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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5

मैत्रेय से विदुर की वार्ता

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (bhagavata.3.5.1)

श्री शुक उवाच द्वारि द्युनद्या ऋषभः कुरूणां मैत्रेयमासीनमगाधबोधम् । क्षत्तोपसृत्याच्युतभावसिद्धः पप्रच्छ सौशील्यगुणाभितृप्तः ॥ 5.1 ॥

śrī-śuka uvāca dvāri dyu-nadyā ṛṣabhaḥ kurūṇāṁ maitreyam āsīnam agādha-bodham kṣattopasṛtyācyuta-bhāva-siddhaḥ papraccha sauśīlya-guṇābhitṛptaḥ

श्री शुकदेव जी ने कहा — कुरुवंश में श्रेष्ठ विदुर, जो अच्युत भगवान की भक्ति में सिद्ध थे, देवनदी गंगा के उद्गम-द्वार पर विराजमान अगाध ज्ञानी मैत्रेय के समीप पहुँचे, और उनके शील तथा गुणों से पूर्णतः संतुष्ट होकर उनसे यह प्रश्न किया।

श्लोक 2 (bhagavata.3.5.2)

विदुर उवाच सुखाय कर्माणि करोति लोको न तैः सुखं वान्यदुपारमं वा । विन्देत भूयस्तत एव दुःखं यदत्र युक्तं भगवान् वदेन्नः ॥ 5.2 ॥

vidura uvāca sukhāya karmāṇi karoti loko na taiḥ sukhaṁ vānyad-upāramaṁ vā vindeta bhūyas tata eva duḥkhaṁ yad atra yuktaṁ bhagavān vaden naḥ

विदुर ने कहा — संसार के लोग सुख की खोज में कर्म करते हैं, किन्तु उन कर्मों से न तो उन्हें सुख मिलता है और न तृप्ति; उलटे उन्हीं कर्मों से बारंबार दुःख ही उत्पन्न होता है। हे भगवन, इस विषय में जो उचित मार्ग हो, वह हमें बताइए।

श्लोक 3 (bhagavata.3.5.3)

जनस्य कृष्णाद्विमुखस्य दैवा- दधर्मशीलस्य सुदुःखितस्य । अनुग्रहायेह चरन्ति नूनं भूतानि भव्यानि जनार्दनस्य ॥ 5.3 ॥

janasya kṛṣṇād vimukhasya daivād adharma-śīlasya suduḥkhitasya anugrahāyeha caranti nūnaṁ bhūtāni bhavyāni janārdanasya

जो लोग दैववश श्रीकृष्ण से विमुख, अधर्मपरायण और अत्यंत दुःखी हैं, उन पर करुणा करने के लिए ही निश्चय ही भगवान जनार्दन के महान भक्त इस पृथ्वी पर विचरण करते रहते हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.3.5.4)

तत्साधुवर्यादिश वर्त्म शं नः संराधितो भगवान् येन पुंसाम् । हृदि स्थितो यच्छति भक्तिपूते ज्ञानं सतत्त्वाधिगमं पुराणम् ॥ 5.4 ॥

tat sādhu-varyādiśa vartma śaṁ naḥ saṁrādhito bhagavān yena puṁsām hṛdi sthito yacchati bhakti-pūte jñānaṁ sa-tattvādhigamaṁ purāṇam

अतः हे श्रेष्ठ साधु, हमें वह मंगलमय मार्ग बताइए, जिसका अनुसरण करने से मनुष्यों के हृदय में विराजमान भगवान प्रसन्न होकर, उनके भक्ति से पवित्र हुए हृदय में, तत्त्व-ज्ञान से युक्त उस सनातन ज्ञान को प्रदान करते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.3.5.5)

करोति कर्माणि कृतावतारो यान्यात्मतन्त्रो भगवांस्त्र्यधीशः । यथा ससर्जाग्र इदं निरीहः संस्थाप्य वृत्तिं जगतो विधत्ते ॥ 5.5 ॥

karoti karmāṇi kṛtāvatāro yāny ātma-tantro bhagavāṁs tryadhīśaḥ yathā sasarjāgra idaṁ nirīhaḥ saṁsthāpya vṛttiṁ jagato vidhatte

जो अवतार लेकर स्वयं आत्म-निर्भर, तीनों लोकों के स्वामी भगवान कर्म करते हैं, तथा जिस प्रकार उन्होंने बिना किसी इच्छा के आरंभ में इस जगत की रचना करके इसकी जीविका को स्थापित कर उसका नियमन किया, वह सब मुझे बताइए।

श्लोक 6 (bhagavata.3.5.6)

यथा पुनः स्वे ख इदं निवेश्य शेते गुहायां स निवृत्तवृत्तिः । योगेश्वराधीश्वर एक एत- दनुप्रविष्टो बहुधा यथासीत् ॥ 5.6 ॥

yathā punaḥ sve kha idaṁ niveśya śete guhāyāṁ sa nivṛtta-vṛttiḥ yogeśvarādhīśvara eka etad anupraviṣṭo bahudhā yathāsīt

