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पंचम स्कन्ध · अध्याय 1

राजा प्रियव्रत का गृहस्थ जीवन

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (bhagavata.5.1.1)

राजोवाच प्रियव्रतो भागवत आत्मारामः कथं मुने । गृहेऽरमत यन्मूलः कर्मबन्धः पराभवः ॥ १ ॥

rājovāca priyavrato bhāgavata ātmārāmaḥ kathaṁ mune gṛhe ’ramata yan-mūlaḥ karma-bandhaḥ parābhavaḥ

राजा (परीक्षित) ने कहा — हे मुने! प्रियव्रत भगवान के महान भक्त थे और आत्मा में ही रमण करने वाले थे; फिर वे गृहस्थ जीवन में क्यों रमे, जो कर्मबन्धन और पराभव का मूल है?

श्लोक 2 (bhagavata.5.1.2)

न नूनं मुक्तसङ्गानां तादृशानां द्विजर्षभ । गृहेष्वभिनिवेशोऽयं पुंसां भवितुमर्हति ॥ २ ॥

na nūnaṁ mukta-saṅgānāṁ tādṛśānāṁ dvijarṣabha gṛheṣv abhiniveśo ’yaṁ puṁsāṁ bhavitum arhati

हे द्विजश्रेष्ठ! ऐसे मुक्त-सङ्ग पुरुषों के लिए गृहस्थ जीवन में इस प्रकार की आसक्ति उचित प्रतीत नहीं होती।

श्लोक 3 (bhagavata.5.1.3)

महतां खलु विप्रर्षे उत्तमश्लोकपादयोः । छायानिर्वृतचित्तानां न कुटुम्बे स्पृहामतिः ॥ ३ ॥

mahatāṁ khalu viprarṣe uttamaśloka-pādayoḥ chāyā-nirvṛta-cittānāṁ na kuṭumbe spṛhā-matiḥ

हे विप्रर्षे! महात्माओं का चित्त, जो भगवान के चरणों की छाया में तृप्त रहता है, कुटुम्ब के प्रति कभी आसक्त नहीं होता।

श्लोक 4 (bhagavata.5.1.4)

संशयोऽयं महान् ब्रह्मन् दारागारसुतादिषु । सक्तस्य यत्सिद्धिरभूत्कृष्णे च मतिरच्युता ॥ ४ ॥

saṁśayo ’yaṁ mahān brahman dārāgāra-sutādiṣu saktasya yat siddhir abhūt kṛṣṇe ca matir acyutā

हे ब्रह्मन्! यह मेरा बड़ा संशय है कि पत्नी, घर और पुत्रादि में आसक्त रहते हुए भी उन्हें कृष्ण में अच्युत बुद्धि की सिद्धि कैसे प्राप्त हुई।

श्लोक 5 (bhagavata.5.1.5)

श्रीशुक उवाच बाढमुक्तं भगवत उत्तमश्लोकस्य श्रीमच्चरणारविन्दमकरन्दरस आवेशितचेतसो भागवतपरमहंस दयितकथां किञ्चिदन्तरायविहतां स्वां शिवतमां पदवीं न प्रायेण हिन्वन्ति ॥ ५ ॥

śrī-śuka uvāca bāḍham uktaṁ bhagavata uttamaślokasya śrīmac-caraṇāravinda-makaranda-rasa āveśita-cetaso bhāgavata-paramahaṁsa-dayita-kathāṁ kiñcid antarāya-vihatāṁ svāṁ śivatamāṁ padavīṁ na prāyeṇa hinvanti.

श्रीशुकदेव ने कहा — आपने ठीक ही कहा है। जिनका चित्त भगवान उत्तमश्लोक के श्रीचरण-कमलों के मकरन्द-रस में लीन हो चुका है और जिन्हें परमहंस भक्तों की प्रिय कथाएँ भाती हैं, वे यदि किसी बाधा से क्षणभर के लिए विचलित भी हो जाएँ, तो भी सामान्यतः अपने उस परम कल्याणकारी मार्ग को नहीं छोड़ते।

श्लोक 6 (bhagavata.5.1.6)

यर्हि वाव ह राजन् स राजपुत्रः प्रियव्रतः परमभागवतो नारदस्य चरणोपसेवयाञ्जसावगतपरमार्थसतत्त्वो ब्रह्मसत्रेण दीक्षिष्यमाणः अवनितलपरिपालनायाम्नातप्रवरगुणगणैकान्तभाजनतया स्वपित्रोपामन्त्रितो भगवति वासुदेव एवाव्यवधानसमाधियोगेन समावेशित-सकलकारकक्रियाकलापो नैवाभ्यनन्दद्यद्यपि तदप्रत्याम्नातव्यं तदधिकरण आत्मनोऽन्यस्माद सतोऽपि पराभवमन्वीक्षमाणः ॥ ६ ॥

yarhi vāva ha rājan sa rāja-putraḥ priyavrataḥ parama-bhāgavato nāradasya caraṇopasevayāñjasāvagata-paramārtha-satattvo brahma-satreṇa dīkṣiṣyamāṇo ’vani-tala-paripālanāyāmnāta-pravara-guṇa-gaṇaikānta-bhājanatayā sva-pitropāmantrito bhagavati vāsudeva evāvyavadhāna-samādhi-yogena samāveśita-sakala-kāraka-kriyā-kalāpo naivābhyanandad yadyapi tad apratyāmnātavyaṁ tad-adhikaraṇa ātmano ’nyasmād asato ’pi parābhavam anvīkṣamāṇaḥ.

