है — यह उसकी कुबुद्धि से उत्पन्न भावना है।

श्लोक 31 (bhagavata.3.31.31)

तदर्थं कुरुते कर्म यद्बद्धो याति संसृतिम् । योऽनुयाति ददत्क्लेशमविद्याकर्मबन्धनः ॥ 31.31 ॥

tad-arthaṁ kurute karma yad-baddho yāti saṁsṛtim yo ’nuyāti dadat kleśam avidyā-karma-bandhanaḥ

उसी शरीर के लिए वह ऐसे कर्म करता है जिनके बंधन में बँधकर वह संसार-चक्र में भटकता रहता है; और वह शरीर, जो अविद्या और कर्म के बंधन से उत्पन्न है, उसे केवल क्लेश ही देते हुए उसके पीछे-पीछे चलता रहता है।

श्लोक 32 (bhagavata.3.31.32)

यद्यसद्भिः पथि पुनः शिश्नोदरकृतोद्यमैः । आस्थितो रमते जन्तुस्तमो विशति पूर्ववत् ॥ 31.32 ॥

yady asadbhiḥ pathi punaḥ śiśnodara-kṛtodyamaiḥ āsthito ramate jantus tamo viśati pūrvavat

यदि यह जीव पुनः अपने जननेन्द्रिय और उदर के लिए प्रयत्नशील असत्पुरुषों के मार्ग पर स्थित होकर रमण करने लगे, तो वह पूर्व की भाँति फिर उसी अंधकार में प्रवेश करता है।

श्लोक 33 (bhagavata.3.31.33)

सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिः श्रीर्ह्रीर्यशः क्षमा । शमो दमो भगश्चेति यत्सङ्गाद्याति सङ्क्षयम् ॥ 31.33 ॥

satyaṁ śaucaṁ dayā maunaṁ buddhiḥ śrīr hrīr yaśaḥ kṣamā śamo damo bhagaś ceti yat-saṅgād yāti saṅkṣayam

उस संगति से सत्य, शौच, दया, गंभीरता, बुद्धि, श्री, लज्जा, यश, क्षमा, मन का संयम, इन्द्रियों का संयम तथा सौभाग्य — ये सब नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.3.31.34)

तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु । सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ 31.34 ॥

teṣv aśānteṣu mūḍheṣu khaṇḍitātmasv asādhuṣu saṅgaṁ na kuryāc chocyeṣu yoṣit-krīḍā-mṛgeṣu ca

इसलिए उन अशान्त, मूढ़, आत्मबोध से रहित, दुष्ट, शोचनीय तथा स्त्रियों के हाथों नाचने वाले पशु-तुल्य पुरुषों की संगति नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 35 (bhagavata.3.31.35)

न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः । योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ 31.35 ॥

na tathāsya bhaven moho bandhaś cānya-prasaṅgataḥ yoṣit-saṅgād yathā puṁso yathā tat-saṅgi-saṅgataḥ

किसी अन्य विषय के प्रति आसक्ति से पुरुष को उतना मोह और बंधन नहीं होता, जितना स्त्री-संग से अथवा उसमें आसक्त लोगों की संगति से होता है।

श्लोक 36 (bhagavata.3.31.36)

प्रजापतिः स्वां दुहितरं दृष्ट्वा तद्रूपधर्षितः । रोहिद्भूतां सोऽन्वधावदृक्षरूपी हतत्रपः ॥ 31.36 ॥

prajāpatiḥ svāṁ duhitaraṁ dṛṣṭvā tad-rūpa-dharṣitaḥ rohid-bhūtāṁ so ’nvadhāvad ṛkṣa-rūpī hata-trapaḥ

प्रजापति ब्रह्मा ने अपनी ही पुत्री को देखकर उसके रूप से मोहित हो गए, और जब वह हिरणी बनी, तब निर्लज्ज होकर स्वयं हिरण के रूप में उसके पीछे दौड़ पड़े।

श्लोक 37 (bhagavata.3.31.37)

