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नवम स्कन्ध · अध्याय 5

दुर्वासा मुनि के प्राणों की रक्षा

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (bhagavata.9.5.1)

श्रीशुक उवाच एवं भगवतादिष्टो दुर्वासाश्चक्रतापितः । अम्बरीषमुपावृत्य तत्पादौ दुःखितोऽग्रहीत् ॥ 5.1 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ bhagavatādiṣṭo durvāsāś cakra-tāpitaḥ ambarīṣam upāvṛtya tat-pādau duḥkhito ’grahīt

शुकदेव जी ने कहा — भगवान की इस आज्ञा को पाकर, सुदर्शन चक्र से अत्यन्त संतप्त दुर्वासा मुनि तुरन्त अम्बरीष के पास लौट आए, और अत्यन्त दुःखी होकर उनके चरणों को पकड़ लिया।

श्लोक 2 (bhagavata.9.5.2)

तस्य सोद्यममावीक्ष्य पादस्पर्शविलज्जितः । अस्तावीत् तद्धरेरस्त्रं कृपया पीडितो भृशम् ॥ 5.2 ॥

tasya sodyamam āvīkṣya pāda-sparśa-vilajjitaḥ astāvīt tad dharer astraṁ kṛpayā pīḍito bhṛśam

मुनि द्वारा अपने चरणों का स्पर्श किए जाने पर अम्बरीष अत्यन्त लज्जित हुए, और उनकी यह दयनीय दशा देखकर करुणा से अभिभूत हो उन्होंने तत्क्षण भगवान के उस अस्त्र की स्तुति करना आरम्भ किया।

श्लोक 3 (bhagavata.9.5.3)

अम्बरीष उवाच त्वमग्निर्भगवान् सूर्यस्त्वं सोमो ज्योतिषां पतिः । त्वमापस्त्वं क्षितिर्व्योम वायुर्मात्रेन्द्रियाणि च ॥ 5.3 ॥

ambarīṣa uvāca tvam agnir bhagavān sūryas tvaṁ somo jyotiṣāṁ patiḥ tvam āpas tvaṁ kṣitir vyoma vāyur mātrendriyāṇi ca

अम्बरीष ने कहा — तुम अग्नि हो, तुम भगवान सूर्य हो, तुम ज्योतियों के स्वामी सोम हो। तुम जल हो, तुम पृथ्वी हो, तुम आकाश हो, तुम वायु हो, तुम पाँचों तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ भी हो।

श्लोक 4 (bhagavata.9.5.4)

सुदर्शन नमस्तुभ्यं सहस्राराच्युतप्रिय । सर्वास्त्रघातिन् विप्राय स्वस्ति भूया इडस्पते ॥ 5.4 ॥

sudarśana namas tubhyaṁ sahasrārācyuta-priya sarvāstra-ghātin viprāya svasti bhūyā iḍaspate

हे सुदर्शन! हे सहस्र अरों वाले, अच्युत के प्रिय! तुम्हें नमस्कार है। हे विश्व के पालक, समस्त अस्त्रों के संहारक! इस ब्राह्मण का मंगल हो।

श्लोक 5 (bhagavata.9.5.5)

त्वं धर्मस्त्वमृतं सत्यं त्वं यज्ञोऽखिलयज्ञभुक् । त्वं लोकपालः सर्वात्मा त्वं तेजः पौरुषं परम् ॥ 5.5 ॥

tvaṁ dharmas tvam ṛtaṁ satyaṁ tvaṁ yajño ’khila-yajña-bhuk tvaṁ loka-pālaḥ sarvātmā tvaṁ tejaḥ pauruṣaṁ param

तुम धर्म हो, तुम अमृत हो, तुम सत्य हो, तुम यज्ञ हो, तुम समस्त यज्ञों के भोक्ता हो। तुम लोकपाल हो, तुम सर्वात्मा हो, तुम परम पौरुष-तेज हो।

श्लोक 6 (bhagavata.9.5.6)