और यह भी बताइए कि किस प्रकार वे, समस्त वृत्ति से निवृत्त होकर, इस सृष्टि को अपने ही आकाश-स्वरूप में समेटकर उस गुहा में शयन करते हैं, और वे योगेश्वरों के भी ईश्वर, अकेले होते हुए भी किस प्रकार इसमें विविध रूपों से प्रवेश करते हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.3.5.7)

क्रीडन् विधत्ते द्विजगोसुराणां क्षेमाय कर्माण्यवतारभेदैः । मनो न तृप्यत्यपि शृण्वतां नः सुश्लोकमौलेश्चरितामृतानि ॥ 5.7 ॥

krīḍan vidhatte dvija-go-surāṇāṁ kṣemāya karmāṇy avatāra-bhedaiḥ mano na tṛpyaty api śṛṇvatāṁ naḥ suśloka-mauleś caritāmṛtāni

अपनी लीलाओं में विभिन्न अवतारों के माध्यम से वे ब्राह्मणों, गौओं और देवताओं के कल्याण के लिए ही कर्म करते हैं; और यद्यपि हम उन सुयशस्वी भगवान के चरित्र-रूपी अमृत को निरंतर सुनते रहते हैं, फिर भी हमारा मन कभी तृप्त नहीं होता।

श्लोक 8 (bhagavata.3.5.8)

यैस्तत्त्वभेदैरधिलोकनाथो लोकानलोकान् सह लोकपालान् । अचीक्लृपद्यत्र हि सर्वसत्त्व- निकायभेदोऽधिकृतः प्रतीतः ॥ 5.8 ॥

yais tattva-bhedair adhiloka-nātho lokān alokān saha lokapālān acīkḷpad yatra hi sarva-sattva- nikāya-bhedo ’dhikṛtaḥ pratītaḥ

जिन तत्त्वों के भेद से सभी लोकों के स्वामी ने ऊर्ध्व और अधोलोकों की, उनके पालकों सहित, रचना की, और जिनमें समस्त जीवों के भेद स्पष्टतः स्थापित प्रतीत होते हैं, वह सब भी हमें बताइए।

श्लोक 9 (bhagavata.3.5.9)

येन प्रजानामुत आत्मकर्म- रूपाभिधानां य भिदां व्यधत्त । नारायणो विश्वसृगात्मयोनि- रेतच्च नो वर्णय विप्रवर्य ॥ 5.9 ॥

yena prajānām uta ātma-karma- rūpābhidhānāṁ ca bhidāṁ vyadhatta nārāyaṇo viśvasṛg ātma-yonir etac ca no varṇaya vipra-varya

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, विश्व की सृष्टि करने वाले, स्वयंभू भगवान नारायण ने जिन तत्त्वों के माध्यम से प्राणियों के स्वभाव, कर्म, रूप और नाम में भेद उत्पन्न किया, वह भी हमें बताइए।

श्लोक 10 (bhagavata.3.5.10)

परावरेषां भगवन् व्रतानि श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् । अतृप्नुम क्षुल्लसुखावहानां तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ॥ 5.10 ॥

parāvareṣāṁ bhagavan vratāni śrutāni me vyāsa-mukhād abhīkṣṇam atṛpnuma kṣulla-sukhāvahānāṁ teṣām ṛte kṛṣṇa-kathāmṛtaughāt

हे भगवन, मैंने ऊँचे और नीचे — दोनों प्रकार के — जीवन के व्रतों के विषय में व्यास जी के मुख से बार-बार सुना है, किन्तु उन विषयों के अल्प सुख से मुझे कभी तृप्ति नहीं मिली — तृप्ति तो केवल श्रीकृष्ण-कथा के अमृत-प्रवाह से ही मिलती है।

श्लोक 11 (bhagavata.3.5.11)

कस्तृप्नुयात्तीर्थपदोऽभिधानात् सत्रेषु वः सूरिभिरीड्यमानात् । यः कर्णनाडीं पुरुषस्य यातो भवप्रदां गेहरतिं छिनत्ति ॥ 5.11 ॥

kas tṛpnuyāt tīrtha-pado ’bhidhānāt satreṣu vaḥ sūribhir īḍyamānāt yaḥ karṇa-nāḍīṁ puruṣasya yāto bhava-pradāṁ geha-ratiṁ chinatti

जिनके चरण-कमल ही समस्त तीर्थ हैं, और जिनकी स्तुति महान सत्रों में विद्वज्जन करते हैं, ऐसे भगवान के वर्णन से भला कौन तृप्त हो सकता है — क्योंकि वह वर्णन जब मनुष्य के कर्णरंध्र में प्रवेश करता है, तो जन्म-मृत्यु का कारण बनने वाली गृहासक्ति को ही काट डालता है।

श्लोक 12 (bhagavata.3.5.12)

मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां सखापि ते भारतमाह कृष्णः । यस्मिन्नृणां ग्राम्यसुखानुवादै- र्मतिर्गृहीता नु हरेः कथायाम् ॥ 5.12 ॥

munir vivakṣur bhagavad-guṇānāṁ sakhāpi te bhāratam āha kṛṣṇaḥ yasmin nṛṇāṁ grāmya-sukhānuvādair matir gṛhītā nu hareḥ kathāyām

यद्यपि आपके सखा मुनि व्यास ने महाभारत में भगवान के गुणों का वर्णन करने की इच्छा से ही उसकी रचना की, फिर भी वहाँ लौकिक विषयों के आख्यानों के माध्यम से ही मनुष्यों की बुद्धि को हरि-कथा की ओर आकर्षित किया गया है।

श्लोक 13 (bhagavata.3.5.13)

सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः । हरेः पदानुस्मृतिनिर्वृतस्य समस्तदुःखाप्ययमाशु धत्ते ॥ 5.13 ॥

sā śraddadhānasya vivardhamānā viraktim anyatra karoti puṁsaḥ hareḥ padānusmṛti-nirvṛtasya samasta-duḥkhāpyayam āśu dhatte

श्रद्धावान पुरुष में वह हरि-कथा जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे अन्य समस्त विषयों के प्रति उसमें विरक्ति उत्पन्न हो जाती है; और भगवान के चरणों के निरंतर स्मरण से आनंदित हुए उस पुरुष के समस्त दुःख शीघ्र ही समाप्त हो जाते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.3.5.14)

ताञ्छोच्यशोच्यानविदोऽनुशोचे हरेः कथायां विमुखानघेन । क्षिणोति देवोऽनिमिषस्तु येषा- मायुर्वृथावादगतिस्मृतीनाम् ॥ 5.14 ॥

tāñ chocya-śocyān avido ’nuśoce hareḥ kathāyāṁ vimukhān aghena kṣiṇoti devo ’nimiṣas tu yeṣām āyur vṛthā-vāda-gati-smṛtīnām

जो अभागे लोग अपने पापों के कारण हरि-कथा से मुख मोड़ लेते हैं और उसके प्रयोजन को नहीं समझते, उन दयनीयों में भी दयनीय पुरुषों पर मुझे दया आती है, क्योंकि मैं देखता हूँ कि व्यर्थ के विवाद, कल्पित लक्ष्यों और तरह-तरह की स्मृतियों में उलझे उनके जीवन को अपलक काल स्वयं क्षीण करता जाता है।

श्लोक 15 (bhagavata.3.5.15)

तदस्य कौषारव शर्मदातु- र्हरेः कथामेव कथासु सारम् । उद्धृत्य पुष्पेभ्य इवार्तबन्धो शिवाय नः कीर्तय तीर्थकीर्तेः ॥ 5.15 ॥

tad asya kauṣārava śarma-dātur hareḥ kathām eva kathāsu sāram uddhṛtya puṣpebhya ivārta-bandho śivāya naḥ kīrtaya tīrtha-kīrteḥ

अतः हे कौषारव, हे दुःखियों के बंधु, जिस प्रकार भ्रमर फूलों से केवल मधु ही चुनता है, उसी प्रकार आप भी सभी कथाओं में से केवल उस भगवान की कथा को, जो कल्याणदाता है, हमारे हित के लिए निकालकर हमें सुनाइए।

श्लोक 16 (bhagavata.3.5.16)

स विश्वजन्मस्थितिसंयमार्थे कृतावतारः प्रगृहीतशक्तिः । चकार कर्माण्यतिपूरुषाणि यानीश्वरः कीर्तय तानि मह्यम् ॥ 5.16 ॥

sa viśva-janma-sthiti-saṁyamārthe kṛtāvatāraḥ pragṛhīta-śaktiḥ cakāra karmāṇy atipūruṣāṇi yānīśvaraḥ kīrtaya tāni mahyam

इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के लिए ही अपनी सम्पूर्ण शक्ति सहित अवतार धारण करने वाले उन सर्वोच्च नियन्ता के जो-जो अलौकिक कर्म हैं, वे सब कृपया मुझे सुनाइए।

श्लोक 17 (bhagavata.3.5.17)

श्री शुक उवाच स एवं भगवान् पृष्टः क्षत्त्रा कौषारवो मुनिः । पुंसां निःश्रेयसार्थेन तमाह बहुमानयन् ॥ 5.17 ॥

śrī-śuka uvāca sa evaṁ bhagavān pṛṣṭaḥ kṣattrā kauṣāravo muniḥ puṁsāṁ niḥśreyasārthena tam āha bahu-mānayan

श्री शुकदेव जी ने कहा — विदुर द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, कौषारव मैत्रेय मुनि ने उन्हें अत्यंत आदर देते हुए, समस्त प्राणियों के परम कल्याण के हेतु से, उनसे यह कहना आरंभ किया।

श्लोक 18 (bhagavata.3.5.18)

मैत्रेय उवाच साधु पृष्टं त्वया साधो लोकान् साध्वनुगृह्णता । कीर्तिं वितन्वता लोके आत्मनोऽधोक्षजात्मनः ॥ 5.18 ॥

maitreya uvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā sādho lokān sādhv anugṛhṇatā kīrtiṁ vitanvatā loke ātmano ’dhokṣajātmanaḥ

