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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1

मनु-कन्याओं की वंशावली

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (bhagavata.4.1.1)

मैत्रेय उवाच मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे । आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः ॥ १ ॥

maitreya uvāca manos tu śatarūpāyāṁ tisraḥ kanyāś ca jajñire ākūtir devahūtiś ca prasūtir iti viśrutāḥ

श्री मैत्रेय जी ने कहा — मनु को अपनी पत्नी शतरूपा से तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो आकूति, देवहूति और प्रसूति के नाम से विख्यात हुईं।

श्लोक 2 (bhagavata.4.1.2)

आकूतिं रुचये प्रादादपि भ्रातृमतीं नृपः । पुत्रिकाधर्ममाश्रित्य शतरूपानुमोदितः ॥ २ ॥

ākūtiṁ rucaye prādād api bhrātṛmatīṁ nṛpaḥ putrikā-dharmam āśritya śatarūpānumoditaḥ

यद्यपि आकूति के भाई थे, तथापि राजा मनु ने शतरूपा की सम्मति से पुत्रिका-धर्म का आश्रय लेकर उसे प्रजापति रुचि को इस शर्त पर दिया कि उसका पुत्र मनु का ही माना जाएगा।

श्लोक 3 (bhagavata.4.1.3)

प्रजापतिः स भगवान् रुचिस्तस्यामजीजनत् । मिथुनं ब्रह्मवर्चस्वी परमेण समाधिना ॥ ३ ॥

prajāpatiḥ sa bhagavān rucis tasyām ajījanat mithunaṁ brahma-varcasvī parameṇa samādhinā

उस तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी प्रजापति रुचि ने परम समाधि के बल से उसमें एक युगल — पुत्र और पुत्री — को जन्म दिया।

श्लोक 4 (bhagavata.4.1.4)

यस्तयोः पुरुषः साक्षाद्विष्णुर्यज्ञस्वरूपधृक् । या स्त्री सा दक्षिणा भूतेरंशभूतानपायिनी ॥ ४ ॥

yas tayoḥ puruṣaḥ sākṣād viṣṇur yajña-svarūpa-dhṛk yā strī sā dakṣiṇā bhūter aṁśa-bhūtānapāyinī

उन दोनों में जो पुरुष-संतान थी, वह साक्षात् भगवान विष्णु ही यज्ञ के स्वरूप में प्रकट हुए थे, और जो कन्या थी, वह दक्षिणा नाम से भूति देवी (लक्ष्मी) का अविभाज्य अंश थी।

श्लोक 5 (bhagavata.4.1.5)

आनिन्ये स्वगृहं पुत्र्याः पुत्रं विततरोचिषम् । स्वायम्भुवो मुदा युक्तो रुचिर्जग्राह दक्षिणाम् ॥ ५ ॥

āninye sva-gṛhaṁ putryāḥ putraṁ vitata-rociṣam svāyambhuvo mudā yukto rucir jagrāha dakṣiṇām

स्वायंभुव मनु प्रसन्नतापूर्वक उस तेजोमय पौत्र यज्ञ को अपने घर ले गए, और रुचि ने पुत्री दक्षिणा को अपने पास ही रखा।

श्लोक 6 (bhagavata.4.1.6)

तां कामयानां भगवानुवाह यजुषां पतिः । तुष्टायां तोषमापन्नोऽजनयद् द्वादशात्मजान् ॥ ६ ॥

tāṁ kāmayānāṁ bhagavān uvāha yajuṣāṁ patiḥ tuṣṭāyāṁ toṣam āpanno ’janayad dvādaśātmajān

कालांतर में यज्ञों के स्वामी भगवान ने दक्षिणा से विवाह किया, जो उन्हें ही पति रूप में चाहती थी, और उससे संतुष्ट होकर उसमें बारह पुत्रों को जन्म दिया।

श्लोक 7 (bhagavata.4.1.7)

तोषः प्रतोषः सन्तोषो भद्रः शान्तिरिडस्पतिः । इध्मः कविर्विभुः स्वह्नः सुदेवो रोचनो द्विषट् ॥ ७ ॥

toṣaḥ pratoṣaḥ santoṣo bhadraḥ śāntir iḍaspatiḥ idhmaḥ kavir vibhuḥ svahnaḥ sudevo rocano dvi-ṣaṭ

यज्ञ और दक्षिणा के वे बारह पुत्र थे — तोष, प्रतोष, संतोष, भद्र, शान्ति, इडस्पति, इध्म, कवि, विभु, स्वह्न, सुदेव और रोचन।

श्लोक 8 (bhagavata.4.1.8)

तुषिता नाम ते देवा आसन्स्वायम्भुवान्तरे । मरीचिमिश्रा ऋषयो यज्ञः सुरगणेश्वरः ॥ ८ ॥

tuṣitā nāma te devā āsan svāyambhuvāntare marīci-miśrā ṛṣayo yajñaḥ sura-gaṇeśvaraḥ

स्वायंभुव मन्वंतर में ये पुत्र तुषित नामक देवता हुए; मरीचि आदि ऋषिगण सप्तर्षि हुए, और यज्ञ स्वयं देवताओं के अधिपति इन्द्र बने।

श्लोक 9 (bhagavata.4.1.9)

