षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5
प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप
श्लोक 1 (bhagavata.6.5.1)
श्रीशुक उवाच तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः । हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद्विभुः ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca tasyāṁ sa pāñcajanyāṁ vai viṣṇu-māyopabṛṁhitaḥ haryaśva-saṁjñān ayutaṁ putrān ajanayad vibhuḥ
श्रीशुक ने कहा — भगवान् विष्णु की माया से समर्थ हुए दक्ष ने अपनी पत्नी पांचजनी के गर्भ से हर्यश्व नामक दस हज़ार पुत्र उत्पन्न किए।
श्लोक 2 (bhagavata.6.5.2)
अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्वे दाक्षायणा नृप । पित्रा प्रोक्ताः प्रजासर्गे प्रतीचीं प्रययुर्दिशम् ॥ २ ॥
apṛthag-dharma-śīlās te sarve dākṣāyaṇā nṛpa pitrā proktāḥ prajā-sarge pratīcīṁ prayayur diśam
हे राजन्! दक्ष के वे सभी पुत्र एक समान सुशील और धर्मपरायण थे; अपने पिता द्वारा प्रजा-वृद्धि का आदेश पाकर वे सब पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े।
श्लोक 3 (bhagavata.6.5.3)
तत्र नारायणसरस्तीर्थं सिन्धुसमुद्रयोः । सङ्गमो यत्र सुमहन्मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥ ३ ॥
tatra nārāyaṇa-saras tīrthaṁ sindhu-samudrayoḥ saṅgamo yatra sumahan muni-siddha-niṣevitam
वहाँ, जहाँ सिंधु नदी समुद्र से मिलती है, नारायण-सरोवर नामक एक महान् तीर्थ है, जहाँ मुनि और सिद्धजन निवास करते हैं।
श्लोक 4 (bhagavata.6.5.4)
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः । धर्मे पारमहंस्ये च प्रोत्पन्नमतयोऽप्युत ॥ ४ ॥
tad-upasparśanād eva vinirdhūta-malāśayāḥ dharme pāramahaṁsye ca protpanna-matayo ’py uta
उस तीर्थ के जल के स्पर्शमात्र से उन पुत्रों के हृदय की समस्त मलिनता धुल गई, और उनका मन परमहंसों के धर्म की ओर आकृष्ट होने लगा।
श्लोक 5 (bhagavata.6.5.5)
तेपिरे तप एवोग्रं पित्रादेशेन यन्त्रिताः । प्रजाविवृद्धये यत्तान् देवर्षिस्तान् ददर्श ह ॥ ५ ॥
tepire tapa evograṁ pitrādeśena yantritāḥ prajā-vivṛddhaye yattān devarṣis tān dadarśa ha
फिर भी, पिता की आज्ञा से बँधे हुए, वे प्रजा की वृद्धि हेतु घोर तपस्या करने लगे; उसी समय देवर्षि नारद ने उन्हें वहाँ देखा।
श्लोक 6 (bhagavata.6.5.6)
उवाच चाथ हर्यश्वाः कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः । अदृष्ट्वान्तं भुवो यूयं बालिशा बत पालकाः ॥ ६ ॥
uvāca cātha haryaśvāḥ kathaṁ srakṣyatha vai prajāḥ adṛṣṭvāntaṁ bhuvo yūyaṁ bāliśā bata pālakāḥ
उन्होंने हर्यश्वों से कहा — तुम प्रजा की सृष्टि कैसे करोगे, जब तुमने पृथ्वी की सीमा ही नहीं देखी? हाय! तुम तो अनुभवहीन बालक हो, फिर भी शासक बनने चले हो।
श्लोक 7 (bhagavata.6.5.7)
