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एकादश स्कन्ध · अध्याय 13

त्रिपुण्ड्रधारण-माहात्म्य

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.13.1)

श्रीनारायण उवाच । महापातकसङ्घाश्च पातकान्यपराण्यपि । नश्यन्ति मुनिशार्दूल सत्यं सत्यं न चान्यथा ॥

śrīnārāyaṇa uvāca mahāpātakasaṅghāśca pātakānyaparāṇyapi naśyanti muniśārdūla satyaṁ satyaṁ na cānyathā

श्री नारायण ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! महापातकों के समूह और अन्य छोटे-छोटे पाप — सभी नष्ट हो जाते हैं। यह सत्य है, यह पूर्णतः सत्य है, इसमें कोई अन्यथा नहीं है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.13.2)

एकं भस्म धृतं येन तस्य पुण्यफलं शृणु । यतीनां ज्ञानदं प्रोक्तं वानस्थानां विरक्तिदम् ॥

ekaṁ bhasma dhṛtaṁ yena tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu yatīnāṁ jñānadaṁ proktaṁ vānasthānāṁ viraktidam

जिस पुरुष ने एक बार भी भस्म धारण की है, उसके पुण्यफल को सुनो — यतियों के लिए यह ज्ञान देने वाली और वानप्रस्थों के लिए वैराग्य देने वाली कही गई है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.13.3)

गृहस्थानां मुने तद्वद्धर्मवृद्धिकरं तथा । ब्रह्मचर्याश्रमस्थानां स्वाध्यायप्रदमेव च ॥

gṛhasthānāṁ mune tadvaddharmavṛddhikaraṁ tathā brahmacaryāśramasthānāṁ svādhyāyapradameva ca

हे मुने! गृहस्थों के लिए यह उसी प्रकार धर्म की वृद्धि करने वाली है, और ब्रह्मचर्याश्रम में स्थित लोगों के लिए यह स्वाध्याय प्रदान करने वाली है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.13.4)

शूद्राणां पुण्यदं नित्यमन्येषां पापनाशनम् । भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥

śūdrāṇāṁ puṇyadaṁ nityamanyeṣāṁ pāpanāśanam bhasmanoddhūlanaṁ caiva tathā tiryak tripuṇḍrakam

शूद्रों के लिए यह सदा पुण्यदायी और अन्य लोगों के लिए पापनाशक है — भस्म का यह लेपन और तिरछा त्रिपुण्ड्र, दोनों ही।

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.13.5)

रक्षार्थं सर्वभूतानां विधत्ते वैदिकी श्रुतिः । भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥

rakṣārthaṁ sarvabhūtānāṁ vidhatte vaidikī śrutiḥ bhasmanoddhūlanaṁ caiva tathā tiryak tripuṇḍrakam

समस्त प्राणियों की रक्षा के लिए वैदिक श्रुति भस्म के लेपन और तिरछे त्रिपुण्ड्र का विधान करती है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.13.6)

यज्ञत्वेनैव सर्वेषां विधत्ते वैदिकी श्रुतिः । भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥

yajñatvenaiva sarveṣāṁ vidhatte vaidikī śrutiḥ bhasmanoddhūlanaṁ caiva tathā tiryak tripuṇḍrakam

सबके लिए यज्ञ के समान फलदायी होने के कारण वैदिक श्रुति भस्म के लेपन और तिरछे त्रिपुण्ड्र का विधान करती है।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.13.7)

सर्वधर्मतया तेषां विधत्ते वैदिकी श्रुतिः । भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥

sarvadharmatayā teṣāṁ vidhatte vaidikī śrutiḥ bhasmanoddhūlanaṁ caiva tathā tiryak tripuṇḍrakam

सम्पूर्ण धर्मों के स्वरूप होने के कारण वैदिक श्रुति उनके लिए भस्म के लेपन और तिरछे त्रिपुण्ड्र का विधान करती है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.13.8)

माहेश्वराणां लिङ्गार्थं विधत्ते वैदिकी श्रुतिः । भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥

māheśvarāṇāṁ liṅgārthaṁ vidhatte vaidikī śrutiḥ bhasmanoddhūlanaṁ caiva tathā tiryak tripuṇḍrakam