नमः सुनाभाखिलधर्मसेतवे ह्यधर्मशीलासुरधूमकेतवे । त्रैलोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसे मनोजवायाद्भुतकर्मणे गृणे ॥ 5.6 ॥

namaḥ sunābhākhila-dharma-setave hy adharma-śīlāsura-dhūma-ketave trailokya-gopāya viśuddha-varcase mano-javāyādbhuta-karmaṇe gṛṇe

हे सुन्दर नाभि वाले! तुम समस्त धर्म के सेतु हो, अधर्मी असुरों के लिए मानो धूमकेतु हो। हे त्रैलोक्य के रक्षक, विशुद्ध तेजस्वी, मन के समान वेगवान, अद्भुत कर्म करने वाले! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 7 (bhagavata.9.5.7)

त्वत्तेजसा धर्ममयेन संहृतं तमः प्रकाशश्च दृशो महात्मनाम् । दुरत्ययस्ते महिमा गिरां पते त्वद्रूपमेतत् सदसत् परावरम् ॥ 5.7 ॥

tvat-tejasā dharma-mayena saṁhṛtaṁ tamaḥ prakāśaś ca dṛśo mahātmanām duratyayas te mahimā girāṁ pate tvad-rūpam etat sad-asat parāvaram

तुम्हारे धर्ममय तेज से महात्माओं की दृष्टि का अन्धकार दूर होकर प्रकाश उदित होता है। हे वाणी के स्वामी! तुम्हारी महिमा को लाँघना असम्भव है — यह समस्त सत् और असत्, स्थूल और सूक्ष्म तुम्हारा ही रूप है।

श्लोक 8 (bhagavata.9.5.8)

यदा विसृष्टस्त्वमनञ्जनेन वै बलं प्रविष्टोऽजित दैत्यदानवम् । बाहूदरोर्वङ्घ्रिशिरोधराणि वृश्चन्नजस्रं प्रधने विराजसे ॥ 5.8 ॥

yadā visṛṣṭas tvam anañjanena vai balaṁ praviṣṭo ’jita daitya-dānavam bāhūdarorv-aṅghri-śirodharāṇi vṛścann ajasraṁ pradhane virājase

हे अजित! जब निष्कलंक भगवान द्वारा भेजे जाकर तुम दैत्यों और दानवों की सेना में प्रवेश करते हो, तब निरन्तर उनकी भुजाओं, उदरों, जंघाओं, टाँगों और सिरों को काटते हुए युद्धभूमि में सुशोभित होते हो।

श्लोक 9 (bhagavata.9.5.9)

स त्वं जगत् त्राण खलप्रहाणये निरूपितः सर्वसहो गदाभृता । विप्रस्य चास्मत्कुलदैवहेतवे विधेहि भद्रं तदनुग्रहो हि नः ॥ 5.9 ॥

sa tvaṁ jagat-trāṇa khala-prahāṇaye nirūpitaḥ sarva-saho gadā-bhṛtā viprasya cāsmat-kula-daiva-hetave vidhehi bhadraṁ tad anugraho hi naḥ

तुम ही जगत् की रक्षा और दुष्टों के संहार हेतु गदाधारी भगवान द्वारा सर्वसमर्थ नियुक्त हुए हो। हमारे कुल के आराध्य इस ब्राह्मण के प्रति भी कल्याण करो — यही हम पर तुम्हारी सबसे बड़ी कृपा होगी।

श्लोक 10 (bhagavata.9.5.10)

यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा स्वधर्मो वा स्वनुष्ठितः । कुलं नो विप्रदैवं चेद् द्विजो भवतु विज्वरः ॥ 5.10 ॥

yady asti dattam iṣṭaṁ vā sva-dharmo vā svanuṣṭhitaḥ kulaṁ no vipra-daivaṁ ced dvijo bhavatu vijvaraḥ

यदि हमने कभी उचित पात्रों को दान दिया हो, यज्ञ किया हो, अपने स्वधर्म का भलीभाँति पालन किया हो, अथवा हमारा कुल सदा ब्राह्मणों को देवतुल्य मानता रहा हो, तो इसके बदले यह द्विज तापरहित हो जाए।

