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एकादश स्कन्ध · अध्याय 14

विभूतिधारण-माहात्म्य

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.14.1)

श्रीनारायण उवाच । भस्मदिग्धशरीराय यो ददाति धनं मुदा । तस्य सर्वाणि पापानि विनश्यन्ति न संशयः ॥

śrīnārāyaṇa uvāca bhasmadigdhaśarīrāya yo dadāti dhanaṁ mudā tasya sarvāṇi pāpāni vinaśyanti na saṁśayaḥ

श्री नारायण ने कहा — जो व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक भस्म से लिप्त शरीर वाले को धन देता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.14.2)

श्रुतयः स्मृतयः सर्वाः पुराणान्यखिलान्यपि । वदन्ति भूतिमाहाम्यं तत्तस्माद्धारयेद्द्विजः ॥

śrutayaḥ smṛtayaḥ sarvāḥ purāṇānyakhilānyapi vadanti bhūtimāhāmyaṁ tattasmāddhārayeddvijaḥ

समस्त श्रुतियाँ, स्मृतियाँ और सभी पुराण भूति (भस्म) की महिमा का वर्णन करते हैं; अतः द्विज को उसे धारण करना चाहिए।

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.14.3)

सितेन भस्मना कुर्यात्त्रिसन्ध्यं यस्त्रिपुण्ड्रकम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥

sitena bhasmanā kuryāttrisandhyaṁ yastripuṇḍrakam sarvapāpavinirmuktaḥ śivaloke mahīyate

जो त्रिकाल संध्या में श्वेत भस्म से त्रिपुण्ड्र करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.14.4)

योगी सर्वाङ्गकं स्तानमापादतलमस्तकम् । त्रिसन्ध्यमाचरेन्नित्यमाशु योगमवाप्नुयात् ॥

yogī sarvāṅgakaṁ stānamāpādatalamastakam trisandhyamācarennityamāśu yogamavāpnuyāt

जो योगी पैरों के तलवे से मस्तक तक सम्पूर्ण अंगों पर त्रिकाल संध्या में नित्य भस्म-स्नान करता है, वह शीघ्र ही योग को प्राप्त करता है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.14.5)

भस्मस्नानेन पुरुषः कुलस्योद्धारको भवेत् । भस्मस्नानं जलस्नानादसङ्ख्येयगुणान्वितम् ॥

bhasmasnānena puruṣaḥ kulasyoddhārako bhavet bhasmasnānaṁ jalasnānādasaṅkhyeyaguṇānvitam

भस्म-स्नान से पुरुष अपने कुल का उद्धारक बनता है; भस्म-स्नान जल-स्नान से असंख्य गुना अधिक फलदायी है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.14.6)

सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम् । तत्फलं लभते सर्वं भस्मस्नानान्न संशयः ॥

sarvatīrtheṣu yatpuṇyaṁ sarvatīrtheṣu yatphalam tatphalaṁ labhate sarvaṁ bhasmasnānānna saṁśayaḥ

समस्त तीर्थों में जो पुण्य है, समस्त तीर्थों में जो फल है, वह समस्त फल भस्म-स्नान से प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.14.7)

महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । भस्मस्नानेन तत्सर्वं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥

mahāpātakayukto vā yukto vāpyupapātakaiḥ bhasmasnānena tatsarvaṁ dahatyagnirivendhanam

महापातकों से युक्त हो या उपपातकों से युक्त, भस्म-स्नान उन सबको उसी प्रकार भस्म कर देता है जैसे अग्नि ईंधन को।

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.14.8)

भस्मस्नानात्परं स्नानं पवित्रं नैव विद्यते । एवमुक्तं शिवेनादौ तदा स्नातः स्वयं शिवः ॥

bhasmasnānātparaṁ snānaṁ pavitraṁ naiva vidyate evamuktaṁ śivenādau tadā snātaḥ svayaṁ śivaḥ

भस्म-स्नान से बढ़कर कोई पवित्र स्नान नहीं है। यह बात स्वयं शिव ने आरम्भ में कही थी, जब उन्होंने स्वयं भस्म से स्नान किया था।

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.14.9)