हे राजन्! उस समय राजकुमार प्रियव्रत, जो नारद मुनि के चरणों की सेवा से परम सत्य को प्रत्यक्ष जान चुके परम भागवत थे और ब्रह्म-सत्र (संन्यास-व्रत) में दीक्षा लेने ही वाले थे, उन्हें उनके पिता ने पृथ्वी के पालन हेतु शास्त्रोक्त श्रेष्ठ गुणों के एकमात्र अधिकारी होने के कारण बुलाया। किन्तु प्रियव्रत, जिनकी समस्त इन्द्रियाँ और क्रियाएँ निरन्तर भगवान वासुदेव के ध्यान में लीन थीं, इस आदेश का स्वागत नहीं कर सके — यद्यपि यह आदेश अस्वीकार्य नहीं था — क्योंकि वे आत्मा से भिन्न किसी भी विषय में प्रवृत्त होने को, भले ही वह वास्तव में पराभव न भी हो, एक प्रकार का पराभव ही मानते थे।

श्लोक 7 (bhagavata.5.1.7)

अथ ह भगवानादिदेव एतस्य गुणविसर्गस्य परिबृंहणानुध्यानव्यवसित सकलजगदभिप्राय आत्मयोनिरखिलनिगमनिजगणपरिवेष्टितः स्वभवनादवततार ॥ ७ ॥

atha ha bhagavān ādi-deva etasya guṇa-visargasya paribṛṁhaṇānudhyāna-vyavasita-sakala-jagad-abhiprāya ātma-yonir akhila-nigama-nija-gaṇa-pariveṣṭitaḥ sva-bhavanād avatatāra.

तदनन्तर आदिदेव भगवान ब्रह्मा, जो स्वयंभू हैं और जिनका समस्त चिन्तन इस त्रिगुणात्मक सृष्टि के पालन तथा सम्पूर्ण जगत के कल्याण में ही निरत रहता है, अपने साक्षात् वेदस्वरूप परिजनों से घिरे हुए अपने धाम से उतर आए।

श्लोक 8 (bhagavata.5.1.8)

स तत्र तत्र गगनतल उडुपतिरिव विमानावलिभिरनुपथममरपरिवृढैरभिपूज्यमानः पथि पथि च वरूथशः सिद्धगन्धर्वसाध्यचारणमुनिगणैरुपगीयमानो गन्धमादनद्रोणीमवभासयन्नुपससर्प ॥ ८ ॥

sa tatra tatra gagana-tala uḍu-patir iva vimānāvalibhir anupatham amara-parivṛḍhair abhipūjyamānaḥ pathi pathi ca varūthaśaḥ siddha-gandharva-sādhya-cāraṇa-muni-gaṇair upagīyamāno gandha-mādana-droṇīm avabhāsayann upasasarpa.

वे मार्ग में सर्वत्र, आकाशमण्डल में नक्षत्रपति चन्द्रमा के समान, अपने विमानों की पंक्तियों सहित मार्गानुगत श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित होते हुए, तथा पद-पद पर सिद्ध, गन्धर्व, साध्य, चारण और मुनिगणों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, गन्धमादन पर्वत की घाटी को प्रकाशित करते हुए वहाँ पधारे।

श्लोक 9 (bhagavata.5.1.9)

तत्र ह वा एनं देवर्षिर्हंसयानेन पितरं भगवन्तं हिरण्यगर्भमुपलभमानः सहसैवोत्थायार्हणेन सह पितापुत्राभ्यामवहिताञ्जलिरुपतस्थे ॥ ९ ॥

tatra ha vā enaṁ devarṣir haṁsa-yānena pitaraṁ bhagavantaṁ hiraṇya-garbham upalabhamānaḥ sahasaivotthāyārhaṇena saha pitā-putrābhyām avahitāñjalir upatasthe.

वहाँ देवर्षि नारद ने हंसवाहन पर आते हुए अपने पिता भगवान हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) को देखकर तुरन्त उठकर, पिता-पुत्र (मनु और प्रियव्रत) सहित, अर्घ्यादि पूजन-सामग्री लेकर विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर उनकी उपासना की।

श्लोक 10 (bhagavata.5.1.10)

भगवानपि भारत तदुपनीतार्हणः सूक्तवाकेनातितरामुदितगुणगणावतारसुजयः प्रियव्रतमादि पुरुषस्तं सदयहासावलोक इति होवाच ॥ १० ॥

bhagavān api bhārata tad-upanītārhaṇaḥ sūkta-vākenātitarām udita-guṇa-gaṇāvatāra-sujayaḥ priyavratam ādi-puruṣas taṁ sadaya-hāsāvaloka iti hovāca.

