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प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2

ग्रन्थ-संख्या-विषय-वर्णन

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (devibhagavatam.1.2.1)

सूत उवाच । धन्योऽहमतिभाग्योऽहं पावितोऽहं महात्मभिः । यत्पृष्टं सुमहत्पुण्यं पुराणं वेदविश्रुतम् ॥ 2.1 ॥

sūta uvāca dhanyo'hamatibhāgyo'haṁ pāvito'haṁ mahātmabhiḥ yatpṛṣṭaṁ sumahatpuṇyaṁ purāṇaṁ vedaviśrutam

सूत ने कहा — मैं धन्य हूँ, अति भाग्यशाली हूँ, महात्माओं द्वारा पवित्र किया गया हूँ, क्योंकि मुझसे वेद के समान प्रसिद्ध वह महान पुण्यमय पुराण पूछा गया है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.1.2.2)

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि सर्वश्रुत्यर्थसम्मतम् । रहस्यं सर्वशास्त्राणामागमानामनुत्तमम् ॥ 2.2 ॥

tadahaṁ sampravakṣyāmi sarvaśrutyarthasammatam rahasyaṁ sarvaśāstrāṇāmāgamānāmanuttamam

वह मैं पूर्णरूप से कहूँगा, जो समस्त श्रुतियों के अर्थ से सम्मत है — समस्त शास्त्रों का रहस्य, आगमों में सर्वोत्तम।

श्लोक 3 (devibhagavatam.1.2.3)

नत्वा तत्पदपङ्कजं सुललितं मुक्तिप्रदं योगिनाम् ॥ ब्रह्माद्यैरपि सेवितं स्तुतिपरैर्ध्येयं मुनीन्द्रैः सदा । वक्ष्याम्यद्य सविस्तरं बहुरसं श्रीमत्पुराणोत्तमम् ॥ भक्त्या सर्वरसालयं भगवतीनाम्ना प्रसिद्धं द्विजाः ॥ 2.3 ॥

natvā tatpadapaṅkajaṁ sulalitaṁ muktipradaṁ yoginām brahmādyairapi sevitaṁ stutiparairdhyeyaṁ munīndraiḥ sadā vakṣyāmyadya savistaraṁ bahurasaṁ śrīmatpurāṇottamam bhaktyā sarvarasālayaṁ bhagavatīnāmnā prasiddhaṁ dvijāḥ

उन अत्यंत सुललित, योगियों को मुक्ति देने वाले, ब्रह्मादि देवों द्वारा भी सेवित तथा स्तुतिपरायण मुनीन्द्रों द्वारा सदा ध्येय, उनके चरण-कमलों को नमस्कार करके — हे द्विजो! मैं आज विस्तारपूर्वक, भक्तिभाव से, बहुरसमय उस श्रीमत् पुराणोत्तम को कहूँगा, जो समस्त रसों का आगार तथा भगवती के नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.1.2.4)

या विद्येत्यभिधीयते श्रुतिपथे शक्तिः सदाद्या परा ॥ सर्वज्ञा भवबन्धछित्तिनिपुणा सर्वाशये संस्थिता । दुर्ज्ञेया सुदुरात्मभिश्च मुनिभिर्ध्यानास्पदं प्रापिता ॥ प्रत्यक्षा भवतीह सा भगवती सिद्धिप्रदा स्यात्सदा ॥ 2.4 ॥

yā vidyetyabhidhīyate śrutipathe śaktiḥ sadādyā parā sarvajñā bhavabandhachittinipuṇā sarvāśaye saṁsthitā durjñeyā sudurātmabhiśca munibhirdhyānāspadaṁ prāpitā pratyakṣā bhavatīha sā bhagavatī siddhipradā syātsadā

जो श्रुति-मार्ग में 'विद्या' कही जाती है, वह सदा आद्या और परा शक्ति है — सर्वज्ञ, संसार-बन्धन को काटने में कुशल, सबके हृदय में स्थित; दुष्टात्माओं द्वारा भी दुर्ज्ञेय, मुनियों द्वारा ध्यान का आश्रय बनाई गई — वह भगवती यहाँ प्रत्यक्ष होकर सदा सिद्धि प्रदान करने वाली होती हैं।

