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नवम स्कन्ध · अध्याय 18

राजा ययाति द्वारा यौवन की पुनःप्राप्ति

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (bhagavata.9.18.1)

श्रीशुक उवाच यतिर्ययातिः संयातिरायतिर्वियतिः कृतिः । षडिमे नहुषस्यासन्निन्द्रियाणीव देहिनः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca yatir yayātiḥ saṁyātir āyatir viyatiḥ kṛtiḥ ṣaḍ ime nahuṣasyāsann indriyāṇīva dehinaḥ

श्री शुकदेव ने कहा — यति, ययाति, संयाति, आयति, वियति और कृति — ये छह नहुष के पुत्र थे, मानो देहधारी जीव की छह इन्द्रियाँ हों।

श्लोक 2 (bhagavata.9.18.2)

राज्यं नैच्छद् यतिः पित्रा दत्तं तत्परिणामवित् । यत्र प्रविष्टः पुरुष आत्मानं नावबुध्यते ॥ २ ॥

rājyaṁ naicchad yatiḥ pitrā dattaṁ tat-pariṇāmavit yatra praviṣṭaḥ puruṣa ātmānaṁ nāvabudhyate

पिता द्वारा प्रदत्त राज्य को यति ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वे उसके परिणाम को भली-भाँति जानते थे — जो पुरुष उस पद में प्रवेश करता है, वह अपने आत्मस्वरूप को नहीं पहचान पाता।

श्लोक 3 (bhagavata.9.18.3)

पितरि भ्रंशिते स्थानादिन्द्राण्या धर्षणाद्द्विजैः । प्रापितेऽजगरत्वं वै ययातिरभवन्नृपः ॥ ३ ॥

pitari bhraṁśite sthānād indrāṇyā dharṣaṇād dvijaiḥ prāpite ’jagaratvaṁ vai yayātir abhavan nṛpaḥ

जब उनके पिता नहुष को इन्द्राणी के प्रति किए गए अपराध के कारण ब्राह्मणों द्वारा अपने पद से गिराकर अजगर बना दिया गया, तब ययाति राजा बने।

श्लोक 4 (bhagavata.9.18.4)

चतसृष्वादिशद् दिक्षु भ्रातृन् भ्राता यवीयसः । कृतदारो जुगोपोर्वीं काव्यस्य वृषपर्वणः ॥ ४ ॥

catasṛṣv ādiśad dikṣu bhrātṝn bhrātā yavīyasaḥ kṛta-dāro jugoporvīṁ kāvyasya vṛṣaparvaṇaḥ

उन्होंने अपने छोटे भाइयों को चारों दिशाओं में नियुक्त किया; तत्पश्चात् काव्य (शुक्राचार्य) तथा वृषपर्वा की कन्याओं से विवाह कर वे सम्पूर्ण पृथ्वी की रक्षा करने लगे।

श्लोक 5 (bhagavata.9.18.5)

श्रीराजोवाच ब्रह्मर्षिर्भगवान् काव्यः क्षत्रबन्धुश्च नाहुषः । राजन्यविप्रयोः कस्माद् विवाहः प्रतिलोमकः ॥ ५ ॥

śrī-rājovāca brahmarṣir bhagavān kāvyaḥ kṣatra-bandhuś ca nāhuṣaḥ rājanya-viprayoḥ kasmād vivāhaḥ pratilomakaḥ

राजा ने कहा — काव्य भगवान ब्रह्मर्षि थे, और नाहुष क्षत्रिय-बन्धु; फिर क्षत्रिय और ब्राह्मण के बीच यह प्रतिलोम विवाह कैसे सम्पन्न हुआ?

श्लोक 6 (bhagavata.9.18.6)

श्रीशुक उवाच एकदा दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा नाम कन्यका । सखीसहस्रसंयुक्ता गुरुपुत्र्या च भामिनी ॥ ६ ॥

śrī-śuka uvāca ekadā dānavendrasya śarmiṣṭhā nāma kanyakā sakhī-sahasra-saṁyuktā guru-putryā ca bhāminī

श्री शुकदेव ने कहा — एक दिन दानवराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा, जो स्वभाव से उग्र थीं, अपनी सहस्रों सखियों तथा अपने गुरु की पुत्री देवयानी के साथ —

श्लोक 7 (bhagavata.9.18.7)