हे भरतवंशी! उनके द्वारा दिए गए अर्घ्य को स्वीकार कर तथा उत्तम स्तुति-वचनों से भलीभाँति सम्मानित होकर वे आदिपुरुष भगवान ब्रह्मा, करुणापूर्ण मुस्कान से प्रियव्रत की ओर देखते हुए, इस प्रकार बोले।

श्लोक 11 (bhagavata.5.1.11)

श्रीभगवानुवाच निबोध तातेदमृतं ब्रवीमि मासूयितुं देवमर्हस्यप्रमेयम् । वयं भवस्ते तत एष महर्षि- र्वहाम सर्वे विवशा यस्य दिष्टम् ॥ ११ ॥

śrī-bhagavān uvāca nibodha tātedam ṛtaṁ bravīmi māsūyituṁ devam arhasy aprameyam vayaṁ bhavas te tata eṣa maharṣir vahāma sarve vivaśā yasya diṣṭam

श्रीभगवान (ब्रह्मा) ने कहा — हे तात! मैं जो सत्य कह रहा हूँ, उसे ध्यान से सुनो। तुम्हें उस अप्रमेय प्रभु के प्रति असूया नहीं करनी चाहिए। हम सब — भगवान शिव, तुम्हारे पिता, और ये महर्षि नारद भी — सब उसी की आज्ञा का विवशतापूर्वक पालन करते हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.5.1.12)

न तस्य कश्चित्तपसा विद्यया वा न योगवीर्येण मनीषया वा । नैवार्थधर्मैः परतः स्वतो वा कृतं विहन्तुं तनुभृद्विभूयात् ॥ १२ ॥

na tasya kaścit tapasā vidyayā vā na yoga-vīryeṇa manīṣayā vā naivārtha-dharmaiḥ parataḥ svato vā kṛtaṁ vihantuṁ tanu-bhṛd vibhūyāt

कोई भी देहधारी — चाहे वह तप से हो, विद्या से हो, योग-बल से हो, बुद्धि से हो, अथवा धन या धर्म के बल से, चाहे स्वयं करे या दूसरों की सहायता से — उसके (भगवान के) विधान को टालने में समर्थ नहीं हो सकता।

श्लोक 13 (bhagavata.5.1.13)

भवाय नाशाय च कर्म कर्तुं शोकाय मोहाय सदा भयाय । सुखाय दुःखाय च देहयोग- मव्यक्तदिष्टं जनताङ्ग धत्ते ॥ १३ ॥

bhavāya nāśāya ca karma kartuṁ śokāya mohāya sadā bhayāya sukhāya duḥkhāya ca deha-yogam avyakta-diṣṭaṁ janatāṅga dhatte

हे तात! समस्त प्राणी उस अव्यक्त (अदृश्य) भगवद्-आदेश के अनुसार ही जन्म और मृत्यु के लिए, कर्म करने के लिए, शोक, मोह और सतत भय के लिए, तथा सुख-दुःख के लिए देह धारण करते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.5.1.14)

यद्वाचि तन्त्यां गुणकर्मदामभिः सुदुस्तरैर्वत्स वयं सुयोजिताः । सर्वे वहामो बलिमीश्वराय प्रोता नसीव द्विपदे चतुष्पदः ॥ १४ ॥

yad-vāci tantyāṁ guṇa-karma-dāmabhiḥ sudustarair vatsa vayaṁ suyojitāḥ sarve vahāmo balim īśvarāya protā nasīva dvi-pade catuṣ-padaḥ

हे वत्स! हम सब गुण और कर्म की दुस्तर रस्सियों से वेदवाणी की उस डोरी में भलीभाँति बँधे हुए हैं, और जैसे नकेल की डोरी से नाथा हुआ पशु मनुष्य के वश में चलता है, वैसे ही हम सब ईश्वर के लिए यह भार ढोते हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.5.1.15)

ईशाभिसृष्टं ह्यवरुन्ध्महेऽङ्ग दुःखं सुखं वा गुणकर्मसङ्गात् । आस्थाय तत्तद्यदयुङ्क्त नाथ- श्चक्षुष्मतान्धा इव नीयमानाः ॥ १५ ॥

īśābhisṛṣṭaṁ hy avarundhmahe ’ṅga duḥkhaṁ sukhaṁ vā guṇa-karma-saṅgāt āsthāya tat tad yad ayuṅkta nāthaś cakṣuṣmatāndhā iva nīyamānāḥ

हे तात! हम गुण और कर्म के संसर्ग से ईश्वर द्वारा निर्धारित सुख अथवा दुःख को ही प्राप्त करते हैं। नाथ (भगवान) जिस-जिस कर्म में हमें नियुक्त करते हैं, उसी में स्थित रहकर हम वैसे ही चलते हैं जैसे कोई अन्धा नेत्रवान की डोर पकड़कर चलता है।

श्लोक 16 (bhagavata.5.1.16)

मुक्तोऽपि तावद्बिभृयात्स्वदेह- मारब्धमश्नन्नभिमानशून्यः । यथानुभूतं प्रतियातनिद्रः किं त्वन्यदेहाय गुणान्न वृङ्क्ते ॥ १६ ॥

mukto ’pi tāvad bibhṛyāt sva-deham ārabdham aśnann abhimāna-śūnyaḥ yathānubhūtaṁ pratiyāta-nidraḥ kiṁ tv anya-dehāya guṇān na vṛṅkte

मुक्त पुरुष भी अपने प्रारब्ध-भोग को भोगते हुए, अभिमानरहित होकर, अपने शरीर को उसी प्रकार धारण किए रहता है जैसे जागा हुआ व्यक्ति स्वप्न में भोगे हुए को स्मरण करता है; किन्तु वह पुनः दूसरा शरीर पाने के लिए गुणों का आश्रय नहीं लेता।

श्लोक 17 (bhagavata.5.1.17)

भयं प्रमत्तस्य वनेष्वपि स्याद् यतः स आस्ते सहषट्सपत्नः । जितेन्द्रियस्यात्मरतेर्बुधस्य गृहाश्रमः किं नु करोत्यवद्यम् ॥ १७ ॥

bhayaṁ pramattasya vaneṣv api syād yataḥ sa āste saha-ṣaṭ-sapatnaḥ jitendriyasyātma-rater budhasya gṛhāśramaḥ kiṁ nu karoty avadyam

जो असावधान है, उसे वन में रहते हुए भी भय बना रहता है, क्योंकि वह वहाँ भी अपने छह सहवासी शत्रुओं (मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियों) के साथ ही रहता है; परन्तु जितेन्द्रिय, आत्मरति और विद्वान पुरुष को गृहस्थाश्रम भला क्या दोष दे सकता है?

