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दशम स्कन्ध · अध्याय 6

अगस्त्य का आश्वासन

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (devibhagavatam.10.6.1)

सूत उवाच । श्रीशस्य वचनाद्देवाः सन्तुष्टाः सर्व एव हि । प्रसन्नमनसो भूत्वा पुनरेनं समूचिरे ॥

sūta uvāca śrīśasya vacanāddevāḥ santuṣṭāḥ sarva eva hi prasannamanaso bhūtvā punarenaṁ samūcire

सूत ने कहा — श्रीश (विष्णु) के वचन से सभी देवगण संतुष्ट हो गए। प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने पुनः उनसे कहा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.10.6.2)

देवा ऊचुः । देवदेव महाविष्णो सृष्टिस्थित्यन्तकारण । विष्णो विन्ध्यनगोऽर्कस्य मार्गरोधं करोति हि ॥

devā ūcuḥ devadeva mahāviṣṇo sṛṣṭisthityantakāraṇa viṣṇo vindhyanago'rkasya mārgarodhaṁ karoti hi

देवों ने कहा — हे देवाधिदेव, महाविष्णु, सृष्टि-स्थिति-प्रलय के कारण! हे विष्णु! विंध्य पर्वत सूर्य के मार्ग को रोक रहा है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.10.6.3)

तेन भानुविरोधेन सर्व एव महाविभो । अलब्धभोगभागा हि किं कुर्मः कुत्र याम हि ॥

tena bhānuvirodhena sarva eva mahāvibho alabdhabhogabhāgā hi kiṁ kurmaḥ kutra yāma hi

हे महाविभो! सूर्य के उस अवरोध से हम सभी अपने भोग-भाग से वंचित हैं — हम क्या करें, कहाँ जाएँ?

श्लोक 4 (devibhagavatam.10.6.4)

श्रीभगवानुवाच । या कर्त्री सर्वजगतामाद्या च कुलवर्धनी । देवी भगवती तस्याः पूजकः परमद्युतिः ॥

śrībhagavānuvāca yā kartrī sarvajagatāmādyā ca kulavardhanī devī bhagavatī tasyāḥ pūjakaḥ paramadyutiḥ

श्री भगवान ने कहा — जो समस्त जगत की कर्त्री, आदिस्वरूपा और कुल की वर्धिनी हैं, उन भगवती देवी की पूजा करने वाले, परम तेजस्वी —

श्लोक 5 (devibhagavatam.10.6.5)

अगस्त्यो मुनिवर्योऽसौ वाराणस्यां समासते । तत्तेजोवञ्चकोऽगस्त्यो भविष्यति सुरोत्तमाः ॥

agastyo munivaryo'sau vārāṇasyāṁ samāsate tattejovañcako'gastyo bhaviṣyati surottamāḥ

— मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य वाराणसी में निवास करते हैं। हे देवश्रेष्ठो! उन्हीं के तेज से विंध्य को छला जा सकेगा।

श्लोक 6 (devibhagavatam.10.6.6)

तं प्रसाद्य द्विजवरमगस्त्यं परमौजसम् । याचध्वं विबुधाः काशीं गत्वा निःश्रेयसः पदीम् ॥

taṁ prasādya dvijavaramagastyaṁ paramaujasam yācadhvaṁ vibudhāḥ kāśīṁ gatvā niḥśreyasaḥ padīm

परम तेजस्वी उस श्रेष्ठ द्विज अगस्त्य को प्रसन्न कर, हे देवो! काशी जाकर, कल्याण-पद के लिए उनसे याचना करो।

श्लोक 7 (devibhagavatam.10.6.7)

सूत उवाच । एवं समुपदिष्टास्ते विष्णुना विबुधोत्तमाः । प्रतीताः प्रणताः सर्वे जग्मुर्वाराणसीं पुरीम् ॥

sūta uvāca evaṁ samupadiṣṭāste viṣṇunā vibudhottamāḥ pratītāḥ praṇatāḥ sarve jagmurvārāṇasīṁ purīm

सूत ने कहा — इस प्रकार विष्णु द्वारा उपदिष्ट वे श्रेष्ठ देवगण विश्वस्त और प्रणत होकर वाराणसी नगरी को गए।