माहेश्वरों (शिवभक्तों) के चिह्न-स्वरूप वैदिक श्रुति भस्म के लेपन और तिरछे त्रिपुण्ड्र का विधान करती है।

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.13.9)

विज्ञानार्थं च सर्वेषां विधत्ते वैदिकी श्रुतिः । शिवेन विष्णुना चैव ब्रह्मणा वज्रिणा तथा ॥

vijñānārthaṁ ca sarveṣāṁ vidhatte vaidikī śrutiḥ śivena viṣṇunā caiva brahmaṇā vajriṇā tathā

और सबके लिए सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति हेतु वैदिक श्रुति इसका विधान करती है — यह भस्म शिव ने, विष्णु ने, ब्रह्मा ने और वज्रधारी इन्द्र ने भी धारण की,

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.13.10)

हिरण्यगर्भेण तदवतारैर्वरुणादिभिः । देवताभिर्धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मकम् ॥

hiraṇyagarbheṇa tadavatārairvaruṇādibhiḥ devatābhirdhṛtaṁ bhasma tripuṇḍroddhūlanātmakam

हिरण्यगर्भ ने, उनके अवतारों ने और वरुण आदि देवताओं ने — इस प्रकार त्रिपुण्ड्र-लेपन के रूप में समस्त देवताओं ने भस्म धारण की।

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.13.11)

उमादेव्या च लक्ष्या च वाचा चान्याभिरास्तिकैः । सर्वस्त्रीभिर्धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मना ॥

umādevyā ca lakṣyā ca vācā cānyābhirāstikaiḥ sarvastrībhirdhṛtaṁ bhasma tripuṇḍroddhūlanātmanā

उमादेवी ने, लक्ष्मी ने, वाणी (सरस्वती) ने और अन्य आस्तिक स्त्रियों ने — इस प्रकार समस्त स्त्रियों ने त्रिपुण्ड्र-लेपन के रूप में भस्म धारण की है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.13.12)

यक्षराक्षसगन्धर्वसिद्धविद्याधरादिभिः । मुनिभिश्च धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मना ॥

yakṣarākṣasagandharvasiddhavidyādharādibhiḥ munibhiśca dhṛtaṁ bhasma tripuṇḍroddhūlanātmanā

यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि ने और मुनियों ने भी त्रिपुण्ड्र-लेपन के रूप में भस्म धारण की है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.13.13)

ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रेरपि च सङ्करैः । अपभ्रंशैर्धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मना ॥

brāhmaṇaiḥ kṣatriyairvaiśyaiḥ śūdrerapi ca saṅkaraiḥ apabhraṁśairdhṛtaṁ bhasma tripuṇḍroddhūlanātmanā

ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों तथा वर्णसंकरों और अपभ्रंश जातियों ने भी त्रिपुण्ड्र-लेपन के रूप में भस्म धारण की है।

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.13.14)

उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च यैः समाचरितं मुदा । त एव शिष्टा विद्वांसो नेतरे मुनिपुङ्गव ॥

uddhūlanaṁ tripuṇḍraṁ ca yaiḥ samācaritaṁ mudā ta eva śiṣṭā vidvāṁso netare munipuṅgava

हे मुनिश्रेष्ठ! जिन्होंने प्रसन्नतापूर्वक इस उद्धूलन और त्रिपुण्ड्र का आचरण किया है, वे ही सुसंस्कृत विद्वान हैं, अन्य कोई नहीं।

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.13.15)

शिवलिङ्गं मणिः सख्यं मन्त्रः पञ्चाक्षरस्तथा । विभूतिरौषधं पुंसां मुक्तिस्त्रीवश्यकर्मणि ॥

śivaliṅgaṁ maṇiḥ sakhyaṁ mantraḥ pañcākṣarastathā vibhūtirauṣadhaṁ puṁsāṁ muktistrīvaśyakarmaṇi

शिवलिंग, मणि, मित्रता, पंचाक्षर मंत्र और विभूति — ये पुरुषों के लिए ऐसी औषधि हैं जो मुक्ति और आकर्षण-सामर्थ्य दोनों प्रदान करती हैं।

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.13.16)

भुनक्ति यत्र भस्माङ्गो मूर्खो वा पण्डितोऽपि वा । तत्र भुङ्क्ते महादेवः सपत्नीको वृषध्वजः ॥

bhunakti yatra bhasmāṅgo mūrkho vā paṇḍito'pi vā tatra bhuṅkte mahādevaḥ sapatnīko vṛṣadhvajaḥ

