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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 9

भगवान का मोहिनी-मूर्ति रूप में अवतार

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (bhagavata.8.9.1)

श्रीशुक उवाच तेऽन्योन्यतोऽसुराः पात्रं हरन्तस्त्यक्तसौहृदाः । क्षिपन्तो दस्युधर्माण आयान्तीं ददृशुः स्त्रियम् ॥ 9.1 ॥

śrī-śuka uvāca te ’nyonyato ’surāḥ pātraṁ harantas tyakta-sauhṛdāḥ kṣipanto dasyu-dharmāṇa āyāntīṁ dadṛśuḥ striyam

श्री शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार असुर परस्पर मित्रता त्यागकर एक-दूसरे से अमृत-पात्र छीनने और फेंकने लगे। इसी बीच, चोरों के समान व्यवहार करते हुए वे एक अत्यंत सुंदर स्त्री को अपनी ओर आती देखने लगे।

श्लोक 2 (bhagavata.8.9.2)

अहो रूपमहो धाम अहो अस्या नवं वयः । इति ते तामभिद्रुत्य पप्रच्छुर्जातहृच्छयाः ॥ 9.2 ॥

aho rūpam aho dhāma aho asyā navaṁ vayaḥ iti te tām abhidrutya papracchur jāta-hṛc-chayāḥ

'अहा, कैसा अद्भुत रूप है! अहा, कैसी दिव्य कान्ति है! अहा, इसकी यह नवयौवन आयु कैसी है!' — ऐसा कहते हुए, हृदय में काम-भाव जगने से वे असुर उसकी ओर दौड़ पड़े और उससे प्रश्न पूछने लगे।

श्लोक 3 (bhagavata.8.9.3)

का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कुतो वा किं चिकीर्षसि । कस्यासि वद वामोरु मथ्नतीव मनांसि नः ॥ 9.3 ॥

kā tvaṁ kañja-palāśākṣi kuto vā kiṁ cikīrṣasi kasyāsi vada vāmoru mathnatīva manāṁsi naḥ

'हे कमलदल-नेत्री, तुम कौन हो? कहाँ से आई हो और यहाँ क्या करना चाहती हो? हे सुंदर जंघाओं वाली, बताओ तुम किसकी हो — तुम्हें देखकर तो मानो हमारे मन मथे जा रहे हैं।'

श्लोक 4 (bhagavata.8.9.4)

न वयं त्वामरैर्दैत्यैः सिद्धगन्धर्वचारणैः । नास्पृष्टपूर्वां जानीमो लोकेशैश्च कुतो नृभिः ॥ 9.4 ॥

na vayaṁ tvāmarair daityaiḥ siddha-gandharva-cāraṇaiḥ nāspṛṣṭa-pūrvāṁ jānīmo lokeśaiś ca kuto nṛbhiḥ

'हम जानते हैं कि तुम्हें आज तक न देवताओं ने, न दैत्यों ने, न सिद्धों-गन्धर्वों-चारणों ने और न ही लोकपालों ने कभी स्पर्श किया है — फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या!'

श्लोक 5 (bhagavata.8.9.5)

नूनं त्वं विधिना सुभ्रूः प्रेषितासि शरीरिणाम् । सर्वेन्द्रियमनःप्रीतिं विधातुं सघृणेन किम् ॥ 9.5 ॥

nūnaṁ tvaṁ vidhinā subhrūḥ preṣitāsi śarīriṇām sarvendriya-manaḥ-prītiṁ vidhātuṁ saghṛṇena kim

'हे सुंदर भौंहों वाली, निश्चय ही विधाता ने कृपापूर्वक तुम्हें देहधारियों की सभी इन्द्रियों और मन को प्रसन्न करने के लिए ही भेजा है — क्या यह सत्य नहीं?'

श्लोक 6 (bhagavata.8.9.6)

सा त्वं नः स्पर्धमानानामेकवस्तुनि मानिनि । ज्ञातीनां बद्धवैराणां शं विधत्स्व सुमध्यमे ॥ 9.6 ॥

sā tvaṁ naḥ spardhamānānām eka-vastuni mānini jñātīnāṁ baddha-vairāṇāṁ śaṁ vidhatsva sumadhyame

'हे मानिनी, हम सब एक ही वस्तु के लिए आपस में होड़ कर रहे बन्धु हैं जिनमें अब वैर बंध गया है। हे सुडौल कटि वाली, तुम ही हमारे इस विवाद को शांत करो।'

श्लोक 7 (bhagavata.8.9.7)