देवयान्या पुरोद्याने पुष्पितद्रुमसङ्कुले । व्यचरत्कलगीतालिनलिनीपुलिनेऽबला ॥ ७ ॥

devayānyā purodyāne puṣpita-druma-saṅkule vyacarat kala-gītāli- nalinī-puline ’balā

— उस उद्यान में देवयानी के साथ विचरण करने लगीं, जो फूलों से लदे वृक्षों से भरा था, उस कमलिनी के तट पर जहाँ भ्रमरों का मधुर गुंजार गूँज रहा था।

श्लोक 8 (bhagavata.9.18.8)

ता जलाशयमासाद्य कन्याः कमललोचनाः । तीरे न्यस्य दुकूलानि विजह्रुः सिञ्चतीर्मिथः ॥ ८ ॥

tā jalāśayam āsādya kanyāḥ kamala-locanāḥ tīre nyasya dukūlāni vijahruḥ siñcatīr mithaḥ

कमल जैसे नेत्रों वाली वे कन्याएँ जलाशय के पास पहुँचकर अपने वस्त्र तट पर उतार, परस्पर जल छिड़कते हुए क्रीड़ा करने लगीं।

श्लोक 9 (bhagavata.9.18.9)

वीक्ष्य व्रजन्तं गिरिशं सह देव्या वृषस्थितम् । सहसोत्तीर्य वासांसि पर्यधुर्व्रीडिताः स्त्रियः ॥ ९ ॥

vīkṣya vrajantaṁ giriśaṁ saha devyā vṛṣa-sthitam sahasottīrya vāsāṁsi paryadhur vrīḍitāḥ striyaḥ

देवी पार्वती सहित बैल पर आरूढ़ भगवान गिरीश (शिव) को समीप से जाते देख, वे स्त्रियाँ लज्जित होकर तुरन्त जल से बाहर निकलीं और अपने वस्त्र धारण करने लगीं।

श्लोक 10 (bhagavata.9.18.10)

शर्मिष्ठाजानती वासो गुरुपुत्र्याः समव्ययत् । स्वीयं मत्वा प्रकुपिता देवयानीदमब्रवीत् ॥ १० ॥

śarmiṣṭhājānatī vāso guru-putryāḥ samavyayat svīyaṁ matvā prakupitā devayānīdam abravīt

शर्मिष्ठा ने अनजाने में गुरु-पुत्री देवयानी का वस्त्र पहन लिया, उसे अपना समझकर। इससे क्रुद्ध होकर देवयानी यह बोलीं —

श्लोक 11 (bhagavata.9.18.11)

अहो निरीक्ष्यतामस्या दास्याः कर्म ह्यसाम्प्रतम् । अस्मद्धार्यं धृतवती शुनीव हविरध्वरे ॥ ११ ॥

aho nirīkṣyatām asyā dāsyāḥ karma hy asāmpratam asmad-dhāryaṁ dhṛtavatī śunīva havir adhvare

अरी, इस दासी के इस अनुचित आचरण को तो देखो! इसने मेरा वस्त्र इस प्रकार धारण कर लिया है, मानो कुतिया यज्ञ की हवि को उठा ले।

श्लोक 12 (bhagavata.9.18.12)

यैरिदं तपसा सृष्टं मुखं पुंसः परस्य ये । धार्यते यैरिह ज्योतिः शिवः पन्थाः प्रदर्शितः ॥ १२ ॥

yair idaṁ tapasā sṛṣṭaṁ mukhaṁ puṁsaḥ parasya ye dhāryate yair iha jyotiḥ śivaḥ panthāḥ pradarśitaḥ

हम उस वंश से हैं जिनके तप से यह सृष्टि रची गई, जो परम पुरुष के मुख कहलाते हैं, जिनके भीतर वह दिव्य ज्योति सदा प्रतिष्ठित रहती है, और जिन्होंने ही कल्याणकारी मार्ग का प्रदर्शन किया है।

श्लोक 13 (bhagavata.9.18.13)

यान् वन्दन्त्युपतिष्ठन्ते लोकनाथाः सुरेश्वराः । भगवानपि विश्वात्मा पावनः श्रीनिकेतनः ॥ १३ ॥

yān vandanty upatiṣṭhante loka-nāthāḥ sureśvarāḥ bhagavān api viśvātmā pāvanaḥ śrī-niketanaḥ