जहाँ भस्म-अंकित शरीर वाला कोई पुरुष भोजन करता है — चाहे वह मूर्ख हो या पण्डित — वहाँ वृषभ-ध्वज महादेव अपनी पत्नी सहित भोजन करते हैं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.13.17)

भस्मसञ्छन्नसर्वाङ्गमनुगच्छति यः पुमान् । सर्वपातकयुक्तोऽपि पूजितो मानवोऽचिरात् ॥

bhasmasañchannasarvāṅgamanugacchati yaḥ pumān sarvapātakayukto'pi pūjito mānavo'cirāt

जो पुरुष सम्पूर्ण अंगों में भस्म से आच्छादित किसी व्यक्ति के पीछे-पीछे (आदरपूर्वक) चलता है, वह सब पापों से युक्त होते हुए भी शीघ्र ही पूजनीय हो जाता है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.13.18)

भस्मसञ्छन्नसर्वाङ्गं यः स्तौति श्रद्धया सह । सर्वपातकयुक्तोऽपि पूज्यते मानवोऽचिरात् ॥

bhasmasañchannasarvāṅgaṁ yaḥ stauti śraddhayā saha sarvapātakayukto'pi pūjyate mānavo'cirāt

जो पुरुष श्रद्धापूर्वक सम्पूर्ण अंगों में भस्म-आच्छादित व्यक्ति की स्तुति करता है, वह सब पापों से युक्त होते हुए भी शीघ्र ही पूज्य हो जाता है।

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.13.19)

त्रिपुण्ड्रधारिणे भिक्षाप्रदानेन हि केवलम् । तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् ॥

tripuṇḍradhāriṇe bhikṣāpradānena hi kevalam tenādhītaṁ śrutaṁ tena tena sarvamanuṣṭhitam

त्रिपुण्ड्रधारी को मात्र भिक्षा देने से ही मनुष्य ने वेद पढ़ लिया, शास्त्र सुन लिया और समस्त कर्म कर लिए, ऐसा समझना चाहिए।

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.13.20)

येन विप्रेण शिरसि त्रिपुण्ड्रं भस्मना कृतम् । कीकटेष्वपि देशेषु यत्र भूतिविभूषणः ॥

yena vipreṇa śirasi tripuṇḍraṁ bhasmanā kṛtam kīkaṭeṣvapi deśeṣu yatra bhūtivibhūṣaṇaḥ

जिस ब्राह्मण ने भस्म से अपने मस्तक पर त्रिपुण्ड्र धारण किया है, वह कीकट जैसे निकृष्ट देशों में भी — जहाँ भस्म-विभूषित पुरुष निवास करता है —

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.13.21)

मानवस्तु वसेन्नित्यं काशीक्षेत्रसमं हि तत् । दुःशीलः शीलयुक्तो वा योगयुक्तोऽप्यलक्षणः ॥

mānavastu vasennityaṁ kāśīkṣetrasamaṁ hi tat duḥśīlaḥ śīlayukto vā yogayukto'pyalakṣaṇaḥ

यदि सदा वहाँ निवास करे, तो वह स्थान काशीक्षेत्र के समान हो जाता है — चाहे वह दुःशील हो या सुशील, योगयुक्त हो या लक्षणहीन,

श्लोक 22 (devibhagavatam.11.13.22)

भूतिशासनयुक्तो वा स पूज्यो मम पुत्रवत् । छद्मनापि चरेद्यो हि भूतिशासनमैश्वरम् ॥

bhūtiśāsanayukto vā sa pūjyo mama putravat chadmanāpi caredyo hi bhūtiśāsanamaiśvaram

भूति (भस्म) के अनुशासन से युक्त वह पुरुष मेरे द्वारा अपने पुत्र के समान पूज्य माना जाता है। जो कपटपूर्वक भी ऐश्वर्यमय भूति-अनुशासन का आचरण करता है,

श्लोक 23 (devibhagavatam.11.13.23)

सोऽपि यां गतिमाप्नोति न तां यज्ञशतैरपि । सम्पर्काल्लीलया वापि भयाद्वा धारयेत्तु यः ॥

so'pi yāṁ gatimāpnoti na tāṁ yajñaśatairapi samparkāllīlayā vāpi bhayādvā dhārayettu yaḥ

