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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2

दक्ष द्वारा भगवान शिव को शाप

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (bhagavata.4.2.1)

विदुर उवाच भवे शीलवतां श्रेष्ठे दक्षो दुहितृवत्सलः । विद्वेषमकरोत्कस्मादनादृत्यात्मजां सतीम् ॥ १ ॥

vidura uvāca bhave śīlavatāṁ śreṣṭhe dakṣo duhitṛ-vatsalaḥ vidveṣam akarot kasmād anādṛtyātmajāṁ satīm

विदुर जी ने कहा — पुत्री-वत्सल दक्ष ने सुशीलजनों में श्रेष्ठ भगवान शिव के प्रति द्वेष क्यों किया, और अपनी पुत्री सती का अनादर क्यों किया?

श्लोक 2 (bhagavata.4.2.2)

कस्तं चराचरगुरुं निर्वैरं शान्तविग्रहम् । आत्मारामं कथं द्वेष्टि जगतो दैवतं महत् ॥ २ ॥

kas taṁ carācara-guruṁ nirvairaṁ śānta-vigraham ātmārāmaṁ kathaṁ dveṣṭi jagato daivataṁ mahat

उन चराचर के गुरु, वैरभाव-रहित, शान्त-स्वरूप, आत्माराम तथा सम्पूर्ण जगत के महान देवता से भला कौन द्वेष कर सकता है — दक्ष उनसे द्वेष कैसे कर बैठे?

श्लोक 3 (bhagavata.4.2.3)

एतदाख्याहि मे ब्रह्मन्जामातुः श्वशुरस्य च । विद्वेषस्तु यतः प्राणांस्तत्यजे दुस्त्यजान्सती ॥ ३ ॥

etad ākhyāhi me brahman jāmātuḥ śvaśurasya ca vidveṣas tu yataḥ prāṇāṁs tatyaje dustyajān satī

हे ब्रह्मन्! यह मुझे बताइए — जामाता और श्वसुर के बीच किस द्वेष के कारण सती ने अपने अत्यंत दुस्त्याज्य प्राणों का त्याग कर दिया?

श्लोक 4 (bhagavata.4.2.4)

मैत्रेय उवाच पुरा विश्वसृजां सत्रे समेताः परमर्षयः । तथामरगणाः सर्वे सानुगा मुनयोऽग्नयः ॥ ४ ॥

maitreya uvāca purā viśva-sṛjāṁ satre sametāḥ paramarṣayaḥ tathāmara-gaṇāḥ sarve sānugā munayo ’gnayaḥ

श्री मैत्रेय जी ने कहा — प्राचीन काल में विश्व के प्रजापतियों के एक महायज्ञ में समस्त परम ऋषि, तथा अपने अनुचरों सहित सम्पूर्ण देवगण, मुनि और अग्निगण एकत्र हुए थे।

श्लोक 5 (bhagavata.4.2.5)

तत्र प्रविष्टमृषयो दृष्ट्वार्कमिव रोचिषा । भ्राजमानं वितिमिरं कुर्वन्तं तन्महत्सदः ॥ ५ ॥

tatra praviṣṭam ṛṣayo dṛṣṭvārkam iva rociṣā bhrājamānaṁ vitimiraṁ kurvantaṁ tan mahat sadaḥ

वहाँ प्रविष्ट हुए दक्ष को ऋषियों ने सूर्य के समान तेजयुक्त देखा, जो अपनी कान्ति से समस्त अंधकार को दूर करके उस महान सभा को प्रकाशित कर रहे थे।

श्लोक 6 (bhagavata.4.2.6)

उदतिष्ठन्सदस्यास्ते स्वधिष्ण्येभ्यः सहाग्नयः । ऋते विरिञ्चां शर्वं च तद्भासाक्षिप्तचेतसः ॥ ६ ॥

udatiṣṭhan sadasyās te sva-dhiṣṇyebhyaḥ sahāgnayaḥ ṛte viriñcāṁ śarvaṁ ca tad-bhāsākṣipta-cetasaḥ

