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दशम स्कन्ध · अध्याय 12

देवी चरित्र सहित सावर्णि मनु का वृत्तांत

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (devibhagavatam.10.12.1)

मुनिरुवाच । महिषीगर्भसम्भूतो महाबलपराक्रमः । देवान्सर्वान्पराजित्य महिषोऽभूज्जगत्प्रभुः ॥

muniruvāca mahiṣīgarbhasambhūto mahābalaparākramaḥ devānsarvānparājitya mahiṣo'bhūjjagatprabhuḥ

मुनि ने कहा — भैंस के गर्भ से उत्पन्न, महाबल-पराक्रमी, समस्त देवताओं को परास्त कर महिष जगत् का स्वामी बन गया।

श्लोक 2 (devibhagavatam.10.12.2)

सर्वेषां लोकपालानामधिकारान्महासुरः । बलानिर्जित्य बुभुजे त्रैलोक्यैश्वर्यमद्भुतम् ॥

sarveṣāṁ lokapālānāmadhikārānmahāsuraḥ balānirjitya bubhuje trailokyaiśvaryamadbhutam

समस्त लोकपालों के अधिकारों को बलपूर्वक जीतकर वह महासुर स्वयं त्रिलोक के अद्भुत ऐश्वर्य का भोग करने लगा।

श्लोक 3 (devibhagavatam.10.12.3)

ततः पराजिताः सर्वे देवाः स्वर्गपरिच्युताः । ब्रह्माणं च पुरस्कृत्य ते जग्मुर्लोकमुत्तमम् ॥

tataḥ parājitāḥ sarve devāḥ svargaparicyutāḥ brahmāṇaṁ ca puraskṛtya te jagmurlokamuttamam

तब पराजित होकर स्वर्ग से च्युत हुए सभी देवगण, ब्रह्मा को आगे कर उस श्रेष्ठ लोक में गए —

श्लोक 4 (devibhagavatam.10.12.4)

यत्रोत्तमौ देवदेवौ संस्थितौ शङ्कराच्युतौ । वृत्तान्तं कथयामासुर्महिषस्य दुरात्मनः ॥

yatrottamau devadevau saṁsthitau śaṅkarācyutau vṛttāntaṁ kathayāmāsurmahiṣasya durātmanaḥ

— जहाँ शंकर और अच्युत, वे दोनों श्रेष्ठ देवाधिदेव विराजमान थे, और उन्हें दुरात्मा महिष का सारा वृत्तांत कह सुनाया।

श्लोक 5 (devibhagavatam.10.12.5)

देवानां चैव सर्वेषां स्थानानि तरसासुरः । विनिर्जित्य स्वयं भुङ्क्ते बलवीर्यमदोद्धतः ॥

devānāṁ caiva sarveṣāṁ sthānāni tarasāsuraḥ vinirjitya svayaṁ bhuṅkte balavīryamadoddhataḥ

समस्त देवताओं के स्थानों को बलपूर्वक जीतकर वह असुर स्वयं भोग रहा था, बल-वीर्य और मद से उद्धत होकर।

श्लोक 6 (devibhagavatam.10.12.6)

महिषासुरनामासौ दुष्टदैत्योऽमरेश्वरौ । वधोपायश्च तस्याशु चिन्त्यतामसुरार्दनौ ॥

mahiṣāsuranāmāsau duṣṭadaityo'mareśvarau vadhopāyaśca tasyāśu cintyatāmasurārdanau

'महिषासुर नामक यह दुष्ट दैत्य है, हे अमरेश्वरो! उसके वध का उपाय शीघ्र सोचा जाए, हे असुरार्दनो!'

श्लोक 7 (devibhagavatam.10.12.7)

एवं श्रुत्वा स भगवान्देवानामार्तियुग्वचः । चकार कोपं सुबहुं तथा शङ्करपद्मजौ ॥

evaṁ śrutvā sa bhagavāndevānāmārtiyugvacaḥ cakāra kopaṁ subahuṁ tathā śaṅkarapadmajau

देवताओं के इन पीड़ायुक्त वचनों को सुनकर, भगवान शंकर तथा कमलयोनि ब्रह्मा को भी अत्यंत क्रोध आ गया।

श्लोक 8 (devibhagavatam.10.12.8)

एवं कोपयुतस्यास्य हरेरास्यान्महीपते । तेजः प्रादुरभूद्दिव्यं सहस्रार्कसमद्युति ॥

evaṁ kopayutasyāsya harerāsyānmahīpate tejaḥ prādurabhūddivyaṁ sahasrārkasamadyuti

इस प्रकार क्रोधयुक्त हुए हरि के मुख से, हे भूमिपते! सहस्र सूर्यों के समान दिव्य तेज प्रकट हुआ।

श्लोक 9 (devibhagavatam.10.12.9)

अथानुक्रमतस्तेजः सर्वेषां त्रिदिवौकसाम् । शरीरादुद्भवं प्राप हर्षयद्विबुधाधिपान् ॥

athānukramatastejaḥ sarveṣāṁ tridivaukasām śarīrādudbhavaṁ prāpa harṣayadvibudhādhipān

फिर क्रमशः सभी देवताओं के शरीरों से उत्पन्न होने वाला वह तेज प्रकट हुआ, जिसने देवताओं के स्वामियों को हर्षित किया।

श्लोक 10 (devibhagavatam.10.12.10)

यदभूच्छम्भुजं तेजो मुखमस्योदपद्यत । केशा बभूवुर्याम्येन वैष्णवेन च बाहवः ॥

yadabhūcchambhujaṁ tejo mukhamasyodapadyata keśā babhūvuryāmyena vaiṣṇavena ca bāhavaḥ

शंभु से जो तेज उत्पन्न हुआ, वह इसका मुख बना; यम के तेज से केश बने, और विष्णु के तेज से भुजाएँ बनीं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.10.12.11)

सौम्येन च स्तनौ जातौ माहेन्द्रेण च मध्यमः । वारुणेन ततो भूप जङ्घोरू सम्बभूवतुः ॥

saumyena ca stanau jātau māhendreṇa ca madhyamaḥ vāruṇena tato bhūpa jaṅghorū sambabhūvatuḥ

सौम्य (चंद्रमा) से दोनों स्तन उत्पन्न हुए, और महेन्द्र से कटि-भाग बना। वरुण से, हे भूप! जंघा और ऊरु उत्पन्न हुए —

श्लोक 12 (devibhagavatam.10.12.12)

नितम्बौ तेजसा भूमेः पादौ ब्राह्मेण तेजसा । पादाङ्गुल्यो भानवेन वासवेन कराङ्गुली ॥

nitambau tejasā bhūmeḥ pādau brāhmeṇa tejasā pādāṅgulyo bhānavena vāsavena karāṅgulī