श्लोक 5 (devibhagavatam.1.2.5)

सृष्ट्वाखिलं जगदिदं सदसत्स्वरूपं शक्त्या स्वया त्रिगुणया परिपाति विश्वम् । संहृत्य कल्पसमये रमते तथैका तां सर्वविश्वजननीं मनसा स्मरामि ॥ 2.5 ॥

sṛṣṭvākhilaṁ jagadidaṁ sadasatsvarūpaṁ śaktyā svayā triguṇayā paripāti viśvam saṁhṛtya kalpasamaye ramate tathaikā tāṁ sarvaviśvajananīṁ manasā smarāmi

इस समस्त सत्-असत्स्वरूप जगत को रचकर, वे अपनी त्रिगुणमयी शक्ति से विश्व का पालन करती हैं, और प्रलय-काल में इसका संहार करके अकेली ही क्रीड़ा करती हैं — उस सम्पूर्ण विश्व की जननी का मैं मन में स्मरण करता हूँ।

श्लोक 6 (devibhagavatam.1.2.6)

ब्रह्मा सृजत्यखिलमेतदिति प्रसिद्धं पौराणिकैश्च कथितं खलु वेदविद्भिः । विष्णोस्तु नाभिकमले किल तस्य जन्म तैरुक्तमेव सृजते न हि स स्वतन्त्रः ॥ 2.6 ॥

brahmā sṛjatyakhilametaditi prasiddhaṁ paurāṇikaiśca kathitaṁ khalu vedavidbhiḥ viṣṇostu nābhikamale kila tasya janma tairuktameva sṛjate na hi sa svatantraḥ

यह प्रसिद्ध है और वेदज्ञ पौराणिकों द्वारा भी कहा गया है कि ब्रह्मा इस सबकी रचना करते हैं; परन्तु उनका जन्म तो विष्णु की नाभि-कमल से हुआ — वे उन्हीं के कहे अनुसार सृष्टि करते हैं, स्वतन्त्र नहीं हैं।

श्लोक 7 (devibhagavatam.1.2.7)

विष्णुस्तु शेषशयने स्वपितीति काले तन्नाभिपद्यमुकुले खलु तस्य जन्म । आधारतां किल गतोऽत्र सहस्रमौलिः सम्बोध्यतां स भगवान् हि कथं मुरारिः ॥ 2.7 ॥

viṣṇustu śeṣaśayane svapitīti kāle tannābhipadyamukule khalu tasya janma ādhāratāṁ kila gato'tra sahasramauliḥ sambodhyatāṁ sa bhagavān hi kathaṁ murāriḥ

विष्णु भी उस समय शेष-शय्या पर शयन करते हैं, और उनकी नाभि के कमल-कोश से ही उनका (ब्रह्मा का) जन्म हुआ; सहस्रफणधारी शेष तो केवल उनका आधार मात्र बनते हैं — फिर वे भगवान मुरारि स्वयं कैसे जाग्रत हो सकते हैं (उसकी सहायता के बिना)?

श्लोक 8 (devibhagavatam.1.2.8)

एकार्णवस्य सलिलं रसरूपमेव पात्रं विना न हि रसस्थितिरस्ति कच्चित् । या सर्वभूतविषये किल शक्तिरूपा तां सर्वभूतजननीं शरणं गतोऽस्मि ॥ 2.8 ॥

ekārṇavasya salilaṁ rasarūpameva pātraṁ vinā na hi rasasthitirasti kaccit yā sarvabhūtaviṣaye kila śaktirūpā tāṁ sarvabhūtajananīṁ śaraṇaṁ gato'smi

एकार्णव का जल स्वयं रसरूप ही है, परन्तु पात्र के बिना उस रस की स्थिति कहीं भी सम्भव नहीं; जो शक्तिरूप में समस्त प्राणियों में विद्यमान हैं, उस सर्वभूत-जननी की मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 9 (devibhagavatam.1.2.9)