प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुपुत्रौ महौजसौ । तत्पुत्रपौत्रनप्तृणामनुवृत्तं तदन्तरम् ॥ ९ ॥

priyavratottānapādau manu-putrau mahaujasau tat-putra-pautra-naptṝṇām anuvṛttaṁ tad-antaram

मनु के दोनों पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद महातेजस्वी राजा हुए, और उस मन्वंतर में उनके पुत्र, पौत्र तथा प्रपौत्रों की परंपरा निरंतर चलती रही।

श्लोक 10 (bhagavata.4.1.10)

देवहूतिमदात्तात कर्दमायात्मजां मनुः । तत्सम्बन्धि श्रुतप्रायं भवता गदतो मम ॥ १० ॥

devahūtim adāt tāta kardamāyātmajāṁ manuḥ tat-sambandhi śruta-prāyaṁ bhavatā gadato mama

हे तात! मनु ने अपनी पुत्री देवहूति को कर्दम मुनि को दिया — उससे संबंधित वह वृत्तांत मेरे द्वारा कहे जाने पर तुम प्रायः सुन ही चुके हो।

श्लोक 11 (bhagavata.4.1.11)

दक्षाय ब्रह्मपुत्राय प्रसूतिं भगवान्मनुः । प्रायच्छद्यत्कृतः सर्गस्त्रिलोक्यां विततो महान् ॥ ११ ॥

dakṣāya brahma-putrāya prasūtiṁ bhagavān manuḥ prāyacchad yat-kṛtaḥ sargas tri-lokyāṁ vitato mahān

पूजनीय मनु ने अपनी पुत्री प्रसूति को ब्रह्मा-पुत्र दक्ष को प्रदान किया, और उन्हीं से उत्पन्न विशाल सृष्टि तीनों लोकों में फैली।

श्लोक 12 (bhagavata.4.1.12)

याः कर्दमसुताः प्रोक्ता नव ब्रह्मर्षिपत्नयः । तासां प्रसूतिप्रसवं प्रोच्यमानं निबोध मे ॥ १२ ॥

yāḥ kardama-sutāḥ proktā nava brahmarṣi-patnayaḥ tāsāṁ prasūti-prasavaṁ procyamānaṁ nibodha me

कर्दम की जिन नौ कन्याओं का वर्णन नौ ब्रह्मर्षियों की पत्नियों के रूप में हो चुका है, अब उनसे उत्पन्न संतानों का वर्णन मुझसे सुनो।

श्लोक 13 (bhagavata.4.1.13)

पत्नी मरीचेस्तु कला सुषुवे कर्दमात्मजा । कश्यपं पूर्णिमानं च ययोरापूरितं जगत् ॥ १३ ॥

patnī marīces tu kalā suṣuve kardamātmajā kaśyapaṁ pūrṇimānaṁ ca yayor āpūritaṁ jagat

कर्दम की कन्या तथा मरीचि की पत्नी कला ने कश्यप और पूर्णिमा को जन्म दिया, जिनकी संतानों से सारा संसार भर गया।

श्लोक 14 (bhagavata.4.1.14)

पूर्णिमासूत विरजं विश्वगं च परन्तप । देवकुल्यां हरेः पादशौचाद्याभूत्सरिद्दिवः ॥ १४ ॥

pūrṇimāsūta virajaṁ viśvagaṁ ca parantapa devakulyāṁ hareḥ pāda- śaucād yābhūt sarid divaḥ

हे परन्तप! पूर्णिमा ने विरज, विश्वग तथा देवकुल्या को जन्म दिया — वही देवकुल्या जो श्रीहरि के चरण-कमलों को धोने वाला जल था और आगे चलकर स्वर्ग की सरिता (आकाश-गंगा) बनी।

श्लोक 15 (bhagavata.4.1.15)

अत्रेः पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशसः सुतान् । दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान् ॥ १५ ॥

atreḥ patny anasūyā trīñ jajñe suyaśasaḥ sutān dattaṁ durvāsasaṁ somam ātmeśa-brahma-sambhavān

अत्रि की पत्नी अनसूया ने तीन सुयशस्वी पुत्रों को जन्म दिया — दत्त, दुर्वासा और सोम — जो क्रमशः विष्णु, शिव और ब्रह्मा के अंशभूत थे।

श्लोक 16 (bhagavata.4.1.16)

विदुर उवाच अत्रेर्गृहे सुरश्रेष्ठाः स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः । किञ्चिच्चिकीर्षवो जाता एतदाख्याहि मे गुरो ॥ १६ ॥

vidura uvāca atrer gṛhe sura-śreṣṭhāḥ sthity-utpatty-anta-hetavaḥ kiñcic cikīrṣavo jātā etad ākhyāhi me guro

विदुर जी ने कहा — हे गुरुदेव! सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कारणस्वरूप वे परम देवगण किसी विशेष प्रयोजन की सिद्धि की इच्छा से अत्रि के घर में क्यों जन्मे? कृपया मुझे यह बताइए।

श्लोक 17 (bhagavata.4.1.17)

मैत्रेय उवाच ब्रह्मणा चोदितः सृष्टावत्रिर्ब्रह्मविदां वरः । सह पत्न्या ययावृक्षं कुलाद्रिं तपसि स्थितः ॥ १७ ॥

maitreya uvāca brahmaṇā coditaḥ sṛṣṭāv atrir brahma-vidāṁ varaḥ saha patnyā yayāv ṛkṣaṁ kulādriṁ tapasi sthitaḥ