— पृथ्वी के तेज से नितंब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य से पैरों की अंगुलियाँ, वासव (इन्द्र) से हाथों की अंगुलियाँ बनीं।

श्लोक 13 (devibhagavatam.10.12.13)

कौबेरेण तथा नासा दन्ताः सञ्जज्ञिरे तदा । प्राजापत्येनोत्तमेन तेजसा वसुधाधिप ॥

kaubereṇa tathā nāsā dantāḥ sañjajñire tadā prājāpatyenottamena tejasā vasudhādhipa

कुबेर से नासिका, और प्रजापति के उत्तम तेज से, हे वसुधाधिप! उस समय दाँत उत्पन्न हुए —

श्लोक 14 (devibhagavatam.10.12.14)

पावकेन च सञ्जातं लोचनत्रितयं शुभम् । सान्ध्येन तेजसा जाते भृकुट्यौ तेजसां निधी ॥

pāvakena ca sañjātaṁ locanatritayaṁ śubham sāndhyena tejasā jāte bhṛkuṭyau tejasāṁ nidhī

— अग्नि के तेज से तीन शुभ नेत्र उत्पन्न हुए; संध्या के तेज से भौंहें उत्पन्न हुईं, वे तेजों की निधि —

श्लोक 15 (devibhagavatam.10.12.15)

कर्णौ वायव्यतो जातौ तेजसो मनुजाधिप । सर्वेषां तेजसा देवी जाता महिषमर्दिनी ॥

karṇau vāyavyato jātau tejaso manujādhipa sarveṣāṁ tejasā devī jātā mahiṣamardinī

— दोनों कान वायु के तेज से उत्पन्न हुए, हे मनुजाधिप! सबके तेज से महिषमर्दिनी देवी उत्पन्न हुईं।

श्लोक 16 (devibhagavatam.10.12.16)

शूलं ददौ शिवो विष्णुश्चक्रं शङ्खं च पाशभृत् । हुताशनो ददौ शक्तिं मारुतश्चापसायकौ ॥

śūlaṁ dadau śivo viṣṇuścakraṁ śaṅkhaṁ ca pāśabhṛt hutāśano dadau śaktiṁ mārutaścāpasāyakau

शिव ने त्रिशूल दिया, विष्णु ने चक्र, पाशधारी वरुण ने शंख दिया; अग्नि ने शक्ति दी, और वायु ने धनुष-बाण दिए।

श्लोक 17 (devibhagavatam.10.12.17)

वज्रं महेन्द्रः प्रददौ घण्टां चैरावताद् गजात् । कालदण्डं यमो ब्रह्मा चाक्षमालाकमण्डलू ॥

vajraṁ mahendraḥ pradadau ghaṇṭāṁ cairāvatād gajāt kāladaṇḍaṁ yamo brahmā cākṣamālākamaṇḍalū

महेन्द्र ने वज्र दिया और ऐरावत हाथी से घंटा; यम ने काल-दण्ड दिया, ब्रह्मा ने अक्षमाला और कमण्डलु।

श्लोक 18 (devibhagavatam.10.12.18)

दिवाकरो रश्मिमालां रोमकूपेषु सन्ददौ । कालः खड्गं तथा चर्म निर्मलं वसुधाधिप ॥

divākaro raśmimālāṁ romakūpeṣu sandadau kālaḥ khaḍgaṁ tathā carma nirmalaṁ vasudhādhipa

सूर्य ने अपनी किरणों की माला उसके रोम-रोम में प्रदान की; काल ने खड्ग और निर्मल ढाल दी, हे वसुधाधिप!

श्लोक 19 (devibhagavatam.10.12.19)

समुद्रो निर्मलं हारमजरे चाम्बरे नृप । चूडामणिं कुण्डले च कटकानि तथाङ्गदे ॥

samudro nirmalaṁ hāramajare cāmbare nṛpa cūḍāmaṇiṁ kuṇḍale ca kaṭakāni tathāṅgade

समुद्र ने निर्मल हार और अजर वस्त्र दिए, हे नृप! चूड़ामणि, कुण्डल, कटक और अंगद भी दिए।

श्लोक 20 (devibhagavatam.10.12.20)

अर्धचन्द्रं निर्मलं च नूपुराणि तथा ददौ । ग्रैवेयकं भूषणं च तस्यै देव्यै मुदान्वितः ॥

ardhacandraṁ nirmalaṁ ca nūpurāṇi tathā dadau graiveyakaṁ bhūṣaṇaṁ ca tasyai devyai mudānvitaḥ

निर्मल अर्धचन्द्र और नूपुर भी दिए, तथा प्रसन्नतापूर्वक उस देवी के लिए ग्रैवेयक आभूषण दिया।

श्लोक 21 (devibhagavatam.10.12.21)

विश्वकर्मा चोर्मिकाश्च ददौ तस्यै धरापते । हिमवान्वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥

viśvakarmā cormikāśca dadau tasyai dharāpate himavānvāhanaṁ siṁhaṁ ratnāni vividhāni ca

विश्वकर्मा ने उन्हें भुज-कंकण दिए, हे धरापते! हिमवान ने वाहन-रूप सिंह और नाना प्रकार के रत्न दिए।

श्लोक 22 (devibhagavatam.10.12.22)

पानपात्रं सुरापूर्णं ददौ तस्यै धनाधिपः । शेषश्च भगवान्देवो नागहारं ददौ विभुः ॥

pānapātraṁ surāpūrṇaṁ dadau tasyai dhanādhipaḥ śeṣaśca bhagavāndevo nāgahāraṁ dadau vibhuḥ

धनाधिप कुबेर ने सुरा से भरा हुआ पानपात्र दिया; और शेष भगवान विभु ने नाग-हार दिया।

श्लोक 23 (devibhagavatam.10.12.23)

अन्यैरशेषविबुधैर्मानिता सा जगन्मयी । तां तुष्टुवुर्महादेवीं देवा महिषपीडिताः ॥

anyairaśeṣavibudhairmānitā sā jaganmayī tāṁ tuṣṭuvurmahādevīṁ devā mahiṣapīḍitāḥ

अन्य समस्त देवताओं द्वारा भी वह जगन्मयी सम्मानित हुई। महिष से पीड़ित देवताओं ने उस महादेवी की —

श्लोक 24 (devibhagavatam.10.12.24)

नानास्तोत्रैर्महेशानीं जगदुद्भवकारिणीम् । तेषां निशम्य देवेशी स्तोत्रं विबुधपूजिता ॥

nānāstotrairmaheśānīṁ jagadudbhavakāriṇīm teṣāṁ niśamya deveśī stotraṁ vibudhapūjitā