श्री मैत्रेय जी ने कहा — हे साधुश्रेष्ठ, तुमने भला प्रश्न पूछा है; क्योंकि तुम्हारा मन सदा भगवान अधोक्षज में लीन रहता है, और इस प्रकार तुम स्वयं संसार पर भी कृपा कर रहे हो तथा उनकी कीर्ति को भी फैला रहे हो।

श्लोक 19 (bhagavata.3.5.19)

नैतच्चित्रं त्वयि क्षत्तर्बादरायणवीर्यजे । गृहीतोऽनन्यभावेन यत्त्वया हरिरीश्वरः ॥ 5.19 ॥

naitac citraṁ tvayi kṣattar bādarāyaṇa-vīryaje gṛhīto ’nanya-bhāvena yat tvayā harir īśvaraḥ

हे विदुर, तुम स्वयं महर्षि बादरायण व्यास के वीर्य से उत्पन्न हुए हो, अतः यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि तुमने अनन्य भाव से भगवान हरि को इस प्रकार अपने हृदय में धारण कर रखा है।

श्लोक 20 (bhagavata.3.5.20)

माण्डव्यशापाद्भगवान् प्रजासंयमनो यमः । भ्रातुः क्षेत्रे भुजिष्यायां जातः सत्यवतीसुतात् ॥ 5.20 ॥

māṇḍavya-śāpād bhagavān prajā-saṁyamano yamaḥ bhrātuḥ kṣetre bhujiṣyāyāṁ jātaḥ satyavatī-sutāt

मैं जानता हूँ कि तुम, जो पहले प्रजा के नियन्ता भगवान यमराज थे, माण्डव्य मुनि के शाप के कारण, सत्यवती-पुत्र व्यास से अपने भाई की दासी-पत्नी के गर्भ में उत्पन्न हुए हो।

श्लोक 21 (bhagavata.3.5.21)

भवान् भगवतो नित्यं सम्मतः सानुगस्य ह । यस्य ज्ञानोपदेशाय मादिशद्भगवान् व्रजन् ॥ 5.21 ॥

bhavān bhagavato nityaṁ sammataḥ sānugasya ha yasya jñānopadeśāya mādiśad bhagavān vrajan

तुम भगवान के उन नित्य सम्मानित पार्षदों में से एक हो, जिनके ज्ञान-लाभ के लिए ही भगवान ने अपने धाम को लौटते समय मुझे यह उपदेश दिया था।

श्लोक 22 (bhagavata.3.5.22)

अथ ते भगवल्लीला योगमायोरुबृंहिताः । विश्वस्थित्युद्भवान्तार्था वर्णयाम्यनुपूर्वशः ॥ 5.22 ॥

atha te bhagaval-līlā yoga-māyorubṛṁhitāḥ viśva-sthity-udbhavāntārthā varṇayāmy anupūrvaśaḥ

अतः अब मैं तुम्हें भगवान की उन लीलाओं का, जो उनकी योगमाया के महान विस्तार-स्वरूप हैं और सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय से सम्बद्ध हैं, क्रमानुसार वर्णन करता हूँ।

श्लोक 23 (bhagavata.3.5.23)

भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः । आत्मेच्छानुगतावात्मा नानामत्युपलक्षणः ॥ 5.23 ॥

bhagavān eka āsedam agra ātmātmanāṁ vibhuḥ ātmecchānugatāv ātmā nānā-maty-upalakṣaṇaḥ

सृष्टि से पूर्व, सर्वव्यापी भगवान अकेले ही, अपने ही स्वरूप में, समस्त जीवों के आत्मा के रूप में विद्यमान थे; उन्हीं की इच्छा के अनुगामी उस आत्मा में ही, विविध प्रकार की बुद्धियों के भेद अंतर्निहित थे।

श्लोक 24 (bhagavata.3.5.24)

स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् दृश्यमेकराट् । मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ 5.24 ॥

sa vā eṣa tadā draṣṭā nāpaśyad dṛśyam ekarāṭ mene ’santam ivātmānaṁ supta-śaktir asupta-dṛk

उस समय, वे स्वयं द्रष्टा, समस्त सृष्टि के अद्वितीय स्वामी, फिर भी कोई दृश्य न होने के कारण कुछ भी नहीं देख पाते थे; उनकी बहिरंगा शक्ति सुप्त थी, किन्तु स्वयं की चेतना कभी सुप्त नहीं होती — इसी से वे अपने-आप को मानो अपूर्ण-सा अनुभव करने लगे।

श्लोक 25 (bhagavata.3.5.25)

सा वा एतस्य संद्रष्टुः शक्तिः सदसदात्मिका । माया नाम महाभाग ययेदं निर्ममे विभुः ॥ 5.25 ॥

sā vā etasya saṁdraṣṭuḥ śaktiḥ sad-asad-ātmikā māyā nāma mahā-bhāga yayedaṁ nirmame vibhuḥ

