नवम स्कन्ध · अध्याय 4
दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान
श्लोक 1 (bhagavata.9.4.1)
श्रीशुक उवाच नाभागो नभगापत्यं यं ततं भ्रातरः कविम् । यविष्ठं व्यभजन् दायं ब्रह्मचारिणमागतम् ॥ 4.1 ॥
śrī-śuka uvāca nābhāgo nabhagāpatyaṁ yaṁ tataṁ bhrātaraḥ kavim yaviṣṭhaṁ vyabhajan dāyaṁ brahmacāriṇam āgatam
नभग के पुत्र नाभाग बहुत काल तक गुरुकुल में ब्रह्मचारी रहे। जब वे लौटे, तब तक उनके भाइयों ने पिता की समस्त सम्पत्ति आपस में बाँट ली थी और सबसे छोटे उस भाई को पिता को ही उसका भाग बता दिया।
श्लोक 2 (bhagavata.9.4.2)
भ्रातरोऽभाङ्क्त किं मह्यं भजाम पितरं तव । त्वां ममार्यास्तताभाङ्क्षुर्मा पुत्रक तदादृथाः ॥ 4.2 ॥
bhrātaro ’bhāṅkta kiṁ mahyaṁ bhajāma pitaraṁ tava tvāṁ mamāryās tatābhāṅkṣur mā putraka tad ādṛthāḥ
नाभाग ने पूछा — "भाइयो, तुमने मुझे क्या भाग दिया?" उन्होंने कहा — "हमने तुम्हारे भाग में पिता को ही दिया है।" यह सुनकर नाभाग जब पिता के पास गए और यह बात कही, तो पिता ने कहा — "पुत्र, उनकी छलपूर्ण बात पर विश्वास मत करो; मैं तुम्हारी सम्पत्ति नहीं हूँ।"
श्लोक 3 (bhagavata.9.4.3)
इमे अङ्गिरसः सत्रमासतेऽद्य सुमेधसः । षष्ठं षष्ठमुपेत्याहः कवे मुह्यन्ति कर्मणि ॥ 4.3 ॥
ime aṅgirasaḥ satram āsate ’dya sumedhasaḥ ṣaṣṭhaṁ ṣaṣṭham upetyāhaḥ kave muhyanti karmaṇi
पिता ने कहा — "हे कवि! ये अंगिरा-वंशी अत्यन्त बुद्धिमान होते हुए भी अभी एक सत्र-यज्ञ कर रहे हैं, जिसमें प्रत्येक छठे दिन वे कर्म-सम्पादन में मोहित हो जाते हैं।"
श्लोक 4 (bhagavata.9.4.4)
तांस्त्वं शंसय सूक्ते द्वे वैश्वदेवे महात्मनः । ते स्वर्यन्तो धनं सत्रपरिशेषितमात्मनः ॥ 4.4 ॥
tāṁstvaṁ śaṁsaya sūkte dve vaiśvadeve mahātmanaḥ te svaryanto dhanaṁ satrapariśeṣitamātmanaḥ
"तुम उन महात्माओं को वैश्वदेव सम्बन्धी दो सूक्त सुनाओ। जब वे स्वर्ग की ओर प्रस्थान करेंगे, तब यज्ञ से शेष बचा हुआ अपना धन तुम्हें दे देंगे।"
श्लोक 5 (bhagavata.9.4.5)
दास्यन्ति तेऽथ तानर्च्छ तथा स कृतवान् यथा । तस्मै दत्त्वा ययुः स्वर्गं ते सत्रपरिशेषणम् ॥ 4.5 ॥
dāsyanti te ’tha tānarccha tathā sa kṛtavān yathā tasmai dattvā yayuḥ svargaṁ te satrapariśeṣaṇam
"वे तुम्हें अवश्य देंगे — ऐसा जाकर उनसे कहो।" पिता के कहे अनुसार ही नाभाग ने किया, और सत्र से बची हुई अपनी सम्पत्ति देकर वे ऋषिगण स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 6 (bhagavata.9.4.6)
तं कश्चित् स्वीकरिष्यन्तं पुरुषः कृष्णदर्शनः । उवाचोत्तरतोऽभ्येत्य ममेदं वास्तुकं वसु ॥ 4.6 ॥
taṁ kaścit svīkariṣyantaṁ puruṣaḥ kṛṣṇa-darśanaḥ uvācottarato ’bhyetya mamedaṁ vāstukaṁ vasu
जब नाभाग वह धन ग्रहण करने ही वाले थे, तभी उत्तर दिशा से एक श्यामवर्ण पुरुष आकर बोला — "इस यज्ञभूमि का यह सारा धन मेरा है।"
श्लोक 7 (bhagavata.9.4.7)
ममेदमृषिभिर्दत्तमिति तर्हि स्म मानवः । स्यान्नौ ते पितरि प्रश्नः पृष्टवान् पितरं यथा ॥ 4.7 ॥
mamedam ṛṣibhir dattam iti tarhi sma mānavaḥ syān nau te pitari praśnaḥ pṛṣṭavān pitaraṁ yathā
नाभाग ने कहा — "यह मुझे ऋषियों ने ही दिया है, यह मेरा है।" तब उस पुरुष ने कहा — "चलो, तुम्हारे पिता से ही यह प्रश्न पूछा जाए।" और नाभाग ने अपने पिता से यही जाकर पूछा।
श्लोक 8 (bhagavata.9.4.8)
यज्ञवास्तुगतं सर्वमुच्छिष्टमृषयः क्वचित् । चक्रुर्हि भागं रुद्राय स देवः सर्वमर्हति ॥ 4.8 ॥
yajña-vāstu-gataṁ sarvam ucchiṣṭam ṛṣayaḥ kvacit cakrur hi bhāgaṁ rudrāya sa devaḥ sarvam arhati
पिता ने कहा — "यज्ञभूमि में जो कुछ भी शेष बचता है, उसे प्राचीन काल में ऋषियों ने रुद्र का भाग निश्चित कर दिया था। अतः वह सब उन्हीं देव का अधिकार है।"
श्लोक 9 (bhagavata.9.4.9)
नाभागस्तं प्रणम्याह तवेश किल वास्तुकम् । इत्याह मे पिता ब्रह्मञ्छिरसा त्वां प्रसादये ॥ 4.9 ॥
nābhāgas taṁ praṇamyāha taveśa kila vāstukam ity āha me pitā brahmañ chirasā tvāṁ prasādaye