श्री मैत्रेय जी ने कहा — ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ अत्रि को जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि-कार्य के लिए प्रेरित किया, तब वे अपनी पत्नी के साथ ऋक्ष पर्वत की कुलाद्रि तपोभूमि में जाकर तपस्या में स्थित हो गए।

श्लोक 18 (bhagavata.4.1.18)

तस्मिन् प्रसूनस्तबकपलाशाशोककानने । वार्भिः स्रवद्भिरुद्घुष्टेनिर्विन्ध्यायाः समन्ततः ॥ १८ ॥

tasmin prasūna-stabaka- palāśāśoka-kānane vārbhiḥ sravadbhir udghuṣṭe nirvindhyāyāḥ samantataḥ

वहाँ, अशोक और पलाश के फूलों के गुच्छों से भरे उस वन में, जो चारों ओर बहती हुई निर्विंध्या नदी के जल-कल-कल से गुंजायमान था —

श्लोक 19 (bhagavata.4.1.19)

प्राणायामेन संयम्य मनो वर्षशतं मुनिः । अतिष्ठदेकपादेन निर्द्वन्द्वोऽनिलभोजनः ॥ १९ ॥

prāṇāyāmena saṁyamya mano varṣa-śataṁ muniḥ atiṣṭhad eka-pādena nirdvandvo ’nila-bhojanaḥ

— वहाँ वह मुनि प्राणायाम द्वारा अपने मन को वश में करके सौ वर्षों तक एक पैर पर खड़ा रहा, द्वंद्वों से रहित होकर केवल वायु का आहार करते हुए।

श्लोक 20 (bhagavata.4.1.20)

शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः । प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥

śaraṇaṁ taṁ prapadye ’haṁ ya eva jagad-īśvaraḥ prajām ātma-samāṁ mahyaṁ prayacchatv iti cintayan

वह यह चिंतन करते हुए — "मैं उन्हीं की शरण ग्रहण करता हूँ, जो सम्पूर्ण जगत के ईश्वर हैं; वे मुझे अपने ही समान संतान प्रदान करें" —

श्लोक 21 (bhagavata.4.1.21)

तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधसाग्निना । निर्गतेन मुनेर्मूर्ध्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥

tapyamānaṁ tri-bhuvanaṁ prāṇāyāmaidhasāgninā nirgatena muner mūrdhnaḥ samīkṣya prabhavas trayaḥ

उस मुनि के मस्तक से प्राणायाम रूपी ईंधन से प्रज्वलित होकर निकली अग्नि जब तीनों लोकों को तपाने लगी, तब उसे देखकर तीनों आदि देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) ने —

श्लोक 22 (bhagavata.4.1.22)

अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः । वितायमानयशसस्तदाश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥

apsaro-muni-gandharva- siddha-vidyādharoragaiḥ vitāyamāna-yaśasas tad-āśrama-padaṁ yayuḥ

— तब अप्सराओं, मुनियों, गन्धर्वों, सिद्धों, विद्याधरों और नागों द्वारा अपनी महिमा का गान कराते हुए वे उस मुनि के आश्रम में पधारे।

श्लोक 23 (bhagavata.4.1.23)

तत्प्रादुर्भावसंयोगविद्योतितमना मुनिः । उत्तिष्ठन्नेकपादेन ददर्श विबुधर्षभान् ॥ २३ ॥

tat-prādurbhāva-saṁyoga- vidyotita-manā muniḥ uttiṣṭhann eka-pādena dadarśa vibudharṣabhān

उनके एक साथ प्रकट होने के आनन्द से मुनि का मन प्रकाशित हो उठा, और वे उसी एक पैर पर खड़े होकर देवताओं में श्रेष्ठ उन तीनों को देखने लगे।

श्लोक 24 (bhagavata.4.1.24)

प्रणम्य दण्डवद्भूमावुपतस्थेऽर्हणाञ्जलिः । वृषहंससुपर्णस्थान् स्वैः स्वैश्चिह्नैश्च चिह्नितान् ॥ २४ ॥

praṇamya daṇḍavad bhūmāv upatasthe ’rhaṇāñjaliḥ vṛṣa-haṁsa-suparṇa-sthān svaiḥ svaiś cihnaiś ca cihnitān

भूमि पर दंडवत् प्रणाम करके वे अंजलि बाँधे हुए उन तीनों के सम्मुख खड़े हुए, जो क्रमशः वृषभ, हंस और गरुड़ पर आसीन थे और अपने-अपने चिह्नों से पहचाने जाते थे।

श्लोक 25 (bhagavata.4.1.25)

कृपावलोकेन हसद्वदनेनोपलम्भितान् । तद्रोचिषा प्रतिहते निमील्य मुनिरक्षिणी ॥ २५ ॥

kṛpāvalokena hasad- vadanenopalambhitān tad-rociṣā pratihate nimīlya munir akṣiṇī

उन्होंने कृपापूर्ण दृष्टि और मुस्कुराते हुए मुख से उसकी ओर देखा, किन्तु उनके तेज से चकाचौंध होकर मुनि ने अपनी आँखें मूँद लीं।

श्लोक 26 (bhagavata.4.1.26)

