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नवम स्कन्ध · अध्याय 22

अजमीढ के वंशज

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (bhagavata.9.22.1)

श्रीशुक उवाच मित्रायुश्च दिवोदासाच्च्यवनस्तत्सुतो नृप । सुदासः सहदेवोऽथ सोमको जन्तुजन्मकृत् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca mitrāyuś ca divodāsāc cyavanas tat-suto nṛpa sudāsaḥ sahadevo ’tha somako jantu-janmakṛt

श्री शुकदेव ने कहा — हे राजन्! दिवोदास से मित्रायु उत्पन्न हुए; उनके पुत्र च्यवन, सुदास, सहदेव तथा सोमक थे, जो जन्तु के जनक बने।

श्लोक 2 (bhagavata.9.22.2)

तस्य पुत्रशतं तेषां यवीयान् पृषतः सुतः । स तस्माद् द्रुपदो जज्ञे सर्वसम्पत्समन्वितः ॥ २ ॥

tasya putra-śataṁ teṣāṁ yavīyān pṛṣataḥ sutaḥ sa tasmād drupado jajñe sarva-sampat-samanvitaḥ

सोमक के सौ पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटे पृषत थे; पृषत से समस्त सम्पदाओं से युक्त द्रुपद उत्पन्न हुए।

श्लोक 3 (bhagavata.9.22.3)

द्रुपदाद् द्रौपदी तस्य धृष्टद्युम्नादयः सुताः । धृष्टद्युम्नाद् धृष्टकेतुर्भार्म्याः पाञ्चालका इमे ॥ ३ ॥

drupadād draupadī tasya dhṛṣṭadyumnādayaḥ sutāḥ dhṛṣṭadyumnād dhṛṣṭaketur bhārmyāḥ pāñcālakā ime

द्रुपद से द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्न आदि पुत्र उत्पन्न हुए; धृष्टद्युम्न से धृष्टकेतु हुए। ये सभी भर्म्याश्व के वंशज, पाञ्चाल कहलाते हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.9.22.4)

योऽजमीढसुतो ह्यन्य ऋक्षः संवरणस्ततः । तपत्यां सूर्यकन्यायां कुरुक्षेत्रपतिः कुरुः ॥ ४ ॥

yo ’jamīḍha-suto hy anya ṛkṣaḥ saṁvaraṇas tataḥ tapatyāṁ sūrya-kanyāyāṁ kurukṣetra-patiḥ kuruḥ

अजमीढ का एक अन्य पुत्र ऋक्ष हुआ; उससे संवरण उत्पन्न हुए; और सूर्य-कन्या तपती के गर्भ से कुरुक्षेत्र के अधिपति कुरु का जन्म हुआ।

श्लोक 5 (bhagavata.9.22.5)

परीक्षिः सुधनुर्जह्नुर्निषधश्च कुरोः सुताः । सुहोत्रोऽभूत् सुधनुषश्च्यवनोऽथ ततः कृती ॥ ५ ॥

parīkṣiḥ sudhanur jahnur niṣadhaś ca kuroḥ sutāḥ suhotro ’bhūt sudhanuṣaś cyavano ’tha tataḥ kṛtī

कुरु के पुत्र परीक्षि, सुधनु, जह्नु तथा निषध थे; सुधनु से सुहोत्र, सुहोत्र से च्यवन, और च्यवन से कृती उत्पन्न हुए।

श्लोक 6 (bhagavata.9.22.6)

वसुस्तस्योपरिचरो बृहद्रथमुखास्ततः । कुशाम्बमत्स्यप्रत्यग्रचेदिपाद्याश्च चेदिपाः ॥ ६ ॥

vasus tasyoparicaro bṛhadratha-mukhās tataḥ kuśāmba-matsya-pratyagra- cedipādyāś ca cedipāḥ

कृती के पुत्र उपरिचर वसु हुए; उनसे बृहद्रथ प्रमुख पुत्र उत्पन्न हुए, साथ ही कुशाम्ब, मत्स्य, प्रत्यग्र तथा चेदिप — ये सभी चेदि देश के शासक हुए।

श्लोक 7 (bhagavata.9.22.7)