उसकी उस कान्ति से चित्त आकृष्ट होकर अग्निगणों सहित सभा के सभी सदस्य अपने-अपने आसनों से उठ खड़े हुए — केवल भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव को छोड़कर।

श्लोक 7 (bhagavata.4.2.7)

सदसस्पतिभिर्दक्षो भगवान्साधु सत्कृतः । अजं लोकगुरुं नत्वा निषसाद तदाज्ञया ॥ ७ ॥

sadasas-patibhir dakṣo bhagavān sādhu sat-kṛtaḥ ajaṁ loka-guruṁ natvā niṣasāda tad-ājñayā

सभा के प्रमुख जनों द्वारा भलीभाँति सम्मानित हुए पूजनीय दक्ष ने लोकगुरु अजन्मा ब्रह्मा को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से अपना आसन ग्रहण किया।

श्लोक 8 (bhagavata.4.2.8)

प्राङ्निषण्णं मृडं दृष्ट्वा नामृष्यत्तदनादृतः । उवाच वामं चक्षुर्भ्यामभिवीक्ष्य दहन्निव ॥ ८ ॥

prāṅ-niṣaṇṇaṁ mṛḍaṁ dṛṣṭvā nāmṛṣyat tad-anādṛtaḥ uvāca vāmaṁ cakṣurbhyām abhivīkṣya dahann iva

किन्तु मृड (भगवान शिव) को पहले से बैठे और अपने प्रति उपेक्षा-भाव रखते देखकर दक्ष यह सहन न कर सके; जलती हुई-सी दृष्टि से उन्हें घूरते हुए वे कठोर वचन बोलने लगे।

श्लोक 9 (bhagavata.4.2.9)

श्रूयतां ब्रह्मर्षयो मे सहदेवाः सहाग्नयः । साधूनां ब्रुवतो वृत्तं नाज्ञानान्न च मत्सरात् ॥ ९ ॥

śrūyatāṁ brahmarṣayo me saha-devāḥ sahāgnayaḥ sādhūnāṁ bruvato vṛttaṁ nājñānān na ca matsarāt

[दक्ष ने कहा —] हे ब्रह्मर्षियो, देवताओ और अग्निगणो! मुझे सुनिए — मैं यह बात सज्जनों के आचार के विषय में कह रहा हूँ, न अज्ञानवश और न ही ईर्ष्यावश।

श्लोक 10 (bhagavata.4.2.10)

अयं तु लोकपालानां यशोघ्नो निरपत्रपः । सद्भिराचरितः पन्था येन स्तब्धेन दूषितः ॥ १० ॥

ayaṁ tu loka-pālānāṁ yaśo-ghno nirapatrapaḥ sadbhir ācaritaḥ panthā yena stabdhena dūṣitaḥ

इस निर्लज्ज ने लोकपालों की कीर्ति को नष्ट किया है; अपने अहंकार में इसने सज्जनों द्वारा आचरित मार्ग को ही दूषित कर दिया है।

श्लोक 11 (bhagavata.4.2.11)

एष मे शिष्यतां प्राप्तो यन्मे दुहितुरग्रहीत् । पाणिं विप्राग्निमुखतः सावित्र्या इव साधुवत् ॥ ११ ॥

eṣa me śiṣyatāṁ prāpto yan me duhitur agrahīt pāṇiṁ viprāgni-mukhataḥ sāvitryā iva sādhuvat

इसने ब्राह्मणों और अग्नि के समक्ष मेरी पुत्री का, जो सावित्री के समान है, इस प्रकार पाणिग्रहण किया मानो कोई सच्चरित्र पुरुष हो — इस प्रकार यह वस्तुतः मेरा शिष्यत्व ही स्वीकार कर चुका है।

श्लोक 12 (bhagavata.4.2.12)

गृहीत्वा मृगशावाक्ष्याः पाणिं मर्कटलोचनः । प्रत्युत्थानाभिवादार्हे वाचाप्यकृत नोचितम् ॥ १२ ॥

gṛhītvā mṛga-śāvākṣyāḥ pāṇiṁ markaṭa-locanaḥ pratyutthānābhivādārhe vācāpy akṛta nocitam