तत्सृष्टसृष्टसृष्टेषु को न्वखण्डितधीः पुमान् । ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया ॥ 31.37 ॥

tat-sṛṣṭa-sṛṣṭa-sṛṣṭeṣu ko nv akhaṇḍita-dhīḥ pumān ṛṣiṁ nārāyaṇam ṛte yoṣin-mayyeha māyayā

ब्रह्मा से उत्पन्न होकर आगे उत्पन्न हुए इन सब प्राणियों में, ऋषि नारायण के अतिरिक्त, इस लोक में माया-रूपिणी स्त्री से भला किसकी बुद्धि विचलित न हुई हो?

श्लोक 38 (bhagavata.3.31.38)

बलं मे पश्य मायायाः स्त्रीमय्या जयिनो दिशाम् । या करोति पदाक्रान्तान्भ्रूविजृम्भेण केवलम् ॥ 31.38 ॥

balaṁ me paśya māyāyāḥ strī-mayyā jayino diśām yā karoti padākrāntān bhrūvi-jṛmbheṇa kevalam

देखो, दिशाओं को जीतने वालों को भी जीत लेने वाली मेरी इस स्त्री-रूपिणी माया के बल को, जो केवल अपनी भौंहों के संकेत मात्र से पुरुषों को अपने चरणों में झुका देती है।

श्लोक 39 (bhagavata.3.31.39)

सङ्गं न कुर्यात्प्रमदासु जातु योगस्य पारं परमारुरुक्षुः । मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो वदन्ति या निरयद्वारमस्य ॥ 31.39 ॥

saṅgaṁ na kuryāt pramadāsu jātu yogasya pāraṁ param ārurukṣuḥ mat-sevayā pratilabdhātma-lābho vadanti yā niraya-dvāram asya

योग की परम सीमा तक पहुँचने की इच्छा रखने वाले, तथा मेरी सेवा से आत्मलाभ प्राप्त कर चुके साधक को स्त्रियों की संगति कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि वे ही आगे बढ़ते साधक के लिए नरक का द्वार हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.3.31.40)

योपयाति शनैर्माया योषिद्देवविनिर्मिता । तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणैः कूपमिवावृतम् ॥ 31.40 ॥

yopayāti śanair māyā yoṣid deva-vinirmitā tām īkṣetātmano mṛtyuṁ tṛṇaiḥ kūpam ivāvṛtam

जो माया धीरे-धीरे स्त्री के रूप में भगवान द्वारा रची जाकर समीप आती है, उसे अपनी ही मृत्यु समझना चाहिए — जैसे घास से ढका हुआ कुआँ।

श्लोक 41 (bhagavata.3.31.41)

यां मन्यते पतिं मोहान्मन्मायामृषभायतीम् । स्त्रीत्वं स्त्रीसङ्गतः प्राप्तो वित्तापत्यगृहप्रदम् ॥ 31.41 ॥

yāṁ manyate patiṁ mohān man-māyām ṛṣabhāyatīm strītvaṁ strī-saṅgataḥ prāpto vittāpatya-gṛha-pradam

स्त्री-संग के फलस्वरूप स्त्रीत्व को प्राप्त हुआ जीव मोहवश पुरुष-रूप में आई हुई मेरी उसी माया को अपना पति मान बैठता है, जो धन, संतान और घर देने वाला प्रतीत होता है।

श्लोक 42 (bhagavata.3.31.42)

तामात्मनो विजानीयात्पत्यपत्यगृहात्मकम् । दैवोपसादितं मृत्युं मृगयोर्गायनं यथा ॥ 31.42 ॥

tām ātmano vijānīyāt paty-apatya-gṛhātmakam daivopasāditaṁ mṛtyuṁ mṛgayor gāyanaṁ yathā

उस पति, संतान और घर के रूप में प्रकट हुई माया को स्त्री को अपनी ही दैव-प्रेरित मृत्यु समझना चाहिए, जैसे शिकारी का मधुर गायन मृग के लिए मृत्यु ही होता है।