वयं कश्यपदायादा भ्रातरः कृतपौरुषाः । विभजस्व यथान्यायं नैव भेदो यथा भवेत् ॥ 9.7 ॥

vayaṁ kaśyapa-dāyādā bhrātaraḥ kṛta-pauruṣāḥ vibhajasva yathā-nyāyaṁ naiva bhedo yathā bhavet

'हम सब कश्यप मुनि की सन्तान होने के नाते भाई-भाई हैं, किन्तु अपने पौरुष के प्रदर्शन में लगे हैं। तुम इसे न्यायपूर्वक इस प्रकार बाँट दो कि हममें फिर कोई फूट न रहे।'

श्लोक 8 (bhagavata.8.9.8)

इत्युपामन्त्रितो दैत्यैर्मायायोषिद्वपुर्हरिः । प्रहस्य रुचिरापाङ्गैर्निरीक्षन्निदमब्रवीत् ॥ 9.8 ॥

ity upāmantrito daityair māyā-yoṣid-vapur hariḥ prahasya rucirāpāṅgair nirīkṣann idam abravīt

दैत्यों द्वारा इस प्रकार अनुरोध किए जाने पर, मायामयी स्त्री-रूप धारण किए हुए भगवान हरि मुस्कुराए और अपनी मनोहर चितवन से उन्हें निहारते हुए यह बोले।

श्लोक 9 (bhagavata.8.9.9)

श्रीभगवानुवाच कथं कश्यपदायादाः पुंश्चल्यां मयि सङ्गताः । विश्वासं पण्डितो जातु कामिनीषु न याति हि ॥ 9.9 ॥

śrī-bhagavān uvāca kathaṁ kaśyapa-dāyādāḥ puṁścalyāṁ mayi saṅgatāḥ viśvāsaṁ paṇḍito jātu kāminīṣu na yāti hi

श्री भगवान ने कहा — कश्यप की सन्तान होकर भी तुम मुझ जैसी एक चंचल स्त्री पर इतना विश्वास कैसे कर बैठे? कोई भी विवेकशील पुरुष कभी विषय-लोलुप स्त्रियों पर विश्वास नहीं करता।

श्लोक 10 (bhagavata.8.9.10)

सालावृकाणां स्त्रीणां च स्वैरिणीनां सुरद्विषः । सख्यान्याहुरनित्यानि नूत्नं नूत्नं विचिन्वताम् ॥ 9.10 ॥

sālāvṛkāṇāṁ strīṇāṁ ca svairiṇīnāṁ sura-dviṣaḥ sakhyāny āhur anityāni nūtnaṁ nūtnaṁ vicinvatām

'हे देवताओं के शत्रुओ, बुद्धिमान पुरुष कहते हैं कि भेड़ियों की तथा स्वच्छन्द विचरने वाली स्त्रियों की मैत्री कभी स्थायी नहीं होती, क्योंकि वे सदा नये-नये साथी की खोज में रहती हैं।'

श्लोक 11 (bhagavata.8.9.11)

श्रीशुक उवाच इति ते क्ष्वेलितैस्तस्या आश्वस्तमनसोऽसुराः । जहसुर्भावगम्भीरं ददुश्चामृतभाजनम् ॥ 9.11 ॥

śrī-śuka uvāca iti te kṣvelitais tasyā āśvasta-manaso ’surāḥ jahasur bhāva-gambhīraṁ daduś cāmṛta-bhājanam

श्री शुकदेव जी ने कहा — उस स्त्री के इन विनोदपूर्ण वचनों को सुनकर असुरों के मन में पूर्ण विश्वास जग गया। वे गम्भीरतापूर्वक हँस पड़े और उन्होंने अमृत का पात्र उसे सौंप दिया।

श्लोक 12 (bhagavata.8.9.12)

ततो गृहीत्वामृतभाजनं हरि- र्बभाष ईषत्स्मितशोभया गिरा । यद्यभ्युपेतं क्व च साध्वसाधु वा कृतं मया वो विभजे सुधामिमाम् ॥ 9.12 ॥

tato gṛhītvāmṛta-bhājanaṁ harir babhāṣa īṣat-smita-śobhayā girā yady abhyupetaṁ kva ca sādhv asādhu vā kṛtaṁ mayā vo vibhaje sudhām imām

तब अमृत-पात्र हाथ में लेकर भगवान हरि ने हल्की मुस्कान से सुशोभित वाणी में कहा — 'यदि तुम मेरे द्वारा किए गए हर कार्य को स्वीकार करो, चाहे वह उचित हो या अनुचित, तभी मैं तुम्हें यह अमृत बाँट सकती हूँ।'

