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एकादश स्कन्ध · अध्याय 16

संध्योपासन-निरूपण

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.16.1)

श्रीनारायण उवाच । अथातः श्रूयतां पुण्यं सन्ध्योपासनमुत्तमम् । भस्मधारणमाहात्म्यं कथितं चैव विस्तरात् ॥

śrīnārāyaṇa uvāca athātaḥ śrūyatāṁ puṇyaṁ sandhyopāsanamuttamam bhasmadhāraṇamāhātmyaṁ kathitaṁ caiva vistarāt

श्री नारायण ने कहा — अब इस परम पुण्यदायी संध्या-उपासना को सुनो। भस्म-धारण की महिमा तो विस्तार से कही ही जा चुकी है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.16.2)

प्रातःसन्ध्याविधानं च कथयिष्यामि तेऽनघ । प्रातःसन्ध्यां सनक्षत्रां मध्याह्ने मध्यभास्कराम् ॥

prātaḥsandhyāvidhānaṁ ca kathayiṣyāmi te'nagha prātaḥsandhyāṁ sanakṣatrāṁ madhyāhne madhyabhāskarām

हे निष्पाप! अब मैं प्रातःसंध्या की विधि बताऊँगा। प्रातःसंध्या नक्षत्रों सहित होती है, मध्याह्न-संध्या सूर्य के मध्याकाश में रहने पर,

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.16.3)

ससूर्यां पश्चिमां सन्ध्यां तिस्रः सन्ध्या उपासते । तद्भेदानपि वक्ष्यामि शृणु देवर्षिसत्तम ॥

sasūryāṁ paścimāṁ sandhyāṁ tisraḥ sandhyā upāsate tadbhedānapi vakṣyāmi śṛṇu devarṣisattama

और सायं-संध्या सूर्य सहित होती है — इस प्रकार तीन संध्याओं की उपासना की जाती है। हे देवर्षिश्रेष्ठ! उनके भेद भी सुनो, मैं बताता हूँ।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.16.4)

उत्तमा तारकोपेता मध्यमा लुप्ततारका । अधमा सूर्यसहिता प्रातःसन्ध्या त्रिधा मता ॥

uttamā tārakopetā madhyamā luptatārakā adhamā sūryasahitā prātaḥsandhyā tridhā matā

प्रातःसंध्या तीन प्रकार की मानी गई है — उत्तम वह जिसमें तारे दिखाई देते हैं, मध्यम वह जिसमें तारे लुप्त हो चुके हों, और अधम वह जिसमें सूर्य उदय हो चुका हो।

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.16.5)

उत्तमा सूर्यसहिता मध्यमास्तमिते रवौ । अधमा तारकोपेता सायंसन्ध्या त्रिधा मता ॥

uttamā sūryasahitā madhyamāstamite ravau adhamā tārakopetā sāyaṁsandhyā tridhā matā

सायं-संध्या भी तीन प्रकार की है — उत्तम वह जिसमें सूर्य दिखाई देता हो, मध्यम सूर्यास्त हो जाने पर, और अधम तारे दिखाई देने पर।

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.16.6)

विप्रो वृक्षो मूलकान्यत्र सन्ध्या वेदः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् । तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा ॥

vipro vṛkṣo mūlakānyatra sandhyā vedaḥ śākhā dharmakarmāṇi patram tasmānmūlaṁ yatnato rakṣaṇīyaṁ chinne mūle naiva vṛkṣo na śākhā

ब्राह्मण एक वृक्ष है, संध्या उसकी जड़ है, वेद शाखाएँ हैं और धर्म-कर्म पत्ते हैं; अतः यत्नपूर्वक जड़ की रक्षा करनी चाहिए — जड़ कटने पर न वृक्ष रहता है, न शाखा।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.16.7)

सन्ध्या येन न विज्ञाता सन्ध्या येनानुपासिता । जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चैव जायते ॥

sandhyā yena na vijñātā sandhyā yenānupāsitā jīvamāno bhavecchūdro mṛtaḥ śvā caiva jāyate

जिसने संध्या को नहीं जाना, जिसने संध्या की उपासना नहीं की, वह जीवित रहते हुए शूद्र होता है और मरने पर कुत्ता बनकर जन्म लेता है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.16.8)

तस्मान्नित्यं प्रकर्तव्यं सन्ध्योपासनमुत्तमम् । तदभावेऽन्यकर्मादावधिकारी भवेन्न हि ॥

tasmānnityaṁ prakartavyaṁ sandhyopāsanamuttamam tadabhāve'nyakarmādāvadhikārī bhavenna hi

अतः इस परम श्रेष्ठ संध्या-उपासना को नित्य करना चाहिए; इसके अभाव में अन्य किसी भी कर्म का अधिकार नहीं रहता।

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.16.9)

उदयास्तमयादूर्ध्वं यावत्स्याद्घटिकात्रयम् । तावत्सन्ध्यामुपासीत प्रायश्चित्तं ततः परम् ॥

udayāstamayādūrdhvaṁ yāvatsyādghaṭikātrayam tāvatsandhyāmupāsīta prāyaścittaṁ tataḥ param

सूर्योदय अथवा सूर्यास्त से लेकर तीन घटी तक संध्या की उपासना करनी चाहिए; उसके पश्चात् प्रायश्चित्त आवश्यक हो जाता है।

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.16.10)

कालातिक्रमणे जाते चतुर्थार्घ्यं प्रदापयेत् । अथवाष्टशतं देवीं जप्त्वादौ तां समाचरेत् ॥

kālātikramaṇe jāte caturthārghyaṁ pradāpayet athavāṣṭaśataṁ devīṁ japtvādau tāṁ samācaret

यदि समय बीत जाए, तो चौथा अर्घ्य देना चाहिए, अथवा पहले देवी के मंत्र का एक सौ आठ बार जप करके फिर वह कर्म करना चाहिए।

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.16.11)

यस्मिन्काले तु यत्कर्म तत्कालाधीश्वरीं च ताम् । सन्ध्यामुपास्य पश्चात्तु तत्कालीनं समाचरेत् ॥

yasminkāle tu yatkarma tatkālādhīśvarīṁ ca tām sandhyāmupāsya paścāttu tatkālīnaṁ samācaret

जिस समय जो कर्म हो, उस काल की अधिष्ठात्री देवी की संध्या-उपासना पहले करके ही, उसके बाद उस समय का कर्म करना चाहिए।

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.16.12)

गृहे साधारणा प्रोक्ता गोष्ठे वै मध्यमा भवेत् । नदीतीरे चोत्तमा स्याद्देवीगेहे तदुत्तमा ॥

gṛhe sādhāraṇā proktā goṣṭhe vai madhyamā bhavet nadītīre cottamā syāddevīgehe taduttamā

घर में की गई संध्या साधारण कही गई है, गोशाला में मध्यम, नदी-तट पर उत्तम, और देवी के मंदिर में सर्वोत्तम होती है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.16.13)

यतो देव्या उपासेयं ततो देव्यास्तु सन्निधौ । सन्ध्यात्रयं प्रकर्तव्यं तदानन्त्याय कल्पते ॥

yato devyā upāseyaṁ tato devyāstu sannidhau sandhyātrayaṁ prakartavyaṁ tadānantyāya kalpate

चूँकि देवी की ही उपासना करनी है, अतः त्रिकाल संध्या देवी के ही समीप करनी चाहिए; यह अनंत फल देने वाली है।

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.16.14)

एतस्या अपरं दैवं ब्राह्मणानां च विद्यते । न विष्णूपासना नित्या न शिवोपासना तथा ॥

etasyā aparaṁ daivaṁ brāhmaṇānāṁ ca vidyate na viṣṇūpāsanā nityā na śivopāsanā tathā

इसके अतिरिक्त ब्राह्मणों के लिए और कोई नित्य दैवोपासना नहीं है — न विष्णु की नित्य उपासना है, न शिव की,