तदाप्रभृति ब्रह्माद्या मुनयश्च शिवार्थिनः । सर्वकर्मसु यत्नेन भस्मस्नानं प्रचक्रिरे ॥

tadāprabhṛti brahmādyā munayaśca śivārthinaḥ sarvakarmasu yatnena bhasmasnānaṁ pracakrire

उसी समय से ब्रह्मा आदि और शिवभक्त मुनियों ने सभी कर्मों में यत्नपूर्वक भस्म-स्नान करना आरम्भ किया।

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.14.10)

तस्मादेतच्छिरःस्नानमाग्नेयं यः समाचरेत् । अनेनैव शरीरेण स हि रुद्रो न संशयः ॥

tasmādetacchiraḥsnānamāgneyaṁ yaḥ samācaret anenaiva śarīreṇa sa hi rudro na saṁśayaḥ

अतः जो कोई इस अग्नि-सम्बन्धी शिरःस्नान का आचरण करता है, वह इसी शरीर से रुद्र ही बन जाता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.14.11)

ये भस्मधारिणं दृष्ट्वा परितृप्ता भवन्ति ते । देवासुरमुनीन्द्रैश्च पूज्या नित्यं न संशयः ॥

ye bhasmadhāriṇaṁ dṛṣṭvā paritṛptā bhavanti te devāsuramunīndraiśca pūjyā nityaṁ na saṁśayaḥ

जो भस्मधारी को देखकर परितृप्त होते हैं, वे देवों, असुरों और मुनीन्द्रों द्वारा सदा पूज्य होते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.14.12)

भस्मसञ्छन्नसर्वाङ्गं दृष्ट्वोत्तिष्ठति यः पुमान् । तं दृष्ट्वा देवराजोऽपि दण्डवत्प्रणमिष्यति ॥

bhasmasañchannasarvāṅgaṁ dṛṣṭvottiṣṭhati yaḥ pumān taṁ dṛṣṭvā devarājo'pi daṇḍavatpraṇamiṣyati

सम्पूर्ण अंगों में भस्म से आच्छादित व्यक्ति को देखकर जो पुरुष खड़ा हो जाता है, उसे देखकर देवराज इन्द्र भी दण्ड के समान प्रणाम करेंगे।

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.14.13)

अभक्ष्यभक्षणं येषां भस्मधारणपूर्वकम् । तेषां तद्भक्ष्यमेव स्यान्मुने नात्र विचारणा ॥

abhakṣyabhakṣaṇaṁ yeṣāṁ bhasmadhāraṇapūrvakam teṣāṁ tadbhakṣyameva syānmune nātra vicāraṇā

जिनके द्वारा भस्म धारण करने के पश्चात् अभक्ष्य भोजन भी किया जाता है, हे मुने! उनके लिए वह भक्ष्य ही हो जाता है, इसमें कोई विचार नहीं।

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.14.14)

यः स्नाति भस्मना नित्यं जले स्नात्वा ततः परम् । ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽऽथवादरात् ॥

yaḥ snāti bhasmanā nityaṁ jale snātvā tataḥ param brahmacārī gṛhastho vā vānaprastho''thavādarāt

जो ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ जल में स्नान करने के पश्चात् श्रद्धापूर्वक नित्य भस्म से स्नान करता है,

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.14.15)

सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् । आग्नेयं भस्मना स्नानं यतीनां च विशिष्यते ॥

sarvapāpavinirmuktaḥ sa yāti paramāṁ gatim āgneyaṁ bhasmanā snānaṁ yatīnāṁ ca viśiṣyate

वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है। भस्म से किया गया अग्नि-स्नान विशेष रूप से यतियों के लिए विहित है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.14.16)

आर्द्रस्नानाद्वरं भस्मस्नानमार्द्रवधो ध्रुवः । आर्द्रं तु प्रकृतिं विद्यात्प्रकृतिं बन्धनं विदुः ॥

ārdrasnānādvaraṁ bhasmasnānamārdravadho dhruvaḥ ārdraṁ tu prakṛtiṁ vidyātprakṛtiṁ bandhanaṁ viduḥ

गीले जल-स्नान से भस्म-स्नान श्रेष्ठ है, क्योंकि गीले स्नान में जीवों की हिंसा निश्चित होती है। गीलेपन को प्रकृति जानना चाहिए, और प्रकृति को ज्ञानी बन्धन कहते हैं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.14.17)