हमें तो लोकपाल और देवेश्वर तक वन्दन करते और सेवा में उपस्थित रहते हैं, यहाँ तक कि विश्वात्मा, पावन तथा श्रीनिकेतन भगवान भी हमारा सम्मान करते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.9.18.14)

वयं तत्रापि भृगवः शिष्योऽस्या नः पितासुरः । अस्मद्धार्यं धृतवती शूद्रो वेदमिवासती ॥ १४ ॥

vayaṁ tatrāpi bhṛgavaḥ śiṣyo ’syā naḥ pitāsuraḥ asmad-dhāryaṁ dhṛtavatī śūdro vedam ivāsatī

और हम तो उसी भृगुकुल में हैं; इसका पिता तो असुर होकर भी केवल हमारा शिष्य मात्र है। फिर भी इस असती ने मेरी वस्तु को हठपूर्वक धारण कर लिया है — मानो कोई शूद्र वेद को हड़प ले।

श्लोक 15 (bhagavata.9.18.15)

एवं क्षिपन्तीं शर्मिष्ठा गुरुपुत्रीमभाषत । रुषा श्वसन्त्युरङ्गीव धर्षिता दष्टदच्छदा ॥ १५ ॥

evaṁ kṣipantīṁ śarmiṣṭhā guru-putrīm abhāṣata ruṣā śvasanty uraṅgīva dharṣitā daṣṭa-dacchadā

श्री शुकदेव ने कहा — इस प्रकार उलाहना सुनकर शर्मिष्ठा क्रोध से सर्पिणी के समान फुफकारती और होंठ दाँतों तले दबाती हुई, गुरु-पुत्री देवयानी से बोलीं —

श्लोक 16 (bhagavata.9.18.16)

आत्मवृत्तमविज्ञाय कत्थसे बहु भिक्षुकि । किं न प्रतीक्षसेऽस्माकं गृहान् बलिभुजो यथा ॥ १६ ॥

ātma-vṛttam avijñāya katthase bahu bhikṣuki kiṁ na pratīkṣase ’smākaṁ gṛhān balibhujo yathā

अरी भिखारिन, अपनी वास्तविक स्थिति को न जानते हुए तू इतना बड़बड़ा रही है! क्या तू भी काक के समान हमारे ही घर की बलि की प्रतीक्षा नहीं करती?

श्लोक 17 (bhagavata.9.18.17)

एवंविधैः सुपरुषैः क्षिप्त्वाचार्यसुतां सतीम् । शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे वासश्चादाय मन्युना ॥ १७ ॥

evaṁ-vidhaiḥ suparuṣaiḥ kṣiptvācārya-sutāṁ satīm śarmiṣṭhā prākṣipat kūpe vāsaś cādāya manyunā

ऐसे कठोर वचनों से आचार्य-पुत्री सती देवयानी को धिक्कारकर, क्रोध में शर्मिष्ठा ने उनके वस्त्र छीनकर उन्हें कुएँ में गिरा दिया।

श्लोक 18 (bhagavata.9.18.18)

तस्यां गतायां स्वगृहं ययातिर्मृगयां चरन् । प्राप्तो यदृच्छया कूपे जलार्थी तां ददर्श ह ॥ १८ ॥

tasyāṁ gatāyāṁ sva-gṛhaṁ yayātir mṛgayāṁ caran prāpto yadṛcchayā kūpe jalārthī tāṁ dadarśa ha

शर्मिष्ठा के घर लौट जाने पर, आखेट में निकले राजा ययाति संयोगवश जल की खोज में उसी कुएँ पर आ पहुँचे और वहाँ देवयानी को देखा।

श्लोक 19 (bhagavata.9.18.19)

दत्त्वा स्वमुत्तरं वासस्तस्यै राजा विवाससे । गृहीत्वा पाणिना पाणिमुज्जहार दयापरः ॥ १९ ॥

dattvā svam uttaraṁ vāsas tasyai rājā vivāsase gṛhītvā pāṇinā pāṇim ujjahāra dayā-paraḥ

वस्त्रहीन देवयानी को देखकर राजा ने अपना उत्तरीय वस्त्र उन्हें दिया, और दयावश उनका हाथ अपने हाथ में लेकर उन्हें कुएँ से बाहर निकाला।

श्लोक 20 (bhagavata.9.18.20)