श्लोक 18 (bhagavata.5.1.18)

यः षट् सपत्नान् विजिगीषमाणो गृहेषु निर्विश्य यतेत पूर्वम् । अत्येति दुर्गाश्रित ऊर्जितारीन् क्षीणेषु कामं विचरेद्विपश्चित् ॥ १८ ॥

yaḥ ṣaṭ sapatnān vijigīṣamāṇo gṛheṣu nirviśya yateta pūrvam atyeti durgāśrita ūrjitārīn kṣīṇeṣu kāmaṁ vicared vipaścit

जो इन छह शत्रुओं पर विजय पाना चाहता है, उसे पहले गृहस्थ जीवन में ही रहकर प्रयत्न करना चाहिए, जैसे कोई दुर्ग का आश्रय लेकर शक्तिशाली शत्रुओं को परास्त कर देता है; और जब कामनाएँ क्षीण हो जाएँ, तब वह विद्वान पुरुष चाहे जहाँ स्वच्छन्द विचरण कर सकता है।

श्लोक 19 (bhagavata.5.1.19)

त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश- दुर्गाश्रितो निर्जितषट्सपत्नः । भुङ्क्ष्वेह भोगान् पुरुषातिदिष्टान् विमुक्तसङ्गः प्रकृतिं भजस्व ॥ १९ ॥

tvaṁ tv abja-nābhāṅghri-saroja-kośa- durgāśrito nirjita-ṣaṭ-sapatnaḥ bhuṅkṣveha bhogān puruṣātidiṣṭān vimukta-saṅgaḥ prakṛtiṁ bhajasva

तुम तो कमलनाभ भगवान के चरण-कमल की कोश-रूपी दुर्ग का आश्रय लेकर पहले ही इन छह शत्रुओं पर विजय पा चुके हो; अतः पुरुषोत्तम द्वारा नियत इन भोगों को भोगो, और संग से सर्वथा मुक्त रहते हुए इस राज्य-भार का पालन करो।

श्लोक 20 (bhagavata.5.1.20)

श्रीशुक उवाच इति समभिहितो महाभागवतो भगवतस्त्रिभुवनगुरोरनुशासनमात्मनो लघुतयावनतशिरोधरो बाढमिति सबहुमानमुवाह ॥ २० ॥

śrī-śuka uvāca iti samabhihito mahā-bhāgavato bhagavatas tri-bhuvana-guror anuśāsanam ātmano laghutayāvanata-śirodharo bāḍham iti sabahu-mānam uvāha.

श्रीशुकदेव ने कहा — इस प्रकार सम्बोधित होकर, महान भागवत प्रियव्रत ने त्रिभुवन के गुरु भगवान ब्रह्मा की आज्ञा को स्वयं को उनसे लघु मानते हुए, सिर झुकाकर, बड़े सम्मान के साथ "बहुत अच्छा" कहकर स्वीकार किया।

श्लोक 21 (bhagavata.5.1.21)

भगवानपि मनुना यथावदुपकल्पितापचितिः प्रियव्रतनारदयोरविषममभिसमीक्षमाणयोरात्मसमवस्थानमवाङ्मनसं क्षयमव्यवहृतं प्रवर्तयन्नगमत् ॥ २१ ॥

bhagavān api manunā yathāvad upakalpitāpacitiḥ priyavrata-nāradayor aviṣamam abhisamīkṣamāṇayor ātmasam avasthānam avāṅ-manasaṁ kṣayam avyavahṛtaṁ pravartayann agamat.

भगवान ब्रह्मा भी, मनु द्वारा यथोचित पूजित होकर तथा प्रियव्रत और नारद द्वारा समभाव से देखे जाते हुए, अपने उस धाम को प्रस्थान कर गए जो मन और वाणी से अगोचर, अक्षय तथा सांसारिक व्यवहार से परे है।

श्लोक 22 (bhagavata.5.1.22)

मनुरपि परेणैवं प्रतिसन्धितमनोरथः सुरर्षिवरानुमतेनात्मजमखिलधरामण्डलस्थितिगुप्तय आस्थाप्य स्वयमतिविषमविषयविषजलाशयाशाया उपरराम ॥ २२ ॥

manur api pareṇaivaṁ pratisandhita-manorathaḥ surarṣi-varānumatenātmajam akhila-dharā-maṇḍala-sthiti-guptaya āsthāpya svayam ati-viṣama-viṣaya-viṣa-jalāśayāśāyā upararāma.