— जगत् की उत्पत्ति करने वाली महेशानी की, नाना स्तोत्रों से स्तुति की। उनकी स्तुति सुनकर विद्वानों से पूजित वह देवेशी —

श्लोक 25 (devibhagavatam.10.12.25)

महिषस्य वधार्थाय महानादं चकार ह । तेन नादेन महिषश्चकितोऽभूद्धरापते ॥

mahiṣasya vadhārthāya mahānādaṁ cakāra ha tena nādena mahiṣaścakito'bhūddharāpate

— महिष के वध के लिए एक महानाद किया। उस नाद से महिष, हे धरापते! भयभीत हो गया।

श्लोक 26 (devibhagavatam.10.12.26)

आससाद जगद्धात्रीं सर्वसैन्यसमावृतः । ततः स युयुधे देव्या महिषाख्यो महासुरः ॥

āsasāda jagaddhātrīṁ sarvasainyasamāvṛtaḥ tataḥ sa yuyudhe devyā mahiṣākhyo mahāsuraḥ

वह सारी सेना सहित जगद्धात्री के पास पहुँचा। तब वह महिष नामक महासुर देवी के साथ युद्ध करने लगा —

श्लोक 27 (devibhagavatam.10.12.27)

शस्त्रास्त्रैर्बहुधा क्षिप्तैः पूरयन्नम्बरान्तरम् । चिक्षुरो ग्रामणीः सेनापतिर्दुर्धरदुर्मुखौ ॥

śastrāstrairbahudhā kṣiptaiḥ pūrayannambarāntaram cikṣuro grāmaṇīḥ senāpatirdurdharadurmukhau

— अनेक शस्त्र-अस्त्र फेंककर आकाश के अंतराल को भरते हुए। चिक्षुर, ग्रामणी, सेनापति, दुर्धर और दुर्मुख —

श्लोक 28 (devibhagavatam.10.12.28)

बाष्कलस्ताम्रकश्चैव बिडालवदनोऽपरः । एतैश्चान्यैरसङ्ख्यातैः सङ्ग्रामान्तकसन्निभैः ॥

bāṣkalastāmrakaścaiva biḍālavadano'paraḥ etaiścānyairasaṅkhyātaiḥ saṅgrāmāntakasannibhaiḥ

— बाष्कल, ताम्रक, और एक अन्य बिडालवदन (बिल्ली के मुख वाला) — इनके तथा युद्ध के अंत के समान अन्य असंख्य —

श्लोक 29 (devibhagavatam.10.12.29)

योधैः परिवृतो वीरो महिषो दानवोत्तमः । ततः सा कोपताम्राक्षी देवी लोकविमोहिनी ॥

yodhaiḥ parivṛto vīro mahiṣo dānavottamaḥ tataḥ sā kopatāmrākṣī devī lokavimohinī

— योद्धाओं से घिरा हुआ, वह वीर महिष, दानवों में श्रेष्ठ। तब वह क्रोध से लाल नेत्रों वाली, लोकों को मोहित करने वाली देवी —

श्लोक 30 (devibhagavatam.10.12.30)

जघान योधान्समरे देवी महिषमाश्रितान् । ततस्तेषु हतेष्वेव स दैत्यो रोषमूर्च्छितः ॥

jaghāna yodhānsamare devī mahiṣamāśritān tatasteṣu hateṣveva sa daityo roṣamūrcchitaḥ

— समर में महिष का आश्रय लेने वाले योद्धाओं का वध करने लगीं। तब उन सबके मारे जाने पर वह दैत्य क्रोध से मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 31 (devibhagavatam.10.12.31)

आससाद तदा देवीं तूर्णं मायाविशारदः । रूपान्तराणि सम्भेजे मायया दानवेश्वरः ॥

āsasāda tadā devīṁ tūrṇaṁ māyāviśāradaḥ rūpāntarāṇi sambheje māyayā dānaveśvaraḥ

तब वह माया में निपुण दानवेश्वर शीघ्र ही देवी के पास आया, और माया से नाना रूप धारण करने लगा।

श्लोक 32 (devibhagavatam.10.12.32)

तानि तान्यस्य रूपाणि नाशयामास सा तदा । ततोऽन्ते माहिषं रूपं बिभ्राणममरार्दनम् ॥

tāni tānyasya rūpāṇi nāśayāmāsa sā tadā tato'nte māhiṣaṁ rūpaṁ bibhrāṇamamarārdanam

उसके उन-उन रूपों को उस समय देवी ने नष्ट कर दिया। तब अंत में जब वह अमरों को पीड़ित करने वाला महिष-रूप धारण किए हुए था —

श्लोक 33 (devibhagavatam.10.12.33)

पाशेन बद्ध्वा सुदृढं छित्त्वा खड्गेन तच्छिरः । पातयामास महिषं देवी देवगणान्तकम् ॥

pāśena baddhvā sudṛḍhaṁ chittvā khaḍgena tacchiraḥ pātayāmāsa mahiṣaṁ devī devagaṇāntakam

— उसे पाश से दृढ़तापूर्वक बाँधकर, खड्ग से उसके सिर को काटकर, देवगणों के अंतक उस महिष को देवी ने गिरा दिया।

श्लोक 34 (devibhagavatam.10.12.34)

हाहाकृतं ततः शेषं सैन्यं भग्नं दिशो दश । तुष्टुवुर्देवदेवेशीं सर्वे देवाः प्रमोदिताः ॥

hāhākṛtaṁ tataḥ śeṣaṁ sainyaṁ bhagnaṁ diśo daśa tuṣṭuvurdevadeveśīṁ sarve devāḥ pramoditāḥ

तब हाहाकार करती हुई शेष सेना दसों दिशाओं में भाग गई; और सभी देवगण अत्यंत हर्षित होकर उस देवाधिदेवी की स्तुति करने लगे।

श्लोक 35 (devibhagavatam.10.12.35)

एवं लक्ष्मीः समुत्पन्ना महिषासुरमर्दिनी । राजञ्छृणु सरस्वत्याः प्रादुर्भावो यथाभवत् ॥

evaṁ lakṣmīḥ samutpannā mahiṣāsuramardinī rājañchṛṇu sarasvatyāḥ prādurbhāvo yathābhavat

इस प्रकार महिषासुरमर्दिनी लक्ष्मी उत्पन्न हुईं। हे राजन्! अब सरस्वती का प्रादुर्भाव जिस प्रकार हुआ, वह सुनो।

श्लोक 36 (devibhagavatam.10.12.36)

एकदा शुम्भनामासीद्दैत्यो मदबलोत्कटः । निशुम्भश्चापि तद्भ्राता महाबलपराक्रमः ॥

ekadā śumbhanāmāsīddaityo madabalotkaṭaḥ niśumbhaścāpi tadbhrātā mahābalaparākramaḥ