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.16.15)

यथा भवेन्महादेव्या गायत्र्याः श्रुतिचोदिता । सर्ववेदसारभूता गायत्र्यास्तु समर्चना ॥

yathā bhavenmahādevyā gāyatryāḥ śruticoditā sarvavedasārabhūtā gāyatryāstu samarcanā

जैसी श्रुति-कथित महादेवी गायत्री की उपासना है। समस्त वेदों के सार-स्वरूप गायत्री की ही सच्ची अर्चना है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.16.16)

ब्रह्मादयोऽपि सन्ध्यायां तां ध्यायन्ति जपन्ति च । वेदा जपन्ति तां नित्यं वेदोपास्या ततः स्मृता ॥

brahmādayo'pi sandhyāyāṁ tāṁ dhyāyanti japanti ca vedā japanti tāṁ nityaṁ vedopāsyā tataḥ smṛtā

ब्रह्मा आदि भी संध्या के समय उनका ध्यान और जप करते हैं; वेद भी नित्य उनका जप करते हैं, अतः वे वेदों द्वारा उपास्य कही गई हैं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.16.17)

तस्मात्सर्वे द्विजाः शाक्ता न शैवा न च वैष्णवाः । आदिशक्तिमुपासन्ते गायत्रीं वेदमातरम् ॥

tasmātsarve dvijāḥ śāktā na śaivā na ca vaiṣṇavāḥ ādiśaktimupāsante gāyatrīṁ vedamātaram

अतः सभी द्विज इस अर्थ में शाक्त हैं, न शैव न वैष्णव — क्योंकि वे आदिशक्ति गायत्री, वेदमाता की उपासना करते हैं।

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.16.18)

आचान्तः प्राणमायम्य केशवादिकनामभिः । केशवश्च तथा नारायणो माधव एव च ॥

ācāntaḥ prāṇamāyamya keśavādikanāmabhiḥ keśavaśca tathā nārāyaṇo mādhava eva ca

आचमन करके प्राण को संयमित करके, केशव आदि नामों से — केशव, फिर नारायण, फिर माधव,

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.16.19)

गोविन्दो विष्णुरेवाथ मधुसूदन एव च । त्रिविक्रमो वामनश्च श्रीधरोऽपि ततः परम् ॥

govindo viṣṇurevātha madhusūdana eva ca trivikramo vāmanaśca śrīdharo'pi tataḥ param

गोविन्द, फिर विष्णु, फिर मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन और फिर श्रीधर —

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.16.20)

हृषीकेशः पद्मनाभो दामोदर अतः परम् । सङ्कर्षणो वासुदेवः प्रद्युम्नोऽप्यनिरुद्धकः ॥

hṛṣīkeśaḥ padmanābho dāmodara ataḥ param saṅkarṣaṇo vāsudevaḥ pradyumno'pyaniruddhakaḥ

ऋषिकेश, पद्मनाभ और फिर दामोदर, संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध —

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.16.21)

पुरुषोत्तमाधोक्षजौ च नारसिंहोऽप्युतस्तथा । जनार्दन उपेन्द्रश्च हरिः कृष्णोऽन्तिमस्तथा ॥

puruṣottamādhokṣajau ca nārasiṁho'pyutastathā janārdana upendraśca hariḥ kṛṣṇo'ntimastathā

पुरुषोत्तम और अधोक्षज, तथा नरसिंह, जनार्दन और उपेन्द्र, तथा अंत में हरि और कृष्ण —

श्लोक 22 (devibhagavatam.11.16.22)

ओङ्कारपूर्वकं नाम चतुर्विंशतिसङ्ख्यया । स्वाहान्तैः प्राशयेद्वारि नमोऽन्तैः स्पर्शयेत्तथा ॥

oṅkārapūrvakaṁ nāma caturviṁśatisaṅkhyayā svāhāntaiḥ prāśayedvāri namo'ntaiḥ sparśayettathā

इन चौबीस नामों को ओंकार-पूर्वक — जो 'स्वाहा' अंत वाले हैं उनसे जल पीना चाहिए, और 'नमः' अंत वाले हैं उनसे जल का स्पर्श करना चाहिए।

श्लोक 23 (devibhagavatam.11.16.23)

केशवादित्रिभिः पीत्वा द्वाभ्यां प्रक्षालयेत्करौ । मुखं प्रक्षालयेद्द्वाभ्यां द्वाभ्यामुन्मार्जनं तथा ॥

keśavāditribhiḥ pītvā dvābhyāṁ prakṣālayetkarau mukhaṁ prakṣālayeddvābhyāṁ dvābhyāmunmārjanaṁ tathā

आरम्भ के केशव आदि तीन नामों से जल पीकर, दो नामों से हाथ धोने चाहिए, दो से मुख धोना चाहिए और दो से मुख पोंछना चाहिए;

श्लोक 24 (devibhagavatam.11.16.24)

एकेन पाणिं सम्प्रोक्ष्य पादावपि शिरोऽपि च । सङ्कर्षणादिदेवानां द्वादशाङ्गानि संस्पृशेत् ॥

ekena pāṇiṁ samprokṣya pādāvapi śiro'pi ca saṅkarṣaṇādidevānāṁ dvādaśāṅgāni saṁspṛśet

एक नाम से हाथ, पैर और सिर पर छिड़कना चाहिए; और संकर्षण आदि देवताओं के नामों से शरीर के बारह अंगों का स्पर्श करना चाहिए।

श्लोक 25 (devibhagavatam.11.16.25)

दक्षिणेनोदकं पीत्वा वामेन संस्पृशेद्बुधः । तावन्न शुध्यते तोयं यावद्वामेन न स्पृशेत् ॥

dakṣiṇenodakaṁ pītvā vāmena saṁspṛśedbudhaḥ tāvanna śudhyate toyaṁ yāvadvāmena na spṛśet

बुद्धिमान पुरुष दाहिने हाथ से जल पीकर बाएँ हाथ से पात्र का स्पर्श करता है; जब तक बाएँ हाथ से स्पर्श न किया जाए, तब तक जल शुद्ध नहीं होता।

श्लोक 26 (devibhagavatam.11.16.26)

गोकर्णाकृतिहस्तेन माषमात्रं जलं पिबेत् । ततो न्यूनाधिकं पीत्वा सुरापायी भवेद्द्विजः ॥

gokarṇākṛtihastena māṣamātraṁ jalaṁ pibet tato nyūnādhikaṁ pītvā surāpāyī bhaveddvijaḥ

गौ के कान के आकार वाले हाथ से माष के बराबर जल पीना चाहिए; इससे कम या अधिक जल पीने वाला द्विज मद्यपायी के समान होता है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.11.16.27)

संहताङ्गुलिना तोयं पाणिना दक्षिणेन तु । मुक्ताङ्गुष्ठकनिष्ठाभ्यां शेषेणाचमनं विदुः ॥

saṁhatāṅgulinā toyaṁ pāṇinā dakṣiṇena tu muktāṅguṣṭhakaniṣṭhābhyāṁ śeṣeṇācamanaṁ viduḥ

दाहिने हाथ की अंगुलियाँ मिलाकर जल पीना चाहिए, अंगूठे और कनिष्ठिका को अलग रखते हुए — शेष अंगुलियों से यह आचमन कहलाता है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.11.16.28)

प्राणायामं ततः कृत्वा प्रणवस्मृतिपूर्वकम् । गायत्रीं शिरसा सार्धं तुरीयपदसंयुताम् ॥

prāṇāyāmaṁ tataḥ kṛtvā praṇavasmṛtipūrvakam gāyatrīṁ śirasā sārdhaṁ turīyapadasaṁyutām

तत्पश्चात् प्रणव के स्मरण-पूर्वक प्राणायाम करके, शिरोमंत्र सहित तथा चतुर्थ पद (तुरीय) से युक्त गायत्री का जप करना चाहिए;

श्लोक 29 (devibhagavatam.11.16.29)