मनु भी, इस प्रकार भगवान ब्रह्मा के द्वारा अपनी मनोकामना पूर्ण होती देखकर, देवर्षि नारद की अनुमति से अपने पुत्र को सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल की रक्षा एवं पालन में प्रतिष्ठित कर, स्वयं उस अत्यन्त भयंकर विषयरूपी विषजल के सरोवर की आशा से निवृत्त हो गए।

श्लोक 23 (bhagavata.5.1.23)

इति ह वाव स जगतीपतिरीश्वरेच्छयाधिनिवेशितकर्माधिकारोऽखिलजगद्बन्धध्वंसनपरानुभावस्य भगवत आदिपुरुषस्याङ्घ्रियुगलानवरतध्यानानुभावेन परिरन्धितकषायाशयोऽवदातोऽपि मानवर्धनो महतां महीतलमनुशशास ॥ २३ ॥

iti ha vāva sa jagatī-patir īśvarecchayādhiniveśita-karmādhikāro ’khila-jagad-bandha-dhvaṁsana-parānubhāvasya bhagavata ādi-puruṣasyāṅghri-yugalānavarata-dhyānānubhāvena parirandhita-kaṣāyāśayo ’vadāto ’pi māna-vardhano mahatāṁ mahītalam anuśaśāsa.

इस प्रकार वे पृथ्वीपति प्रियव्रत, ईश्वर की इच्छा से ही राज्य-कार्य में नियुक्त होकर, समस्त जगत के बन्धन को नष्ट करने में समर्थ आदिपुरुष भगवान के चरण-युगल के अविरत ध्यान के प्रभाव से अपने चित्त के समस्त मल को दग्ध कर चुके थे। यद्यपि वे पहले से ही शुद्ध थे, तथापि महापुरुषों का मान बढ़ाने वाले वे प्रियव्रत इस पृथ्वीतल का शासन करने लगे।

श्लोक 24 (bhagavata.5.1.24)

अथ च दुहितरं प्रजापतेर्विश्वकर्मण उपयेमे बर्हिष्मतीं नाम तस्यामु ह वाव आत्मजानात्मसमानशीलगुणकर्मरूपवीर्योदारान्दश भावयाम्बभूव कन्यां च यवीयसीमूर्जस्वतीं नाम ॥ २४ ॥

atha ca duhitaraṁ prajāpater viśvakarmaṇa upayeme barhiṣmatīṁ nāma tasyām u ha vāva ātmajān ātma-samāna-śīla-guṇa-karma-rūpa-vīryodārān daśa bhāvayām babhūva kanyāṁ ca yavīyasīm ūrjasvatīṁ nāma.

तत्पश्चात् उन्होंने प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से विवाह किया। उससे उन्होंने अपने ही समान स्वभाव, गुण, कर्म, रूप, पराक्रम तथा उदारता से युक्त दस पुत्रों को जन्म दिया, और सबसे छोटी एक कन्या भी हुई, जिसका नाम ऊर्जस्वती था।

श्लोक 25 (bhagavata.5.1.25)

आग्नीध्रेध्मजिह्वयज्ञबाहुमहावीरहिरण्यरेतोघृतपृष्ठसवनमेधातिथिवीतिहोत्रकवय इति सर्व एवाग्निनामानः ॥ २५ ॥

āgnīdhredhmajihva-yajñabāhu-mahāvīra-hiraṇyareto-ghṛtapṛṣṭha-savana-medhātithi-vītihotra-kavaya iti sarva evāgni-nāmānaḥ.

उन दस पुत्रों के नाम थे — आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, महावीर, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, सवन, मेधातिथि, वीतिहोत्र और कवि — ये सभी नाम वस्तुतः अग्निदेव के ही नाम हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.5.1.26)

एतेषां कविर्महावीरः सवन इति त्रय आसन्नूर्ध्वरेतसस्त आत्मविद्यायामर्भभावादारभ्य कृतपरिचयाः पारमहंस्यमेवाश्रममभजन् ॥ २६ ॥

eteṣāṁ kavir mahāvīraḥ savana iti traya āsann ūrdhva-retasas ta ātma-vidyāyām arbha-bhāvād ārabhya kṛta-paricayāḥ pāramahaṁsyam evāśramam abhajan.

इनमें से कवि, महावीर और सवन — ये तीनों बाल्यकाल से ही आजन्म ब्रह्मचारी रहे और आत्मविद्या के अभ्यासी होकर परमहंस-आश्रम का ही आश्रय लिया।

श्लोक 27 (bhagavata.5.1.27)

तस्मिन्नु ह वा उपशमशीलाः परमर्षयः सकलजीवनिकायावासस्य भगवतो वासुदेवस्य भीतानां शरणभूतस्य श्रीमच्चरणारविन्दाविरतस्मरणाविगलितपरमभक्तियोगानुभावेन परिभावितान्तर्हृदयाधिगते भगवति सर्वेषां भूतानामात्मभूते प्रत्यगात्मन्येवा- त्मनस्तादात्म्यमविशेषेण समीयुः ॥ २७ ॥

tasminn u ha vā upaśama-śīlāḥ paramarṣayaḥ sakala-jīva-nikāyāvāsasya bhagavato vāsudevasya bhītānāṁ śaraṇa-bhūtasya śrīmac-caraṇāravindāvirata-smaraṇāvigalita-parama-bhakti-yogānu-bhāvena paribhāvitāntar-hṛdayādhigate bhagavati sarveṣāṁ bhūtānām ātma-bhūte pratyag-ātmany evātmanas tādātmyam aviśeṣeṇa samīyuḥ.