बृहद्रथात् कुशाग्रोऽभूदृषभस्तस्य तत्सुतः । जज्ञे सत्यहितोऽपत्यं पुष्पवांस्तत्सुतो जहुः ॥ ७ ॥

bṛhadrathāt kuśāgro ’bhūd ṛṣabhas tasya tat-sutaḥ jajñe satyahito ’patyaṁ puṣpavāṁs tat-suto jahuḥ

बृहद्रथ से कुशाग्र उत्पन्न हुए; उनके पुत्र ऋषभ; उनके पुत्र सत्यहित; उनके पुत्र पुष्पवान् हुए; और उनके पुत्र जहु।

श्लोक 8 (bhagavata.9.22.8)

अन्यस्यामपि भार्यायां शकले द्वे बृहद्रथात् । ये मात्रा बहिरुत्सृष्टे जरया चाभिसन्धिते । जीव जीवेति क्रीडन्त्या जरासन्धोऽभवत् सुतः ॥ ८ ॥

anyasyām api bhāryāyāṁ śakale dve bṛhadrathāt ye mātrā bahir utsṛṣṭe jarayā cābhisandhite jīva jīveti krīḍantyā jarāsandho ’bhavat sutaḥ

बृहद्रथ ने अपनी एक अन्य पत्नी से दो खण्डों में विभक्त सन्तान को जन्म दिया, जिसे उनकी माता ने देखकर बाहर फिंकवा दिया; राक्षसी जरा ने खेल-खेल में "जीओ, जीओ" कहते हुए उन दोनों खण्डों को जोड़ दिया, जिससे पुत्र जरासन्ध का जन्म हुआ।

श्लोक 9 (bhagavata.9.22.9)

ततश्च सहदेवोऽभूत् सोमापिर्यच्छ्रुतश्रवाः । परीक्षिरनपत्योऽभूत् सुरथो नाम जाह्नवः ॥ ९ ॥

tataś ca sahadevo ’bhūt somāpir yac chrutaśravāḥ parīkṣir anapatyo ’bhūt suratho nāma jāhnavaḥ

उनसे सहदेव उत्पन्न हुए; उनसे सोमापि; उनसे श्रुतश्रवा। कुरु के पुत्र परीक्षि सन्तानहीन रहे; कुरु के पुत्र जह्नु के पुत्र सुरथ हुए।

श्लोक 10 (bhagavata.9.22.10)

ततो विदूरथस्तस्मात् सार्वभौमस्ततोऽभवत् । जयसेनस्तत्तनयो राधिकोऽतोऽयुताय्वभूत् ॥ १० ॥

tato vidūrathas tasmāt sārvabhaumas tato ’bhavat jayasenas tat-tanayo rādhiko ’to ’yutāyv abhūt

सुरथ से विदूरथ उत्पन्न हुए; उनसे सार्वभौम; उनके पुत्र जयसेन; उनसे राधिक, और राधिक से अयुतायु उत्पन्न हुए।

श्लोक 11 (bhagavata.9.22.11)

ततश्चाक्रोधनस्तस्माद् देवातिथिरमुष्य च । ऋक्षस्तस्य दिलीपोऽभूत् प्रतीपस्तस्य चात्मजः ॥ ११ ॥

tataś cākrodhanas tasmād devātithir amuṣya ca ṛkṣas tasya dilīpo ’bhūt pratīpas tasya cātmajaḥ

उनसे अक्रोधन उत्पन्न हुए; उनसे देवातिथि; उनके पुत्र ऋक्ष; उनके पुत्र दिलीप हुए; और उनके पुत्र प्रतीप हुए।

श्लोक 12 (bhagavata.9.22.12)

देवापिः शान्तनुस्तस्य बाह्लीक इति चात्मजाः । पितृराज्यं परित्यज्य देवापिस्तु वनं गतः ॥ १२ ॥

devāpiḥ śāntanus tasya bāhlīka iti cātmajāḥ pitṛ-rājyaṁ parityajya devāpis tu vanaṁ gataḥ

प्रतीप के पुत्र देवापि, शान्तनु तथा बाह्लीक थे। देवापि अपने पिता के राज्य को त्यागकर वन को चले गए —

श्लोक 13 (bhagavata.9.22.13)