चेतस्तत्प्रवणं युञ्जन्नस्तावीत्संहताञ्जलिः । श्लक्ष्णया सूक्तया वाचा सर्वलोकगरीयसः ॥ २६ ॥

cetas tat-pravaṇaṁ yuñjann astāvīt saṁhatāñjaliḥ ślakṣṇayā sūktayā vācā sarva-loka-garīyasaḥ

अपने चित्त को उन्हीं में लगाकर, हाथ जोड़े हुए वे कोमल और सुंदर वाणी में समस्त लोकों में सबसे पूज्य उन तीनों की स्तुति करने लगे।

श्लोक 27 (bhagavata.4.1.27)

अत्रिरुवाच विश्वोद्भवस्थितिलयेषु विभज्यमानै- र्मायागुणैरनुयुगं विगृहीतदेहाः । ते ब्रह्मविष्णुगिरिशाः प्रणतोऽस्म्यहं व-स्तेभ्यः क एव भवतां म इहोपहूतः ॥ २७ ॥

atrir uvāca viśvodbhava-sthiti-layeṣu vibhajyamānair māyā-guṇair anuyugaṁ vigṛhīta-dehāḥ te brahma-viṣṇu-giriśāḥ praṇato ’smy ahaṁ vas tebhyaḥ ka eva bhavatāṁ ma ihopahūtaḥ

अत्रि ने कहा — हे ब्रह्मा, विष्णु और शिव! जो प्रत्येक युग में सृष्टि, स्थिति और प्रलय के निमित्त माया के गुणों के विभाजन द्वारा पृथक्-पृथक् शरीर धारण करते हैं, मैं आप तीनों को प्रणाम करता हूँ। किन्तु आप तीनों में से मैंने वास्तव में किसे बुलाया था?

श्लोक 28 (bhagavata.4.1.28)

एको मयेह भगवान्विविधप्रधानै- श्चित्तीकृतः प्रजननाय कथं नु यूयम् । अत्रागतास्तनुभृतां मनसोऽपि दूराद् ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे ॥ २८ ॥

eko mayeha bhagavān vividha-pradhānaiś cittī-kṛtaḥ prajananāya kathaṁ nu yūyam atrāgatās tanu-bhṛtāṁ manaso ’pi dūrād brūta prasīdata mahān iha vismayo me

मैंने संतान की कामना से अपने चित्त को विविध साधनों द्वारा एक ही भगवान पर एकाग्र किया था — फिर आप तीनों यहाँ कैसे पधारे, जो देहधारियों के मन की पहुँच से भी परे हैं? कृपया मुझे बताइए, मुझ पर प्रसन्न होइए, क्योंकि मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है।

श्लोक 29 (bhagavata.4.1.29)

मैत्रेय उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा त्रयस्ते विबुधर्षभाः । प्रत्याहुः श्लक्ष्णया वाचा प्रहस्य तमृषिं प्रभो ॥ २९ ॥

maitreya uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā trayas te vibudharṣabhāḥ pratyāhuḥ ślakṣṇayā vācā prahasya tam ṛṣiṁ prabho

श्री मैत्रेय जी ने कहा — हे प्रभो! उसके ये वचन सुनकर देवताओं में श्रेष्ठ वे तीनों मुस्कुराए और कोमल वाणी में उस ऋषि को उत्तर देने लगे।

श्लोक 30 (bhagavata.4.1.30)

देवा ऊचुः यथा कृतस्ते सङ्कल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा । सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम् ॥ ३० ॥

devā ūcuḥ yathā kṛtas te saṅkalpo bhāvyaṁ tenaiva nānyathā sat-saṅkalpasya te brahman yad vai dhyāyati te vayam

देवताओं ने कहा — हे ब्रह्मन्! तुमने जैसा संकल्प किया है, वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं; क्योंकि तुम्हारा संकल्प सत्य है, और जिसका तुम ध्यान कर रहे थे, वही हम तीनों हैं।

श्लोक 31 (bhagavata.4.1.31)

अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुताः । भवितारोऽङ्ग भद्रं ते विस्रप्स्यन्ति च ते यशः ॥ ३१ ॥

athāsmad-aṁśa-bhūtās te ātmajā loka-viśrutāḥ bhavitāro ’ṅga bhadraṁ te visrapsyanti ca te yaśaḥ

हे सौम्य! अतः हम तीनों के अंशस्वरूप संतानें तुम्हें प्राप्त होंगी, जो लोक में विख्यात होंगी; तुम्हारा कल्याण हो — वे तुम्हारी कीर्ति को चारों ओर फैलाएँगी।

श्लोक 32 (bhagavata.4.1.32)

एवं कामवरं दत्त्वा प्रतिजग्मुः सुरेश्वराः । सभाजितास्तयोः सम्यग्दम्पत्योर्मिषतोस्ततः ॥ ३२ ॥

evaṁ kāma-varaṁ dattvā pratijagmuḥ sureśvarāḥ sabhājitās tayoḥ samyag dampatyor miṣatos tataḥ

इस प्रकार अभीष्ट वर देकर वे देवेश्वर, दंपती द्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर, उन दोनों के देखते-देखते ही अंतर्ध्यान हो गए।

श्लोक 33 (bhagavata.4.1.33)

सोमोऽभूद्ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् । दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥

somo ’bhūd brahmaṇo ’ṁśena datto viṣṇos tu yogavit durvāsāḥ śaṅkarasyāṁśo nibodhāṅgirasaḥ prajāḥ