श्लोक 43 (bhagavata.3.31.43)

देहेन जीवभूतेन लोकाल्लोकमनुव्रजन् । भुञ्जान एव कर्माणि करोत्यविरतं पुमान् ॥ 31.43 ॥

dehena jīva-bhūtena lokāl lokam anuvrajan bhuñjāna eva karmāṇi karoty avirataṁ pumān

जीव बना यह पुरुष उस शरीर के सहारे एक लोक से दूसरे लोक में भटकता हुआ, अपने ही कर्मों के फल को भोगते हुए, निरन्तर कर्म करता रहता है।

श्लोक 44 (bhagavata.3.31.44)

जीवो ह्यस्यानुगो देहो भूतेन्द्रियमनोमयः । तन्निरोधोऽस्य मरणमाविर्भावस्तु सम्भवः ॥ 31.44 ॥

jīvo hy asyānugo deho bhūtendriya-mano-mayaḥ tan-nirodho ’sya maraṇam āvirbhāvas tu sambhavaḥ

जीव के अनुगामी इस शरीर की, जो भूत, इन्द्रिय और मन से बना है, समाप्ति ही उसकी मृत्यु कहलाती है, और उसका प्राकट्य ही जन्म कहलाता है।

श्लोक 45 (bhagavata.3.31.45)

द्रव्योपलब्धिस्थानस्य द्रव्येक्षायोग्यता यदा । तत्पञ्चत्वमहंमानादुत्पत्तिर्द्रव्यदर्शनम् ॥ 31.45 ॥

dravyopalabdhi-sthānasya dravyekṣāyogyatā yadā tat pañcatvam ahaṁ-mānād utpattir dravya-darśanam

जब वस्तुओं के अनुभव का स्थान (शरीर) वस्तुओं को देखने में असमर्थ हो जाता है, तभी वह मृत्यु है; और जब 'मैं यह शरीर हूँ' ऐसा अभिमान उत्पन्न होता है, तभी वह जन्म कहलाता है।

श्लोक 46 (bhagavata.3.31.46)

यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा । तदैव चक्षुषो द्रष्टुर्द्रष्टृत्वायोग्यतानयोः ॥ 31.46 ॥

yathākṣṇor dravyāvayava- darśanāyogyatā yadā tadaiva cakṣuṣo draṣṭur draṣṭṛtvāyogyatānayoḥ

जैसे जब नेत्र किसी वस्तु के अंगों को देखने में असमर्थ हो जाता है, तब वह असमर्थता नेत्र और उसके द्वारा देखने वाले द्रष्टा दोनों की मानी जाती है — जबकि वास्तव में द्रष्टा की देखने की शक्ति कभी नष्ट नहीं होती।

श्लोक 47 (bhagavata.3.31.47)

तस्मान्न कार्यः सन्त्रासो न कार्पण्यं न सम्भ्रमः । बुद्ध्वा जीवगतिं धीरो मुक्तसङ्गश्चरेदिह ॥ 31.47 ॥

tasmān na kāryaḥ santrāso na kārpaṇyaṁ na sambhramaḥ buddhvā jīva-gatiṁ dhīro mukta-saṅgaś cared iha

इसलिए न तो भय करना चाहिए, न दीनता, न व्याकुलता; जीव की इस वास्तविक गति को समझकर धीर पुरुष को इस लोक में आसक्तिरहित होकर विचरण करना चाहिए।

श्लोक 48 (bhagavata.3.31.48)

सम्यग्दर्शनया बुद्ध्या योगवैराग्ययुक्तया । मायाविरचिते लोके चरेन्न्यस्य कलेवरम् ॥ 31.48 ॥

samyag-darśanayā buddhyā yoga-vairāgya-yuktayā māyā-viracite loke caren nyasya kalevaram

योग और वैराग्य से युक्त सम्यक-दर्शन वाली बुद्धि के द्वारा, इस माया-रचित लोक में शरीर को गौण मानते हुए ही विचरण करना चाहिए।

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