अभवच्छान्तनू राजा प्राङ्महाभिषसंज्ञितः । यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं यौवनमेति सः ॥ १३ ॥

abhavac chāntanū rājā prāṅ mahābhiṣa-saṁjñitaḥ yaṁ yaṁ karābhyāṁ spṛśati jīrṇaṁ yauvanam eti saḥ

— और शान्तनु राजा बने। पूर्वजन्म में वे महाभिष नाम से जाने जाते थे। वे जिस-जिस वृद्ध पुरुष को अपने दोनों हाथों से स्पर्श करते, वह पुनः यौवन को प्राप्त हो जाता।

श्लोक 14 (bhagavata.9.22.14)

शान्तिमाप्नोति चैवाग्र्यां कर्मणा तेन शान्तनुः । समा द्वादश तद्राज्ये न ववर्ष यदा विभुः ॥ १४ ॥

śāntim āpnoti caivāgryāṁ karmaṇā tena śāntanuḥ samā dvādaśa tad-rājye na vavarṣa yadā vibhuḥ

इस शक्ति से वे सबको परम शान्ति प्रदान करते थे, इसीलिए उनका नाम शान्तनु पड़ा। जब समर्थ इन्द्र ने उनके राज्य पर बारह वर्षों तक वर्षा नहीं की —

श्लोक 15 (bhagavata.9.22.15)

शान्तनुर्ब्राह्मणैरुक्तः परिवेत्तायमग्रभुक् । राज्यं देह्यग्रजायाशु पुरराष्ट्रविवृद्धये ॥ १५ ॥

śāntanur brāhmaṇair uktaḥ parivettāyam agrabhuk rājyaṁ dehy agrajāyāśu pura-rāṣṭra-vivṛddhaye

— तब ब्राह्मणों ने शान्तनु से कहा — तुमने अपने बड़े भाई के अधिकार का उपभोग किया है; नगर तथा राष्ट्र की समृद्धि हेतु शीघ्र ही यह राज्य अपने ज्येष्ठ भ्राता को लौटा दो।

श्लोक 16 (bhagavata.9.22.16)

एवमुक्तो द्विजैर्ज्येष्ठं छन्दयामास सोऽब्रवीत् । तन्मन्त्रिप्रहितैर्विप्रैर्वेदाद् विभ्रंशितो गिरा ॥ १६ ॥

evam ukto dvijair jyeṣṭhaṁ chandayām āsa so ’bravīt tan-mantri-prahitair viprair vedād vibhraṁśito girā

ब्राह्मणों द्वारा ऐसा कहे जाने पर, शान्तनु ने जाकर अपने ज्येष्ठ भ्राता को वह राज्य अर्पित किया — किन्तु देवापि, किसी मन्त्री द्वारा भेजे गए ब्राह्मणों की वाणी से पहले ही वैदिक मार्ग से विचलित हो चुके थे, अतः उन्होंने वह राज्य लेने से इनकार कर दिया।

श्लोक 17 (bhagavata.9.22.17)

वेदवादातिवादान् वै तदा देवो ववर्ष ह । देवापिर्योगमास्थाय कलापग्राममाश्रितः ॥ १७ ॥

veda-vādātivādān vai tadā devo vavarṣa ha devāpir yogam āsthāya kalāpa-grāmam āśritaḥ

देवापि ने वेद-विरोधी वचन कहकर स्वयं को अयोग्य बना लिया, और शान्तनु ही पुनः राजा बने; तब देवता ने वर्षा की। देवापि ने योग-साधना का आश्रय लेकर कलाप-ग्राम में निवास किया।

श्लोक 18 (bhagavata.9.22.18)

सोमवंशे कलौ नष्टे कृतादौ स्थापयिष्यति । बाह्लीकात्सोमदत्तोऽभूद् भूरिर्भूरिश्रवास्ततः ॥ १८ ॥

soma-vaṁśe kalau naṣṭe kṛtādau sthāpayiṣyati bāhlīkāt somadatto ’bhūd bhūrir bhūriśravās tataḥ

जब कलियुग में सोमवंश नष्ट हो जाएगा, तब आने वाले सत्ययुग के आरम्भ में देवापि ही उसे पुनः स्थापित करेंगे। बाह्लीक से सोमदत्त उत्पन्न हुए; उनके पुत्र भूरि तथा भूरिश्रवा थे।