श्लोक 13 (bhagavata.8.9.13)

इत्यभिव्याहृतं तस्या आकर्ण्यासुरपुङ्गवाः । अप्रमाणविदस्तस्यास्तत् तथेत्यन्वमंसत ॥ 9.13 ॥

ity abhivyāhṛtaṁ tasyā ākarṇyāsura-puṅgavāḥ apramāṇa-vidas tasyās tat tathety anvamaṁsata

उसकी यह बात सुनकर, विवेक-रहित असुर-श्रेष्ठों ने बिना कुछ और सोचे-समझे तुरंत ही 'हाँ, ऐसा ही हो' कहकर उसकी बात स्वीकार कर ली।

श्लोक 14 (bhagavata.8.9.14)

अथोपोष्य कृतस्नाना हुत्वा च हविषानलम् । दत्त्वा गोविप्रभूतेभ्यः कृतस्वस्त्ययना द्विजैः ॥ 9.14 ॥

athopoṣya kṛta-snānā hutvā ca haviṣānalam dattvā go-vipra-bhūtebhyaḥ kṛta-svastyayanā dvijaiḥ

तत्पश्चात् उन सबने उपवास रखा, स्नान किया, अग्नि में हवि की आहुति दी, गौओं, ब्राह्मणों तथा अन्य प्राणियों को दान दिया, और ब्राह्मणों से स्वस्ति-वाचन करवाया।

श्लोक 15 (bhagavata.8.9.15)

यथोपजोषं वासांसि परिधायाहतानि ते । कुशेषु प्राविशन्सर्वे प्रागग्रेष्वभिभूषिताः ॥ 9.15 ॥

yathopajoṣaṁ vāsāṁsi paridhāyāhatāni te kuśeṣu prāviśan sarve prāg-agreṣv abhibhūṣitāḥ

फिर वे सब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार नए वस्त्र धारण कर, आभूषणों से सुसज्जित होकर, पूर्वाभिमुख बिछाए गए कुश के आसनों पर जा बैठे।

श्लोक 16 (bhagavata.8.9.16)

प्राङ्मुखेषूपविष्टेषु सुरेषु दितिजेषु च । धूपामोदितशालायां जुष्टायां माल्यदीपकैः ॥ 9.16 ॥

prāṅ-mukheṣūpaviṣṭeṣu sureṣu ditijeṣu ca dhūpāmodita-śālāyāṁ juṣṭāyāṁ mālya-dīpakaiḥ

जब देवता और दैत्य दोनों पूर्वाभिमुख होकर उस मण्डप में बैठ गए, जो धूप की सुगन्ध से महक रहा था और पुष्पमालाओं तथा दीपकों से सज्जित था,

श्लोक 17 (bhagavata.8.9.17)

तस्यां नरेन्द्र करभोरुरुशद्दुकूल- श्रोणीतटालसगतिर्मदविह्वलाक्षी । सा कूजती कनकनूपुरशिञ्जितेन कुम्भस्तनी कलसपाणिरथाविवेश ॥ 9.17 ॥

tasyāṁ narendra karabhorur uśad-dukūla- śroṇī-taṭālasa-gatir mada-vihvalākṣī sā kūjatī kanaka-nūpura-śiñjitena kumbha-stanī kalasa-pāṇir athāviveśa

हे राजन्, तभी वह स्त्री उस मण्डप में प्रविष्ट हुई — उसकी जंघाएँ हाथी की सूँड़ जैसी सुडौल थीं, उजले रेशमी वस्त्र से ढके भारी नितम्बों के कारण उसकी चाल मन्थर थी, नेत्र यौवन के मद से चंचल थे, स्तन घट के समान थे, हाथ में कलश लिए वह स्वर्ण-नूपुरों की मधुर झंकार करती हुई भीतर आई।

श्लोक 18 (bhagavata.8.9.18)

तां श्रीसखीं कनककुण्डलचारुकर्ण- नासाकपोलवदनां परदेवताख्याम् । संवीक्ष्य सम्मुमुहुरुत्स्मितवीक्षणेन देवासुरा विगलितस्तनपट्टिकान्ताम् ॥ 9.18 ॥

tāṁ śrī-sakhīṁ kanaka-kuṇḍala-cāru-karṇa- nāsā-kapola-vadanāṁ para-devatākhyām saṁvīkṣya sammumuhur utsmita-vīkṣaṇena devāsurā vigalita-stana-paṭṭikāntām