तं वीरमाहौशनसी प्रेमनिर्भरया गिरा । राजंस्त्वया गृहीतो मे पाणिः परपुरञ्जय ॥ २० ॥

taṁ vīram āhauśanasī prema-nirbharayā girā rājaṁs tvayā gṛhīto me pāṇiḥ para-purañjaya

उशना (शुक्राचार्य) की पुत्री देवयानी ने प्रेम से भरी वाणी में उस वीर से कहा — हे राजन्, हे शत्रु-नगर-विजयी! आपने मेरा हाथ ग्रहण किया है —

श्लोक 21 (bhagavata.9.18.21)

हस्तग्राहोऽपरो मा भूद् गृहीतायास्त्वया हि मे । एष ईशकृतो वीर सम्बन्धो नौ न पौरुषः ॥ २१ ॥

hasta-grāho ’paro mā bhūd gṛhītāyās tvayā hi me eṣa īśa-kṛto vīra sambandho nau na pauruṣaḥ

— अतः अब आपके सिवा कोई अन्य मेरा हाथ न थामे, हे वीर! यह हमारा सम्बन्ध ईश्वर की इच्छा से बना है, मनुष्य के प्रयत्न से नहीं।

श्लोक 22 (bhagavata.9.18.22)

यदिदं कूपमग्नाया भवतो दर्शनं मम । न ब्राह्मणो मे भविता हस्तग्राहो महाभुज । कचस्य बार्हस्पत्यस्य शापाद् यमशपं पुरा ॥ २२ ॥

yad idaṁ kūpa-magnāyā bhavato darśanaṁ mama na brāhmaṇo me bhavitā hasta-grāho mahā-bhuja kacasya bārhaspatyasya śāpād yam aśapaṁ purā

कुएँ में गिरी हुई मुझे आपका यह दर्शन होना भी विधि का ही विधान है, हे महाबाहु! कोई ब्राह्मण कभी मेरा पाणिग्रहण नहीं कर सकेगा, क्योंकि बृहस्पति-पुत्र कच को मैंने पूर्वकाल में जो शाप दिया था, उसी के प्रत्युत्तर में उसने मुझे भी शाप दे दिया था।

श्लोक 23 (bhagavata.9.18.23)

ययातिरनभिप्रेतं दैवोपहृतमात्मनः । मनस्तु तद्गतं बुद्ध्वा प्रतिजग्राह तद्वचः ॥ २३ ॥

yayātir anabhipretaṁ daivopahṛtam ātmanaḥ manas tu tad-gataṁ buddhvā pratijagrāha tad-vacaḥ

यद्यपि यह विवाह शास्त्रीय दृष्टि से अभीष्ट नहीं था, तथापि ययाति ने यह जानकर कि दैव-योग से उनका मन पहले ही देवयानी की ओर आकृष्ट हो चुका है, उनकी बात स्वीकार कर ली।

श्लोक 24 (bhagavata.9.18.24)

गते राजनि सा धीरे तत्र स्म रुदती पितुः । न्यवेदयत्ततः सर्वमुक्तं शर्मिष्ठया कृतम् ॥ २४ ॥

gate rājani sā dhīre tatra sma rudatī pituḥ nyavedayat tataḥ sarvam uktaṁ śarmiṣṭhayā kṛtam

धैर्यवान राजा के चले जाने पर देवयानी रोती हुई अपने पिता के पास गईं और शर्मिष्ठा द्वारा किए गए समस्त वृत्तान्त को उनसे कह सुनाया।

श्लोक 25 (bhagavata.9.18.25)

दुर्मना भगवान् काव्यः पौरोहित्यं विगर्हयन् । स्तुवन् वृत्तिं च कापोतीं दुहित्रा स ययौ पुरात् ॥ २५ ॥

durmanā bhagavān kāvyaḥ paurohityaṁ vigarhayan stuvan vṛttiṁ ca kāpotīṁ duhitrā sa yayau purāt

मन में अत्यन्त क्षुब्ध होकर भगवान काव्य (शुक्राचार्य) ने पुरोहित-वृत्ति की निन्दा की और कापोती वृत्ति (कबूतर के समान बिखरे अन्न बीनकर जीवन-निर्वाह) की प्रशंसा करते हुए अपनी पुत्री सहित नगर से प्रस्थान कर दिया।

श्लोक 26 (bhagavata.9.18.26)