वह भी उस गति को प्राप्त करता है जो सैकड़ों यज्ञों से भी प्राप्त नहीं होती। और जो भी संसर्गवश, क्रीड़ावश अथवा भयवश इसे धारण करता है,

श्लोक 24 (devibhagavatam.11.13.24)

विधियुक्तो विभूतिं तु स च पूज्यो यथा ह्यहम् । शिवस्य विष्णोर्देवानां ब्रह्मणस्तृप्तिकारणम् ॥

vidhiyukto vibhūtiṁ tu sa ca pūjyo yathā hyaham śivasya viṣṇordevānāṁ brahmaṇastṛptikāraṇam

तथा जो विधिपूर्वक विभूति धारण करता है, वह भी मेरे समान ही पूज्य है। यह शिव, विष्णु, देवताओं और ब्रह्मा की तृप्ति का कारण है,

श्लोक 25 (devibhagavatam.11.13.25)

पार्वत्याश्च महालक्ष्या भारत्यास्तृप्तिकारणम् । न दानेन न यज्ञेन न तपोभिः सुदुर्लभैः ॥

pārvatyāśca mahālakṣyā bhāratyāstṛptikāraṇam na dānena na yajñena na tapobhiḥ sudurlabhaiḥ

तथा पार्वती, महालक्ष्मी और भारती (सरस्वती) की भी तृप्ति का कारण है। जो पुण्य त्रिपुण्ड्र से प्राप्त होता है, वह न दान से, न यज्ञ से, न अत्यन्त दुर्लभ तपों से भी प्राप्त होता है —

श्लोक 26 (devibhagavatam.11.13.26)

न तीर्थयात्रया पुण्यं त्रिपुण्ड्रेण च लभ्यते । दानं यज्ञाश्च धर्माश्च तीर्थयात्राश्च नारद ॥

na tīrthayātrayā puṇyaṁ tripuṇḍreṇa ca labhyate dānaṁ yajñāśca dharmāśca tīrthayātrāśca nārada

न ही तीर्थयात्रा से वह पुण्य प्राप्त होता है, जो त्रिपुण्ड्र से प्राप्त होता है। हे नारद! दान, यज्ञ, धर्माचरण और तीर्थयात्राएँ —

श्लोक 27 (devibhagavatam.11.13.27)

ध्यानं तपस्त्रिपुण्ड्रस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् । यथा राजा स्वचिह्नाङ्कं स्वजनं मन्यते सदा ॥

dhyānaṁ tapastripuṇḍrasya kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm yathā rājā svacihnāṅkaṁ svajanaṁ manyate sadā

ध्यान और तप — ये सब त्रिपुण्ड्र के सोलहवें अंश की भी बराबरी नहीं कर सकते। जैसे राजा सदा अपने चिह्न से अंकित व्यक्ति को अपना ही मानता है,

श्लोक 28 (devibhagavatam.11.13.28)

तथा शिवस्त्रिपुण्ड्राङ्कं स्वकीयमिव मन्यते । द्विजातिर्वान्यजातिर्वा शुद्धचित्तेन भस्मना ॥

tathā śivastripuṇḍrāṅkaṁ svakīyamiva manyate dvijātirvānyajātirvā śuddhacittena bhasmanā

वैसे ही शिव त्रिपुण्ड्र से अंकित व्यक्ति को अपना ही मानते हैं। द्विज हो या अन्य जाति का, जो शुद्ध चित्त से भस्म द्वारा

श्लोक 29 (devibhagavatam.11.13.29)

धारयेद्यस्त्रिपुण्ड्राङ्कं रुद्रस्तेन वशीकृतः । त्यक्तसर्वाश्रमाचारो लुप्तसर्वक्रियोऽपि सः ॥

dhārayedyastripuṇḍrāṅkaṁ rudrastena vaśīkṛtaḥ tyaktasarvāśramācāro luptasarvakriyo'pi saḥ

त्रिपुण्ड्र का चिह्न धारण करता है, उसके द्वारा रुद्र वश में कर लिए जाते हैं। जिसने समस्त आश्रमाचार त्याग दिए हों और समस्त कर्म लुप्त हो गए हों, वह भी —

श्लोक 30 (devibhagavatam.11.13.30)