हे महाभाग, उस परम द्रष्टा की वही शक्ति, जो कारण और कार्य दोनों स्वरूप है, माया के नाम से जानी जाती है; और उसी माया के द्वारा उन सर्वशक्तिमान भगवान ने यह सम्पूर्ण जगत रच डाला।

श्लोक 26 (bhagavata.3.5.26)

कालवृत्त्या तु मायायां गुणमय्यामधोक्षजः । पुरुषेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त वीर्यवान् ॥ 5.26 ॥

kāla-vṛttyā tu māyāyāṁ guṇa-mayyām adhokṣajaḥ puruṣeṇātma-bhūtena vīryam ādhatta vīryavān

काल की गति के सहयोग से, त्रिगुणमयी माया में अधोक्षज भगवान ने अपने ही अंश-स्वरूप पुरुष के माध्यम से वीर्य का आधान किया।

श्लोक 27 (bhagavata.3.5.27)

ततोऽभवन् महत्तत्त्वमव्यक्तात्कालचोदितात् । विज्ञानात्मात्मदेहस्थं विश्वं व्यञ्जंस्तमोनुदः ॥ 5.27 ॥

tato ’bhavan mahat-tattvam avyaktāt kāla-coditāt vijñānātmātma-deha-sthaṁ viśvaṁ vyañjaṁs tamo-nudaḥ

इसके पश्चात, काल से प्रेरित उस अव्यक्त माया से महत्तत्त्व की उत्पत्ति हुई, जिसमें स्थित शुद्ध विज्ञान-स्वरूप, अंधकार को दूर करने वाले भगवान ने अपने ही शरीर पर स्थित इस सम्पूर्ण विश्व को प्रकट किया।

श्लोक 28 (bhagavata.3.5.28)

सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः । आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ 5.28 ॥

so ’py aṁśa-guṇa-kālātmā bhagavad-dṛṣṭi-gocaraḥ ātmānaṁ vyakarod ātmā viśvasyāsya sisṛkṣayā

वह महत्तत्त्व भी, अंश, गुण और काल-स्वरूप होकर, भगवान की दृष्टि के परास्त्र में आते ही, इस विश्व की रचना की इच्छा से स्वयं को विविध रूपों में विभाजित करने लगा।

श्लोक 29 (bhagavata.3.5.29)

महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणादहंतत्त्वं व्यजायत । कार्यकारणकर्त्रात्मा भूतेन्द्रियमनोमयः । वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिधा ॥ 5.29 ॥

mahat-tattvād vikurvāṇād ahaṁ-tattvaṁ vyajāyata kārya-kāraṇa-kartrātmā bhūtendriya-mano-mayaḥ vaikārikas taijasaś ca tāmasaś cety ahaṁ tridhā

विकार को प्राप्त उस महत्तत्त्व से अहंकार-तत्त्व उत्पन्न हुआ, जो कार्य, कारण और कर्ता — तीनों रूपों वाला तथा भूत, इन्द्रिय और मन से युक्त है; और यह अहंकार भी वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) तथा तामस — इन तीन रूपों में विभक्त हो गया।

श्लोक 30 (bhagavata.3.5.30)

अहंतत्त्वाद्विकुर्वाणान्मनो वैकारिकादभूत् । वैकारिकाश्च ये देवा अर्थाभिव्यञ्जनं यतः ॥ 5.30 ॥

ahaṁ-tattvād vikurvāṇān mano vaikārikād abhūt vaikārikāś ca ye devā arthābhivyañjanaṁ yataḥ

विकार को प्राप्त हुए सात्त्विक अहंकार से मन उत्पन्न हुआ, और उसी सात्त्विक अहंकार के परिणामस्वरूप उन देवताओं की भी उत्पत्ति हुई, जिनसे इंद्रिय-विषयों का बोध सम्भव होता है।

श्लोक 31 (bhagavata.3.5.31)

तैजसानीन्द्रियाण्येव ज्ञानकर्ममयानि च ॥ 5.31 ॥

taijasānīndriyāṇy eva jñāna-karma-mayāni ca

राजस अहंकार से ही इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं, जो ज्ञान और कर्म — दोनों प्रकार की हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.3.5.32)

तामसो भूतसूक्ष्मादिर्यतः खं लिङ्गमात्मनः ॥ 5.32 ॥

tāmaso bhūta-sūkṣmādir yataḥ khaṁ liṅgam ātmanaḥ

तामस अहंकार से सूक्ष्म भूत उत्पन्न होते हैं, जिनमें से पहला आकाश है, जो स्वयं आत्मा का प्रतीक-चिह्न है।

श्लोक 33 (bhagavata.3.5.33)

कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः । नभसोऽनुसृतं स्पर्शं विकुर्वन्निर्ममेऽनिलम् ॥ 5.33 ॥

kāla-māyāṁśa-yogena bhagavad-vīkṣitaṁ nabhaḥ nabhaso ’nusṛtaṁ sparśaṁ vikurvan nirmame ’nilam