तथैकपुरुषं राष्ट्रं बिलं चादृष्टनिर्गमम् । बहुरूपां स्त्रियं चापि पुमांसं पुंश्चलीपतिम् ॥ ७ ॥
tathaika-puruṣaṁ rāṣṭraṁ bilaṁ cādṛṣṭa-nirgamam bahu-rūpāṁ striyaṁ cāpi pumāṁsaṁ puṁścalī-patim
वहाँ एक ऐसा राज्य है जहाँ केवल एक ही पुरुष रहता है, और एक ऐसा बिल है जिसमें से निकलते हुए किसी को देखा नहीं गया; वहाँ बहुरूपिणी स्त्री है, और वहाँ का पुरुष एक असती स्त्री का पति है —
श्लोक 8 (bhagavata.6.5.8)
नदीमुभयतो वाहां पञ्चपञ्चाद्भुतं गृहम् । क्वचिद्धंसं चित्रकथं क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमि ॥ ८ ॥
nadīm ubhayato vāhāṁ pañca-pañcādbhutaṁ gṛham kvacid dhaṁsaṁ citra-kathaṁ kṣaura-pavyaṁ svayaṁ bhrami
— वहाँ एक नदी है जो दोनों दिशाओं में बहती है, पच्चीस तत्वों से बना एक अद्भुत घर है, कहीं विचित्र कथा वाला एक हंस है, और स्वयं घूमता हुआ, छुरों और वज्रों से बना एक चक्र भी है।
श्लोक 9 (bhagavata.6.5.9)
कथं स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चितः । अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्गं करिष्यथ ॥ ९ ॥
kathaṁ sva-pitur ādeśam avidvāṁso vipaścitaḥ anurūpam avijñāya aho sargaṁ kariṣyatha
तुम, जो अपने विद्वान् पिता की आज्ञा के वास्तविक अभिप्राय को न जानने वाले अज्ञानी हो, अहो! उसके उपयुक्त तात्पर्य को समझे बिना कैसे सृष्टि-कार्य करोगे?
श्लोक 10 (bhagavata.6.5.10)
श्रीशुक उवाच तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया । वाचः कूटं तु देवर्षेः स्वयं विममृशुर्धिया ॥ १० ॥
śrī-śuka uvāca tan niśamyātha haryaśvā autpattika-manīṣayā vācaḥ kūṭaṁ tu devarṣeḥ svayaṁ vimamṛśur dhiyā
श्रीशुक ने कहा — यह सुनकर हर्यश्वों ने अपनी सहज बुद्धि से देवर्षि नारद की उन रहस्यमय बातों पर स्वयं ही चिंतन करना आरंभ किया।
श्लोक 11 (bhagavata.6.5.11)
भूः क्षेत्रं जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम् । अदृष्ट्वा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ ११ ॥
bhūḥ kṣetraṁ jīva-saṁjñaṁ yad anādi nija-bandhanam adṛṣṭvā tasya nirvāṇaṁ kim asat-karmabhir bhavet
पृथ्वी शब्द का अर्थ है कर्म-क्षेत्र, अर्थात् जीव नाम से जाना जाने वाला वह अनादि शरीर, जो स्वयं ही उसके बंधन का कारण है। जब तक इसकी समाप्ति न देख ली जाए, तब तक क्षणभंगुर कर्मों से क्या लाभ?
श्लोक 12 (bhagavata.6.5.12)
एक एवेश्वरस्तुर्यो भगवान् स्वाश्रयः परः । तमदृष्ट्वाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १२ ॥
eka eveśvaras turyo bhagavān svāśrayaḥ paraḥ tam adṛṣṭvābhavaṁ puṁsaḥ kim asat-karmabhir bhavet
वह एक ही परम ईश्वर, चतुर्थ तत्त्व, भगवान्, स्वयं का ही आश्रय और सबसे परे हैं। जन्म-रहित उस भगवान् को देखे बिना, मनुष्य को क्षणभंगुर कर्मों से क्या लाभ?