वानर के समान नेत्रों वाले इसने मृगशावक के समान नेत्रों वाली मेरी पुत्री का पाणिग्रहण तो कर लिया, किन्तु मेरे प्रति, जो खड़े होकर अभिवादन के योग्य था, इसने वाणी से भी उचित व्यवहार नहीं किया।

श्लोक 13 (bhagavata.4.2.13)

लुप्तक्रियायाशुचये मानिने भिन्नसेतवे । अनिच्छन्नप्यदां बालां शूद्रायेवोशतीं गिरम् ॥ १३ ॥

lupta-kriyāyāśucaye mānine bhinna-setave anicchann apy adāṁ bālāṁ śūdrāyevośatīṁ giram

क्रियाहीन, अपवित्र, अभिमानी और मर्यादाओं को तोड़ने वाले इस व्यक्ति को मैंने अनिच्छापूर्वक अपनी बालिका दी — मानो किसी शूद्र को वेद-वाणी सुना दी हो।

श्लोक 14 (bhagavata.4.2.14)

प्रेतावासेषु घोरेषु प्रेतैर्भूतगणैर्वृतः । अटत्युन्मत्तवन्नग्नो व्युप्तकेशो हसन् रुदन् ॥ १४ ॥

pretāvāseṣu ghoreṣu pretair bhūta-gaṇair vṛtaḥ aṭaty unmattavan nagno vyupta-keśo hasan rudan

प्रेतों और भूतगणों से घिरा हुआ यह भयंकर श्मशानों में उन्मत्त-सा नग्न, बिखरे केशों वाला, कभी हँसता और कभी रोता हुआ विचरण करता है।

श्लोक 15 (bhagavata.4.2.15)

चिताभस्मकृतस्नानः प्रेतस्रङ्न्रस्थिभूषणः । शिवापदेशो ह्यशिवो मत्तो मत्तजनप्रियः । पतिः प्रमथनाथानां तमोमात्रात्मकात्मनाम् ॥ १५ ॥

citā-bhasma-kṛta-snānaḥ preta-sraṅ-nrasthi-bhūṣaṇaḥ śivāpadeśo hy aśivo matto matta-jana-priyaḥ patiḥ pramatha-nāthānāṁ tamo-mātrātmakātmanām

वह चिता की भस्म से स्नान करता है और मुर्दों की खोपड़ियों तथा मनुष्य-अस्थियों की मालाएँ धारण करता है। "शिव" — अर्थात मंगलकारी — नाम मात्र से कहा जाने वाला यह वास्तव में उन्मत्त है, केवल उन्मत्त जनों को ही प्रिय है, और तमोगुण-प्रधान प्रमथगणों का स्वामी है।

श्लोक 16 (bhagavata.4.2.16)

तस्मा उन्मादनाथाय नष्टशौचाय दुर्हृदे । दत्ता बत मया साध्वी चोदिते परमेष्ठिना ॥ १६ ॥

tasmā unmāda-nāthāya naṣṭa-śaucāya durhṛde dattā bata mayā sādhvī codite parameṣṭhinā

हाय! ब्रह्मा जी के ही आग्रह पर मैंने अपनी सती-साध्वी पुत्री को उन्मादियों के इस स्वामी को, जो शुचिता से रहित तथा दुष्ट-हृदय है, दे दिया!

श्लोक 17 (bhagavata.4.2.17)

मैत्रेय उवाच विनिन्द्यैवं स गिरिशमप्रतीपमवस्थितम् । दक्षोऽथाप उपस्पृश्य क्रुद्धः शप्तुं प्रचक्रमे ॥ १७ ॥

maitreya uvāca vinindyaivaṁ sa giriśam apratīpam avasthitam dakṣo ’thāpa upaspṛśya kruddhaḥ śaptuṁ pracakrame

श्री मैत्रेय जी ने कहा — इस प्रकार बिना किसी प्रतिकार के बैठे हुए गिरीश (शिव जी) की निन्दा करने के बाद क्रुद्ध दक्ष ने जल का स्पर्श करके शाप देना आरम्भ किया।