काल और माया के अंश के संयोग से, भगवान द्वारा दृष्ट वह आकाश-तत्त्व, उसमें अनुगत स्पर्श-गुण को विकृत करके वायु को उत्पन्न कर देता है।

श्लोक 34 (bhagavata.3.5.34)

अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः । ससर्ज रूपतन्मात्रं ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ 5.34 ॥

anilo ’pi vikurvāṇo nabhasoru-balānvitaḥ sasarja rūpa-tanmātraṁ jyotir lokasya locanam

वह वायु भी आकाश के साथ मिलकर, अत्यंत बलशाली होकर, रूप-तन्मात्र को उत्पन्न करती है, जिससे संसार को देखने में समर्थ करने वाला तेज उत्पन्न होता है।

श्लोक 35 (bhagavata.3.5.35)

अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत्परवीक्षितम् । आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ 5.35 ॥

anilenānvitaṁ jyotir vikurvat paravīkṣitam ādhattāmbho rasa-mayaṁ kāla-māyāṁśa-yogataḥ

वायु के साथ मिला हुआ तेज, जब सर्वोच्च भगवान की दृष्टि से देखा गया, तब काल और माया के अंश के संयोग से रस-सहित जल की उत्पत्ति हुई।

श्लोक 36 (bhagavata.3.5.36)

ज्योतिषाम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वद्ब्रह्मवीक्षितम् । महीं गन्धगुणामाधात्कालमायांशयोगतः ॥ 5.36 ॥

jyotiṣāmbho ’nusaṁsṛṣṭaṁ vikurvad brahma-vīkṣitam mahīṁ gandha-guṇām ādhāt kāla-māyāṁśa-yogataḥ

जल से मिला हुआ तेज, जब ब्रह्म-दृष्टि से देखा गया, तब काल और माया के अंश के संयोग से गन्ध-गुण वाली पृथ्वी उत्पन्न हुई।

श्लोक 37 (bhagavata.3.5.37)

भूतानां नभ आदीनां यद्यद्भव्यावरावरम् । तेषां परानुसंसर्गाद्यथासंख्यं गुणान् विदुः ॥ 5.37 ॥

bhūtānāṁ nabha-ādīnāṁ yad yad bhavyāvarāvaram teṣāṁ parānusaṁsargād yathā saṅkhyaṁ guṇān viduḥ

हे सौम्य, आकाश से लेकर पृथ्वी तक के सभी भौतिक तत्त्वों में जो भी हीन या श्रेष्ठ गुण पाए जाते हैं, वे सब भगवान की उस अंतिम दृष्टि के संयोग से ही, क्रमशः, उन तत्त्वों में स्थापित हुए जानने चाहिए।

श्लोक 38 (bhagavata.3.5.38)

एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः । नानात्वात्स्वक्रियानीशाः प्रोचुः प्राञ्जलयो विभुम् ॥ 5.38 ॥

ete devāḥ kalā viṣṇoḥ kāla-māyāṁśa-liṅginaḥ nānātvāt sva-kriyānīśāḥ procuḥ prāñjalayo vibhum

काल और माया के अंश से आवेष्टित, विष्णु की ये अंश-रूप देवताएँ, जब अपनी-अपनी अलग-अलग शक्ति के कारण अपने कार्य को स्वयं संपन्न करने में असमर्थ हो गईं, तब उन्होंने हाथ जोड़कर सर्वव्यापी भगवान की यह स्तुति की।

श्लोक 39 (bhagavata.3.5.39)

देवा ऊचुः नमाम ते देव पदारविन्दं प्रपन्नतापोपशमातपत्रम् । यन्मूलकेता यतयोऽञ्जसोरु- संसारदुःखं बहिरुत्क्षिपन्ति ॥ 5.39 ॥

devā ūcuḥ namāma te deva padāravindaṁ prapanna-tāpopaśamātapatram yan-mūla-ketā yatayo ’ñjasoru- saṁsāra-duḥkhaṁ bahir utkṣipanti

देवताओं ने कहा — हे देव, हम आपके उन चरण-कमलों को प्रणाम करते हैं, जो शरणागतों के लिए संतापों को शांत करने वाले छत्र के समान हैं, और जिनके आश्रय में स्थित मुनि सहज ही इस विशाल संसार-दुःख को बाहर फेंक देते हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.3.5.40)

धातर्यदस्मिन् भव ईश जीवा- स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म । आत्मन्लभन्ते भगवंस्तवाङ्घ्रि- च्छायां सविद्यामत आश्रयेम ॥ 5.40 ॥

dhātar yad asmin bhava īśa jīvās tāpa-trayeṇābhihatā na śarma ātman labhante bhagavaṁs tavāṅghri- cchāyāṁ sa-vidyām ata āśrayema

हे धाता, हे ईश, इस संसार में जीव त्रिविध तापों से पीड़ित होकर कभी सुख नहीं पाते; इसलिए, हे आत्मन्, हे भगवन, वे आपके ज्ञान-संपन्न चरणों की छाया में ही शरण पाते हैं — हम भी उसी शरण को स्वीकार करते हैं।