श्लोक 13 (bhagavata.6.5.13)
पुमान्नैवैति यद्गत्वा बिलस्वर्गं गतो यथा । प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १३ ॥
pumān naivaiti yad gatvā bila-svargaṁ gato yathā pratyag-dhāmāvida iha kim asat-karmabhir bhavet
जैसे बिल-स्वर्ग अर्थात् पाताल-लोक में गया हुआ पुरुष लौटकर नहीं आता, वैसे ही जो व्यक्ति परमधाम को प्राप्त हो जाता है, वह भी लौटकर नहीं आता। उस परमधाम को न जानने वाले को इस लोक में क्षणभंगुर कर्मों से क्या लाभ?
श्लोक 14 (bhagavata.6.5.14)
नानारूपात्मनो बुद्धिः स्वैरिणीव गुणान्विता । तन्निष्ठामगतस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १४ ॥
nānā-rūpātmano buddhiḥ svairiṇīva guṇānvitā tan-niṣṭhām agatasyeha kim asat-karmabhir bhavet
जीव की बुद्धि, अनेक रूप धारण करती हुई और गुणों से युक्त, एक स्वच्छंद स्त्री के समान है। जो इसकी स्थिरता को प्राप्त नहीं कर पाया, उसे क्षणभंगुर कर्मों से इस लोक में क्या लाभ?
श्लोक 15 (bhagavata.6.5.15)
तत्सङ्गभ्रंशितैश्वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत् । तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १५ ॥
tat-saṅga-bhraṁśitaiśvaryaṁ saṁsarantaṁ kubhāryavat tad-gatīr abudhasyeha kim asat-karmabhir bhavet
उस चंचल बुद्धि के संग से अपना ऐश्वर्य खोकर, मनुष्य एक दुष्ट पत्नी वाले पति के समान संसार में भटकता रहता है। इस बुद्धि की गतियों को न जानने वाले अज्ञानी को क्षणभंगुर कर्मों से इस लोक में क्या लाभ?
श्लोक 16 (bhagavata.6.5.16)
सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम् । मत्तस्य तामविज्ञस्य किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १६ ॥
sṛṣṭy-apyaya-karīṁ māyāṁ velā-kūlānta-vegitām mattasya tām avijñasya kim asat-karmabhir bhavet
सृष्टि और प्रलय दोनों को करने वाली माया-रूपी नदी अपने तटों के निकट अत्यंत वेगवती होती है। उससे मोहित और अनजान पुरुष को क्षणभंगुर कर्मों से क्या लाभ?
श्लोक 17 (bhagavata.6.5.17)
पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणः । अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १७ ॥
pañca-viṁśati-tattvānāṁ puruṣo ’dbhuta-darpaṇaḥ adhyātmam abudhasyeha kim asat-karmabhir bhavet
परम पुरुष पच्चीस तत्वों का अद्भुत प्रतिबिंबक है, जो अध्यात्म का अधिष्ठाता है। उसे न जानने वाले अज्ञानी को इस लोक में क्षणभंगुर कर्मों से क्या लाभ?
श्लोक 18 (bhagavata.6.5.18)
ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम् । विविक्तपदमज्ञाय किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १८ ॥
aiśvaraṁ śāstram utsṛjya bandha-mokṣānudarśanam vivikta-padam ajñāya kim asat-karmabhir bhavet
बंधन और मोक्ष का सम्यक् ज्ञान कराने वाले, भगवद्-विषयक शास्त्र को त्यागकर, तथा उस विवेक-प्रदायक पद को न जानकर, क्षणभंगुर कर्मों से क्या लाभ?
श्लोक 19 (bhagavata.6.5.19)
कालचक्रं भ्रमि तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत् । स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १९ ॥
kāla-cakraṁ bhrami tīkṣṇaṁ sarvaṁ niṣkarṣayaj jagat svatantram abudhasyeha kim asat-karmabhir bhavet
काल-चक्र स्वयं घूमता हुआ, अत्यंत तीक्ष्ण और स्वतंत्र, संपूर्ण जगत् को खींचता चलता है। उसे न जानने वाले अज्ञानी को इस लोक में क्षणभंगुर कर्मों से क्या लाभ?