योगनिद्रामीलिताक्षं विष्णुं दृष्ट्वाम्बुजे स्थितः । अजस्तुष्टाव यां देवीं तामहं शरणं गतः ॥ 2.9 ॥

yoganidrāmīlitākṣaṁ viṣṇuṁ dṛṣṭvāmbuje sthitaḥ ajastuṣṭāva yāṁ devīṁ tāmahaṁ śaraṇaṁ gataḥ

योगनिद्रा से मुँदे नेत्रों वाले विष्णु को कमल पर बैठकर देखकर, अजन्मा ब्रह्मा ने जिस देवी की स्तुति की, उन्हीं की मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 10 (devibhagavatam.1.2.10)

तां ध्यात्वा सगुणां मायां मुक्तिदां निर्गुणां तथा । वक्ष्ये पुराणमखिलं शृण्वन्तु मुनयस्त्विह ॥ 2.10 ॥

tāṁ dhyātvā saguṇāṁ māyāṁ muktidāṁ nirguṇāṁ tathā vakṣye purāṇamakhilaṁ śṛṇvantu munayastviha

गुणसहित माया-रूप तथा साथ ही निर्गुण मुक्तिदायिनी उन्हीं का ध्यान करके, मैं अब सम्पूर्ण पुराण कहूँगा; मुनिगण यहाँ श्रवण करें।

श्लोक 11 (devibhagavatam.1.2.11)

पुराणमुत्तमं पुण्यं श्रीमद्भागवताभिधम् । अष्टादश सहस्राणि श्लोकास्तत्र तु संस्कृताः ॥ 2.11 ॥

purāṇamuttamaṁ puṇyaṁ śrīmadbhāgavatābhidham aṣṭādaśa sahasrāṇi ślokāstatra tu saṁskṛtāḥ

यह श्रीमद्भागवत नामक परम उत्तम और पवित्र पुराण है; इसमें अठारह हजार संस्कृत श्लोक हैं।

श्लोक 12 (devibhagavatam.1.2.12)

स्कन्धा द्वादश चैवात्र कृष्णेन विहिताः शुभाः । त्रिशतं पूर्णमध्याया अष्टादशयुताः स्मृताः ॥ 2.12 ॥

skandhā dvādaśa caivātra kṛṣṇena vihitāḥ śubhāḥ triśataṁ pūrṇamadhyāyā aṣṭādaśayutāḥ smṛtāḥ

इसमें कृष्ण (वेदव्यास) द्वारा रचे गए बारह पवित्र स्कन्ध हैं; इसके अध्यायों की पूर्ण संख्या तीन सौ अठारह मानी गई है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.1.2.13)

विंशतिः प्रथमे तत्र द्वितीये द्वादशैव तु । त्रिंशच्चैव तृतीये तु चतुर्थे पञ्चविंशतिः ॥ 2.13 ॥

viṁśatiḥ prathame tatra dvitīye dvādaśaiva tu triṁśaccaiva tṛtīye tu caturthe pañcaviṁśatiḥ

प्रथम स्कन्ध में बीस, द्वितीय में बारह ही, तृतीय में तीस, तथा चतुर्थ में पच्चीस अध्याय हैं।

श्लोक 14 (devibhagavatam.1.2.14)

पञ्चत्रिंशत्तथाध्यायाः पञ्चमे परिकीर्तिताः । एकत्रिंशत्तथा षष्ठे चत्वारिंशच्च सप्तमे ॥ 2.14 ॥

pañcatriṁśattathādhyāyāḥ pañcame parikīrtitāḥ ekatriṁśattathā ṣaṣṭhe catvāriṁśacca saptame

पंचम में पैंतीस अध्याय कहे गए हैं; छठे में इकतीस तथा सातवें में चालीस।

श्लोक 15 (devibhagavatam.1.2.15)