नाभाग ने उन्हें प्रणाम कर कहा — "हे ईश! यह यज्ञभूमि का धन आपका ही है — ऐसा मेरे पिता ने कहा है। हे ब्रह्मन्! मैं शीश झुकाकर आपसे क्षमा-प्रार्थना करता हूँ।"
श्लोक 10 (bhagavata.9.4.10)
यत् ते पितावदद् धर्मं त्वं च सत्यं प्रभाषसे । ददामि ते मन्त्रदृशो ज्ञानं ब्रह्म सनातनम् ॥ 4.10 ॥
yat te pitāvadad dharmaṁ tvaṁ ca satyaṁ prabhāṣase dadāmi te mantra-dṛśo jñānaṁ brahma sanātanam
रुद्र ने कहा — "तुम्हारे पिता ने जो धर्म कहा, वह सत्य है, और तुम भी सत्य ही बोल रहे हो। अतः मैं तुम्हें मन्त्रद्रष्टा ऋषियों का सनातन ब्रह्मज्ञान प्रदान करता हूँ।"
श्लोक 11 (bhagavata.9.4.11)
गृहाण द्रविणं दत्तं मत्सत्रपरिशेषितम् । इत्युक्त्वान्तर्हितो रुद्रो भगवान् धर्मवत्सलः ॥ 4.11 ॥
gṛhāṇa draviṇaṁ dattaṁ mat-satra-pariśeṣitam ity uktvāntarhito rudro bhagavān dharma-vatsalaḥ
"अब यह मेरे यज्ञ से बचा हुआ धन ग्रहण करो, मैं इसे तुम्हें देता हूँ।" ऐसा कहकर धर्मवत्सल भगवान रुद्र वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 12 (bhagavata.9.4.12)
य एतत् संस्मरेत् प्रातः सायं च सुसमाहितः । कविर्भवति मन्त्रज्ञो गतिं चैव तथात्मनः ॥ 4.12 ॥
ya etat saṁsmaret prātaḥ sāyaṁ ca susamāhitaḥ kavir bhavati mantra-jño gatiṁ caiva tathātmanaḥ
जो कोई प्रातः और सायं एकाग्रचित्त होकर इस कथा का स्मरण करता है, वह ज्ञानवान्, मन्त्रज्ञ बन जाता है और आत्मा की परम गति को भी प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 13 (bhagavata.9.4.13)
नाभागादम्बरीषोऽभून्महाभागवतः कृती । नास्पृशद् ब्रह्मशापोऽपि यं न प्रतिहतः क्वचित् ॥ 4.13 ॥
nābhāgād ambarīṣo ’bhūn mahā-bhāgavataḥ kṛtī nāspṛśad brahma-śāpo ’pi yaṁ na pratihataḥ kvacit
नाभाग के पुत्र अम्बरीष हुए, जो महान् भागवत भक्त और सत्कर्मी थे। ब्राह्मण का शाप, जो अन्यथा कभी विफल नहीं होता, उन्हें भी छू नहीं सका।
श्लोक 14 (bhagavata.9.4.14)
श्रीराजोवाच भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि राजर्षेस्तस्य धीमतः । न प्राभूद् यत्र निर्मुक्तो ब्रह्मदण्डो दुरत्ययः ॥ 4.14 ॥
śrī-rājovāca bhagavañ chrotum icchāmi rājarṣes tasya dhīmataḥ na prābhūd yatra nirmukto brahma-daṇḍo duratyayaḥ
राजा परीक्षित ने कहा — हे भगवन्! मैं उस बुद्धिमान राजर्षि अम्बरीष के विषय में सुनना चाहता हूँ, जिन पर छोड़ा गया दुर्निवार ब्रह्मदण्ड भी प्रभाव न डाल सका।
श्लोक 15 (bhagavata.9.4.15)
श्रीशुक उवाच अम्बरीषो महाभागः सप्तद्वीपवतीं महीम् । अव्ययां च श्रियं लब्ध्वा विभवं चातुलं भुवि ॥ 4.15 ॥
śrīśuka uvāca ambarīṣo mahābhāgaḥ saptadvīpavatīṁ mahīm avyayāṁ ca śriyaṁ labdhvā vibhavaṁ cātulaṁ bhuvi
शुकदेव जी ने कहा — परम भाग्यशाली अम्बरीष ने सप्तद्वीपमयी सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य, अक्षय लक्ष्मी और अतुल ऐश्वर्य प्राप्त किया,
श्लोक 16 (bhagavata.9.4.16)
मेनेऽतिदुर्लभं पुंसां सर्वं तत् स्वप्नसंस्तुतम् । विद्वान् विभवनिर्वाणं तमो विशति यत् पुमान् ॥ 4.16 ॥
mene ’tidurlabhaṁ puṁsāṁ sarvaṁ tat svapnasaṁstutam vidvān vibhavanirvāṇaṁ tamo viśati yat pumān
फिर भी उस विद्वान् राजा ने इस अत्यन्त दुर्लभ ऐश्वर्य को स्वप्न के समान क्षणभंगुर माना, यह जानते हुए कि इसके अन्त में मनुष्य अन्धकार में प्रवेश कर जाता है।
श्लोक 17 (bhagavata.9.4.17)
वासुदेवे भगवति तद्भक्तेषु च साधुषु । प्राप्तो भावं परं विश्वं येनेदं लोष्ट्रवत् स्मृतम् ॥ 4.17 ॥
vāsudeve bhagavati tad-bhakteṣu ca sādhuṣu prāpto bhāvaṁ paraṁ viśvaṁ yenedaṁ loṣṭravat smṛtam
भगवान वासुदेव और उनके साधु भक्तों के प्रति उन्होंने परम भाव प्राप्त कर लिया था, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व उन्हें मिट्टी के ढेले के समान प्रतीत होता था।
श्लोक 18 (bhagavata.9.4.18)
स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो- र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने । करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये ॥ 4.18 ॥