वृषपर्वा तमाज्ञाय प्रत्यनीकविवक्षितम् । गुरुं प्रसादयन् मूर्ध्ना पादयोः पतितः पथि ॥ २६ ॥

vṛṣaparvā tam ājñāya pratyanīka-vivakṣitam guruṁ prasādayan mūrdhnā pādayoḥ patitaḥ pathi

यह जानकर कि गुरु किसी प्रतिशोध के भाव से आ रहे हैं, वृषपर्वा ने उन्हें प्रसन्न करने हेतु मार्ग में ही उनके चरणों में मस्तक झुकाकर दण्डवत् प्रणाम किया।

श्लोक 27 (bhagavata.9.18.27)

क्षणार्धमन्युर्भगवान् शिष्यं व्याचष्ट भार्गवः । कामोऽस्याः क्रियतां राजन् नैनां त्यक्तुमिहोत्सहे ॥ २७ ॥

kṣaṇārdha-manyur bhagavān śiṣyaṁ vyācaṣṭa bhārgavaḥ kāmo ’syāḥ kriyatāṁ rājan naināṁ tyaktum ihotsahe

भगवान भार्गव (शुक्राचार्य) का क्रोध क्षणभर में ही शान्त हो गया; उन्होंने अपने शिष्य से कहा — हे राजन्, इसकी इच्छा पूर्ण करो; मैं इसका त्याग करने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 28 (bhagavata.9.18.28)

तथेत्यवस्थिते प्राह देवयानी मनोगतम् । पित्रा दत्ता यतो यास्ये सानुगा यातु मामनु ॥ २८ ॥

tathety avasthite prāha devayānī manogatam pitrā dattā yato yāsye sānugā yātu mām anu

जब यह बात निश्चित हो गई, तब देवयानी ने अपने मन की बात कही — पिता जिसे मुझे सौंपेंगे, वहाँ जहाँ भी मैं जाऊँ, शर्मिष्ठा अपनी सखियों सहित मेरी परिचारिका बनकर मेरे साथ चले।

श्लोक 29 (bhagavata.9.18.29)

पित्रादत्तादेवयान्यै शर्मिष्ठासानुगातदा । स्वानां तत् सङ्कटं वीक्ष्य तदर्थस्य च गौरवम् । देवयानीं पर्यचरत् स्त्रीसहस्रेण दासवत् ॥ २९ ॥

pitrā dattā devayānyai śarmiṣṭhā sānugā tadā svānāṁ tat saṅkaṭaṁ vīkṣya tad-arthasya ca gauravam devayānīṁ paryacarat strī-sahasreṇa dāsavat

तब पिता वृषपर्वा द्वारा देवयानी को सौंपी गई शर्मिष्ठा ने, अपने कुल पर मँडराते संकट तथा गुरु-ऋण के गौरव को समझते हुए, सहस्रों सखियों सहित दासी के समान देवयानी की सेवा करना स्वीकार किया।

श्लोक 30 (bhagavata.9.18.30)

नाहुषाय सुतां दत्त्वा सह शर्मिष्ठयोशना । तमाह राजञ्छर्मिष्ठामाधास्तल्पे न कर्हिचित् ॥ ३० ॥

nāhuṣāya sutāṁ dattvā saha śarmiṣṭhayośanā tam āha rājañ charmiṣṭhām ādhās talpe na karhicit

उशना (शुक्राचार्य) ने अपनी पुत्री देवयानी को शर्मिष्ठा सहित नहुष-पुत्र ययाति को सौंपते हुए राजा से कहा — शर्मिष्ठा को कभी भी अपनी शय्या पर स्थान मत देना।

श्लोक 31 (bhagavata.9.18.31)

विलोक्यौशनसीं राजञ्छर्मिष्ठा सुप्रजां क्वचित् । तमेव वव्रे रहसि सख्याः पतिमृतौ सती ॥ ३१ ॥

vilokyauśanasīṁ rājañ charmiṣṭhā suprajāṁ kvacit tam eva vavre rahasi sakhyāḥ patim ṛtau satī

हे राजन्! एक बार उशना-पुत्री देवयानी को सुयोग्य सन्तान से युक्त देखकर, सती शर्मिष्ठा ने अपने ऋतुकाल में एकान्त में जाकर अपनी सखी के उसी पति ययाति से याचना की।

श्लोक 32 (bhagavata.9.18.32)