श्लोक 8 (devibhagavatam.10.6.8)

क्षणेन विबुधश्रेष्ठा गत्वा काशीपुरीं शुभाम् । मणिकर्णीं समाप्लुत्य सचैलं भक्तिसंयुताः ॥

kṣaṇena vibudhaśreṣṭhā gatvā kāśīpurīṁ śubhām maṇikarṇīṁ samāplutya sacailaṁ bhaktisaṁyutāḥ

क्षणभर में वे श्रेष्ठ देवगण शुभ काशीपुरी में पहुँचकर, वस्त्रों सहित भक्तिपूर्वक मणिकर्णिका में स्नान कर —

श्लोक 9 (devibhagavatam.10.6.9)

सन्तर्प्य देवांश्च पितॄन्दत्त्वा दानं विधानतः । आगत्य मुनिवर्यस्य चाश्रमं परमं महत् ॥

santarpya devāṁśca pitṝndattvā dānaṁ vidhānataḥ āgatya munivaryasya cāśramaṁ paramaṁ mahat

— देवताओं और पितरों को तृप्त कर, विधिपूर्वक दान देकर, उस श्रेष्ठ मुनि के परम विशाल आश्रम में आकर —

श्लोक 10 (devibhagavatam.10.6.10)

प्रशान्तश्वापदाकीर्णं नानापादपसङ्कुलम् । मयूरैः सारसैर्हंसैश्चक्रवाकैरुपाश्रितम् ॥

praśāntaśvāpadākīrṇaṁ nānāpādapasaṅkulam mayūraiḥ sārasairhaṁsaiścakravākairupāśritam

— जो अत्यंत शांत, वन्य पशुओं से भरा, अनेक वृक्षों से युक्त था, तथा मयूर, सारस, हंस और चक्रवाक पक्षियों से आश्रित था।

श्लोक 11 (devibhagavatam.10.6.11)

महावराहैः कोलैश्च व्याघ्रैः शार्दूलकैरपि । मृगै रुरुभिरत्यर्थं खड्गैः शरभकैरपि ॥

mahāvarāhaiḥ kolaiśca vyāghraiḥ śārdūlakairapi mṛgai rurubhiratyarthaṁ khaḍgaiḥ śarabhakairapi

— महान् वराह और शूकरों, बाघों और चीतों से, तथा अत्यंत मृगों, रुरुओं, गैंडों और शरभों से भी आश्रित —

श्लोक 12 (devibhagavatam.10.6.12)

समाश्रितं परमया लक्ष्म्या मुनिवरं तदा । दण्डवत्पतिताः सर्वे प्रणेमुश्च पुनः पुनः ॥

samāśritaṁ paramayā lakṣmyā munivaraṁ tadā daṇḍavatpatitāḥ sarve praṇemuśca punaḥ punaḥ

— परम लक्ष्मी से युक्त उस श्रेष्ठ मुनि के आश्रम को देखकर, वे सब दण्डवत् गिरकर बार-बार प्रणाम करने लगे।

श्लोक 13 (devibhagavatam.10.6.13)

देवा ऊचुः । जय द्विजगणाधीश मान्य पूज्य धरासुर । वातापीबलनाशाय नमस्ते कुम्भयोनये ॥

devā ūcuḥ jaya dvijagaṇādhīśa mānya pūjya dharāsura vātāpībalanāśāya namaste kumbhayonaye

देवों ने कहा — हे द्विजगणाधीश, मान्य, पूज्य, धरासुर! वातापि के बल का नाश करने वाले, हे कुम्भयोनि! आपको नमस्कार।

श्लोक 14 (devibhagavatam.10.6.14)

लोपामुद्रापते श्रीमन्मित्रावरुणसम्भव । सर्वविद्यानिधेऽगस्त्य शास्त्रयोने नमोऽस्तु ते ॥

lopāmudrāpate śrīmanmitrāvaruṇasambhava sarvavidyānidhe'gastya śāstrayone namo'stu te