इस प्रकार सोम ब्रह्मा के अंश से, योगविद् दत्त विष्णु के अंश से, और दुर्वासा शिव के अंश से उत्पन्न हुए — अब अंगिरा की संतानों का वर्णन सुनो।

श्लोक 34 (bhagavata.4.1.34)

श्रद्धा त्वङ्गिरसः पत्नी चतस्रोऽसूत कन्यकाः । सिनीवाली कुहू राका चतुर्थ्यनुमतिस्तथा ॥ ३४ ॥

śraddhā tv aṅgirasaḥ patnī catasro ’sūta kanyakāḥ sinīvālī kuhū rākā caturthy anumatis tathā

अंगिरा की पत्नी श्रद्धा ने चार कन्याओं को जन्म दिया — सिनीवाली, कुहू, राका, और चौथी अनुमति।

श्लोक 35 (bhagavata.4.1.35)

तत्पुत्रावपरावास्तां ख्यातौ स्वारोचिषेऽन्तरे । उतथ्यो भगवान्साक्षाद् ब्रह्मिष्ठश्च बृहस्पतिः ॥ ३५ ॥

tat-putrāv aparāv āstāṁ khyātau svārociṣe ’ntare utathyo bhagavān sākṣād brahmiṣṭhaś ca bṛhaspatiḥ

उसके दो पुत्र भी थे, जो स्वारोचिष मन्वंतर में विख्यात हुए — परम भाग्यशाली उतथ्य और वेद के परम विद्वान बृहस्पति।

श्लोक 36 (bhagavata.4.1.36)

पुलस्त्योऽजनयत्पत्न्यामगस्त्यं च हविर्भुवि । सोऽन्यजन्मनि दह्राग्निर्विश्रवाश्च महातपाः ॥ ३६ ॥

pulastyo ’janayat patnyām agastyaṁ ca havirbhuvi so ’nya-janmani dahrāgnir viśravāś ca mahā-tapāḥ

पुलस्त्य ने अपनी पत्नी हविर्भू में अगस्त्य नामक पुत्र को जन्म दिया, जो दूसरे जन्म में दह्राग्नि हुए, और महातपस्वी विश्रवा नामक पुत्र को भी जन्म दिया।

श्लोक 37 (bhagavata.4.1.37)

तस्य यक्षपतिर्देवः कुबेरस्त्विडविडासुतः । रावणः कुम्भकर्णश्च तथान्यस्यां विभीषणः ॥ ३७ ॥

tasya yakṣa-patir devaḥ kuberas tv iḍaviḍā-sutaḥ rāvaṇaḥ kumbhakarṇaś ca tathānyasyāṁ vibhīṣaṇaḥ

उसकी पत्नी इडविडा से यक्षपति कुबेर उत्पन्न हुए, तथा उसकी अन्य पत्नी से रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण उत्पन्न हुए।

श्लोक 38 (bhagavata.4.1.38)

पुलहस्य गतिर्भार्या त्रीनसूत सती सुतान् । कर्मश्रेष्ठं वरीयांसं सहिष्णुं च महामते ॥ ३८ ॥

pulahasya gatir bhāryā trīn asūta satī sutān karmaśreṣṭhaṁ varīyāṁsaṁ sahiṣṇuṁ ca mahā-mate

हे महामते! पुलह की सती पत्नी गति ने तीन पुत्रों को जन्म दिया — कर्मश्रेष्ठ, वरीयान और सहिष्णु।

श्लोक 39 (bhagavata.4.1.39)

क्रतोरपि क्रिया भार्या वालखिल्यानसूयत । ऋषीन्षष्टिसहस्राणि ज्वलतो ब्रह्मतेजसा ॥ ३९ ॥

krator api kriyā bhāryā vālakhilyān asūyata ṛṣīn ṣaṣṭi-sahasrāṇi jvalato brahma-tejasā

क्रतु की पत्नी क्रिया ने साठ हजार वालखिल्य ऋषियों को जन्म दिया, जो ब्रह्मतेज से देदीप्यमान थे।

श्लोक 40 (bhagavata.4.1.40)

ऊर्जायां जज्ञिरे पुत्रा वसिष्ठस्य परन्तप । चित्रकेतुप्रधानास्ते सप्त ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ४० ॥

ūrjāyāṁ jajñire putrā vasiṣṭhasya parantapa citraketu-pradhānās te sapta brahmarṣayo ’malāḥ

हे परन्तप! वसिष्ठ की पत्नी ऊर्जा से चित्रकेतु आदि सात निर्मल ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए।

श्लोक 41 (bhagavata.4.1.41)

चित्रकेतुः सुरोचिश्च विरजा मित्र एव च । उल्बणो वसुभृद्यानो द्युमान्शक्त्यादयोऽपरे ॥ ४१ ॥

citraketuḥ surociś ca virajā mitra eva ca ulbaṇo vasubhṛdyāno dyumān śakty-ādayo ’pare

उनके नाम थे — चित्रकेतु, सुरुचि, विरजा, मित्र, उल्बण, वसुभृद्यान और द्युमान; इनके अतिरिक्त वसिष्ठ की अन्य पत्नी से शक्ति आदि अन्य समर्थ पुत्र भी उत्पन्न हुए।