श्लोक 20 (bhagavata.6.5.20)
शास्त्रस्य पितुरादेशं यो न वेद निवर्तकम् । कथं तदनुरूपाय गुणविस्रम्भ्युपक्रमेत् ॥ २० ॥
śāstrasya pitur ādeśaṁ yo na veda nivartakam kathaṁ tad-anurūpāya guṇa-visrambhy upakramet
जो शास्त्र-रूपी पिता के उस आदेश को नहीं जानता, जो संसार से निवृत्त करने वाला है, वह गुणों में विश्वास रखने वाला व्यक्ति उसके अनुरूप आचरण कैसे करेगा?
श्लोक 21 (bhagavata.6.5.21)
इति व्यवसिता राजन् हर्यश्वा एकचेतसः । प्रययुस्तं परिक्रम्य पन्थानमनिवर्तनम् ॥ २१ ॥
iti vyavasitā rājan haryaśvā eka-cetasaḥ prayayus taṁ parikramya panthānam anivartanam
हे राजन्! इस प्रकार निश्चय करके, एक ही चित्त वाले हर्यश्वगण नारद की परिक्रमा करके उस मार्ग पर चल पड़े, जिससे लौटना नहीं होता।
श्लोक 22 (bhagavata.6.5.22)
स्वरब्रह्मणि निर्भातहृषीकेशपदाम्बुजे । अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनिः ॥ २२ ॥
svara-brahmaṇi nirbhāta- hṛṣīkeśa-padāmbuje akhaṇḍaṁ cittam āveśya lokān anucaran muniḥ
अपने चित्त को अखंड रूप से हृषीकेश के उन चरण-कमलों में लगाकर, जो पवित्र नाद-ब्रह्म में स्पष्ट प्रकट होते हैं, मुनि नारद विभिन्न लोकों में विचरण करते रहे।
श्लोक 23 (bhagavata.6.5.23)
नाशं निशम्य पुत्राणां नारदाच्छीलशालिनाम् । अन्वतप्यत कः शोचन् सुप्रजस्त्वं शुचां पदम् ॥ २३ ॥
nāśaṁ niśamya putrāṇāṁ nāradāc chīla-śālinām anvatapyata kaḥ śocan suprajastvaṁ śucāṁ padam
अपने सुशील पुत्रों की, नारद के कारण हुई, इस हानि को सुनकर दक्ष अत्यंत शोक करने लगे — उन सुयोग्य पुत्रों के होने का सुख भी अब शोक का ही कारण बन गया था।
श्लोक 24 (bhagavata.6.5.24)
स भूयः पाञ्चजन्यायामजेन परिसान्त्वितः । पुत्रानजनयद्दक्षः सवलाश्वान्सहस्रिणः ॥ २४ ॥
sa bhūyaḥ pāñcajanyāyām ajena parisāntvitaḥ putrān ajanayad dakṣaḥ savalāśvān sahasriṇaḥ
ब्रह्मा जी द्वारा सांत्वना दिए जाने पर, दक्ष ने पुनः अपनी पत्नी पांचजनी के गर्भ से सवलाश्व नामक एक सहस्र पुत्र उत्पन्न किए।
श्लोक 25 (bhagavata.6.5.25)
ते च पित्रा समादिष्टाः प्रजासर्गे धृतव्रताः । नारायणसरो जग्मुर्यत्र सिद्धाः स्वपूर्वजाः ॥ २५ ॥
te ca pitrā samādiṣṭāḥ prajā-sarge dhṛta-vratāḥ nārāyaṇa-saro jagmur yatra siddhāḥ sva-pūrvajāḥ
पिता की आज्ञा से प्रजा-वृद्धि हेतु व्रत धारण करके, वे भी उसी नारायण-सरोवर की ओर गए, जहाँ उनके अग्रज सिद्धि को प्राप्त हुए थे।
श्लोक 26 (bhagavata.6.5.26)
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः । जपन्तो ब्रह्म परमं तेपुस्तत्र महत्तपः ॥ २६ ॥
tad-upasparśanād eva vinirdhūta-malāśayāḥ japanto brahma paramaṁ tepus tatra mahat tapaḥ