स्वर्ण-कुण्डलों से सुशोभित कान, सुंदर नासिका, कपोल और मुख वाली, मानो लक्ष्मी की सखी जैसी उस परम सुंदरी को — जिसका वक्ष:स्थल पर लिपटा वस्त्र कुछ खिसक गया था और जो मन्द मुस्कान के साथ चितवन बिखेर रही थी — देखकर देवता और असुर दोनों ही पूर्णत: मोहित हो गए।

श्लोक 19 (bhagavata.8.9.19)

असुराणां सुधादानं सर्पाणामिव दुर्नयम् । मत्वा जातिनृशंसानां न तां व्यभजदच्युतः ॥ 9.19 ॥

asurāṇāṁ sudhā-dānaṁ sarpāṇām iva durnayam matvā jāti-nṛśaṁsānāṁ na tāṁ vyabhajad acyutaḥ

स्वभाव से ही क्रूर असुरों को अमृत देना सर्पों को दूध पिलाने जितना ही अनुचित समझकर, अच्युत भगवान ने उन्हें अमृत का भाग नहीं दिया।

श्लोक 20 (bhagavata.8.9.20)

कल्पयित्वा पृथक् पङ्क्तीरुभयेषां जगत्पतिः । तांश्चोपवेशयामास स्वेषु स्वेषु च पङ्क्तिषु ॥ 9.20 ॥

kalpayitvā pṛthak paṅktīr ubhayeṣāṁ jagat-patiḥ tāṁś copaveśayām āsa sveṣu sveṣu ca paṅktiṣu

जगत्पति भगवान ने देवताओं और असुरों दोनों की अलग-अलग पंक्तियाँ बनवा दीं और सबको अपनी-अपनी पंक्ति में बिठा दिया।

श्लोक 21 (bhagavata.8.9.21)

दैत्यान्गृहीतकलसो वञ्चयन्नुपसञ्चरैः । दूरस्थान् पाययामास जरामृत्युहरां सुधाम् ॥ 9.21 ॥

daityān gṛhīta-kalaso vañcayann upasañcaraiḥ dūra-sthān pāyayām āsa jarā-mṛtyu-harāṁ sudhām

कलश हाथ में लिए वह पहले दैत्यों के पास गई और मधुर बातों से उन्हें भरमाकर छल लिया, फिर दूर बैठे देवताओं को जरा और मृत्यु का नाश करने वाला वह अमृत पिलाया।

श्लोक 22 (bhagavata.8.9.22)

ते पालयन्तः समयमसुराः स्वकृतं नृप । तूष्णीमासन्कृतस्नेहाः स्त्रीविवादजुगुप्सया ॥ 9.22 ॥

te pālayantaḥ samayam asurāḥ sva-kṛtaṁ nṛpa tūṣṇīm āsan kṛta-snehāḥ strī-vivāda-jugupsayā

हे राजन्, अपनी ही दी हुई प्रतिज्ञा का पालन करते हुए और उससे मोहग्रस्त हो जाने के कारण, तथा एक स्त्री से विवाद करने में लज्जा का अनुभव करते हुए, असुर चुपचाप बैठे रहे।

श्लोक 23 (bhagavata.8.9.23)

तस्यां कृतातिप्रणयाः प्रणयापायकातराः । बहुमानेन चाबद्धा नोचुः किञ्चन विप्रियम् ॥ 9.23 ॥

tasyāṁ kṛtātipraṇayāḥ praṇayāpāya-kātarāḥ bahu-mānena cābaddhā nocuḥ kiñcana vipriyam

उस स्त्री के प्रति उनका अत्यधिक स्नेह हो गया था, और उसका स्नेह कहीं टूट न जाए इस भय से तथा उसके प्रति गहरे सम्मान के बंधन में बँधे होने से, असुरों ने उससे कोई अप्रिय बात नहीं कही।

श्लोक 24 (bhagavata.8.9.24)

देवलिङ्गप्रतिच्छन्नः स्वर्भानुर्देवसंसदि । प्रविष्टः सोममपिबच्चन्द्रार्काभ्यां च सूचितः ॥ 9.24 ॥

deva-liṅga-praticchannaḥ svarbhānur deva-saṁsadi praviṣṭaḥ somam apibac candrārkābhyāṁ ca sūcitaḥ

स्वर्भानु (राहु) नामक असुर देवता का वेश धारण कर देवताओं की सभा में घुस आया और अमृत पीने लगा; किन्तु चन्द्रमा और सूर्य ने, जो उससे शत्रुता रखते थे, उसे पहचान कर संकेत कर दिया।