श्लोक 19 (bhagavata.9.22.19)

शलश्च शान्तनोरासीद् गङ्गायां भीष्म आत्मवान् । सर्वधर्मविदां श्रेष्ठो महाभागवतः कविः ॥ १९ ॥

śalaś ca śāntanor āsīd gaṅgāyāṁ bhīṣma ātmavān sarva-dharma-vidāṁ śreṣṭho mahā-bhāgavataḥ kaviḥ

— और शल भी उनके पुत्र थे। शान्तनु से, गंगा के गर्भ से, भीष्म का जन्म हुआ, जो आत्मसंयमी, समस्त धर्मों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ, महान भागवत भक्त तथा मनीषी थे।

श्लोक 20 (bhagavata.9.22.20)

वीरयूथाग्रणीर्येन रामोऽपि युधि तोषितः । शान्तनोर्दासकन्यायां जज्ञे चित्राङ्गदः सुतः ॥ २० ॥

vīra-yūthāgraṇīr yena rāmo ’pi yudhi toṣitaḥ śāntanor dāsa-kanyāyāṁ jajñe citrāṅgadaḥ sutaḥ

— योद्धाओं में अग्रणी, जिनसे युद्ध में स्वयं परशुराम भी सन्तुष्ट हो गए थे। शान्तनु से, धीवर-कन्या के गर्भ से, पुत्र चित्रांगद उत्पन्न हुए।

श्लोक 21 (bhagavata.9.22.21)

विचित्रवीर्यश्चावरजो नाम्ना चित्राङ्गदो हतः । यस्यां पराशरात् साक्षादवतीर्णो हरेः कला ॥ २१ ॥

vicitravīryaś cāvarajo nāmnā citrāṅgado hataḥ yasyāṁ parāśarāt sākṣād avatīrṇo hareḥ kalā

उनके छोटे भाई विचित्रवीर्य थे; उसी नाम के एक गन्धर्व, चित्रांगद, ने उन्हें (बड़े भाई को) मार डाला। उन्हीं सत्यवती से, पराशर मुनि द्वारा, साक्षात् भगवान हरि के अंश का अवतरण हुआ।

श्लोक 22 (bhagavata.9.22.22)

वेदगुप्तो मुनिः कृष्णो यतोऽहमिदमध्यगाम् । हित्वा स्वशिष्यान् पैलादीन्भगवान् बादरायणः ॥ २२ ॥

veda-gupto muniḥ kṛṣṇo yato ’ham idam adhyagām hitvā sva-śiṣyān pailādīn bhagavān bādarāyaṇaḥ

— वेदों के संरक्षक मुनि कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास), जिनसे मैंने स्वयं इस भागवत का अध्ययन किया; अपने अन्य शिष्यों, पैल आदि, को छोड़कर भगवान बादरायण ने यह मुझे ही सुनाया —

श्लोक 23 (bhagavata.9.22.23)

मह्यं पुत्राय शान्ताय परं गुह्यमिदं जगौ । विचित्रवीर्योऽथोवाह काशीराजसुते बलात् ॥ २३ ॥

mahyaṁ putrāya śāntāya paraṁ guhyam idaṁ jagau vicitravīryo ’thovāha kāśīrāja-sute balāt

— मुझे, अपने शान्त-चित्त पुत्र को, उन्होंने यह परम गुह्य भागवत सुनाया। इधर विचित्रवीर्य ने काशिराज की दोनों कन्याओं का बलपूर्वक वरण कर विवाह किया —

श्लोक 24 (bhagavata.9.22.24)

स्वयंवरादुपानीते अम्बिकाम्बालिके उभे । तयोरासक्तहृदयो गृहीतो यक्ष्मणा मृतः ॥ २४ ॥

svayaṁvarād upānīte ambikāmbālike ubhe tayor āsakta-hṛdayo gṛhīto yakṣmaṇā mṛtaḥ

— अम्बिका और अम्बालिका, जिन्हें स्वयंवर से हरकर लाया गया था। उन दोनों में अत्यन्त आसक्त-हृदय होने के कारण वे यक्ष्मा रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 25 (bhagavata.9.22.25)