उस तीर्थ के जल के स्पर्श से हृदय की मलिनता धुल जाने पर, वे परम ब्रह्म-मंत्र का जप करते हुए वहाँ महान् तपस्या करने लगे।
श्लोक 27 (bhagavata.6.5.27)
अब्भक्षाः कतिचिन्मासान् कतिचिद्वायुभोजनाः । आराधयन् मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम् ॥ २७ ॥
ab-bhakṣāḥ katicin māsān katicid vāyu-bhojanāḥ ārādhayan mantram imam abhyasyanta iḍaspatim
कुछ महीनों तक केवल जल पीकर और कुछ महीनों तक केवल वायु का सेवन करते हुए, उन्होंने वेदों के स्वामी की आराधना करते हुए इस मंत्र का अभ्यास किया —
श्लोक 28 (bhagavata.6.5.28)
ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने । विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ॥ २८ ॥
oṁ namo nārāyaṇāya puruṣāya mahātmane viśuddha-sattva-dhiṣṇyāya mahā-haṁsāya dhīmahi
ॐ, हम उन महापुरुष नारायण को नमस्कार करते हैं, जो शुद्ध सत्त्व में स्थित हैं और परम हंस-स्वरूप हैं — हम उनका ध्यान करते हैं।
श्लोक 29 (bhagavata.6.5.29)
इति तानपि राजेन्द्र प्रजासर्गधियो मुनिः । उपेत्य नारदः प्राह वाचः कूटानि पूर्ववत् ॥ २९ ॥
iti tān api rājendra prajā-sarga-dhiyo muniḥ upetya nāradaḥ prāha vācaḥ kūṭāni pūrvavat
हे राजेंद्र! इस प्रकार, प्रजा उत्पन्न करने के विचार में लगे उन पुत्रों के पास भी मुनि नारद पहुँचे, और पूर्ववत् उन्हें वही रहस्यमय वचन कहे।
श्लोक 30 (bhagavata.6.5.30)
दाक्षायणाः संशृणुत गदतो निगमं मम । अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातृणां भ्रातृवत्सलाः ॥ ३० ॥
dākṣāyaṇāḥ saṁśṛṇuta gadato nigamaṁ mama anvicchatānupadavīṁ bhrātṝṇāṁ bhrātṛ-vatsalāḥ
हे दक्ष के पुत्रो! मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो। अपने भाइयों के प्रति स्नेह रखने वाले तुम, उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करो।
श्लोक 31 (bhagavata.6.5.31)
भ्रातृणां प्रायणं भ्राता योऽनुतिष्ठति धर्मवित् । स पुण्यबन्धुः पुरुषो मरुद्भिः सह मोदते ॥ ३१ ॥
bhrātṝṇāṁ prāyaṇaṁ bhrātā yo ’nutiṣṭhati dharmavit sa puṇya-bandhuḥ puruṣo marudbhiḥ saha modate
जो धर्मज्ञ भाई अपने भाइयों के मार्ग का अनुसरण करता है, वह पुण्यशाली सहोदर मरुद्गणों के साथ आनंद करता है।
श्लोक 32 (bhagavata.6.5.32)
एतावदुक्त्वा प्रययौ नारदोऽमोघदर्शनः । तेऽपि चान्वगमन् मार्गं भ्रातृणामेव मारिष ॥ ३२ ॥
etāvad uktvā prayayau nārado ’mogha-darśanaḥ te ’pi cānvagaman mārgaṁ bhrātṝṇām eva māriṣa
हे माननीय! इतना कहकर, जिनकी दृष्टि कभी निष्फल नहीं जाती, वे नारद वहाँ से चले गए; और वे पुत्र भी अपने भाइयों के ही मार्ग पर चल पड़े।