अष्टमे तत्त्वसङ्ख्याश्च पञ्चाशन्नवमे तथा । त्रयोदश तु सम्प्रोक्ता दशमे मुनिना किल ॥ 2.15 ॥

aṣṭame tattvasaṅkhyāśca pañcāśannavame tathā trayodaśa tu samproktā daśame muninā kila

आठवें में तत्त्वों की संख्या के बराबर (चौबीस) अध्याय हैं, नवें में पचास; और दसवें में मुनि ने तेरह अध्याय बताए हैं।

श्लोक 16 (devibhagavatam.1.2.16)

तथा चैकादशस्कन्धे चतुर्विंशतिरीरिताः । चतुर्दशैव चाध्याया द्वादशे मुनिसत्तमाः ॥ 2.16 ॥

tathā caikādaśaskandhe caturviṁśatirīritāḥ caturdaśaiva cādhyāyā dvādaśe munisattamāḥ

तथा ग्यारहवें स्कन्ध में चौबीस अध्याय कहे गए हैं, और हे मुनिश्रेष्ठ! बारहवें में चौदह ही अध्याय हैं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.1.2.17)

एवं सङ्ख्या समाख्याता पुराणेऽस्मिन्महात्मना । अष्टादशसहस्रीया सङ्ख्या च परिकीर्तिता ॥ 2.17 ॥

evaṁ saṅkhyā samākhyātā purāṇe'sminmahātmanā aṣṭādaśasahasrīyā saṅkhyā ca parikīrtitā

इस प्रकार उस महात्मा (व्यास) द्वारा इस पुराण की संख्या बताई गई है; और अठारह हजार श्लोकों की कुल गणना भी घोषित की गई है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.1.2.18)

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ 2.18 ॥

sargaśca pratisargaśca vaṁśo manvantarāṇi ca vaṁśānucaritaṁ caiva purāṇaṁ pañcalakṣaṇam

सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, तथा वंशानुचरित — ये पुराण के पाँच लक्षण हैं।

श्लोक 19 (devibhagavatam.1.2.19)

निर्गुणा या सदा नित्या व्यापिका विकृता शिवा । योगगम्याखिलाधारा तुरीया या च संस्थिता ॥ 2.19 ॥

nirguṇā yā sadā nityā vyāpikā vikṛtā śivā yogagamyākhilādhārā turīyā yā ca saṁsthitā

जो सदा नित्य, निर्गुण, व्यापिनी, विकृत रूप धारण करने वाली, कल्याणस्वरूपा, योग द्वारा गम्य, सबकी आधार तथा तुरीया अवस्था में स्थित रहती हैं —

श्लोक 20 (devibhagavatam.1.2.20)

तस्यास्तु सात्त्विकी शक्ती राजसी तामसी तथा । महालक्ष्मीः सरस्वती महाकालीति ताः स्त्रियः ॥ 2.20 ॥

tasyāstu sāttvikī śaktī rājasī tāmasī tathā mahālakṣmīḥ sarasvatī mahākālīti tāḥ striyaḥ

उन्हीं की सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी शक्तियाँ हैं — वे तीन देवियाँ महालक्ष्मी, सरस्वती और महाकाली हैं।

श्लोक 21 (devibhagavatam.1.2.21)

तासां तिसॄणां शक्तीनां देहाङ्गीकारलक्षणः । सृष्ट्यर्थं च समाख्यातः सर्गः शास्त्रविशारदैः ॥ 2.21 ॥

tāsāṁ tisṝṇāṁ śaktīnāṁ dehāṅgīkāralakṣaṇaḥ sṛṣṭyarthaṁ ca samākhyātaḥ sargaḥ śāstraviśāradaiḥ

उन तीनों शक्तियों का सृष्टि हेतु देह धारण करना ही शास्त्र-विशारदों द्वारा 'सर्ग' कहलाया गया है।

श्लोक 22 (devibhagavatam.1.2.22)