क्षेत्रेऽप्रजस्य वै भ्रातुर्मात्रोक्तो बादरायणः । धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनत् ॥ २५ ॥

kṣetre ’prajasya vai bhrātur mātrokto bādarāyaṇaḥ dhṛtarāṣṭraṁ ca pāṇḍuṁ ca viduraṁ cāpy ajījanat

अपनी माता की आज्ञा से बादरायण (वेदव्यास) ने अपने सन्तानहीन भाई की पत्नियों के गर्भ से धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर को उत्पन्न किया।

श्लोक 26 (bhagavata.9.22.26)

गान्धार्यां धृतराष्ट्रस्य जज्ञे पुत्रशतं नृप । तत्र दुर्योधनो ज्येष्ठो दुःशला चापि कन्यका ॥ २६ ॥

gāndhāryāṁ dhṛtarāṣṭrasya jajñe putra-śataṁ nṛpa tatra duryodhano jyeṣṭho duḥśalā cāpi kanyakā

हे राजन्! गान्धारी के गर्भ से धृतराष्ट्र के सौ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें ज्येष्ठ दुर्योधन थे, तथा एक कन्या भी हुई, दुःशला।

श्लोक 27 (bhagavata.9.22.27)

शापान्मैथुनरुद्धस्य पाण्डोः कुन्त्यां महारथाः । जाता धर्मानिलेन्द्रेभ्यो युधिष्ठिरमुखास्त्रयः ॥ २७ ॥

śāpān maithuna-ruddhasya pāṇḍoḥ kuntyāṁ mahā-rathāḥ jātā dharmānilendrebhyo yudhiṣṭhira-mukhās trayaḥ

शाप के कारण मैथुन से वंचित पाण्डु के, कुन्ती के गर्भ से, धर्म, वायु तथा इन्द्र द्वारा युधिष्ठिर आदि तीन महारथी पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 28 (bhagavata.9.22.28)

नकुलः सहदेवश्च माद्रयां नासत्यदस्रयोः । द्रौपद्यां पञ्च पञ्चभ्यः पुत्रास्ते पितरोऽभवन् ॥ २८ ॥

nakulaḥ sahadevaś ca mādryāṁ nāsatya-dasrayoḥ draupadyāṁ pañca pañcabhyaḥ putrās te pitaro ’bhavan

माद्री के गर्भ से, नासत्य तथा दस्र नामक अश्विनीकुमारों द्वारा नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए। द्रौपदी के गर्भ से उन पाँचों भाइयों को पाँच पुत्र प्राप्त हुए — वे ही तुम्हारे चाचा-तुल्य हैं।

श्लोक 29 (bhagavata.9.22.29)

युधिष्ठिरात् प्रतिविन्ध्यः श्रुतसेनो वृकोदरात् । अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ २९ ॥

yudhiṣṭhirāt prativindhyaḥ śrutaseno vṛkodarāt arjunāc chrutakīrtis tu śatānīkas tu nākuliḥ

युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य उत्पन्न हुए; वृकोदर (भीम) से श्रुतसेन; अर्जुन से श्रुतकीर्ति; और नकुल से शतानीक।

श्लोक 30 (bhagavata.9.22.30)

सहदेवसुतो राजञ्छ्रुतकर्मा तथापरे । युधिष्ठिरात् तु पौरव्यां देवकोऽथ घटोत्कचः ॥ ३० ॥

sahadeva-suto rājañ chrutakarmā tathāpare yudhiṣṭhirāt tu pauravyāṁ devako ’tha ghaṭotkacaḥ

हे राजन्! सहदेव के पुत्र श्रुतकर्मा हुए। इनके अतिरिक्त भी अन्य पुत्र थे — पौरवी के गर्भ से युधिष्ठिर को देवक प्राप्त हुए; और घटोत्कच —

श्लोक 31 (bhagavata.9.22.31)

भीमसेनाद्धिडिम्बायां काल्यां सर्वगतस्ततः । सहदेवात् सुहोत्रं तु विजयासूत पार्वती ॥ ३१ ॥

bhīmasenād dhiḍimbāyāṁ kālyāṁ sarvagatas tataḥ sahadevāt suhotraṁ tu vijayāsūta pārvatī

