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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3

गजेन्द्र की शरणागति-स्तुति

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (bhagavata.8.3.1)

श्रीबादरायणिरुवाच एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि । जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥ 3.1 ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca evaṁ vyavasito buddhyā samādhāya mano hṛdi jajāpa paramaṁ jāpyaṁ prāg-janmany anuśikṣitam

श्रीबादरायणि (शुकदेव) ने कहा — इस प्रकार बुद्धि से दृढ़ निश्चय कर, मन को हृदय में स्थिर करके, गजेन्द्र ने उस परम मन्त्र का जप किया जो उसने पूर्वजन्म में सीखा था।

श्लोक 2 (bhagavata.8.3.2)

श्रीगजेन्द्र उवाच ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् । पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥ 3.2 ॥

śrī-gajendra uvāca oṁ namo bhagavate tasmai yata etac cid-ātmakam puruṣāyādi-bījāya pareśāyābhidhīmahi

गजेन्द्र ने कहा — ॐ, उन भगवान को नमस्कार, जिनसे यह चेतन-अचेतनमय जगत् उत्पन्न हुआ है; हम उन परमपुरुष, सृष्टि के आदि बीज, परमेश्वर का ध्यान करते हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.8.3.3)

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् । योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ 3.3 ॥

yasminn idaṁ yataś cedaṁ yenedaṁ ya idaṁ svayam yo ’smāt parasmāc ca paras taṁ prapadye svayambhuvam

जिनमें यह सब स्थित है, जिनसे यह उत्पन्न होता है, जिनके द्वारा यह धारण किया जाता है, जो स्वयं ही यह जगत् हैं, और जो उस परम से भी परे हैं — उन स्वयंभू की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

श्लोक 4 (bhagavata.8.3.4)

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद् विभातं क्व च तत् तिरोहितम् । अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः ॥ 3.4 ॥

yaḥ svātmanīdaṁ nija-māyayārpitaṁ kvacid vibhātaṁ kva ca tat tirohitam aviddha-dṛk sākṣy ubhayaṁ tad īkṣate sa ātma-mūlo ’vatu māṁ parāt-paraḥ

जो अपनी माया से अपने ही स्वरूप में इस जगत् को कभी प्रकट करते हैं और कभी छिपा देते हैं, तथा जो अपनी अखण्ड दृष्टि से साक्षी रूप में दोनों अवस्थाओं को देखते हैं — वे परात्पर, समस्त आत्माओं के मूल भगवान मेरी रक्षा करें।

श्लोक 5 (bhagavata.8.3.5)

कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु । तमस्तदासीद् गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥ 3.5 ॥

kālena pañcatvam iteṣu kṛtsnaśo lokeṣu pāleṣu ca sarva-hetuṣu tamas tadāsīd gahanaṁ gabhīraṁ yas tasya pāre ’bhivirājate vibhuḥ

जब काल के प्रभाव से समस्त लोक, उनके पालक तथा समस्त कारण पंचत्व को प्राप्त हो जाते हैं, तब केवल घोर, गहन अन्धकार ही शेष रहता है — उस अन्धकार के पार वे सर्वशक्तिमान् प्रभु दीप्तिमान् रहते हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.8.3.6)

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु- र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् । यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥ 3.6 ॥

na yasya devā ṛṣayaḥ padaṁ vidur jantuḥ punaḥ ko ’rhati gantum īritum yathā naṭasyākṛtibhir viceṣṭato duratyayānukramaṇaḥ sa māvatu

जिनके पद को देवता और ऋषि भी नहीं जानते, तो साधारण प्राणी भला उसे कैसे पा सकता या वर्णन कर सकता है? जैसे किसी अभिनेता का वास्तविक स्वरूप उसके वेष और अभिनय से छिपा रहता है, वैसे ही जिनकी लीला का अनुसरण करना अत्यंत कठिन है — वे मेरी रक्षा करें।

श्लोक 7 (bhagavata.8.3.7)

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः । चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥ 3.7 ॥

didṛkṣavo yasya padaṁ sumaṅgalaṁ vimukta-saṅgā munayaḥ susādhavaḥ caranty aloka-vratam avraṇaṁ vane bhūtātma-bhūtāḥ suhṛdaḥ sa me gatiḥ