श्लोक 42 (bhagavata.4.1.42)

चित्तिस्त्वथर्वणः पत्नी लेभे पुत्रं धृतव्रतम् । दध्यञ्चमश्वशिरसं भृगोर्वंशं निबोध मे ॥ ४२ ॥

cittis tv atharvaṇaḥ patnī lebhe putraṁ dhṛta-vratam dadhyañcam aśvaśirasaṁ bhṛgor vaṁśaṁ nibodha me

अथर्वा की पत्नी चित्ति को दृढ़-व्रती पुत्र दध्यंच प्राप्त हुआ, जो अश्वशिरा नाम से भी जाना गया; अब भृगु के वंश का वर्णन मुझसे सुनो।

श्लोक 43 (bhagavata.4.1.43)

भृगुः ख्यात्यां महाभागः पत्न्यां पुत्रानजीजनत् । धातारं च विधातारं श्रियं च भगवत्पराम् ॥ ४३ ॥

bhṛguḥ khyātyāṁ mahā-bhāgaḥ patnyāṁ putrān ajījanat dhātāraṁ ca vidhātāraṁ śriyaṁ ca bhagavat-parām

महाभाग भृगु ने अपनी पत्नी ख्याति में दो पुत्रों — धाता और विधाता — तथा भगवान के प्रति परम अनुरक्त एक कन्या श्री को जन्म दिया।

श्लोक 44 (bhagavata.4.1.44)

आयतिं नियतिं चैव सुते मेरुस्तयोरदात् । ताभ्यां तयोरभवतां मृकण्डः प्राण एव च ॥ ४४ ॥

āyatiṁ niyatiṁ caiva sute merus tayor adāt tābhyāṁ tayor abhavatāṁ mṛkaṇḍaḥ prāṇa eva ca

मेरु ने अपनी दो कन्याएँ आयति और नियति धाता और विधाता को दीं; उनसे मृकण्ड और प्राण उत्पन्न हुए।

श्लोक 45 (bhagavata.4.1.45)

मार्कण्डेयो मृकण्डस्य प्राणाद्वेदशिरा मुनिः । कविश्च भार्गवो यस्य भगवानुशना सुतः ॥ ४५ ॥

mārkaṇḍeyo mṛkaṇḍasya prāṇād vedaśirā muniḥ kaviś ca bhārgavo yasya bhagavān uśanā sutaḥ

मृकण्ड से मार्कण्डेय उत्पन्न हुए, और प्राण से वेदशिरा मुनि उत्पन्न हुए, जिनके पुत्र भार्गव कवि, अर्थात् भगवान उशना (शुक्राचार्य), हुए।

श्लोक 46 (bhagavata.4.1.46)

त एते मुनयः क्षत्तर्लोकान्सर्गैरभावयन् । एष कर्दमदौहित्रसन्तानः कथितस्तव ॥ ४६ ॥

ta ete munayaḥ kṣattar lokān sargair abhāvayan eṣa kardama-dauhitra- santānaḥ kathitas tava

हे क्षत्तः! इन सभी मुनियों ने अपनी संतानों से लोकों को परिपूर्ण किया; इस प्रकार मैंने तुम्हें कर्दम की पुत्रियों से उत्पन्न इस वंश-परम्परा का वर्णन किया।

श्लोक 47 (bhagavata.4.1.47)

शृण्वतः श्रद्दधानस्य सद्यः पापहरः परः । प्रसूतिं मानवीं दक्ष उपयेमे ह्यजात्मजः ॥ ४७ ॥

śṛṇvataḥ śraddadhānasya sadyaḥ pāpa-haraḥ paraḥ prasūtiṁ mānavīṁ dakṣa upayeme hy ajātmajaḥ

जो इसे श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके पापों का शीघ्र ही नाश हो जाता है। अब ब्रह्मा-पुत्र दक्ष ने मनु की दूसरी पुत्री प्रसूति से विवाह किया।

श्लोक 48 (bhagavata.4.1.48)

तस्यां ससर्ज दुहितृः षोडशामललोचनाः । त्रयोदशादाद्धर्माय तथैकामग्नये विभुः ॥ ४८ ॥

tasyāṁ sasarja duhitṝḥ ṣoḍaśāmala-locanāḥ trayodaśādād dharmāya tathaikām agnaye vibhuḥ

उसमें शक्तिशाली दक्ष ने निर्मल नेत्रों वाली सोलह कन्याओं को जन्म दिया; उनमें से तेरह कन्याएँ धर्म को और एक अग्नि को दीं।

श्लोक 49 (bhagavata.4.1.49)

पितृभ्य एकां युक्तेभ्यो भवायैकां भवच्छिदे । श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टिः पुष्टिः क्रियोन्नतिः ॥ ४९ ॥

pitṛbhya ekāṁ yuktebhyo bhavāyaikāṁ bhava-cchide śraddhā maitrī dayā śāntis tuṣṭiḥ puṣṭiḥ kriyonnatiḥ

एक कन्या संयुक्त पितरों को और एक कन्या संसार-बंधन के नाशक भगवान शिव को दी। धर्म को दी गई तेरह कन्याओं के नाम थे — श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति —

श्लोक 50 (bhagavata.4.1.50)