— भीमसेन को हिडिम्बा के गर्भ से घटोत्कच, तथा काली के गर्भ से सर्वगत प्राप्त हुए। सहदेव को पर्वतराज-कन्या विजया के गर्भ से सुहोत्र प्राप्त हुए।

श्लोक 32 (bhagavata.9.22.32)

करेणुमत्यां नकुलो नरमित्रं तथार्जुनः । इरावन्तमुलुप्यां वै सुतायां बभ्रुवाहनम् । मणिपुरपतेः सोऽपि तत्पुत्रः पुत्रिकासुतः ॥ ३२ ॥

kareṇumatyāṁ nakulo naramitraṁ tathārjunaḥ irāvantam ulupyāṁ vai sutāyāṁ babhruvāhanam maṇipura-pateḥ so ’pi tat-putraḥ putrikā-sutaḥ

करेणुमती के गर्भ से नकुल को नरमित्र प्राप्त हुए; अर्जुन को उलूपी के गर्भ से इरावान्, तथा मणिपुर-नरेश की कन्या के गर्भ से बभ्रुवाहन प्राप्त हुए, जो स्वयं अर्जुन के ही पुत्र होते हुए भी उस राजा के दत्तक-पुत्र (पुत्रिका-पुत्र) बने।

श्लोक 33 (bhagavata.9.22.33)

तव तातः सुभद्रायामभिमन्युरजायत । सर्वातिरथजिद् वीर उत्तरायां ततो भवान् ॥ ३३ ॥

tava tātaḥ subhadrāyām abhimanyur ajāyata sarvātirathajid vīra uttarāyāṁ tato bhavān

तुम्हारे पिता अभिमन्यु सुभद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुए — वे ऐसे वीर थे जो अतिरथियों तक को पराजित कर सकते थे; और उन्हीं से, उत्तरा के गर्भ से, तुम्हारा जन्म हुआ।

श्लोक 34 (bhagavata.9.22.34)

परिक्षीणेषु कुरुषु द्रौणेर्ब्रह्मास्त्रतेजसा । त्वं च कृष्णानुभावेन सजीवो मोचितोऽन्तकात् ॥ ३४ ॥

parikṣīṇeṣu kuruṣu drauṇer brahmāstra-tejasā tvaṁ ca kṛṣṇānubhāvena sajīvo mocito ’ntakāt

जब कुरुवंश लगभग नष्ट हो चुका था, तब तुम भी द्रोण-पुत्र के ब्रह्मास्त्र के तेज से आहत होकर मृत्यु के मुख में जाने ही वाले थे, कि भगवान कृष्ण के प्रभाव से जीवित बचा लिए गए।

श्लोक 35 (bhagavata.9.22.35)

तवेमे तनयास्तात जनमेजयपूर्वकाः । श्रुतसेनो भीमसेन उग्रसेनश्च वीर्यवान् ॥ ३५ ॥

taveme tanayās tāta janamejaya-pūrvakāḥ śrutaseno bhīmasena ugrasenaś ca vīryavān

हे तात! ये तुम्हारे ही पुत्र हैं — सबसे प्रथम जनमेजय, फिर श्रुतसेन, भीमसेन, तथा पराक्रमी उग्रसेन।

श्लोक 36 (bhagavata.9.22.36)

जनमेजयस्त्वां विदित्वा तक्षकान्निधनं गतम् । सर्पान् वै सर्पयागाग्नौ स होष्यति रुषान्वितः ॥ ३६ ॥

janamejayas tvāṁ viditvā takṣakān nidhanaṁ gatam sarpān vai sarpa-yāgāgnau sa hoṣyati ruṣānvitaḥ

जब जनमेजय को यह ज्ञात होगा कि तक्षक के द्वारा तुम्हारी मृत्यु हुई है, तब वह क्रोध से भरकर सर्प-यज्ञ की अग्नि में सर्पों की आहुति देगा।

श्लोक 37 (bhagavata.9.22.37)