जिनके परम मंगलमय चरणों के दर्शन की इच्छा से आसक्तिरहित, सर्वभूतों के हितैषी, सबको अपने समान माननेवाले साधु-मुनिगण वन में लोकोत्तर व्रतों का निरंतर पालन करते हैं — वही मेरी गति हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.8.3.8)

न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा । तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ 3.8 ॥

na vidyate yasya ca janma karma vā na nāma-rūpe guṇa-doṣa eva vā tathāpi lokāpyaya-sambhavāya yaḥ sva-māyayā tāny anukālam ṛcchati

जिनका न कोई जन्म है, न कर्म, न नाम-रूप, न कोई गुण या दोष — फिर भी वे लोक की उत्पत्ति और संहार के लिए अपनी माया से समय-समय पर इन्हें धारण करते हैं।

श्लोक 9 (bhagavata.8.3.9)

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये । अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥ 3.9 ॥

tasmai namaḥ pareśāya brahmaṇe ’nanta-śaktaye arūpāyoru-rūpāya nama āścarya-karmaṇe

उन परमेश्वर, अनन्त शक्तिमान् ब्रह्म को नमस्कार; जो स्वयं निराकार होते हुए भी अनेक विराट रूप धारण करते हैं तथा जिनके कार्य अद्भुत हैं, उन्हें नमस्कार।

श्लोक 10 (bhagavata.8.3.10)

नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने । नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ 3.10 ॥

nama ātma-pradīpāya sākṣiṇe paramātmane namo girāṁ vidūrāya manasaś cetasām api

स्वयं-प्रकाश, साक्षी, परमात्मा को नमस्कार; जो वाणी, मन तथा चित्त की भी पहुँच से परे हैं, उन्हें नमस्कार।

श्लोक 11 (bhagavata.8.3.11)

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता । नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ 3.11 ॥

sattvena pratilabhyāya naiṣkarmyeṇa vipaścitā namaḥ kaivalya-nāthāya nirvāṇa-sukha-saṁvide

जो सत्त्वगुण द्वारा तथा नैष्कर्म्य के माध्यम से बुद्धिमान् पुरुषों द्वारा प्राप्त किए जाते हैं, उन कैवल्य के स्वामी, निर्वाण-सुख के ज्ञाता को नमस्कार।

श्लोक 12 (bhagavata.8.3.12)

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे । निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ 3.12 ॥

namaḥ śāntāya ghorāya mūḍhāya guṇa-dharmiṇe nirviśeṣāya sāmyāya namo jñāna-ghanāya ca

उनके शांत रूप, उग्र रूप तथा मूढ़-सदृश रूप को नमस्कार, जो गुणों को धारण करते हुए भी उनसे परे हैं; निर्विशेष, सम भाव वाले, ज्ञानघन स्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 13 (bhagavata.8.3.13)

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे । पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ 3.13 ॥

kṣetra-jñāya namas tubhyaṁ sarvādhyakṣāya sākṣiṇe puruṣāyātma-mūlāya mūla-prakṛtaye namaḥ

हे क्षेत्रज्ञ, सबके अध्यक्ष, साक्षीस्वरूप आपको नमस्कार; आत्माओं के मूल पुरुष, मूल प्रकृतिस्वरूप आपको नमस्कार।

श्लोक 14 (bhagavata.8.3.14)

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे । असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥ 3.14 ॥

sarvendriya-guṇa-draṣṭre sarva-pratyaya-hetave asatā cchāyayoktāya sad-ābhāsāya te namaḥ

हे समस्त इन्द्रियों के विषयों के द्रष्टा, समस्त प्रतीतियों के कारण, जो असत् जगत् की छाया के द्वारा वर्णित होते हुए भी सत् के आभासस्वरूप हैं — आपको नमस्कार।

श्लोक 15 (bhagavata.8.3.15)

नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय । सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥ 3.15 ॥

namo namas te ’khila-kāraṇāya niṣkāraṇāyādbhuta-kāraṇāya sarvāgamāmnāya-mahārṇavāya namo ’pavargāya parāyaṇāya