दक्षिणे रेचयेद्वायुं वामेन पूरितोदरम् । कुम्भेन धारयेन्नित्यं प्राणायामं विदुर्बुधाः ॥

dakṣiṇe recayedvāyuṁ vāmena pūritodaram kumbhena dhārayennityaṁ prāṇāyāmaṁ vidurbudhāḥ

दाहिनी नासिका से वायु निकालनी चाहिए, बाईं से उदर भरना चाहिए, और कुम्भक से नित्य वायु को रोकना चाहिए — बुद्धिमान इसे प्राणायाम जानते हैं।

श्लोक 30 (devibhagavatam.11.16.30)

पीडयेद्दक्षिणां नाडीमङ्गुष्ठेन तथोत्तराम् । कनिष्ठानामिकाभ्यां तु मध्यमां तर्जनीं त्यजेत् ॥

pīḍayeddakṣiṇāṁ nāḍīmaṅguṣṭhena tathottarām kaniṣṭhānāmikābhyāṁ tu madhyamāṁ tarjanīṁ tyajet

दाहिनी नाड़ी को अंगूठे से और बाईं को अनामिका-कनिष्ठिका से दबाना चाहिए, मध्यमा और तर्जनी को त्यागते हुए।

श्लोक 31 (devibhagavatam.11.16.31)

रेचकः पूरकश्चैव प्राणायामोऽथ कुम्भकः । प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु योगिभिर्यतमानसैः ॥

recakaḥ pūrakaścaiva prāṇāyāmo'tha kumbhakaḥ procyate sarvaśāstreṣu yogibhiryatamānasaiḥ

रेचक, पूरक तथा कुम्भक — यह प्राणायाम समस्त शास्त्रों में संयमित मन वाले योगियों द्वारा कहा गया है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.11.16.32)

रेचकः सृजते वायुं पूरकः पूरयेत्तु तम् । साम्येन संस्थितिर्यत्तत्कुम्भकः परिकीर्तितः ॥

recakaḥ sṛjate vāyuṁ pūrakaḥ pūrayettu tam sāmyena saṁsthitiryattatkumbhakaḥ parikīrtitaḥ

रेचक वायु को छोड़ता है, पूरक उसे भरता है; और जो दोनों के समत्व में स्थिति है, वह कुम्भक कहलाता है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.11.16.33)

नीलोत्पलदलश्यामं नाभिमध्ये प्रतिष्ठितम् । चतुर्भुजं महात्मानं पूरके चिन्तयेद्धरिम् ॥

nīlotpaladalaśyāmaṁ nābhimadhye pratiṣṭhitam caturbhujaṁ mahātmānaṁ pūrake cintayeddharim

पूरक में नील कमल-दल के समान श्याम, नाभि के मध्य में स्थित, चतुर्भुज महात्मा हरि का चिन्तन करना चाहिए।

श्लोक 34 (devibhagavatam.11.16.34)

कुम्भके तु हृदि स्थाने ध्यायेत्तु कमलासनम् । प्रजापतिं जगन्नाथं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥

kumbhake tu hṛdi sthāne dhyāyettu kamalāsanam prajāpatiṁ jagannāthaṁ caturvaktraṁ pitāmaham

कुम्भक में हृदय-स्थान में कमलासन, प्रजापति, जगन्नाथ, चतुर्मुख पितामह ब्रह्मा का ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 35 (devibhagavatam.11.16.35)

रेचके शङ्करं ध्यायेल्ललाटस्थं महेश्वरम् । शुद्धस्फटिकसङ्काशं निर्मलं पापनाशनम् ॥

recake śaṅkaraṁ dhyāyellalāṭasthaṁ maheśvaram śuddhasphaṭikasaṅkāśaṁ nirmalaṁ pāpanāśanam

रेचक में ललाट में स्थित शंकर महेश्वर का ध्यान करना चाहिए — शुद्ध स्फटिक के समान, निर्मल, पापनाशक।

श्लोक 36 (devibhagavatam.11.16.36)

पूरके विष्णुसायुज्यं कुम्भके ब्रह्मणो गतिम् । रेचकेन तृतीयं तु प्राप्नुयादीश्वरं परम् ॥

pūrake viṣṇusāyujyaṁ kumbhake brahmaṇo gatim recakena tṛtīyaṁ tu prāpnuyādīśvaraṁ param

पूरक से विष्णु का सायुज्य, कुम्भक से ब्रह्मा की गति, और रेचक से तीसरी — परम ईश्वर की प्राप्ति होती है।

श्लोक 37 (devibhagavatam.11.16.37)

पौराणाचमनाद्यं च प्रोक्तं देवर्षिसत्तम । श्रौतमाचमनाद्यं च शृणु पापापहं मुने ॥

paurāṇācamanādyaṁ ca proktaṁ devarṣisattama śrautamācamanādyaṁ ca śṛṇu pāpāpahaṁ mune

हे देवर्षिश्रेष्ठ! पुराणोक्त आचमन आदि इस प्रकार कहा गया। हे मुने! अब श्रुति-सम्मत आचमन आदि सुनो, जो पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 38 (devibhagavatam.11.16.38)

प्रणवं पूर्वमुच्चार्य गायत्रीं तु तदित्यृचम् । पादादौ व्याहृतीस्तिस्रः श्रौताचमनमुच्यते ॥

praṇavaṁ pūrvamuccārya gāyatrīṁ tu tadityṛcam pādādau vyāhṛtīstisraḥ śrautācamanamucyate

पहले प्रणव का उच्चारण करके, फिर गायत्री तथा 'तत्' ऋचा, पहले तीनों व्याहृतियाँ — इसे श्रुति-सम्मत आचमन कहा जाता है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.11.16.39)

गायत्रीं शिरसा सार्धं जपेद्व्याहृतिपूर्विकाम् । प्रतिप्रणवसंयुक्तां त्रितयं प्राणसंयमः ॥

gāyatrīṁ śirasā sārdhaṁ japedvyāhṛtipūrvikām pratipraṇavasaṁyuktāṁ tritayaṁ prāṇasaṁyamaḥ

व्याहृति-पूर्वक, प्रत्येक के साथ प्रणव से युक्त, शिरोमंत्र सहित गायत्री का तीन बार जप करना — यह प्राणसंयम कहलाता है।

श्लोक 40 (devibhagavatam.11.16.40)

(सलक्षणं तु प्राणानामायामं कीर्त्यतेऽधुना । नानापापैकशमनं महापुण्यफलप्रदम् ॥) पञ्चाङ्गुलीभिर्नासाग्रं पीडयेत्प्रणवेन तु । सर्वपापहरा मुद्रा वानप्रस्थगृहस्थयोः ॥

(salakṣaṇaṁ tu prāṇānāmāyāmaṁ kīrtyate'dhunā nānāpāpaikaśamanaṁ mahāpuṇyaphalapradam ) pañcāṅgulībhirnāsāgraṁ pīḍayetpraṇavena tu sarvapāpaharā mudrā vānaprasthagṛhasthayoḥ

(अब प्राणों के संयम का लक्षण-सहित वर्णन किया जा रहा है, जो अनेक पापों का एकमात्र शमन करने वाला और महापुण्य-फल देने वाला है।) पाँचों अंगुलियों से नासाग्र को दबाकर प्रणव का उच्चारण करना चाहिए — यह सर्वपाप-हारिणी मुद्रा वानप्रस्थ और गृहस्थ दोनों के लिए है।

श्लोक 41 (devibhagavatam.11.16.41)

कनिष्ठानामिकाङ्गुष्ठैर्यतेश्च ब्रह्मचारिणः । आपो हि ष्ठेति तिसृभिः प्रोक्षणं स्यात्कुशोदकैः ॥

kaniṣṭhānāmikāṅguṣṭhairyateśca brahmacāriṇaḥ āpo hi ṣṭheti tisṛbhiḥ prokṣaṇaṁ syātkuśodakaiḥ