एक बार शुम्भ नामक एक दैत्य था, मद और बल से उत्कट, और निशुम्भ भी उसका भाई, महाबल-पराक्रमी।

श्लोक 37 (devibhagavatam.10.12.37)

तेन सम्पीडिता देवाः सर्वे भ्रष्टश्रियो नृप । हिमवन्तमथासाद्य देवीं तुष्टुवुरादरात् ॥

tena sampīḍitā devāḥ sarve bhraṣṭaśriyo nṛpa himavantamathāsādya devīṁ tuṣṭuvurādarāt

उससे पीड़ित होकर, हे नृप! सभी देवगण अपने ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो गए; फिर हिमालय पर पहुँचकर उन्होंने आदरपूर्वक देवी की स्तुति की।

श्लोक 38 (devibhagavatam.10.12.38)

देवा ऊचुः । जय देवेशि भक्तानामार्तिनाशनकोविदे । दानवान्तकरूपे त्वमजरामरणेऽनघे ॥

devā ūcuḥ jaya deveśi bhaktānāmārtināśanakovide dānavāntakarūpe tvamajarāmaraṇe'naghe

देवों ने कहा — हे देवेशी! भक्तों की पीड़ा नष्ट करने में कुशल, आपकी जय हो! दानवों के अंत का रूप धारण करने वाली, अजर-अमर, निष्पाप!

श्लोक 39 (devibhagavatam.10.12.39)

देवेशि भक्तिसुलभे महाबलपराक्रमे । विष्णुशङ्करब्रह्मादिस्वरूपेऽनन्तविक्रमे ॥

deveśi bhaktisulabhe mahābalaparākrame viṣṇuśaṅkarabrahmādisvarūpe'nantavikrame

हे देवेशी! भक्ति से सुलभ, महाबल-पराक्रमी! विष्णु, शंकर, ब्रह्मा आदि के स्वरूप वाली, अनंत विक्रम वाली!

श्लोक 40 (devibhagavatam.10.12.40)

सृष्टिस्थितिकरे नाशकारिके कान्तिदायिनि । महाताण्डवसुप्रीते मोददायिनि माधवि ॥

sṛṣṭisthitikare nāśakārike kāntidāyini mahātāṇḍavasuprīte modadāyini mādhavi

सृष्टि और स्थिति करने वाली, नाश करने वाली, कांति देने वाली! महातांडव से प्रसन्न, आनंद देने वाली, हे माधवी!

श्लोक 41 (devibhagavatam.10.12.41)

प्रसीद देवदेवेशि प्रसीद करुणानिधे । निशुम्भशुम्भसम्भूतभयापाराम्बुवारिधे ॥

prasīda devadeveśi prasīda karuṇānidhe niśumbhaśumbhasambhūtabhayāpārāmbuvāridhe

प्रसन्न होइए, हे देवाधिदेवी! प्रसन्न होइए, हे करुणा की निधि! शुम्भ-निशुम्भ से उत्पन्न भय के अपार समुद्र से —

श्लोक 42 (devibhagavatam.10.12.42)

उद्धरास्मान् प्रपन्नार्तिनाशिके शरणागतान् । एवं संस्तुवतां तेषां त्रिदशानां धरापते ॥

uddharāsmān prapannārtināśike śaraṇāgatān evaṁ saṁstuvatāṁ teṣāṁ tridaśānāṁ dharāpate

— शरणागत, पीड़ित हम प्रपन्नों का उद्धार कीजिए।' इस प्रकार उन तैंतीस देवताओं के स्तुति करने पर, हे धरापते! —

श्लोक 43 (devibhagavatam.10.12.43)

प्रसन्ना गिरिजा प्राह ब्रूत स्तवनकारणम् । एतस्मिन्नन्तरे यस्याः कोशरूपात्समुत्थिता ॥

prasannā girijā prāha brūta stavanakāraṇam etasminnantare yasyāḥ kośarūpātsamutthitā

— प्रसन्न होकर गिरिजा बोलीं, 'इस स्तुति का कारण बताओ।' इसी बीच जिनके कोश-रूप शरीर से उत्पन्न हुईं —

श्लोक 44 (devibhagavatam.10.12.44)

कौशिकी सा जगत्पूज्या देवान्प्रीत्येदमब्रवीत् । प्रसन्नाहं सुरश्रेष्ठाः स्तवेनोत्तमरूपिणी ॥

kauśikī sā jagatpūjyā devānprītyedamabravīt prasannāhaṁ suraśreṣṭhāḥ stavenottamarūpiṇī

— वह जगत्पूज्या कौशिकी देवताओं से प्रेमपूर्वक बोलीं — 'मैं प्रसन्न हूँ, हे देवश्रेष्ठो! इस स्तुति से, उत्तम-रूपिणी मैं —'

श्लोक 45 (devibhagavatam.10.12.45)

व्रियतां वर इत्युक्ते देवाः संवव्रिरे वरम् । शुम्भनामावरो भ्राता निशुम्भस्तस्य विश्रुतः ॥

vriyatāṁ vara ityukte devāḥ saṁvavrire varam śumbhanāmāvaro bhrātā niśumbhastasya viśrutaḥ

— 'वर माँगो।' यह कहे जाने पर देवताओं ने वर माँगा — 'शुम्भ नामक एक भाई और उसका विख्यात भाई निशुम्भ —

श्लोक 46 (devibhagavatam.10.12.46)

त्रैलोक्यमोजसाक्रान्तं दैत्येन बलशालिना । तद्वधश्चिन्त्यतां देवि दुरात्मा दानवेश्वरः ॥

trailokyamojasākrāntaṁ daityena balaśālinā tadvadhaścintyatāṁ devi durātmā dānaveśvaraḥ

— उस बलशाली दैत्य ने बलपूर्वक त्रिलोक को आक्रांत कर लिया है। हे देवि! उनके वध का विचार कीजिए — वह दुरात्मा दानवेश्वर —

श्लोक 47 (devibhagavatam.10.12.47)

बाधते सततं देवि तिरस्कृत्य निजौजसा । देव्युवाच । देवशत्रुं पातयिष्ये निशुम्भं शुम्भमेव च ॥

bādhate satataṁ devi tiraskṛtya nijaujasā devyuvāca devaśatruṁ pātayiṣye niśumbhaṁ śumbhameva ca

— अपने बल से हमारा तिरस्कार कर निरंतर पीड़ा देता है, हे देवि!' देवी ने कहा — 'देवशत्रु निशुम्भ और शुम्भ को मैं गिरा दूँगी —

श्लोक 48 (devibhagavatam.10.12.48)