प्रकृतेस्तु प्रहाणाय भस्मना स्नानमिष्यते । भस्मना सदृशं ब्रह्यन्नास्ति लोकत्रयेष्वपि ॥

prakṛtestu prahāṇāya bhasmanā snānamiṣyate bhasmanā sadṛśaṁ brahyannāsti lokatrayeṣvapi

प्रकृति के नाश के लिए भस्म से स्नान वांछित है। हे ब्रह्मन्! भस्म के समान तीनों लोकों में भी कुछ नहीं है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.14.18)

रक्षार्थं मङ्गलार्थं च पवित्रार्थं पुरा सुरैः । भस्म दृष्ट्वा मुने पूर्वं दत्तं देव्यै प्रियेण तु ॥

rakṣārthaṁ maṅgalārthaṁ ca pavitrārthaṁ purā suraiḥ bhasma dṛṣṭvā mune pūrvaṁ dattaṁ devyai priyeṇa tu

हे मुने! रक्षा के लिए, मंगल के लिए और पवित्रता के लिए, प्राचीन काल में देवताओं ने भस्म को देखकर प्रेमपूर्वक पहले देवी को अर्पित किया था।

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.14.19)

तस्मादेतच्छिरःस्नानमाग्नेयं यः समाचरेत् । भवपाशैर्विनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥

tasmādetacchiraḥsnānamāgneyaṁ yaḥ samācaret bhavapāśairvinirmuktaḥ śivaloke mahīyate

अतः जो कोई इस अग्नि-सम्बन्धी शिरःस्नान का आचरण करता है, वह भव के पाशों से मुक्त होकर शिवलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.14.20)

ज्वररक्षःपिशाचाश्च पूतनाकुष्ठगुल्मकाः । भगन्दराणि सर्वाणि चाशीतिर्वातरोगकाः ॥

jvararakṣaḥpiśācāśca pūtanākuṣṭhagulmakāḥ bhagandarāṇi sarvāṇi cāśītirvātarogakāḥ

ज्वर, राक्षस, पिशाच, पूतना, कुष्ठ, गुल्म, समस्त भगन्दर तथा अस्सी प्रकार के वातरोग,

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.14.21)

चतुःषष्टिः पित्तरोगाः श्लेष्मा सप्तत्रिपञ्चकाः । व्याघ्रचौरभयं चैवाप्यन्ये दुष्टग्रहा अपि ॥

catuḥṣaṣṭiḥ pittarogāḥ śleṣmā saptatripañcakāḥ vyāghracaurabhayaṁ caivāpyanye duṣṭagrahā api

चौंसठ पित्तरोग, इक्कीस कफरोग, बाघ और चोर का भय, तथा अन्य दुष्ट ग्रहों की पीड़ा भी —

श्लोक 22 (devibhagavatam.11.14.22)

भस्मस्नानेन नश्यन्ति सिंहेनैव यथा गजाः । शुद्धशीतजलेनैव भस्मना च त्रिपुण्ड्रकम् ॥

bhasmasnānena naśyanti siṁhenaiva yathā gajāḥ śuddhaśītajalenaiva bhasmanā ca tripuṇḍrakam

ये सब भस्म-स्नान से उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे सिंह से हाथी। शुद्ध शीतल जल से और भस्म से त्रिपुण्ड्र —

श्लोक 23 (devibhagavatam.11.14.23)

यो धारयेत्परं ब्रह्म स प्राप्नोति न संशयः । (भस्मना च त्रिपुण्ड्रं च यः कोऽपि धारयेत्परम् । स ब्रह्मलोकमाप्नोति मुक्तपापो न संशयः ॥) यथाविधि ललाटे वै वह्निवीर्यप्रधारणात् ॥

yo dhārayetparaṁ brahma sa prāpnoti na saṁśayaḥ (bhasmanā ca tripuṇḍraṁ ca yaḥ ko'pi dhārayetparam sa brahmalokamāpnoti muktapāpo na saṁśayaḥ ) yathāvidhi lalāṭe vai vahnivīryapradhāraṇāt

जो धारण करता है, वह परब्रह्म को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं। (और जो भी भस्म तथा त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह पापमुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं।) विधिपूर्वक ललाट पर अग्नि-तेज को धारण करने से,