हरिद्रुहिणरुद्राणां समुत्पत्तिस्ततः स्मृता । पालनोत्पत्तिनाशार्थं प्रतिसर्गः स्मृतो हि सः ॥ 2.22 ॥

haridruhiṇarudrāṇāṁ samutpattistataḥ smṛtā pālanotpattināśārthaṁ pratisargaḥ smṛto hi saḥ

उसी से हरि, ब्रह्मा और रुद्र की समुत्पत्ति मानी गई है; पालन, उत्पत्ति और नाश के लिए वही 'प्रतिसर्ग' कहलाता है।

श्लोक 23 (devibhagavatam.1.2.23)

सोमसूर्योद्भवानां च राज्ञां वंशप्रकीर्तनम् । हिरण्यकशिप्वादीनां वंशास्ते परिकीर्तिताः ॥ 2.23 ॥

somasūryodbhavānāṁ ca rājñāṁ vaṁśaprakīrtanam hiraṇyakaśipvādīnāṁ vaṁśāste parikīrtitāḥ

सोम और सूर्य से उत्पन्न राजाओं के वंश का वर्णन, तथा हिरण्यकशिपु आदि के वंश — ये सब 'वंश' कहे गए हैं।

श्लोक 24 (devibhagavatam.1.2.24)

स्वायम्भुवमुखानां च मनूनां परिवर्णनम् । कालसङ्ख्या तथा तेषां तत्तन्मन्वन्तराणि च ॥ 2.24 ॥

svāyambhuvamukhānāṁ ca manūnāṁ parivarṇanam kālasaṅkhyā tathā teṣāṁ tattanmanvantarāṇi ca

स्वायम्भुव आदि मनुओं का सम्पूर्ण वर्णन, तथा उन-उन मन्वन्तरों की कालसंख्या —

श्लोक 25 (devibhagavatam.1.2.25)

तेषां वंशानुकथनं वंशानुचरितं स्मृतम् । पञ्चलक्षणयुक्तानि भवन्ति मुनिसत्तमाः ॥ 2.25 ॥

teṣāṁ vaṁśānukathanaṁ vaṁśānucaritaṁ smṛtam pañcalakṣaṇayuktāni bhavanti munisattamāḥ

और उनके वंशजों का अनुवर्णन ही 'वंशानुचरित' कहलाता है; हे मुनिश्रेष्ठो! इन्हीं पाँच लक्षणों से युक्त होकर पुराण बनते हैं।

श्लोक 26 (devibhagavatam.1.2.26)

सपादलक्षं च तथा भारतं मुनिना कृतम् । इतिहास इति प्रोक्तं पञ्चमं वेदसम्मतम् ॥ 2.26 ॥

sapādalakṣaṁ ca tathā bhārataṁ muninā kṛtam itihāsa iti proktaṁ pañcamaṁ vedasammatam

इसी प्रकार मुनि (व्यास) द्वारा रचित सवा लाख श्लोकों वाला महाभारत 'इतिहास' कहलाता है — यह पाँचवाँ, वेद के समान सम्मत ग्रन्थ है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.1.2.27)

शौनक उवाच । कानि तानि पुराणानि ब्रूहि सूत सविस्तरम् । कतिसङ्ख्यानि सर्वज्ञ श्रोतुकामा वयं त्विह ॥ 2.27 ॥

śaunaka uvāca kāni tāni purāṇāni brūhi sūta savistaram katisaṅkhyāni sarvajña śrotukāmā vayaṁ tviha

शौनक ने कहा — हे सूत! वे पुराण कौन-कौन से हैं, विस्तारपूर्वक बताइए; हे सर्वज्ञ! वे कितनी संख्या में हैं? हम यहाँ उन्हें सुनना चाहते हैं।

श्लोक 28 (devibhagavatam.1.2.28)

कलिकालविभीताः स्मो नैमिषारण्यवासिनः । ब्रह्मणात्र समादिष्टाश्चक्रं दत्त्वा मनोमयम् ॥ 2.28 ॥

kalikālavibhītāḥ smo naimiṣāraṇyavāsinaḥ brahmaṇātra samādiṣṭāścakraṁ dattvā manomayam