राजपुत्र्यार्थितोऽपत्ये धर्मं चावेक्ष्य धर्मवित् । स्मरञ्छुक्रवचः काले दिष्टमेवाभ्यपद्यत ॥ ३२ ॥

rāja-putryārthito ’patye dharmaṁ cāvekṣya dharmavit smarañ chukra-vacaḥ kāle diṣṭam evābhyapadyata

सन्तान हेतु राजकुमारी की प्रार्थना सुनकर, धर्मज्ञ राजा ने धर्म पर विचार किया; शुक्राचार्य के वचन का स्मरण होते हुए भी, उन्होंने इसे विधि के विधान के रूप में स्वीकार कर लिया।

श्लोक 33 (bhagavata.9.18.33)

यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत । द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ३३ ॥

yaduṁ ca turvasuṁ caiva devayānī vyajāyata druhyuṁ cānuṁ ca pūruṁ ca śarmiṣṭhā vārṣaparvaṇī

देवयानी ने यदु और तुर्वसु को जन्म दिया; वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने द्रुह्यु, अनु और पूरु को जन्म दिया।

श्लोक 34 (bhagavata.9.18.34)

गर्भसम्भवमासुर्या भर्तुर्विज्ञाय मानिनी । देवयानी पितुर्गेहं ययौ क्रोधविमूर्छिता ॥ ३४ ॥

garbha-sambhavam āsuryā bhartur vijñāya māninī devayānī pitur gehaṁ yayau krodha-vimūrchitā

जब स्वाभिमानिनी देवयानी को यह ज्ञात हुआ कि असुर-कन्या शर्मिष्ठा अपने पति से गर्भवती हुई हैं, तो वे क्रोध से विह्वल होकर अपने पिता के घर चली गईं।

श्लोक 35 (bhagavata.9.18.35)

प्रियामनुगतः कामी वचोभिरुपमन्त्रयन् । न प्रसादयितुं शेके पादसंवाहनादिभिः ॥ ३५ ॥

priyām anugataḥ kāmī vacobhir upamantrayan na prasādayituṁ śeke pāda-saṁvāhanādibhiḥ

कामातुर राजा अपनी प्रिया के पीछे-पीछे गए और मधुर वचनों से तथा उनके चरण दबाकर उन्हें मनाने का प्रयत्न करते रहे, किन्तु वे उन्हें प्रसन्न न कर सके।

श्लोक 36 (bhagavata.9.18.36)

शुक्रस्तमाह कुपितः स्त्रीकामानृतपूरुष । त्वां जरा विशतां मन्द विरूपकरणी नृणाम् ॥ ३६ ॥

śukras tam āha kupitaḥ strī-kāmānṛta-pūruṣa tvāṁ jarā viśatāṁ manda virūpa-karaṇī nṛṇām

क्रुद्ध होकर शुक्राचार्य ने राजा से कहा — हे स्त्री-कामी, प्रतिज्ञा-भंजक मूर्ख! तुझे वृद्धावस्था घेर ले, जो मनुष्यों को कुरूप बना देती है।

श्लोक 37 (bhagavata.9.18.37)

श्रीययातिरुवाच अतृप्तोऽस्म्यद्य कामानां ब्रह्मन् दुहितरि स्म ते । व्यत्यस्यतां यथाकामं वयसा योऽभिधास्यति ॥ ३७ ॥

śrī-yayātir uvāca atṛpto ’smy adya kāmānāṁ brahman duhitari sma te vyatyasyatāṁ yathā-kāmaṁ vayasā yo ’bhidhāsyati

श्री ययाति ने कहा — हे ब्रह्मन्, आपकी पुत्री के प्रति मेरी कामनाएँ अभी तृप्त नहीं हुई हैं। (शुक्राचार्य ने कहा —) जो भी अपनी अवस्था तुझे देने को इच्छुक हो, उसके साथ यह अवस्था इच्छानुसार बदल ले।

श्लोक 38 (bhagavata.9.18.38)

इति लब्धव्यवस्थानः पुत्रं ज्येष्ठमवोचत । यदो तात प्रतीच्छेमां जरां देहि निजं वयः ॥ ३८ ॥

iti labdha-vyavasthānaḥ putraṁ jyeṣṭham avocata yado tāta pratīcchemāṁ jarāṁ dehi nijaṁ vayaḥ

इस प्रकार यह उपाय प्राप्त कर ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र से कहा — हे तात यदु, तुम यह मेरी वृद्धावस्था ग्रहण करो और मुझे अपनी युवावस्था दे दो।

श्लोक 39 (bhagavata.9.18.39)