श्लोक 11 (bhagavata.9.5.11)

यदि नो भगवान् प्रीत एकः सर्वगुणाश्रयः । सर्वभूतात्मभावेन द्विजो भवतु विज्वरः ॥ 5.11 ॥

yadi no bhagavān prīta ekaḥ sarva-guṇāśrayaḥ sarva-bhūtātma-bhāvena dvijo bhavatu vijvaraḥ

यदि सर्वगुणों के आश्रय, अद्वितीय भगवान समस्त प्राणियों की आत्मा के भाव से हम पर प्रसन्न हों, तो यह द्विज तापरहित हो जाए।

श्लोक 12 (bhagavata.9.5.12)

श्रीशुक उवाच इति संस्तुवतो राज्ञो विष्णुचक्रं सुदर्शनम् । अशाम्यत् सर्वतो विप्रं प्रदहद् राजयाञ्चया ॥ 5.12 ॥

śrī-śuka uvāca iti saṁstuvato rājño viṣṇu-cakraṁ sudarśanam aśāmyat sarvato vipraṁ pradahad rāja-yācñayā

शुकदेव जी ने कहा — राजा की इस प्रार्थना पर वह विष्णु का सुदर्शन चक्र, जो सब ओर से उस ब्राह्मण को दग्ध कर रहा था, राजा की प्रार्थना से ही शान्त हो गया।

श्लोक 13 (bhagavata.9.5.13)

स मुक्तोऽस्त्राग्नितापेन दुर्वासाः स्वस्तिमांस्ततः । प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः ॥ 5.13 ॥

sa mukto ’strāgni-tāpena durvāsāḥ svastimāṁs tataḥ praśaśaṁsa tam urvīśaṁ yuñjānaḥ paramāśiṣaḥ

अस्त्र की अग्नि की पीड़ा से मुक्त होकर वे कल्याणयुक्त दुर्वासा मुनि प्रसन्न हुए और उस राजा की प्रशंसा करते हुए उन्हें उत्तम आशीर्वाद देने लगे।

श्लोक 14 (bhagavata.9.5.14)

दुर्वासा उवाच अहो अनन्तदासानां महत्त्वं दृष्टमद्य मे । कृतागसोऽपि यद् राजन् मङ्गलानि समीहसे ॥ 5.14 ॥

durvāsā uvāca aho ananta-dāsānāṁ mahattvaṁ dṛṣṭam adya me kṛtāgaso ’pi yad rājan maṅgalāni samīhase

दुर्वासा ने कहा — हे राजन्! आज मैंने भगवान के अनन्य दासों की महानता प्रत्यक्ष देखी है, कि अपराध करने पर भी तुम मेरे मंगल की ही कामना करते रहे।

श्लोक 15 (bhagavata.9.5.15)

दुष्करः को नु साधूनां दुस्त्यजो वा महात्मनाम् । यैः संगृहीतो भगवान् सात्वतामृषभो हरिः ॥ 5.15 ॥

duṣkaraḥ ko nu sādhūnāṁ dustyajo vā mahātmanām yaiḥ saṅgṛhīto bhagavān sātvatām ṛṣabho hariḥ

जिन्होंने सात्वतों के स्वामी भगवान हरि को अपने हृदय में बसा लिया है, उन साधुओं और महात्माओं के लिए भला क्या करना कठिन है, और क्या त्यागना असम्भव है?

श्लोक 16 (bhagavata.9.5.16)

यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः । तस्य तीर्थपदः किं वा दासानामवशिष्यते ॥ 5.16 ॥

yan-nāma-śruti-mātreṇa pumān bhavati nirmalaḥ tasya tīrtha-padaḥ kiṁ vā dāsānām avaśiṣyate

जिनका नाम केवल श्रवण मात्र से मनुष्य को निर्मल कर देता है, उन्हीं भगवान के तीर्थ-सम चरणों के दासों के लिए फिर क्या शेष रह जाता है जो असम्भव हो?