आपको बारंबार नमस्कार, जो समस्त कारणों के कारण होते हुए भी स्वयं अकारण तथा अद्भुत कारण हैं; समस्त आगमों और परम्पराओं के महासागर, मोक्षदाता तथा परम आश्रय आपको नमस्कार।

श्लोक 16 (bhagavata.8.3.16)

गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय । नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम- स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ 3.16 ॥

guṇāraṇi-cchanna-cid-uṣmapāya tat-kṣobha-visphūrjita-mānasāya naiṣkarmya-bhāvena vivarjitāgama- svayaṁ-prakāśāya namas karomi

जिनकी चेतना अरणि-काष्ठ में छिपी अग्नि के समान गुणों में छिपी रहती है, तथा जिनका 'मन' उनके क्षोभ से प्रकट होता प्रतीत होता है; जो नैष्कर्म्य-भाव से शास्त्र-विधान से भी परे स्वयं-प्रकाशस्वरूप हैं — उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 17 (bhagavata.8.3.17)

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय । स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत- प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥ 3.17 ॥

mādṛk prapanna-paśu-pāśa-vimokṣaṇāya muktāya bhūri-karuṇāya namo ’layāya svāṁśena sarva-tanu-bhṛn-manasi pratīta- pratyag-dṛśe bhagavate bṛhate namas te

मुझ जैसे शरणागत पशु को बंधन से मुक्त करने वाले, सदा मुक्त, अत्यंत करुणामय, अविनाशी को नमस्कार; जो अपने अंश द्वारा प्रत्येक देहधारी के मन में अन्तःसाक्षी रूप में प्रतीत होते हैं, उन विराट भगवान को नमस्कार।

श्लोक 18 (bhagavata.8.3.18)

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै- र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय । मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥ 3.18 ॥

ātmātma-jāpta-gṛha-vitta-janeṣu saktair duṣprāpaṇāya guṇa-saṅga-vivarjitāya muktātmabhiḥ sva-hṛdaye paribhāvitāya jñānātmane bhagavate nama īśvarāya

जो स्वयं, सन्तान, परिजन, गृह, धन और लोगों में आसक्त पुरुषों के लिए दुष्प्राप्य हैं, तथा गुणों के संसर्ग से सर्वथा रहित हैं; मुक्तात्माओं द्वारा जो अपने ही हृदय में सतत ध्यान किए जाते हैं, उन ज्ञानस्वरूप भगवान ईश्वर को नमस्कार।

श्लोक 19 (bhagavata.8.3.19)

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति । किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ 3.19 ॥

yaṁ dharma-kāmārtha-vimukti-kāmā bhajanta iṣṭāṁ gatim āpnuvanti kiṁ cāśiṣo rāty api deham avyayaṁ karotu me ’dabhra-dayo vimokṣaṇam

जिनकी आराधना कर धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्ष के इच्छुक जन अपनी वांछित गति को प्राप्त करते हैं; जो वरदान और अविनाशी देह भी प्रदान करते हैं — वे अपार करुणामय प्रभु मुझे इस संकट से मुक्ति प्रदान करें।

श्लोक 20 (bhagavata.8.3.20)

एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः । अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥ 3.20 ॥

ekāntino yasya na kañcanārthaṁ vāñchanti ye vai bhagavat-prapannāḥ aty-adbhutaṁ tac-caritaṁ sumaṅgalaṁ gāyanta ānanda-samudra-magnāḥ

जिनके एकांतिक भक्त, भगवान की शरण में जाकर उनसे कुछ भी कामना नहीं करते, अपितु उनके अत्यंत अद्भुत, परम मंगलमय चरित्र का गान करते हुए आनन्द-सागर में निमग्न रहते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.8.3.21)

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश- मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् । अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर- मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥ 3.21 ॥

tam akṣaraṁ brahma paraṁ pareśam avyaktam ādhyātmika-yoga-gamyam atīndriyaṁ sūkṣmam ivātidūram anantam ādyaṁ paripūrṇam īḍe