कालषेयं पुरोधाय तुरं तुरगमेधषाट् । समन्तात् पृथिवीं सर्वां जित्वा यक्ष्यति चाध्वरैः ॥ ३७ ॥

kālaṣeyaṁ purodhāya turaṁ turaga-medhaṣāṭ samantāt pṛthivīṁ sarvāṁ jitvā yakṣyati cādhvaraiḥ

कलष के पुत्र तुर को पुरोहित बनाकर, वह समस्त पृथ्वी को चारों ओर से जीतकर, अश्वमेध-विजयी कहलाकर अनेक महायज्ञ सम्पन्न करेगा।

श्लोक 38 (bhagavata.9.22.38)

तस्य पुत्रः शतानीको याज्ञवल्क्यात् त्रयीं पठन् । अस्त्रज्ञानं क्रियाज्ञानं शौनकात् परमेष्यति ॥ ३८ ॥

tasya putraḥ śatānīko yājñavalkyāt trayīṁ paṭhan astra-jñānaṁ kriyā-jñānaṁ śaunakāt param eṣyati

उनके पुत्र शतानीक होंगे, जो याज्ञवल्क्य से त्रयी-वेद का अध्ययन करते हुए, अस्त्र-विद्या तथा क्रिया-विद्या का परम ज्ञान शौनक से प्राप्त करेंगे।

श्लोक 39 (bhagavata.9.22.39)

सहस्रानीकस्तत्पुत्रस्ततश्चैवाश्वमेधजः । असीमकृष्णस्तस्यापि नेमिचक्रस्तु तत्सुतः ॥ ३९ ॥

sahasrānīkas tat-putras tataś caivāśvamedhajaḥ asīmakṛṣṇas tasyāpi nemicakras tu tat-sutaḥ

उनके पुत्र सहस्रानीक होंगे; उनसे अश्वमेधज; उनसे असीमकृष्ण; और उनके पुत्र नेमिचक्र होंगे।

श्लोक 40 (bhagavata.9.22.40)

गजाह्वये हृते नद्या कौशाम्ब्यां साधु वत्स्यति । उक्तस्ततश्चित्ररथस्तस्माच्छुचिरथः सुतः ॥ ४० ॥

gajāhvaye hṛte nadyā kauśāmbyāṁ sādhu vatsyati uktas tataś citrarathas tasmāc chucirathaḥ sutaḥ

जब गजाह्वय (हस्तिनापुर) नदी के प्रवाह में बह जाएगा, तब वह कौशाम्बी में भली-भाँति निवास करेगा। उनके पुत्र चित्ररथ नाम से विख्यात होंगे, और उनके पुत्र शुचिरथ होंगे।

श्लोक 41 (bhagavata.9.22.41)

तस्माच्च वृष्टिमांस्तस्य सुषेणोऽथ महीपतिः । सुनीथस्तस्य भविता नृचक्षुर्यत् सुखीनलः ॥ ४१ ॥

tasmāc ca vṛṣṭimāṁs tasya suṣeṇo ’tha mahīpatiḥ sunīthas tasya bhavitā nṛcakṣur yat sukhīnalaḥ

उनसे वृष्टिमान् उत्पन्न होंगे; उनके पुत्र सुषेण पृथ्वी के सम्राट् होंगे; उनके पुत्र सुनीथ होंगे; उनसे नृचक्षु, और उनसे सुखीनल उत्पन्न होंगे।

श्लोक 42 (bhagavata.9.22.42)

परिप्लवः सुतस्तस्मान्मेधावी सुनयात्मजः । नृपञ्जयस्ततो दूर्वस्तिमिस्तस्माज्जनिष्यति ॥ ४२ ॥

pariplavaḥ sutas tasmān medhāvī sunayātmajaḥ nṛpañjayas tato dūrvas timis tasmāj janiṣyati

उनके पुत्र परिप्लव होंगे; उनसे सुनय; उनके पुत्र मेधावी; उनसे नृपंजय; फिर दूर्व; और उनसे तिमि उत्पन्न होंगे।

श्लोक 43 (bhagavata.9.22.43)

तिमेर्बृहद्रथस्तस्माच्छतानीकः सुदासजः । शतानीकाद् दुर्दमनस्तस्यापत्यं महीनरः ॥ ४३ ॥

timer bṛhadrathas tasmāc chatānīkaḥ sudāsajaḥ śatānīkād durdamanas tasyāpatyaṁ mahīnaraḥ

