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नवम स्कन्ध · अध्याय 17

पुरूरवा के पुत्रों के वंश

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (bhagavata.9.17.1)

श्रीबादरायणिरुवाच यः पुरूरवसः पुत्र आयुस्तस्याभवन् सुताः । नहुषः क्षत्रवृद्धश्च रजी राभश्च वीर्यवान् ॥ १ ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca yaḥ purūravasaḥ putra āyus tasyābhavan sutāḥ nahuṣaḥ kṣatravṛddhaś ca rajī rābhaś ca vīryavān

श्री बादरायणि (शुकदेव) ने कहा — पुरूरवा का पुत्र आयु हुआ; उसके पुत्र थे नहुष, क्षत्रवृद्ध, रजि तथा पराक्रमी राभ।

श्लोक 2 (bhagavata.9.17.2)

अनेना इति राजेन्द्र शृणु क्षत्रवृधोऽन्वयम् । क्षत्रवृद्धसुतस्यासन् सुहोत्रस्यात्मजास्त्रयः ॥ २ ॥

anenā iti rājendra śṛṇu kṣatravṛdho ’nvayam kṣatravṛddha-sutasyāsan suhotrasyātmajās trayaḥ

और अनेना भी, हे राजेन्द्र। अब क्षत्रवृद्ध का वंश सुनो — क्षत्रवृद्ध का पुत्र सुहोत्र हुआ, जिसके तीन पुत्र थे।

श्लोक 3 (bhagavata.9.17.3)

काश्यः कुशो गृत्समद इति गृत्समदादभूत् । शुनकः शौनको यस्य बह्वृचप्रवरो मुनिः ॥ ३ ॥

kāśyaḥ kuśo gṛtsamada iti gṛtsamadād abhūt śunakaḥ śaunako yasya bahvṛca-pravaro muniḥ

काश्य, कुश और गृत्समद — गृत्समद से शुनक उत्पन्न हुआ, और शुनक से शौनक, जो ऋग्वेद के ज्ञाताओं में सर्वश्रेष्ठ मुनि थे।

श्लोक 4 (bhagavata.9.17.4)

काश्यस्य काशिस्तत्पुत्रो राष्ट्रो दीर्घतमःपिता । धन्वन्तरिर्दीर्घतमस आयुर्वेदप्रवर्तकः । यज्ञभुग् वासुदेवांशः स्मृतमात्रार्तिनाशनः ॥ ४ ॥

kāśyasya kāśis tat-putro rāṣṭro dīrghatamaḥ-pitā dhanvantarir dīrghatamasa āyur-veda-pravartakaḥ yajña-bhug vāsudevāṁśaḥ smṛta-mātrārti-nāśanaḥ

काश्य का पुत्र काशि हुआ; उसका पुत्र राष्ट्र, जो दीर्घतमा का पिता बना। दीर्घतमा से धन्वन्तरि उत्पन्न हुए, जो आयुर्वेद के प्रवर्तक, भगवान वासुदेव के अंशावतार तथा यज्ञ-भाग के भोक्ता थे — जिनका स्मरण मात्र से ही समस्त पीड़ाएँ नष्ट हो जाती हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.9.17.5)

तत्पुत्रः केतुमानस्य जज्ञे भीमरथस्ततः । दिवोदासो द्युमांस्तस्मात् प्रतर्दन इति स्मृतः ॥ ५ ॥

tat-putraḥ ketumān asya jajñe bhīmarathas tataḥ divodāso dyumāṁs tasmāt pratardana iti smṛtaḥ

उनका पुत्र केतुमान हुआ; उससे भीमरथ उत्पन्न हुए। भीमरथ से दिवोदास, और दिवोदास से द्युमान हुए, जो प्रतर्दन नाम से विख्यात हुए।

श्लोक 6 (bhagavata.9.17.6)

स एव शत्रुजिद् वत्स ऋतध्वज इतीरितः । तथा कुवलयाश्वेति प्रोक्तोऽलर्कादयस्ततः ॥ ६ ॥

sa eva śatrujid vatsa ṛtadhvaja itīritaḥ tathā kuvalayāśveti prokto ’larkādayas tataḥ