शान्तस्वभाव वाले वे परम ऋषिगण, समस्त जीव-समूहों के आश्रय-स्थल और भयभीतों की शरण भगवान वासुदेव के श्रीचरण-कमलों के अविरत स्मरण से उत्पन्न अविचल परमभक्तियोग के प्रभाव से अपने अन्तःकरण को भावित करते हुए, सबके आत्मस्वरूप उन भगवान को अपने ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) में साक्षात् उपलब्ध कर, अपनी आत्मा का उनसे अभेद भाव से तादात्म्य प्राप्त कर लिया।

श्लोक 28 (bhagavata.5.1.28)

अन्यस्यामपि जायायां त्रयः पुत्रा आसन्नुत्तमस्तामसो रैवत इति मन्वन्तराधिपतयः ॥ २८ ॥

anyasyām api jāyāyāṁ trayaḥ putrā āsann uttamas tāmaso raivata iti manvantarādhipatayaḥ.

अपनी दूसरी पत्नी से उन्हें तीन और पुत्र प्राप्त हुए — उत्तम, तामस और रैवत — जो आगे चलकर मन्वन्तरों के अधिपति (मनु) बने।

श्लोक 29 (bhagavata.5.1.29)

एवमुपशमायनेषु स्वतनयेष्वथ जगतीपतिर्जगतीमर्बुदान्येकादश परिवत्सराणामव्याहताखिलपुरुषकारसारसम्भृतदोर्दण्डयुगलापीडितमौर्वीगुणस्तनितविरमितधर्मप्रतिपक्षो बर्हिष्मत्याश्चानुदिनमेधमानप्रमोदप्रसरणयौषिण्यव्रीडाप्रमुषितहासावलोकरुचिरक्ष्वेल्यादिभिः पराभूयमानविवेक इवानवबुध्यमान इव महामना बुभुजे ॥ २९ ॥

evam upaśamāyaneṣu sva-tanayeṣv atha jagatī-patir jagatīm arbudāny ekādaśa parivatsarāṇām avyāhatākhila-puruṣa-kāra-sāra-sambhṛta-dor-daṇḍa-yugalāpīḍita-maurvī-guṇa-stanita-viramita-dharma-pratipakṣo barhiṣmatyāś cānudinam edhamāna-pramoda-prasaraṇa-yauṣiṇya-vrīḍā-pramuṣita-hāsāvaloka-rucira-kṣvely-ādibhiḥ parābhūyamāna-viveka ivānavabudhyamāna iva mahāmanā bubhuje.

इस प्रकार अपने उन शान्त-स्वभाव पुत्रों के परमहंस-आश्रम ग्रहण करने के बाद, वे पृथ्वीपति ग्यारह अर्बुद वर्षों तक पृथ्वी का शासन करते रहे। अपनी दोनों प्रबल भुजाओं से खींची गई धनुष-प्रत्यंचा की गर्जना मात्र से ही, जिसमें उनका अबाध पुरुषार्थ सन्निहित था, समस्त धर्म-विरोधी शक्तियाँ शान्त हो जाती थीं। साथ ही, रानी बर्हिष्मती के दिन-प्रतिदिन बढ़ते हुए हर्ष, उनकी स्त्री-सुलभ लज्जा से युक्त मनोहर हास-विलास तथा क्रीड़ाओं से मानो उनका विवेक कुछ-कुछ आच्छादित हो जाता था, और वे महामना राजा मानो उससे अनभिज्ञ रहते हुए ही उन भोगों को भोगते रहे।

श्लोक 30 (bhagavata.5.1.30)

यावदवभासयति सुरगिरिमनुपरिक्रामन् भगवानादित्यो वसुधातलमर्धेनैव प्रतपत्यर्धेनावच्छादयति तदा हि भगवदुपासनोपचितातिपुरुषप्रभावस्तदनभिनन्दन् समजवेन रथेन ज्योतिर्मयेन रजनीमपि दिनं करिष्यामीति सप्तकृत्वस्तरणिमनुपर्यक्रामद् द्वितीय इव पतङ्गः ॥ ३० ॥

yāvad avabhāsayati sura-girim anuparikrāman bhagavān ādityo vasudhā-talam ardhenaiva pratapaty ardhenāvacchādayati tadā hi bhagavad-upāsanopacitāti-puruṣa-prabhāvas tad anabhinandan samajavena rathena jyotirmayena rajanīm api dinaṁ kariṣyāmīti sapta-kṛt vastaraṇim anuparyakrāmad dvitīya iva pataṅgaḥ.

जब भगवान सूर्यदेव सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करते हुए इस पृथ्वीतल के केवल आधे भाग को ही प्रकाशित करते और शेष आधे को अन्धकार में छोड़ देते, तो भगवद्-उपासना से अलौकिक शक्ति प्राप्त प्रियव्रत को यह अच्छा नहीं लगा। तब उन्होंने "मैं रात्रि को भी दिन बना दूँगा" — यह संकल्प लेकर अपने तेजोमय रथ पर सूर्य के समान वेग से सात बार सूर्य की परिक्रमा की, मानो वे स्वयं द्वितीय सूर्य ही हों।

श्लोक 31 (bhagavata.5.1.31)

ये वा उ ह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखातास्ते सप्त सिन्धव आसन् यत एव कृताः सप्त भुवो द्वीपाः ॥ ३१ ॥

ye vā u ha tad-ratha-caraṇa-nemi-kṛta-parikhātās te sapta sindhava āsan yata eva kṛtāḥ sapta bhuvo dvīpāḥ.