यति और ब्रह्मचारी के लिए कनिष्ठिका, अनामिका और अंगूठे से — 'आपो हि ष्ठा' इन तीन ऋचाओं से कुश-जल द्वारा प्रोक्षण करना चाहिए।

श्लोक 42 (devibhagavatam.11.16.42)

ऋगन्ते मार्जनं कुर्यात्पादान्ते वा समाहितः । नवप्रणवयुक्तेन आपो हि ष्ठेत्यनेन तु ॥

ṛgante mārjanaṁ kuryātpādānte vā samāhitaḥ navapraṇavayuktena āpo hi ṣṭhetyanena tu

सावधान होकर प्रत्येक ऋचा अथवा पाद के अंत में मार्जन करना चाहिए, नौ प्रणवों से युक्त 'आपो हि ष्ठा' इस मंत्र से।

श्लोक 43 (devibhagavatam.11.16.43)

नश्येदघं मार्जनेन संवत्सरसमुद्भवम् । तत आचमनं कृत्वा सूर्यश्चेति पिबेदपः ॥

naśyedaghaṁ mārjanena saṁvatsarasamudbhavam tata ācamanaṁ kṛtvā sūryaśceti pibedapaḥ

इस मार्जन से एक वर्ष में उत्पन्न पाप नष्ट हो जाता है। तत्पश्चात् आचमन करके 'सूर्यश्च' मंत्र से जल पीना चाहिए।

श्लोक 44 (devibhagavatam.11.16.44)

अन्तःकरणसम्भिन्नं पापं तस्य विनश्यति । प्रणवेन व्याहृतिभिर्गायत्र्या प्रणवाद्यया ॥

antaḥkaraṇasambhinnaṁ pāpaṁ tasya vinaśyati praṇavena vyāhṛtibhirgāyatryā praṇavādyayā

प्रणव, व्याहृतियों तथा प्रणव-पूर्वक गायत्री से उस व्यक्ति का अन्तःकरण में स्थित पाप भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 45 (devibhagavatam.11.16.45)

आपो हि ष्ठेति सूक्तेन मार्जनं चैव कारयेत् । उद्धृत्य दक्षिणे हस्ते जलं गोकर्णवत्कृते ॥

āpo hi ṣṭheti sūktena mārjanaṁ caiva kārayet uddhṛtya dakṣiṇe haste jalaṁ gokarṇavatkṛte

'आपो हि ष्ठा' सूक्त से मार्जन करना चाहिए — दाहिने हाथ में गौ के कान के आकार में जल लेकर,

श्लोक 46 (devibhagavatam.11.16.46)

नीत्वा तं नासिकाग्रं तु वामकुक्षौ स्मरेदघम् । पुरुषं कृष्णवर्णं च ऋतं चेति पठेत्ततः ॥

nītvā taṁ nāsikāgraṁ tu vāmakukṣau smaredagham puruṣaṁ kṛṣṇavarṇaṁ ca ṛtaṁ ceti paṭhettataḥ

उसे नासाग्र तक ले जाकर बाईं कोख में अपने पाप का, कृष्णवर्ण पुरुष के रूप में, स्मरण करके 'ऋतं च' का पाठ करना चाहिए।

श्लोक 47 (devibhagavatam.11.16.47)

द्रुपदां वा ऋचं पश्चाद्दक्षनासापुटेन च । श्वासमार्गेण तं पापमानयेत्करवारिणि ॥

drupadāṁ vā ṛcaṁ paścāddakṣanāsāpuṭena ca śvāsamārgeṇa taṁ pāpamānayetkaravāriṇi

अथवा बाद में 'द्रुपदा' ऋचा से, दाहिनी नासिका से, श्वास-मार्ग द्वारा उस पाप को हाथ के जल में लाना चाहिए।

श्लोक 48 (devibhagavatam.11.16.48)

नावलोक्यैव तद्वारि वामभागेऽश्मनि क्षिपेत् । निष्पापं तु शरीरं मे सञ्जातमिति भावयेत् ॥

nāvalokyaiva tadvāri vāmabhāge'śmani kṣipet niṣpāpaṁ tu śarīraṁ me sañjātamiti bhāvayet

उस जल को बिना देखे बाईं ओर पत्थर पर फेंक देना चाहिए, यह भावना करते हुए — 'मेरा शरीर निष्पाप हो गया है'।

श्लोक 49 (devibhagavatam.11.16.49)

उत्थाय तु ततः पादौ द्वौ समौ सन्नियोजयेत् । जलाञ्जलिं गृहीत्वा तु तर्जन्यङ्गुष्ठवर्जितम् ॥

utthāya tu tataḥ pādau dvau samau sanniyojayet jalāñjaliṁ gṛhītvā tu tarjanyaṅguṣṭhavarjitam

तब उठकर दोनों पैरों को समान रखना चाहिए, और तर्जनी तथा अंगूठे को छोड़कर जलांजलि लेकर,

श्लोक 50 (devibhagavatam.11.16.50)

वीक्ष्य भानुं क्षिपेद्वारि गायत्र्या चाभिमन्त्रितम् । त्रिवारं मुनिशार्दूल विधिरेषोऽर्घ्यमोचने ॥

vīkṣya bhānuṁ kṣipedvāri gāyatryā cābhimantritam trivāraṁ muniśārdūla vidhireṣo'rghyamocane

सूर्य को देखकर, गायत्री से अभिमंत्रित जल तीन बार अर्पित करना चाहिए — हे मुनिश्रेष्ठ! यह अर्घ्य-अर्पण की विधि है।

श्लोक 51 (devibhagavatam.11.16.51)

ततः प्रदक्षिणां कुर्यादसावादित्यमन्त्रतः । मध्याह्ने सकृदेव स्यात्सन्ध्ययोस्तु त्रिवारतः ॥

tataḥ pradakṣiṇāṁ kuryādasāvādityamantrataḥ madhyāhne sakṛdeva syātsandhyayostu trivārataḥ

तत्पश्चात् सूर्य-मंत्र से प्रदक्षिणा करनी चाहिए — मध्याह्न में एक बार, प्रातः और सायं की संध्याओं में तीन बार।

श्लोक 52 (devibhagavatam.11.16.52)

ईषन्नग्रः प्रभाते तु मध्याह्ने दण्डवत्स्थितः । आसने चोपविष्टस्तु द्विजः सायं क्षिपेदपः ॥

īṣannagraḥ prabhāte tu madhyāhne daṇḍavatsthitaḥ āsane copaviṣṭastu dvijaḥ sāyaṁ kṣipedapaḥ

प्रातःकाल थोड़ा आगे झुककर, मध्याह्न में दण्ड के समान सीधा खड़े होकर, और सायंकाल आसन पर बैठकर द्विज को जल अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 53 (devibhagavatam.11.16.53)

उदकं प्रक्षिपेद्यस्मात्तत्कारणमतः शृणु । त्रिंशत्कोट्यो महावीरा मन्देहा नाम राक्षसाः ॥

udakaṁ prakṣipedyasmāttatkāraṇamataḥ śṛṇu triṁśatkoṭyo mahāvīrā mandehā nāma rākṣasāḥ

जल अर्पित करने का कारण सुनो — तीस करोड़ महाबली मन्देह नामक राक्षस हैं,

श्लोक 54 (devibhagavatam.11.16.54)

कृतघ्ना दारुणा घोराः सूर्यमिच्छन्ति खादितुम् । ततो देवगणाः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ॥

kṛtaghnā dāruṇā ghorāḥ sūryamicchanti khāditum tato devagaṇāḥ sarve ṛṣayaśca tapodhanāḥ

वे कृतघ्न, क्रूर और भयानक हैं, सूर्य को खाना चाहते हैं। इसलिए समस्त देवगण और तपस्वी ऋषिगण

श्लोक 55 (devibhagavatam.11.16.55)