हम नैमिषारण्य के निवासी कलिकाल से भयभीत हैं; यहाँ हम ब्रह्मा जी द्वारा आदेशित हुए, उन्होंने हमें एक मनोमय चक्र प्रदान किया था।

श्लोक 29 (devibhagavatam.1.2.29)

कथितं तेन नः सर्वान्गच्छन्त्वेतस्य पृष्ठतः । नेमिः संशीर्यते यत्र स देशः पावनः स्मृतः ॥ 2.29 ॥

kathitaṁ tena naḥ sarvāngacchantvetasya pṛṣṭhataḥ nemiḥ saṁśīryate yatra sa deśaḥ pāvanaḥ smṛtaḥ

उन्होंने हम सबसे कहा — 'इसके पीछे-पीछे चलो; जहाँ इसकी नेमि (धार) क्षीण हो जाए, वही स्थान पवित्र माना जाएगा।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.1.2.30)

कलेस्तत्र प्रवेशो न कदाचित् सम्भविष्यति । तावत्तिष्ठन्तु तत्रैव यावत्सत्ययुगं पुनः ॥ 2.30 ॥

kalestatra praveśo na kadācit sambhaviṣyati tāvattiṣṭhantu tatraiva yāvatsatyayugaṁ punaḥ

'वहाँ कलि का प्रवेश कभी सम्भव नहीं होगा; जब तक सत्ययुग पुनः न आए, तब तक तुम वहीं निवास करो।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.1.2.31)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गृहीत्वा तत्कथानकम् । चालयन्निर्गतस्तूर्णं सर्वदेशदिदृक्षया ॥ 2.31 ॥

tacchrutvā vacanaṁ tasya gṛhītvā tatkathānakam cālayannirgatastūrṇaṁ sarvadeśadidṛkṣayā

उनके वचन सुनकर तथा उस निर्देश को ग्रहण करके, समस्त देशों को देखने की इच्छा से हम उस चक्र को घुमाते हुए शीघ्र ही निकल पड़े।

श्लोक 32 (devibhagavatam.1.2.32)

प्रेत्यात्र चालयंश्चक्रं नेमिः शीर्णोऽत्र पश्यतः । तेनेदं नैमिषं प्रोक्तं क्षेत्रं परमपावनम् ॥ 2.32 ॥

pretyātra cālayaṁścakraṁ nemiḥ śīrṇo'tra paśyataḥ tenedaṁ naimiṣaṁ proktaṁ kṣetraṁ paramapāvanam

आगे बढ़ते हुए चक्र को घुमाते-घुमाते, यहीं हमारे देखते-देखते इसकी नेमि क्षीण हो गई; इसीलिए यह परम पवित्र क्षेत्र 'नैमिष' कहलाया।

श्लोक 33 (devibhagavatam.1.2.33)

कलिप्रवेशो नैवात्र तस्मात्स्थानं कृतं मया । मुनिभिः सिद्धसङ्घैश्च कलिभीतैर्महात्मभिः ॥ 2.33 ॥

kalipraveśo naivātra tasmātsthānaṁ kṛtaṁ mayā munibhiḥ siddhasaṅghaiśca kalibhītairmahātmabhiḥ

यहाँ कलि का प्रवेश कदापि नहीं होता, इसलिए कलि से भयभीत महात्मा मुनियों और सिद्ध-समूहों सहित मैंने यहीं अपना स्थान बना लिया है।

श्लोक 34 (devibhagavatam.1.2.34)

पशुहीनाः कृता यज्ञाः पुरोडाशादिभिः किल । कालातिवाहनं कार्यं यावत्सत्ययुगागमः ॥ 2.34 ॥

paśuhīnāḥ kṛtā yajñāḥ puroḍāśādibhiḥ kila kālātivāhanaṁ kāryaṁ yāvatsatyayugāgamaḥ

पशुरहित यज्ञ पुरोडाश आदि से किए जाते हैं; सत्ययुग के आगमन तक इसी प्रकार काल व्यतीत करना है।