श्लोक 17 (bhagavata.9.5.17)

राजन्ननुगृहीतोऽहं त्वयातिकरुणात्मना । मदघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेऽभिरक्षिताः ॥ 5.17 ॥

rājann anugṛhīto ’haṁ tvayātikaruṇātmanā mad-aghaṁ pṛṣṭhataḥ kṛtvā prāṇā yan me ’bhirakṣitāḥ

हे राजन्! तुम अत्यन्त करुणाशील हो — तुमने मेरे अपराध को पीछे छोड़कर मेरे प्राणों की रक्षा की है, इसके लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ।

श्लोक 18 (bhagavata.9.5.18)

राजा तमकृताहारः प्रत्यागमनकाङ्क्षया । चरणावुपसङ्गृह्य प्रसाद्य समभोजयत् ॥ 5.18 ॥

rājā tam akṛtāhāraḥ pratyāgamana-kāṅkṣayā caraṇāv upasaṅgṛhya prasādya samabhojayat

मुनि के लौट आने की प्रतीक्षा में राजा ने स्वयं भोजन नहीं किया था। अतः लौटने पर उन्होंने मुनि के चरण पकड़कर उन्हें प्रसन्न किया और भलीभाँति भोजन कराया।

श्लोक 19 (bhagavata.9.5.19)

सोऽशित्वादृतमानीतमातिथ्यं सार्वकामिकम् । तृप्तात्मा नृपतिं प्राह भुज्यतामिति सादरम् ॥ 5.19 ॥

so ’śitvādṛtam ānītam ātithyaṁ sārva-kāmikam tṛptātmā nṛpatiṁ prāha bhujyatām iti sādaram

मनोवांछित भोजन ग्रहण कर पूर्णतः तृप्त हुए मुनि ने आदरपूर्वक राजा से कहा — "अब आप भी भोजन ग्रहण कीजिए।"

श्लोक 20 (bhagavata.9.5.20)

प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि तव भागवतस्य वै । दर्शनस्पर्शनालापैरातिथ्येनात्ममेधसा ॥ 5.20 ॥

prīto ’smy anugṛhīto ’smi tava bhāgavatasya vai darśana-sparśanālāpair ātithyenātma-medhasā

दुर्वासा ने कहा — हे भागवत! तुम्हारे दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप और तुम्हारी बुद्धिपूर्वक की गई इस आतिथ्य-सेवा से मैं अत्यन्त प्रसन्न और अनुगृहीत हुआ हूँ।

श्लोक 21 (bhagavata.9.5.21)

कर्मावदातमेतत् ते गायन्ति स्वःस्त्रियो मुहुः । कीर्तिं परमपुण्यां च कीर्तयिष्यति भूरियम् ॥ 5.21 ॥

karmāvadātam etat te gāyanti svaḥ-striyo muhuḥ kīrtiṁ parama-puṇyāṁ ca kīrtayiṣyati bhūr iyam

स्वर्ग की देवांगनाएँ भी बारम्बार तुम्हारे इस निर्मल चरित्र और परम पवित्र कीर्ति का गान करेंगी, और यह पृथ्वी भी तुम्हारी कीर्ति का बारम्बार कीर्तन करती रहेगी।

श्लोक 22 (bhagavata.9.5.22)

श्रीशुक उवाच एवं सङ्कीर्त्य राजानं दुर्वासाः परितोषितः । ययौ विहायसामन्त्र्य ब्रह्मलोकमहैतुकम् ॥ 5.22 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ saṅkīrtya rājānaṁ durvāsāḥ paritoṣitaḥ yayau vihāyasāmantrya brahmalokam ahaitukam

शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार राजा की महिमा का कीर्तन करते हुए, पूर्णतः सन्तुष्ट दुर्वासा मुनि उनसे विदा लेकर आकाश-मार्ग से उस निर्दोष ब्रह्मलोक को चले गए।

श्लोक 23 (bhagavata.9.5.23)

संवत्सरोऽत्यगात् तावद् यावता नागतो गतः । मुनिस्तद्दर्शनाकाङ्क्षो राजाब्भक्षो बभूव ह ॥ 5.23 ॥

saṁvatsaro ’tyagāt tāvad yāvatā nāgato gataḥ munis tad-darśanākāṅkṣo rājāb-bhakṣo babhūva ha