उपासते महासन्ध्यां प्रक्षिपन्त्युदकाञ्जलिम् । दह्यन्ते तेन दैत्यास्ते वज्रीभूतेन वारिणा ॥

upāsate mahāsandhyāṁ prakṣipantyudakāñjalim dahyante tena daityāste vajrībhūtena vāriṇā

महासंध्या की उपासना करके जल की अंजलियाँ अर्पित करते हैं; उस जल से, जो वज्र के समान कठोर हो जाता है, वे दैत्य जल जाते हैं।

श्लोक 56 (devibhagavatam.11.16.56)

एतस्मात्कारणाद्विप्राः सन्ध्यां नित्यमुपासते । महापुण्यस्य जननं सन्ध्योपासनमीरितम् ॥

etasmātkāraṇādviprāḥ sandhyāṁ nityamupāsate mahāpuṇyasya jananaṁ sandhyopāsanamīritam

इसी कारण ब्राह्मण नित्य संध्या की उपासना करते हैं। संध्या-उपासना को महापुण्य का जनक कहा गया है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.11.16.57)

अर्घ्याङ्गभूतमन्त्रोऽयं प्रोच्यते शृणु नारद । यदुच्चारणमात्रेण साङ्गं सन्ध्याफलं भवेत् ॥

arghyāṅgabhūtamantro'yaṁ procyate śṛṇu nārada yaduccāraṇamātreṇa sāṅgaṁ sandhyāphalaṁ bhavet

अब अर्घ्य के अंगभूत मंत्र को बताता हूँ, हे नारद! सुनो — जिसके उच्चारण मात्र से संध्या का सांग फल प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 58 (devibhagavatam.11.16.58)

सोऽहमर्कोऽस्म्यहं ज्योतिरात्मा ज्योतिरहं शिवः । आत्मज्योतिरहं शुक्लः सर्वज्योती रसोऽस्म्यहम् ॥

so'hamarko'smyahaṁ jyotirātmā jyotirahaṁ śivaḥ ātmajyotirahaṁ śuklaḥ sarvajyotī raso'smyaham

'मैं वही हूँ, मैं सूर्य हूँ, मैं ज्योतिर्मय आत्मा हूँ, मैं ज्योति हूँ, मैं शिव हूँ; मैं आत्मज्योति हूँ, शुक्ल हूँ, सर्वज्योति हूँ, मैं रस हूँ।'

श्लोक 59 (devibhagavatam.11.16.59)

आगच्छ वरदे देवि गायत्रि ब्रह्मरूपिणि । जपानुष्ठानसिद्।ह्ध्यर्थं प्रविश्य हृदयं मम ॥

āgaccha varade devi gāyatri brahmarūpiṇi japānuṣṭhānasid hdhyarthaṁ praviśya hṛdayaṁ mama

'हे वरदे देवि गायत्रि, ब्रह्मरूपिणि! जप-अनुष्ठान की सिद्धि के लिए मेरे हृदय में प्रवेश करके पधारो।'

श्लोक 60 (devibhagavatam.11.16.60)

उत्तिष्ठ देवि गन्तव्यं पुनरागमनाय च । अर्घ्येषु देवि गन्तव्यं प्रविश्य हृदयं मम ॥

uttiṣṭha devi gantavyaṁ punarāgamanāya ca arghyeṣu devi gantavyaṁ praviśya hṛdayaṁ mama

'हे देवि! उठो, अब जाना है, फिर से आने के लिए; हे देवि! अर्घ्यों में मेरे हृदय में प्रवेश करके जाना है।'

श्लोक 61 (devibhagavatam.11.16.61)

ततः शुद्धस्थले नैजमासनं स्थापयेद्बुधः । तत्रारुह्य जपेत्पश्चाद्गायत्रीं वेदमातरम् ॥

tataḥ śuddhasthale naijamāsanaṁ sthāpayedbudhaḥ tatrāruhya japetpaścādgāyatrīṁ vedamātaram

तत्पश्चात् बुद्धिमान व्यक्ति शुद्ध स्थान पर अपना आसन स्थापित करके उस पर बैठकर वेदमाता गायत्री का जप करे।

श्लोक 62 (devibhagavatam.11.16.62)

अत्रैव खेचरी मुद्रा प्राणायामोत्तरं मुने । प्रातःसन्ध्याविधाने च कीर्तिता मुनिपुङ्गव ॥

atraiva khecarī mudrā prāṇāyāmottaraṁ mune prātaḥsandhyāvidhāne ca kīrtitā munipuṅgava

हे मुने, मुनिश्रेष्ठ! यहीं प्राणायाम के पश्चात् खेचरी मुद्रा प्रातःसंध्या-विधि में कही गई है।

श्लोक 63 (devibhagavatam.11.16.63)

तन्नामार्थं प्रवक्ष्यामि सादरं शृणु नारद । चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे गता ॥

tannāmārthaṁ pravakṣyāmi sādaraṁ śṛṇu nārada cittaṁ carati khe yasmājjihvā carati khe gatā

हे नारद! उसके नाम का अर्थ आदरपूर्वक सुनो — चूँकि चित्त आकाश (खे) में विचरण करता है और जिह्वा भी आकाश में जाकर विचरण करती है,

श्लोक 64 (devibhagavatam.11.16.64)

भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी । न चासनं सिद्धसमं न कुम्भसदृशोऽनिलः ॥

bhruvorantargatā dṛṣṭirmudrā bhavati khecarī na cāsanaṁ siddhasamaṁ na kumbhasadṛśo'nilaḥ

और दृष्टि दोनों भौंहों के मध्य में स्थित हो जाती है — यही खेचरी मुद्रा है। न सिद्धासन के समान कोई आसन है, न कुम्भक के समान कोई प्राणायाम,

श्लोक 65 (devibhagavatam.11.16.65)

न खेचरीसमा मुद्रा सत्यं सत्यं च नारद । घण्टावत्पणवोच्चाराद्वायुं निर्जित्य यत्नतः ॥

na khecarīsamā mudrā satyaṁ satyaṁ ca nārada ghaṇṭāvatpaṇavoccārādvāyuṁ nirjitya yatnataḥ

और हे नारद! न खेचरी मुद्रा के समान कोई मुद्रा है — यह सत्य, अत्यंत सत्य है। घंटा के समान प्रणव-उच्चार से यत्नपूर्वक वायु को जीतकर,

श्लोक 66 (devibhagavatam.11.16.66)

स्थिरासने स्थिरो भूत्वा निरहङ्कारनिर्ममः । लक्षणं नारद मुने शृणु सिद्धासनस्य च ॥

sthirāsane sthiro bhūtvā nirahaṅkāranirmamaḥ lakṣaṇaṁ nārada mune śṛṇu siddhāsanasya ca

स्थिर आसन में स्थिर होकर, अहंकार और ममत्व से रहित होकर — हे नारद मुने! अब सिद्धासन का लक्षण सुनो।

श्लोक 67 (devibhagavatam.11.16.67)

योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन्मेढ्रे पादमथैकमेव हृदयं कृत्वा समं विग्रहम् । स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन्भ्रुवोरन्तरं तिष्ठत्येतदतीव योगिसुखदं सिद्धासनं प्रोच्यते ॥

yonisthānakamaṅghrimūlaghaṭitaṁ kṛtvā dṛḍhaṁ vinyasenmeḍhre pādamathaikameva hṛdayaṁ kṛtvā samaṁ vigraham sthāṇuḥ saṁyamitendriyo'caladṛśā paśyanbhruvorantaraṁ tiṣṭhatyetadatīva yogisukhadaṁ siddhāsanaṁ procyate

योनि-स्थान को एड़ी के मूल से दृढ़तापूर्वक जोड़कर, दूसरे पैर को लिंग पर रखकर, हृदय और शरीर को सीधा करके, स्तम्भ के समान संयमित इन्द्रियों सहित, अचल दृष्टि से भौंहों के मध्य को देखते हुए स्थिर बैठना — यह अत्यंत योगी-सुखदायक सिद्धासन कहलाता है।