उनके उस रथ के पहियों की नेमियों से खोदी गई खाइयाँ ही आगे चलकर सात समुद्र बनीं, और उन्हीं से पृथ्वी के सात द्वीप बने।

श्लोक 32 (bhagavata.5.1.32)

जम्बूप्लक्षशाल्मलिकुशक्रौञ्चशाकपुष्करसंज्ञास्तेषां परिमाणं पूर्वस्मात्पूर्वस्मादुत्तर उत्तरो यथासंख्यं द्विगुणमानेन बहिः समन्तत उपक्लृप्ताः ॥ ३२ ॥

jambū-plakṣa-śālmali-kuśa-krauñca-śāka-puṣkara-saṁjñās teṣāṁ parimāṇaṁ pūrvasmāt pūrvasmād uttara uttaro yathā-saṅkhyaṁ dvi-guṇa-mānena bahiḥ samantata upakḷptāḥ.

उन द्वीपों के नाम हैं — जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। इनका विस्तार क्रमशः एक-दूसरे से बाहर की ओर होता गया, और प्रत्येक अगला द्वीप पूर्ववर्ती द्वीप से ठीक दुगुने आकार का है।

श्लोक 33 (bhagavata.5.1.33)

क्षारोदेक्षुरसोदसुरोदघृतोदक्षीरोददधिमण्डोदशुद्धोदाः सप्त जलधयः सप्त द्वीपपरिखा इवाभ्यन्तरद्वीपसमाना एकैकश्येन यथानुपूर्वं सप्तस्वपि बहिर्द्वीपेषु पृथक्परित उपकल्पितास्तेषु जम्ब्वादिषु बर्हिष्मतीपतिरनुव्रतानात्मजानाग्नीध्रेध्मजिह्वयज्ञबाहुहिरण्यरेतोघृतपृष्ठमेधातिथिवीतिहोत्रसंज्ञान् यथा संख्येनैकैकस्मिन्नेकमेवाधिपतिं विदधे ॥ ३३ ॥

kṣārodekṣu-rasoda-suroda-ghṛtoda-kṣīroda-dadhi-maṇḍoda-śuddhodāḥ sapta jaladhayaḥ sapta dvīpa-parikhā ivābhyantara-dvīpa-samānā ekaikaśyena yathānupūrvaṁ saptasv api bahir dvīpeṣu pṛthak parita upakalpitās teṣu jambv-ādiṣu barhiṣmatī-patir anuvratānātmajān āgnīdhredhmajihva-yajñabāhu-hiraṇyareto-ghṛtapṛṣṭha-medhātithi-vītihotra-saṁjñān yathā-saṅkhyenaikaikasminn ekam evādhi-patiṁ vidadhe.

नमकीन जल, गन्ने का रस, मदिरा, घृत, दूध, दही और मीठा जल — इन सात समुद्रों में से प्रत्येक, मानो सम्बन्धित द्वीप की खाई के समान, अपने भीतरी द्वीप के बराबर विस्तार का है, और सातों द्वीपों को क्रमशः चारों ओर से घेरे हुए है। उन जम्बू आदि द्वीपों पर बर्हिष्मतीपति प्रियव्रत ने अपने आज्ञाकारी पुत्रों — आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, मेधातिथि और वीतिहोत्र — में से एक-एक को क्रमशः एक-एक द्वीप का अधिपति नियुक्त किया।

श्लोक 34 (bhagavata.5.1.34)

दुहितरं चोर्जस्वतीं नामोशनसे प्रायच्छद्यस्यामासीद् देवयानी नाम काव्यसुता ॥ ३४ ॥

duhitaraṁ corjasvatīṁ nāmośanase prāyacchad yasyām āsīd devayānī nāma kāvya-sutā.

उन्होंने अपनी पुत्री ऊर्जस्वती का विवाह उशना (शुक्राचार्य) से किया, जिससे काव्य (शुक्राचार्य) की पुत्री देवयानी नामक कन्या उत्पन्न हुई।

श्लोक 35 (bhagavata.5.1.35)

नैवंविधः पुरुषकार उरुक्रमस्यपुंसां तदङ्घ्रिरजसा जितषड्गुणानाम् । चित्रं विदूरविगतः सकृदाददीतयन्नामधेयमधुना स जहाति बन्धम् ॥ ३५ ॥

naivaṁ-vidhaḥ puruṣa-kāra urukramasya puṁsāṁ tad-aṅghri-rajasā jita-ṣaḍ-guṇānām citraṁ vidūra-vigataḥ sakṛd ādadīta yan-nāmadheyam adhunā sa jahāti bandham

विक्रमशाली भगवान के चरण-रज से जिन्होंने छहों (शरीर के) विकारों पर विजय पा ली है, ऐसे पुरुषों के लिए यह पुरुषार्थ कोई आश्चर्य की बात नहीं; क्योंकि जो अन्त्यज (अस्पृश्य) पुरुष भी उनके नाम का एक बार उच्चारण कर ले, वह तत्क्षण ही अपने बन्धन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 36 (bhagavata.5.1.36)

स एवमपरिमितबलपराक्रम एकदा तु देवर्षिचरणानुशयनानुपतितगुणविसर्गसंसर्गेणानिर्वृतमिवात्मानं मन्यमान आत्मनिर्वेद इदमाह ॥ ३६ ॥

sa evam aparimita-bala-parākrama ekadā tu devarṣi-caraṇānuśayanānu-patita-guṇa-visarga-saṁsargeṇānirvṛtam ivātmānaṁ manyamāna ātma-nirveda idam āha.