श्लोक 41 (bhagavata.3.5.41)

मार्गन्ति यत्ते मुखपद्मनीडै- श्छन्दःसुपर्णैऋर्षयो विविक्ते । यस्याघमर्षोदसरिद्वरायाः पदं पदं तीर्थपदः प्रपन्नाः ॥ 5.41 ॥

mārganti yat te mukha-padma-nīḍaiś chandaḥ-suparṇair ṛṣayo vivikte yasyāgha-marṣoda-sarid-varāyāḥ padaṁ padaṁ tīrtha-padaḥ prapannāḥ

जिनके मुखकमल को निवास बनाकर, वेदरूपी पंखों वाले विशुद्ध-चित्त ऋषिगण उसे खोजते फिरते हैं, और जिनके एक-एक चरणचिह्न में समाया हुआ पापनाशक जल श्रेष्ठतम नदी (गंगा) के रूप में शरणागतों को प्राप्त होता है, हे तीर्थचरण, वह तीर्थस्वरूप पद हम भी खोज रहे हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.3.5.42)

यच्छ्रद्धया श्रुतवत्या य भक्त्या संमृज्यमाने हृदयेऽवधाय । ज्ञानेन वैराग्यबलेन धीरा व्रजेम तत्तेऽङ्घ्रिसरोजपीठम् ॥ 5.42 ॥

yac chraddhayā śrutavatyā ca bhaktyā sammṛjyamāne hṛdaye ’vadhāya jñānena vairāgya-balena dhīrā vrajema tat te ’ṅghri-saroja-pīṭham

श्रद्धापूर्वक श्रवण और भक्ति से जिनके चरणों को हृदय में स्थापित करने से हृदय शुद्ध हो जाता है, वे धीर पुरुष ज्ञान और वैराग्य के बल से उन्हीं आपके चरण-कमलों के आश्रय-स्थान की ओर बढ़ें — यही हमारी प्रार्थना है।

श्लोक 43 (bhagavata.3.5.43)

विश्वस्य जन्मस्थितिसंयमार्थे कृतावतारस्य पदाम्बुजं ते । व्रजेम सर्वे शरणं यदीश स्मृतं प्रयच्छत्यभयं स्वपुंसाम् ॥ 5.43 ॥

viśvasya janma-sthiti-saṁyamārthe kṛtāvatārasya padāmbujaṁ te vrajema sarve śaraṇaṁ yad īśa smṛtaṁ prayacchaty abhayaṁ sva-puṁsām

हे ईश, इस विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के लिए अवतार धारण करने वाले आपके उन चरण-कमलों की ही शरण में हम सब जाएँ, क्योंकि वे स्मरण मात्र से ही अपने भक्तों को अभयदान देते हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.3.5.44)

यत्सानुबन्धेऽसति देहगेहे ममाहमित्यूढदुराग्रहाणाम् । पुंसां सुदूरं वसतोऽपि पुर्यां भजेम तत्ते भगवन् पदाब्जम् ॥ 5.44 ॥

yat sānubandhe ’sati deha-gehe mamāham ity ūḍha-durāgrahāṇām puṁsāṁ sudūraṁ vasato ’pi puryāṁ bhajema tat te bhagavan padābjam

जो पुरुष 'यह शरीर मेरा है', 'यह घर मेरा है' — इस प्रकार के गहरे दुराग्रह में बंधे रहते हैं, वे आपके उन चरण-कमलों को, जो उन्हीं के भीतर विराजमान हैं, फिर भी दूर बसे रहकर नहीं देख पाते — हे भगवन, हम उन्हीं आपके चरण-कमलों की उपासना करें।

श्लोक 45 (bhagavata.3.5.45)

तान् वै ह्यसद्वृत्तिभिरक्षिभिर्ये पराहृतान्तर्मनसः परेश । अथो न पश्यन्त्युरुगाय नूनं ये ते पदन्यासविलासलक्ष्याः ॥ 5.45 ॥

tān vai hy asad-vṛttibhir akṣibhir ye parāhṛtāntar-manasaḥ pareśa atho na paśyanty urugāya nūnaṁ ye te padanyāsa-vilāsa-lakṣyāḥ

हे परमेश, जिनका आंतरिक मन असत् वृत्तियों वाली इन्द्रियों द्वारा बहिर्मुख कर दिया गया है, वे निश्चय ही आपके उन चरणों को नहीं देख पाते, हे विशाल कीर्तिवाले, जिन्हें केवल वे ही देखते हैं, जिनका एकमात्र लक्ष्य आपकी लीलाओं का दिव्य आनंद लेना है।

श्लोक 46 (bhagavata.3.5.46)

पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये । वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ 5.46 ॥

pānena te deva kathā-sudhāyāḥ pravṛddha-bhaktyā viśadāśayā ye vairāgya-sāraṁ pratilabhya bodhaṁ yathāñjasānvīyur akuṇṭha-dhiṣṇyam