श्लोक 68 (devibhagavatam.11.16.68)

आयातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्मसम्मितम् । गायत्री छन्दसां मातरिदं ब्रह्म जुषस्व मे ॥

āyātu varadā devī akṣaraṁ brahmasammitam gāyatrī chandasāṁ mātaridaṁ brahma juṣasva me

'वरदा देवी पधारें, वह अक्षर जो ब्रह्म-तुल्य है; हे गायत्रि, छन्दों की माता! इस ब्रह्म को स्वीकार करो।'

श्लोक 69 (devibhagavatam.11.16.69)

यदह्ना कुरुते पापं तदह्ना प्रतिमुच्यते । यद्रात्र्या कुरुते पापं तद्रात्र्या प्रतिमुच्यते ॥

yadahnā kurute pāpaṁ tadahnā pratimucyate yadrātryā kurute pāpaṁ tadrātryā pratimucyate

'दिन में जो पाप किया जाता है, वह दिन में ही मुक्त हो जाता है; रात्रि में जो पाप किया जाता है, वह रात्रि में ही मुक्त हो जाता है।'

श्लोक 70 (devibhagavatam.11.16.70)

सर्ववर्णे महादेवि सन्ध्याविद्ये सरस्वति । अजरे अमरे देवि सर्वदेवि नमोऽस्तु ते ॥

sarvavarṇe mahādevi sandhyāvidye sarasvati ajare amare devi sarvadevi namo'stu te

'हे सर्ववर्णा महादेवि, संध्या-विद्ये, सरस्वति! हे अजर, अमर देवि, हे सर्वदेवि! तुम्हें नमस्कार है।'

श्लोक 71 (devibhagavatam.11.16.71)

तेजोऽसीत्यादिमन्त्रेण देवीमावाहयेत्ततः । यत्कृतं त्वदनुष्ठानं तत्सर्वं पूर्णमस्तु मे ॥

tejo'sītyādimantreṇa devīmāvāhayettataḥ yatkṛtaṁ tvadanuṣṭhānaṁ tatsarvaṁ pūrṇamastu me

तत्पश्चात् 'तेजोऽसि' आदि मंत्र से देवी का आवाहन करना चाहिए — 'जो भी तुम्हारा अनुष्ठान किया गया है, वह सब मेरे लिए पूर्ण हो।'

श्लोक 72 (devibhagavatam.11.16.72)

ततः शापविमोक्षाय विधानं सम्यगाचरेत् । ब्रह्मशापस्ततो विश्वामित्रस्य च तथैव च ॥

tataḥ śāpavimokṣāya vidhānaṁ samyagācaret brahmaśāpastato viśvāmitrasya ca tathaiva ca

तत्पश्चात् शाप-विमोचन की विधि सम्यक् रूप से करनी चाहिए। ब्रह्मा का शाप, विश्वामित्र का शाप, और उसी प्रकार —

श्लोक 73 (devibhagavatam.11.16.73)

वसिष्ठशाप इत्येतत्त्रिविधं शापलक्षणम् । ब्रह्मणः स्मरणेनैव ब्रह्मशापो निवर्तते ॥

vasiṣṭhaśāpa ityetattrividhaṁ śāpalakṣaṇam brahmaṇaḥ smaraṇenaiva brahmaśāpo nivartate

वसिष्ठ का शाप — इस प्रकार तीन प्रकार के शाप हैं। ब्रह्मा के स्मरण मात्र से ब्रह्म-शाप निवृत्त हो जाता है,

श्लोक 74 (devibhagavatam.11.16.74)

विश्वामित्रस्मरणतो विश्वामित्रस्य शापतः । वसिष्ठस्मरणादेव तस्य शापो विनश्यति ॥

viśvāmitrasmaraṇato viśvāmitrasya śāpataḥ vasiṣṭhasmaraṇādeva tasya śāpo vinaśyati

विश्वामित्र के स्मरण से विश्वामित्र का शाप, और वसिष्ठ के स्मरण से ही उनका शाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 75 (devibhagavatam.11.16.75)

हृत्पद्ममध्ये पुरुषं प्रमाणं सत्यात्मकं सर्वजगत्स्वरूपम् । ध्यायामि नित्यं परमात्मसंज्ञं चिद्रूपमेकं वचसामगम्यम् ॥

hṛtpadmamadhye puruṣaṁ pramāṇaṁ satyātmakaṁ sarvajagatsvarūpam dhyāyāmi nityaṁ paramātmasaṁjñaṁ cidrūpamekaṁ vacasāmagamyam

'हृदय-कमल के मध्य में स्थित उस पुरुष का, जो सत्यस्वरूप, अंगुष्ठ-प्रमाण, समस्त जगत का स्वरूप है, परमात्मा नाम वाले, चित्स्वरूप, एक, वाणी के अगम्य का, मैं नित्य ध्यान करता हूँ।'

श्लोक 76 (devibhagavatam.11.16.76)

अथ न्यासविधिं वक्ष्ये सन्ध्याया अङ्गसम्भवम् । ओङ्कारं पूर्ववद्योज्यं ततो मन्त्रानुदीरयेत् ॥

atha nyāsavidhiṁ vakṣye sandhyāyā aṅgasambhavam oṅkāraṁ pūrvavadyojyaṁ tato mantrānudīrayet

अब मैं संध्या के अंगभूत न्यास-विधि बताऊँगा। पूर्व की भाँति ओंकार जोड़कर फिर मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए —

श्लोक 77 (devibhagavatam.11.16.77)

भूरित्युक्त्वा च पादाभ्यां नम इत्येव चोच्चरेत् । भुवः पूर्वं तु जानुभ्यां स्वः कटिभ्यां नमो वदेत् ॥

bhūrityuktvā ca pādābhyāṁ nama ityeva coccaret bhuvaḥ pūrvaṁ tu jānubhyāṁ svaḥ kaṭibhyāṁ namo vadet

'भूः' कहकर दोनों पैरों को 'नमः' कहते हुए स्पर्श करना चाहिए; पहले 'भुवः' से दोनों घुटनों को, 'स्वः' से कमर को 'नमः' कहते हुए स्पर्श करना चाहिए,

श्लोक 78 (devibhagavatam.11.16.78)

महर्नाभ्यै जनश्चैव हदयाय ततस्तपः । कण्ठाय च ततः सत्यं ललाटे परिकीर्तयेत् ॥

maharnābhyai janaścaiva hadayāya tatastapaḥ kaṇṭhāya ca tataḥ satyaṁ lalāṭe parikīrtayet

'महः' नाभि को, 'जनः' हृदय को, फिर 'तपः' कंठ को, और फिर 'सत्यम्' ललाट पर घोषित करना चाहिए।

श्लोक 79 (devibhagavatam.11.16.79)

अङ्गुष्ठाभ्यां तत्सवितुस्तर्जनीभ्यां वरेण्यकम् । भर्गो देवस्य मध्याध्यां धीमहीत्येव कीर्तयेत् ॥

aṅguṣṭhābhyāṁ tatsavitustarjanībhyāṁ vareṇyakam bhargo devasya madhyādhyāṁ dhīmahītyeva kīrtayet

दोनों अंगूठों से 'तत्सवितुः', तर्जनियों से 'वरेण्यम्', मध्यमा अंगुलियों से 'भर्गो देवस्य' — और इसी प्रकार 'धीमहि' कहना चाहिए;

श्लोक 80 (devibhagavatam.11.16.80)

अनामाभ्यां कनिष्ठाभ्यां धियो यो नः पदं वदेत् । प्रचोदयात्करपृष्ठतलयोर्विन्यसेत्सुधीः ॥

anāmābhyāṁ kaniṣṭhābhyāṁ dhiyo yo naḥ padaṁ vadet pracodayātkarapṛṣṭhatalayorvinyasetsudhīḥ