sa vai manaḥ kṛṣṇapadāravindayo- rvacāṁsi vaikuṇṭhaguṇānuvarṇane karau harermandiramārjanādiṣu śrutiṁ cakārācyutasatkathodaye
उन्होंने अपने मन को कृष्ण के चरण-कमलों में, वाणी को वैकुण्ठ के गुणों के वर्णन में, हाथों को हरि-मन्दिर की सफाई आदि सेवा में, और कानों को अच्युत की पावन कथाओं के श्रवण में नियोजित कर दिया।
श्लोक 19 (bhagavata.9.4.19)
मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तद्भृत्यगात्रस्पर्शेऽङ्गसङ्गमम् । घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते ॥ 4.19 ॥
mukundaliṅgālayadarśane dṛśau tadbhṛtyagātrasparśe ’ṅgasaṅgamam ghrāṇaṁ ca tatpādasarojasaurabhe śrīmattulasyā rasanāṁ tadarpite
उन्होंने अपनी आँखों को मुकुन्द की मूर्ति और मन्दिरों के दर्शन में, अपने शरीर के स्पर्श को उनके सेवकों के शरीर-स्पर्श में, अपनी घ्राण-शक्ति को उनके चरण-कमलों की तुलसी-सुगन्ध में, और अपनी जिह्वा को उन्हें अर्पित प्रसाद के रसास्वादन में लगाया।
श्लोक 20 (bhagavata.9.4.20)
पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृषीकेशपदाभिवन्दने । कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः ॥ 4.20 ॥
pādau hareḥ kṣetrapadānusarpaṇe śiro hṛṣīkeśapadābhivandane kāmaṁ ca dāsye na tu kāmakāmyayā yathottamaślokajanāśrayā ratiḥ
उन्होंने अपने चरणों को हरि के तीर्थ-स्थानों तक चलने में, अपने शीश को हृषीकेश के चरणों में प्रणाम करने में, और अपनी समस्त इच्छाओं को उन्हीं की सेवा में लगा दिया — किसी कामना की पूर्ति के लिए नहीं, अपितु उसी प्रीति के साथ जो उत्तमश्लोक भगवान के भक्तजनों में स्वाभाविक रूप से होती है।
श्लोक 21 (bhagavata.9.4.21)
एवं सदा कर्मकलापमात्मनः परेऽधियज्ञे भगवत्यधोक्षजे । सर्वात्मभावं विदधन्महीमिमां तन्निष्ठविप्राभिहितः शशास ह ॥ 4.21 ॥
evaṁ sadā karma-kalāpam ātmanaḥ pare ’dhiyajñe bhagavaty adhokṣaje sarvātma-bhāvaṁ vidadhan mahīm imāṁ tan-niṣṭha-viprābhihitaḥ śaśāsa ha
इस प्रकार अपने समस्त राजकीय कर्मों के फल को सदैव परम पुरुष, अधियज्ञ भगवान अधोक्षज को समर्पित करते हुए, तथा उन्हीं में निष्ठावान ब्राह्मणों की सम्मति से, उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन किया।
श्लोक 22 (bhagavata.9.4.22)
ईजेऽश्वमेधैरधियज्ञमीश्वरं महाविभूत्योपचिताङ्गदक्षिणैः । ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभि- र्धन्वन्यभिस्रोतमसौ सरस्वतीम् ॥ 4.22 ॥
īje ’śvamedhair adhiyajñam īśvaraṁ mahā-vibhūtyopacitāṅga-dakṣiṇaiḥ tatair vasiṣṭhāsita-gautamādibhir dhanvany abhisrotam asau sarasvatīm
उन्होंने वसिष्ठ, असित, गौतम आदि महर्षियों द्वारा सम्पन्न, महान् ऐश्वर्य और प्रचुर दक्षिणा से युक्त अश्वमेध यज्ञों द्वारा उस मरुस्थल में, जहाँ सरस्वती नदी बहती है, समस्त यज्ञों के स्वामी परमेश्वर की आराधना की।
श्लोक 23 (bhagavata.9.4.23)
यस्य क्रतुषु गीर्वाणैः सदस्या ऋत्विजो जनाः । तुल्यरूपाश्चानिमिषा व्यदृश्यन्त सुवाससः ॥ 4.23 ॥
yasya kratuṣu gīrvāṇaiḥ sadasyā ṛtvijo janāḥ tulya-rūpāś cānimiṣā vyadṛśyanta suvāsasaḥ
उनके यज्ञों में सभासद और ऋत्विजगण देवताओं के समान तेजस्वी, समान रूपवान्, अपलक-नेत्र और सुवस्त्रधारी दिखाई देते थे।
श्लोक 24 (bhagavata.9.4.24)
स्वर्गो न प्रार्थितो यस्य मनुजैरमरप्रियः । शृण्वद्भिरुपगायद्भिरुत्तमश्लोकचेष्टितम् ॥ 4.24 ॥
svargo na prārthito yasya manujair amara-priyaḥ śṛṇvadbhir upagāyadbhir uttamaśloka-ceṣṭitam
उनकी प्रजा भगवान की महिमामय लीलाओं का श्रवण और कीर्तन करती रहती थी, इसलिए उन्हें देवताओं को भी प्रिय वह स्वर्ग-लोक भी वांछनीय प्रतीत नहीं होता था।
श्लोक 25 (bhagavata.9.4.25)
संवर्धयन्ति यत् कामाः स्वाराज्यपरिभाविताः । दुर्लभा नापि सिद्धानां मुकुन्दं हृदि पश्यतः ॥ 4.25 ॥
saṁvardhayanti yat kāmāḥ svārājya-paribhāvitāḥ durlabhā nāpi siddhānāṁ mukundaṁ hṛdi paśyataḥ