श्लोक 24 (devibhagavatam.11.14.24)

नाशयेल्लिखितां यामीं ललाटस्थां लिपिं ध्रुवम् । कण्ठोपरिकृतं पापं नाशयेत्तत्प्रधारणात् ॥

nāśayellikhitāṁ yāmīṁ lalāṭasthāṁ lipiṁ dhruvam kaṇṭhoparikṛtaṁ pāpaṁ nāśayettatpradhāraṇāt

ललाट पर लिखी हुई यम की लिपि निश्चय ही नष्ट हो जाती है। कण्ठ के ऊपर धारण करने से कण्ठ-सम्बन्धी किए गए पाप नष्ट होते हैं,

श्लोक 25 (devibhagavatam.11.14.25)

कण्ठे च धारणात्कण्ठभोगादिकृतपातकम् । बाह्वोर्बाहुकृतं पापं वक्षसा मनसा कृतम् ॥

kaṇṭhe ca dhāraṇātkaṇṭhabhogādikṛtapātakam bāhvorbāhukṛtaṁ pāpaṁ vakṣasā manasā kṛtam

और कण्ठ पर धारण करने से कण्ठ-भोग आदि से किए गए पाप नष्ट होते हैं; भुजाओं पर धारण करने से भुजाओं से किए गए पाप, और वक्षस्थल पर मन से किए गए पाप —

श्लोक 26 (devibhagavatam.11.14.26)

नाभ्यां शिश्नकृतं पापं गुदे गुदकृतं हरेत् । पार्श्वयोर्धारणाद्ब्रह्मन् परस्त्र्यालिङ्गनादिकम् ॥

nābhyāṁ śiśnakṛtaṁ pāpaṁ gude gudakṛtaṁ haret pārśvayordhāraṇādbrahman parastryāliṅganādikam

नाभि पर धारण करने से जननेन्द्रिय से किए गए पाप, गुदा पर गुदा से किए गए पाप दूर होते हैं; हे ब्रह्मन्! दोनों पार्श्वों पर धारण करने से परस्त्री-आलिंगन आदि पाप —

श्लोक 27 (devibhagavatam.11.14.27)

तद्भस्मधारणं शस्तं सर्वत्रैव त्रिलिङ्गकम् । ब्रह्मविष्णुमहेशानां त्रय्यग्नीनां च धारणम् ॥

tadbhasmadhāraṇaṁ śastaṁ sarvatraiva triliṅgakam brahmaviṣṇumaheśānāṁ trayyagnīnāṁ ca dhāraṇam

वह भस्म-धारण, त्रिपुण्ड्र के रूप में सर्वत्र प्रशंसित, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तथा तीनों अग्नियों के प्रतीक-धारण के रूप में माना जाता है,

श्लोक 28 (devibhagavatam.11.14.28)

गुणलोकत्रयाणां च धारणं तेन वै कृतम् । भस्मच्छन्नो द्विजो विद्वान्महापातकसम्भवैः ॥

guṇalokatrayāṇāṁ ca dhāraṇaṁ tena vai kṛtam bhasmacchanno dvijo vidvānmahāpātakasambhavaiḥ

और उसी से तीनों गुणों तथा तीनों लोकों का भी प्रतीक-धारण किया जाता है। जो विद्वान द्विज भस्म से आच्छादित है, वह महापातकों से उत्पन्न दोषों से —

श्लोक 29 (devibhagavatam.11.14.29)

दोषैर्वियुज्यते सद्यो मुच्यते च न संशयः । भस्मनिष्ठस्य दह्यन्ते दोषा भस्माग्निसङ्गमात् ॥

doṣairviyujyate sadyo mucyate ca na saṁśayaḥ bhasmaniṣṭhasya dahyante doṣā bhasmāgnisaṅgamāt

तत्काल पृथक् हो जाता है और मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं। भस्मनिष्ठ व्यक्ति के दोष भस्म की अग्नि के संसर्ग से भस्म हो जाते हैं।

श्लोक 30 (devibhagavatam.11.14.30)