जब तक मुनि लौटकर नहीं आए, तब तक पूरे एक वर्ष तक राजा अन्न ग्रहण न करते हुए, मुनि के दर्शन की प्रतीक्षा में केवल जल पीकर रहे।

श्लोक 24 (bhagavata.9.5.24)

गतेऽथ दुर्वाससि सोऽम्बरीषो द्विजोपयोगातिपवित्रमाहरत् । ऋषेर्विमोक्षं व्यसनं च वीक्ष्य मेने स्ववीर्यं च परानुभावम् ॥ 5.24 ॥

gate ’tha durvāsasi so ’mbarīṣo dvijopayogātipavitram āharat ṛṣer vimokṣaṁ vyasanaṁ ca vīkṣya mene sva-vīryaṁ ca parānubhāvam

दुर्वासा के लौटने पर अम्बरीष ने उन्हें द्विजों के योग्य अत्यन्त पवित्र भोजन कराया, और मुनि को इस संकट से मुक्त हुआ देखकर उन्होंने यह सब भगवान के ही प्रभाव और अपने ही सामर्थ्य का फल माना।

श्लोक 25 (bhagavata.9.5.25)

एवं विधानेकगुणः स राजा परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे । क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं ययाविरिञ्च्यान् निरयांश्चकार ॥ 5.25 ॥

evaṁ vidhāneka-guṇaḥ sa rājā parātmani brahmaṇi vāsudeve kriyā-kalāpaiḥ samuvāha bhaktiṁ yayāviriñcyān nirayāṁś cakāra

इस प्रकार अनेक सद्गुणों से सम्पन्न वह राजा परब्रह्म भगवान वासुदेव में अपने समस्त कर्मों द्वारा भक्ति को समर्पित करता रहा, जिससे उसने ब्रह्मलोक तक को नरकतुल्य मान लिया।

श्लोक 26 (bhagavata.9.5.26)

श्रीशुक उवाच अथाम्बरीषस्तनयेषु राज्यं समानशीलेषु विसृज्य धीरः । वनं विवेशात्मनि वासुदेवे मनो दधद् ध्वस्तगुणप्रवाहः ॥ 5.26 ॥

śrī-śuka uvāca athāmbarīṣas tanayeṣu rājyaṁ samāna-śīleṣu visṛjya dhīraḥ vanaṁ viveśātmani vāsudeve mano dadhad dhvasta-guṇa-pravāhaḥ

शुकदेव जी ने कहा — तत्पश्चात् धीर अम्बरीष ने अपने ही समान गुणी पुत्रों में राज्य बाँटकर, समस्त गुणों के प्रवाह से मुक्त होकर, भगवान वासुदेव में मन को स्थिर करते हुए वन में प्रवेश किया।

श्लोक 27 (bhagavata.9.5.27)

इत्येतत् पुण्यमाख्यानमम्बरीषस्य भूपते । सङ्कीर्तयन्ननुध्यायन् भक्तो भगवतो भवेत् ॥ 5.27 ॥

ity etat puṇyam ākhyānam ambarīṣasya bhūpate saṅkīrtayann anudhyāyan bhakto bhagavato bhavet

हे राजन्! अम्बरीष के इस पवित्र आख्यान का जो कोई कीर्तन या स्मरण करता है, वह भगवान का भक्त हो जाता है।

श्लोक 28 (bhagavata.9.5.28)

अम्बरीषस्यचरितं येशृण्वन्तिमहात्मनः । मुक्तिं प्रयान्तितेसर्वेभक्त्याविष्णोः प्रसादतः ॥ 5.28 ॥

ambarīṣasya caritaṁ ye śṛṇvanti mahātmanaḥ muktiṁ prayānti te sarve bhaktyā viṣṇoḥ prasādataḥ

जो लोग महात्मा अम्बरीष के इस चरित्र को श्रवण करते हैं, वे सब भगवान विष्णु की कृपा से भक्तिपूर्वक मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

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