स्वस्थास्तिष्ठत भद्रं वः कण्टकं नाशयामि वः । इत्युक्त्वा देवदेवेशी देवान्सेन्द्रान्दयामयी ॥

svasthāstiṣṭhata bhadraṁ vaḥ kaṇṭakaṁ nāśayāmi vaḥ ityuktvā devadeveśī devānsendrāndayāmayī

— तुम स्वस्थ रहो, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हारे कांटे को नष्ट करती हूँ।' यह कहकर वह दयामयी देवाधिदेवी, इन्द्र सहित देवताओं के —

श्लोक 49 (devibhagavatam.10.12.49)

जगामादर्शनं सद्यो मिषतां त्रिदिवौकसाम् । देवाः समागता हृष्टाः सुवर्णाद्रिगुहां शुभाम् ॥

jagāmādarśanaṁ sadyo miṣatāṁ tridivaukasām devāḥ samāgatā hṛṣṭāḥ suvarṇādriguhāṁ śubhām

— सामने से ही, उन देवताओं के देखते-देखते अदृश्य हो गईं। हर्षित देवगण स्वर्ण पर्वत की शुभ गुफा में एकत्र हुए।

श्लोक 50 (devibhagavatam.10.12.50)

चण्डमुण्डौ पश्यतःस्म भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः । दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं देवीं लोकविमोहिनीम् ॥

caṇḍamuṇḍau paśyataḥsma bhṛtyau śumbhaniśumbhayoḥ dṛṣṭvā tāṁ cārusarvāṅgīṁ devīṁ lokavimohinīm

चण्ड और मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ के दोनों सेवक, लोकों को मोहित करने वाली उस सर्वांग-सुंदर देवी को देखने लगे।

श्लोक 51 (devibhagavatam.10.12.51)

कथयामासतू राज्ञे भृत्यौ तौ चण्डमुण्डकौ । देव सर्वासुरश्रेष्ठ रत्नभोगार्ह मानद ॥

kathayāmāsatū rājñe bhṛtyau tau caṇḍamuṇḍakau deva sarvāsuraśreṣṭha ratnabhogārha mānada

उन दोनों सेवकों, चण्ड और मुण्ड ने राजा से यह कहा — 'हे देव! समस्त असुरों में श्रेष्ठ, रत्न-भोग के योग्य, मान देने वाले! —

श्लोक 52 (devibhagavatam.10.12.52)

अपूर्वा कामिनी दृष्टा चावाभ्यां रिपुमर्दन । तस्याः सम्भोगयोग्यत्वमस्त्येव तव साम्प्रतम् ॥

apūrvā kāminī dṛṣṭā cāvābhyāṁ ripumardana tasyāḥ sambhogayogyatvamastyeva tava sāmpratam

— हम दोनों ने एक अपूर्व सुंदरी देखी है, हे शत्रुमर्दन! अब वह आपके भोग के योग्य ही है —

श्लोक 53 (devibhagavatam.10.12.53)

तां समानय चार्वङ्गीं भुङ्क्ष्व सौख्यसमन्वितः । तादृशी नासुरी नारी न गन्धर्वी न दानवी ॥

tāṁ samānaya cārvaṅgīṁ bhuṅkṣva saukhyasamanvitaḥ tādṛśī nāsurī nārī na gandharvī na dānavī

— उस सुंदरांगी को ले आइए, सुख के साथ भोग कीजिए। न असुरों में, न गंधर्वों में, न दानवों में —

श्लोक 54 (devibhagavatam.10.12.54)

न मानवी नापि देवी यादृशी सा मनोहरा । एवं भृत्यवचः श्रुत्वा शुम्भः परबलार्दनः ॥

na mānavī nāpi devī yādṛśī sā manoharā evaṁ bhṛtyavacaḥ śrutvā śumbhaḥ parabalārdanaḥ

— न मनुष्यों में, न देवताओं में भी, ऐसी मनोहर स्त्री कहीं नहीं है।' इस प्रकार सेवकों के वचन सुनकर, शत्रु-सेना का मर्दन करने वाला शुम्भ —

श्लोक 55 (devibhagavatam.10.12.55)

दूतं सम्मेषयामास सुग्रीवं नाम दानवम् । स दूतस्त्वरितं गत्वा देव्याः सविधमादरात् ॥

dūtaṁ sammeṣayāmāsa sugrīvaṁ nāma dānavam sa dūtastvaritaṁ gatvā devyāḥ savidhamādarāt

— सुग्रीव नामक एक दानव को दूत बनाकर भेजा। वह दूत शीघ्र जाकर, आदरपूर्वक देवी के समीप —

श्लोक 56 (devibhagavatam.10.12.56)

वृत्तान्तं कथयामास देव्यै शुम्भस्य यद्वचः । देवि शुम्भासुरो नाम त्रैलोक्यविजयी प्रभुः ॥

vṛttāntaṁ kathayāmāsa devyai śumbhasya yadvacaḥ devi śumbhāsuro nāma trailokyavijayī prabhuḥ

— शुम्भ के जो वचन थे, वह वृत्तांत देवी से कह सुनाया — 'हे देवि! शुम्भासुर नामक त्रिलोक-विजयी प्रभु —

श्लोक 57 (devibhagavatam.10.12.57)

सर्वेषां रत्नवस्तूनां भोक्ता मान्यो दिवौकसाम् । तदुक्तं शृणु मे देवि रत्नभोक्ताहमव्ययः ॥

sarveṣāṁ ratnavastūnāṁ bhoktā mānyo divaukasām taduktaṁ śṛṇu me devi ratnabhoktāhamavyayaḥ

— समस्त रत्नों-वस्तुओं का भोक्ता, स्वर्गवासियों द्वारा मान्य है। उनका कहा वचन सुनिए, हे देवि! — मैं अविनाशी रत्नभोक्ता हूँ —

श्लोक 58 (devibhagavatam.10.12.58)

त्वं चापि रत्नभूतासि भज मां चारुलोचने । सर्वेषु यानि रत्नानि देवासुरनरेषु च ॥

tvaṁ cāpi ratnabhūtāsi bhaja māṁ cārulocane sarveṣu yāni ratnāni devāsuranareṣu ca

— और तुम भी रत्नस्वरूपा हो, हे सुनयने! मेरा भजन करो। देवों, असुरों और मनुष्यों में जो भी रत्न हैं —

श्लोक 59 (devibhagavatam.10.12.59)

तानि मय्येव सुभगे भज मां कामजै रसैः । देव्युवाच । सत्यं वदसि हे दूत दैत्यराजप्रियङ्करम् ॥

tāni mayyeva subhage bhaja māṁ kāmajai rasaiḥ devyuvāca satyaṁ vadasi he dūta daityarājapriyaṅkaram