मैं उस अक्षर ब्रह्म, परमेश्वर, अव्यक्त, अध्यात्म-योग द्वारा ही प्राप्य, इन्द्रियों से परे, सूक्ष्म, मानो अत्यंत दुर्गम्य, अनन्त, आदि तथा परिपूर्ण परमात्मा की स्तुति करता हूँ।

श्लोक 22 (bhagavata.8.3.22)

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः । नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ 3.22 ॥

yasya brahmādayo devā vedā lokāś carācarāḥ nāma-rūpa-vibhedena phalgvyā ca kalayā kṛtāḥ

जिनकी अत्यंत सूक्ष्म-सी कला मात्र से ब्रह्मा आदि देवगण, वेद, तथा चराचर सम्पूर्ण लोक नाम-रूप के भेद से रचे गए हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.8.3.23)

यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः । तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥ 3.23 ॥

yathārciṣo ’gneḥ savitur gabhastayo niryānti saṁyānty asakṛt sva-rociṣaḥ tathā yato ’yaṁ guṇa-sampravāho buddhir manaḥ khāni śarīra-sargāḥ

जैसे अग्नि की चिंगारियाँ या सूर्य की किरणें बार-बार अपने ही तेजस्वी स्रोत से निकलती और उसी में लीन होती हैं, वैसे ही उन्हीं से यह गुणों का प्रवाह — बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ तथा शरीरों की सृष्टि — बार-बार उत्पन्न और लीन होता रहता है।

श्लोक 24 (bhagavata.8.3.24)

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः । नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ 3.24 ॥

sa vai na devāsura-martya-tiryaṅ na strī na ṣaṇḍho na pumān na jantuḥ nāyaṁ guṇaḥ karma na san na cāsan niṣedha-śeṣo jayatād aśeṣaḥ

वे न देव हैं, न असुर, न मनुष्य, न पशु; न स्त्री हैं, न नपुंसक, न पुरुष, न कोई साधारण प्राणी; वे न कोई गुण हैं, न कर्म, न सत् हैं न असत् — केवल निषेध द्वारा ही जिनका बोध शेष रहता है, वे अनन्त भगवान सर्वत्र विजयी हों।

श्लोक 25 (bhagavata.8.3.25)

जिजीविषे नाहमिहामुया कि- मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या । इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव- स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥ 3.25 ॥

jijīviṣe nāham ihāmuyā kim antar bahiś cāvṛtayebha-yonyā icchāmi kālena na yasya viplavas tasyātma-lokāvaraṇasya mokṣam

मैं अब इस भीतर-बाहर अज्ञान से आवृत हाथी की योनि में जीवित रहने की इच्छा नहीं रखता; मैं केवल उस आत्मदर्शन के आवरण से मुक्ति चाहता हूँ, जो काल के द्वारा भी नष्ट नहीं होता।

श्लोक 26 (bhagavata.8.3.26)

सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम् । विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥ 3.26 ॥

so ’haṁ viśva-sṛjaṁ viśvam aviśvaṁ viśva-vedasam viśvātmānam ajaṁ brahma praṇato ’smi paraṁ padam

मैं उन विश्व के रचयिता, विश्वस्वरूप होते हुए भी विश्व से परे, सर्वज्ञ, विश्वात्मा, अजन्मा ब्रह्म, परम पद को प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 27 (bhagavata.8.3.27)

योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते । योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥ 3.27 ॥

yoga-randhita-karmāṇo hṛdi yoga-vibhāvite yogino yaṁ prapaśyanti yogeśaṁ taṁ nato ’smy aham

योग द्वारा जिनके कर्म भस्म हो चुके हैं, ऐसे योगीजन योग से प्रकाशित हृदय में जिनका दर्शन करते हैं, उन योगेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 28 (bhagavata.8.3.28)

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग- शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय । प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ 3.28 ॥

namo namas tubhyam asahya-vega- śakti-trayāyākhila-dhī-guṇāya prapanna-pālāya duranta-śaktaye kad-indriyāṇām anavāpya-vartmane