वे सिद्धियाँ, जो योगियों की आत्म-प्रभुता की भावना से भी पोषित होती हैं और सिद्धों को भी दुर्लभ हैं, उस भक्त के लिए भी तुच्छ रहती हैं जो अपने हृदय में सदा मुकुन्द का दर्शन करता है।
श्लोक 26 (bhagavata.9.4.26)
स इत्थं भक्तियोगेन तपोयुक्तेन पार्थिवः । स्वधर्मेण हरिं प्रीणन् सर्वान् कामान्शनैर्जहौ ॥ 4.26 ॥
sa itthaṁ bhakti-yogena tapo-yuktena pārthivaḥ sva-dharmeṇa hariṁ prīṇan sarvān kāmān śanair jahau
इस प्रकार तपस्यायुक्त भक्तियोग द्वारा, अपने स्वधर्म से भगवान हरि को प्रसन्न करते हुए, उस राजा ने धीरे-धीरे समस्त कामनाओं का त्याग कर दिया।
श्लोक 27 (bhagavata.9.4.27)
गृहेषु दारेषु सुतेषु बन्धुषु द्विपोत्तमस्यन्दनवाजिवस्तुषु । अक्षय्यरत्नाभरणाम्बरादि- ष्वनन्तकोशेष्वकरोदसन्मतिम् ॥ 4.27 ॥
gṛheṣu dāreṣu suteṣu bandhuṣu dvipottama-syandana-vāji-vastuṣu akṣayya-ratnābharaṇāmbarādiṣv ananta-kośeṣv akarod asan-matim
घर, पत्नियों, पुत्रों, बन्धुओं, उत्तम गजों, रथों, अश्वों, अक्षय रत्नों, आभूषणों, वस्त्रों और अपार कोष के प्रति भी उन्होंने आसक्ति-रहित बुद्धि धारण कर ली।
श्लोक 28 (bhagavata.9.4.28)
तस्मा अदाद्धरिश्चक्रं प्रत्यनीकभयावहम् । एकान्तभक्तिभावेन प्रीतो भक्ताभिरक्षणम् ॥ 4.28 ॥
tasmā adād dhariś cakraṁ pratyanīka-bhayāvaham ekānta-bhakti-bhāvena prīto bhaktābhirakṣaṇam
उनके अनन्य भक्ति-भाव से प्रसन्न होकर भगवान हरि ने उन्हें अपना वह सुदर्शन चक्र प्रदान किया, जो शत्रुओं के लिए भयावह और भक्तों की रक्षा करने वाला है।
श्लोक 29 (bhagavata.9.4.29)
आरिराधयिषुः कृष्णं महिष्या तुल्यशीलया । युक्तः सांवत्सरं वीरो दधार द्वादशीव्रतम् ॥ 4.29 ॥
ārirādhayiṣuḥ kṛṣṇaṁ mahiṣyā tulya-śīlayā yuktaḥ sāṁvatsaraṁ vīro dadhāra dvādaśī-vratam
भगवान कृष्ण की आराधना करने की इच्छा से उस वीर राजा ने अपने ही समान शीलवती रानी के साथ एक वर्ष तक द्वादशी का व्रत धारण किया।
श्लोक 30 (bhagavata.9.4.30)
व्रतान्ते कार्तिके मासि त्रिरात्रं समुपोषितः । स्नातः कदाचित् कालिन्द्यां हरिं मधुवनेऽर्चयत् ॥ 4.30 ॥
vratānte kārtike māsi tri-rātraṁ samupoṣitaḥ snātaḥ kadācit kālindyāṁ hariṁ madhuvane ’rcayat
व्रत के अन्त में, कार्तिक मास में तीन रात्रि उपवास करके, एक बार यमुना में स्नान कर उन्होंने मधुवन में भगवान हरि की पूजा की।
श्लोक 31 (bhagavata.9.4.31)
महाभिषेकविधिना सर्वोपस्करसम्पदा । अभिषिच्याम्बराकल्पैर्गन्धमाल्यार्हणादिभिः ॥ 4.31 ॥
mahābhiṣekavidhinā sarvopaskarasampadā abhiṣicyāmbarākalpairgandhamālyārhaṇādibhiḥ
उन्होंने महाभिषेक की विधि से, समस्त सामग्री की सम्पदा सहित, वस्त्र, आभूषण, गन्ध, माला आदि पूजा-द्रव्यों से भगवान का अभिषेक किया,
श्लोक 32 (bhagavata.9.4.32)
तद्गतान्तरभावेन पूजयामास केशवम् । ब्राह्मणांश्च महाभागान् सिद्धार्थानपि भक्तितः ॥ 4.32 ॥
tadgatāntarabhāvena pūjayāmāsa keśavam brāhmaṇāṁśca mahābhāgān siddhārthānapi bhaktitaḥ
और अन्तःकरण को उन्हीं में लीन रखते हुए केशव की पूजा की, तथा भक्तिपूर्वक उन महाभाग ब्राह्मणों की भी अर्चना की, जिनकी कोई सांसारिक कामना शेष नहीं थी।
श्लोक 33 (bhagavata.9.4.33)
गवां रुक्मविषाणीनां रूप्याङ्घ्रीणां सुवाससाम् । पयःशीलवयोरूपवत्सोपस्करसम्पदाम् ॥ 4.33 ॥
gavāṁ rukmaviṣāṇīnāṁ rūpyāṅghrīṇāṁ suvāsasām payaḥśīlavayorūpavatsopaskarasampadām
उन्होंने स्वर्ण-मढ़े सींगों और रजत-मढ़े खुरों वाली, सुवस्त्रों से सज्जित, दुधारू, सुशील, युवा, सुन्दर तथा अपने बछड़ों सहित सम्पूर्ण गौओं को दान में दिया,
श्लोक 34 (bhagavata.9.4.34)
प्राहिणोत् साधुविप्रेभ्यो गृहेषु न्यर्बुदानि षट् । भोजयित्वा द्विजानग्रे स्वाद्वन्नं गुणवत्तमम् ॥ 4.34 ॥
prāhiṇot sādhuviprebhyo gṛheṣu nyarbudāni ṣaṭ bhojayitvā dvijānagre svādvannaṁ guṇavattamam
उन साधु ब्राह्मणों के घरों में साठ करोड़ गौएँ भिजवाईं, और सबसे पहले द्विजों को उत्तम गुणों से युक्त स्वादिष्ट अन्न खिलाया।
श्लोक 35 (bhagavata.9.4.35)
लब्धकामैरनुज्ञातः पारणायोपचक्रमे । तस्य तर्ह्यतिथिः साक्षाद् दुर्वासा भगवानभूत् ॥ 4.35 ॥