श्लोक 18 (bhagavata.4.2.18)

अयं तु देवयजन इन्द्रोपेन्द्रादिभिर्भवः । सह भागं न लभतां देवैर्देवगणाधमः ॥ १८ ॥

ayaṁ tu deva-yajana indropendrādibhir bhavaḥ saha bhāgaṁ na labhatāṁ devair deva-gaṇādhamaḥ

[दक्ष ने कहा —] देवताओं में अधम यह भव (शिव) इस यज्ञ में इन्द्र, उपेन्द्र आदि देवताओं के साथ हविष्य का भाग न पाए।

श्लोक 19 (bhagavata.4.2.19)

निषिध्यमानः स सदस्यमुख्यै- र्दक्षो गिरित्राय विसृज्य शापम् । तस्माद्विनिष्क्रम्य विवृद्धमन्यु- र्जगाम कौरव्य निजं निकेतनम् ॥ १९ ॥

niṣidhyamānaḥ sa sadasya-mukhyair dakṣo giritrāya visṛjya śāpam tasmād viniṣkramya vivṛddha-manyur jagāma kauravya nijaṁ niketanam

हे कुरुवंशी! सभा के प्रमुख जनों द्वारा रोके जाने पर भी दक्ष ने गिरित्र (शिव जी) पर शाप छोड़कर, अपने क्रोध को और बढ़ाते हुए, उस सभा से बाहर निकलकर अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 20 (bhagavata.4.2.20)

विज्ञाय शापं गिरिशानुगाग्रणी- र्नन्दीश्वरो रोषकषायदूषितः । दक्षाय शापं विससर्ज दारुणं ये चान्वमोदंस्तदवाच्यतां द्विजाः ॥ २० ॥

vijñāya śāpaṁ giriśānugāgraṇīr nandīśvaro roṣa-kaṣāya-dūṣitaḥ dakṣāya śāpaṁ visasarja dāruṇaṁ ye cānvamodaṁs tad-avācyatāṁ dvijāḥ

गिरीश के अनुचरों में अग्रगण्य नन्दीश्वर, जब उस शाप को जानकर क्रोध से लाल हो उठे, तब उन्होंने दक्ष तथा उन ब्राह्मणों पर, जिन्होंने उसके अनुचित वचनों का समर्थन किया था, एक भयंकर शाप छोड़ा।

श्लोक 21 (bhagavata.4.2.21)

य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि । द्रुह्यत्यज्ञः पृथग्दृष्टिस्तत्त्वतो विमुखो भवेत् ॥ २१ ॥

ya etan martyam uddiśya bhagavaty apratidruhi druhyaty ajñaḥ pṛthag-dṛṣṭis tattvato vimukho bhavet

[नन्दीश्वर ने कहा —] जो अज्ञानवश तथा द्वैत-दृष्टि रखते हुए इस नश्वर शरीर के बहाने द्वेषरहित भगवान शिव के प्रति द्रोह करता है, वह तत्त्वतः परम-ज्ञान से विमुख हो जाएगा।

श्लोक 22 (bhagavata.4.2.22)

गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया । कर्मतन्त्रं वितनुते वेदवादविपन्नधीः ॥ २२ ॥

gṛheṣu kūṭa-dharmeṣu sakto grāmya-sukhecchayā karma-tantraṁ vitanute veda-vāda-vipanna-dhīḥ

कूट धर्म से युक्त गृहस्थ-जीवन में आसक्त होकर, सांसारिक सुख की कामना से, तथा वेद-वाद से बुद्धि नष्ट होकर, वह केवल कर्मकाण्ड के जाल में उलझा रहेगा।

श्लोक 23 (bhagavata.4.2.23)

बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः । स्त्रीकामः सोऽस्त्वतितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २३ ॥

buddhyā parābhidhyāyinyā vismṛtātma-gatiḥ paśuḥ strī-kāmaḥ so ’stv atitarāṁ dakṣo basta-mukho ’cirāt