वही द्युमान शत्रुजित्, वत्स तथा ऋतध्वज नामों से भी कहे गए, और कुवलयाश्व भी उन्हीं का नाम था; उनसे अलर्क आदि पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 7 (bhagavata.9.17.7)

षष्टिंवर्षसहस्राणि षष्टिंवर्षशतानि च । नालर्कादपरो राजन् बुभुजे मेदिनीं युवा ॥ ७ ॥

ṣaṣṭiṁ varṣa-sahasrāṇi ṣaṣṭiṁ varṣa-śatāni ca nālarkād aparo rājan bubhuje medinīṁ yuvā

हे राजन्! अलर्क ने छाछठ हजार वर्षों तक पृथ्वी का भोग किया। उनके सिवा किसी अन्य युवा राजा ने इतने दीर्घ काल तक पृथ्वी पर राज्य नहीं भोगा।

श्लोक 8 (bhagavata.9.17.8)

अलर्कात्सन्ततिस्तस्मात् सुनीथोऽथ निकेतनः । धर्मकेतुः सुतस्तस्मात् सत्यकेतुरजायत ॥ ८ ॥

alarkāt santatis tasmāt sunītho ’tha niketanaḥ dharmaketuḥ sutas tasmāt satyaketur ajāyata

अलर्क से संतति नामक पुत्र हुआ; उससे सुनीथ, फिर निकेतन उत्पन्न हुए। निकेतन के पुत्र धर्मकेतु हुए, और धर्मकेतु से सत्यकेतु का जन्म हुआ।

श्लोक 9 (bhagavata.9.17.9)

धृष्टकेतुस्ततस्तस्मात् सुकुमारः क्षितीश्वरः । वीतिहोत्रोऽस्य भर्गोऽतो भार्गभूमिरभून्नृप ॥ ९ ॥

dhṛṣṭaketus tatas tasmāt sukumāraḥ kṣitīśvaraḥ vītihotro ’sya bhargo ’to bhārgabhūmir abhūn nṛpa

हे राजन्! सत्यकेतु से धृष्टकेतु उत्पन्न हुए; उनसे पृथ्वी के स्वामी सुकुमार हुए। सुकुमार से वीतिहोत्र, वीतिहोत्र से भर्ग, और भर्ग से भार्गभूमि उत्पन्न हुए।

श्लोक 10 (bhagavata.9.17.10)

इतीमे काशयो भूपाः क्षत्रवृद्धान्वयायिनः । राभस्य रभसः पुत्रो गम्भीरश्चाक्रियस्ततः ॥ १० ॥

itīme kāśayo bhūpāḥ kṣatravṛddhānvayāyinaḥ rābhasya rabhasaḥ putro gambhīraś cākriyas tataḥ

ये सभी काशि-वंशीय राजा क्षत्रवृद्ध की ही सन्तान थे। अब राभ का पुत्र रभस हुआ; उससे गम्भीर, और गम्भीर से अक्रिय उत्पन्न हुए।

श्लोक 11 (bhagavata.9.17.11)

तद्गोत्रं ब्रह्मविज् जज्ञे शृणु वंशमनेनसः । शुद्धस्ततः शुचिस्तस्माच्चित्रकृद् धर्मसारथिः ॥ ११ ॥

tad-gotraṁ brahmavij jajñe śṛṇu vaṁśam anenasaḥ śuddhas tataḥ śucis tasmāc citrakṛd dharmasārathiḥ

उसी वंश में ब्रह्मवित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। अब अनेना के वंश को सुनो — उससे शुद्ध, शुद्ध से शुचि, और शुचि से चित्रकृत् उत्पन्न हुए, जो धर्मसारथि भी कहलाए।

श्लोक 12 (bhagavata.9.17.12)

ततः शान्तरजो जज्ञे कृतकृत्यः स आत्मवान् । रजेः पञ्चशतान्यासन् पुत्राणाममितौजसाम् ॥ १२ ॥

tataḥ śāntarajo jajñe kṛta-kṛtyaḥ sa ātmavān rajeḥ pañca-śatāny āsan putrāṇām amitaujasām