labdhakāmairanujñātaḥ pāraṇāyopacakrame tasya tarhyatithiḥ sākṣād durvāsā bhagavānabhūt
जब वे सन्तुष्ट ब्राह्मण अनुमति दे चुके, तब राजा व्रत का पारण करने ही वाले थे कि उसी समय साक्षात् दुर्वासा मुनि उनके अतिथि होकर वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 36 (bhagavata.9.4.36)
तमानर्चातिथिं भूपः प्रत्युत्थानासनार्हणैः । ययाचेऽभ्यवहाराय पादमूलमुपागतः ॥ 4.36 ॥
tam ānarcātithiṁ bhūpaḥ pratyutthānāsanārhaṇaiḥ yayāce ’bhyavahārāya pāda-mūlam upāgataḥ
राजा ने खड़े होकर, आसन और अर्घ्य आदि से उस अतिथि का सम्मान किया, और उनके चरणों में जाकर भोजन ग्रहण करने की प्रार्थना की।
श्लोक 37 (bhagavata.9.4.37)
प्रतिनन्द्य स तां याञ्चां कर्तुमावश्यकं गतः । निममज्ज बृहद् ध्यायन् कालिन्दीसलिले शुभे ॥ 4.37 ॥
pratinandya sa tāṁ yācñāṁ kartum āvaśyakaṁ gataḥ nimamajja bṛhad dhyāyan kālindī-salile śubhe
दुर्वासा मुनि ने उस निवेदन को सहर्ष स्वीकार किया, किन्तु नित्य-कर्म सम्पन्न करने के लिए चले गए, और यमुना के पवित्र जल में डुबकी लगाकर परब्रह्म का ध्यान करने लगे।
श्लोक 38 (bhagavata.9.4.38)
मुहूर्तार्धावशिष्टायां द्वादश्यां पारणं प्रति । चिन्तयामास धर्मज्ञो द्विजैस्तद्धर्मसङ्कटे ॥ 4.38 ॥
muhūrtārdhāvaśiṣṭāyāṁ dvādaśyāṁ pāraṇaṁ prati cintayām āsa dharma-jño dvijais tad-dharma-saṅkaṭe
जब द्वादशी का केवल आधा मुहूर्त शेष रह गया और पारण अभी होना था, तब धर्मज्ञ राजा उस धर्म-सङ्कट में ब्राह्मणों से विचार-विमर्श करने लगे।
श्लोक 39 (bhagavata.9.4.39)
ब्राह्मणातिक्रमे दोषो द्वादश्यां यदपारणे । यत् कृत्वा साधु मे भूयादधर्मो वा न मां स्पृशेत् ॥ 4.39 ॥
brāhmaṇātikrame doṣo dvādaśyāṁ yadapāraṇe yat kṛtvā sādhu me bhūyādadharmo vā na māṁ spṛśet
राजा ने कहा — "ब्राह्मण की अवहेलना करना दोष है, और द्वादशी में व्रत का पारण न करना भी दोष है। ऐसा कुछ बताइए जिससे मेरा कल्याण हो और अधर्म मुझे स्पर्श न करे।"
श्लोक 40 (bhagavata.9.4.40)
अम्भसा केवलेनाथ करिष्ये व्रतपारणम् । आहुरब्भक्षणं विप्रा ह्यशितं नाशितं च तत् ॥ 4.40 ॥
ambhasā kevalenātha kariṣye vratapāraṇam āhurabbhakṣaṇaṁ viprā hyaśitaṁ nāśitaṁ ca tat
"मैं केवल जल पीकर ही व्रत का पारण कर लूँगा, क्योंकि ब्राह्मणों ने कहा है कि जल-पान भोजन भी है और अभोजन भी।"
श्लोक 41 (bhagavata.9.4.41)
इत्यपः प्राश्य राजर्षिश्चिन्तयन् मनसाच्युतम् । प्रत्यचष्ट कुरुश्रेष्ठ द्विजागमनमेव सः ॥ 4.41 ॥
ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha dvijāgamanam eva saḥ
हे कुरुश्रेष्ठ! यह कहकर उस राजर्षि ने केवल जल ग्रहण किया, और मन में अच्युत का ध्यान करते हुए उस ब्राह्मण के लौट आने की प्रतीक्षा करने लगे।
श्लोक 42 (bhagavata.9.4.42)
दुर्वासा यमुनाकूलात् कृतावश्यक आगतः । राज्ञाभिनन्दितस्तस्य बुबुधे चेष्टितं धिया ॥ 4.42 ॥
durvāsā yamunā-kūlāt kṛtāvaśyaka āgataḥ rājñābhinanditas tasya bubudhe ceṣṭitaṁ dhiyā
यमुना-तट पर अपना नित्य-कर्म पूर्ण कर दुर्वासा मुनि लौट आए। राजा ने उनका हार्दिक स्वागत किया, किन्तु मुनि ने अपनी दिव्य दृष्टि से राजा के आचरण को जान लिया।
श्लोक 43 (bhagavata.9.4.43)
मन्युना प्रचलद्गात्रो भ्रुकुटीकुटिलाननः । बुभुक्षितश्च सुतरां कृताञ्जलिमभाषत ॥ 4.43 ॥
manyunā pracalad-gātro bhru-kuṭī-kuṭilānanaḥ bubhukṣitaś ca sutarāṁ kṛtāñjalim abhāṣata
क्रोध से काँपते हुए शरीर के साथ, भौंहें टेढ़ी किए हुए, और अत्यन्त क्षुधातुर, उन्होंने हाथ जोड़े खड़े राजा से इस प्रकार कहा।
श्लोक 44 (bhagavata.9.4.44)
अहो अस्य नृशंसस्य श्रियोन्मत्तस्य पश्यत । धर्मव्यतिक्रमं विष्णोरभक्तस्येशमानिनः ॥ 4.44 ॥
aho asya nṛ-śaṁsasya śriyonmattasya paśyata dharma-vyatikramaṁ viṣṇor abhaktasyeśa-māninaḥ
"अहो! देखो इस क्रूर, ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त, भगवान विष्णु के अभक्त, और स्वयं को ईश्वर मानने वाले इस राजा का धर्म-उल्लंघन!"