भस्मस्नानविशुद्धात्मा आत्मनिष्ठ इति स्मृतः । भस्मना दिग्धसर्वाङ्गो भस्मदीप्तत्रिपुण्ड्रकः ॥

bhasmasnānaviśuddhātmā ātmaniṣṭha iti smṛtaḥ bhasmanā digdhasarvāṅgo bhasmadīptatripuṇḍrakaḥ

भस्म-स्नान से विशुद्ध आत्मा वाला व्यक्ति 'आत्मनिष्ठ' कहलाता है। जिसका सम्पूर्ण शरीर भस्म से लिप्त है, जिसका त्रिपुण्ड्र भस्म से दीप्त है,

श्लोक 31 (devibhagavatam.11.14.31)

भस्मशायी च पुरुषो भस्मनिष्ठ इति स्मृतः । भूतप्रेतपिशाचाद्या रोगाश्चातीव दुःसहाः ॥

bhasmaśāyī ca puruṣo bhasmaniṣṭha iti smṛtaḥ bhūtapretapiśācādyā rogāścātīva duḥsahāḥ

और जो भस्म पर शयन करता है, वह पुरुष 'भस्मनिष्ठ' कहलाता है। भूत, प्रेत, पिशाच आदि तथा अत्यंत असह्य रोग —

श्लोक 32 (devibhagavatam.11.14.32)

भस्मनिष्ठस्य सान्निध्याद्विद्रवन्ति न संशयः । भासनाद्भसितं प्रोक्तं भस्म कल्मषभक्षणात् ॥

bhasmaniṣṭhasya sānnidhyādvidravanti na saṁśayaḥ bhāsanādbhasitaṁ proktaṁ bhasma kalmaṣabhakṣaṇāt

भस्मनिष्ठ व्यक्ति की समीपता से भाग जाते हैं, इसमें संशय नहीं। भासन (चमकने) के कारण इसे 'भसित' कहा गया है, और पाप को भक्षण करने के कारण 'भस्म'।

श्लोक 33 (devibhagavatam.11.14.33)

भूतिर्भूतिकरी पुंसां रक्षा रक्षाकरी पुरा । त्रिपुण्ड्रधारिणं दृष्ट्वा भूतप्रेतपुरःसराः ॥

bhūtirbhūtikarī puṁsāṁ rakṣā rakṣākarī purā tripuṇḍradhāriṇaṁ dṛṣṭvā bhūtapretapuraḥsarāḥ

भूति (विभूति) पुरुषों के लिए ऐश्वर्य देने वाली है, और रक्षा प्राचीन काल से रक्षा करने वाली रही है। त्रिपुण्ड्रधारी को देखकर भूत-प्रेत आदि,

श्लोक 34 (devibhagavatam.11.14.34)

भीताः प्रकम्पिताः शीघ्रं नश्यन्त्येव न संशयः । स्मरणादेव रुद्रस्य यथा पापं प्रणश्यति ॥

bhītāḥ prakampitāḥ śīghraṁ naśyantyeva na saṁśayaḥ smaraṇādeva rudrasya yathā pāpaṁ praṇaśyati

भयभीत होकर काँपते हुए शीघ्र ही भाग जाते हैं, इसमें संशय नहीं — जैसे रुद्र के स्मरण मात्र से पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 35 (devibhagavatam.11.14.35)

अप्यकार्यसहस्राणि कृत्वा यः स्नाति भस्मना । तत्सर्वं दहते भस्म यथाग्निस्तेजसा वनम् ॥

apyakāryasahasrāṇi kṛtvā yaḥ snāti bhasmanā tatsarvaṁ dahate bhasma yathāgnistejasā vanam

जो व्यक्ति हजारों अकार्य करने के बाद भी भस्म से स्नान करता है, वह भस्म उन सबको उसी प्रकार भस्म कर देती है जैसे अग्नि अपने तेज से वन को।

श्लोक 36 (devibhagavatam.11.14.36)

कृत्वापि चातुलं पापं मृत्युकालेऽपि यो द्विजः । भस्मस्नायी भवेत्कश्चित्क्षिप्रं पापैः प्रमुच्यते ॥

kṛtvāpi cātulaṁ pāpaṁ mṛtyukāle'pi yo dvijaḥ bhasmasnāyī bhavetkaścitkṣipraṁ pāpaiḥ pramucyate