बाह्य विषयों में ही रमी हुई बुद्धि से आत्म-गति को भूला हुआ, पशुवत् आचरण करने वाला, अत्यंत कामासक्त यह दक्ष शीघ्र ही बकरे के मुख वाला हो जाए।

श्लोक 24 (bhagavata.4.2.24)

विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसौ जडः । संसरन्त्विह ये चामुमनु शर्वावमानिनम् ॥ २४ ॥

vidyā-buddhir avidyāyāṁ karmamayyām asau jaḍaḥ saṁsarantv iha ye cāmum anu śarvāvamāninam

कर्मकाण्डमय अविद्या में ही अपनी विद्या-बुद्धि रखने वाला यह जड़ पुरुष, तथा शिव-अपमानी इसका अनुसरण करने वाले सभी लोग, इस संसार-चक्र में ही भटकते रहें।

श्लोक 25 (bhagavata.4.2.25)

गिरः श्रुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा । मथ्ना चोन्मथितात्मानः सम्मुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २५ ॥

giraḥ śrutāyāḥ puṣpiṇyā madhu-gandhena bhūriṇā mathnā conmathitātmānaḥ sammuhyantu hara-dviṣaḥ

जो हर (शिव) से द्वेष रखते हैं, वे वेदों की पुष्पित तथा मधुर सुगंध से भरी वाणी से मथित हुए अपने चित्त द्वारा सदैव मोहग्रस्त बने रहें।

श्लोक 26 (bhagavata.4.2.26)

सर्वभक्षा द्विजा वृत्त्यै धृतविद्यातपोव्रताः । वित्तदेहेन्द्रियारामा याचका विचरन्त्विह ॥ २६ ॥

sarva-bhakṣā dvijā vṛttyai dhṛta-vidyā-tapo-vratāḥ vitta-dehendriyārāmā yācakā vicarantv iha

विद्या, तप और व्रत को केवल आजीविका के साधन के रूप में धारण करने वाले, तथा धन, देह और इन्द्रियों में ही रमे रहने वाले वे ब्राह्मण सर्वभक्षी याचकों के रूप में इस पृथ्वी पर भटकते रहें।

श्लोक 27 (bhagavata.4.2.27)

तस्यैवं वदतः शापं श्रुत्वा द्विजकुलाय वै । भृगुः प्रत्यसृजच्छापं ब्रह्मदण्डं दुरत्ययम् ॥ २७ ॥

tasyaivaṁ vadataḥ śāpaṁ śrutvā dvija-kulāya vai bhṛguḥ pratyasṛjac chāpaṁ brahma-daṇḍaṁ duratyayam

उसके द्वारा इस प्रकार सम्पूर्ण द्विज-कुल पर दिए गए शाप को सुनकर भृगु ने उसके प्रत्युत्तर में शिव के अनुयायियों पर एक दुर्निवार्य ब्रह्म-दण्ड रूपी शाप छोड़ा।

श्लोक 28 (bhagavata.4.2.28)

भवव्रतधरा ये च ये च तान्समनुव्रताः । पाषण्डिनस्ते भवन्तु सच्छास्त्रपरिपन्थिनः ॥ २८ ॥

bhava-vrata-dharā ye ca ye ca tān samanuvratāḥ pāṣaṇḍinas te bhavantu sac-chāstra-paripanthinaḥ

[भृगु ने कहा —] जो भव (शिव) के व्रत धारण करते हैं, तथा जो उनका अनुसरण करते हैं, वे सद्शास्त्रों के विरोधी पाखण्डी बन जाएँ।

श्लोक 29 (bhagavata.4.2.29)

नष्टशौचा मूढधियो जटाभस्मास्थिधारिणः । विशन्तु शिवदीक्षायां यत्र दैवं सुरासवम् ॥ २९ ॥

naṣṭa-śaucā mūḍha-dhiyo jaṭā-bhasmāsthi-dhāriṇaḥ viśantu śiva-dīkṣāyāṁ yatra daivaṁ surāsavam

शुचिता से रहित, बुद्धि से भ्रष्ट, तथा जटा, भस्म और अस्थियाँ धारण करने वाले वे लोग उस शिव-दीक्षा में प्रवेश करें, जहाँ मदिरा को ही दैवी वस्तु माना जाता है।