चित्रकृत् से शान्तरज उत्पन्न हुए, जो कृतकृत्य तथा आत्मवान् थे। रजि के पाँच सौ पुत्र थे, सभी अपार तेजस्वी।

श्लोक 13 (bhagavata.9.17.13)

देवैरभ्यर्थितो दैत्यान् हत्वेन्द्रायाददाद् दिवम् । इन्द्रस्तस्मै पुनर्दत्त्वा गृहीत्वा चरणौ रजेः । आत्मानमर्पयामास प्रह्रादाद्यरिशङ्कितः ॥ १३ ॥

devair abhyarthito daityān hatvendrāyādadād divam indras tasmai punar dattvā gṛhītvā caraṇau rajeḥ ātmānam arpayām āsa prahrādādy-ari-śaṅkitaḥ

देवताओं की प्रार्थना पर रजि ने दैत्यों का वध कर स्वर्ग इन्द्र को लौटा दिया। इन्द्र ने वह स्वर्ग पुनः रजि को अर्पित किया, और फिर प्रह्लाद आदि शत्रुओं से भयभीत होकर उनके चरण पकड़ कर स्वयं को उन्हीं को समर्पित कर दिया।

श्लोक 14 (bhagavata.9.17.14)

पितर्युपरते पुत्रा याचमानाय नो ददुः । त्रिविष्टपं महेन्द्राय यज्ञभागान् समाददुः ॥ १४ ॥

pitary uparate putrā yācamānāya no daduḥ triviṣṭapaṁ mahendrāya yajña-bhāgān samādaduḥ

पिता के देहावसान के पश्चात् उनके पुत्रों ने याचना करने पर भी महेन्द्र को स्वर्ग वापस नहीं लौटाया, अपितु उन्हें केवल यज्ञ का भाग ही अर्पित किया।

श्लोक 15 (bhagavata.9.17.15)

गुरुणा हूयमानेऽग्नौ बलभित् तनयान् रजेः । अवधीद् भ्रंशितान् मार्गान्न कश्चिदवशेषितः ॥ १५ ॥

guruṇā hūyamāne ’gnau balabhit tanayān rajeḥ avadhīd bhraṁśitān mārgān na kaścid avaśeṣitaḥ

तब गुरु बृहस्पति द्वारा अग्नि में आहुतियाँ डाले जाने पर, धर्मपथ से भ्रष्ट हुए रजि के उन पुत्रों को बलभित् इन्द्र ने मार डाला — उनमें से एक भी शेष न रहा।

श्लोक 16 (bhagavata.9.17.16)

कुशात् प्रतिः क्षात्रवृद्धात् सञ्जयस्तत्सुतो जयः । ततः कृतः कृतस्यापि जज्ञे हर्यबलो नृपः ॥ १६ ॥

kuśāt pratiḥ kṣātravṛddhāt sañjayas tat-suto jayaḥ tataḥ kṛtaḥ kṛtasyāpi jajñe haryabalo nṛpaḥ

क्षत्रवृद्ध के वंशज कुश से प्रति उत्पन्न हुए; उनका पुत्र सञ्जय, सञ्जय का पुत्र जय हुआ। जय से कृत, और कृत से राजा हर्यबल का जन्म हुआ।

श्लोक 17 (bhagavata.9.17.17)

सहदेवस्ततो हीनो जयसेनस्तु तत्सुतः । सङ्कृतिस्तस्य च जयः क्षत्रधर्मा महारथः । क्षत्रवृद्धान्वया भूपा इमेशृण्वथनाहुषान् ॥ १७ ॥

sahadevas tato hīno jayasenas tu tat-sutaḥ saṅkṛtis tasya ca jayaḥ kṣatra-dharmā mahā-rathaḥ kṣatravṛddhānvayā bhūpā ime śṛṇv atha nāhuṣān

उससे सहदेव उत्पन्न हुए, फिर हीन। हीन का पुत्र जयसेन, उनका पुत्र सङ्कृति, और सङ्कृति का पुत्र जय हुआ, जो क्षत्रिय-धर्म का पालन करने वाला महारथी था। ये सब क्षत्रवृद्ध के वंश के राजा थे — अब नहुष के वंशजों को सुनो।

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