अतुलनीय पाप करने वाला द्विज भी यदि मृत्यु के समय भस्म से स्नान कर ले, तो वह शीघ्र ही पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 37 (devibhagavatam.11.14.37)

भस्मस्नानाद्धि शुद्धात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः । मत्समीपं समागम्य न स भूयोऽभिवर्तते ॥

bhasmasnānāddhi śuddhātmā jitakrodho jitendriyaḥ matsamīpaṁ samāgamya na sa bhūyo'bhivartate

भस्म-स्नान से विशुद्ध आत्मा वाला, क्रोध और इन्द्रियों को जीतने वाला व्यक्ति मेरे समीप आकर पुनः संसार में नहीं लौटता।

श्लोक 38 (devibhagavatam.11.14.38)

वनस्पतिगते सोमे भस्मोद्धूलितविग्रहः । अर्चितं शङ्करं दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

vanaspatigate some bhasmoddhūlitavigrahaḥ arcitaṁ śaṅkaraṁ dṛṣṭvā sarvapāpaiḥ pramucyate

वनस्पति-सहित सोम (चन्द्र-योग) के समय, भस्म से लिप्त शरीर वाला व्यक्ति पूजित शंकर को देखकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.11.14.39)

आयुष्कामोऽथवा विद्वान्भूतिकामोऽथवा नरः । नित्यं वै धारयेद्भस्म मोक्षकामी च वै द्विजः ॥

āyuṣkāmo'thavā vidvānbhūtikāmo'thavā naraḥ nityaṁ vai dhārayedbhasma mokṣakāmī ca vai dvijaḥ

आयु की कामना करने वाला, अथवा विद्वान ऐश्वर्य की कामना करने वाला मनुष्य, अथवा मोक्ष की कामना करने वाला द्विज — सभी को नित्य भस्म धारण करनी चाहिए।

श्लोक 40 (devibhagavatam.11.14.40)

त्रिपुण्ड्रं परमं पुण्यं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । ये घोरा राक्षसाः प्रेता ये चान्ये क्षुद्रजन्तवः ॥

tripuṇḍraṁ paramaṁ puṇyaṁ brahmaviṣṇuśivātmakam ye ghorā rākṣasāḥ pretā ye cānye kṣudrajantavaḥ

त्रिपुण्ड्र परम पुण्यदायी है, यह ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्वरूप है। जो भी भयंकर राक्षस, प्रेत तथा अन्य क्षुद्र जन्तु हैं,

श्लोक 41 (devibhagavatam.11.14.41)

त्रिपुण्ड्रधारणं दृष्ट्वा पलायन्ते न संशयः । कृत्वा शौचादिकं कर्म स्नात्वा तु विमले जले ॥

tripuṇḍradhāraṇaṁ dṛṣṭvā palāyante na saṁśayaḥ kṛtvā śaucādikaṁ karma snātvā tu vimale jale

त्रिपुण्ड्र-धारण को देखकर वे भाग जाते हैं, इसमें संशय नहीं। शौच आदि कर्म करके तथा निर्मल जल में स्नान करके,

श्लोक 42 (devibhagavatam.11.14.42)

भस्मनोद्धूलनं कार्यमापादतलमस्तकम् । केवलं वारुणं स्नानं देहे बाह्यमलापहम् ॥

bhasmanoddhūlanaṁ kāryamāpādatalamastakam kevalaṁ vāruṇaṁ snānaṁ dehe bāhyamalāpaham

पैरों के तलवे से मस्तक तक भस्म का लेपन करना चाहिए। केवल जल-स्नान शरीर की केवल बाह्य मलिनता को दूर करता है;

श्लोक 43 (devibhagavatam.11.14.43)

विभूतिस्तानमनघं बाह्यान्तरमलापहम् । त्यक्त्वापि वारुणं स्नानं तत्परः स्यान्न संशयः ॥

vibhūtistānamanaghaṁ bāhyāntaramalāpaham tyaktvāpi vāruṇaṁ snānaṁ tatparaḥ syānna saṁśayaḥ

निष्पाप विभूति-स्नान बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार की मलिनता को दूर करता है। जल-स्नान त्यागकर भी इसी में तत्पर रहना चाहिए, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 44 (devibhagavatam.11.14.44)