मातामहकृतां वत्स न तृप्तो विषयेष्वहम् । वयसा भवदीयेन रंस्ये कतिपयाः समाः ॥ ३९ ॥

mātāmaha-kṛtāṁ vatsa na tṛpto viṣayeṣv aham vayasā bhavadīyena raṁsye katipayāḥ samāḥ

हे वत्स, मैं अभी विषय-भोगों से तृप्त नहीं हुआ हूँ — तुम्हारे नाना द्वारा दी गई इस वृद्धावस्था को लेकर, तुम्हारी युवावस्था से मैं कुछ और वर्ष भोग करना चाहता हूँ।

श्लोक 40 (bhagavata.9.18.40)

श्रीयदुरुवाच नोत्सहे जरसा स्थातुमन्तरा प्राप्तया तव । अविदित्वा सुखं ग्राम्यं वैतृष्ण्यं नैति पूरुषः ॥ ४० ॥

śrī-yadur uvāca notsahe jarasā sthātum antarā prāptayā tava aviditvā sukhaṁ grāmyaṁ vaitṛṣṇyaṁ naiti pūruṣaḥ

श्री यदु ने कहा — आपकी यह असमय आई हुई वृद्धावस्था धारण करने में मैं समर्थ नहीं हूँ। सांसारिक सुख को जाने बिना मनुष्य वैराग्य को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 41 (bhagavata.9.18.41)

तुर्वसुश्चोदितः पित्रा द्रुह्युश्चानुश्च भारत । प्रत्याचख्युरधर्मज्ञा ह्यनित्ये नित्यबुद्धयः ॥ ४१ ॥

turvasuś coditaḥ pitrā druhyuś cānuś ca bhārata pratyācakhyur adharmajñā hy anitye nitya-buddhayaḥ

हे भारत! जब तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु से भी पिता ने यही प्रार्थना की, तो धर्म के रहस्य से अनभिज्ञ वे भी, अनित्य को नित्य समझते हुए, इनकार कर बैठे।

श्लोक 42 (bhagavata.9.18.42)

अपृच्छत् तनयं पूरुं वयसोनं गुणाधिकम् । न त्वमग्रजवद् वत्स मां प्रत्याख्यातुमर्हसि ॥ ४२ ॥

apṛcchat tanayaṁ pūruṁ vayasonaṁ guṇādhikam na tvam agrajavad vatsa māṁ pratyākhyātum arhasi

तब उन्होंने अपने पुत्र पूरु से, जो अवस्था में सबसे छोटे किन्तु गुणों में सबसे बड़े थे, पूछा — हे वत्स, तुम अपने बड़े भाइयों की भाँति मुझे अस्वीकार मत करना।

श्लोक 43 (bhagavata.9.18.43)

श्रीपूरुरुवाच को नु लोके मनुष्येन्द्र पितुरात्मकृतः पुमान् । प्रतिकर्तुं क्षमो यस्य प्रसादाद् विन्दते परम् ॥ ४३ ॥

śrī-pūrur uvāca ko nu loke manuṣyendra pitur ātma-kṛtaḥ pumān pratikartuṁ kṣamo yasya prasādād vindate param

श्री पूरु ने कहा — हे मनुष्येन्द्र! इस लोक में ऐसा कौन पुरुष है, जो पिता द्वारा उत्पन्न होकर, जिनकी कृपा से परम पद प्राप्त होता है, उनका ऋण चुका सके?

श्लोक 44 (bhagavata.9.18.44)

उत्तमश्चिन्तितं कुर्यात् प्रोक्तकारी तु मध्यमः । अधमोऽश्रद्धया कुर्यादकर्तोच्चरितं पितुः ॥ ४४ ॥

uttamaś cintitaṁ kuryāt prokta-kārī tu madhyamaḥ adhamo ’śraddhayā kuryād akartoccaritaṁ pituḥ

उत्तम पुत्र पिता के मनोभाव को समझकर ही उसे पूर्ण कर देता है; मध्यम पुत्र आज्ञा पाकर करता है; अधम अश्रद्धापूर्वक करता है — किन्तु जो कुछ भी नहीं करता, वह तो मानो पिता का त्यागा हुआ मलमूत्र है।

श्लोक 45 (bhagavata.9.18.45)