बुद्धिर्मेधा तितिक्षा ह्रीर्मूर्तिर्धर्मस्य पत्नयः । श्रद्धासूत शुभं मैत्री प्रसादमभयं दया ॥ ५० ॥

buddhir medhā titikṣā hrīr mūrtir dharmasya patnayaḥ śraddhāsūta śubhaṁ maitrī prasādam abhayaṁ dayā

— बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति — ये सब धर्म की पत्नियाँ थीं। श्रद्धा से शुभ, मैत्री से प्रसाद, और दया से अभय उत्पन्न हुए।

श्लोक 51 (bhagavata.4.1.51)

शान्तिः सुखं मुदं तुष्टिः स्मयं पुष्टिरसूयत । योगं क्रियोन्नतिर्दर्पमर्थं बुद्धिरसूयत ॥ ५१ ॥

śāntiḥ sukhaṁ mudaṁ tuṣṭiḥ smayaṁ puṣṭir asūyata yogaṁ kriyonnatir darpam arthaṁ buddhir asūyata

शान्ति से सुख, तुष्टि से मुद, पुष्टि से स्मय, क्रिया से योग, उन्नति से दर्प, और बुद्धि से अर्थ उत्पन्न हुए।

श्लोक 52 (bhagavata.4.1.52)

मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् । मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्तिर्नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥

medhā smṛtiṁ titikṣā tu kṣemaṁ hrīḥ praśrayaṁ sutam mūrtiḥ sarva-guṇotpattir nara-nārāyaṇāv ṛṣī

मेधा से स्मृति, तितिक्षा से क्षेम, और ह्री से प्रश्रय नामक पुत्र उत्पन्न हुआ; तथा समस्त सद्गुणों की उत्पत्ति-स्थान मूर्ति ने नर-नारायण नामक दोनों ऋषियों को जन्म दिया।

श्लोक 53 (bhagavata.4.1.53)

ययोर्जन्मन्यदो विश्वमभ्यनन्दत्सुनिर्वृतम् । मनांसि ककुभो वाताः प्रसेदुः सरितोऽद्रयः ॥ ५३ ॥

yayor janmany ado viśvam abhyanandat sunirvṛtam manāṁsi kakubho vātāḥ praseduḥ sarito ’drayaḥ

उन दोनों के जन्म पर सम्पूर्ण विश्व परम सन्तोष से हर्षित हो उठा; सबके मन शांत हो गए, तथा वायु, दिशाएँ, नदियाँ और पर्वत सभी प्रसन्न हो उठे।

श्लोक 54 (bhagavata.4.1.54)

दिव्यवाद्यन्त तूर्याणि पेतुः कुसुमवृष्टयः । मुनयस्तुष्टुवुस्तुष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥ ५४ ॥

divy avādyanta tūryāṇi petuḥ kusuma-vṛṣṭayaḥ munayas tuṣṭuvus tuṣṭā jagur gandharva-kinnarāḥ

दिव्य वाद्य स्वयं बज उठे, पुष्पों की वर्षा होने लगी, प्रसन्न मुनि स्तुति-गान करने लगे, तथा गन्धर्व और किन्नर गीत गाने लगे।

श्लोक 55 (bhagavata.4.1.55)

नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत्परममङ्गलम् । देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥

nṛtyanti sma striyo devya āsīt parama-maṅgalam devā brahmādayaḥ sarve upatasthur abhiṣṭavaiḥ

देवांगनाएँ नृत्य करने लगीं, और सर्वत्र परम मंगल का वातावरण छा गया; ब्रह्मा आदि समस्त देवगण स्तुतियों सहित उनके समक्ष उपस्थित हुए।

श्लोक 56 (bhagavata.4.1.56)

देवा ऊचुः यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय । एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥ ५६ ॥

devā ūcuḥ yo māyayā viracitaṁ nijayātmanīdaṁ khe rūpa-bhedam iva tat-praticakṣaṇāya etena dharma-sadane ṛṣi-mūrtinādya prāduścakāra puruṣāya namaḥ parasmai

देवताओं ने कहा — जिस परम पुरुष ने अपनी माया से अपने ही भीतर रचे गए इस विश्व को, जैसे आकाश में विविध रूप-सा भासित होता है, उसका यथार्थ स्वरूप दिखाने के लिए आज धर्म के घर में ऋषि-रूप में प्रकट किया है, उस परम पुरुष को हमारा नमस्कार है।

श्लोक 57 (bhagavata.4.1.57)

सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान् सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः । दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम् ॥ ५७ ॥

so ’yaṁ sthiti-vyatikaropaśamāya sṛṣṭān sattvena naḥ sura-gaṇān anumeya-tattvaḥ dṛśyād adabhra-karuṇena vilokanena yac chrī-niketam amalaṁ kṣipatāravindam

वे भगवान, जिनका तत्त्व केवल अनुमान से ही जाना जा सकता है, जिन्होंने संसार की व्यवस्था में उत्पन्न विक्षोभ को शांत करने के लिए हम देवताओं को सत्त्वगुण द्वारा रचा, अपनी अपार करुणा से भरी दृष्टि हम पर डालें — वह दृष्टि जिसकी शोभा लक्ष्मी के निवासस्थान उस निर्मल कमल की शोभा को भी मात करती है।

श्लोक 58 (bhagavata.4.1.58)