हे त्रिगुणों की असह्य वेगवती शक्ति वाले, समस्त बुद्धि के गुणस्वरूप, शरणागतों के रक्षक, अनन्त शक्तिशाली, तथा दुष्ट इन्द्रियों वालों के लिए अगम्य प्रभु, आपको बारंबार नमस्कार।

श्लोक 29 (bhagavata.8.3.29)

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम् । तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥ 3.29 ॥

nāyaṁ veda svam ātmānaṁ yac-chaktyāhaṁ-dhiyā hatam taṁ duratyaya-māhātmyaṁ bhagavantam ito ’smy aham

यह जीव, जिसकी दृष्टि उन्हीं की शक्ति से उत्पन्न अहंकार के कारण आवृत हो गई है, अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता; उन्हीं दुर्लंघ्य महिमा वाले भगवान की मैं शरण में जाता हूँ।

श्लोक 30 (bhagavata.8.3.30)

श्रीशुक उवाच एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः । नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात् तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥ 3.30 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ gajendram upavarṇita-nirviśeṣaṁ brahmādayo vividha-liṅga-bhidābhimānāḥ naite yadopasasṛpur nikhilātmakatvāt tatrākhilāmara-mayo harir āvirāsīt

शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार गजेन्द्र ने भगवान का वर्णन बिना किसी विशेष रूप का उल्लेख किए किया था, इसलिए अपने-अपने पृथक् रूपों के अभिमानी ब्रह्मा आदि देवता वहाँ नहीं आए; किन्तु चूँकि हरि सबकी आत्मा तथा समस्त देवताओं के स्वरूप हैं, वे स्वयं वहाँ प्रकट हो गए।

श्लोक 31 (bhagavata.8.3.31)

तं तद्वदार्तमुपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः । छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान- श्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥ 3.31 ॥

taṁ tadvad ārtam upalabhya jagan-nivāsaḥ stotraṁ niśamya divijaiḥ saha saṁstuvadbhiḥ chandomayena garuḍena samuhyamānaś cakrāyudho ’bhyagamad āśu yato gajendraḥ

गजेन्द्र को इस प्रकार पीड़ित जानकर तथा साथ-साथ स्तुति करते देवताओं सहित उसकी स्तुति सुनकर, जगन्निवास भगवान, छन्दस्वरूप गरुड़ पर आरूढ़ होकर, चक्र हाथ में लिए हुए, वहाँ शीघ्र आ पहुँचे जहाँ गजेन्द्र था।

श्लोक 32 (bhagavata.8.3.32)

सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् । उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा- न्नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥ 3.32 ॥

so ’ntaḥ-sarasy urubalena gṛhīta ārto dṛṣṭvā garutmati hariṁ kha upātta-cakram utkṣipya sāmbuja-karaṁ giramāha kṛcchrān nārāyaṇākhila-guro bhagavan namas te

सरोवर के भीतर उस प्रबल शक्ति द्वारा जकड़े हुए व्याकुल गजेन्द्र ने, गरुड़ पर आरूढ़, आकाश में चक्रधारी हरि को देखकर, कमल-पुष्प सहित अपनी सूँड़ को ऊपर उठाकर बड़ी कठिनाई से यह वाणी उच्चारित की — 'हे नारायण, हे अखिलगुरु, हे भगवन्, आपको नमस्कार।'

श्लोक 33 (bhagavata.8.3.33)

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार । ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं संपश्यतां हरिरमूमुचदुच्छ्रियाणाम् ॥ 3.33 ॥

taṁ vīkṣya pīḍitam ajaḥ sahasāvatīrya sa-grāham āśu sarasaḥ kṛpayojjahāra grāhād vipāṭita-mukhād ariṇā gajendraṁ saṁpaśyatāṁ harir amūmucad ucchriyāṇām

उसे इस प्रकार पीड़ित देखकर, अजन्मा भगवान तुरन्त नीचे उतरे और करुणावश ग्राह सहित गजेन्द्र को सरोवर से शीघ्र बाहर निकाला; फिर अपने चक्र से ग्राह का मुख चीरकर, समस्त उपस्थित महापुरुषों के देखते-देखते हरि ने गजेन्द्र को मुक्त कर दिया।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4