अनामिका और कनिष्ठिका से 'धियो यो नः' कहना चाहिए; और बुद्धिमान पुरुष हाथों के पृष्ठ और तल पर 'प्रचोदयात्' रखे।

श्लोक 81 (devibhagavatam.11.16.81)

ब्रह्मात्मने तत्सवितुर्हृदयाय नमस्तथा । विष्ण्वात्मने वरेण्यं च शिरसे नम इत्यपि ॥

brahmātmane tatsaviturhṛdayāya namastathā viṣṇvātmane vareṇyaṁ ca śirase nama ityapi

ब्रह्म-आत्मा को 'तत्सवितुः' हृदय पर 'नमः' सहित, विष्णु-आत्मा को 'वरेण्यम्' शिर पर 'नमः' सहित —

श्लोक 82 (devibhagavatam.11.16.82)

भर्गो देवस्थ रुद्रात्मने शिखायै प्रकीर्तितम् । शक्त्यात्मने धीमहीति कवचाय ततः परम् ॥

bhargo devastha rudrātmane śikhāyai prakīrtitam śaktyātmane dhīmahīti kavacāya tataḥ param

रुद्र-आत्मा को 'भर्गो देवस्य' शिखा पर कहा गया है, शक्ति-आत्मा को 'धीमहि' कवच पर, फिर —

श्लोक 83 (devibhagavatam.11.16.83)

कालात्मने धियो यो नो नेत्रत्रय उदीरितम् । प्रचोदयाच्च सर्वात्मनेऽस्त्राय परिकीर्तितम् ॥

kālātmane dhiyo yo no netratraya udīritam pracodayācca sarvātmane'strāya parikīrtitam

काल-आत्मा को 'धियो यो नः' तीनों नेत्रों पर कहा गया है, और सर्व-आत्मा को 'प्रचोदयात्' अस्त्र पर घोषित किया गया है।

श्लोक 84 (devibhagavatam.11.16.84)

अक्षरन्यासमेवाग्रे कथयामि महामुने । गायत्रीवर्णसम्भूतन्यासः पापहरः परः ॥

akṣaranyāsamevāgre kathayāmi mahāmune gāyatrīvarṇasambhūtanyāsaḥ pāpaharaḥ paraḥ

हे महामुने! अब मैं पहले अक्षर-न्यास बताता हूँ — गायत्री के वर्णों से उत्पन्न यह न्यास परम पापनाशक है।

श्लोक 85 (devibhagavatam.11.16.85)

प्रणवं पूर्वमुच्चार्य वर्णन्यासः प्रकीर्तितः । तत्कारमादावुच्चार्य पादाङ्गुष्ठद्वये न्यसेत् ॥

praṇavaṁ pūrvamuccārya varṇanyāsaḥ prakīrtitaḥ tatkāramādāvuccārya pādāṅguṣṭhadvaye nyaset

पहले प्रणव का उच्चारण करके वर्ण-न्यास कहा गया है। पहले 'त' का उच्चारण करके दोनों पैरों के अंगूठों पर न्यास करना चाहिए;

श्लोक 86 (devibhagavatam.11.16.86)

सकारं गुल्फयोस्तद्वद्विकारं जङ्घयोर्न्यसेत् । जान्वोस्तुकारं विन्यस्य ऊर्वोश्चैव वकारकम् ॥

sakāraṁ gulphayostadvadvikāraṁ jaṅghayornyaset jānvostukāraṁ vinyasya ūrvoścaiva vakārakam

इसी प्रकार 'स' को दोनों टखनों पर, 'वि' को दोनों पिंडलियों पर न्यास करना चाहिए; 'तु' को दोनों घुटनों पर, और 'व' को जांघों पर;

श्लोक 87 (devibhagavatam.11.16.87)

रेकारं च गुदे न्यस्य णिकारं लिङ्ग एव च । कट्यां यकारमेवात्र भकारं नाभिमण्डले ॥

rekāraṁ ca gude nyasya ṇikāraṁ liṅga eva ca kaṭyāṁ yakāramevātra bhakāraṁ nābhimaṇḍale

'रे' को गुदा पर तथा 'णि' को लिंग पर न्यास करके, यहाँ कमर पर 'य', नाभि-मंडल पर 'भ' —

श्लोक 88 (devibhagavatam.11.16.88)

गोकारं हृदये न्यस्य देकारं स्तनयोर्द्वयोः । वकारं हृदि विन्यस्य स्यकारं कण्ठकूपके ॥

gokāraṁ hṛdaye nyasya dekāraṁ stanayordvayoḥ vakāraṁ hṛdi vinyasya syakāraṁ kaṇṭhakūpake

'गो' को हृदय पर, 'दे' को दोनों स्तनों पर न्यास करके, 'व' को हृदय पर, 'स्य' को कंठ-कूप पर;

श्लोक 89 (devibhagavatam.11.16.89)

धीकारं मुखदेशे तु मकारं तालुदेशके । हिकारं नासिकाग्रे तु धिकारं नेत्रमण्डले ॥

dhīkāraṁ mukhadeśe tu makāraṁ tāludeśake hikāraṁ nāsikāgre tu dhikāraṁ netramaṇḍale

'धी' को मुख-प्रदेश पर, 'म' को तालु-प्रदेश पर, 'हि' को नासाग्र पर, 'धि' को नेत्र-मंडल पर;

श्लोक 90 (devibhagavatam.11.16.90)

भ्रूमध्ये चैव योकारं योकारं च ललाटके । नकारं वै पूर्वमुखे प्रकारं दक्षिणे मुखे ॥

bhrūmadhye caiva yokāraṁ yokāraṁ ca lalāṭake nakāraṁ vai pūrvamukhe prakāraṁ dakṣiṇe mukhe

भौंहों के मध्य में 'यो', तथा ललाट पर पुनः 'यो'; पूर्व मुख पर 'न', दक्षिण मुख पर 'प्र';

श्लोक 91 (devibhagavatam.11.16.91)

चोकारं पश्चिममुखे दकारं चोत्तरे मुखे । याकारं मूर्ध्नि विन्यस्य तकारं व्यापकं न्यसेत् ॥

cokāraṁ paścimamukhe dakāraṁ cottare mukhe yākāraṁ mūrdhni vinyasya takāraṁ vyāpakaṁ nyaset

पश्चिम मुख पर 'चो', उत्तर मुख पर 'द'; मस्तक पर 'या' न्यास करके, सम्पूर्ण शरीर पर व्यापक रूप से 'त' का न्यास करना चाहिए।

श्लोक 92 (devibhagavatam.11.16.92)

एतन्न्यासविधिं केचिन्नेच्छन्ति जपतत्पराः । ततो ध्यायेन्महादेवीं जगन्मातरमम्बिकाम् ॥

etannyāsavidhiṁ kecinnecchanti japatatparāḥ tato dhyāyenmahādevīṁ jaganmātaramambikām

जप में तत्पर कुछ लोग इस न्यास-विधि को नहीं चाहते। तत्पश्चात् जगन्माता अम्बिका, महादेवी का ध्यान करना चाहिए,

श्लोक 93 (devibhagavatam.11.16.93)

भास्वज्जपाप्रसूनाभां कुमारीं परमेश्वरीम् । रक्ताम्बुजासनारूढां रक्तगन्धानुलेपनाम् ॥

bhāsvajjapāprasūnābhāṁ kumārīṁ parameśvarīm raktāmbujāsanārūḍhāṁ raktagandhānulepanām

प्रातःकालीन जपा-पुष्प के समान कान्ति वाली, सदा कुमारी, परमेश्वरी, लाल कमल के आसन पर आरूढ़, लाल चन्दन से अनुलिप्त,

श्लोक 94 (devibhagavatam.11.16.94)