श्लोक 45 (bhagavata.9.4.45)
यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्त्र्य च । अदत्त्वा भुक्तवांस्तस्य सद्यस्ते दर्शये फलम् ॥ 4.45 ॥
yo mām atithim āyātam ātithyena nimantrya ca adattvā bhuktavāṁs tasya sadyas te darśaye phalam
"जिसने मुझ अतिथि को भोजन का निमन्त्रण देकर, मुझे कुछ दिए बिना ही स्वयं भोजन कर लिया — अभी तुम्हें उस कर्म का फल दिखाता हूँ।"
श्लोक 46 (bhagavata.9.4.46)
एवं ब्रुवाण उत्कृत्य जटां रोषप्रदीपितः । तया स निर्ममे तस्मै कृत्यां कालानलोपमाम् ॥ 4.46 ॥
evaṁ bruvāṇa utkṛtya jaṭāṁ roṣa-pradīpitaḥ tayā sa nirmame tasmai kṛtyāṁ kālānalopamām
ऐसा कहते हुए, क्रोध से प्रज्वलित होकर उन्होंने अपनी जटा से एक बाल उखाड़ा, और उससे कालाग्नि के समान भयंकर एक कृत्या (राक्षसी) उत्पन्न कर दी।
श्लोक 47 (bhagavata.9.4.47)
तामापतन्तीं ज्वलतीमसिहस्तां पदा भुवम् । वेपयन्तीं समुद्वीक्ष्य न चचाल पदान्नृपः ॥ 4.47 ॥
tām āpatantīṁ jvalatīm asi-hastāṁ padā bhuvam vepayantīṁ samudvīkṣya na cacāla padān nṛpaḥ
हाथ में तलवार लिए, प्रज्वलित, अपने पैरों से पृथ्वी को कँपाती हुई उस कृत्या को अपनी ओर आते देखकर भी वह राजा अपने स्थान से एक कदम भी विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 48 (bhagavata.9.4.48)
प्राग्दिष्टं भृत्यरक्षायां पुरुषेण महात्मना । ददाह कृत्यां तां चक्रं क्रुद्धाहिमिव पावकः ॥ 4.48 ॥
prāg diṣṭaṁ bhṛtya-rakṣāyāṁ puruṣeṇa mahātmanā dadāha kṛtyāṁ tāṁ cakraṁ kruddhāhim iva pāvakaḥ
महात्मा भगवान द्वारा पूर्व से ही अपने भक्त की रक्षा हेतु आदिष्ट सुदर्शन चक्र ने, जैसे अग्नि क्रुद्ध सर्प को भस्म कर देती है, उस कृत्या को उसी क्षण भस्म कर दिया।
श्लोक 49 (bhagavata.9.4.49)
तदभिद्रवदुद्वीक्ष्य स्वप्रयासं च निष्फलम् । दुर्वासा दुद्रुवे भीतो दिक्षु प्राणपरीप्सया ॥ 4.49 ॥
tad-abhidravad udvīkṣya sva-prayāsaṁ ca niṣphalam durvāsā dudruve bhīto dikṣu prāṇa-parīpsayā
अपने प्रयास को विफल होते और सुदर्शन चक्र को अपनी ओर बढ़ते देखकर दुर्वासा मुनि भयभीत होकर अपने प्राणों की रक्षा हेतु दिशा-दिशा में भागने लगे।
श्लोक 50 (bhagavata.9.4.50)
तमन्वधावद् भगवद्रथाङ्गं दावाग्निरुद्धूतशिखो यथाहिम् । तथानुषक्तं मुनिरीक्षमाणो गुहां विविक्षुः प्रससार मेरोः ॥ 4.50 ॥
tam anvadhāvad bhagavad-rathāṅgaṁ dāvāgnir uddhūta-śikho yathāhim tathānuṣaktaṁ munir īkṣamāṇo guhāṁ vivikṣuḥ prasasāra meroḥ
जैसे उठती हुई दावाग्नि की लपटें सर्प का पीछा करती हैं, वैसे ही भगवान का वह चक्र उनका पीछा करने लगा। उसे अपने साथ लगा हुआ देखकर मुनि मेरु पर्वत की किसी गुफा में छिपने की इच्छा से दौड़ पड़े।
श्लोक 51 (bhagavata.9.4.51)
दिशो नभः क्ष्मां विवरान्समुद्रान् लोकान् सपालांस्त्रिदिवं गतः सः । यतो यतो धावति तत्र तत्र सुदर्शनं दुष्प्रसहं ददर्श ॥ 4.51 ॥
diśo nabhaḥ kṣmāṁ vivarān samudrān lokān sapālāṁs tridivaṁ gataḥ saḥ yato yato dhāvati tatra tatra sudarśanaṁ duṣprasahaṁ dadarśa
वे दिशाओं में, आकाश में, पृथ्वी पर, गुफाओं में, समुद्रों में, लोकपालों सहित विभिन्न लोकों में, स्वर्ग तक भाग गए — किन्तु जहाँ-जहाँ भी वे दौड़े, वहीं-वहीं उन्हें वह असह्य सुदर्शन चक्र दिखाई दिया।
श्लोक 52 (bhagavata.9.4.52)
अलब्धनाथः स सदा कुतश्चित् सन्त्रस्तचित्तोऽरणमेषमाणः । देवं विरिञ्चं समगाद्विधात- स्त्राह्यात्मयोनेऽजिततेजसो माम् ॥ 4.52 ॥
alabdha-nāthaḥ sa sadā kutaścit santrasta-citto ’raṇam eṣamāṇaḥ devaṁ viriñcaṁ samagād vidhātas trāhy ātma-yone ’jita-tejaso mām
कहीं भी शरण न पाकर, सदा भयभीत-चित्त होकर आश्रय ढूँढ़ते हुए वे अन्ततः ब्रह्मा देव के पास पहुँचे और बोले — "हे स्वयम्भू विधाता! मुझे अजित भगवान के तेज से बचाइए।"
श्लोक 53 (bhagavata.9.4.53)
श्रीब्रह्मोवाच स्थानं मदीयं सहविश्वमेतत् क्रीडावसाने द्विपरार्धसंज्ञे । भ्रूभङ्गमात्रेण हि सन्दिधक्षोः कालात्मनो यस्य तिरोभविष्यति ॥ 4.53 ॥
śrībrahmovāca sthānaṁ madīyaṁ sahaviśvametat krīḍāvasāne dviparārdhasaṁjñe bhrūbhaṅgamātreṇa hi sandidhakṣoḥ kālātmano yasya tirobhaviṣyati
ब्रह्मा जी ने कहा — जिस द्विपरार्ध नामक काल-अवधि की समाप्ति पर, काल-स्वरूप उन प्रभु की भौंह के संकेत मात्र से, मेरा यह स्थान सम्पूर्ण विश्व सहित भस्म करने की इच्छा से लुप्त हो जाएगा,