एवं सुरगणैस्तात भगवन्तावभिष्टुतौ । लब्धावलोकैर्ययतुरर्चितौ गन्धमादनम् ॥ ५८ ॥

evaṁ sura-gaṇais tāta bhagavantāv abhiṣṭutau labdhāvalokair yayatur arcitau gandhamādanam

हे तात! इस प्रकार देवगणों द्वारा स्तुति किए जाने पर वे दोनों दिव्य ऋषि, उन्हें अपनी दृष्टि प्रदान करके तथा सम्मानित होकर, गंधमादन पर्वत की ओर चले गए।

श्लोक 59 (bhagavata.4.1.59)

ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहागतौ । भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥

tāv imau vai bhagavato harer aṁśāv ihāgatau bhāra-vyayāya ca bhuvaḥ kṛṣṇau yadu-kurūdvahau

यही दोनों भगवान हरि के अंशस्वरूप अब यदु और कुरु वंश में क्रमशः कृष्ण और अर्जुन के रूप में प्रकट हुए हैं, पृथ्वी के भार को हरने के लिए।

श्लोक 60 (bhagavata.4.1.60)

स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत् । पावकं पवमानं च शुचिं च हुतभोजनम् ॥ ६० ॥

svāhābhimāninaś cāgner ātmajāṁs trīn ajījanat pāvakaṁ pavamānaṁ ca śuciṁ ca huta-bhojanam

स्वाहा के प्रिय पति अग्निदेव ने उसमें तीन पुत्रों — पावक, पवमान और शुचि — को जन्म दिया, जो यज्ञ में दी गई आहुतियों का भक्षण करके जीवित रहते हैं।

श्लोक 61 (bhagavata.4.1.61)

तेभ्योऽग्नयः समभवन्चत्वारिंशच्च पञ्च च । त एवैकोनपञ्चाशत्साकं पितृपितामहैः ॥ ६१ ॥

tebhyo ’gnayaḥ samabhavan catvāriṁśac ca pañca ca ta evaikonapañcāśat sākaṁ pitṛ-pitāmahaiḥ

उन तीनों से पैंतालीस अन्य अग्नि उत्पन्न हुए; अपने पिता और पितामह सहित वे कुल मिलाकर उनचास हैं।

श्लोक 62 (bhagavata.4.1.62)

वैतानिके कर्मणि यन्नामभिर्ब्रह्मवादिभिः । आग्नेय्य इष्टयो यज्ञे निरूप्यन्तेऽग्नयस्तु ते ॥ ६२ ॥

vaitānike karmaṇi yan- nāmabhir brahma-vādibhiḥ āgneyya iṣṭayo yajñe nirūpyante ’gnayas tu te

यही वे अग्निगण हैं, जिनके नामों से ब्रह्मवादी लोग वैतानिक यज्ञ-कर्म में आग्नेय आहुतियों का निरूपण करते हैं।

श्लोक 63 (bhagavata.4.1.63)

अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सौम्याः पितर आज्यपाः । साग्नयोऽनग्नयस्तेषां पत्नी दाक्षायणी स्वधा ॥ ६३ ॥

agniṣvāttā barhiṣadaḥ saumyāḥ pitara ājyapāḥ sāgnayo ’nagnayas teṣāṁ patnī dākṣāyaṇī svadhā

पितरगण अग्निष्वात्त, बर्हिषद, सौम्य और आज्यप हैं, जिनमें से कुछ सारि हैं और कुछ निरग्नि; उन सबकी पत्नी दक्ष-पुत्री स्वधा हैं।

श्लोक 64 (bhagavata.4.1.64)

तेभ्यो दधार कन्ये द्वे वयुनां धारिणीं स्वधा । उभे ते ब्रह्मवादिन्यौ ज्ञानविज्ञानपारगे ॥ ६४ ॥

tebhyo dadhāra kanye dve vayunāṁ dhāriṇīṁ svadhā ubhe te brahma-vādinyau jñāna-vijñāna-pārage

उनसे स्वधा ने दो कन्याओं — वयुना और धारिणी — को जन्म दिया, जो दोनों ही ब्रह्मवादिनी थीं और ज्ञान तथा विज्ञान दोनों में पारंगत थीं।

श्लोक 65 (bhagavata.4.1.65)

भवस्य पत्नी तु सती भवं देवमनुव्रता । आत्मनः सदृशं पुत्रं न लेभे गुणशीलतः ॥ ६५ ॥

bhavasya patnī tu satī bhavaṁ devam anuvratā ātmanaḥ sadṛśaṁ putraṁ na lebhe guṇa-śīlataḥ

किन्तु भगवान शिव की पत्नी सती, जो अपने पति के प्रति सर्वथा अनुव्रता थीं, अपने समान गुण और शील वाले पुत्र को प्राप्त न कर सकीं।

श्लोक 66 (bhagavata.4.1.66)

पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा । अप्रौढैवात्मनात्मानमजहाद्योगसंयुता ॥ ६६ ॥

pitary apratirūpe sve bhavāyānāgase ruṣā aprauḍhaivātmanātmānam ajahād yoga-saṁyutā

इसका कारण यह था कि उसके पिता दक्ष निर्दोष भगवान शिव के प्रति द्वेषवश अनुचित व्यवहार करते थे; अतः अल्पायु में ही सती ने योगबल से स्वयं अपने शरीर का त्याग कर दिया।

अध्याय-सूचीअध्याय 2