श्लोक 33 (bhagavata.6.5.33)
सध्रीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुपथं गताः । नाद्यापि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव ॥ ३३ ॥
sadhrīcīnaṁ pratīcīnaṁ parasyānupathaṁ gatāḥ nādyāpi te nivartante paścimā yāminīr iva
वे उस सत्य, कल्याणकारी और परम पद तक पहुँचाने वाले मार्ग पर चल पड़े, और आज तक लौटकर नहीं आए — जैसे बीती हुई रात्रियाँ कभी नहीं लौटतीं।
श्लोक 34 (bhagavata.6.5.34)
एतस्मिन् काल उत्पातान् बहून् पश्यन् प्रजापतिः । पूर्ववन्नारदकृतं पुत्रनाशमुपाशृणोत् ॥ ३४ ॥
etasmin kāla utpātān bahūn paśyan prajāpatiḥ pūrvavan nārada-kṛtaṁ putra-nāśam upāśṛṇot
उसी समय, अनेक अपशकुनों को देखते हुए, प्रजापति दक्ष ने यह भी सुना कि नारद के कारण, पहले की भाँति, उनके इन पुत्रों का भी वैसा ही हश्र हुआ।
श्लोक 35 (bhagavata.6.5.35)
चुक्रोध नारदायासौ पुत्रशोकविमूर्च्छितः । देवर्षिमुपलभ्याह रोषाद्विस्फुरिताधरः ॥ ३५ ॥
cukrodha nāradāyāsau putra-śoka-vimūrcchitaḥ devarṣim upalabhyāha roṣād visphuritādharaḥ
पुत्र-शोक से मूर्च्छित होकर वह नारद पर अत्यंत क्रोधित हो उठे; देवर्षि को पाकर, क्रोध से काँपते हुए ओठों के साथ वे इस प्रकार बोले।
श्लोक 36 (bhagavata.6.5.36)
श्रीदक्ष उवाच अहो असाधो साधूनां साधुलिङ्गेन नस्त्वया । असाध्वकार्यर्भकाणां भिक्षोर्मार्गः प्रदर्शितः ॥ ३६ ॥
śrī-dakṣa uvāca aho asādho sādhūnāṁ sādhu-liṅgena nas tvayā asādhv akāry arbhakāṇāṁ bhikṣor mārgaḥ pradarśitaḥ
श्री दक्ष ने कहा — अरे दुष्ट, तू साधुओं के वेश में स्वयं असाधु है! तूने हमारे भोले-भाले बालकों को भिक्षुक का मार्ग दिखाकर हमारे साथ यह अनुचित कार्य किया है।
श्लोक 37 (bhagavata.6.5.37)
ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानाममीमांसितकर्मणाम् । विघातः श्रेयसः पाप लोकयोरुभयोः कृतः ॥ ३७ ॥
ṛṇais tribhir amuktānām amīmāṁsita-karmaṇām vighātaḥ śreyasaḥ pāpa lokayor ubhayoḥ kṛtaḥ
वे अभी तीन ऋणों से मुक्त भी नहीं हुए थे, और अपने कर्तव्य पर विचार भी नहीं कर पाए थे — हे पापी! तूने दोनों लोकों में उनके कल्याण का विनाश कर दिया।
श्लोक 38 (bhagavata.6.5.38)
एवं त्वं निरनुक्रोशो बालानां मतिभिद्धरेः । पार्षदमध्ये चरसि यशोहा निरपत्रपः ॥ ३८ ॥
evaṁ tvaṁ niranukrośo bālānāṁ mati-bhid dhareḥ pārṣada-madhye carasi yaśo-hā nirapatrapaḥ
इस प्रकार, बालकों के प्रति निर्दयी होकर उनकी बुद्धि को भ्रष्ट करने वाला तू, भगवान् के पार्षदों के बीच विचरण करता है, और निर्लज्ज होकर उनकी कीर्ति को भी कलंकित करता है।
श्लोक 39 (bhagavata.6.5.39)