तिमि से बृहद्रथ उत्पन्न होंगे; उनसे शतानीक, जिनके पुत्र सुदास होंगे; शतानीक से दुर्दमन, और उनके पुत्र महीनर होंगे।

श्लोक 44 (bhagavata.9.22.44)

दण्डपाणिर्निमिस्तस्य क्षेमको भविता यतः । ब्रह्मक्षत्रस्य वै योनिर्वंशो देवर्षिसत्कृतः ॥ ४४ ॥

daṇḍapāṇir nimis tasya kṣemako bhavitā yataḥ brahma-kṣatrasya vai yonir vaṁśo devarṣi-satkṛtaḥ

उनके पुत्र दण्डपाणि होंगे; उनके पुत्र निमि, जिनसे क्षेमक उत्पन्न होंगे। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह वंश बताया, जो ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों का उद्गम है, तथा देवताओं और ऋषियों द्वारा सम्मानित है।

श्लोक 45 (bhagavata.9.22.45)

क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ । अथ मागधराजानो भाविनो ये वदामि ते ॥ ४५ ॥

kṣemakaṁ prāpya rājānaṁ saṁsthāṁ prāpsyati vai kalau atha māgadha-rājāno bhāvino ye vadāmi te

राजा क्षेमक तक पहुँचकर यह वंश कलियुग में अपनी समाप्ति को प्राप्त होगा। अब मैं तुम्हें मगध के भावी राजाओं के विषय में बताता हूँ।

श्लोक 46 (bhagavata.9.22.46)

भविता सहदेवस्य मार्जारिर्यच्छ्रुतश्रवाः । ततो युतायुस्तस्यापि निरमित्रोऽथ तत्सुतः ॥ ४६ ॥

bhavitā sahadevasya mārjārir yac chrutaśravāḥ tato yutāyus tasyāpi niramitro ’tha tat-sutaḥ

सहदेव (जरासन्ध-पुत्र) के पुत्र मार्जारि होंगे; उनसे श्रुतश्रवा; उनसे युतायु; और उनके पुत्र निरमित्र होंगे।

श्लोक 47 (bhagavata.9.22.47)

सुनक्षत्रः सुनक्षत्राद् बृहत्सेनोऽथ कर्मजित् । ततः सुतञ्जयाद् विप्रः शुचिस्तस्य भविष्यति ॥ ४७ ॥

sunakṣatraḥ sunakṣatrād bṛhatseno ’tha karmajit tataḥ sutañjayād vipraḥ śucis tasya bhaviṣyati

उनके पुत्र सुनक्षत्र होंगे; उनसे बृहत्सेन; फिर कर्मजित्; उनसे सुतंजय; उनके पुत्र विप्र; और उनके पुत्र शुचि होंगे।

श्लोक 48 (bhagavata.9.22.48)

क्षेमोऽथ सुव्रतस्तस्माद् धर्मसूत्रः समस्ततः । द्युमत्सेनोऽथ सुमतिः सुबलो जनिता ततः ॥ ४८ ॥

kṣemo ’tha suvratas tasmād dharmasūtraḥ samas tataḥ dyumatseno ’tha sumatiḥ subalo janitā tataḥ

उनके पुत्र क्षेम होंगे; उनसे सुव्रत; उनके पुत्र धर्मसूत्र; उनसे सम; फिर द्युमत्सेन; उनके पुत्र सुमति; और उनसे सुबल उत्पन्न होंगे।

श्लोक 49 (bhagavata.9.22.49)

सुनीथः सत्यजिदथ विश्वजिद् यद् रिपुञ्जयः । बार्हद्रथाश्च भूपाला भाव्याः साहस्रवत्सरम् ॥ ४९ ॥

sunīthaḥ satyajid atha viśvajid yad ripuñjayaḥ bārhadrathāś ca bhūpālā bhāvyāḥ sāhasra-vatsaram

उनके पुत्र सुनीथ होंगे; उनसे सत्यजित्; फिर विश्वजित्; और उनसे रिपुंजय होंगे। बृहद्रथ-वंश के ये सभी राजा एक सहस्र वर्षों तक शासन करेंगे।

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