वे अपरिमित बल-पराक्रम से सम्पन्न प्रियव्रत एक दिन यह अनुभव करने लगे कि देवर्षि नारद के चरणों की शरण लेने के बावजूद इस त्रिगुणमयी सृष्टि के संसर्ग में पड़कर वे मानो असन्तुष्ट ही रह गए हैं; तब वैराग्य से भरकर उन्होंने यह कहा।

श्लोक 37 (bhagavata.5.1.37)

अहो असाध्वनुष्ठितं यदभिनिवेशितोऽहमिन्द्रियैरविद्यारचितविषमविषयान्धकूपे तदलमलममुष्या वनिताया विनोदमृगं मां धिग्धिगिति गर्हयाञ्चकार ॥ ३७ ॥

aho asādhv anuṣṭhitaṁ yad abhiniveśito ’ham indriyair avidyā-racita-viṣama-viṣayāndha-kūpe tad alam alam amuṣyā vanitāyā vinoda-mṛgaṁ māṁ dhig dhig iti garhayāṁ cakāra.

उन्होंने स्वयं की निन्दा करते हुए कहा — हाय! मैंने कैसा अशुभ आचरण किया कि इन्द्रियों के वशीभूत होकर अविद्या-निर्मित इस विषम विषय-रूपी अन्धे कुएँ में गिर पड़ा! अब बस, बहुत हो चुका! धिक्कार है मुझे, जो इस स्त्री के हाथों का खिलौना बना रहा।

श्लोक 38 (bhagavata.5.1.38)

परदेवताप्रसादाधिगतात्मप्रत्यवमर्शेनानुप्रवृत्तेभ्यः पुत्रेभ्य इमां यथादायं विभज्य भुक्तभोगां च महिषीं मृतकमिव सह महाविभूतिमपहाय स्वयं निहितनिर्वेदो हृदि गृहीतहरिविहारानुभावो भगवतो नारदस्य पदवीं पुनरेवानुससार ॥ ३८ ॥

para-devatā-prasādādhigatātma-pratyavamarśenānupravṛttebhyaḥ putrebhya imāṁ yathā-dāyaṁ vibhajya bhukta-bhogāṁ ca mahiṣīṁ mṛtakam iva saha mahā-vibhūtim apahāya svayaṁ nihita-nirvedo hṛdi gṛhīta-hari-vihārānubhāvo bhagavato nāradasya padavīṁ punar evānusasāra.

सर्वोच्च देवता (भगवान) की कृपा से प्राप्त आत्म-विवेक के कारण, उन्होंने पृथ्वी को अपने आज्ञाकारी पुत्रों में यथोचित बाँट दिया, तथा जिस रानी के साथ उन्होंने भोग भोगे थे, उसे तथा अपने विशाल ऐश्वर्य को मृतक-तुल्य समझकर त्याग दिया। इस प्रकार स्वयं वैराग्य धारण कर, हृदय में भगवान हरि की लीलाओं का अनुभव संजोए हुए, वे पुनः भगवान नारद के मार्ग की ओर लौट चले।

श्लोक 39 (bhagavata.5.1.39)

तस्य ह वा एते श्लोकाः— प्रियव्रतकृतं कर्म को नु कुर्याद्विनेश्वरम् । यो नेमिनिम्नैरकरोच्छायां घ्नन् सप्त वारिधीन् ॥ ३९ ॥

tasya ha vā ete ślokāḥ — priyavrata-kṛtaṁ karma ko nu kuryād vineśvaram yo nemi-nimnair akaroc chāyāṁ ghnan sapta vāridhīn

उनके सम्बन्ध में ये श्लोक प्रसिद्ध हैं — प्रियव्रत के इस कर्म को ईश्वर के अतिरिक्त और कौन कर सकता है, जिन्होंने रथ-चक्रों की नेमियों से गड्ढे खोदकर सात समुद्र बना डाले और रात्रि के अन्धकार को ही मिटा दिया?

श्लोक 40 (bhagavata.5.1.40)

भूसंस्थानं कृतं येन सरिद्गिरिवनादिभिः । सीमा च भूतनिर्वृत्यै द्वीपे द्वीपे विभागशः ॥ ४० ॥

bhū-saṁsthānaṁ kṛtaṁ yena sarid-giri-vanādibhiḥ sīmā ca bhūta-nirvṛtyai dvīpe dvīpe vibhāgaśaḥ

"जिन्होंने नदियों, पर्वतों, वनों आदि के द्वारा पृथ्वी की संरचना की, तथा प्राणियों की शान्ति के लिए प्रत्येक द्वीप में विभागानुसार सीमाएँ निर्धारित कीं।"

श्लोक 41 (bhagavata.5.1.41)

भौमं दिव्यं मानुषं च महित्वं कर्मयोगजम् । यश्चक्रे निरयौपम्यं पुरुषानुजनप्रियः ॥ ४१ ॥

bhaumaṁ divyaṁ mānuṣaṁ ca mahitvaṁ karma-yogajam yaś cakre nirayaupamyaṁ puruṣānujana-priyaḥ

"देवर्षि नारद के प्रिय अनुयायी उन प्रियव्रत ने कर्म और योग से प्राप्त पार्थिव, दिव्य तथा मानवीय समस्त ऐश्वर्य को नरक के समान तुच्छ मान लिया।"

अध्याय-सूचीअध्याय 2