श्लोक 30 (bhagavata.4.2.30)

ब्रह्म च ब्राह्मणांश्चैव यद्यूयं परिनिन्दथ । सेतुं विधारणं पुंसामतः पाषण्डमाश्रिताः ॥ ३० ॥

brahma ca brāhmaṇāṁś caiva yad yūyaṁ parinindatha setuṁ vidhāraṇaṁ puṁsām ataḥ pāṣaṇḍam āśritāḥ

[भृगु ने आगे कहा —] चूँकि तुम वेद और मनुष्यों की मर्यादा को धारण करने वाले ब्राह्मणों की निन्दा करते हो, अतः तुमने पाखण्ड का आश्रय ले ही लिया है।

श्लोक 31 (bhagavata.4.2.31)

एष एव हि लोकानां शिवः पन्थाः सनातनः । यं पूर्वे चानुसन्तस्थुर्यत्प्रमाणं जनार्दनः ॥ ३१ ॥

eṣa eva hi lokānāṁ śivaḥ panthāḥ sanātanaḥ yaṁ pūrve cānusantasthur yat-pramāṇaṁ janārdanaḥ

यही लोकों के लिए सनातन और मंगलकारी मार्ग है, जिसका पूर्वजों ने अनुसरण किया, और जिसका प्रमाण स्वयं भगवान जनार्दन हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.4.2.32)

तद्ब्रह्म परमं शुद्धं सतां वर्त्म सनातनम् । विगर्ह्य यात पाषण्डं दैवं वो यत्र भूतराट् ॥ ३२ ॥

tad brahma paramaṁ śuddhaṁ satāṁ vartma sanātanam vigarhya yāta pāṣaṇḍaṁ daivaṁ vo yatra bhūta-rāṭ

उस परम शुद्ध वेद की, जो सज्जनों का सनातन मार्ग है, निन्दा करके अब उस पाखण्ड में जाओ, जहाँ भूतगणों के स्वामी ही तुम्हारे इष्टदेव हों।

श्लोक 33 (bhagavata.4.2.33)

मैत्रेय उवाच तस्यैवं वदतः शापं भृगोः स भगवान् भवः । निश्चक्राम ततः किञ्चिद्विमना इव सानुगः ॥ ३३ ॥

maitreya uvāca tasyaivaṁ vadataḥ śāpaṁ bhṛgoḥ sa bhagavān bhavaḥ niścakrāma tataḥ kiñcid vimanā iva sānugaḥ

श्री मैत्रेय जी ने कहा — भृगु के इस प्रकार शाप देते समय भगवान भव (शिव) कुछ उदास-से होकर अपने अनुचरों के साथ वहाँ से चले गए।

श्लोक 34 (bhagavata.4.2.34)

तेऽपि विश्वसृजः सत्रं सहस्रपरिवत्सरान् । संविधाय महेष्वास यत्रेज्य ऋषभो हरिः ॥ ३४ ॥

te ’pi viśva-sṛjaḥ satraṁ sahasra-parivatsarān saṁvidhāya maheṣvāsa yatrejya ṛṣabho hariḥ

हे महाधनुर्धर! उन विश्व-रचयिताओं ने उस यज्ञ को, जिसमें सबमें श्रेष्ठ भगवान हरि की आराधना होती थी, सहस्र वर्षों तक सम्पन्न किया।

श्लोक 35 (bhagavata.4.2.35)

आप्लुत्यावभृथं यत्र गङ्गा यमुनयान्विता । विरजेनात्मना सर्वे स्वं स्वं धाम ययुस्ततः ॥ ३५ ॥

āplutyāvabhṛthaṁ yatra gaṅgā yamunayānvitā virajenātmanā sarve svaṁ svaṁ dhāma yayus tataḥ

वहाँ, जहाँ गंगा यमुना से मिलती है, उन सबने अवभृथ-स्नान किया, और निर्मल हृदय होकर सब अपने-अपने धाम को चले गए।

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