हे लोपामुद्रा के पति, श्रीमान मित्रावरुण-पुत्र! हे अगस्त्य, समस्त विद्याओं के निधि, शास्त्र से उत्पन्न! आपको नमस्कार।

श्लोक 15 (devibhagavatam.10.6.15)

यस्योदये प्रसन्नानि भवन्त्युज्ज्वलभाञ्ज्यपि । तोयानि तोयराशीनां तस्मै तुभ्यं नमोऽस्तु ते ॥

yasyodaye prasannāni bhavantyujjvalabhāñjyapi toyāni toyarāśīnāṁ tasmai tubhyaṁ namo'stu te

जिनके उदय से समुद्रों का जल, उमड़ता हुआ और उज्ज्वल होने पर भी, शांत हो जाता है — उन आपको नमस्कार।

श्लोक 16 (devibhagavatam.10.6.16)

काशपुष्पविकासाय लङ्कावासप्रियाय च । जटामण्डलयुक्ताय सशिष्याय नमोऽस्तु ते ॥

kāśapuṣpavikāsāya laṅkāvāsapriyāya ca jaṭāmaṇḍalayuktāya saśiṣyāya namo'stu te

काश-पुष्पों के खिलने के कारण, लंका की ओर निवास के प्रिय, जटाओं के मंडल से युक्त, अपने शिष्य सहित आपको नमस्कार।

श्लोक 17 (devibhagavatam.10.6.17)

जय सर्वामरस्तव्य गुणराशे महामुने । वरिष्ठाय च पूज्याय सस्त्रीकाय नमोऽस्तु ते ॥

jaya sarvāmarastavya guṇarāśe mahāmune variṣṭhāya ca pūjyāya sastrīkāya namo'stu te

हे समस्त देवताओं द्वारा स्तुत्य, गुणों की राशि, महामुने! श्रेष्ठतम, पूज्य, अपनी पत्नी सहित आपको नमस्कार।

श्लोक 18 (devibhagavatam.10.6.18)

प्रसादः क्रियतां स्वामिन् वयं त्वां शरणं गताः । दुस्तराच्छैलजाद्दुःखात्पीडिताः परमद्युते ॥

prasādaḥ kriyatāṁ svāmin vayaṁ tvāṁ śaraṇaṁ gatāḥ dustarācchailajādduḥkhātpīḍitāḥ paramadyute

हे स्वामी! प्रसन्न होइए, हम आपकी शरण में आए हैं, हे परम तेजस्वी! पर्वत-पुत्र विंध्य से उत्पन्न दुस्तर दुःख से पीड़ित होकर।

श्लोक 19 (devibhagavatam.10.6.19)

इत्येवं संस्तुतोऽगस्त्यो मुनिः परमधार्मिकः । प्राह प्रसन्नया वाचा विहसन् द्विजसत्तमः ॥

ityevaṁ saṁstuto'gastyo muniḥ paramadhārmikaḥ prāha prasannayā vācā vihasan dvijasattamaḥ

इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, वे परम धार्मिक मुनि अगस्त्य, उन श्रेष्ठ द्विज ने मुस्कुराते हुए प्रसन्न वाणी में कहा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.10.6.20)

मुनिरुवाच । भवन्तः परमश्रेष्ठा देवास्त्रिभुवनेश्वराः । लोकपाला महात्मानो निग्रहानुग्रहक्षमाः ॥

muniruvāca bhavantaḥ paramaśreṣṭhā devāstribhuvaneśvarāḥ lokapālā mahātmāno nigrahānugrahakṣamāḥ

मुनि ने कहा — आप सब परम श्रेष्ठ देव, त्रिभुवन के स्वामी, लोकपाल, महात्मा, दण्ड और अनुग्रह दोनों में समर्थ हैं।

श्लोक 21 (devibhagavatam.10.6.21)

योऽमरावत्यधीशानः कुलिशं यस्य चायुधम् । सिद्ध्यष्टकं च यद्द्वारि स शक्रो मरुतां पतिः ॥

yo'marāvatyadhīśānaḥ kuliśaṁ yasya cāyudham siddhyaṣṭakaṁ ca yaddvāri sa śakro marutāṁ patiḥ