श्लोक 35 (devibhagavatam.1.2.35)

भाग्ययोगेन सम्प्राप्तः सूत त्वं चात्र सर्वथा । कथयाद्य पुराणं हि पावनं ब्रह्मसम्मतम् ॥ 2.35 ॥

bhāgyayogena samprāptaḥ sūta tvaṁ cātra sarvathā kathayādya purāṇaṁ hi pāvanaṁ brahmasammatam

हे सूत! सौभाग्य के संयोग से आप यहाँ सब प्रकार से पधारे हैं; अब आज उस पावन, ब्रह्मस्वरूप पुराण का वर्णन कीजिए।

श्लोक 36 (devibhagavatam.1.2.36)

सूत शुश्रूषवः सर्वे वक्ता त्वं मतिमानथ । निर्व्यापारा वयं नूनमेकचित्तास्तथैव च ॥ 2.36 ॥

sūta śuśrūṣavaḥ sarve vaktā tvaṁ matimānatha nirvyāpārā vayaṁ nūnamekacittāstathaiva ca

हे सूत! हम सब सुनने के इच्छुक हैं, और आप बुद्धिमान वक्ता हैं; हम निश्चय ही निष्क्रिय तथा एकाग्रचित्त हैं।

श्लोक 37 (devibhagavatam.1.2.37)

त्वं सूत भव दीर्घायुस्तापत्रयविवर्जितः । कथयाद्य पुराणं हि पुण्यं भागवतं शिवम् ॥ 2.37 ॥

tvaṁ sūta bhava dīrghāyustāpatrayavivarjitaḥ kathayādya purāṇaṁ hi puṇyaṁ bhāgavataṁ śivam

हे सूत! आप त्रिविध तापों से रहित होकर दीर्घायु हों; आज उस पवित्र, कल्याणकारी भागवत पुराण का वर्णन कीजिए —

श्लोक 38 (devibhagavatam.1.2.38)

यत्र धर्मार्थकामानां वर्णनं विधिपूर्वकम् । विद्यां प्राप्य तया मोक्षः कथितो मुनिना किल ॥ 2.38 ॥

yatra dharmārthakāmānāṁ varṇanaṁ vidhipūrvakam vidyāṁ prāpya tayā mokṣaḥ kathito muninā kila

जिसमें धर्म, अर्थ और काम का विधिपूर्वक वर्णन है, तथा जिसमें विद्या को प्राप्त करके उसके द्वारा मोक्ष होना मुनि द्वारा कहा गया है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.1.2.39)

द्वैपायनेन मुनिना कथितं यच्च पावनम् । न तृप्यामो वयं सूत कथां श्रुत्वा मनोरमाम् ॥ 2.39 ॥

dvaipāyanena muninā kathitaṁ yacca pāvanam na tṛpyāmo vayaṁ sūta kathāṁ śrutvā manoramām

व्यासमुनि द्वारा कही गई वह पावन कथा — हे सूत! उस मनोहर कथा को सुनकर भी हम तृप्त नहीं होते।

श्लोक 40 (devibhagavatam.1.2.40)

सकलगुणगणानामेकपात्रं पवित्र\- ॥ मखिलभुवनमातुर्नाट्यवद्यद्विचित्रम् । निखिलमलगणानां नाशकृत्कामकन्दम् ॥ प्रकटय भगवत्या नामयुक्तं पुराणम् ॥ 2.40 ॥

sakalaguṇagaṇānāmekapātraṁ pavitra\- makhilabhuvanamāturnāṭyavadyadvicitram nikhilamalagaṇānāṁ nāśakṛtkāmakandam prakaṭaya bhagavatyā nāmayuktaṁ purāṇam

समस्त गुणसमूहों का एकमात्र पात्र, पवित्र, सम्पूर्ण भुवनों की माता की अनिन्द्य एवं विचित्र लीला से युक्त, समस्त मलसमूहों का नाशक तथा कामनाओं का मूल — भगवती के नाम से युक्त उस पुराण को प्रकट कीजिए।

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