ननु भागवता नित्यं भूतानुग्रहकातराः । ऋते त्वां सौहृदघ्नं वै वैरङ्करमवैरिणाम् ॥ ३९ ॥
nanu bhāgavatā nityaṁ bhūtānugraha-kātarāḥ ṛte tvāṁ sauhṛda-ghnaṁ vai vairaṅ-karam avairiṇām
भगवान् के सभी भक्त सदा प्राणियों पर कृपा करने के लिए उत्सुक रहते हैं — तेरे सिवाय, जो मित्रता का नाश करने वाला और निर्दोष जनों से भी शत्रुता उत्पन्न करने वाला है।
श्लोक 40 (bhagavata.6.5.40)
नेत्थं पुंसां विरागः स्यात् त्वया केवलिना मृषा । मन्यसे यद्युपशमं स्नेहपाशनिकृन्तनम् ॥ ४० ॥
netthaṁ puṁsāṁ virāgaḥ syāt tvayā kevalinā mṛṣā manyase yady upaśamaṁ sneha-pāśa-nikṛntanam
यदि तू यह मानता है कि तूने उनके स्नेह-बंधन काटकर उन्हें वैराग्य दिया है, तो यह मिथ्या है — इस प्रकार, केवल अपनी बात से, मनुष्यों में सच्चा वैराग्य उत्पन्न नहीं हो सकता।
श्लोक 41 (bhagavata.6.5.41)
नानुभूय न जानाति पुमान् विषयतीक्ष्णताम् । निर्विद्यते स्वयं तस्मान्न तथा भिन्नधीः परैः ॥ ४१ ॥
nānubhūya na jānāti pumān viṣaya-tīkṣṇatām nirvidyate svayaṁ tasmān na tathā bhinna-dhīḥ paraiḥ
बिना स्वयं अनुभव किए मनुष्य विषयों की तीव्रता को नहीं जान पाता; जब वह स्वयं अनुभव करता है, तभी सच्चा वैराग्य होता है — दूसरों के द्वारा बुद्धि बदल देने से वैसा वैराग्य नहीं होता।
श्लोक 42 (bhagavata.6.5.42)
यन्नस्त्वं कर्मसन्धानां साधूनां गृहमेधिनाम् । कृतवानसि दुर्मर्षं विप्रियं तव मर्षितम् ॥ ४२ ॥
yan nas tvaṁ karma-sandhānāṁ sādhūnāṁ gṛhamedhinām kṛtavān asi durmarṣaṁ vipriyaṁ tava marṣitam
हम गृहस्थ होते हुए भी, अपने कर्तव्य-कर्मों का सम्यक् निर्वाह करने वाले सच्चरित्र लोग हैं — फिर भी तूने हमारे साथ यह असह्य अप्रिय कार्य किया, जिसे अब तक सहन किया गया है।
श्लोक 43 (bhagavata.6.5.43)
तन्तुकृन्तन यन्नस्त्वमभद्रमचरः पुनः । तस्माल्लोकेषु ते मूढ न भवेद्भ्रमतः पदम् ॥ ४३ ॥
tantu-kṛntana yan nas tvam abhadram acaraḥ punaḥ tasmāl lokeṣu te mūḍha na bhaved bhramataḥ padam
हे वंश-सूत्र को काटने वाले! तूने हमारे साथ यह अशुभ कार्य फिर से किया है। इसलिए, हे मूर्ख! तू सदा भ्रमण करता रहेगा, परंतु किसी भी लोक में तुझे स्थायी निवास न मिलेगा।
श्लोक 44 (bhagavata.6.5.44)
श्रीशुक उवाच प्रतिजग्राह तद्बाढं नारदः साधुसम्मतः । एतावान्साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वरः स्वयम् ॥ ४४ ॥
śrī-śuka uvāca pratijagrāha tad bāḍhaṁ nāradaḥ sādhu-sammataḥ etāvān sādhu-vādo hi titikṣeteśvaraḥ svayam
श्रीशुक ने कहा — साधुजनों द्वारा सम्मानित नारद ने उस शाप को सहर्ष स्वीकार करते हुए कहा, 'ऐसा ही हो।' यही सच्चे साधु का लक्षण है, कि वह स्वयं समर्थ होते हुए भी सहनशीलता धारण करता है।