— वे सब, हे सुभगे! मुझमें ही हैं; कामनाजनित रसों से मेरा भजन करो।' देवी ने कहा — 'हे दूत! तुम सत्य कहते हो, दैत्यराज को प्रिय करने वाला —

श्लोक 60 (devibhagavatam.10.12.60)

प्रतिज्ञा या मया पूर्वं कृता साप्यनृता कथम् । भवेत्तां शृणु मे दूत या प्रतिज्ञा मया कृता ॥

pratijñā yā mayā pūrvaṁ kṛtā sāpyanṛtā katham bhavettāṁ śṛṇu me dūta yā pratijñā mayā kṛtā

— किन्तु मैंने पहले जो प्रतिज्ञा की थी, वह भी असत्य कैसे हो सकती है? हे दूत! मेरी वह प्रतिज्ञा सुनो —

श्लोक 61 (devibhagavatam.10.12.61)

यो मे दर्पं विधुनुते यो मे बलमपोहति । यो मे प्रतिबलो भूयात्स एव मम भोगभाक् ॥

yo me darpaṁ vidhunute yo me balamapohati yo me pratibalo bhūyātsa eva mama bhogabhāk

— जो मेरे गर्व को दूर करे, जो मेरे बल को नष्ट करे, जो मेरे समान बलशाली हो जाए, वही मेरे भोग का अधिकारी होगा।

श्लोक 62 (devibhagavatam.10.12.62)

तत एनां प्रतिज्ञां मे सत्यां कृत्वासुरेश्वरः । गृह्णातु पाणिं तरसा तस्याशक्यं किमत्र हि ॥

tata enāṁ pratijñāṁ me satyāṁ kṛtvāsureśvaraḥ gṛhṇātu pāṇiṁ tarasā tasyāśakyaṁ kimatra hi

— तो असुरेश्वर मेरी इस प्रतिज्ञा को सत्य करके शीघ्र मेरा हाथ ग्रहण करें — इसमें उनके लिए क्या असंभव है?

श्लोक 63 (devibhagavatam.10.12.63)

तस्माद् गच्छ महादूत स्वामिनं ब्रूहि चादृतः । प्रतिज्ञां चापि मे सत्यां विधास्यति बलाधिकः ॥

tasmād gaccha mahādūta svāminaṁ brūhi cādṛtaḥ pratijñāṁ cāpi me satyāṁ vidhāsyati balādhikaḥ

— इसलिए, हे महादूत! जाओ, अपने स्वामी से आदरपूर्वक कहो — मेरी प्रतिज्ञा को भी वह बलाधिक ही सत्य सिद्ध करेगा।

श्लोक 64 (devibhagavatam.10.12.64)

एवं वाक्यं महादेव्याः समाकर्ण्य स दानवः । कथयामास शुम्भाय देव्या वृत्तान्तमादितः ॥

evaṁ vākyaṁ mahādevyāḥ samākarṇya sa dānavaḥ kathayāmāsa śumbhāya devyā vṛttāntamāditaḥ

महादेवी के इन वचनों को सुनकर, उस दानव ने शुम्भ को देवी का सारा वृत्तांत आरम्भ से कह सुनाया।

श्लोक 65 (devibhagavatam.10.12.65)

तदाप्रियं दूतवाक्यं शुम्भः श्रुत्वा महाबलः । कोपमाहारयामास महान्तं दनुजाधिपः ॥

tadāpriyaṁ dūtavākyaṁ śumbhaḥ śrutvā mahābalaḥ kopamāhārayāmāsa mahāntaṁ danujādhipaḥ

तब दूत का वह अप्रिय वचन सुनकर महाबली शुम्भ, वह दनुजाधिप, अत्यंत क्रोध को प्राप्त हुआ।

श्लोक 66 (devibhagavatam.10.12.66)

ततो धूम्राक्षनामानं दैत्यं दैत्यपतिः प्रभुः । आदिदेश शृणु वचो धूम्राक्ष मम चादृतः ॥

tato dhūmrākṣanāmānaṁ daityaṁ daityapatiḥ prabhuḥ ādideśa śṛṇu vaco dhūmrākṣa mama cādṛtaḥ

तब उस प्रभु दैत्यपति ने धूम्राक्ष नामक दैत्य को आदेश दिया — 'सुनो मेरे वचन, हे धूम्राक्ष, आदरपूर्वक —

श्लोक 67 (devibhagavatam.10.12.67)

तां दुष्टां केशपाशेषु हत्वाप्यानीयतां मम । समीपमविलम्बेन शीघ्रं गच्छस्व मे पुरः ॥

tāṁ duṣṭāṁ keśapāśeṣu hatvāpyānīyatāṁ mama samīpamavilambena śīghraṁ gacchasva me puraḥ

— उस दुष्टा को केश-पाशों से पकड़कर मार भी दो तो भी उसे मेरे समीप ले आओ; बिना विलंब किए शीघ्र मेरे सामने जाओ।'

श्लोक 68 (devibhagavatam.10.12.68)

इत्यादेशं समासाद्य दैत्येशो धूम्रलोचनः । षष्ट्यासुराणां सहितः सहस्राणां महाबलः ॥

ityādeśaṁ samāsādya daityeśo dhūmralocanaḥ ṣaṣṭyāsurāṇāṁ sahitaḥ sahasrāṇāṁ mahābalaḥ

इस आदेश को प्राप्त कर वह दैत्यपति धूम्रलोचन, महाबली, साठ हज़ार असुरों के साथ —

श्लोक 69 (devibhagavatam.10.12.69)

तुहिनाचलमासाद्य देव्याः सविधमेव सः । उच्चैर्देवीं जगादाशु भज दैत्यपतिं शुभे ॥

tuhinācalamāsādya devyāḥ savidhameva saḥ uccairdevīṁ jagādāśu bhaja daityapatiṁ śubhe

— हिमालय पर्वत पर देवी के समीप ही पहुँचकर, उच्च स्वर में देवी से बोला — 'हे शुभे! दैत्यपति का भजन करो —

श्लोक 70 (devibhagavatam.10.12.70)

शुम्भं नाम महावीर्यं सर्वभोगानवाप्नुहि । नोचेत्केशान्गृहीत्वा त्वां नेष्ये दैत्यपतिं प्रति ॥

śumbhaṁ nāma mahāvīryaṁ sarvabhogānavāpnuhi nocetkeśāngṛhītvā tvāṁ neṣye daityapatiṁ prati

— महापराक्रमी शुम्भ नामक का, और समस्त भोगों को प्राप्त करो। नहीं तो केश पकड़कर मैं तुम्हें दैत्यपति के पास ले जाऊँगा।'