इति प्रमुदितः पूरुः प्रत्यगृह्णाज्जरां पितुः । सोऽपि तद्वयसा कामान् यथावज्जुजुषे नृप ॥ ४५ ॥

iti pramuditaḥ pūruḥ pratyagṛhṇāj jarāṁ pituḥ so ’pi tad-vayasā kāmān yathāvaj jujuṣe nṛpa

इस प्रकार पूरु ने प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता की वृद्धावस्था स्वीकार कर ली; और राजा ययाति उस युवावस्था से यथेच्छ भोग करने लगे।

श्लोक 46 (bhagavata.9.18.46)

सप्तद्वीपपतिः सम्यक् पितृवत् पालयन् प्रजाः । यथोपजोषं विषयाञ्जुजुषेऽव्याहतेन्द्रियः ॥ ४६ ॥

sapta-dvīpa-patiḥ saṁyak pitṛvat pālayan prajāḥ yathopajoṣaṁ viṣayāñ jujuṣe ’vyāhatendriyaḥ

सप्त द्वीपों के अधिपति ययाति प्रजा का पिता के समान भली-भाँति पालन करते हुए, अक्षुण्ण इन्द्रियों के साथ यथेच्छ विषय-भोग करने लगे।

श्लोक 47 (bhagavata.9.18.47)

देवयान्यप्यनुदिनं मनोवाग्देहवस्तुभिः । प्रेयसः परमां प्रीतिमुवाह प्रेयसी रहः ॥ ४७ ॥

devayāny apy anudinaṁ mano-vāg-deha-vastubhiḥ preyasaḥ paramāṁ prītim uvāha preyasī rahaḥ

देवयानी भी, अपने प्रियतम की प्रिया, प्रतिदिन एकान्त में मन, वाणी, शरीर तथा अन्य सभी उपायों से अपने पति को परम प्रसन्नता प्रदान करती रहीं।

श्लोक 48 (bhagavata.9.18.48)

अयजद् यज्ञपुरुषं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । सर्वदेवमयं देवं सर्ववेदमयं हरिम् ॥ ४८ ॥

ayajad yajña-puruṣaṁ kratubhir bhūri-dakṣiṇaiḥ sarva-devamayaṁ devaṁ sarva-vedamayaṁ harim

उन्होंने प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों द्वारा साक्षात् यज्ञपुरुष भगवान हरि की आराधना की, जो समस्त देवताओं के स्वरूप तथा समस्त वेदों के सार हैं।

श्लोक 49 (bhagavata.9.18.49)

यस्मिन्निदं विरचितं व्योम्नीव जलदावलिः । नानेव भाति नाभाति स्वप्नमायामनोरथः ॥ ४९ ॥

yasminn idaṁ viracitaṁ vyomnīva jaladāvaliḥ nāneva bhāti nābhāti svapna-māyā-manorathaḥ

जिनमें यह सृष्टि उसी प्रकार रची गई है जैसे आकाश में मेघमाला, और जो अनेक रूपों में प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः प्रतीत नहीं होते, जैसे स्वप्न, माया अथवा मनोरथ हों।

श्लोक 50 (bhagavata.9.18.50)

तमेव हृदि विन्यस्य वासुदेवं गुहाशयम् । नारायणमणीयांसं निराशीरयजत् प्रभुम् ॥ ५० ॥

tam eva hṛdi vinyasya vāsudevaṁ guhāśayam nārāyaṇam aṇīyāṁsaṁ nirāśīr ayajat prabhum

उन्होंने हृदय-गुहा में निवास करने वाले, अणु से भी सूक्ष्म, भगवान वासुदेव नारायण को अपने हृदय में स्थापित कर, निष्काम भाव से उन प्रभु की आराधना की।

श्लोक 51 (bhagavata.9.18.51)

एवं वर्षसहस्राणि मनःषष्ठैर्मनःसुखम् । विदधानोऽपि नातृप्यत् सार्वभौमः कदिन्द्रियैः ॥ ५१ ॥

evaṁ varṣa-sahasrāṇi manaḥ-ṣaṣṭhair manaḥ-sukham vidadhāno ’pi nātṛpyat sārva-bhaumaḥ kad-indriyaiḥ

इस प्रकार सहस्र वर्षों तक मन-सहित छहों इन्द्रियों द्वारा मानसिक सुख का उपभोग करते हुए भी, वह सार्वभौम सम्राट अपनी दुर्दम इन्द्रियों से कभी तृप्त न हो सका।

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