हे देव, जो लोग आपकी कथा के अमृत का पान करते हुए, बढ़ती हुई भक्ति और निर्मल हृदय से युक्त होकर, वैराग्य का सार और सच्चा ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, वे सहज ही उस अखंड धाम (वैकुण्ठलोक) को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 47 (bhagavata.3.5.47)

तथापरे चात्मसमाधियोग- बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् । त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते ॥ 5.47 ॥

tathāpare cātma-samādhi-yoga- balena jitvā prakṛtiṁ baliṣṭhām tvām eva dhīrāḥ puruṣaṁ viśanti teṣāṁ śramaḥ syān na tu sevayā te

इसी प्रकार अन्य लोग भी, आत्म-समाधि और योग के बल से उस अत्यंत बलवती प्रकृति को जीतकर, हे धीर पुरुष, आप में ही प्रवेश करते हैं; किन्तु उनके लिए यह अत्यंत श्रमसाध्य है, जबकि भक्तों के लिए ऐसी कोई कठिनाई नहीं है, क्योंकि वे तो केवल आपकी सेवा भर करते हैं।

श्लोक 48 (bhagavata.3.5.48)

तत्ते वयं लोकसिसृक्षयाद्य त्वयानुसृष्टास्त्रिभिरात्मभिः स्म । सर्वे वियुक्ताः स्वविहारतन्त्रं न शक्नुमस्तत्प्रतिहर्तवे ते ॥ 5.48 ॥

tat te vayaṁ loka-sisṛkṣayādya tvayānusṛṣṭās tribhir ātmabhiḥ sma sarve viyuktāḥ sva-vihāra-tantraṁ na śaknumas tat pratihartave te

हे आदिपुरुष, इस प्रकार आपकी ही इच्छा से जगत की सृष्टि के हेतु आज हम तीनों गुणों द्वारा उत्पन्न किए गए हैं, और परस्पर पृथक् होने के कारण हम अपने-अपने कार्य के जाल को उस रूप में नहीं चला पा रहे हैं जो आपकी लीला के लिए उचित हो।

श्लोक 49 (bhagavata.3.5.49)

यावद्बलिं तेऽज हराम काले यथा वयं चान्नमदाम यत्र । यथोभयेषां त इमे हि लोका बलिं हरन्तोऽन्नमदन्त्यनूहाः ॥ 5.49 ॥

yāvad baliṁ te ’ja harāma kāle yathā vayaṁ cānnam adāma yatra yathobhayeṣāṁ ta ime hi lokā baliṁ haranto ’nnam adanty anūhāḥ

हे अजन्मा, कृपया हमें बताइए कि हम कैसे समय-समय पर आपको भेंट अर्पित करें, और आप हमें अन्न किस प्रकार प्रदान करें, जिससे यह सारा संसार भेंट अर्पण करते हुए और अन्न ग्रहण करते हुए, बिना किसी बाधा के, दोनों के हित में जीवनयापन कर सके।

श्लोक 50 (bhagavata.3.5.50)

त्वं नः सुराणामसि सान्वयानां कूटस्थ आद्यः पुरुषः पुराणः । त्वं देव शक्त्यां गुणकर्मयोनौ रेतस्त्वजायां कविमादधेऽजः ॥ 5.50 ॥

tvaṁ naḥ surāṇām asi sānvayānāṁ kūṭa-stha ādyaḥ puruṣaḥ purāṇaḥ tvaṁ deva śaktyāṁ guṇa-karma-yonau retas tv ajāyāṁ kavim ādadhe ’jaḥ

आप ही हम देवताओं के, अपनी सम्पूर्ण परम्परा सहित, आदि, अपरिवर्तनीय एवं सनातन पुरुष हैं; हे देव, आप ही स्वयं अजन्मा होते हुए भी, गुण और कर्म की योनि-स्वरूप उस शक्ति में, सम्पूर्ण जीवों की सृष्टि हेतु, बीज का आधान करते हैं।

श्लोक 51 (bhagavata.3.5.51)

ततो वयं मत्प्रमुखा यदर्थे बभूविमात्मन् करवाम किं ते । त्वं नः स्वचक्षुः परिदेहि शक्त्या देव क्रियार्थे यदनुग्रहाणाम् ॥ 5.51 ॥

tato vayaṁ mat-pramukhā yad-arthe babhūvimātman karavāma kiṁ te tvaṁ naḥ sva-cakṣuḥ paridehi śaktyā deva kriyārthe yad-anugrahāṇām

इसीलिए, हे परमात्मन्, हम — जिनमें मैं भी अग्रगण्य हूँ — जिस प्रयोजन के लिए उत्पन्न हुए हैं, उसके लिए अब हम क्या करें? हे देव, अपनी कृपादृष्टि हमें प्रदान कीजिए और उस शक्ति से भी हमें युक्त कीजिए, जिससे हम आपकी कृपा से प्राप्त अपने-अपने कार्यों को भलीभाँति सम्पन्न कर सकें।

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