श्लोक 71 (devibhagavatam.10.12.71)

इत्युक्ता सा ततो देवी दैत्येन त्रिदशारिणा । उवाच दैत्य यद् ब्रूषे तत्सत्यं ते महाबल ॥

ityuktā sā tato devī daityena tridaśāriṇā uvāca daitya yad brūṣe tatsatyaṁ te mahābala

देवताओं के शत्रु उस दैत्य के इस प्रकार कहे जाने पर, तब वह देवी बोलीं — 'हे दैत्य! तुम जो कहते हो, वह सत्य है, हे महाबल! —

श्लोक 72 (devibhagavatam.10.12.72)

राजा शुम्भासुरस्त्वं च किं करिष्यसि तद्वद । इत्युक्तो दैत्यपोऽधावत्तूर्णं शस्त्रसमन्वितः ॥

rājā śumbhāsurastvaṁ ca kiṁ kariṣyasi tadvada ityukto daityapo'dhāvattūrṇaṁ śastrasamanvitaḥ

— राजा शुम्भासुर बलशाली है, और तुम क्या करोगे, यह बताओ।' यह कहे जाने पर वह दैत्यपति शस्त्र सहित शीघ्र दौड़ पड़ा —

श्लोक 73 (devibhagavatam.10.12.73)

भस्मसात्तं चकाराशु हुङ्कारेण महेश्वरी । ततः सैन्यं वाहनेन देव्या भग्नं महीपते ॥

bhasmasāttaṁ cakārāśu huṅkāreṇa maheśvarī tataḥ sainyaṁ vāhanena devyā bhagnaṁ mahīpate

— उसे उस महेश्वरी ने केवल हुंकार से तुरंत भस्म कर दिया। तब, हे भूमिपते! उसकी सेना वाहनों सहित देवी द्वारा तोड़ दी गई —

श्लोक 74 (devibhagavatam.10.12.74)

दिशो दशाभजच्छीघ्रं हाहाभूतमचेतनम् । तद्वृत्तान्तं समाश्रुत्य स शुम्भो दैत्यराड् विभुः ॥

diśo daśābhajacchīghraṁ hāhābhūtamacetanam tadvṛttāntaṁ samāśrutya sa śumbho daityarāḍ vibhuḥ

— और शीघ्र दसों दिशाओं में हाहाकार करती, चेतनाशून्य होकर भाग गई। उस वृत्तांत को सुनकर वह प्रभु दैत्यराज शुम्भ —

श्लोक 75 (devibhagavatam.10.12.75)

चुकोप च महाकोपाद् भ्रुकुटीकुटिलाननः । ततः कोपपरीतात्मा दैत्यराजः प्रतापवान् ॥

cukopa ca mahākopād bhrukuṭīkuṭilānanaḥ tataḥ kopaparītātmā daityarājaḥ pratāpavān

— महाक्रोध से क्रुद्ध हो गया, उसका मुख भौंहों से कुटिल हो उठा। तब क्रोध से आविष्ट मन वाला वह प्रतापी दैत्यराज —

श्लोक 76 (devibhagavatam.10.12.76)

चण्डं मुण्डं रक्तबीजं क्रमतः प्रैषयद्विभुः । ते च गत्वा त्रयो दैत्या विक्रान्ता बहुविक्रमाः ॥

caṇḍaṁ muṇḍaṁ raktabījaṁ kramataḥ praiṣayadvibhuḥ te ca gatvā trayo daityā vikrāntā bahuvikramāḥ

— चण्ड, मुण्ड और रक्तबीज को क्रमशः भेजा, वह प्रभु। और वे तीनों पराक्रमी, महाविक्रमी दैत्य जाकर —

श्लोक 77 (devibhagavatam.10.12.77)

देवीं ग्रहीतुमारब्धयत्नास्ते ह्यभवन्बलात् । तानापतत एवासौ जगद्धात्री मदोत्कटा ॥

devīṁ grahītumārabdhayatnāste hyabhavanbalāt tānāpatata evāsau jagaddhātrī madotkaṭā

— बलपूर्वक देवी को पकड़ने का प्रयत्न करने लगे। उन्हें आक्रमण करते ही देखकर वह मदोन्मत्त जगद्धात्री देवी —

श्लोक 78 (devibhagavatam.10.12.78)

शूलं गहीत्वा वेगेन पातयामास भूतले । ससैन्यान्निहताञ्छ्रुत्वा दैत्यांस्त्रीन्दानवेश्वरौ ॥

śūlaṁ gahītvā vegena pātayāmāsa bhūtale sasainyānnihatāñchrutvā daityāṁstrīndānaveśvarau

— शूल हाथ में लेकर वेगपूर्वक उन्हें भूतल पर गिरा दिया। सेना सहित उन तीनों दैत्यों के मारे जाने का समाचार सुनकर, वे दोनों दानवेश्वर —

श्लोक 79 (devibhagavatam.10.12.79)

शुम्भश्चैव निशुम्भश्च समाजग्मतुरोजसा । निशुम्भश्चैव शुम्भश्च कृत्वा युद्धं महोत्कटम् ॥

śumbhaścaiva niśumbhaśca samājagmaturojasā niśumbhaścaiva śumbhaśca kṛtvā yuddhaṁ mahotkaṭam

— शुम्भ और निशुम्भ स्वयं ही वेगपूर्वक आ पहुँचे। तब निशुम्भ और शुम्भ ने अत्यंत भीषण युद्ध करके —

श्लोक 80 (devibhagavatam.10.12.80)

देव्याश्च वशगौ जातौ निहतौ च तयासुरौ । इति दैत्यवरं शुम्भं घातयित्वा जगन्मयी ॥

devyāśca vaśagau jātau nihatau ca tayāsurau iti daityavaraṁ śumbhaṁ ghātayitvā jaganmayī

— देवी के वशीभूत होकर, उनके द्वारा दोनों असुर मार डाले गए। इस प्रकार उस श्रेष्ठ दैत्य शुम्भ का वध कर, वह जगन्मयी देवी —

श्लोक 81 (devibhagavatam.10.12.81)

विबुधैः संस्तुता तद्वत्साक्षाद्वागीश्वरी परा । एवं ते वर्णितो राजन् प्रादुर्भावोऽतिरम्यकः ॥

vibudhaiḥ saṁstutā tadvatsākṣādvāgīśvarī parā evaṁ te varṇito rājan prādurbhāvo'tiramyakaḥ

— विद्वानों द्वारा स्तुत हुईं, वे साक्षात् परम वागीश्वरी। हे राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह अत्यंत रमणीय प्रादुर्भाव वर्णन किया —

श्लोक 82 (devibhagavatam.10.12.82)