श्लोक 54 (bhagavata.9.4.54)
अहं भवो दक्षभृगुप्रधानाः प्रजेशभूतेशसुरेशमुख्याः । सर्वे वयं यन्नियमं प्रपन्ना मूर्ध्न्यार्पितं लोकहितं वहामः ॥ 4.54 ॥
ahaṁ bhavo dakṣabhṛgupradhānāḥ prajeśabhūteśasureśamukhyāḥ sarve vayaṁ yanniyamaṁ prapannā mūrdhnyārpitaṁ lokahitaṁ vahāmaḥ
मैं, शिव, दक्ष और भृगु आदि प्रधान प्रजापति, तथा भूतेश्वर और सुरेश्वर आदि — हम सब उन्हीं की आज्ञा के अधीन हैं, और सबके कल्याण हेतु उसे शीश पर धारण करते हैं।
श्लोक 55 (bhagavata.9.4.55)
प्रत्याख्यातो विरिञ्चेन विष्णुचक्रोपतापितः । दुर्वासाः शरणं यातः शर्वं कैलासवासिनम् ॥ 4.55 ॥
pratyākhyāto viriñcena viṣṇu-cakropatāpitaḥ durvāsāḥ śaraṇaṁ yātaḥ śarvaṁ kailāsa-vāsinam
विष्णु-चक्र से संतप्त और ब्रह्मा द्वारा अस्वीकृत होकर दुर्वासा मुनि कैलासवासी भगवान शिव की शरण में गए।
श्लोक 56 (bhagavata.9.4.56)
श्रीशङ्कर उवाच वयं न तात प्रभवाम भूम्नि यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशाः । भवन्ति काले न भवन्ति हीदृशाः सहस्रशो यत्र वयं भ्रमामः ॥ 4.56 ॥
śrī-śaṅkara uvāca vayaṁ na tāta prabhavāma bhūmni yasmin pare ’nye ’py aja-jīva-kośāḥ bhavanti kāle na bhavanti hīdṛśāḥ sahasraśo yatra vayaṁ bhramāmaḥ
भगवान शंकर ने कहा — हे तात! उस परम सत्ता के समक्ष हम कुछ भी सामर्थ्य नहीं रखते, जिसमें असंख्य ब्रह्माण्ड और जीव-समूह काल-क्रम से उत्पन्न होते और लीन होते रहते हैं, और जिसमें हम स्वयं भी हजारों की संख्या में भ्रमण करते रहते हैं।
श्लोक 57 (bhagavata.9.4.57)
अहं सनत्कुमारश्च नारदो भगवानजः । कपिलोऽपान्तरतमो देवलो धर्म आसुरिः ॥ 4.57 ॥
ahaṁ sanatkumāraśca nārado bhagavānajaḥ kapilo ’pāntaratamo devalo dharma āsuriḥ
मैं, सनत्कुमार, नारद, भगवान ब्रह्मा, कपिल, अपान्तरतम (व्यास), देवल, धर्म और आसुरि —
श्लोक 58 (bhagavata.9.4.58)
मरीचिप्रमुखाश्चान्ये सिद्धेशाः पारदर्शनाः । विदाम न वयं सर्वे यन्मायां माययावृताः ॥ 4.58 ॥
marīcipramukhāścānye siddheśāḥ pāradarśanāḥ vidāma na vayaṁ sarve yanmāyāṁ māyayāvṛtāḥ
तथा मरीचि आदि अन्य सिद्धेश्वर, जो परम तत्व के दृष्टा हैं — हम सब भी उन्हीं की माया से आवृत होने के कारण उनकी माया को पूर्णतः नहीं जान सकते।
श्लोक 59 (bhagavata.9.4.59)
तस्य विश्वेश्वरस्येदं शस्त्रं दुर्विषहं हि नः । तमेवं शरणं याहि हरिस्ते शं विधास्यति ॥ 4.59 ॥
tasya viśveśvarasyedaṁ śastraṁ durviṣahaṁ hi naḥ tamevaṁ śaraṇaṁ yāhi hariste śaṁ vidhāsyati
उन्हीं विश्वेश्वर का यह अस्त्र हम सभी के लिए भी असह्य है। अतः उन्हीं की शरण में जाओ; भगवान हरि ही तुम्हारा कल्याण करेंगे।
श्लोक 60 (bhagavata.9.4.60)
ततो निराशो दुर्वासाः पदं भगवतो ययौ । वैकुण्ठाख्यं यदध्यास्ते श्रीनिवासः श्रिया सह ॥ 4.60 ॥
tato nirāśo durvāsāḥ padaṁ bhagavato yayau vaikuṇṭhākhyaṁ yad adhyāste śrīnivāsaḥ śriyā saha
तब निराश होकर दुर्वासा मुनि भगवान के उस वैकुण्ठ नामक धाम को गए, जहाँ श्रीनिवास भगवान लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं।
श्लोक 61 (bhagavata.9.4.61)
सन्दह्यमानोऽजितशस्त्रवह्निना तत्पादमूले पतितः सवेपथुः । आहाच्युतानन्त सदीप्सित प्रभो कृतागसं माव हि विश्वभावन ॥ 4.61 ॥
sandahyamāno ’jita-śastra-vahninā tat-pāda-mūle patitaḥ savepathuḥ āhācyutānanta sad-īpsita prabho kṛtāgasaṁ māvahi viśva-bhāvana
अजित भगवान के उस अस्त्र की अग्नि से संतप्त होकर, काँपते हुए वे उनके चरणों में गिर पड़े और बोले — "हे अच्युत! हे अनन्त! हे सदा वांछनीय प्रभु! हे विश्व के पालनकर्ता! मुझ अपराधी की रक्षा कीजिए।"
श्लोक 62 (bhagavata.9.4.62)
अजानता ते परमानुभावं कृतं मयाघं भवतः प्रियाणाम् । विधेहि तस्यापचितिं विधात- र्मुच्येत यन्नाम्न्युदिते नारकोऽपि ॥ 4.62 ॥
ajānatā te paramānubhāvaṁ kṛtaṁ mayāghaṁ bhavataḥ priyāṇām vidhehi tasyāpacitiṁ vidhātar mucyeta yan-nāmny udite nārako ’pi
"आपके परम प्रभाव को न जानते हुए मैंने आपके प्रियजन के प्रति यह अपराध कर दिया है। हे विधाता! उसका प्रायश्चित्त कर दीजिए — आपका नाम उच्चारित होने मात्र से तो नरकवासी भी मुक्त हो जाता है।"