सकृत्तिर्यक्त्रिपुण्ड्राङ्कं धारयेत्सोऽपि मुच्यते । नास्य ज्ञानं परीक्षेत न कुलं न व्रतं तथा ॥

sakṛttiryaktripuṇḍrāṅkaṁ dhārayetso'pi mucyate nāsya jñānaṁ parīkṣeta na kulaṁ na vrataṁ tathā

यदि एक बार भी तिरछे त्रिपुण्ड्र का चिह्न धारण करे, तो वह भी मुक्त हो जाता है। ऐसे व्यक्ति का न ज्ञान परखना चाहिए, न कुल, न ही व्रत।

श्लोक 31 (devibhagavatam.11.13.31)

त्रिपुण्ड्राङ्कितभालेन पूज्य एव हि नारद । शिवमन्त्रात्परो मन्त्रो नास्ति तुल्यं शिवात्परम् ॥

tripuṇḍrāṅkitabhālena pūjya eva hi nārada śivamantrātparo mantro nāsti tulyaṁ śivātparam

हे नारद! त्रिपुण्ड्र से अंकित मस्तक वाला पुरुष निश्चय ही पूज्य है। शिव-मंत्र से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है, शिव से बढ़कर या उनके तुल्य कुछ भी नहीं है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.11.13.32)

शिवार्चनात्परं पुण्यं न हि तीर्थं च भस्मना । रुद्राग्नेर्यत्परं तीर्थं तद्भस्म परिकीर्तितम् ॥

śivārcanātparaṁ puṇyaṁ na hi tīrthaṁ ca bhasmanā rudrāgneryatparaṁ tīrthaṁ tadbhasma parikīrtitam

शिव-पूजन से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है, और भस्म से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है। रुद्र की अग्नि से जो श्रेष्ठ तीर्थ उत्पन्न हुआ, वही भस्म कहलाया।

श्लोक 33 (devibhagavatam.11.13.33)

ध्वंसनं सर्वदुःखानां सर्वपापविशोधनम् । अन्त्यजो वाधमो वापि मूर्खो वा पण्डितोऽपि वा ॥

dhvaṁsanaṁ sarvaduḥkhānāṁ sarvapāpaviśodhanam antyajo vādhamo vāpi mūrkho vā paṇḍito'pi vā

यह समस्त दुःखों का नाशक और समस्त पापों का शोधक है — चाहे कोई अन्त्यज हो या अधम, मूर्ख हो या पण्डित,

श्लोक 34 (devibhagavatam.11.13.34)

यस्मिन्देशे वसेन्नित्यं भूतिशासनसंयुतः । तस्मिन्सदाशिवः सोमः सर्वभूतगणैर्वृतः । सर्वतीर्थेश्च संयुक्तः सान्निध्यं कुरुते सदा ॥

yasmindeśe vasennityaṁ bhūtiśāsanasaṁyutaḥ tasminsadāśivaḥ somaḥ sarvabhūtagaṇairvṛtaḥ sarvatīrtheśca saṁyuktaḥ sānnidhyaṁ kurute sadā

जिस देश में भूति-अनुशासन से युक्त पुरुष सदा निवास करता है, उस देश में सदाशिव, उमा-सहित, समस्त भूतगणों से घिरे हुए तथा समस्त तीर्थों से युक्त होकर सदा अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं।

श्लोक 35 (devibhagavatam.11.13.35)

एतानि पञ्चशिवमन्त्रपवित्रितानि भस्मानि कामदहनाङ्गविभूषितानि । त्रैपुण्ड्रकाणि रचितानि ललाटपट्टे लुम्पन्ति दैवलिखितानि दुरक्षराणि ॥

etāni pañcaśivamantrapavitritāni bhasmāni kāmadahanāṅgavibhūṣitāni traipuṇḍrakāṇi racitāni lalāṭapaṭṭe lumpanti daivalikhitāni durakṣarāṇi

पाँच शिव-मंत्रों से पवित्र की गई तथा काम को भस्म करने वाले शिव के अंगों को विभूषित करने वाली ये भस्म — जब ललाट-पट्ट पर त्रिपुण्ड्र के रूप में सजाई जाती हैं, तब विधाता द्वारा लिखे हुए दुरक्षरों (अशुभ भाग्य) को मिटा देती हैं।

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