काल्याश्चैव महालक्ष्याः सरस्वत्याः क्रमेण च । परा परेश्वरी देवी जगत्सर्गं करोति च ॥

kālyāścaiva mahālakṣyāḥ sarasvatyāḥ krameṇa ca parā pareśvarī devī jagatsargaṁ karoti ca

— काली, महालक्ष्मी और सरस्वती का, क्रमशः। वह परा परमेश्वरी देवी जगत् की सृष्टि करती हैं —

श्लोक 83 (devibhagavatam.10.12.83)

पालनं चैव संहारं सैव देवी दधाति हि । तां समाश्रय देवेशीं जगन्मोहनिवारिणीम् ॥

pālanaṁ caiva saṁhāraṁ saiva devī dadhāti hi tāṁ samāśraya deveśīṁ jaganmohanivāriṇīm

— तथा पालन और संहार भी वही देवी करती हैं। हे राजन्! जगत् के मोह को दूर करने वाली उस देवेशी की शरण लीजिए —

श्लोक 84 (devibhagavatam.10.12.84)

महामायां पूज्यतमां सा कार्यं ते विधास्यति । श्रीनारायण उवाच । इति राजा वचः श्रुत्वा मुनेः परमशोभनम् ॥

mahāmāyāṁ pūjyatamāṁ sā kāryaṁ te vidhāsyati śrīnārāyaṇa uvāca iti rājā vacaḥ śrutvā muneḥ paramaśobhanam

— उस परम पूज्य महामाया की; वे ही आपका कार्य सिद्ध करेंगी। श्री नारायण ने कहा — इस प्रकार मुनि के परम सुंदर वचन सुनकर राजा —

श्लोक 85 (devibhagavatam.10.12.85)

देवीं जगाम शरणं सर्वकामफलप्रदाम् । निराहारो यतात्मा च तन्मनाश्च समाहितः ॥

devīṁ jagāma śaraṇaṁ sarvakāmaphalapradām nirāhāro yatātmā ca tanmanāśca samāhitaḥ

— समस्त कामनाओं के फल देने वाली देवी की शरण में गया। निराहार रहकर, संयमित आत्मा और एकाग्र मन वाला होकर —

श्लोक 86 (devibhagavatam.10.12.86)

देवीमूर्तिं मृण्मयीं च पूजयामास भक्तितः । पूजनान्ते बलिं तस्यै निजगात्रासृजं ददत् ॥

devīmūrtiṁ mṛṇmayīṁ ca pūjayāmāsa bhaktitaḥ pūjanānte baliṁ tasyai nijagātrāsṛjaṁ dadat

— उसने भक्तिपूर्वक देवी की मिट्टी की मूर्ति की पूजा की; पूजन के अंत में अपने ही शरीर के रक्त की बलि उन्हें अर्पित करते हुए —

श्लोक 87 (devibhagavatam.10.12.87)

तदा प्रसन्ना देवेशी जगद्योनिः कृपावती । प्रादुर्बभूव पुरतो वरं ब्रूहीति भाषिणी ॥

tadā prasannā deveśī jagadyoniḥ kṛpāvatī prādurbabhūva purato varaṁ brūhīti bhāṣiṇī

— तब प्रसन्न हुई, जगत् की योनि, कृपायुक्त वह देवेशी उसके सामने प्रकट हुईं, कहती हुईं — 'वर माँगो।'

श्लोक 88 (devibhagavatam.10.12.88)

स राजा निजमोहस्य नाशनं ज्ञानमुत्तमम् । राज्यं निष्कण्टकं चैव याचति स्म महेश्वरीम् ॥

sa rājā nijamohasya nāśanaṁ jñānamuttamam rājyaṁ niṣkaṇṭakaṁ caiva yācati sma maheśvarīm

उस राजा ने अपने ही मोह के नाश के लिए उत्तम ज्ञान, और निष्कंटक राज्य महेश्वरी से माँगा।

श्लोक 89 (devibhagavatam.10.12.89)

देव्युवाच । राजन्निष्कण्टकं राज्यं ज्ञानं वै मोहनाशनम् । भविष्यति मया दत्तमस्मिन्नेव भवे तव ॥

devyuvāca rājanniṣkaṇṭakaṁ rājyaṁ jñānaṁ vai mohanāśanam bhaviṣyati mayā dattamasminneva bhave tava

देवी ने कहा — हे राजन्! निष्कंटक राज्य और मोह का नाश करने वाला ज्ञान — यह इसी जन्म में मेरे द्वारा तुम्हें दिया जाएगा।

श्लोक 90 (devibhagavatam.10.12.90)

अन्यच्च शृणु भूपाल जन्मान्तरविचेष्टितम् । भानोर्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता भवान् ॥

anyacca śṛṇu bhūpāla janmāntaraviceṣṭitam bhānorjanma samāsādya sāvarṇirbhavitā bhavān

और भी सुनो, हे भूपाल! जो जन्मांतर में होने वाला है — सूर्य से जन्म प्राप्त कर तुम सावर्णि बनोगे —

श्लोक 91 (devibhagavatam.10.12.91)

तत्र मन्वन्तरस्यापि पतित्वं बहुविक्रमम् । सन्ततिं बहुलां चापि प्राप्स्यते मद्वराद्भवान् ॥

tatra manvantarasyāpi patitvaṁ bahuvikramam santatiṁ bahulāṁ cāpi prāpsyate madvarādbhavān

— और वहाँ महापराक्रमी मन्वंतर के स्वामी भी बनोगे; मेरे वर से तुम्हें प्रचुर संतान भी प्राप्त होगी।

श्लोक 92 (devibhagavatam.10.12.92)

एवं दत्त्वा वरं देवी जगामादर्शनं तदा । सोऽपि देव्याः प्रसादेन जातो मन्वन्तराधिपः ॥

evaṁ dattvā varaṁ devī jagāmādarśanaṁ tadā so'pi devyāḥ prasādena jāto manvantarādhipaḥ

इस प्रकार वर देकर देवी तब अदृश्य हो गईं; और वह भी देवी के प्रसाद से मन्वंतर का अधिपति बना।

श्लोक 93 (devibhagavatam.10.12.93)

एवं ते वर्णितं साधो सावर्णेर्जन्म कर्म च । एतत्पठंस्तथा शृण्वन्देव्यनुग्रहमाप्नुयात् ॥

evaṁ te varṇitaṁ sādho sāvarṇerjanma karma ca etatpaṭhaṁstathā śṛṇvandevyanugrahamāpnuyāt

हे साधो! इस प्रकार मैंने तुम्हें सावर्णि का जन्म और कर्म वर्णन किया। जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह देवी का अनुग्रह प्राप्त करता है।

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