रक्तमाल्याम्बरधरां चतुरास्यां चतुर्भुजाम् । द्विनेत्रां स्रुक्स्रुवो मालां कुण्डिकां चैव बिभ्रतीम् ॥

raktamālyāmbaradharāṁ caturāsyāṁ caturbhujām dvinetrāṁ sruksruvo mālāṁ kuṇḍikāṁ caiva bibhratīm

लाल माला और वस्त्र धारण करने वाली, चार मुख वाली, चार भुजाओं वाली, दो नेत्रों वाली, स्रुक्-स्रुवा, माला और कमण्डलु धारण करने वाली,

श्लोक 95 (devibhagavatam.11.16.95)

सर्वाभरणसन्दीप्तामृग्वेदाध्यायिनीं पराम् । हंसपत्रामाहवनीयमध्यस्थां ब्रह्मदेवताम् ॥

sarvābharaṇasandīptāmṛgvedādhyāyinīṁ parām haṁsapatrāmāhavanīyamadhyasthāṁ brahmadevatām

समस्त आभूषणों से देदीप्यमान, ऋग्वेद का अध्ययन करने वाली परम देवी, हंस पर आरूढ़, आहवनीय अग्नि के मध्य में स्थित, ब्रह्म-देवता,

श्लोक 96 (devibhagavatam.11.16.96)

चतुष्पदामष्टकुक्षिं सप्तशीर्षां महेश्वरीम् । अग्निवक्त्रां रुद्रशिखां विष्णुचित्तां तु भावयेत् ॥

catuṣpadāmaṣṭakukṣiṁ saptaśīrṣāṁ maheśvarīm agnivaktrāṁ rudraśikhāṁ viṣṇucittāṁ tu bhāvayet

चार चरणों वाली, आठ कुक्षियों वाली, सात शिरों वाली महेश्वरी — अग्नि जिसका मुख है, रुद्र जिसकी शिखा है, विष्णु जिसका चित्त है, ऐसा भावन करना चाहिए।

श्लोक 97 (devibhagavatam.11.16.97)

ब्रह्मा तु कवचं यस्या गोत्रं साङ्ख्यायनं स्मृतम् । आदित्यमण्डलान्तःस्थां ध्यायेद्देवीं महेश्वरीम् ॥

brahmā tu kavacaṁ yasyā gotraṁ sāṅkhyāyanaṁ smṛtam ādityamaṇḍalāntaḥsthāṁ dhyāyeddevīṁ maheśvarīm

जिनका कवच ब्रह्मा हैं और गोत्र साङ्ख्यायन स्मरण किया गया है, उस महेश्वरी देवी का सूर्य-मंडल के भीतर स्थित रूप में ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 98 (devibhagavatam.11.16.98)

एवं ध्यात्वा विधानेन गायत्रीं वेदमातरम् । ततो मुद्राः प्रकुर्वीत देव्याः प्रीतिकराः शुभाः ॥

evaṁ dhyātvā vidhānena gāyatrīṁ vedamātaram tato mudrāḥ prakurvīta devyāḥ prītikarāḥ śubhāḥ

इस प्रकार विधिपूर्वक वेदमाता गायत्री का ध्यान करके, तत्पश्चात् देवी को प्रसन्न करने वाली शुभ मुद्राएँ करनी चाहिए,

श्लोक 99 (devibhagavatam.11.16.99)

सुमुखं सपुटं चैव विततं विस्तृतं तथा । द्विमुखं त्रिमुखं चैव चतुष्कं पञ्चकं तथा ॥

sumukhaṁ sapuṭaṁ caiva vitataṁ vistṛtaṁ tathā dvimukhaṁ trimukhaṁ caiva catuṣkaṁ pañcakaṁ tathā

सुमुख, सपुट, वितत तथा विस्तृत; द्विमुख, त्रिमुख, चतुष्क तथा पंचक;

श्लोक 100 (devibhagavatam.11.16.100)

षण्मुखाधोमुखं चैव व्यापकाञ्जलिकं तथा । शकटं यमपाशं च ग्रथितं सन्मुखोन्मुखम् ॥

ṣaṇmukhādhomukhaṁ caiva vyāpakāñjalikaṁ tathā śakaṭaṁ yamapāśaṁ ca grathitaṁ sanmukhonmukham

षण्मुख, अधोमुख तथा व्यापकांजलिक; शकट, यमपाश, ग्रथित तथा सन्मुखोन्मुख;

श्लोक 101 (devibhagavatam.11.16.101)

विलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यं कूर्मं वराहकम् । सिंहाक्रान्तं महाक्रान्तं मुद्गरं पल्लवं तथा ॥

vilambaṁ muṣṭikaṁ caiva matsyaṁ kūrmaṁ varāhakam siṁhākrāntaṁ mahākrāntaṁ mudgaraṁ pallavaṁ tathā

विलम्ब तथा मुष्टिक; मत्स्य, कूर्म तथा वराह; सिंहाक्रान्त, महाक्रान्त, मुद्गर तथा पल्लव।

श्लोक 102 (devibhagavatam.11.16.102)

चतुर्विंशतिमुद्राश्च गायत्र्याः सम्प्रदर्शयेत् । शताक्षरां च गायत्रीं सकृदावर्तयेत्सुधीः ॥

caturviṁśatimudrāśca gāyatryāḥ sampradarśayet śatākṣarāṁ ca gāyatrīṁ sakṛdāvartayetsudhīḥ

इस प्रकार गायत्री की चौबीस मुद्राओं का प्रदर्शन करना चाहिए, और बुद्धिमान व्यक्ति सौ अक्षरों वाली गायत्री का एक बार आवर्तन करे।

श्लोक 103 (devibhagavatam.11.16.103)

चतुर्विंशत्यक्षराणि गायत्र्या कीर्तितानि हि । जातवेदसनाम्नीं च ऋचमुच्चारयेत्ततः ॥

caturviṁśatyakṣarāṇi gāyatryā kīrtitāni hi jātavedasanāmnīṁ ca ṛcamuccārayettataḥ

गायत्री के चौबीस अक्षर कहे गए हैं; तत्पश्चात् 'जातवेदसे' नाम वाली ऋचा का उच्चारण करना चाहिए।

श्लोक 104 (devibhagavatam.11.16.104)

त्र्यम्बकस्यर्चमावृत्य गायत्री शतवर्णका । भवतीयं महापुण्या सकृज्जप्या बुधैरियम् ॥

tryambakasyarcamāvṛtya gāyatrī śatavarṇakā bhavatīyaṁ mahāpuṇyā sakṛjjapyā budhairiyam

त्र्यम्बक ऋचा को दोहराकर यह सौ अक्षरों वाली गायत्री बनती है — यह अत्यंत पुण्यदायी है, बुद्धिमान इसे एक बार जपते हैं।

श्लोक 105 (devibhagavatam.11.16.105)

ओङ्कारं पूर्वमुच्चार्य भूर्भुवः स्वस्तथैव च । चतुर्विंशत्यक्षरां च गायत्रीं प्रोच्चरेत्ततः ॥

oṅkāraṁ pūrvamuccārya bhūrbhuvaḥ svastathaiva ca caturviṁśatyakṣarāṁ ca gāyatrīṁ proccarettataḥ

पहले ओंकार का उच्चारण करके, फिर भूः-भुवः-स्वः, और तत्पश्चात् चौबीस अक्षरों वाली गायत्री का उच्चारण करना चाहिए।

श्लोक 106 (devibhagavatam.11.16.106)

एवं नित्यं जपं कुर्याद्ब्राह्मणो विप्रपुङ्गवः । स समग्रं फलं प्राप्य सन्ध्यायाः सुखमेधते ॥

evaṁ nityaṁ japaṁ kuryādbrāhmaṇo viprapuṅgavaḥ sa samagraṁ phalaṁ prāpya sandhyāyāḥ sukhamedhate

इस प्रकार विप्रश्रेष्ठ ब्राह्मण को नित्य जप करना चाहिए; वह संध्या का सम्पूर्ण फल पाकर सुख से समृद्ध होता है।

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