जो अमरावती के स्वामी हैं, जिनका आयुध वज्र है, जिनके द्वार पर आठों सिद्धियाँ रहती हैं — वे शक्र मरुतों के स्वामी हैं।

श्लोक 22 (devibhagavatam.10.6.22)

वैश्वानरः कृशानुर्हि हव्यकव्यवहोऽनिशम् । मुखं सर्वामराणां हि सोऽग्निः किं तस्य दुष्करम् ॥

vaiśvānaraḥ kṛśānurhi havyakavyavaho'niśam mukhaṁ sarvāmarāṇāṁ hi so'gniḥ kiṁ tasya duṣkaram

वैश्वानर अग्नि, जो निरंतर हव्य और कव्य को ढोने वाले हैं, समस्त देवताओं के मुख-स्वरूप हैं — उनके लिए क्या असंभव है?

श्लोक 23 (devibhagavatam.10.6.23)

रक्षोगणाधिपो भीमः सर्वेषां कर्मसाक्षिकः । दण्डव्यग्रकरो देवः किं तस्यासुकरं सुराः ॥

rakṣogaṇādhipo bhīmaḥ sarveṣāṁ karmasākṣikaḥ daṇḍavyagrakaro devaḥ kiṁ tasyāsukaraṁ surāḥ

रक्षोगणों के भीषण स्वामी, सबके कर्मों के साक्षी, हाथ में सदा दण्ड लिए हुए देव (यम) — हे देवो! उनके लिए क्या कठिन है?

श्लोक 24 (devibhagavatam.10.6.24)

तथापि यदि देवेशाः कार्यं मच्छक्तिसिद्धिभृत् । अस्ति चेदुच्यतां देवाः करिष्यामि न संशयः ॥

tathāpi yadi deveśāḥ kāryaṁ macchaktisiddhibhṛt asti ceducyatāṁ devāḥ kariṣyāmi na saṁśayaḥ

फिर भी, हे देवेशो! यदि मेरी शक्ति-सिद्धि से संपन्न होने वाला कोई कार्य हो, तो बताइए, हे देवो! मैं उसे अवश्य करूँगा।

श्लोक 25 (devibhagavatam.10.6.25)

एवं मुनिवरेणोक्तं निशम्य विबुधर्षभाः । प्रतीताः प्रणयोद्विग्नाः कार्यं निजगदुर्निजम् ॥

evaṁ munivareṇoktaṁ niśamya vibudharṣabhāḥ pratītāḥ praṇayodvignāḥ kāryaṁ nijagadurnijam

श्रेष्ठ मुनि के इन वचनों को सुनकर, वे देवश्रेष्ठ विश्वस्त होकर, स्नेह से उद्विग्न हो, अपना कार्य उनसे कह सुनाया।

श्लोक 26 (devibhagavatam.10.6.26)

महर्षे विन्ध्यगिरिणा निरुद्धोऽर्कविनिर्गमः । त्रैलोक्यं तेन संविष्टं हाहाभूतमचेतनम् ॥

maharṣe vindhyagiriṇā niruddho'rkavinirgamaḥ trailokyaṁ tena saṁviṣṭaṁ hāhābhūtamacetanam

'हे महर्षे! विंध्य पर्वत ने सूर्य के उदय को रोक दिया है। उससे त्रिलोकी हाहाकारमय और चेतनाशून्य हो गई है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.10.6.27)

तद्वृद्धिं स्तम्भय मुने निजया तपसः श्रिया । भवतस्तेजसागस्त्य नूनं नम्रो भविष्यति । एतदेवास्मदीयं च कार्यं कर्तव्यमस्ति हि ॥

tadvṛddhiṁ stambhaya mune nijayā tapasaḥ śriyā bhavatastejasāgastya nūnaṁ namro bhaviṣyati etadevāsmadīyaṁ ca kāryaṁ kartavyamasti hi

हे मुने! अपनी तपस्या की महिमा से उसकी वृद्धि को रोक दीजिए। हे अगस्त्य! आपके तेज से वह निश्चय ही विनम्र हो जाएगा। यही हमारा कार्य है जो हमें कराना है।'

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