श्लोक 63 (bhagavata.9.4.63)
श्रीभगवानुवाच अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥ 4.63 ॥
śrī-bhagavān uvāca ahaṁ bhakta-parādhīno hy asvatantra iva dvija sādhubhir grasta-hṛdayo bhaktair bhakta-jana-priyaḥ
भगवान ने कहा — हे द्विज! मैं अपने भक्तों के अधीन हूँ, मानो स्वतन्त्र ही न होऊँ। साधु भक्तों ने मेरे हृदय को अपने वश में कर लिया है, और उन भक्तों के भक्त भी मुझे प्रिय हैं।
श्लोक 64 (bhagavata.9.4.64)
नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तैः साधुभिर्विना । श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा ॥ 4.64 ॥
nāham ātmānam āśāse mad-bhaktaiḥ sādhubhir vinā śriyaṁ cātyantikīṁ brahman yeṣāṁ gatir ahaṁ parā
हे ब्रह्मन्! मैं अपने साधु भक्तों के बिना, जिनकी परम गति मैं ही हूँ, न तो अपना स्वरूप-सुख चाहता हूँ और न ही अपने परम ऐश्वर्य को।
श्लोक 65 (bhagavata.9.4.65)
ये दारागारपुत्राप्तप्राणान् वित्तमिमं परम् । हित्वा मां शरणं याताः कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे ॥ 4.65 ॥
ye dārāgāra-putrāpta- prāṇān vittam imaṁ param hitvā māṁ śaraṇaṁ yātāḥ kathaṁ tāṁs tyaktum utsahe
जिन्होंने अपनी पत्नी, घर, पुत्र, प्रिय जनों, प्राणों और इस परम धन तक को त्यागकर मेरी शरण ली है, उन्हें मैं कैसे त्याग सकता हूँ?
श्लोक 66 (bhagavata.9.4.66)
मयि निर्बद्धहृदयाः साधवः समदर्शनाः । वशेकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा ॥ 4.66 ॥
mayi nirbaddha-hṛdayāḥ sādhavaḥ sama-darśanāḥ vaśe kurvanti māṁ bhaktyā sat-striyaḥ sat-patiṁ yathā
जिस प्रकार सती स्त्रियाँ अपने सुशील पति को वश में कर लेती हैं, उसी प्रकार मेरे में हृदय बाँधे हुए, सम-दर्शी साधुजन भक्ति द्वारा मुझे अपने वश में कर लेते हैं।
श्लोक 67 (bhagavata.9.4.67)
मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादिचतुष्टयम् । नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविप्लुतम् ॥ 4.67 ॥
mat-sevayā pratītaṁ te sālokyādi-catuṣṭayam necchanti sevayā pūrṇāḥ kuto ’nyat kāla-viplutam
मेरी सेवा से स्वतः प्राप्त होने वाली सालोक्य आदि चारों मुक्तियों को भी वे नहीं चाहते, क्योंकि वे मेरी सेवा से ही पूर्ण-तृप्त रहते हैं — फिर काल के अधीन नष्ट होने वाले अन्य सुखों की तो बात ही क्या!
श्लोक 68 (bhagavata.9.4.68)
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् । मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥ 4.68 ॥
sādhavo hṛdayaṁ mahyaṁ sādhūnāṁ hṛdayaṁ tv aham mad-anyat te na jānanti nāhaṁ tebhyo manāg api
साधुजन ही मेरा हृदय हैं, और मैं ही साधुजनों का हृदय हूँ। वे मेरे सिवा और कुछ नहीं जानते, और मैं भी उनसे तनिक भी भिन्न कुछ नहीं जानता।
श्लोक 69 (bhagavata.9.4.69)
उपायं कथयिष्यामि तव विप्र शृणुष्व तत् । अयं ह्यात्माभिचारस्ते यतस्तं याहि मा चिरम् । साधुषु प्रहितं तेजः प्रहर्तुः कुरुतेऽशिवम् ॥ 4.69 ॥
upāyaṁ kathayiṣyāmi tava vipra śṛṇuṣva tat ayaṁ hy ātmābhicāras te yatas taṁ yāhi mā ciram sādhuṣu prahitaṁ tejaḥ prahartuḥ kurute ’śivam
हे विप्र! अब मैं तुम्हें उपाय बताता हूँ, सुनो — यह तो तुम्हारे अपने ही विरुद्ध किया गया अभिचार है, अतः बिना विलम्ब किए उसी राजा के पास जाओ। साधुजनों पर प्रयुक्त तेज उसके प्रयोग करने वाले का ही अशुभ करता है।
श्लोक 70 (bhagavata.9.4.70)
तपो विद्या च विप्राणां निःश्रेयसकरे उभे । ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥ 4.70 ॥
tapo vidyā ca viprāṇāṁ niḥśreyasa-kare ubhe te eva durvinītasya kalpete kartur anyathā
ब्राह्मणों के लिए तप और विद्या, दोनों ही कल्याणकारी हैं; किन्तु वे ही अविनीत व्यक्ति के लिए, उसके करने वाले के लिए ही, अनिष्टकारी बन जाते हैं।
श्लोक 71 (bhagavata.9.4.71)
ब्रह्मंस्तद् गच्छ भद्रं ते नाभागतनयं नृपम् । क्षमापय महाभागं ततः शान्तिर्भविष्यति ॥ 4.71 ॥
brahmaṁs tad gaccha bhadraṁ te nābhāga-tanayaṁ nṛpam kṣamāpaya mahā-bhāgaṁ tataḥ śāntir bhaviṣyati
हे ब्रह्मन्! अतः तुम्हारा कल्याण हो — जाओ, नाभाग-पुत्र उस महाभाग राजा से क्षमा माँगो; तभी तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी।