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नवम स्कन्ध · अध्याय 14

राजा पुरूरवा और उर्वशी

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (bhagavata.9.14.1)

श्रीशुक उवाच अथातः श्रुयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः । यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca athātaḥ śrūyatāṁ rājan vaṁśaḥ somasya pāvanaḥ yasminn ailādayo bhūpāḥ kīrtyante puṇya-kīrtayaḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — हे राजन्, अब चंद्रवंश का पावन वर्णन सुनो, जिसमें ऐल (पुरूरवा) जैसे पुण्यकीर्ति राजाओं का वर्णन है।

श्लोक 2 (bhagavata.9.14.2)

सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रदसरोरुहात् । जातस्यासीत् सुतो धातुरत्रिः पितृसमो गुणैः ॥ २ ॥

sahasra-śirasaḥ puṁso nābhi-hrada-saroruhāt jātasyāsīt suto dhātur atriḥ pitṛ-samo guṇaiḥ

सहस्रशीर्ष पुरुष की नाभि-सरोवर से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए; उनके पुत्र अत्रि पिता के समान ही गुणसंपन्न थे।

श्लोक 3 (bhagavata.9.14.3)

तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल । विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥ ३ ॥

tasya dṛgbhyo ’bhavat putraḥ somo ’mṛtamayaḥ kila viprauṣadhy-uḍu-gaṇānāṁ brahmaṇā kalpitaḥ patiḥ

उनके नेत्रों से अमृतमय सोम (चंद्रमा) नामक पुत्र उत्पन्न हुए; ब्रह्मा ने उन्हें ब्राह्मणों, औषधियों और नक्षत्रों का स्वामी नियुक्त किया।

श्लोक 4 (bhagavata.9.14.4)

सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम् । पत्नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात् ॥ ४ ॥

so ’yajad rājasūyena vijitya bhuvana-trayam patnīṁ bṛhaspater darpāt tārāṁ nāmāharad balāt

तीनों लोकों को जीतकर सोम ने राजसूय यज्ञ किया; तत्पश्चात अहंकारवश उन्होंने बृहस्पति की पत्नी तारा का बलपूर्वक अपहरण कर लिया।

श्लोक 5 (bhagavata.9.14.5)

यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात् । नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः ॥ ५ ॥

yadā sa deva-guruṇā yācito ’bhīkṣṇaśo madāt nātyajat tat-kṛte jajñe sura-dānava-vigrahaḥ

देवगुरु द्वारा बार-बार माँगे जाने पर भी घमंड में सोम ने तारा को न लौटाया; इसी कारण देवताओं और दानवों के बीच युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 6 (bhagavata.9.14.6)

शुक्रो बृहस्पतेर्द्वेषादग्रहीत् सासुरोडुपम् । हरो गुरुसुतं स्नेहात् सर्वभूतगणावृतः ॥ ६ ॥

śukro bṛhaspater dveṣād agrahīt sāsuroḍupam haro guru-sutaṁ snehāt sarva-bhūta-gaṇāvṛtaḥ

शुक्राचार्य ने बृहस्पति से द्वेषवश दानवों सहित सोम का पक्ष लिया; शिव ने अपने गुरु-पुत्र (बृहस्पति) के प्रति स्नेहवश समस्त भूतगणों सहित उनका साथ दिया।

श्लोक 7 (bhagavata.9.14.7)

सर्वदेवगणोपेतो महेन्द्रो गुरुमन्वयात् । सुरासुरविनाशोऽभूत् समरस्तारकामयः ॥ ७ ॥

sarva-deva-gaṇopeto mahendro gurum anvayāt surāsura-vināśo ’bhūt samaras tārakāmayaḥ

समस्त देवगणों सहित महेंद्र ने भी बृहस्पति का अनुसरण किया; इस प्रकार केवल तारा के लिए देवताओं और असुरों का विनाशकारी युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 8 (bhagavata.9.14.8)

निवेदितोऽथाङ्गिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत् । तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छदन्तर्वत्नीमवैत् पतिः ॥ ८ ॥

nivedito ’thāṅgirasā somaṁ nirbhartsya viśva-kṛt tārāṁ sva-bhartre prāyacchad antarvatnīm avait patiḥ

जब अंगिरा ने सारी बात ब्रह्मा को बताई, तो विश्वकर्ता ब्रह्मा ने सोम को कड़ी फटकार लगाई और तारा को उसके पति को लौटा दिया, तब पति को उसकी गर्भावस्था का पता चला।

श्लोक 9 (bhagavata.9.14.9)

त्यज त्यजाशु दुष्प्रज्ञे मत्क्षेत्रादाहितं परैः । नाहं त्वां भस्मसात् कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकेऽसति ॥ ९ ॥

tyaja tyajāśu duṣprajñe mat-kṣetrād āhitaṁ paraiḥ nāhaṁ tvāṁ bhasmasāt kuryāṁ striyaṁ sāntānike ’sati

बृहस्पति ने कहा — 'हे दुर्बुद्धि! त्याग दो, शीघ्र त्याग दो इसे, जो दूसरे ने मेरे क्षेत्र में स्थापित किया है। संतान की कामना से ही सही, अपवित्र होते हुए भी मैं तुझे भस्म नहीं करूँगा।'

श्लोक 10 (bhagavata.9.14.10)

तत्याज व्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम् । स्पृहामाङ्गिरसश्चक्रे कुमारे सोम एव च ॥ १० ॥

tatyāja vrīḍitā tārā kumāraṁ kanaka-prabham spṛhām āṅgirasaś cakre kumāre soma eva ca

लज्जित तारा ने तुरंत ही स्वर्णकांतिमय उस बालक को जन्म दिया; बृहस्पति और सोम दोनों ही उस बालक को पाने के इच्छुक हो उठे।

श्लोक 11 (bhagavata.9.14.11)

ममायं न तवेत्युच्चैस्तस्मिन् विवदमानयोः । पप्रच्छुऋर्षयो देवा नैवोचे व्रीडिता तु सा ॥ ११ ॥

mamāyaṁ na tavety uccais tasmin vivadamānayoḥ papracchur ṛṣayo devā naivoce vrīḍitā tu sā

'यह मेरा है, तुम्हारा नहीं' — इस प्रकार ऊँचे स्वर में विवाद करते हुए उन दोनों से ऋषियों और देवताओं ने पूछा, किंतु लज्जित तारा कुछ न बोल सकीं।

श्लोक 12 (bhagavata.9.14.12)

कुमारो मातरं प्राह कुपितोऽलीकलज्जया । किं न वचस्यसद् वृत्ते आत्मावद्यं वदाशु मे ॥ १२ ॥

kumāro mātaraṁ prāha kupito ’līka-lajjayā kiṁ na vacasy asad-vṛtte ātmāvadyaṁ vadāśu me

बालक ने स्वयं क्रुद्ध होकर अपनी माता से कहा — 'हे कुलटा, व्यर्थ की लज्जा से क्या लाभ? अपना दोष क्यों नहीं बताती? शीघ्र मुझे सच बता दो।'

श्लोक 13 (bhagavata.9.14.13)

ब्रह्मा तां रह आहूय समप्राक्षीच्च सान्त्वयन् । सोमस्येत्याह शनकैः सोमस्तं तावदग्रहीत् ॥ १३ ॥

brahmā tāṁ raha āhūya samaprākṣīc ca sāntvayan somasyety āha śanakaiḥ somas taṁ tāvad agrahīt

ब्रह्मा ने तारा को एकांत में बुलाकर सांत्वना देते हुए पूछा; तब उसने धीरे से कहा, 'यह सोम का पुत्र है।' सोम ने तत्काल उस बालक को अपना लिया।

श्लोक 14 (bhagavata.9.14.14)

तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप । बुद्ध्या गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण्मुदम् ॥ १४ ॥

tasyātma-yonir akṛta budha ity abhidhāṁ nṛpa buddhyā gambhīrayā yena putreṇāpoḍurāṇ mudam

हे राजन्, ब्रह्मा ने उस बालक की गहन बुद्धि देखकर उसका नाम बुध रखा; इस पुत्र से नक्षत्रपति सोम को अत्यंत हर्ष प्राप्त हुआ।

श्लोक 15 (bhagavata.9.14.15)

ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां य उदाहृतः । तस्य रूपगुणौदार्यशीलद्रविणविक्रमान् ॥ १५ ॥

tataḥ purūravā jajñe ilāyāṁ ya udāhṛtaḥ tasya rūpa-guṇaudārya- śīla-draviṇa-vikramān

उनसे इला के गर्भ से पुरूरवा उत्पन्न हुए, जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है। उनके रूप, गुण, उदारता, शील, धन और पराक्रम की —

श्लोक 16 (bhagavata.9.14.16)

श्रुत्वोर्वशीन्द्रभवने गीयमानान् सुरर्षिणा । तदन्तिकमुपेयाय देवी स्मरशरार्दिता ॥ १६ ॥

śrutvorvaśīndra-bhavane gīyamānān surarṣiṇā tad-antikam upeyāya devī smara-śarārditā

— देवर्षि नारद द्वारा इंद्रसभा में की गई प्रशंसा सुनकर, कामबाण से पीड़ित देवी उर्वशी उनके समीप आ पहुँचीं।

श्लोक 17 (bhagavata.9.14.17)

मित्रावरुणयोः शापादापन्ना नरलोकताम् । निशम्य पुरुषश्रेष्ठं कन्दर्पमिव रूपिणम् । धृतिं विष्टभ्य ललना उपतस्थे तदन्तिके ॥ १७ ॥

mitrā-varuṇayoḥ śāpād āpannā nara-lokatām niśamya puruṣa-śreṣṭhaṁ kandarpam iva rūpiṇam

मित्र-वरुण के शाप से मनुष्यत्व को प्राप्त हुई उर्वशी, कामदेव के समान सुंदर उस पुरुषश्रेष्ठ के विषय में सुनकर —

श्लोक 18 (bhagavata.9.14.18)

स तां विलोक्य नृपतिर्हर्षेणोत्फुल्ललोचनः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा देवीं हृष्टतनूरुहः ॥ १८ ॥

dhṛtiṁ viṣṭabhya lalanā upatasthe tad-antike sa tāṁ vilokya nṛpatir harṣeṇotphulla-locanaḥ uvāca ślakṣṇayā vācā devīṁ hṛṣṭa-tanūruhaḥ

— स्वयं को संयत कर एक स्त्री की भाँति उनके समीप गईं। उन्हें देखकर हर्ष से नेत्र खिल उठे और रोमांचित शरीर वाले राजा ने कोमल वाणी में देवी से यह कहा।

श्लोक 19 (bhagavata.9.14.19)

श्रीराजोवाच स्वागतं ते वरारोहे आस्यतां करवाम किम् । संरमस्व मया साकं रतिर्नौ शाश्वतीः समाः ॥ १९ ॥

śrī-rājovāca svāgataṁ te varārohe āsyatāṁ karavāma kim saṁramasva mayā sākaṁ ratir nau śāśvatīḥ samāḥ

राजा ने कहा — 'हे वरारोहे, तुम्हारा स्वागत है; बैठो, बताओ मैं क्या करूँ? मेरे साथ रमण करो, हमारा प्रेम युगों-युगों तक बना रहे।'

श्लोक 20 (bhagavata.9.14.20)

उर्वश्युवाच कस्यास्त्वयि न सज्जेत मनो दृष्टिश्च सुन्दर । यदङ्गान्तरमासाद्य च्यवते ह रिरंसया ॥ २० ॥

urvaśy uvāca kasyās tvayi na sajjeta mano dṛṣṭiś ca sundara yad-aṅgāntaram āsādya cyavate ha riraṁsayā

उर्वशी ने कहा — 'हे सुंदर! तुम्हें देखकर किस स्त्री का मन और दृष्टि आसक्त न होगी? जो स्त्री तुम्हारे वक्षस्थल का सान्निध्य पा ले, वह रमण की इच्छा से विचलित हुए बिना नहीं रह सकती।'

श्लोक 21 (bhagavata.9.14.21)

एतावुरणकौ राजन् न्यासौ रक्षस्व मानद । संरंस्ये भवता साकं श्लाघ्यः स्त्रीणां वरः स्मृतः ॥ २१ ॥

etāv uraṇakau rājan nyāsau rakṣasva mānada saṁraṁsye bhavatā sākaṁ ślāghyaḥ strīṇāṁ varaḥ smṛtaḥ

'हे राजन्, हे मानद! मेरे इन दोनों मेमनों की धरोहर के रूप में रक्षा करो। मैं तुम्हारे साथ रमण करूँगी, क्योंकि तुम स्त्रियों के प्रशंसनीय वर के रूप में विख्यात हो।'

श्लोक 22 (bhagavata.9.14.22)

घृतं मे वीर भक्ष्यं स्यान्नेक्षे त्वान्यत्र मैथुनात् । विवाससं तत् तथेति प्रतिपेदे महामनाः ॥ २२ ॥

ghṛtaṁ me vīra bhakṣyaṁ syān nekṣe tvānyatra maithunāt vivāsasaṁ tat tatheti pratipede mahāmanāḥ

'हे वीर, केवल घृत में बना भोजन ही मेरा आहार हो, और मैथुन के अतिरिक्त कभी तुम्हें निर्वस्त्र न देखूँ।' महामना राजा ने 'तथास्तु' कहकर इसे स्वीकार किया।

श्लोक 23 (bhagavata.9.14.23)

अहो रूपमहो भावो नरलोकविमोहनम् । को न सेवेत मनुजो देवीं त्वां स्वयमागताम् ॥ २३ ॥

aho rūpam aho bhāvo nara-loka-vimohanam ko na seveta manujo devīṁ tvāṁ svayam āgatām

राजा ने कहा — 'अहो! कैसा रूप, कैसी छवि, जो समस्त मनुष्यलोक को मोहित करने वाली है! जो देवी तुम स्वयं आई हो, तुम्हारी सेवा कौन मनुष्य न करेगा?'

श्लोक 24 (bhagavata.9.14.24)

तया स पुरुषश्रेष्ठो रमयन्त्या यथार्हतः । रेमे सुरविहारेषु कामं चैत्ररथादिषु ॥ २४ ॥

tayā sa puruṣa-śreṣṭho ramayantyā yathārhataḥ reme sura-vihāreṣu kāmaṁ caitrarathādiṣu

श्रीशुकदेव जी ने कहा — वह पुरुषश्रेष्ठ पुरूरवा उर्वशी के साथ यथोचित रमण करते हुए चैत्ररथ आदि देव-विहार-स्थलों में इच्छानुसार आनंद करने लगे।

श्लोक 25 (bhagavata.9.14.25)

रममाणस्तया देव्या पद्मकिञ्जल्कगन्धया । तन्मुखामोदमुषितो मुमुदेऽहर्गणान् बहून् ॥ २५ ॥

ramamāṇas tayā devyā padma-kiñjalka-gandhayā tan-mukhāmoda-muṣito mumude ’har-gaṇān bahūn

कमल-केसर के समान सुगंधित उस देवी के साथ रमण करते हुए, उसके मुख की सुगंध से मोहित पुरूरवा अनेक दिनों तक हर्षपूर्वक आनंदित रहे।

श्लोक 26 (bhagavata.9.14.26)

अपश्यन्नुर्वशीमिन्द्रो गन्धर्वान् समचोदयत् । उर्वशीरहितं मह्यमास्थानं नातिशोभते ॥ २६ ॥

apaśyann urvaśīm indro gandharvān samacodayat urvaśī-rahitaṁ mahyam āsthānaṁ nātiśobhate

उर्वशी को अपनी सभा में न देखकर इंद्र ने गंधर्वों को यह कहते हुए प्रेरित किया — 'उर्वशी के बिना मेरी सभा शोभा नहीं देती।'

श्लोक 27 (bhagavata.9.14.27)

ते उपेत्य महारात्रे तमसि प्रत्युपस्थिते । उर्वश्या उरणौ जह्रुर्न्यस्तौ राजनि जायया ॥ २७ ॥

te upetya mahā-rātre tamasi pratyupasthite urvaśyā uraṇau jahrur nyastau rājani jāyayā

वे गंधर्व घोर अंधकारमय मध्यरात्रि में आए और उर्वशी द्वारा राजा को सौंपे गए दोनों मेमनों को चुरा ले गए।

श्लोक 28 (bhagavata.9.14.28)

निशम्याक्रन्दितं देवी पुत्रयोर्नीयमानयोः । हतास्म्यहं कुनाथेन नपुंसा वीरमानिना ॥ २८ ॥

niśamyākranditaṁ devī putrayor nīyamānayoḥ hatāsmy ahaṁ kunāthena napuṁsā vīra-māninā

पुत्रवत् पाले उन मेमनों को ले जाते समय उनका रुदन सुनकर देवी उर्वशी ने कहा — 'मैं इस कायर, नपुंसक किंतु स्वयं को वीर मानने वाले कुपति के कारण नष्ट हो गई!'

श्लोक 29 (bhagavata.9.14.29)

यद्विश्रम्भादहं नष्टा हृतापत्या च दस्युभिः । यः शेते निशि सन्त्रस्तो यथा नारी दिवा पुमान् ॥ २९ ॥

yad-viśrambhād ahaṁ naṣṭā hṛtāpatyā ca dasyubhiḥ yaḥ śete niśi santrasto yathā nārī divā pumān

'जिसके भरोसे मैं यहाँ रही, उसी के कारण चोर मेरी संतान ले गए। यह तो रात्रि में भयभीत स्त्री के समान सोता है, जबकि दिन में पुरुष जैसा दिखता है।'

श्लोक 30 (bhagavata.9.14.30)

इति वाक्सायकैर्बिद्धः प्रतोत्त्रैरिव कुञ्जरः । निशि निस्त्रिंशमादाय विवस्त्रोऽभ्यद्रवद् रुषा ॥ ३० ॥

iti vāk-sāyakair biddhaḥ pratottrair iva kuñjaraḥ niśi nistriṁśam ādāya vivastro ’bhyadravad ruṣā

इन वाग्बाणों से उसी प्रकार बिंधकर जैसे हाथी अंकुश से बिंधता है, राजा क्रोधित होकर बिना वस्त्र पहने ही तलवार लेकर रात्रि में दौड़ पड़े।

श्लोक 31 (bhagavata.9.14.31)

ते विसृज्योरणौ तत्र व्यद्योतन्त स्म विद्युतः । आदाय मेषावायान्तं नग्नमैक्षत सा पतिम् ॥ ३१ ॥

te visṛjyoraṇau tatra vyadyotanta sma vidyutaḥ ādāya meṣāv āyāntaṁ nagnam aikṣata sā patim

गंधर्वों ने वहीं दोनों मेमने छोड़ दिए और बिजली के समान चमककर अंतर्धान हो गए। मेमनों को लिए लौटते अपने नग्न पति को देखकर उर्वशी वहाँ से चली गईं।

श्लोक 32 (bhagavata.9.14.32)

ऐलोऽपि शयने जायामपश्यन् विमना इव । तच्चित्तो विह्वलः शोचन् बभ्रामोन्मत्तवन्महीम् ॥ ३२ ॥

ailo ’pi śayane jāyām apaśyan vimanā iva tac-citto vihvalaḥ śocan babhrāmonmattavan mahīm

ऐल (पुरूरवा) ने भी शय्या पर अपनी पत्नी को न पाकर व्याकुल मन से, शोकाकुल होकर उन्मत्त की भाँति पृथ्वी पर भटकना आरंभ कर दिया।

श्लोक 33 (bhagavata.9.14.33)

स तां वीक्ष्य कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यां च तत्सखीः । पञ्च प्रहृष्टवदनः प्राह सूक्तं पुरूरवाः ॥ ३३ ॥

sa tāṁ vīkṣya kurukṣetre sarasvatyāṁ ca tat-sakhīḥ pañca prahṛṣṭa-vadanaḥ prāha sūktaṁ purūravāḥ

कुरुक्षेत्र में सरस्वती के तट पर उन्हें अपनी पाँच सखियों सहित देखकर, प्रसन्न मुख वाले पुरूरवा ने यह मधुर वचन कहा।

श्लोक 34 (bhagavata.9.14.34)

अहो जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमर्हसि । मां त्वमद्याप्यनिर्वृत्य वचांसि कृणवावहै ॥ ३४ ॥

aho jāye tiṣṭha tiṣṭha ghore na tyaktum arhasi māṁ tvam adyāpy anirvṛtya vacāṁsi kṛṇavāvahai

'हे प्रिये, ठहरो, ठहरो! हे निष्ठुरे, मुझे त्यागना तुम्हें शोभा नहीं देता। यदि अब भी तुम प्रसन्न न हो, तो कम से कम हमें कुछ बातें तो कर लेने दो।'

श्लोक 35 (bhagavata.9.14.35)

सुदेहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया । खादन्त्येनं वृका गृध्रास्त्वत्प्रसादस्य नास्पदम् ॥ ३५ ॥

sudeho ’yaṁ pataty atra devi dūraṁ hṛtas tvayā khādanty enaṁ vṛkā gṛdhrās tvat-prasādasya nāspadam

'हे देवी, तुम्हारे द्वारा त्यागा गया यह सुंदर शरीर यहीं गिर जाएगा; तुम्हारी कृपा से रहित हो जाने पर इसे भेड़िये और गिद्ध खा जाएँगे।'

श्लोक 36 (bhagavata.9.14.36)

उर्वश्युवाच मा मृथाः पुरुषोऽसि त्वं मा स्म त्वाद्युर्वृका इमे । क्वापि सख्यं न वै स्त्रीणां वृकाणां हृदयं यथा ॥ ३६ ॥

urvaśy uvāca mā mṛthāḥ puruṣo ’si tvaṁ mā sma tvādyur vṛkā ime kvāpi sakhyaṁ na vai strīṇāṁ vṛkāṇāṁ hṛdayaṁ yathā

उर्वशी ने कहा — 'मत मरो, तुम पुरुष हो; इन भेड़ियों को तुम्हें खाने न दो। स्त्रियों से कहीं भी सच्ची मित्रता नहीं होती — उनका हृदय तो भेड़ियों के समान होता है।'

श्लोक 37 (bhagavata.9.14.37)

स्त्रियो ह्यकरुणाः क्रूरा दुर्मर्षाः प्रियसाहसाः । घ्नन्त्यल्पार्थेऽपि विश्रब्धं पतिं भ्रातरमप्युत ॥ ३७ ॥

striyo hy akaruṇāḥ krūrā durmarṣāḥ priya-sāhasāḥ ghnanty alpārthe ’pi viśrabdhaṁ patiṁ bhrātaram apy uta

'स्त्रियाँ निर्दय, क्रूर, असहनशील और अपने सुख के लिए साहसिक होती हैं; तनिक-से स्वार्थ के लिए वे विश्वस्त पति अथवा भाई तक का वध कर सकती हैं।'

श्लोक 38 (bhagavata.9.14.38)

विधायालीकविश्रम्भमज्ञेषु त्यक्तसौहृदाः । नवं नवमभीप्सन्त्यः पुंश्चल्यः स्वैरवृत्तयः ॥ ३८ ॥

vidhāyālīka-viśrambham ajñeṣu tyakta-sauhṛdāḥ navaṁ navam abhīpsantyaḥ puṁścalyaḥ svaira-vṛttayaḥ

'झूठा विश्वास दिलाकर वे मूर्खों के प्रति भी स्नेह त्याग देती हैं और स्वच्छंद स्वभाव वाली वे स्त्रियाँ सदा नए-नए प्रेमी की खोज में रहती हैं।'

श्लोक 39 (bhagavata.9.14.39)

संवत्सरान्ते हि भवानेकरात्रं मयेश्वरः । रंस्यत्यपत्यानि च ते भविष्यन्त्यपराणि भोः ॥ ३९ ॥

saṁvatsarānte hi bhavān eka-rātraṁ mayeśvaraḥ raṁsyaty apatyāni ca te bhaviṣyanty aparāṇi bhoḥ

'हे स्वामी, फिर भी प्रत्येक वर्ष के अंत में एक रात्रि के लिए तुम मुझसे मिल सकोगे, और इस प्रकार तुम्हें और भी संतानें प्राप्त होंगी।'

श्लोक 40 (bhagavata.9.14.40)

अन्तर्वत्नीमुपालक्ष्य देवीं स प्रययौ पुरीम् । पुनस्तत्र गतोऽब्दान्ते उर्वशीं वीरमातरम् ॥ ४० ॥

antarvatnīm upālakṣya devīṁ sa prayayau purīm punas tatra gato ’bdānte urvaśīṁ vīra-mātaram

देवी को गर्भवती जानकर वे अपनी नगरी लौट गए; वर्ष के अंत में पुनः वहाँ जाकर उन्होंने वीर-पुत्र की माता बन चुकी उर्वशी को पाया।

श्लोक 41 (bhagavata.9.14.41)

उपलभ्य मुदा युक्तः समुवास तया निशाम् । अथैनमुर्वशी प्राह कृपणं विरहातुरम् ॥ ४१ ॥

upalabhya mudā yuktaḥ samuvāsa tayā niśām athainam urvaśī prāha kṛpaṇaṁ virahāturam

हर्षित होकर उन्होंने वह रात्रि उसके साथ बिताई; तत्पश्चात वियोग की पीड़ा से दुखी और दीन उस राजा से उर्वशी ने यह कहा।

श्लोक 42 (bhagavata.9.14.42)

गन्धर्वानुपधावेमांस्तुभ्यं दास्यन्ति मामिति । तस्य संस्तुवतस्तुष्टा अग्निस्थालीं ददुर्नृप । उर्वशीं मन्यमानस्तां सोऽबुध्यत चरन् वने ॥ ४२ ॥

gandharvān upadhāvemāṁs tubhyaṁ dāsyanti mām iti tasya saṁstuvatas tuṣṭā agni-sthālīṁ dadur nṛpa urvaśīṁ manyamānas tāṁ so ’budhyata caran vane

'इन गंधर्वों की शरण लो, ये मुझे तुम्हें सौंप देंगे।' उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर गंधर्वों ने राजा को एक अग्निस्थाली (अग्नि-पात्र-कन्या) प्रदान की; उसे उर्वशी समझकर राजा वन में विचरण करने लगे, किंतु बाद में उन्हें अपनी भूल का ज्ञान हुआ।

श्लोक 43 (bhagavata.9.14.43)

स्थालीं न्यस्य वने गत्वा गृहानाध्यायतो निशि । त्रेतायां सम्प्रवृत्तायां मनसि त्रय्यवर्तत ॥ ४३ ॥

sthālīṁ nyasya vane gatvā gṛhān ādhyāyato niśi tretāyāṁ sampravṛttāyāṁ manasi trayy avartata

उस कन्या को वन में छोड़कर घर लौटे राजा जब रात्रि में उर्वशी का ध्यान करते हुए जाग रहे थे, तभी त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ और उनके मन में त्रयी विद्या (वेदज्ञान) उदित हुई।

श्लोक 44 (bhagavata.9.14.44)

स्थालीस्थानं गतोऽश्वत्थं शमीगर्भं विलक्ष्य सः । तेन द्वे अरणी कृत्वा उर्वशीलोककाम्यया ॥ ४४ ॥

sthālī-sthānaṁ gato ’śvatthaṁ śamī-garbhaṁ vilakṣya saḥ tena dve araṇī kṛtvā urvaśī-loka-kāmyayā

वे उसी स्थान पर पहुँचे जहाँ उन्होंने वह कन्या छोड़ी थी, और वहाँ एक शमी वृक्ष के भीतर से उगे अश्वत्थ वृक्ष को देखा। उर्वशी के लोक को प्राप्त करने की कामना से उन्होंने उसकी लकड़ी से दो अरणियाँ बनाईं।

श्लोक 45 (bhagavata.9.14.45)

उर्वशीं मन्त्रतो ध्यायन्नधरारणिमुत्तराम् । आत्मानमुभयोर्मध्ये यत् तत् प्रजननं प्रभुः ॥ ४५ ॥

urvaśīṁ mantrato dhyāyann adharāraṇim uttarām ātmānam ubhayor madhye yat tat prajananaṁ prabhuḥ

मंत्रोच्चारण के साथ उन्होंने निचली अरणी को उर्वशी, ऊपरी को स्वयं तथा दोनों के बीच उत्पन्न होने वाली अग्नि को अपने पुत्र के रूप में ध्यान किया।

श्लोक 46 (bhagavata.9.14.46)

तस्य निर्मन्थनाज्जातो जातवेदा विभावसुः । त्रय्या स विद्यया राज्ञा पुत्रत्वे कल्पितस्त्रिवृत् ॥ ४६ ॥

tasya nirmanthanāj jāto jāta-vedā vibhāvasuḥ trayyā sa vidyayā rājñā putratve kalpitas tri-vṛt

उस मंथन से उत्पन्न जातवेदा (अग्नि) को राजा ने त्रयी विद्या द्वारा अपने त्रिविध पुत्र के रूप में स्वीकार किया।

श्लोक 47 (bhagavata.9.14.47)

तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तमधोक्षजम् । उर्वशीलोकमन् विच्छन्सर्वदेवमयं हरिम् ॥ ४७ ॥

tenāyajata yajñeśaṁ bhagavantam adhokṣajam urvaśī-lokam anvicchan sarva-devamayaṁ harim

उस अग्नि द्वारा, उर्वशी के लोक को प्राप्त करने की इच्छा से, उन्होंने यज्ञेश्वर भगवान — इंद्रियातीत, समस्त देवस्वरूप हरि — की आराधना की।

श्लोक 48 (bhagavata.9.14.48)

एक एव पुरा वेदः प्रणवः सर्ववाङ्मयः । देवो नारायणो नान्य एकोऽग्निर्वर्ण एव च ॥ ४८ ॥

eka eva purā vedaḥ praṇavaḥ sarva-vāṅmayaḥ devo nārāyaṇo nānya eko ’gnir varṇa eva ca

प्राचीन काल में एक ही वेद था — समस्त वाणी का सार प्रणव (ॐ); एकमात्र आराध्य देव नारायण थे, अन्य कोई नहीं; अग्नि भी एक ही थी और आश्रम भी एक ही (हंस) था।

श्लोक 49 (bhagavata.9.14.49)

पुरूरवस एवासीत् त्रयी त्रेतामुखे नृप । अग्निना प्रजया राजा लोकं गान्धर्वमेयिवान् ॥ ४९ ॥

purūravasa evāsīt trayī tretā-mukhe nṛpa agninā prajayā rājā lokaṁ gāndharvam eyivān

हे राजन्, त्रेतायुग के प्रारंभ में पुरूरवा ने ही त्रयी विद्या का प्रवर्तन किया; अग्नि को अपनी संतान मानकर वे राजा गंधर्वलोक को प्राप्त हुए।

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