कृतमप्यकृतं सत्यं भस्मस्नानं विना मुने । भस्मस्नानं श्रुतिप्रोक्तमाग्नेयं स्नानमुच्यते ॥

kṛtamapyakṛtaṁ satyaṁ bhasmasnānaṁ vinā mune bhasmasnānaṁ śrutiproktamāgneyaṁ snānamucyate

हे मुने! भस्म-स्नान के बिना किया गया कर्म भी सत्य में अकिया हुआ ही है। भस्म-स्नान श्रुति में कहा गया है और इसे 'आग्नेय स्नान' कहा जाता है।

श्लोक 45 (devibhagavatam.11.14.45)

अन्तर्बहिश्च संशुद्धं शिवपूजाफलं लभेत् । यद्बाह्यमलमात्रस्य नाशकं स्तानमस्ति तत् ॥

antarbahiśca saṁśuddhaṁ śivapūjāphalaṁ labhet yadbāhyamalamātrasya nāśakaṁ stānamasti tat

जो भीतर और बाहर से पूर्ण शुद्ध होता है, वही शिव-पूजा का फल प्राप्त करता है। जो स्नान केवल बाह्य मलिनता का ही नाशक है,

श्लोक 46 (devibhagavatam.11.14.46)

तन्नाशयति तीव्रेण प्राणिबाह्यान्तरं मलम् । कृत्वापि कोटिशो नित्यं वारुणं स्नानमादरात् ॥

tannāśayati tīvreṇa prāṇibāhyāntaraṁ malam kṛtvāpi koṭiśo nityaṁ vāruṇaṁ snānamādarāt

वह भस्म-स्नान तीव्रता से प्राणी की बाह्य और आंतरिक मलिनता को नष्ट करता है। यद्यपि करोड़ों बार भी श्रद्धापूर्वक जल-स्नान किया जाए,

श्लोक 47 (devibhagavatam.11.14.47)

न भवत्येव पूतात्मा भस्मस्नानं विना मुने । यद्भस्मस्नानमाहाम्यं तद्वेदो वेद तत्त्वतः ॥

na bhavatyeva pūtātmā bhasmasnānaṁ vinā mune yadbhasmasnānamāhāmyaṁ tadvedo veda tattvataḥ

फिर भी हे मुने! भस्म-स्नान के बिना आत्मा पवित्र नहीं होती। भस्म-स्नान की जो महिमा है, उसे वेद ही तत्त्वतः जानते हैं,

श्लोक 48 (devibhagavatam.11.14.48)

यद्वा वेद महादेवः सर्वदेवशिखामणिः । भस्मस्नानमकृत्वैव यः कुर्यात्कर्म वैदिकम् ॥

yadvā veda mahādevaḥ sarvadevaśikhāmaṇiḥ bhasmasnānamakṛtvaiva yaḥ kuryātkarma vaidikam

अथवा सर्वदेवों में शिरोमणि महादेव जानते हैं। जो भस्म-स्नान किए बिना ही वैदिक कर्म करता है,

श्लोक 49 (devibhagavatam.11.14.49)

स तत्कर्मकलार्धार्धमपि नाप्नोति वस्तुतः । यः करिष्यति यत्नेन भस्मस्नानं यथाविधि ॥

sa tatkarmakalārdhārdhamapi nāpnoti vastutaḥ yaḥ kariṣyati yatnena bhasmasnānaṁ yathāvidhi

वह वास्तव में उस कर्म के फल का आधा-आधा भाग भी प्राप्त नहीं करता। जो यत्नपूर्वक विधिवत भस्म-स्नान करेगा,

श्लोक 50 (devibhagavatam.11.14.50)

स एवैकः सर्वकर्मस्वधिकारी श्रुतिश्रुतः । पावनं पावनानां च भस्मस्नानं श्रुतिश्रुतम् ॥

sa evaikaḥ sarvakarmasvadhikārī śrutiśrutaḥ pāvanaṁ pāvanānāṁ ca bhasmasnānaṁ śrutiśrutam

वही अकेला श्रुति द्वारा कथित सभी कर्मों का अधिकारी है। भस्म-स्नान, जो श्रुति में कहा गया है, पवित्रों का भी पवित्रकारक है।

श्लोक 51 (devibhagavatam.11.14.51)

न करिष्यति यो मोहात्स महापातकी भवेत् । अनन्तैर्वारुणैः स्नानैर्यत्पुण्यं प्राप्यते द्विजैः ॥

na kariṣyati yo mohātsa mahāpātakī bhavet anantairvāruṇaiḥ snānairyatpuṇyaṁ prāpyate dvijaiḥ

जो मोहवश उसे नहीं करता, वह महापातकी बन जाता है। द्विजों को अनन्त जल-स्नानों से जो पुण्य प्राप्त होता है,

श्लोक 52 (devibhagavatam.11.14.52)

ततोऽनन्तगुणं पुण्यं भस्मस्नानादवाप्यते । कालत्रयेऽपि कर्तव्यं भस्मस्नानं प्रयत्नतः ॥

tato'nantaguṇaṁ puṇyaṁ bhasmasnānādavāpyate kālatraye'pi kartavyaṁ bhasmasnānaṁ prayatnataḥ

उससे अनन्तगुना पुण्य भस्म-स्नान से प्राप्त होता है। तीनों कालों में यत्नपूर्वक भस्म-स्नान करना चाहिए।

श्लोक 53 (devibhagavatam.11.14.53)

भस्मस्नानं स्मृतं श्रौतं तत्त्यागी पतितो भवेत् । मूत्राद्युत्सर्जनान्ते तु भस्मस्नानं प्रयत्नतः ॥

bhasmasnānaṁ smṛtaṁ śrautaṁ tattyāgī patito bhavet mūtrādyutsarjanānte tu bhasmasnānaṁ prayatnataḥ

भस्म-स्नान श्रुति में स्मृत है; इसका त्याग करने वाला पतित हो जाता है। मूत्रादि विसर्जन के पश्चात् यत्नपूर्वक भस्म-स्नान —

श्लोक 54 (devibhagavatam.11.14.54)

कर्तव्यमन्यथा पूता न भविष्यन्ति मानवाः । विधिवत्कृतशौचोऽपि भस्मस्नानं विना द्विजः ॥

kartavyamanyathā pūtā na bhaviṣyanti mānavāḥ vidhivatkṛtaśauco'pi bhasmasnānaṁ vinā dvijaḥ

करना चाहिए, अन्यथा मनुष्य पवित्र नहीं होंगे। विधिवत शौच करने वाला द्विज भी यदि भस्म-स्नान न करे,

श्लोक 55 (devibhagavatam.11.14.55)

न भविष्यति पूतात्मा नाधिकार्यपि कर्मणि । अपानवायुनिर्याते जृम्भणे स्कन्दने क्षुते ॥

na bhaviṣyati pūtātmā nādhikāryapi karmaṇi apānavāyuniryāte jṛmbhaṇe skandane kṣute

तो वह पवित्र आत्मा वाला नहीं होगा, न ही कर्म के लिए अधिकारी होगा। अपान वायु के निकलने पर, जँभाई लेने पर, स्राव सहित छींक आने पर, छींकने पर,

श्लोक 56 (devibhagavatam.11.14.56)

श्लेष्मोद्गारेऽपि कर्तव्यं भस्मस्नानं प्रयत्नतः । श्रीभस्मस्नानमाहात्म्यस्यैकदेशोऽत्र वर्णितः ॥

śleṣmodgāre'pi kartavyaṁ bhasmasnānaṁ prayatnataḥ śrībhasmasnānamāhātmyasyaikadeśo'tra varṇitaḥ

और कफ के उद्गार पर भी यत्नपूर्वक भस्म-स्नान करना चाहिए। यहाँ श्री भस्म-स्नान की महिमा का एक अंश ही वर्णित किया गया है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.11.14.57)

पुनश्च सम्प्रवक्ष्यामि भस्मस्नानोत्थितं फलम् । सावधानेन मनसा श्रोतव्यं मुनिपुङ्गव ॥

punaśca sampravakṣyāmi bhasmasnānotthitaṁ phalam sāvadhānena manasā śrotavyaṁ munipuṅgava

अब मैं पुनः भस्म-स्नान से उत्पन्न फल का वर्णन करूँगा; हे मुनिश्रेष्ठ! सावधान मन से सुनो।

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