श्लोक 25 (bhagavata.8.9.25)

चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबतः शिरः । हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोऽपतत् ॥ 9.25 ॥

cakreṇa kṣura-dhāreṇa jahāra pibataḥ śiraḥ haris tasya kabandhas tu sudhayāplāvito ’patat

भगवान हरि ने अपने छुरे-सी तीक्ष्ण धार वाले चक्र से पान करते हुए उस राहु का सिर काट डाला। उसका धड़ अमृत का स्पर्श न पाने के कारण गिरकर मृत हो गया।

श्लोक 26 (bhagavata.8.9.26)

शिरस्त्वमरतां नीतमजो ग्रहमचीक्लृपत् । यस्तु पर्वणि चन्द्रार्कावभिधावति वैरधीः ॥ 9.26 ॥

śiras tv amaratāṁ nītam ajo graham acīkḷpat yas tu parvaṇi candrārkāv abhidhāvati vaira-dhīḥ

किन्तु उसका सिर अमृत का स्पर्श पा चुका था, अतः अमर हो गया, और ब्रह्मा जी ने उसे एक ग्रह के रूप में स्थापित कर दिया। यही राहु अपने पुराने वैर के कारण पूर्णिमा और अमावस्या के दिनों में चन्द्रमा और सूर्य पर आक्रमण करने दौड़ता है।

श्लोक 27 (bhagavata.8.9.27)

पीतप्रायेऽमृते देवैर्भगवान् लोकभावनः । पश्यतामसुरेन्द्राणां स्वं रूपं जगृहे हरिः ॥ 9.27 ॥

pīta-prāye ’mṛte devair bhagavān loka-bhāvanaḥ paśyatām asurendrāṇāṁ svaṁ rūpaṁ jagṛhe hariḥ

जब देवताओं द्वारा अमृत लगभग पूरा पी लिया गया, तब समस्त लोकों का पालन करने वाले भगवान हरि ने असुर-प्रमुखों के देखते-देखते ही अपना वास्तविक रूप प्रकट कर दिया।

श्लोक 28 (bhagavata.8.9.28)

एवं सुरासुरगणाः समदेशकाल- हेत्वर्थकर्ममतयोऽपि फले विकल्पाः । तत्रामृतं सुरगणाः फलमञ्जसापु- र्यत्पादपङ्कजरजःश्रयणान्न दैत्याः ॥ 9.28 ॥

evaṁ surāsura-gaṇāḥ sama-deśa-kāla- hetv-artha-karma-matayo ’pi phale vikalpāḥ tatrāmṛtaṁ sura-gaṇāḥ phalam añjasāpur yat-pāda-paṅkaja-rajaḥ-śrayaṇān na daityāḥ

इस प्रकार देवताओं और असुरों के लिए स्थान, समय, हेतु, उद्देश्य और कर्म सब समान होते हुए भी, फल में भेद हो गया। देवगण उस अमृत के फल को सहज ही प्राप्त कर सके, क्योंकि वे भगवान के चरण-कमलों की रज का आश्रय लिए हुए थे, जबकि असुर उस आश्रय से रहित होने के कारण उस फल को नहीं पा सके।

श्लोक 29 (bhagavata.8.9.29)

यद् युज्यतेऽसुवसुकर्ममनोवचोभि- र्देहात्मजादिषु नृभिस्तदसत् पृथक्त्वात् । तैरेव सद् भवति यत् क्रियतेऽपृथक्त्वात् सर्वस्य तद् भवति मूलनिषेचनं यत् ॥ 9.29 ॥

yad yujyate ’su-vasu-karma-mano-vacobhir dehātmajādiṣu nṛbhis tad asat pṛthaktvāt tair eva sad bhavati yat kriyate ’pṛthaktvāt sarvasya tad bhavati mūla-niṣecanaṁ yat

मनुष्य अपने प्राण, धन, कर्म, मन और वाणी से जो कुछ भी शरीर, पुत्र आदि के लिए करता है, वह पृथकता — अर्थात् भगवान से विमुख भाव — के कारण असत् (निष्फल) ही रहता है। किन्तु वही सब कुछ, जब अभिन्न भाव से अर्थात् भगवान की सेवा के रूप में किया जाता है, तो सत्य फल देने वाला बन जाता है — ठीक उसी प्रकार जैसे वृक्ष की जड़ में डाला गया जल सम्पूर्ण वृक्ष तक पहुँच जाता है।

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